हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४५ – सूचना का अधिकार – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)  

☆  चुभते तीर # १४५ – व्यंग्य  – सूचना का अधिकार ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राज्य मुख्य सूचना आयुक्त कार्यालय के मुख्य बरामदे की जालीदार खिड़की पर पीतल की एक पुरानी और मटमैली घंटी पिछले बीस सालों से एक सन की खुरदरी रस्सी के सहारे लटकी हुई थी जिसके भीतर की गोल लोहे वाली जिभी बरसों पहले निकाल ली गई थी। उस घंटी की बनावट कभी दफ्तर में सुनवाई की बारी बताने के काम आती थी पर अब वक्त की धूल और सीलन से उसकी चमक पूरी तरह उड़ चुकी थी और वह खिड़की की जंग लगी सलाखों के बीच बेआवाज झूल रही थी। खिड़की के ठीक नीचे सीमेंट के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही धरमदास काका अपनी इमली की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले धरमदास काका दिन भर उस मूक घंटी को अपनी धुंधली आँखों से एकटक निहारते रहते थे। भवन परिसर में सुबह से ही आधुनिक पारदर्शी पोर्टल, डिजिटल शिकायत पेटियों और हाईटेक निगरानी तंत्र का प्रदर्शन करने के लिए शहर के बड़े-बड़े अफसरों, वकीलों और नेताओं की चमचमाती गाड़ियाँ आ रही थीं। मंच से नागरिक अधिकारों और सच को सामने लाने की कसमें खाते हुए लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए प्रवक्ताओं और सूट-बूट पहने अफसरों को खिड़की के कोने में लटकी उस बेजुबान पीतल की घंटी से कोई सरोकार नहीं था। दफ्तर का पुराना चपरासी मंगरू जब भी हाथ में फाइलों का बंडल लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगरू आज सूचना के अधिकार के इस मेले में इस गूंगी घंटी में कोई सच की बोली बजने की उम्मीद जगी क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की पर्चियां ही बाँटी जा रही हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

सूचना भवन में हाल ही में राजधानी के प्रशासनिक सुधार सचिवालय से नए मुख्य सूचना आयुक्त बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक डिजिटल ट्रैकिंग के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए ऑनलाइन पोर्टल कक्ष का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे धरमदास काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस खिड़की पर लटकी पुरानी घंटी पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को अंतरराष्ट्रीय सूचना दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल इंडिया के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक बेकार घंटी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और संस्थान के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय उद्घाटन सत्र का मुख्य भाषण समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे धरमदास काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई आरटीआई अर्जी का स्टेटस या बुढ़ापा पेंशन की अपील देखनी है तो भीतर काउंटर पर जाकर फॉर्म भरिए, इस तरह बाहर बैठकर खिड़की पर टँगी एक टूटी घंटी को घूरने से इस मुल्क की सरकारी फाइलों का सच बाहर नहीं आने वाला है।” धरमदास काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “आयुक्त साहब मैं किसी कागजी नकल या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस घंटी में वह खोया हुआ सच लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए सच की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस सूचना अधिकार दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके जनता को हर फाइल तक पहुँच दे रही है, फिर आपकी इस पुरानी पीतल की घंटी का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त पेशकार पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस आयोग के हर फैसले और हर अपील के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “आयुक्त साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस कस्बे में आरटीआई कानून की शुरुआत हुई थी और गरीबों के राशन की चोरी दबाने के लिए फाइलों में आग लगाई जाती थी तब काका के इकलौते बेटे सत्यप्रकाश ने इसी चौपाल पर खड़े होकर सच जानने के अधिकार की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “सत्यप्रकाश ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पीतल की घंटी से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब सत्यप्रकाश उस समय पूरे जिले का सबसे बहादुर और स्वाभिमानी युवा आरटीआई कार्यकर्ता था, जब राशन माफिया और भ्रष्ट ठेकेदार गरीबों के हक पर कुंडली मारकर बैठते थे तब सत्यप्रकाश ने इसी घंटी को खिड़की पर बांधकर कसम खाई थी कि जब भी किसी गरीब की फाइल दबाई जाएगी तो वह इसे बजाकर पूरे कस्बे को जगाएगा, उसने भूख से तड़पते सैकड़ों परिवारों को उनका हक दिलाया था और ऐलान किया था कि जब तक इस दफ्तर की आखिरी फाइल शीशे की तरह साफ नहीं हो जाएगी तब तक वह किसी भ्रष्ट तंत्र के आगे नहीं झुकेगा।”

धरमदास काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस घंटी की खुरदरी रस्सी को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे सत्यप्रकाश ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह घंटी केवल पीतल का ढक्कन नहीं बल्कि सच की आवाज है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से केंद्रीय पारदर्शिता आयोग का सबसे बड़ा लोक अधिकार आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस घंटी में नई जिभी लगाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी आरटीआई फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब सत्यप्रकाश ने करोड़ों के सरकारी घोटालों की पोल खोली थी तो देश के सबसे बड़े खनन और रियल एस्टेट सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए सत्यप्रकाश को अपनी बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट जनसंपर्क एजेंसी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी देकर खरीद लिया था। सत्यप्रकाश ने अपने सारे आदर्शों और उस घंटी का वास्ता ताक पर रखकर उन जांचों को दबाने वाली फाइलों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा पीआर माफिया बन गया जो आज सरकारों और उद्योगपतियों के काले कारनामों को छिपाने का सबसे बड़ा ठेका चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि सत्यप्रकाश तो खुद सच को दफन करने वाला सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर सूचना के अधिकार और पारदर्शिता का ढोंग करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप की आवाज को फाइलों में बंद करके बेच देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई सच्चाई के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस मूक घंटी को ताकते रह गए और पूरा सूचना भवन उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८२ ☆ कविता – सुबह सवेरे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “सुबह सवेरे…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८२ ☆

✍ कविता ☆ सुबह सवेरे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे कमरे की खिड़की पर

एक बुलबुल गाती है

सुबह सवेरे, एकदम सवेरे

पेड़ की डाली पर आती है

एक बुलबुल गाती है।

 

सूरज जब उगने को होता है

अंधेरा जब छँटने को होता है

जैसे ही घड़ी सुबह का आगाज़ देती है

तभी उसका गान शुरू होता है ।

तभी बुलबुल गाती है।

 

मुझे लगता है कभी-कभी

विट्ठल विट्ठल गा रही है

कभी लगता है ट्विंकल ट्विंकल

कभी कृष्ण कृष्ण  गा रही है ।

बहुत मीठी आवाज में

एक बुलबुल गाती है।

 

मेरी आँख खुलती हैं उसे सुनकर

मन में एक खुशी होती है उसे सुनकर

सुबह हो गई मैं सोचता हूँ

समय का भान होता है उसे सुनकर।

तय समय पर रोज गाती है।

एक बुलबुल गाती है।

 

बुलबुल को सुबह होने का ज्ञान

पता नहीं कैसे होता है

बादलों की ओट से लालिमा लिए

पर सूरज को होता है।

सूरज को जगा कर

बुलबुल उड़ जाती है

एक बुलबुल गाती है।

हर रोज गाती है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बालकनी।)

☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“माँ, सामने वाले अंकल रोज यहाँ क्यों बैठे रहते हैं?”

“शायद किसी का इंतज़ार करते हैं।”

“आपको कैसे पता?”

सुधा मुस्कुराई, “क्योंकि कभी तुम्हारे पापा भी ऐसे ही मेरा इंतज़ार किया करते थे।”

अंशु कुछ कहता, उससे पहले ही नीचे ब्रेक लगने की तेज आवाज गूँजी।

एक बाइक फिसली। युवक उछलकर सड़क पर गिरा। हेलमेट दूर जा छिटका।

“माँ!”

अंशु रेलिंग पकड़कर नीचे झुक गया।

सुधा के हाथ काँपने लगे। आँखों के सामने वही दृश्य कौंध गया—सड़क पर पड़ी कार, टूटे शीशे और अस्पताल से आया वह एक वाक्य—

“मैडम, इन्हें बचाया नहीं जा सका।”

विवेक की मौत को वर्षों बीत चुके थे, मगर उस एक क्षण ने समय को फिर वहीं रोक दिया था।

“माँ, कुछ हुआ तो नहीं?”

सुधा ने बेटे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“नहीं… आज बस एक पुराना हादसा सामने आ गया।”

नीचे लोग घायल युवक को उठाकर अस्पताल ले जाने लगे।

अंशु ने धीरे से पूछा, “पापा भी ऐसे ही गए थे?”

सुधा ने सिर हिलाया।

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर अंशु बोला, “माँ, आप फिर भी यहाँ क्यों आती हैं?”

सुधा ने सामने देखा।

“क्योंकि तुम्हारे पापा ने यहीं से मुझे पहली बार देखा था… और मैंने यहीं से उन्हें।”

अंशु ने माँ का हाथ थाम लिया।

सुधा ने गहरी साँस ली।

एक क्षण ने आज किसी अजनबी को सड़क पर गिराया था और वर्षों पहले उसी तरह के एक क्षण ने उससे उसका अपना संसार छीन लिया था।

वह धीरे से भीतर चली गई।

पीछे रह गई शाम, सड़क और वह जगह—जहाँ एक नजर ने जीवन दिया था और एक हादसे ने उसे छीन लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११० ⇒ ऊंची दुकान फीके पकवान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ऊंची दुकान फीके पकवान…“।)

?अभी अभी # १११० ⇒ आलेख – ऊंची दुकान फीके पकवान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब भी स्वादिष्ट व्यंजनों का ज़िक्र होगा, मीठे पकवान सबसे पहले याद आयेंगे। चौरासी की योनि में छप्पन भोग बार बार नसीब नहीं होते। इस भोग योनि में जब जीव का गला सूखता है तब अच्छे अच्छों को पानी याद आता है, लेकिन जब सामने गर्मागर्म केसरिया, रस भरी जलेबियाँ निकाली जा रही हों, तो मुंह से लार ही टपकेगी, आंख से आंसू नहीं।

पकवानों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, पसंद अपनी अपनी, पकवान अपना अपना!  कोई जलेबी से संतुष्ट तो कोई इमरती पर फिदा। सब पकवानों की किस्मत जुदा जुदा। आज के लोगों का पकवानों का व्याकरण इतना कमजोर है कि उन्हें रबड़ी, बासुंदी और कलाकंद में भेद ही नहीं पता। एक पाक कला प्रशिक्षण केंद्र में जब यह पूछा गया कि हलवाई किसे कहते हैं, तो एक जवाब यह भी आया, जो हलवा अच्छा बनाए उसे हलवाई कहते हैं। कहते हैं मुझको, हलवा हलवाई।।

आजकल हमें मीठा बोलने की नसीहत तो दी जाती है लेकिन साथ में यह भी हिदायत, कि मीठा कम खायें। क्या बच्चे क्या बूढ़े, क्या जमाना था, जब हमेशा लड्डू पेड़े और गुलाबजामुन का ही जिक्र होता था। गरीबों का भोजन दाल बाटी, आजकल स्वादिष्ट भोजन की गिनती में आ गया है। जो इंसान, घी में तरबतर, दो बाटी ठीक से नहीं खा सकता, उसके सामने मावा बाटी की बात करना, मावा बाटी का अपमान नहीं तो और क्या है।

आप जब किसी ऊंची मिठाई की दुकान से पकवान खरीदते हैं तो यह सोचकर ही खरीदते हैं कि यहां की मिठाई शुद्ध, मीठी व स्वादिष्ट ही होगी। और अगर पकवान फीके हुए तो शायद दूसरी बार कभी उस दुकान की ओर रुख नहीं करेंगे। यह जानते हुए भी, कि अधिक घी, मावा और शकर हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, हम मीठा खाने से समझौता नहीं करते।।

आज अगर कोई ऊंची मिठाई की दुकान वाला अगर अपना प्रचार इस तरह करता है तो क्या गलत करता है। फीके पकवान की ऊंची दुकान!  यहां शुगर फ्री, कोलोस्ट्रल फ्री, स्वादिष्ट मिठाइयां उपलब्ध हैं। मेरे शहर में तो आजकल ऊंची दुकानों में फीके पकवान मिलना शुरू भी हो गए हैं। गरीब आदमी मीठे को तरसता है, और अमीर आदमी शुगर फ्री के लिए। गरीब आदमी पसीना बहाता है कुछ मीठा खाने के लिए!  जब कि एक अमीर आदमी को शुगर फ्री मिठाई के लिए भी पैसा बहाना पड़ता है।

एक हमारे गंगा किनारे वाले छोरे, अरे वही पान वाले बनारसी बाबू, जो दो पैसे कमाने के बाद, के. बी.सी. के बिग बी बनकर भी साबुन, तेल और कुछ मीठा खिलाने से बाज नहीं आते, आजकल कमला पसंद पर उतर आए हैं। अब तो आप समझ गए, कौन बना बेवकूफ, और कौन बना करोड़पति। सबकी अपनी अपनी मति।।

हम तो आज भी किसी के घर जाते हैं और जब सौजन्यवश चाय कॉफी का न्योता स्वीकार नहीं करते, तो कुछ ठंडा हो जाए कहने पर, शिकंजी पर राजी हो जाते हैं और तब हमें नीबू की शिकंजी पेश कर दी जाती है। हम शिकंजी पी तो लेते हैं, लेकिन ईश्वर झूठ ना बुलवाए, उस वक्त भी हमारी आँखों के सामने, नागौरी की शिकंजी तैर रही होती है। मीठा हमारी कमजोरी है और नमकीन हमारी खूबी।

सब्जी में नमक हो न हो, भोजन के वक्त एक मुट्ठी सेंव सब स्वाद बराबर कर देती है। बढ़ते रहें इंदौर में मरीज और अस्पताल, सराफा और छप्पन दुकान की रौनक कभी कम नहीं होने वाली। ठाकुर जी का नित्य राजभोग भी होगा और छप्पन भोग भी। अपनी सेहत का खयाल रखें। दबाकर खाएं, डूबकर व्यायाम करें। अगर मीठे से परहेज हो, तो कोई ऐसी ऊंची दुकान तलाशें, जहां शुगर फ्री, फीके पकवान उपलब्ध हों। कैसी होती होगी, चाशनी वाली, शुगर फ्री, गर्मागर्म केसरिया जलेबी, और बिना नमक का नमकीन। नहीं होता यकीन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३३३ ☆ पितृपक्ष… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३३३ ?

☆ पितृपक्ष… ☆  प्रभा सोनवणे ☆

☆

पूर्वी रोज यायचा कावळा —

न चुकता,

तुम्ही असताना …

आणि तुम्हीही,

अंड्यातला पिवळा बलक —

देऊन टाकायचे दररोज त्याला !

तो यायचाच,

काव काव करत… नाष्ट्यासाठी!!

 

पण तुम्ही गेल्यापासून,

कावळा येत नाही दारात!

त्यालाही कळलं असावं,

 

आपला अन्नदाता–

निघून गेल्याचं !

 आता पितृपक्षातही येत नाही तो

दहीभाताची उंडी खायला!

कावळा तृप्त झालाय… की,

तुम्हाला मोक्ष मिळालाय?

सारे अनाकलनीय!

मला तरी !

☆

© प्रभा सोनवणे

६ ऑक्टोबर २०२६

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६५ – बुन्देली कविता – ”साँसों के हत्यारे हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “साँसों के हत्यारे हैं “।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६५ ☆

☆  बुन्देली कविता – “साँसों के हत्यारे हैं “ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

साँसों के हत्यारे हैं 

जंगल काटन बारे हैं 

* 

भये ईंधेरी रातों में 

जुगनू हितू हमारे हैं 

 *

बीज डार दय आशा के 

अँकुराये उजयारे  हैं 

 *

बे डर रये उजालों से 

ई मशाल में नारे हैं 

 *

बात प्यार की ने करियो 

भड़क जात अंगारे हैं 

 *

बाहुबली बो जीत गओ 

सहमे फिर गलियारे हैं 

 *

‘भगवत’ निकर रये बाहर 

जितने नोट डकारे हैं

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३७ – सास-ससुर, माता-पिता… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सास-ससुर, माता-पिता…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३७ ☆

☆  सास-ससुर, माता-पिता… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

बहू अगर बेटी बने, सब रहते खुशहाल ।

दीवारें खिचतीं नहींे, हिलमिल गुजरें साल ।।

*

सास अगर माता बने, बढ़ जाता है मान ।

जीवन भर सुख शांति से, घर की बढ़ती शान ।।

*

सास बहू के प्रेम में, छिपा अनोखा का राज ।

रिद्धि सिद्धि समृद्धि का, रहता सिर पर  ताज ।।

*

खुले दिलों से सब मिलें, ना कोई खट्टास ।

वातायन जब खुला हो, सुख शान्ति का वास।।

*

रिश्तों का यह मेल ही, खुशियों की बरसात ।

दूर हटें संकट सभी, सुख की बिछे बिसात।।

*

सास-ससुर, माता-पिता, दोनों एक समान ।

कोई भी अन्तर नहीं, कहते वेद पुरान ।।8

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१७ ☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है  नौशाद जी द्वारा लिखित  “आठवाँ सुर” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१७ ☆

☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(किताब उपलब्ध करवाने हेतु, आभार Kavita Kafe UK – कविता कैफ़े यूके)

कृति – आठवाँ सुर

लेखक – नौशाद 

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ संगीत के उस्ताद का शब्द-संसार : ‘आठवाँ सुर’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नौशाद अली को हम हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार के रूप में याद करते हैं। बैजू बावरा, मुगल-ए-आज़म, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी जैसी फिल्मों का संगीत उनकी पहचान है।

लेकिन जब संगीत का यह जादूगर शब्दों के संसार में प्रवेश करता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक संवेदनशील शायर भी था। ‘आठवाँ सुर’ इसी शायर नौशाद अली से हमारा परिचय कराती है। पुस्तक उनकी शायरी का संग्रह है, जिसमें ग़ज़ल, शेर और आत्मानुभूति के स्वर एक साथ दिखाई देते हैं।

‘आठवाँ सुर’ शीर्षक अपने आप में बड़ा अर्थपूर्ण है। भारतीय संगीत में सामान्यतः सात स्वरों की चर्चा होती है, लेकिन नौशाद के लिए जीवन के अनुभवों, प्रेम, विरह, स्मृति, पीड़ा और मृत्यु से निकली अनुभूति जैसे किसी अनसुने आठवें स्वर की तरह है। यही स्वर उनकी शायरी में सुनाई देता है। संगीतकार नौशाद ने फिल्मों में सुरों से भावों को व्यक्त किया था, शायर नौशाद शब्दों से वही काम करते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में भी एक लयात्मकता सहज रूप से नज़र आती है।

 नौशाद की शायरी केवल प्रेम की रूमानियत तक सीमित नहीं है। उसमें जीवन की नश्वरता, बिछोह, स्मृति, आत्मसंवाद और मृत्यु का बोध भी है। एक जगह वे लिखते हैं   —

“क्यों मिली थी हयात याद करो

याद रखने की बात याद करो।”

दो छोटे-से मिसरे हैं, लेकिन इनके भीतर पूरी जिंदगी का प्रश्न खड़ा हो जाता है। जीवन क्यों मिला था? हमने उसका क्या किया? और जाते-जाते क्या याद रह जाएगा? यह प्रश्न शायर स्वयं से भी करता है और पाठक से भी।

इसी तरह उनका एक और शेर है—

“इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए

जब मिल गए हैं आप तो कुछ बात कीजिए।”

यहाँ भाषा सहज है, लेकिन भाव में गहराई है। ‘बेकरार दिल’ और ‘मुलाकात’ जैसे पारंपरिक ग़ज़ल के रूमानी शब्दों के माध्यम से नौशाद उस आत्मीय क्षण को पकड़ लेते हैं जिसमें मिलने के बाद भी मन की बात कहने की बेचैनी बनी रहती है।

 संग्रह की विशेषता इसकी सादगी है। नौशाद कठिन शब्दावली या चमत्कारपूर्ण बिंबों के पीछे नहीं भागते। वे उर्दू ग़ज़ल की परंपरा में रहते हुए भी अपनी बात को अपेक्षाकृत सीधे ढंग से कहते हैं। प्रेम है तो उसमें आत्मीयता है, विरह है तो उसमें पीड़ा है, स्मृति है तो उसके साथ एक कसक है। इसीलिए उनके शेर पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई केवल शायरी कर रहा है। लगता है जैसे कोई अपने जीवन का हिसाब-किताब पाठकों के सामने रख रहा हो।

उनकी शायरी की जड़ें परंपरा में हैं और वे स्वयं इस परंपरा से अनजान नहीं थे। पुस्तक के एक पृष्ठ पर उनका आत्मव्यंग्य पूर्ण शेर है—

“करना है शायरी अगर ‘नौशाद’

‘मीर’ का कुल्लियात याद करो।”

यह केवल मीर के प्रति श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अपनी शायरी की सीमाओं की विनम्र स्वीकृति भी है। रचनाकार की पहचान इसी विनम्रता से होती है कि वह अपने पीछे खड़ी महान परंपरा को पहचानता है। नौशाद यहाँ अपने लिए भी एक कसौटी निर्धारित करते दिखाई देते हैं।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आया उनका आत्मीय संस्मरण भी संग्रह को केवल शायरी की किताब नहीं रहने देता। उसमें परिवार, मृत्यु, स्मृति और अपने प्रियजनों से जुड़ा ऐसा मार्मिक प्रसंग आता है, जहाँ चार पंक्तियों में उनकी निजी पीड़ा कविता बन जाती है

“फिर उसी तरह कलेजे से लगा लो मुझको

गिरती दीवार हूँ लिल्लाह सँभालो मुझको।”

और आगे—

“जिसने फल-फूल दिये, प्यार दिया, साया दिया

मैं वही पेड़ हूँ मरने से बचा लो मुझको।”

यहाँ ‘पेड़’ केवल पेड़ नहीं रह जाता। वह जीवन, परिवार, आश्रय और बीतती उम्र का प्रतीक बन जाता है। यह प्रसंग पढ़ते हुए लगता है कि संगीतकार नौशाद के भीतर का शायर अपने जीवन के अंतिम सत्य से संवाद कर रहा है।

‘आठवाँ सुर’ की शायरी में याद एक महत्वपूर्ण भाव है। वे बीते हुये समय की बार-बार याद करते है। कभी प्रेम की याद के रूप में, कभी किसी बिछुड़े व्यक्ति की स्मृति बनकर और कभी अपने ही अतीत के आईने की तरह। एक शेर में वे कहते हैं—

“मैं लाख ढूँढूँ उसे ढूँढने से क्या होगा

मेरी तलाश में वो भी तो खो गया होगा।”

यहाँ तलाश का द्वंद्व बहुत सुंदर है। जिसे हम खोज रहे हैं, संभव है वह भी हमें खोजते-खोजते कहीं खो गया हो। प्रेम की यह पारस्परिक विडंबना शेर को साधारण विरह से उठाकर जीवन की व्यापक अनुभूति बना देती है।

नौशाद की शायरी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष समय और मृत्यु का बोध है। जीवन को वे स्थायी उपलब्धि की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ संसार आता-जाता है, रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं और अंततः मनुष्य स्मृतियों में बदल जाता है। यही दृष्टि उनकी शायरी को केवल प्रेम-कविता का संग्रह बनने से बचाती है।

इस दृष्टि से ‘आठवाँ सुर’ को नौशाद के संगीत से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। संगीत में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा को लोकप्रिय सिनेमा की भाषा में प्रतिष्ठित किया, शायरी में उन्होंने उसी सांस्कृतिक संस्कार को शब्दों का रूप दिया। उनके संगीत की तरह उनकी शायरी में भी माधुर्य, अनुशासन और भाव प्रधानता दिखाई देती है। किताब से गुजरते हुए नौशाद की रचनात्मक दुनिया में संगीत और कविता दो अलग-अलग धाराएँ नहीं, बल्कि एक ही संवेदनशील मन से निकले दो स्वर समझ आतें हैं। उनके जीवन और कला की यही बहुआयामी पहचान उन्हें विशिष्ट बनाती है।

‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए सबसे सुखद बात यह लगती है कि यहाँ एक प्रसिद्ध संगीतकार अपने स्थापित व्यक्तित्व का सहारा लेकर शायर बनने की कोशिश नहीं करता। वह अपने शब्दों के बल पर सामने आता है। कहीं वह प्रेमी है, कहीं विरही, कहीं आत्मालोचक, कहीं जीवन से सवाल करता हुआ मनुष्य और कहीं अपनी स्मृतियों में लौटता हुआ वृद्ध। यही मानवीयता इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है।

अनुमान लगा सकता हूं कि ये संग्रह उनके जीवन के लंबे सफर में मन का चैन ढूंढने का, समय समय पर कागज पर अभिव्यक्त प्रयासो का संकलन है।

नौशाद के संगीत को सुनते हुए हम उनके सुरों के जादू में खो जाते हैं,  ‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए उन्हीं सुरों के पीछे छिपे मनुष्य से हमारा परिचय होता है। सात सुरों के महान साधक ने शब्दों में जो अतिरिक्त स्वर खोजा, शायद वही इस पुस्तक का ‘आठवाँ सुर’ है, एक ऐसा स्वर, जिसे कानों से कम और मन से अधिक सुना जा सकता है।

उन्हें श्रद्धांजलि

#लंदन_डायरी, #पुस्तक, #bhawan

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७९ – परोपकार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “परोपकार”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🪴परोपकार 🪴

चमचमाती कार से उतर सीधे चौराहे पर बने स्टेज पर पहुंचे अतिथि महोदय का सभी ने ह्दय से स्वागत अभिनंदन किया। आगे आने पुष्प हार पहनाने की होड़ मची थी। सोशल मीडिया का समय तस्वीरें भी खींची जा रही थी। गाँव में अत्यंत आत्मियता के साथ आयोजन को मनाया जा रहा था।

अतिथि महोदय ने प्रणाम स्वीकार करते, प्रणाम करते अपना भाषण आरंभ किया— जीवन में सेवा का अवसर जब भी आए खोना नही चाहिए। जब कभी मिले उसे जरुर कर लेना चाहिए।परोपकार करते ही रहना चाहिए।

अब मुझे ही देखिए – – – मैनें शहर में एक वृद्धा आश्रम का शुभारंभ किया और सर्व प्रथम मैनें अपनी ही माँ को वृध्दाआश्रम में रहने भेज दिया।

बात सुनते ही खुसुर-पुसुर होने लगी। पंडाल खाली होते देर न लगी। अतिथि महोदय समझ पाते–किसी ने पीछे से आवाज लगाई। ऐसे परोपकार से हम गाँव वाले बिना परोपकार के भी रह सकते हैं।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३८ – हास्य-व्यंग्य – “लोकतंत्र खतरे में…!” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “लोकतंत्र खतरे में…!”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “लोकतंत्र खतरे में…!” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

“लोकतंत्र खतरे में है।” हमारे देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता – प्रवक्ता और नामवर समाजसेवी जब – तब देशवासियों को इसके प्रति आगाह करते रहते हैं। लोकतंत्र को खतरे में बताने वाले इसके लिए हमेशा ही अपने प्रतियोगी राजनीतिक दलों अथवा अन्य कद्दावर नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं। चाहे भाजपा हो, कांग्रेस, जद, जद (यू) अथवा पश्चिम बंगाल की टीएमसी या दक्षिण भारत के राजनीतिक दल सभी दूसरे दलों और उनके नेताओं की कार्यप्रणालियों को अलोकतांत्रिक बताते हुए लोकतंत्र को खतरा बता रहे हैं। दुनिया को यह बताने के लिए कि भारतवर्ष में अराजकता है, यहां के निवासियों की हालत बहुत खराब है, “भारत में लोकतंत्र खतरे में है” कुछ नेता अक्सर विदेश भी जाते रहते हैं। आश्चर्य है कि हमारे देश में सत्तापक्ष से लेकर सभी विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेताओं सहित गली मोहल्ला तक के नेता देश में लोकतंत्र बचाने की लड़ाई जी जान से लड़ रहे हैं फिर भी लोकतंत्र खतरे में है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र के जन्मदाताओं और उसके पालन-पोषण कर्ताओं द्वारा ही स्वहित के चलते नवजात लोकतंत्र की समुचित देखरेख में बरती गई लापरवाही के कारण वह बचपन से ही कुपोषित और कमजोर हो चला हो और इतनी लंबी आयु होने के बाद भी उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं आया। मुझे तो लगता है कि स्वार्थी नेताओं ने जानबूझ कर हमारे देश के लोकतंत्र को मजबूत, बलिष्ठ, हट्टा-कट्टा नहीं होने दिया ताकि अपनी मर्जी पूरी करने कभी भी उसके साथ छेड़छाड़, बलात्कार किया जा सके। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जैसे लोकतंत्र एक अत्यंत “रूपवती कन्या” है और विभिन्न राजनीतिक संगठनों के पदाधिकारी और नेता व उसके टुच्चे आशिक उसे अपने कब्जे में करके उससे अपनी मर्जी का डांस करवाना चाहते हैं। जब मोहल्ला छाप साधारण से त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में मारपीट, खून खराब हो जाता है, बड़े क्षेत्र की शांति व्यवस्था प्रभावित हो जाती है तब यहां तो लोकतंत्र के असंख्य हितैषी – दीवाने और रखवाले हैं। लोकतंत्र को बचाने, उस पर कब्जा करने और उसके पालन-पोषण की इस बहुकोणीय लड़ाई और छीना झपटी में बेचारा लोकतंत्र अब घायल होकर वेंटिलेटर पर पहुंच गया है। निःसंदेह जो वेंटिलेटर पर पहुंच जाता है, उसे मृत नहीं माना जाता अतः कहा जा सकता है कि बीमार ही सही, किंतु अभी हमारे देश में लोकतंत्र जिंदा है। देश के सभी राजनीतिक दल, नेता, अफसर, कर्मचारी, समाजसेवी और सभी धर्मों के संरक्षक अपने-अपने ढंग से लोकतंत्र को बचाने के प्रयास और प्रार्थना कर रहे हैं। उसकी जीवन रक्षा की कामना में रत हैं। मुझे विश्वास है कि हमारे देश का लोकतंत्र कभी न कभी वेंटिलेटर से निकलकर पूरी तरह स्वस्थ और मजबूत होकर खड़ा होगा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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