(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – माँ… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘नभ से ओझल होते खग‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆
कविता – नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
आज फिर लगा कि वे दिन जल्द लौटेंगे
जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l
कि फिर खिड़की पर टुकटुक करती चिड़िया दिखेगी l
मुड मुड, उड़ उड़ जोर जोर से
शीशे से लड़ती दिखेगी l
खो चुकी हैं चहचहाटें जिंदगी की रफ़्तार में l
जहाँ तहाँ मोबाईल टॉवर, पेड़ कट रहे अंधाधुंध l
खामोश हो गये सारे खग संघर्ष के तूफान में ll
एक समय ऐसा भी था जब लौट आते थे पंछी घरोंदो में अपने l
पर आज फिर शाम होते ही वहाँ भी बंजर वसुधा मिली l
सूरज की लाली उषा से मिलकर प्रातः बातें आज भी करती हैं l
पुष्कर की झिलमिल बूंदे पुष्प कमल की पंखुड़ियों पर मोती आज भी जड़ती है l
मंद मंद इठलाती शीतल हवा कानों में आज भी कुछ कहती है l
पर प्रातः काल के नील गगन से खग ओझल हो रहे हैं l
ये देख मन उद्विग्न हुआ और फिर अंतर्मन से आवाज आई कि वे दिन जल्द ही लौटेंगे जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सपनों को तुम ना सोने देना…।)
☆ शशि साहित्य # २७ ☆
कविता – सपनों को तुम ना सोने देना… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
☆ # अडला हरी नि शाळेपेक्षा स्पेशल ट्यूशन बरी… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर☆
शी. आई मला किनई नुसती शाळा ते घर नि घर ते शाळा दिवसभर करण्यात बोअर होतयं… रोजचं जा लडदू आणि ये लडदू करण्यात काही थ्रील वाटत नाही बघं… आणि तसंही शाळेत कुठल्याही विषयाच्या टिचर तरी कुठे त्यांच्या तासाला बाय हार्ट शिकवतात… अर्धेअधिक पुस्तक आणि गाईडचं रेफर करून आम्हाला वाचून सांगतात… मग तो मराठीचा तास असूदे नाही तर गणित नाही तर गेलाबाजार सायन्स… सगळ्या टिचरची शिकवण्याची एकच काॅपीपेस्ट मेथड असते… हं या टाॅपिकला यावर्षी च्या पेपरला व्ही. व्ही. आय. एम. पी. मार्क करा आणि त्यातला तो पाचवा प्रश्न यावेळेस विचारला जाण्याची शक्यता आहे… तेव्हा फक्त त्याचं उत्तर तेव्हढं लक्षात ठेवा.. बाकी या लेसन मध्ये काही नाही… आता उद्या दुसरा लेसन आपण बघणार आहोत… आतापर्यंत आपले अकरा लेसन या प्रकारेच तुम्हाला शिकवून झाले आहेत… सगळ्यांना समजलेलं तर आहेच आणि ज्यांना काही डिफिकल्टी असतील तर त्यांनी माझ्या स्पेशल ट्यूशनला ॲडमिशन घेऊन क्लिअर करून घ्यावी… शाळेत तासाला विषयाचा सिलॅबसच जेमतेम पूर्ण होईपर्यंत मारामार तिथे डिफिकल्टी कुठून साॅल्वह करता येणार… आणि माझ्या स्पेशल ट्यूशनमधे नव्वद मिनिटाचा तास असल्याने तुमच्याकडे वेळ देता येतो… शिवाय टेस्ट सिरीजमध्ये विषय चांगला पक्का होऊन डिसटिंक्शन मार्क मिळतात… हा माझा लौकिक आहे… तेव्हा तुम्ही मुलांनी आपल्या पेरेंटसना या क्लासला जायचे आहे म्हणून सांगा. जे येतील त्यांचं भविष्य उज्ज्वल झालंच म्हणून समजा आणि जे येणार नाहीत ते या विषयात फेल झालेच म्हणून समजा… चाॅईस ईज युवर… असं शाळेतला उठसुठ जो तो टिचर आम्हाला रोजच ही
टेप वाजवून दाखवतो… आणि पंचेचाळीस मिनिटाच्या तासात फक्त दहा मिनिटात विषय गुंडाळला जातो बाकी सगळं ट्यूशनमधे सांगितलं जाईल म्हणतात… मग मम्मी आम्ही घरी तरी अभ्यास कशाला आणि का करायचा… का उगाच आताच माथेफोड करायची… सगळी परीक्षेची काळजी जर स्पेशल ट्यूशनमधे घेतली जाणार आहे तर शाळेत तरी कशाला जायचं… तिकडे बाहेरच्या बाहेर ट्यूशन जाॅइन केललं काय वाईट… परीक्षेच्या प्रश्न पत्रिकेची नक्कल उत्तरासकट हाती मिळत असेल तर शाळेची गरज काय… आणि कोण आता ते सेल्फ स्टडीज च्या ओल्ड ट्रॅडिशनला फाॅलो करेल… ट्यूशनची फी एकदा भरली कि आपलं फ्युचर सेफ होते… फर्स्टक्लास विथ मेरिटचं भलंमोठ्ठं सर्टिफिकेट हाती येतं तेव्हा तर याचसाठी केला होता अट्टाहास हेच ओठी येतं… (हो ते तेव्हढचं.. डोक्यात काय घुसलयं कोणत्या देवाला ठाऊक).. पण आताच्या डिजीटल जमान्यात उसका भी डर नही… कारण डर के आगेही गुगल कि… चुकलं चुकलं… अपनीही जीत होती है… नाहीतरी तुम्ही माझ्यासाठी या शाळेतल्या आणि पुढच्या काॅलेजच्या शिक्षणासाठी किती खर्च करत राहणार आणि सगळ्यात महत्त्वाचं या वेळखाऊ सव्यापव्यसात माझा टाईम किती बरबाद होईल… ते मला चालायचं नाही… मला त्या टाईम स्लाॅट मधे कुछ तो क्रिएटिव्ह करायचं आहे.. जसं कि पब जी ग्राफिक्स सुपरफास्ट कसं होईल… बंद तिजोरी कशी उघडता येईल… सायलेंट बाॅम्ब कसा बनवता येईल… वगैरे वगैरे.. या सगळ्या गोष्टी काय शाळेत किंवा काॅलेजच्या धड्यात मिळतात काय… त्यासाठी गुगल सर्च करावं लागतं आणि तसं गुगलच आता महागुरू असल्याने बाकी गुरूंची सुट्टी झालीय… माझा आता पाचवीच्या वार्षिक परिक्षेचे सगळे पेपर विथ आन्सर गुगलवरच तर अपलोड झालेले आहेत.. त्याला गुगल पे ने फी भरली कि आपल्याला ॲक्सेस मिळतो… आणि येथून पुढे हिच प्रोसेस फाॅलो केली कि जीवन में खुशीयाही खुशीया आ जाएगी… तेव्हा पप्पा नि मम्मी तुम्ही फक्त पैसै तयार ठेवा… बाकी मी बघून घेतो… आणि लवकरच तुम्हाला माझ्या तर्फे यशसिध्दीचा आनंदाचा मेवा देतो…
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९० ☆
☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भारतीय संस्कृति में पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, आध्यात्मिक साधना, आत्ममंथन और पुण्य संचय का विशेष अवसर माना गया है। यह अतिरिक्त मास चंद्र और सौर गणना के संतुलन के लिए जोड़ा जाता है तथा भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण “पुरुषोत्तम मास” कहलाता है। धर्मग्रंथों में इस माह को जप, तप, दान, सत्संग और सेवा के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।
भारतीय परंपरा में धर्म केवल मंदिरों और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति की रक्षा को भी पुण्यकर्म माना गया है। पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित इस सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी आध्यात्मिक साधना का ही एक रूप है। इसलिए पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि के साथ-साथ प्रकृति-संरक्षण का भी संदेश देता है।
इस पावन अवधि में वृक्षारोपण, पौधों की सेवा, पक्षियों के लिए जल-पात्र रखना, जलस्रोतों की स्वच्छता, नदी-तालाबों के संरक्षण का संकल्प लेना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना भी श्रेष्ठ सेवा मानी जा सकती है। जब हम एक पौधे को रोपते हैं या किसी जलस्रोत को स्वच्छ रखने का प्रयास करते हैं, तब वह केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं होता, बल्कि सृष्टि के प्रति हमारी श्रद्धा का भी परिचायक बनता है।
आज जब प्रकृति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पुरुषोत्तम मास हमें यह स्मरण कराता है कि ईश्वर की आराधना और प्रकृति की सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सच्ची भक्ति वही है जो मानव, जीव-जंतु और प्रकृति—सभी के कल्याण का भाव अपने भीतर समेटे। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही पुरुषोत्तम मास की वास्तविक सार्थकता भी।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित “व्यंग्य पच्चीसी…” पर चर्चा।
(१४ जून को लोकार्पित)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०८ ☆
☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” – लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी
लेखक:सुरेश पटवा
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆मुखौटे उतारती एक बेबाक कृति– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज के भीतर झाँकने की एक पैनी दृष्टि है।
मैं प्रायः कहता रहा हूं कि व्यंग्यकार को गन्ने का शुगर फ्री रस निकाल कर प्रस्तुत करना आना चाहिए । वह खुद समाज से भिन्न नहीं होता । उसे समाज में रहते हुए उसकी मरम्मत का जिम्मा उठाना पड़ता है। मां की भांति दुलारते पुचकारते हुए समाज सुधार करना व्यंग्य का नैतिक कार्य है।
“व्यंग्य स्वतंत्र विधा से पहले, एक ‘स्पिरिट’ है जो कहीं भी समाहित हो सकती है।
इन तथ्यों के साथ ” सुरेश पटवा की कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ का मूल्यांकन करना प्रासंगिक हो जाता है। पटवा एक बहुविध रचनाकार हैं, जिनकी भाषा में सहजता, शैली में चुटीलापन और दृष्टि में जन-सरोकारों की स्पष्टता है।
एक सजग लेखक का सामाजिक आईना
‘व्यंग्य पच्चीसी’ अपने शीर्षक के अनुरूप पच्चीस विविध व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है। यह पुस्तक न केवल पाठक का मनोरंजन करती है, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए बाध्य भी करती है। लेखक का व्यंग्य उपहास नहीं, बल्कि यथार्थ का ‘अनावरण’ है। वे व्यक्ति पर प्रहार करने के बजाय समाज में व्याप्त कुत्सित प्रवृत्तियों, सत्ता के छल-प्रपंच, बौद्धिक पाखंड, और बाजारवाद की विडंबनाओं को बेनकाब करते हैं।
पटवा जी की लेखन प्रक्रिया स्वयं में एक प्रयोग है। वे जिस कृति पर काम करते हैं, उसके प्रतिदिन के लेखन को सार्वजनिक कर बौद्धिक पाठकों के साथ सतत संवाद स्थापित करते हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और चुटीली है। इस संग्रह की प्रमुख शिल्पगत विशेषता , बुंदेली के स्थानीय प्रयोग, सटीक मुहावरे और ‘आइटम संत’ जैसे स्वनिर्मित शब्दों का जीवंत प्रयोग है।
व्यंग्य लेखों में शिल्पगत विविधता है ।।व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग, रूपकों एवं फैंटेसी के माध्यम से व्यंग्य को धारदार बनाया गया है।
अभिव्यक्ति में कटाक्ष और शिष्टता का संतुलन है। तीखे प्रहारों के बावजूद भाषा मर्यादित है। व्यक्तिगत आक्षेप या किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध फूहड़ता नहीं है, जो लेखक की परिपक्वता को दर्शाता है। वैचारिक धरातल पर
यह संग्रह समकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करता है। ‘मोबाइल व्यथा कथा’ और ‘फ़ेस्बुकिया करनी-भरनी’ आज के डिजिटल दौर की विसंगतियों पर कटाक्ष हैं।
‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ जैसे व्यंग्य लेखों में पुरस्कार-लोलुपता और साहित्यिक परिवेश की विडंबनाओं का यथार्थ चित्रण है।
प्रशासनिक विडंबनाएं उजागर करते व्यंग्य ‘छिद्दी का बकरी लोन’, ‘भ्रष्टाचार का बुल्डोजर’ और ‘ओम बजटाय नमः’ आदि रचनाएँ सत्ता और दफ्तरों की नौकरशाही मानसिकता पर चोट करती हैं। ‘सभ्य जंगल की सैर’ आधुनिकता और प्रकृति-विमुखता के अंतर्विरोधों को बखूबी रेखांकित करती है।
‘व्यंग्य पच्चीसी’ पारंपरिक व्यंग्य-परंपरा का विस्तार है, जिसमें व्यंग्य के ट्रायपॉड परसाई , जोशी और त्यागी जैसे पुरोधाओं की वैचारिक परंपरा की गूँज तो है, किंतु शैली पूर्णतः मौलिक और समकालीन है।
यद्यपि कहीं-कहीं लेखक की विद्वत्ता व्यंग्य की संक्षिप्तता को प्रभावित करती है, तथापि यह पुस्तक समकालीन व्यंग्य का एक दस्तावेज़ है।
यह संग्रह सामान्य पाठक के लिए रोचक, चिंतनशील पाठक के लिए गंभीर और नए लेखकों के लिए व्यंग्य की समझ को लेकर एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में सक्षम है। सुरेश जी की यह कृति सिद्ध करती है कि आज व्यंग्य विधा समाज की चेतना को झकझोरने का सशक्त माध्यम है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री सुमति कुमार जैनजी द्वारा संपादित पुस्तक – “लघु की विराटता” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८ ☆
☆ पुस्तक समीक्षा ☆ लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
☆ लघु की विराटता को दर्शाती पुस्तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
लघु में कथा समेटे हो वह लघुकथा होती है। इसमें निदान होता है। समस्या के समाधान से दूर रहती है। बस ! अपने में एक तीक्ष्णता और व्यंग्यता को समाए रखती है। प्रारंभ में इसे लघु कथा कहा जाता था। इस मायने में भारतेंदु हरिश्चंद्र को लघुकथा का जनक माना जाता है। इन्होंने इसी पैमाने पर खरी उतरने वाली लघुकथाएं लिखी थी।
इसके पश्चात कई रचनाकारों ने इसे पुष्पित व पल्लवित किया है। इसमें मुख्य रूप से प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, वजाहत, जगदीश कश्यप, विष्णु नागर, यशपाल, चंद्रभान शर्मा गुलेरी, राजेंद्र यादव, काशीनाथ सिंह, हरिशंकर परसाई, सतीशराज पुष्करणा सहित अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने इसे विकसित व स्थापित किया है।
वहीं वर्तमान में अनेक रचनाकार इसे गति प्रदान कर रहे हैं। ये नवोदित रचनाकारों को प्रशिक्षित करते हुए अपने रचनाकर्म में भी लिप्त हैं। इनमें मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, रूप देवगुण, राजकुमार निजात, अनिल शूर आजाद, रामकुमार घोटड़, मधुकांत, अशोक भाटिया, अशोक जैन, बलराम, सतीश दुबे सुभाष नीरव, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा, माधव नागदा, संतोष सुपेकर, कांताराय, चंद्रेश कुमार छतलानी आदि अनेक नामों को प्रमुखता से लिया जा सकता है।
लघुकथा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं और संकलनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रस्तुत समीक्ष्य लघुकथा संकलन- लघुकथा की विराटता, उसी परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। इसका संपादन- जगमग दीप ज्योति, मासिक पत्रिका के संपादक सुमति कुमार जैन ने किया है। जो अनेक वर्षों से संपादनकर्म में संलग्न है।
प्रस्तुत संकलन में लघुकथा की विराटता को रचनाओं की गुणवत्ता में समेटने का प्रयास किया गया हैं। इसमें अनेक लघुकथाएं प्रतिष्ठित रचनाकारों की सम्मिलित की गई है। लघुकथा के चमकते नामों में से प्रमुख- कमल चोपड़ा, माधव नागदा, मधुकांत, पूरणसिंह, प्रबोधकुमार गोविल, राजकुमार निजात, रामकुमार घोटड़, रामचरण यादव, रमेश मनोहरा, रामेश्वर कांबोज, रामरतन यादव, रूप देवगुण, शराफत अली खान, मुकेश साहनी, त्रिलोकसिंह ठकुरेला सहित अनेक लघुकथाकारों को इसमें सम्मिलित किया गया है।
इसके अलावा इस पुस्तक में कई नवोदितों को स्थान देकर प्रोत्साहित किया गया है। मगर, इसी के साथ ही संपादक ने रचनाधर्मिता को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है। इस प्राथमिकता के आधार पर जनजीवन के संघर्ष, उसके यथार्थ स्वरूप और उत्थान-पतन पर प्रश्नचिन्ह लगाती कथाओं को प्राथमिकता के साथ सम्मिलित किया है।
चार सौ छिय्यासी पृष्ठों के इस विराट संकलन में कुल मिलाकर एक सौ दस रचनाकारों की लघुकथाएं संकलित की गई है। मुख्य पृष्ठ इसकी सांकेतिकता को प्रदर्शित करता है। साज-सज्जा व छपाई उत्तम है । पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य वाजिब है। साथ ही सभी लघुकथाएं पठनीय बन पड़ी है। इस संकलन का लघुकथा के क्षेत्र में हार्दिक स्वागत किया जाएगा। ऐसा समीक्षक का विश्वास है।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)