(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके उपन्यास “यादों में गौरैया” के विचारणीय अंश – – सावधान! यहाँ यादें वर्जित हैं ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९१ ☆
☆ कथा कहानी – सावधान! यहाँ यादें वर्जित हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
(‘यादों में गौरैया’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि हमारी लुप्त होती संवेदनाओं और व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ का एक अत्यंत तीखा और मर्मभेदी प्रहार है। कहानी एक नन्ही गौरैया के बहाने शुरू होती है, लेकिन देखते ही देखते सत्ता के गलियारों, स्वार्थी राजनेताओं और भ्रष्ट ठेकेदारों के उस तिलिस्म को बेनकाब कर देती है, जहाँ मासूमियत भी ‘फंड’ और ‘घपलों’ की भेंट चढ़ जाती है। महान व्यंग्यकारों की परंपरा को आगे बढ़ाता यह उपन्यास अपनी चुटीली भाषा और गहरे कटाक्षों से पाठक को भीतर तक झकझोरता है और एक चुभता हुआ सवाल छोड़ जाता है कि क्या विकास की इस अंधी दौड़ में हमने अपनी मनुष्यता खो दी है? यदि आप समाज की कड़वी सच्चाइयों को व्यंग्य के आईने में देखना चाहते हैं, तो यह कृति आपके संग्रह में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, क्योंकि यह गौरैया की तलाश नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर मरती संवेदनाओं की पुकार है। यह उपन्यास ई-कॉमर्स प्लेटफोर्म अमेज़न पर उपलब्ध है।)
उस पुराने मकान की ढहरी हुई मुंडेर पर बैठी वह गौरैया अब घर की मालकिन नहीं, बल्कि एक अनधिकार चेष्टा थी। पिता की मृत्यु के बाद घर की चौखट अचानक ऊँची हो गई थी और माँ की अर्थी के साथ ही वे तमाम स्मृतियाँ भी विदा हो गईं जो ईंट-गारे के इस ढाँचे को ‘मायका’ कहती थीं। अब वहाँ नीम का वह पेड़ मात्र एक लकड़ी का लट्ठा था, जिसके नीचे बचपन की सिसकियाँ दफन थीं। भाई की आँखों में अब ममत्व की जगह खतौनी के नंबर चमकते थे और भौजाई की मुस्कुराहट में उस बासी बची हुई चाय की कड़वाहट थी, जो औपचारिकता के चूल्हे पर खौल रही थी। वह घर, जो कभी फेफड़ों की तरह साँस लेता था, अब एक निर्जीव अजायबघर बन चुका था जहाँ उसकी गुड़िया के टूटे हाथ और पुरानी कापियाँ ‘अतिक्रमण’ की श्रेणी में डाल दी गई थीं। वह अपनी ही जड़ों से उखड़े हुए उस गमले की तरह थी जिसे अब बरामदे के कोने में जगह मिलने पर अहसान मानना था।
सम्बन्धों की इस ढहती हुई सल्तनत में प्रतीक अब बदल चुके थे। पिता के चश्मे का शीशा जो कभी नैतिकता का लेंस था, अब धूल की परतों में सुबक रहा था। जिस कमरे में वह कभी बेखौफ होकर पैर फैलाती थी, वहाँ अब संदूक और फालतू सामान का पहरा था—मानो घर ने अपनी बेटी को पहचानने से इनकार कर दिया हो। मायका अब उस पुराने कोट की तरह था जिसे सहेजने का मन तो सबका था, पर पहनने का साहस किसी में नहीं। भाई के शब्द अब शहद में डुबाए हुए नश्तर थे, जो बार-बार यह अहसास दिलाते थे कि संभ्रांत परिवारों में विवाहित बेटियाँ केवल ‘अतिथि’ होती हैं, और अतिथि का अधिक ठहरना शास्त्र सम्मत नहीं। वह घर अब एक ऐसा भूगोल बन गया था जिसकी सीमा रेखाएं उसकी विदाई के दिन ही खींच दी गई थीं, बस सूचना का प्रेषण माता-पिता की अंतिम सांसों तक रुका हुआ था।
मायका एक मानसिक अवस्था थी, जो भौतिक देह के पंचतत्व में विलीन होते ही लुप्त हो गई। अब वहाँ केवल स्मृतियों का एक कबाड़खाना था जहाँ वह अपनी पहचान ढूँढने आई थी, पर उसे मिला केवल सन्नाटा और दीवारों पर जमी हुई सीलन। जिस आंगन को वह अपना ब्रह्मांड समझती थी, वह अब एक विवादित भूखंड मात्र था। वह खुद को उस डाकघर की तरह महसूस कर रही थी जहाँ पत्र तो आते हैं, पर पाने वाले का पता बदल चुका होता है। माँ की रसोई अब एक प्रयोगशाला थी जहाँ केवल नपे-तुले रिश्तों का स्वाद चखा जाता था। वहाँ अब प्रेम की जगह प्रोटोकॉल ने ले ली थी। वह समझ गई कि माता-पिता के बिना मायका केवल एक रूपक है, जिसे समाज ने लड़कियों को बहलाने के लिए गढ़ा था ताकि वे अपनी जड़ों की तलाश में भटकती रहें।
अंतिम दिन जब वह चलने लगी, तो भाई ने उसे एक पुराना पीतल का लोटा थमा दिया—शायद विरासत का अंतिम अवशेष। उसने लोटे में झाँका, वह खाली था, बिल्कुल उसके मायके के अहसास की तरह। तभी उसने देखा कि आँगन के बीचों-बीच लगा वह पुराना अमरूद का पेड़, जिसे उसने अपने हाथों से सींचा था, रातों-रात काटकर जड़ से उखाड़ दिया गया था। उसने सिसकते हुए पूछा—”यह क्या हुआ?” भाई ने बड़ी सहजता से कहा—”बहन, इस जगह अब कार पार्किंग बनेगी, बेवजह जड़ें नींव हिला रही थीं।” उसने अपना सूटकेस उठाया और मुड़कर देखा, तो पाया कि घर के मुख्य द्वार पर उसके नाम की नेमप्लेट (पिता ने अपनी बेटी के नाम पर ही घर का नेमप्लेट बनवाया था) की जगह ‘सावधान, कुत्तों से बचें’ का बोर्ड टंग चुका था। वह घर जिसे वह अपना समझ रही थी, दरअसल एक श्मशान था जहाँ उसकी यादों का अंतिम संस्कार पहले ही हो चुका था। उसने लोटा वहीं छोड़ा और बिना पीछे मुड़े उस ‘पार्किंग लॉट’ से बाहर निकल गई।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८५ ☆
☆माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भारत की आत्मा यदि किसी एक धारा में बहती हुई महसूस की जाए, तो वह है माँ गंगा। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातनी लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है।
तीर्थ अनेकों आपके, भक्त तारतीं आप।
संगम की महिमा अमिट, हर लें सब संताप।।
सच में, गंगा केवल जल नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। भारत के अनगिनत तीर्थ, घाट और नगर इसी पवित्र धारा के किनारे बसे हैं, जहाँ आज भी लोग अपने दुःखों का विसर्जन कर शांति का अनुभव करते हैं।
माँ गंगा का भौतिक उद्गम गौमुख (गंगोत्री ग्लेशियर) से माना जाता है। यहाँ से निकलने वाली धारा “भागीरथी” कहलाती है, जो आगे चलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है और तभी “गंगा” नाम धारण करती है।
यहाँ एक अद्भुत समन्वय दिखता है—आध्यात्मिक कथा कहती है कि राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं, जबकि विज्ञान बताता है कि यह हिमनदों के पिघलने से बनी एक विशाल नदी तंत्र है। जीवन को सींचती हुई यात्रा…
उद्गम गौमुख आपका, गंगोत्री हरिद्वार।
वाराणसी प्रयाग माँ, कल-कल जल रसधार।।
गंगा हरिद्वार से मैदानों में प्रवेश करती है, जहाँ इसका स्वरूप और भी विशाल और जीवनदायिनी हो जाता है।
फिर प्रयागराज में यमुना और अदृश्य सरस्वती के साथ त्रिवेणी संगम बनाती है—यह स्थान आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आगे वाराणसी जैसे प्राचीन नगर में गंगा मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों का गहरा संबंध इस नदी से जुड़ता है।
गंगा की धारा अनेक शहरों और संस्कृतियों को जोड़ती हुई आगे बढ़ती है…
कोलकता, कानपुर, गाजी, पटना धाम।
जीवनदायनि मातु हैं, सदा बहें अविराम।।
कानपुर, पटना और कोलकाता जैसे बड़े नगरों से गुजरते हुए अंततः गंगा, गंगा सागर में समुद्र से मिल जाती हैं।
यह मिलन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक है—जीवन की यात्रा का अंतिम समर्पण।
क्यों विशेष है गंगा जल?
आधुनिक विज्ञान भी गंगा की विशेषताओं को स्वीकार करता है। शोध बताते हैं कि गंगा जल में स्वयं शुद्धिकरण (self-purification) की अद्भुत क्षमता होती है, जिसका कारण उसमें पाए जाने वाले विशेष जीवाणु और खनिज हैं।
यही कारण है कि गंगा जल लंबे समय तक खराब नहीं होता—यह बात आज के युवाओं को विज्ञान के माध्यम से जोड़ती है।आज की युवा पीढ़ी के लिए गंगा केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का आह्वान है।
गंगा हमें सिखाती है—
निरंतर बहते रहना
सबको जोड़ना
और स्वयं को समर्पित करना
यदि हम गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाए रखें, तो यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनी रहेगी।
देवनदी मंदाकिनी, विष्णुपगी ध्रुवनन्द।
सुरसरिता माँ जाह्नवी, देतीं परमानन्द।।
माँ गंगा सच में “जाह्नवी”, “सुरसरिता” और “देवनदी” हैं—जो केवल शरीर ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र करती हैं।
माँ गंगा की यह यात्रा—गौमुख से गंगा सागर तक—हमें जीवन का गूढ़ संदेश देती है:
“बहते रहो, जोड़ते रहो, और अंततः समर्पण में ही पूर्णता है।”
यही गंगा है—आस्था भी, विज्ञान भी, और जीवन का सार भी।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४११ ☆
आलेख – साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।
साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा, तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के ‘प्राण’ को अपनी कल्पना में जिया है।
सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है, व्यावसायिकता से किंचित परे है, वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय, निर्देशन, संपादन, लोकेशन, फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत, गायन वगैरह ढेर सारे लोग नहीं होते ।
जब प्रसाद जी लिखते हैं”तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन”तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है। फिल्मी धुनों में ऐसे गीत ‘शब्दनाद’ और गांभीर्य को खो देते है, जो मूल कृति की आत्मा थी।
फिल्मकार की कोशिश उसे ‘लोकप्रिय’ और ‘दृश्य-योग्य’ बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।
दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’ से लेकर अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’, आर.के. नारायण की ‘गाइड’ और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित ‘साँवरिया’ जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। ‘तीसरी कसम’ में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम ‘देवदास’ या ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।
फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके ‘उद्देश्य’ और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।
अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो ‘शब्दनाद’ हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है।
जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – “बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४६ ☆
☆ व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।
“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”
हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”
बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।
हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”
“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।
सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।
सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।
अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।
सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।
बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।
इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।
उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुगली पुलिया…“।)
अभी अभी # ९७३ ⇒ आलेख – चुगली पुलिया श्री प्रदीप शर्मा
ताल तो भोपाल का, बाकी सब तलैया है। आजकल बड़े बड़े फ्लाई ओवर बन रहे हैं, जब संसाधनों की कमी थी, नदियों पर पुल बनाए जाते थे और छोटे छोटे नालों पर बरसात के मौसम में आने जाने के लिए छोटा पुल बनाया जाता था।
हमारे शहर में आज भी कृष्णपुरा पुल है जो कभी सबसे बड़ा पुल कहलाता था। रामबाग और कृष्णापुरे के बीच, आज भी एक पुल है, जिसे बीच वाला पुल कहते थे। घर से स्कूल हम इसी पुल से जाते थे। दिन में तो ठीक, रात में इस पुल से गुजरने में डर लगता था। जब यह पुल बना होगा, किसी ने पुल की फर्शी पर ॐ लिख रखा था। चलते वक्त हमें ध्यान रखना पड़ता था, कहीं इस पर पांव न पड़ जाए। पुल के खत्म होने के पहले, एक पिलर से सटा हुआ, कुछ कटा हुआ, एक शब्द लिखा था कग्। रोज पुल पार करते वक्त ध्यान इसी पर रहता था, ॐ आ गया, अब कग् आएगा।।
पुल को अंग्रेजी में ब्रिज कहते है। मेरे शहर में मेरे देखते देखते, कितने ब्रिज बन गए। मुझे अच्छी तरह याद है, आज तिलक पथ पर कहां लोखंडे ब्रिज है, वहां कभी एक छोटी सी पुलिया थी। इस पार से उस पार जाने के लिए खतरों के खिलाड़ी की तरह, संभल संभल उतरे पारा वाला मामला था। हम बच्चे लोगों का तो कई बार पांव भी फिसल जाता था। पानी ज़्यादा नहीं होता था। एक तो mud स्नान और बाद में घर पर पहले तबीयत से पूजा, तत्पश्चात ठंडे पानी से स्नान।।
सारे पुल ब्रिज हुए अब ! ब्रिज तो हावड़ा का, बाकी सब culvert यानी पुलिया है। आज हमारे शहर में नदी तो एक ही है, जिसका सौंदर्यीकरण चल रहा है, लेकिन पुलियाओं की कोई कमी नहीं। बरसाती पानी के निकास के लिए नालों पर पुलिया बनाई जाती थी। नाले तो बंद हो जाते थी, पुलिया मशहूर हो जाती थी।
आज शहर में जगह जगह कई पुलियाएं हैं। किसी को तीन पुलिया कहते हैं, तो किसी को गमला पुलिया। सुबह की सैर पर जाने वाले स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए, ये पुलियाएं सुस्ताने के काम आती हैं। सुबह की सैर अकेले नहीं की जाती। चार पांच लोगों का ग्रुप हो, तो समय भी कट जाता है, और थकान भी महसूस नहीं होती। राजनीति, शेयर मार्केट, फिल्म और अफवाहों के अलावा और भी कई मसले होते हैं, जिन पर इन पुलियाओं पर विस्तृत चर्चा होती है।
कुछ पुलियाएं जो मंदिर के करीब स्थित हैं, शाम की आरती के बाद मोहल्ले की महिलाओं के लिए सुरक्षित होती हैं। वहां सड़क के दोनों ओर, आमने सामने एक एक पुलिया है जिसका नाम किसी ने निंदा पुलिया और चुगली पुलिया रख दिया है। निंदा और चुगली में भी अंतर होता है। निंदा तो किसी की भी की जा सकती है, लेकिन चुगली तो अपनों की ही हो सकती है।।
ऐसा माना जाता है कि निंदा खुले आम की जाती है लेकिन चुगली किसी से छुपाकर की जाती है। मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो, यह चुगली नहीं तो और क्या है।।
सास को बहू की निन्दा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए वह खुले आम निंदा पुलिया पर किसी भी बहू की निन्दा कर सकती है। बचपन में हम निंदा नहीं समझते थे, केवल चुगली से ही काम चला लिया करते थे। किसी के कान भरना क्या चुगली करना नहीं।
अगर पुलिया न होती, तो हम अपने दिल की बात कहां करते। दीवारों के भी कान होते हैं, पुलिया के कान, मुंह, आंख कुछ नहीं होते। आज तक किसी पुलिया ने इधर की बात इधर नहीं की। न कुछ लिया, न कुछ दिया। बस जो उस पर बैठा, उसको थोड़ा आराम दिया। उसे अपने मन की बात कहने का मौका दिया। कितनों ने पुलिया पर बैठकर अपनी फिक्र धुएं में उड़ाई है, कितने थके हुए राहगीरों ने यहां बैठकर राहत की सांस पाई है। क्या आपको कभी किसी पुलिया की याद आई है।।
– स्मृतिशेष वरिष्ठ पत्रकार मोहन शशि नहीं रहे – भावपूर्ण श्रद्धांजलि – ☆ साभार – श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’ –
हमारे आदरणीय श्री मोहन शशि जी
हमारे मोहल्ले के श्याम कक्का, लीला कक्का, एवं मोहन कक्का यह ऐसे नाम थे, जो सभी के जुबान में रटे थे। हम सभी मित्रों की नगर के समाचार पत्रों की पाठशाला उनके घर पर हुआ करती थी। संपादक होने के कारण उनके घर जबलपुर के सभी अखबार आया करते थे और लेखन अभिरुचि बचपन से होने की वजह से मुझे पढ़ने का बड़ा शौक रहता था। श्री मोहन शशि अपने भाइयों में सबसे छोटे थे।
समाचार पत्र नवभारत में पत्रकार होने के नाते पूरे शहर में उनकी धाक थी। मिलन संस्था का एक बड़ा नाम था। मोहन शशि जी ने जबलपुर में नौटंकी, कव्वाली, बेलबाग की मुजरा पार्टी जैसे कार्यक्रमों की जगह शहर में सांस्कृतिक एवं साहित्य कार्यक्रमों से हवा का रुख बदला और बड़े-बड़े स्टेज बनाकर या गीत संगीत का वातावरण बनाया।
उन्हीं कार्यक्रमों से नगर में के के नायकर, यंग आर्केस्ट्रा के रजनीकांत, दत्तात्रेय-हेमंत कुलकर्णी बंधु, निरंजन शर्मा जैसे अनेक कलाकार उभर कर आए और पूरे देश में छा गए।
उनके बड़े भाई श्री श्यामलाल यादव बाद में पार्षद भी बने। मोहल्ले के लड़के बिगड़े न इसलिए आदर्श छात्र मंडल संस्था को बनाया। लालचबूतरा एक मंच बना। जिसमें वर्ष भर ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते थे। जिसमें श्री लीलाधर यादव संयोजक बने। उस समय मिलन मित्रसंघ संस्था की धूम थी। सन् 1974-75 में श्री नाथ की तलैया में मिलन का एक भव्य कार्यक्रम होने वाला था। और उसी समय इलाहाबाद नाट्य संघ का कार्यक्रम भी तीन दिवसीय शहीद स्मारक में होने वाला था।
शशि जी इस कार्यक्रम में असुविधा महसूस कर रहे थे। तब उन्होंने हमारी संस्था को यह कार्यक्रम को करने का आफर दिया। हम लोगों ने कमर कसी मधुकर सरोज कोष्टा, शैलेश साहू, सुंदर लाल कोष्टा, महेश सिंह ठाकुर, मगन ठेकेदार सहित अनेक मित्र थे, मै (मनोज कुमार शुक्ल) सचिव था।
शहीद स्मारक में गेट के अगल-बगल दो खिड़कियां हुआ करतींः उसमें टिकट काउंटर के द्वारा अंदर प्रवेश मिलता था। अर्थात लोग टिकट खरीद कर ही कार्यक्रम को देखने जाते थे। इस तरह कार्यक्रम तीन दिनों तक चला जिसमें कई नाटक दिन में तीन नाटक संपन्न हुए। शशि जी समय निकालकर एक दो बार राउंड लगाते और खुश होते की आदर्श छात्र मंडल ने बखूबी अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। शहर में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए थे। पोस्टर बनाने में मधुकर सरोज कोष्टा सिद्ध हस्त थे। जिनकी आज देश में कई जगह चित्र प्रदर्शनी लग चुकीं हैं।
1978- 79 के दौरान हमारे एक कहानी संग्रह क्रांति समर्पण में श्री मोहन शशि ने भूमिका लिखी थी। इस कहानी संग्रह में पिता पुत्र की कहानियां थीं। श्री रामनाथ शुक्ल श्रीनाथ मेरे पिताजी थे। मिलन में मैं वर्षों कोषाध्यक्ष रहा। नौकरी की वजह से मैं इस शहर से उस शहर जाता रहा। जब गृह नगर आता तो उनसे अवश्य मिलता। तबसे लेकर आज तक उनका सानिध्य मुझे मिलता ही रहा है।
हमने नगर ही नहीं प्रदेश में सांस्कृतिक एवं साहित्यिक वातावरण की अलख जगाने वाले एक पुरोधा को खोया है। ईश्वर उन्हें अपने चरणों में जगह दे।
साभार – श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’, जबलपुर
🙏💐ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृतिशेष मोहन शशि जी को विनम्र श्रद्धांजलि💐🙏
≈संस्थापक संपादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. इन्द्र बहादुर खरे
☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ ☆
☆ “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(73 वी पुण्य तिथि 13 अप्रैल पर शत शत नमन)
बड़ी भली है अम्मा मेरी
ताजा दूध पिलाती है।
मीठे मीठे फल लेकर
मुझको रोज खिलाती है।
अपने समय में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल उपरोक्त मनमोहक काव्य पंक्तियों के रचयिता, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविदस्व श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपनी साहित्य साधना से राष्ट्रीय स्तर पर जबलपुर को गौरवान्वित किया था। खरे जीने अपने साहित्यिक जीवन में गद्य और पद्य में जो कुछ भी साहित्य सृजन किया उसने उनके समय में तो अपार लोकप्रियता अर्जित की ही बल्कि वह आज भी चर्चित, पठनीय और प्रभावी है।
हितकारणी कालेज के प्रारंभिक काल के प्रसिद्ध प्राध्यापक, जबलपुर के माडल हाई स्कूल के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विजन के फूल और भोर के गीत जैसी अनेक काव्य कृतियों के रचियता स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपने समय में अनेक साहित्यिक पुस्तकों के प्रतिष्ठित लेखकों के रुप में चर्चित रहे हैं लेकिन यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने समय में ऐसी पाठ्य पुस्तकों की रचना की जो कि उनके समय में पाठ्यक्रम में न केवल शामिल की गई बल्कि उपयोगी और ज्ञानवर्धक भी सिद्ध हुईं। शिक्षा जगत के लिए काफी पहले भारत के गौरवशाली इतिहास से छात्रों को परिचित कराने के लिए भारत वैभव के नाम से 3 भागों में विभक्त पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल की गई थीं जिसमें भारत वैभव के भाग 3 की रचना स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे नेकी थी।
सुभाष प्रिटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक में 21 अध्याय शामिल किये गए थे जिसमें हमारा देश, भारतीय स्वतंत्रता, 1857 की जनक्रांति, गांधीजी और असहयोग आंदोलन, हमारी राजनीतिक प्रगति, बारडोली सत्याग्रह और सरकारी दमन, 1934 से 1941 और 1942 से 1947 तक का कालखंड, आजादी के बाद का घटना चक्र इत्यादि प्रमुख विषयों से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण बातें समझाईं गयी थी।
आज अगर हम इस पुस्तक की विभिन्न बातों पर ध्यान दें तो हम आज भी ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से इस पुस्तक को शिक्षा जगत के लिए प्रासंगिक और उपयोगी पाते हैं। इस सबंध में स्व. श्री खरे जी के सुपुत्र आदरणीय श्री अमित रंजन जी ने भी पुस्तक में लिखा है कि आदरणीय पाठक स्वयं तय करें कि 150 में लिखी पुस्तक आज भी कहाँ तक उपयोगी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्व श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की अन्य पठनीय और लोकप्रिय कविताओं को पूर्व में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था जिनमें बड़ी भली है अम्मा मेरी, ताजा दूध पिलाती है, शिक्षा जगत में काफी लोकप्रिय और प्रभावी मानी जाती थी।
भोपाल के संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन खरे परिवार के सहयोग से किया गया है। इस पुस्तक का आवरण पृष्ठ भारत के नक्शे में महात्मा गॉंधी के चित्र के साथ काफी आकर्षक लग रहा है। इस पुस्तक के प्रकाशन से आदरणीय स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी का प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व और भारत के ऐतिहासिक महत्व की बातें दोनों ही दिल और दिमाग में ताजी हो गईं।
साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के ऐसे श्रद्धेय और प्रेरणा स्रोत पितृ पुरुष स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की पुण्यतिथि पर सादर स्मरण के साथ शत शत प्रणाम।