हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८७ – “रोज यही दोहराती घडियाँ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत रोज यही दोहराती घडियाँ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “रोज यही दोहराती घडियाँ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटा पंखा लगवाये

उपहार नहीं लेंगे

बाहर खटिया पर सोये

बाबा सब सहलेंगे

 

“संस्कार के नाम, त्याग

क्या किया पिताजी ने

मुश्किलात अब क्या हैं

उनको यह जीवन जीने”

 

कहकर बेटा तुरत फुरत

बाहर का रुख लेकर

निकल चुका होता कहता

हम क्या क्या कर लेंगे ?

 

उधर पूज्य माता जी

बैठीं चढ़ा चढ़ा पारा

अपनी बहू पवित्रा का

कर शापित भिनसारा

 

नाती की पसलियाँ पकड़

बैठीं सूखी खांसी

रोग इसी गर्मी में क्या

सब इंतकाम लेंगे

 

छोटीबहिन बागवाले

मंदिर के कोने से

टपर टपर बतियाती

किससे कई महीने से

 

बेटा सोच नहीं पाता

इस विकट परिस्थिति में

और पिता का कहना कि-

ऐसा , तो मर लेंगे

 

एक अनौखी कथा चला

करती है इस घरकी

रोज यही दोहराती घडियाँ

टिक-टिक दिनभर की

 

और चल रहा ढर्रा इनका

स्वाभिमान ढोते

हम यों लिख सकते यह

किस्सा बस क्या  करलेंगे?

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-06-2023

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मातृरेखा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मातृरेखा ? ?

उसके विश्वास के आगे

मेरी उम्र की रेखा

बचपन पर ठहरी रहती है,

मेरे बीमार पड़ने पर

‘बेटे को नज़र लग गई’

जब मेरी माँ कहती है!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता बांझ…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆

☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

वह सुकुमार सी कली

जो नाजो से थी पली

जो चिड़ियों सी चहकती थी

जो मोगरे की खुशबू सी महकती थी

जिसके पायल की आवाज से

सुबह खिलखिलाती थी

जिसके आरती के बाद

रात जवान हो जाती थी

जिसकी सांसों को सुनकर

पुरवाई चलती थी

उसकी मुस्कान से

उसकी गृहस्थी की

ज्योत जलती थी

 

वह आज गुमसुम

चुपचाप शांत है

शायद कोई बात है

जिससे भयाक्रांत है

उसकी आंखों में वेदना

झलक रही थी

आंसू की धार

उसके पलकों से छलक रही थी

अपने हृदय में कोई पीड़ा

वह छुपाए जा रही थी

ससुराल में उसकी उपेक्षा

 उसे अंदर ही अंदर

खाए जा रही थी

घर का हर सदस्य उससे

 एक सवाल पूछ रहा था

जिसका जवाब

उसे नहीं सूझ रहा था

 

उसने कठोर नियम का पालन किया

हर विधि को पवित्रता से पूर्ण किया

हर पूजा स्थल के

चौखट पर माथा टेका

चमत्कार की आशा से

सब की तरफ देखा

हर बड़े चिकित्सक से मिली

पर उसके मन की कली नहीं खिली

उसने आधुनिक आईवीएफ का भी प्रयास किया

पर यहां पर उसने भी

उसे निराश किया

पति और घर वाले

 उसकी उपेक्षा करने लगे

वह तो एक बांझ है

सब तिरस्कार से कहने लगे

बांझ शब्द उसके कानों में

पिघले शीशे सा लगने लगा

उसके नारीत्व का अपमान

चोट खाए नागिन सा धीरे-धीरे जगने लगा

वह लोगों के तानों से टूट गई

उसकी खुशी उससे

 सदा के लिए रूठ गई

 

उसने आत्मबल से

एक कठोर निर्णय लिया

अपने पति को

उसमें सम्मिलित किया

वह एक बाल आश्रम में

अपने पति संग गई

वहां पर एक बच्ची को

गोद लेने की बात कही

सारी कागजी कार्रवाई के बाद

कुछ माह पश्चात

उन्हें किया गया याद

वह बच्ची उन्हें

गोद दी गई

उनकी कानूनी रजामंदी

अधिकारी के समक्ष ली गई

 

बच्ची को गोद लेकर

वह खुशी-खुशी घर आई

घर के हर कोने को सजाया

मिठाई लोगों में बटवाई

उसके जीवन में नई सुबह हुई

दूर हुई दुःख भरी सांझ

बच्ची को गोद में लेकर

वह नाच उठी

उसकी भावनाओं की

सभी सीमाएं टूटी

और पूछ बैठी

ऐ बेदर्द जमाने

बता-

अब मुझे कौन कहेगा बांझ ? /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११२ – आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें।)

☆ अभिव्यक्ति # ११२ ☆

☆ आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

हम फिर से लौट चलें, सुरमई बचपन में,

सुप्त हुई बचपन की भावना, अब तो जागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

नाव बनाकर कागज की, पानी में तैरा दें,

बच्चों के संग, बच्चे बन, फिर मुस्कान दिखा दें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

छत पर जाकर, पतंग उड़ाएं, कटी पतंगें लूटें,

जल्दी से मान भी जाएं, जल्दी से फिर रूठें,

समय के पीछे न चलकर, समय के आगे भागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

निष्कलंक हो, निश्छल हो, निष्कपट हो जाएं,

बच्चों जैसे, बच्चों के संग, बच्चों के हो जाएं,

क्षणभंगुर जीवन का सपना, सपनों से अब जागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ फूलों की सोच… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता फूलों की सोच

? कविता – फूलों की सोच ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

मधुर महक से भरे

फूलों के गुच्छे

शीतल पवन से

हिलोरें लेते

मानो डालियों पर

झूला डाले

आनंद मगन हो रहे

 

डालियां उनके कानों में

सुरीली तान छेड़ती

हौले से पूछती हैं

कहां से लाते हो

यह भीनी मादक महक  ?

तुम्हारी जड़ों में तो माली

सड़ी गली गोबर

सूखे मरे पत्ते

कीड़ों की खाद

भरता रहता है

तुम पर उन सब का

कोई असर नहीं होता ?

 

फूल मुस्कुरा उठे

हम इंसान थोड़े ही हैं

जो सर्वश्रेष्ठ को लेकर

निकृष्ट बनाने में माहिर है

 

हमने तो सीखा है

सदा सुगंध ही सुगंध बिखेरना

मनुष्य बेशक

अपने स्वार्थ के चलते

हमारी अधखिली कलियों  को

कुचल मसल डालता है

पर हम भी अपनी

सुगंध बांटने से

पीछे नहीं हटेंगे

वह हमारे गुण चाहे

ना स्वीकारे 

हम उसके स्वार्थ

अवगुणों को

कभी नहीं अपनाएंगे

 

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बोधिवृक्ष ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बोधिवृक्ष ? ?

बोधिवृक्ष

जो हरे-भरे रहे हैं,

अब ठूँठ से खड़े हैं,

संभवत: धरती से

जुड़े रहने का

दण्ड मिला है,

जंगली बेलें-

धरती से ऊपर पनपती,

बोधि के वक्ष पर फुदकती,

इठला रही हैं,

परजीवी हैं,

बोधि की जड़ो को

खा रही हैं,

बुद्धिमानी के

सरकारी तमगे पा रही हैं,

बोधि बंजर हो चुके,

जंगली बेलें

सौभाग्यवती हैं,

हमारे समय की

यही विसंगति है!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ – कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भयानक“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ ?

? कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

द्वेष  ईर्ष्या  कपट  भयानक

गर्म-गर्म  लू-लपट भयानक

=2=

शेर    मारने,    चूहे  निकले

मिल रई ऐसी रपट भयानक

=3=

शिष्य  गुरु  पर  हावी  हैं उफ़

अब वो डाँट न डपट भयानक

=4=

बाहर    ख़ामोशी   है   किन्तु

भीतर शोर है विकट भयानक

=5=

दंगे-तिकड़म-हुड़दंग   ‘राजेश’

करवाती यह  टिकट भयानक

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ – मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मानव अब तो जाग. )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ ☆

☆ मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

नभ से हर पल गिर रही, लपटें बनकर आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

दिनकर निकले भोर में, मोहक लगता रूप।

भरी दुपहरी में लगे, लपट बनी यह धूप।।

शहर सकल वीरान यह, मनुज रहे सब भाग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

सघन वनों को काट कर, बनते खूब मकान।

बढ़ता पारा देख अब, विकल हुए इंसान।।

सब जन मिलकर गा रहे, गहन तपन का राग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

बचना है यदि ताप से, जन-जन करे प्रयास।

तरुवर हर इक द्वार हो, हरी-भरी सी घास।।

रिम-झिम प्रभु बरसात कर, मिट जाए यह आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०८ ☆ दोहा छंद – ।। बाल काल बचपन नटखटपन ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०८ ☆

☆ दोहा छंद ।। बाल काल बचपन नटखटपन ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

1

कभी बाल्यकाल गुम नहीं हो,   बचपन की   उम्र में।

नटखटपन कभी गुम नहीं, हो छोटे चंचल मन में।।

2

चाचा नेहरू जयंती मनाई जाती, ले बाल दिवस रूप।

बच्चों को मोबाइल से दूर, खेलने दो वर्षा और धूप।।

3

बालपन मासूमपन बना रहे, हमेशा मुन्ना-मुनिया में।

बचपन को सुरक्षित रखोहमेशा   ही दुनिया में।।

4

बचपन कच्ची मिट्टी    सा ,जैसा बनाएं बन जाएगा।

परिवार पहली पाठशाला ,जैसा बनाएंगे बन आएगा।।

5

बच्चों को खाने को दें ,पौष्टिक आहार ही   सदा।

फास्ट फूड की लत न हो, खाएं केवल यदा-कदा।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७१ ☆ कविता – महाराणा प्रताप… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – महाराणा प्रताप। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७१ ☆  

☆ महाराणा प्रताप…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अपनी त्याग तपस्या प्रण का स्मारक जो आप है

वह इतिहास पुरुष भारत का अनुपम वीर प्रताप है।।

*

गीत लिखे है बलिदानों के उसने हल्दी घाटी में

खुशबू है उसके विश्वासों की चित्तौड़ी माटी में।।

*

आती है ध्वनि अब भी चेतक के विश्वासी टापों की

सुन पड़ती आवाजें दम्भी अकबर के संतापों की ।।

*

भामाशाह की भावनाओं के चित्र नजर जो आते हैं

हर पढ़ने वाले की आंखों में आंसू भर आते हैं।।

*

पढ़ते जब भी पृष्ठ युद्ध के पुस्तक में इतिहासों की

रुक सी जाती गति पढ़ने वाले भावुक की सांसों की ।।

*

कैसा था प्रताप वह जिसकी वन में कटी जवानी थी।

और संग में जिसके भूखी बिटिया थी औ’ रानी थी।।

*

कैसी सुदृढ़ भावना थी गहरी मन में उस राणा की

सभी सुखों को लात मार जिसने चिन्ता की बाना की।।

*

अकबर भी भौंचक था उसकी सोच समझ कुर्बानी पर

थी जिसकी दुनियां न्यौछावर मातृभूमि के पानी पर।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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