(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “मन, मानस और हम…” ।)
कविता – मन, मानस और हम… मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
उम्र के सत्तरवें दशक में कदम रखते हुए भी..
दिल और ज़हन
न वो बचपन की मासूमियत भूल पाता है..
न वो नटखटपन, न शरारतें,
न वो जवानी की रुमानियत।
जिस्म चुकता जाता है ..
स्मृतियाँ तरो ताज़ा होती जातीं हैं ।
माज़ी (अतीत) तकरीबन रोज़..
चौखट पर आकर, दरवज्जे पर,
दस्तक देता है।
चाहे कुछ लम्हों को सही..
वजूद लौट आता है
उस हाशिये पर
जहाँ स्वच्छंदता थी..
मन आवारा था, भावनाओं में।
न ज़िम्मेदारियां, न संघर्ष था जीवन..
बस अपनी सांसें, अपनी धड़कनें थीं।
कल्पनाओं की उस “टाईम मशीन” का शुक्रिया
जो हमें चाहे अनचाहे उस दौर ए वक़्त में ले जाती है…!!!!!
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – महा-प्रस्थान के क्षण – २।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८९ ☆
☆ – महा-प्रस्थान के क्षण – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
बूढ़े पिता सा
देखता आकाश
दृश्य यह कितना करुण है।
ज्वाल के सम्मुख लिए जल
और भी जन है,
जिनके टूटते मन हैं।
ठीक ऐसी ही दशा में…
भू, हवा, पर्वत, किरन, वन औ सुमन हैं।
त्यक्त वस्त्रों सी पड़ी
निस्पंद ये
परछाइयाँ,
मानो किसी का शापमय आदेश हो!
लग रहा-
जैसे कि खण्डित मूर्तियों का देश हो !
पाषाण जैसे प्राण भी तो
कर रहे हैं
आँसुओं में संतरण,
क्योंकि निष्प्रभ हो गई है
सभ्यता की व्याकरण।
आह! मेरे प्रश्न बालक, खो गये,
पगवाट में, वनवाट में,
और उनके ‘उत्तरों‘ का ‘ध्रुव‘
कि वह तो गया है
शान्ति वन के घाट में।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “ऐसे आर्तनाद के क्षण बस...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “ऐसे आर्तनाद के क्षण बस...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बेटियां…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆
☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆
☆
हमारा एक मित्र सुबह मॉर्निंग वॉक में मिला
मिलते ही करने लगा
आजकल नहीं मिलने का गिला
यार दिन भर क्या करते हो ?
क्या यहां पर नहीं रहते हो ?
मैंने कहा मित्र
मैं अपनी पत्नी के संग बच्चों के पास चला जाता हूं
कुछ दिन वहां रहता हूं
इसलिए रोज नहीं आता हूं
उसने पूछा,
बच्चे कहां पर रहते है?
मैंने कहा,
एक बेटा और तीन बेटियां हैं
सभी विवाहित है
वे देश के तीन कोने में है
और हम यहां इस कोने में है
उसने लंबी सांस भरी
और बोला,
एक बात करूं खरी खरी
तुम बहुत भाग्यशाली हो
जो बच्चों के साथ समय बिताते हो
खुशी खुशी रिटायरमेंट के दिन बिताते हो
भाई,
हमारे साथ तो प्रश्न चिन्ह है
परिस्थितियों बहुत भिन्न है
एक ही बेटा और बेटी है
दोनों अपने परिवार में व्यस्त है
अपने परिवार संग मस्त है
हम जब भी बहु बेटे के पास जाते हैं
कुछ दिन मुश्किल से रह पाते हैं
हमारी पत्नी और बहू में
रोज होती जंग है
पारिवारिक शांति होती भंग है
वैसे ही वृद्धावस्था में बीमारियों की समस्याएं क्या कम है
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!पिता!!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ ☆
☆ !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
☆
लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।
*
जिनकी क्षमताएंँ ऊंँची हो आकाश से, मन में सपने सजाते तुम्हारे लिए ।
देखना चाहते खुद से उत्तम तुम्हें , करते हैं सब समर्पित तुम्हारे लिए ।।
शब्द भी श्रेष्ठ से सदा खोजती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।
लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।
*
मन में गहराई रखकर वे पाताल सी, दर्द दुनियाँ के तुमसे छुपाते सदा ।
असीमित प्रेम करते हैं संतान से, रौब बातों में अपनी दिखाते सदा ।।
रौब से झांँकता उनका डर टोहती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।
लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।
*
उनका साया हिमालय सा दे हौसला, वो कहें धैर्य खोना न चलते रहो ।
हर कदम पर खड़ा हूंँ मैं परछाई सा, पीछे देखो नहीं आगे बढ़ते रहो ।।
पिता तुल्य पाया न रिश्ता कोई, जग के रिश्तों को जब-जब भी मैं तोलती ।
लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।
लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सलामी…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – स्वामी विवेकानंद…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २७० ☆
☆ स्वामी विवेकानंद… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆
युवा तापस जिसने ऊंची उठाई धर्म-ध्वजा शिकागो में जिसकी वाणी,
मुग्ध जग सुनता रहा विवेकी, अध्यात्म ज्ञानी तेज था
बंगाल का इसी भारत का समर्पित देश प्रेमी लाल था ।।।।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवित हम जलते गाँधी…।
रचना संसार # ९८ ☆
☆ गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’