मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “अवकाश.. शोध अंतराळाचा” – संपादक : निखिल विद्याधर पंडितराव ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

“अवकाश.. शोध अंतराळाचा” – संपादक : निखिल विद्याधर पंडितराव ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक : अवकाश … शोध अंतराळाचा 

संपादक : निखिल विद्याधर पंडितराव

पृष्ठ : २००

मूल्य : २४०₹

पृथ्वी भोवतीचे अवकाश… अथांग पोकळी… गूढ… विस्मयकारी… कुतूहल जागवणारी… अभ्यासक, संशोधकांना खुणावणारी… अब्जावधी वर्षांचं संचित सोबत बाळगणारी… ग्रह-ताऱ्यांना मिरविणारी… आव्हान देणारी… पृथ्वी नावाच्या ग्रहावरील मनुष्यप्राण्यास सदोदित मोहवणारी….

आतापर्यंत झालेल्या संशोधनातून या अवकाश विश्वाबद्दलचे केवळ ज्ञानच वाढले नाही तर भविष्यातील पिढ्यांना दूर अंतराळाच्या पोकळीमध्ये अखंड फिरणाऱ्या ताऱ्यांना स्पर्श करण्यासाठी, तेथे पोहोचण्यासाठी सातत्याने प्रेरित केले आहे. अनंत शक्यतांची पडताळणी करून शोध आणि नवनिर्मितीचा प्रवास सुरू ठेवण्यासाठी… आपल्या सूर्यमालेबाहेरील ताऱ्यांभोवती फिरणाऱ्या ग्रहांच्या शोधामुळे पृथ्वीच्या पलीकडेही जीवन आहे का, हे पाहण्याची उत्कंठा वाढली आहे. अवकाश संशोधनामध्ये सातत्याने होत असलेली प्रगती ही उदयोन्मुख तंत्रज्ञान आणि विश्वाचे अमर्याद रहस्य उलगडण्याच्या प्रयत्नांचाच एक भाग असेल. याचाच घेतलेला वेध म्हणजे ‘अवकाश’ हे पुस्तक…

अवकाश’ हे पुस्तक अशा सर्व गोष्टींवर भाष्य करते. अवकाशाच्या अमर्याद ताकदीबाबत आपल्याला माहिती करून देते. भारताला प्राचीन काळापासून खगोलशास्त्रीय परंपरा लाभली आहेच; त्याला विज्ञानाची जोड मिळत गेली आणि आज विज्ञानाधिष्ठीत समाज घडवण्यामध्ये इस्त्रो, नासा आदी अनेक संस्था प्रत्यक्षात काम करत आहेत. अवकाशातील विश्वाबद्दल आपले आकर्षण संस्कृतीइतकेच प्राचीन आहे. पृथ्वीच्या पलीकडे जाऊन अत्याधुनिक मोहिमा भारताने यशस्वी करून दाखवल्या आहेत. पृथ्वीच्या पलीकडे असणारे विश्व समजून घेण्याच्या प्रयत्न सातत्याने केला आहे, करत आहोत आणि करत राहणार आहोत. ‘अवकाश’ या पुस्तकात याचाच वेध घेण्याचा प्रयत्न केला आहे. महत्त्वाकांक्षा, संशोधन आणि भविष्यात अवकाशातील माणसांचे जगणे या सगळ्यांचा वेध घेण्याचा प्रयत्न या पुस्तकातून केला आहे.

या पुस्तकात भूषण जोशी, डॉ. बाळ फोंडके, अच्युत गोडबोले/आसावरी निफाडकर, सुरेश नाईक, डॉ. पंडित विद्यासागर, डॉ. अनिल लचके, प्रा. डॉ. आर. श्रीआनंद, डॉ. श्रीकांत कार्लेकर, डॉ. संजय ढोले, डॉ. प्रकाश तुपे, प्रमोद काळे, अथर्व पाठक, सुधीर फाकटकर, अनघा शिराळकर, बी. एच. पाटील, सोनल थोरवे, डॉ. व्ही. एन. शिंदे, दिशा सावंत, सुरेंद्र पाटसकर, गोपाळ कुलकर्णी, सारंग खानापूरकर, मानसी शहा, संजय उपाध्ये यांनी सर्वस्पर्शी अवकाशाचा वेध घेतला आहे. भारताच्या अंतराळ संशोधनातील उल्लेखनीय प्रगतीवर प्रकाश टाकणारे विविध लेख त्यामध्ये एकत्र केलेले आहेत, ज्यामध्ये चांद्रयानपासून विविध मोहिमांचा समावेश आहे. या पुस्तकातील प्रत्येक प्रकरण नवी दृष्टी, विज्ञान आपल्यासमोर उभे करते.

या पुस्तकातून विज्ञान, तंत्रज्ञान आणि अवकाश संशोधन क्षेत्राच्या भूत, वर्तमान आणि भविष्यातील योजनांच्या वाटचालीविषयीचा मांडलेला पट नक्कीच उपयुक्त ठरणारा असेल.

परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४३ – बुन्देली कविता – ”रिश्ते-नाते टोरत जा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – रिश्ते-नाते टोरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४३ ☆

☆ बुन्देली कविता – रिश्ते-नाते टोरत जा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

रिश्ते-नाते टोरत जा रय

मन की खीब बहोरत जा रय

*

हाँत फेर खें बे समझाउत

तुम उनखें झकझोरत जा रय

*

निकरौ बाहर खीब सपर लव

गैरी नदिया लोरत जा रय

*

कैत भले की, काय सुनत नइँ

जबरइँ दाँत निपोरत जा रय

*

राम-लखन ने तिलक लगाये

तुलसी चंदन गोरत जा रय

*

बे गोबिन्दा पहलमान हैं

कई मटकियाँ फोरत जा रय

*

पंडत जी खें काय भिड़ा दव

‘भगवत’ सपरत-खोरत जा रय

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मंज़िल पर फ़ैसला… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “मंज़िल पर फ़ैसला…

? मंज़िल पर फ़ैसला ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

 

फ़ैसला मंज़िल पर ही होगा

अभी से कैसे उसे बेवफ़ा कह दूँ

सफ़र मुकम्मल तो होने दो

बेबुनियाद इल्ज़ाम कैसे लगा दूँ

 *

अभी ख़ामोश हैं ये सर्द हवाएँ

लिए धड़कनों में उसका नाम

ये तो वक्त़ की तंगदिली है

इसे जुदाई का नाम कैसे दे दूँ

 *

तमाम मोड़ हैं बाक़ी राहों में

कई इम्तिहाँ अभी भी हैं बरक़रार

अधूरी सी इस दास्ताँ को ख़त्म

होने का ऐलान  कैसे कर दूँ

 *

नज़र की धुंध छँट जाएगी

हक़ीक़तें भी सामने आएँगी

अभी  तो  सच है अधूरा

यूँही ऐलानबेवफ़ा कैसे कर दूँ

 *

आफ़ताबये इश्क़ ठहरता नहीं

वक्त़ के साथ ही निखरता है

कल क्या रंग दिखाएगा ये

अभी से कैसे दूरअंदेशी कर दूँ

 *

वो धुंध में नहीं, मेरे यक़ीन में साफ़ है…!

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता ? ?

नाज़ुक होती हैं

कविता की अँगुलियाँ

नरम होती हैं

कविता की हथेलियाँ

स्निग्ध होते हैं पाँव

जैसे केसर-मलाई का लेप

दूधिया तलवे

जो मखमली दूब पर चलें

तो दूब की छाप

उन पर उभर आए,

यों समझो,

एकदम नाज़ुक

एकदम मुलायम

एकदम नरम

सुडौल

भरी-भरी देह वाली

बेहद सुंदर

बलखाती औरत-सी

होती है कविता;

प्रौढ़ शिक्षा वर्ग में

शिक्षक महोदय पढ़ा रहे थे,

वो मजदूर औरत

चुपचाप देखती रही

अपनी खुरदुरी हथेलियाँ

कटी-छिली अँगुलियाँ

मिट्टी सने पैर

बिवाइयों भरे तलवे

बेडौल

जगह-जगह से पिचकी-सी देह

उसका जी हुआ

उठे और चिल्लाकर कहे-

नहीं माटसाब!

कविता ऐसी भी होती है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ युद्ध… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ युद्ध… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(वन लाइनर)

वे शांति- स्थापना को संकल्पित हैं। उन्हें कलम की ताकत पर पूरा भरोसा है जितना ट्रंप को अपने सिरफिरे बयानों पर। लिहाज़ा एक बुद्धिवादी संगठन ने बुद्धिजीवियों को आमंत्रित किया है शांति स्थापना के लिए। कुछ लोग दो, तो कुछ लोग चार चक्रवाहिनियों पर सवार होकर बड़ी दूर से आए हैं। भई साहित्यकारों का भी तो कोई कर्तव्य बनता है कि नहीं !

बेशक वे अस्त्र-शस्त्रों से लैस नहीं हैं पर उनके पास शब्दों का आयरन डोम, शब्दों के मिसाइल, शब्दों के ड्रोन, शब्दों के बी-2 बाॅम्बर, शब्दों के एफ-35 क्या नहीं है उनके पास? ईरान-इजराइल युद्ध में इंसानियत का जनाज़ा निकलते देख कर वे कैसे चुप रह सकते हैं? यह तो कायरता हुई।

महाभारत काल, प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध ब्ब्रिटेन का साम्राज्यवाद, बांग्लादेश, अमेरिका और वेनेजुएला, वियतनाम, अफगानिस्तान, यूक्रेन, इराक, सीरिया, लीबिया, गाज़ा, यू .एन सभी चर्चा के केंद्र में रहे। बुद्धिजीवियों के माथे पर चिंता का संजाल नज़र आया।

चाय-पानी पीकर लेखक ज्वाला जी निकले। उन्हें जरा भी चैन न था। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खरबपति मालिक या युग के खलनायक, सनकी तानाशाह और बिजूका यू .एन। नक्कारखाने में तूती की आवाज भला कौन सुनेगा? वे बेहद अशांत थे। सभी शब्दों से शांति-शांति पुकार रहे थे जैसे वह आने ही वाली है। इस मंथन से मोहिनी की तरह अमृत घट लेकर प्रकट होने ही वाली है।

ज्वाला जी की आंखों के सामने शब्दों के समानांतर वो तस्वीरें उभर रही थी, ठीक उसी समय कितने ही लोग घायल, अपाहिज, लहूलुहान, मृत या भूखे-प्यासे तड़प रहे होंगे, गैस फील्ड, ऑयल रिफाइनरी जल रही होंगी ! आसमान काले धुएं से भर गया होगा। सायरन बज रहे होंगे। खण्डहर हो रही होंगी सारी इमारतें !

तो सचमुच शब्दों की शांति हुक्मरानों के सनकी दिमाग तक पहुंच पाएगी? ज्वाला जी स्वयं को समझा नहीं पा रहे थे, कहीं यह स्वयं को विचारक, चिंतक सिद्ध करने का निरीह प्रयास तो नहीं? या महज प्रदर्शन स्वयं को शांतिप्रिय सिद्ध करने का। उन्होंने सभी उपस्थितों की आंखों में, अगले दिन अखबार में छपनेवाली अपनी अपनी तस्वीरें, नाम, बयान देख लिए थे।

कहते हैं कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है। क्या यह सही है? पर मौन भी तो ठीक नहीं। इसे मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की कोशिश कह सकते हैं ! उन्हें लग रहा है वे खुद को नहीं समझा पाएँगे। और वे लगातार स्वयं से युद्ध रत हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९९ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९९ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक : सुरेश पटवा

प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल

मूल्य : ₹250

☆ विसंगतियों के विरूद्ध तीखा प्रतिकार है ‘व्यंग्य पच्चीसी’- – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी साहित्य जगत में अपनी बहुआयामी लेखनी से विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ रचनाकार सुरेश पटवा अब व्यंग्य की दुनिया में अपनी नई कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के साथ उपस्थित हैं। मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित यह संग्रह पटवा जी के गहन अनुभवों और समाज की विसंगतियों पर उनके पैनी दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।

 

विविधतापूर्ण लेखन का विस्तार

१९५२ में जन्मे सुरेश चंद्र पटवा एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक हैं, जिनकी स्वीकार्यता उनके भाषाई कौशल और पाठकीय संप्रेषणीयता से स्व-प्रमाणित है। बाल साहित्य, प्रकृति वर्णन, इतिहास, फिल्म जगत और मनोविज्ञान जैसे विविध विषयों पर अधिकारपूर्वक लिखने वाले पटवा जी ‘प्रयोगवादी’ रचनाकार हैं। ‘हिन्दू प्रतिरोध गाथा’ जैसी ऐतिहासिक कृति हो या ‘जंगल की सैर’ जैसी बाल रचना, उन्होंने हर विधा में अपनी शोधपरक दृष्टि का परिचय दिया है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पटवा जी का प्रथम व्यंग्य केंद्रित संग्रह है, जो समकालीन व्यंग्य लेखन की स्थापित सीमाओं को तोड़ता है। इनके आलेख किसी अखबार की शब्द-सीमा में बंधे न होकर विषय का विस्तार से विश्लेषण करते हैं। संग्रह में शामिल ‘अथ श्री मोबाइल कथा’ और ‘स्वर्गीय फेसबुकिया से संवाद’ आज के डिजिटल युग की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करते हैं। बिना पढ़े संदेश फॉरवर्ड करने की अंधी दौड़ और आभासी दुनिया में सक्रियता की होड़ को उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से उकेरा है।

साहित्यिक जगत पर कटाक्ष

संग्रह की रचनाएं जैसे ‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ लेखकों के ही आपसी अंतर्विरोधों और साहित्यिक परिवेश के वर्तमान हाल को उजागर करती हैं। वे बड़ी बेबाकी से लिखते हैं— “साहित्यजीवी भैया, असल में ईनाम वाली किताब और बिकने वाली किताब अलग-अलग होती हैं।” लोकभाषा का पुट और संवाद शैली उनके व्यंग्यों को और भी मारक बनाती है। ‘मैथी में पका नीम चढ़ा करेला’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से वे भाषाई उन्मुक्तता के साथ समाज और व्यवस्था पर चोट करते हैं।

अनुभव की परिपक्वता

अपने बैंक अधिकारी के सेवाकाल के अनुभवों को उन्होंने ‘छिद्दी का बकरी लोन’ जैसे व्यंग्य में पिरोया है, जो भ्रष्टाचार की जड़ों तक ले जाता है। वहीं ‘ओम बजटाय नमः’ और ‘अथ श्री कल्कि पुराण कथा’ जैसे शीर्षक दर्शाते हैं कि उन पर हरिशंकर परसाई जैसी महान व्यंग्य परंपरा का गहरा प्रभाव है, जिसे उन्होंने अपनी मौलिकता के साथ आगे बढ़ाया है।

निष्कर्ष

व्यंग्य केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने के लिए होता है। पटवा जी की यह कृति पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। बदलते समय के साथ जब घटनाएं खुद को दोहराती हैं, तब ये व्यंग्य और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। निश्चित ही, ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के माध्यम से सुरेश पटवा जी समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में एक सक्षम और संभावनाओं से भरपूर व्यंग्यकार के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ेंगे।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१६ – भारत की है शान, वंदेमातरम ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “भारत की है शान, वंदेमातरम। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१६ ☆

☆ भारत की है शान, वंदेमातरम… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

भारत की है शान, वंदेमातरम।

बंकिम जी का गान वंदेमातरम।।

 *

गोरों से लड़ी लड़ाई थी सबने।

आजादी का ज्ञान वंदेमातरम।।

 *

गाथाएँ बलिदानों की भरी हुईं।

जनता की अब तान, वंदेमातरम।।

 *

गांधी सुभाष आजाद भगत नारा।

स्वतन्त्रता बलिदान, वंदेमातरम।।

 *

झुका न पाया कभी तिरंगा कोई।

रखे हथेली जान, वंदेमातरम।।

 *

परिवर्तन आंदोलन का शस्त्र बने।

इस पर अब अभिमान, वंदेमातरम।।

 *

सैनिक कर्ज चुकाएँगे सीमा पर

कर्तव्यों का भान, वंदेमातरम।।

 *

राष्ट्रभक्ति की अलख जगाएंगे हम।

गाएंगे सब गान, वंदेमातरम।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६१ आद्या कीआराधना – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित लघुकथा आद्या कीआराधना ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६१ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕आद्या कीआराधना 🚩

बड़े भक्ति भाव से जिन कन्याओं को सिध्दी दात्री नवदुर्गा पूजन के बाद मंदिर में तामझाम के साथ कन्या भोज कराया गया था। समाज सेवक और कुछ शुभ चिंतकों की तस्वीरें दिखाई दे रही थी। लग रहा था, श्रद्धा की भावना उमड़ रही है।

आज भोर होते ही आसपास की सभी बिटिया मंदिरों पर सफाई करते नजर आई।

पान चबाते वही सब कहते जा रहे थे – – – देख वहाँ से सब साफ होना चाहिए। एक भी कचरा नही होना चाहिए।

माथे पर जय माता दी की पट्टी लगाये सभी बालिकाएं मंदिर की साफ सफाई करते भगवती को सुना रही थी–झुन झुन झननन बाजे मैय्या पाँव पैजनियांँ।

कैसी आद्या शक्ति की भक्ति।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७२ – देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७२ ☆ देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज उपरोक्त ख़बर दैनिक समाचार पत्र में पढ़ी तो बड़ा सुकून मिला। जबसे होश संभाला है, जीवन में जब भी कोई मिला, हर व्यक्ति ये ही कहता रहा, “तुम कुछ भी नहीं करते हो”।

आज इस खबर से बड़ी राहत मिली। बचपन में पाठशाला के शिक्षक, परिजन आदि सभी ये ही कहते थे, कब तुम कुछ करोगे? अब बड़े हो रहे हो, कब कुछ करोगे ?

महाविद्यालय के गुरुजन भी ये ही तोहमत दिया करते थे। जीवन में क्या करोगे? आदि आदि। विवाहोपरांत भी पत्नी ये ही कहती आ रही हैं, तुम तो निठल्ले हो, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है।

कार्यालय के साथी भी वरिष्ठ अधिकारी से कह देते थे, हमारे पास तो कोई काम है, ही नहीं, इसी चक्कर में सभी सीटों का पेंडिंग कार्य हमें ही करना पड़ता था। ठप्पा जो लगा हुआ था, कि हमारे सीट पर कुछ भी काम नहीं है।

बच्चे, अब बड़े हो गए हैं, वो भी मीठे शब्दों में ऐसा ही कुछ कह देते हैं। जो करना है, जल्दी करना आरंभ कर देवें। जीवन में एक्टिव रहना चाहिए।

मित्र मंडली भी खुले आम, भरी महफिलों में हमारी फुरसतिया आदत का मखौल उड़ाते रहते हैं।

अब सब का मुंह बंद हो जायेगा, जब उनको मालूम चलेगा हम वर्षों से कुछ नहीं कर, दिमाग को ब्रेक दिए हुए हैं। अब जब भी ब्रेक समाप्त होगा, हम बहुत कुछ कर सकने लायक बन जाएंगे। बस दिल साथ नहीं दे रहा, वो कमबख्त तो ये चाहता है, हम कभी भी कुछ ना करें।

हद, तो तब हो जाती है, दिल के निकट वाले दोस्त इस लेख को पढ़ कर ये कह देते हैं, उसके पास कोई काम नहीं है, बस मोबाइल में कुछ भी लिख कर सांझा कर देता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५८ ⇒ विचारों का लॉक डाउन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारों का लॉक डाउन।)

?अभी अभी # ९५८ ⇒ आलेख – विचारों का लॉक डाउन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चित्त, मन और बुद्धि के साम्राज्य में विचार कहां से उठते हैं, कहां चले जाते हैं, कहना बड़ा मुश्किल होता है। विचार आपके कहने से नहीं आता। जब किसी एक विषय पर आप अपना मन केंद्रित करते हैं, तब विचारों को एक दिशा अवश्य मिल जाती है।

एकांत हो, और लेखन का मूड हो, तो विचार मानो नोट बंदी की कतार में खड़े मिलते हैं। मेरा नंबर कब आयेगा! कुछ विचार ऐसे भी होते हैं जो कतार तोड़कर आगे निकल जाते हैं। अगर इनकी तकदीर अच्छी हुई तो उनको लेखक के पन्नों में जगह मिल जाती है। कभी कभी तो विचारों का आगमन तय होता है और इतने में ही पत्नी चाय का प्याला लेकर चली आती है, और आया हुआ विचार चाय की भाप के साथ हवा हो जाता है।।

विचारों को जितनी जल्दी कलम में कैद कर लिया जाए उतना अच्छा क्योंकि विचारों की फितरत आवारा किस्म की होती है। आज ऐसा ही कुछ अहसास हुआ, जब कुछ लिखने के लिए कलम उठाई। विषय तक तय था लेकिन अचानक विचारों पर ऐसा ब्रेक लगा, मानो लॉक डाउन घोषित हो गया हो। बहुत दिमाग पर ज़ोर डाला, लेकिन न तो वह शीर्षक स्मृति में वापस आया, न ही कोई विचार।

मैं आंखें बंद करके लेट गया।

आसपास की आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थी, लेकिन विचारों का आवागमन पूरी तरह बंद था। सृजन की अवस्था से अचानक एक बंजर जमीन जैसी अवस्था किसी को भी असहज कर सकती है, लेकिन मैं इस अवस्था में भी आनंद तलाश कर रहा था। बिना प्रयत्न किए, विचार शून्य होना, सहजावस्था के संकेत हैं। जो चित्त हमेशा समुद्र की लहरों की तरह अशांत रहता है, अचानक गहरे पानी पैठ गया है। वहां कोई हलचल नहीं, कोई सात्विक, राजसी अथवा तामसी विचार नहीं।।

उस विचारशून्य अवस्था से जब पुनः विचारों के प्रवाह ने मुझे झंझोड़ा, तब मुझे आभास हुआ मैं विचारों के शून्य से गुजर चुका हूं। विचारों का लॉक डाउन समाप्त हो गया है, अब विचार किसी के बाप से नहीं रुकने वाले।

शून्य में ऐसा क्या है, जो किसी अंक में नहीं। क्या विचारों के अभाव का चित्त पर इतना प्रभाव पड़ता है कि वह संकल्प विकल्प करना भूल जाता है। यह वह अवस्था नहीं जिसे किंकर्तव्यविमूढ़ कहा जाता है। विचारों का अभाव ही ध्यान है, समाधि है, जहां प्रज्ञा पूर्ण रूपेण जाग्रत रहती है। विचारशून्यता एक ऐसा आकाश है, जहां जागृति होते हुए भी जड़ता नजर आती है। हमारा अस्तित्व उसी शून्य से है, वही संभवतः चिदाकाश है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares