मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!! – मंदोदरी” – लेख क्र. ८ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!! – मंदोदरी” – लेख क्र. ८. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

लंकेच्या रणभूमीवर ची ती काळ रात्र! नजर जाईल तिथे शवांचा खच पडलेला, रक्ताचे पाट वहाताहेत, आणि अशातच… चतुर्वेद, सहा उपनिषदे, आयुर्वेद यांचं संपूर्ण ज्ञान असलेला ज्ञानी, विश्रवा ऋषींचा आणि उच्च दानव कुळातील माता कैकसी चा पुत्र… दशानन… रावण… रक्तरंजित अवस्थेत, धराशायी होत मृत होऊन पडलेला. तिन्ही मुलं ही युद्धात मारली गेलेली.

पतीच्या आणि पुत्रांच्या मृत्युची वार्ता कानी येताच, जीवाच्या आकांताने, दु:खावेगाने वेडीपिशी होत धावत गेली रणभूमीवर! पतीच्या शवाजवळ बसली… शोकमग्न मंदोदरी च्या मुखातून शब्द बाहेर पडले…

राम विमुख अस हाल तुम्हारा,

रहा न को कुल रोवन हारा!

उठली दु:खावेगाने आणि आक्रंदन करीत विचारती झाली… ” कुठे आहे तो, ज्याने माझ्या पतीला मारलं?? “

तिला अंगुली निर्देशाने दाखविले आणि सांगितले गेलेल्या दिशेला ती गेली.

तिथे एका शीळेवर प्रभू श्रीरामचंद्र खाली मान घालून, दु:खी, उदास, हताश बसलेले. युद्धात झालेल्या जीव हानी ने किंकर्तव्यमूढ बसलेले. अचानक एक सावली दिसते पायाजवळ… लक्षात येते की कुणा स्त्री ची सावली आहे… लगेच उभे रहातात, वळून मोठ्या अदबीने म्हणतात, ” माते, प्रणाम ! कोण आहेस तू? “…….. मर्यादा पुरूषोत्तम राम तिच्या पुढ्यात, विनम्रपणे नतमस्तक झालेला… मंदोदरी ला परस्त्रीचे अपहरण करणा- या रावणाला हरविणा-याची खरी ताकद दिसली आणि कळली ही !! तिच्या पुढ्यात झुकून उभा होता… ब्रह्मा पुत्र, मांधाता ला आव्हान देणा-या, कुबेराला खाली आणणा-या, सा-या जगाला हरविणा-या रावणाला ठार मारणारा… श्रीराम!!! तिला तिच्या प्रश्नाचं उत्तर मिळतं. मर्यादा पुरूषोत्तमाच्या या… स्त्री च्या सावलीचं ही भान ठेवणा-या, पर स्त्री मातेसमान मानणा-या या पुरूषोत्तमाच्या उंची पुढे तिला… परस्त्रीचं अपहरण करून आणणारा तिचा लंकापती दशानन अगदीच थिटा वाटला. ती वरमून परतली.

मंदोदरी…. नित्य स्मरणीय अशा पंचकन्यांपैकी एक! पण ही येवढीच तिची ओळख नाही. याच्या पलिकडे ही तिच्या व्यक्तिमत्वाचे अनेक पैलू, कंगोरे आहेत जे अलक्षित राहिले आहेत. रामायण म्हणजे… राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान… हेच डोळ्यासमोर येतात लगेच! पण यां व्यतिरिक्त ही अशी व्यक्ती चित्रे आहेत ज्यांच्या बद्दल फारशी माहिती नाही अधोरेखित झाली. त्यातीलच एक आहे… रावणाची पत्नी मंदोदरी!! 

 मंदोदरी… असुरांचा राजा मयासुर आणि अप्सरा हेमा यांची कन्या. पुराणात तिच्या जन्माविषयी वेग वेगळ्या कथा आहेत. तरीही मान्यतेनुसार ती मधुरा नावाची शापित अप्सरांचे, जी बेडकीरूपातून पूर्व रूपात आल्यावर मयासुर आणि हेमा तिला दत्तक घेतात.

…. सुंदरता, बुद्धीमत्ता, आणि नैतिकता याचा अद्वितीय संगम म्हणजे मंदोदरी! अतिशय धर्मपरायण!! रावणाशी विवाह होऊन लंकेला येते आणि सोन्याच्या लंकेची महाराणी बनते. वेद, शास्त्र, विविध कला संपन्न असलेली मंदोदरी, अगदी ख-या अर्थाने…

.. कार्येषु दासी, करणेषु मंत्री, भोजेषु माता, रूपेषु लक्ष्मी, शयनेषु रंभा, क्षमायेषु धरित्री!

अशी… षट्कर्मयुता कुलधर्म पत्नी होती. तिचा भविष्याचा ही अभ्यास होता. असं म्हणतात की ती रावणाशी बुद्धिबळाचा खेळ ही खेळत असे. बुद्धिबळाची सुरुवात तिनेच केली असं म्हंटलं जातं! 

अशा या बुद्धी मान आणि भविष्य जाणणा-या मंदोदरी ला जेव्हा रावणाने सीताहरण केल्याचे कळते तेव्हा तिला अतिशय क्लेष होतात. पर स्त्री, तीही विष्णू चा अवतार असलेल्या प्रभु रामचंद्रांची पत्नी सीता… हिच्या विषयी असा काम आणि मोह भाव जागृत होऊन तिचं हरण करणा-या रावणाला विनाशकाले विपरीत बुद्धी सुचली आहे हे तिला लक्षात आले… रावणावर निरतिशय प्रेम आणि निष्ठा असलेल्या मंदोदरी ने त्याला वारंवार धर्माच्या मार्गावर चालण्यासाठी समजावले, सल्ला दिला. तिने लंकेची नीती आणि रावणाची चेतना शक्ती बनून राहण्याची सतत धडपड केली.

सीतेला सन्मानाने श्रीरामाकडे परत पाठविण्यातच लंका आणि लंकाधिपतीचं भलं आहे हे ती पुन:पुन्हा समजावत राहिली, विनवत राहिली…..

 विनंती करी मंदोदरी|

वाया आणिली जानकी घरी|

 *

लाज झाली तिहीं लोकी||

 *

मज पाहता हे विवसी|

क्षय आणिला कुळासी||

 अभिलाषिता पर सती|

हे तो नव्हे राजनीती|

 ज्याते ध्यानी ध्याती योगी|

तो मज येतो भेटीलागी|

 तया रामासी विन्मुख होणे 

जळो जीणे लाजिरवाणे||

 – – संत नामदेव.

संत नामदेवांनी सुद्धा मंदोदरीच्या, रावणाला समजावण्याची, तिच्या पत्नी धर्माची, दखल घेतली आहे हे विशेष!! अधर्मात ही धर्म सांभाळण्याची पराकाष्ठा आणि निकराचे प्रयत्न करणा-या मंदोदरी चे पती प्रेम आणि विवेक ; रावणाच्या अहंकार आणि क्रोधापुढे हारलं!! 

तिला पतीची हार, रक्तरंजित शेवट दिसत होता, पण तरीही या पतीला प्रेरित करणा-या, पतीची चेतना बनलेल्या समिधेचं तेज, सामर्थ्य, चेतना निस्तेज झाली, स्फुल्लिंग मंदावलं पतीच्या क्रोधाहंकाराच्या धगधगत्या होमकुंडापुढे!! आणि तिच्या नशिबी आलं ते एकटेपण!! एकटीने जळत रहाणं!!

…. जळो जिणे हे लाजिरवाणे!!…. हाच सल, हाच चटका, हाच डाग उरी घेऊन ही समिधा जळत राहिली!! 

– लेख क्र. ८.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३६ ☆ कथा-कहानी – अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘अपना आकाश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३६ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सुकुमार की नौकरी और कमाई अच्छी है। स्थानीय म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में इंजीनियर है। अच्छी तनख्वाह के अलावा खासी ऊपरी आमदनी है। घर में उसके अलावा छोटा भाई दिनकर है, जो कॉर्पोरेशन में  ही क्लर्क है। वह भी खाने पीने लायक कमा लेता है। एक छोटी बहन नंदिनी है, जो शादी के लायक हो रही है।

कमाई बढ़ाने के साथ सुकुमार की पत्नी शोभा को उड़ने की इच्छा होती है। अब इस घर में मन नहीं लगता। नया फर्नीचर, नये पर्दे लेने की इच्छा होती है। अपनी नर्सरी और लॉन बनाने की इच्छा होती है। यह भी इच्छा होती है कि मिलने जुलने वाले आएं तो उसका वैभव देखकर प्रभावित हों। मुख़्तसर यह कि वे सब इच्छाएं  सिर उठाती हैं जो समृद्धि के साथ पैदा होती हैं। अपना अलग आकाश हो और उसमें परवाज़ भरने की पूरी स्वतंत्रता हो।

नंदिनी के विवाह की ज़िम्मेदारी सामने है, लेकिन सुकुमार और शोभा के लिए यह बड़ी अड़चन है। इस काम में ज़्यादा सहयोग देने के लिए अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर अंकुश लगाना पड़ेगा, अपने कुछ सपने स्थगित करने पड़ेंगे। इसलिए बेहतर यह है कि घर से जल्दी से जल्दी निकल जाया जाए। उसके बाद जो सहयोग बने, देकर मुक्ति पाई जा सकती है।

अब घर छोड़ने के लिए बहाने ढूंढ़े जा रहे हैं। जिसे घर छोड़ना ही है उसके लिए बहानों की क्या कमी? शोभा, सास और ननद को सुना कर अपने असंतोष को ज़ाहिर करती रहती है ताकि घर छोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। कभी बच्चों का स्कूल दूर होने का रोना रोया जाता है, कभी ज़रूरत के हिसाब से जगह कम होने की शिकायत की जाती है। सुना सुना कर परिवार वालों को उनकी विदाई के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है।

फिर ‘क्लाइमेक्स’ की तैयारी की जाती है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े किये जाते हैं, कभी ननद के द्वारा भाभी का साबुन इस्तेमाल कर लेने पर, कभी देवर द्वारा सब्ज़ी-भाजी न लाने पर। जिसे विवाद करना है उसके लिए मुद्दों की क्या कमी? सुकुमार ने बिना किसी को बताये एक  घर किराये पर ले लिया था। जब सब तैयारी हो गयी तो शोभा ने एक दिन बात का बतंगड़ बनाकर घर सिर पर उठा लिया और फिर गुस्से के नाटक के साथ फटाफट घर छोड़ दिया। बात सिर्फ इतनी थी कि ननद ने उसके छोटे बच्चे को शरारत करने पर थप्पड़ लगा दिया था। घर से बाहर निकल कर शोभा को खूब राहत और खुशी महसूस हुई। अब उड़ान भरने के लिए सामने खुला आकाश है।

पिता के घर से निकल कर सुकुमार और शोभा अपना घोंसला सजाने में लग गये। नया फर्नीचर आया, नये पर्दे, नया फ्रिज। अब अपने और अपने बच्चों के लिए खाने पीने का सामान बेहिचक लाया जा सकेगा, किसी के साथ बांटने की समस्या नहीं रहेगी। शोभा के लिए साड़ी लाते वक्त मां या बहन का ख़याल उलझन पैदा नहीं करेगा। अब  सुकुमार-शोभा को लगता कि उनका कोई वजूद है, उनकी भी कोई हस्ती है। परिवार के साथ रहने पर ऐसा गहरा संतोष, ऐसी तृप्ति कहां मिलती है?

परिवार से अलग होने पर सुकुमार के लिए कई बंदिशें भी ख़त्म हुईं। अब देर रात तक कहीं रुकने पर मां-बाप के परेशान सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा। पहले सुकुमार कभी-कभी दोस्तों के साथ थोड़ी शराब ले लेता था। अब लड़खड़ाने की हद तक भी पी जा सकती थी। शोभा से उसे डर नहीं लगता था क्योंकि उसने शोभा को समझा दिया था कि शराबख़ोरी अब हर ऊंचे समाज में आम है और बिना शराबख़ोरी ऊंचे समाज में गुज़र नहीं हो सकती।

इस सारे सुख के बावजूद शोभा को कभी-कभी अड़चन होती है। अब तबियत ख़राब होने पर भी बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से लेकर सारे काम निपटाने पड़ते हैं। समय से खाना न मिले तो सुकुमार चिड़चिड़ाने लगता है। पहले अस्वस्थ होने पर सास और ननद से मदद मिल जाती थी। अब किसी का सहारा नहीं है। पड़ोसियों से सलाम-दुआ से ज़्यादा संबंध नहीं हैं। इन दिक्कतों के बावजूद शोभा के लिए अपनी गृहस्थी की मालकिन होने का सुख और गर्व बहुत बड़ा है। उस सुख के सामने सभी दिक्कतें छोटी पड़ जाती हैं।

अब सुकुमार और शोभा उस घर में मेहमानों की तरह जाते हैं। अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं। अब माता-पिता, भाई-बहन के लिए थोड़ा बहुत जो कर दिया, उस पर कोई सवालिया निशान  नहीं लगता। माता-पिता स्वाभिमानी हैं, वे बेटे बहू से कुछ मांगते नहीं। सुकुमार-शोभा जब उस घर में जाते हैं तो अपनी दिक्कतों का ऐसा दफ्तर खोलते हैं कि किसी दूसरे को अपना दुख प्रकट करने की हिम्मत नहीं होती।

सुकुमार अब रात को देर से सोता है और सवेरे देर से उठता है। पहले देर से और देर तक सोने पर पिताजी की बातें सुननी पड़ती थीं। अब रोकने वाला कोई नहीं। नये घर में आकर उसकी तोंद बढ़ गयी है। खर्च बढ़ने के साथ वह ऊपरी आमदनी के नये-नये साधन ढूंढ़ रहा है। आमदनी बढ़ने के साथ उसकी आदतें बिगड़ती जा रही हैं।

मुश्किल यह है कि सुख के घी में कभी न कभी मक्खी पड़ती ही है। कई दिनों से सुकुमार रात को देर से लौटता था और अक्सर वह नशे की हालत में होता था। शोभा उसका इंतज़ार करते-करते सो जाती थी। एक रात लौटते वक्त कॉलोनी के छोर पर सुकुमार का स्कूटर लुढ़क गया। ख़ासी चोट खाकर वह बेहोश हो गया। सौभाग्य से कॉलोनी के कुछ लड़कों की नज़र उस पर पड़ गयी। वे उसे लाद-फांद कर घर ले आये।

ज़िन्दगी में पहली बार शोभा को इतने बड़े संकट का सामना अकेले करना था। वह बदहवासी की हालत में थी। सुकुमार ख़ून से सना पलंग पर पड़ा था और दोनों बच्चे नींद में ग़ाफ़िल थे। सुकुमार के सिर और चेहरे में चोट थी। कमीज़ फट गयी थी और शरीर कई  जगह से छिल गया था। कॉलोनी के लड़के भले थे, दौड़कर डॉक्टर को बुला लाये। डॉक्टर ने आंखों की जांच की, हाथ- पांव  की दुरुस्ती देखी और घावों को साफ कर उनमें  दवा लगायी। फिर कहा, ‘हेड इंजरी हो सकती है। इन्हें दो दिन के लिए किसी नर्सिंग होम में रख दीजिए। मैं चिट्ठी लिख देता हूं।’

अब और बड़ा संकट था। कॉलोनी के लड़के सुकुमार को नर्सिंग होम ले जाने के लिए तैयार थे, लेकिन शोभा के सामने समस्या यह थी कि कौन रात भर बच्चों के पास रहे और कौन सुकुमार के साथ नर्सिंग होम जाए। रात के बारह बज चुके थे और पूरी कॉलोनी नींद में डूबी थी। किसी परिवार से ऐसे संबंध नहीं बन पाये थे कि किसी को बच्चों की देखभाल के लिए बुलाया जा सके।

अंत में वही विकल्प चुनना पड़ा जो सबसे ज़्यादा भरोसेमंद था और जिसमें सबसे कम धर्मसंकट था। उसने ससुराल को फोन लगाकर सारी जानकारी दी।

खबर पाते ही ससुर, सास, ननद और देवर हाज़िर हो गये। शोभा को बड़ी देर के आत्मनियंत्रण के बाद रोने को कंधा मिला। परिवार के इन चारों सदस्यों को देखकर उसकी जान में जान आयी। अब न सुकुमार की देखभाल की चिन्ता रही, न बच्चों की देखभाल की। बड़ी देर से उसे जकड़े रखने वाला अकेलापन एक झटके में छंट गया।

ससुर को साथ लेकर वह सुकुमार को नर्सिंग होम ले गयी। कॉलोनी के लड़कों ने इसमें पूरी मदद की। नर्सिंग होम पहुंचने के बाद शोभा ने लड़कों को भरे दिल से विदा किया। नर्सिंग होम में जल्दी ही सुकुमार की हालत काबू में आ गयी, लेकिन अड़तालीस घंटे ऑब्ज़र्वेशन में रखना ज़रूरी था।

थोड़ी देर में सुकुमार को नींद आ गयी और शोभा ज़मीन पर उसकी बगल में कंबल बिछाकर सो गयी। सुकुमार के पिता बाहर बरामदे में सोने चले गये।

सवेरे सुकुमार पूरी तरह होश में था। ससुर को उसकी देखभाल के लिए छोड़कर शोभा घर आ गयी। उस दिन बच्चे स्कूल नहीं गये थे। वे  बुआ और दादी से मां और पिता की अनुपस्थिति के बारे में पूछताछ में लगे थे। दादी और बुआ उन्हें गोलमोल जवाब देकर बहला रही थीं।

घर आकर शोभा ने देवर को चाय नाश्ता लेकर नर्सिंग होम भेज दिया। अचानक आये संकट ने उसके स्नायुओं को बिल्कुल थका दिया था। वह पस्ती की हालत में पलंग पर लेट गयी। थकान ज़रूर थी, लेकिन अब चिन्ता दूर हो गयी थी।

पलंग पर आंखें बन्द किये लेटी शोभा भीतर से बच्चों जैसी बेचारगी महसूस कर रही थी। उसे किसी ऐसे हमदर्द की ज़रूरत महसूस हो रही थी जो उसके सिरहाने बैठकर उसके उद्विग्न  माथे पर हाथ रखे और उसे सुकून दे। वह बीच बीच में आंखें खोलकर बड़ी उम्मीद से अपनी सास की तरफ देख रही थी। उधर सास, उसकी हालत  से  बेख़बर, बच्चों को नहलाने धुलाने में मशगूल थी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०८ – अनिवार्य निर्णय… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अनिवार्य निर्णय…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०८ — अनिवार्य निर्णय — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक सुनी सुनायी कहानी पर मेरा विश्वास होने से उसे लिख रहा हूँ ताकि वह सुनी सुनायी न रह कर शब्दों के घेरे में सदा के लिए अडिग रह जाए। धरती रहने से मनुष्य भी तो रहेंगे। यह कहानी मनुष्य के साथ रहे और रह कर उन्हें विवेचन के लिए विवश करे कि किस तरह उन्हें ठगा जाता है और वे होते हैं कि ठगी को शायद भगवानी प्रसाद मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नीच अधम साधु नदी के किनारे बैठ कर अपने पाँव धो रहा था। वह आत्म केन्द्रित भाव से इस चिंतन में पड़ा हुआ था कि क्या लोगों से विश्वासघात करने के लिए वह पैदा हुआ था? तभी नदी में एक विशाल धारा प्रकट हुई जो उसे बहा ले गयी। वक्त को यही इंतजार था वह किसी मोड़ पर कमजोर तो पड़े। अन्यथा भक्तों के घेरे में वह बहुत बलिष्ठ होता था। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३७ – क्रोध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३७ क्रोध… ?

चैनल पर समाचार देख रहा हूँ। दुकानदार द्वारा दस रुपये मांगने पर क्रोधित युवक ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। समाचार सुनकर हतप्रभ हूँ, अवाक हूँ। कुछ लोग विचार कर सकते हैं कि केवल दस रुपए के लिए कोई इतनी हिंसा कैसे कर सकता है? मेरे सामने प्रश्न दस रुपये या दस लाख या दस करोड़ का नहीं, मनुष्य के क्रोध के पारावार का है। जो मारा गया वह मनुष्य था, जिसने मारा, वह मनुष्य है। सत्यस्थिति तो पुलिस की विवेचना से सामने आएगी तथापि प्रथम दृष्टया यह षड्यंत्रपूर्वक की गई हत्या नहीं लगती। इसके मूल में क्रोध के चलते अपना आपा खो देना दिखता है।

क्रोध मनुष्य की प्राकृतिक भावना है। मनुष्य के भावनात्मक विरेचन के लिए भी क्रोध अनिवार्य है। तथापि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्र अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए। क्रोध का अतिरेक सामान्य विवाद को हिंसक दुर्घटना में बदल सकता है।

प्रश्न है कि क्रोध क्यों उपजता है? मनोविज्ञान कहता है कि सामान्यत: अपेक्षा-भंग, असंतोष, असहिष्णुता, असफलता, असुरक्षा, असहायता के चलते क्रोध उपजता है।

योगेश्वर, श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय के बासठवें श्लोक में क्रोध के संबंध में कहते हैं,

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

योगेश्वर उवाच अगले श्लोक में इसी विषय को विस्तार देता है-

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहत्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और ज्ञानशक्ति का नाश हो जाने से मनुष्य अपनी स्थिति से, अपनी मनुष्यता से गिर जाता है।

क्रोध के चलते मनुष्यता से गिरा मनुष्य, कैसे अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है, इसका उल्लेख अपनी एक लघुकथा ‘क्रोध में किया था। लघुकथा इस प्रकार है-

“…दोनों में बहस होने लगी थी। विवाद की तीक्ष्णता बढ़ती गई। आक्रोश में दोनों थे पर पहला मनुष्य था, दूसरा क्रोधी था। क्रोध, तर्क का पथ तज देता है, मर्म को चोट पहुँचाने की राह चलता है। इस राह के एक विनाशकारी मोड़ पर तिलमिलाहट टकराती है।

तिलमिलाहट में क्रोधी ने एक बड़ा पत्थर मनुष्य के सिर पर दे मारा। मनुष्य की मौत हो गई। क्रोधी को फाँसी चढ़ना पड़ा।

यश, संपदा, नेह, संबंध, अंततः समूचे अस्तित्व की बलि ले लेता है क्रोध।”

आज के मनुष्य का अनुभव बताता है कि बदलती जीवन शैली में अब अहंकार से भी क्रोध उपजने लगा है। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स या श्रेष्ठता बोध, अहंकार के मूल में होते हैं।

इस लघुकथा को लेख के आरंभ में उल्लेखित घटना से जोड़ें। जिसकी हत्या हुई, उसका जीवन असमय नष्ट हो गया। जिसने हत्या की, उसका जीवन भी नष्ट होने की स्थिति में आ गया है।

लोकोक्ति है कि क्रोध वह अग्निकुंड है जो आपके हाथों स्वयं आपकी आहुति करवा देता है।

अपनी आहुति या अपने क्रोध पर नियंत्रण? निर्णय हरेक को अपने स्तर पर लेना है।

© संजय भारद्वाज 

(16:55 बजे, 30 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८१ – दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला – आम खास का खास है)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८१ ☆

☆ दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आम खास का खास है, खास आम का आम.

सलिलदाम दे आम ले, गुठली ले बेदाम..

.

आम न जो वह खास है, खास न जो वह आम.

आम खास है, खास है आम, नहीं बेनाम..

.

पन्हा अमावट आमरस, अमकलियाँ अमचूर.

चटखारे ले चाटिये, मजा मिले भरपूर..

.

दर्प न सहता है तनिक, बहुत विनत है आम.

अच्छे-अच्छों के करे. खट्टे दाँत- सलाम..

.

छककर खाँय अचार, या मधुर मुरब्बा आम .

पेड़ा बरफी कलौंजी, स्वाद अमोल-अदाम..

.

लँगड़ा, हापुस, दशहरी, कलमी चिना बदाम.

सिंदूरी, नीलमपरी, चुसना आम ललाम..

.

चौसा बैगनपरी खा, चाहे हो जो दाम.

सलिलआम अनमोल है, सोच न- खर्च छदाम..

.

तोताचश्म न आम है, तोतापरी सुनाम.

चंचु सदृश दो नोक औ‘, तोते जैसा चाम..

.

हुआ मलीहाबाद का, सारे जग में नाम.

अमराई में विचरिये, खाकर मीठे आम..

.

लाल बसंती हरा या, पीत रंग निष्काम.

बढ़ता फलता मौन हो, सहे ग्रीष्म की घाम..

.

आम्र रसाल अमिय फल, अमिया जिसके नाम.

चढ़ा देवफल भोग में, हो न विधाता वाम..

सलिलआम के आम ले, गुठली के भी दाम.

उदर रोग की दवा है, कोठा रहे न जाम..

चाटी अमिया बहू ने, भला करो हे राम!.

सासू जी नत सर खड़ीं, गृह मंदिर सुर-धाम..

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (1 जून से 7 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (1 जून से 7 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कहते हैं

“हरि अनंत हरि कथा अनंता।

कहहिं सुनहिं बहुबिधि जसब संता॥

भगवान अनंत है और उनकी कृपा भी अनंत है। इसी प्रकार हमारे श्री हनुमान जी भी अनंत प्रकार से हमारी रक्षा करते हैं और उनको याद करने का सबसे अच्छा तरीका श्री हनुमान चालीसा का पठन-पाठन है। आज की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है :-

भूत पिसाच निकट नहिं आवै |

महाबीर जब नाम सुनावै ||

लाभ:- इस चौपाई के संपुट पाठ करने से बुरी आत्मा, भूतप्रेत आदि अगर आपके पास आ गए हैं तो दूर भाग जाएंगे अन्यथा आपके पास नहीं आएंगे।

नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 1 जून से 7 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, बुध और शुक्र मिथुन राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। गुरु प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेंगे तथा 2 तारीख के 1:57 दिन से कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। क्रोध की मात्रा थोड़ी बढ़ सकती है। अगर आपको श्वास संबंधी कोई रोग है तो उसमें आपको लाभ होगा। धन आने की मात्रा में थोड़ी कमी हो सकती है। आपको अपने संतान से सहायता मिल सकती है। आपकी प्रतिष्ठा में इस सप्ताह वृद्धि होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। 1 जून को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आप कचहरी के कार्यों में सफल हो सकते हैं। धन आने का उत्तम योग बनेगा। व्यापार में लाभ होगा। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपको अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए, भाग्य पर नहीं। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अगर वह कहीं कार्यरत है तो उनको वहां सफलता मिलेगी। अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपको अपने कार्य स्थल पर सावधानी पूर्वक बात करना चाहिए। क्रोध में नहीं आना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 6 तारीख की दोपहर से लेकर 7 तारीख तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता दायक है। एक, 2 और 3 जून को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें अक्षत और लाल पुष्प डालकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रह सकता है। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि संभव है। प्रेम संबंधों में स्थायित्व भी आएगा। नौकरी के मामले में सफलता का योग है। कचहरी के मामले में आपको सावधान रहना चाहिए। धन आने का उत्तम योग है। भाग्य के मामले में आप सावधान रहें। आप अपने कर्मों पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। शत्रुओं को आप थोड़े से प्रयास से परास्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून कार्यों को करने हेतु सफलता दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कार्यालय में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करने में सफलता मिल सकती है।। भाग्य से मामूली मदद प्राप्त हो सकती है।। कार्यालय में आपको अपने साथियों और अधिकारियों का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए।। इस सप्ताह आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा।। आपके संतान की उन्नति भी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख की दोपहर तक का समय कार्यों को करने में मददगार है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। भाग्य से भी आपको मदद मिल सकती है। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आप या आपके जीवन साथी में से किसी एक को शारीरिक कष्ट हो सकता है। आपको अपने संतान से कोई विशेष सहयोग नहीं मिलेगा। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन तारीख ठीक-ठाक है। 1 तारीख को आपको अपने प्रतिष्ठा और माता जी के प्रति थोड़ा सा तक रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी का ध्यान करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा उनको अपने कार्यालय में अधिकारियों एवं सहयोगियों से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा व्यापार उत्तम चलेगा अगर आप नए व्यापार का प्रयास कर रहे हैं तो एक बड़े व्यापार की नींव डाल सकते हैं। भाग्य से आपको इस सप्ताह कोई विशेष मदद नहीं मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन तारीख लाभदायक है। इन दोनों तारीखों में आपके द्वारा किए जा रहे अधिकांश कार्य सफल होंगे। इस सप्ताह 1 तारीख को आपको अपने भाई बहनों का सहयोग प्राप्तहो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी की पूजा करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद मिलेगी। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। व्यापारियों का व्यापार भी अच्छा चलेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को उनके कार्यालय में अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। परंतु उनको बहुत सावधान होकर कार्य करना चाहिए। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक हैं। 1 जून को आपको धन के मामले में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका बहुत अच्छी तरह से साथ देगा। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुके हुए हैं उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं का बड़ी आसानी के साथ थोड़े से प्रयास से ही सफाया कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपको अपने जीवनसाथी के स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 6 और 7 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल हैं। 1 तारीख को आपको अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

अगर आप अविवाहित हैं तो यह समय आपके लिए काफी अच्छा है। आपके विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। पुराना अगर कोई प्रस्ताव चल रहा है तो विवाह तय भी हो सकता है। नए-नए संबंध बन सकते हैं। पुराने संबंधों में वृद्धि हो सकती है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। व्यापार में प्रगति होगी। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। आपको अपने दुश्मनों से इस सप्ताह थोड़ा सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून परिणाम दायक हैं। 1 जून को आपको कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए काफी अच्छा रहेगा। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आपको गलत रास्ते से धन की प्राप्ति हो सकती है। धन प्राप्ति का ठीक-ठाक योग है। इस सप्ताह आपके लिए चार पांच और छे तारीख उत्तम है। दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। 1 तारीख को आपको अपने धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आप अपने भाई बहनों के साथ संबंध अच्छा रहेगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। संतान का आपको अच्छा समर्थन प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक रहेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपनी प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको कम मदद मिलेगी। आपको अपने परिश्रम से कार्यों को संपन्न करना होगा। इस सप्ताह आपके लिए 6 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 7 तारीख कार्यों को करने के लिए उत्साहवर्धक हैं। चार-पांच और 6 तारीख के दोपहर तक आपको सतर्क रहना चाहिए। 1 तारीख को आपको अपने कार्यालय में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके थोड़े से प्रयास से ही आपकी प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि होगी। लोगों के बीच में आपकी स्वीकारता बढ़ेगी। आपको सम्मान प्राप्त होगा। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक रहेगी। अगर आप व्यापारी है तो आपका व्यापार अच्छा चलेगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। आपके संतान को उनके कार्यों में सफलता मिल सकती है। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। परीक्षाओं में आपको सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून कार्यों को करने हेतु मददगार है। 6 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर और 7 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ४९ आणि ५० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ४९ आणि ५० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ४९ – – 

सदा बोलिल्यासारीखे चालताहे|

अनेकी सदा एक देवासी पाहे|

सगुणी भजे लेश नाही भ्रमाचा|

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा|४९|

अर्थ :  जो बोलण्याप्रमाणे वागतो, परमेश्वराची जरी अनेक रूपे असली तरी तो एकच आहे या दृष्टीने त्याच्याकडे पाहतो, सगुण परमेश्वराची उपासना करताना त्याच्या मनामध्ये कोणतीही शंका असत नाही असा भक्त त्या सर्वोत्तमाचा श्रेष्ठ भक्त असतो.

विवेचन : खऱ्या भक्ताची फार सुंदर लक्षणे समर्थांनी या ठिकाणी सांगितली आहेत. परमेश्वराचा प्रिय भक्त होणे ही सोपी गोष्ट नाही. जशी रोगातून बरे होण्यासाठी अनेक पथ्ये पाळावी लागतात, तशीच पथ्ये भक्ताला देखील पाळावी लागतात. आपले संत म्हणजे “बोले तैसा चाले” या तुकोबांच्या उक्तीचे मूर्तिमंत उदाहरण होत.

व्यवहारामध्ये आपण बऱ्याच वेळा खोटे बोलत असतो. बऱ्याच व्यक्ती बोलतात एक आणि करतात दुसरे ! अशा व्यक्ती दुसऱ्याला उपदेश करण्यात आघाडीवर असतात. परंतु स्वतःवर वेळ आली की त्यांचे वागणे वेगळे असते. आपल्या मुलांना मराठी माध्यमाच्या शाळांमध्ये घाला असे सांगणाऱ्या बऱ्याच व्यक्तींची मुले इंग्रजी माध्यमातून शिक्षण घेताना दिसतात. लग्नप्रसंगी हुंडा घेऊ नये, अवास्तव खर्च करू नये अशी सांगणारी मंडळी त्यांच्या मुलांच्या लग्नामध्ये या सगळ्या गोष्टी बाजूला ठेवून वारेमाप खर्च करताना दिसतात. असे वागणे म्हणजे दुटप्पी वागणे होय.

संतांच्या बोलण्यात आणि वागण्यात एकवाक्यता असते. “काय उणे आम्हां विठोबाचे पायी… “असे तुकाराम महाराजांनी म्हटले. किंवा “सोने रूपे आम्हां मृत्तिकेसमान, ” असे जे त्यांनी म्हटले ती त्यांची अंतरंगातून आलेली निरपेक्ष वृत्ती होती. विरक्ती त्यांच्या रक्तात भिनली होती. म्हणून छत्रपती शिवाजी महाराजांनी जेव्हा त्यांना सोने, नाणे, वस्त्र इत्यादी स्वरूपात नजराणा पाठवला तेव्हा त्यांनी तो नाकारला. छत्रपती शिवाजी महाराज समर्थ रामदासांन आपले गुरु मानत. एकदा तर त्यांनी आपले राज्य समर्थांना चिठ्ठी लिहून झोळीत अर्पण केले होते. परंतु समर्थांनी ते त्यांना परत केले. अशी असते संतांची निरपेक्ष वृत्ती !

अशी भक्ती आणि विरक्ती अंगात भिनली पाहिजे. आपण सर्वसामान्य माणसे आहोत परंतु संतांनी दाखवलेल्या या मार्गावर वाटचाल तर करू शकतो ! माझ्या प्रपंचासाठी आवश्यक तेवढे धन मी मिळवीन. इतरांचे धन किंवा पैसा माझ्यासाठी मृत्तिकेसमान असेल. परस्त्रीकडे मी माता किंवा भगिनी म्हणून पाहीन या गोष्टी तर आपल्याला सहज करता येण्यासारख्या आहेत.

ज्याप्रमाणे आपल्या देशाबद्दल बोलताना आपण म्हणतो की आपल्या देशात अनेकतेत एकता आहे. त्याप्रमाणे परमेश्वराची विविध रूपे आणि विविध नावे असली तरी चैतन्यरूपी असलेला तो परमेश्वर एकच आहे. अनेक संतांनी हे सत्य एकमुखाने सांगितले आहे. गीतेत श्रीकृष्णाने सांगितले आहे की ज्याप्रमाणे विविध नद्या एकाच समुद्राला येऊन मिळतात त्याप्रमाणे विविध देवदेवतांना केलेली प्रार्थना माझ्यापर्यंत येऊन पोहोचते. पण आम्ही सामान्य माणसे हे समजून घेताना गोंधळ करतो. देवामध्ये कोण श्रेष्ठ, कोण कनिष्ठ अशा प्रकारचा भेदभाव करत बसतो.

स्थुलाकडून सूक्ष्माकडे तशी सगुणाकडून निर्गुणाकडे आपली वाटचाल झाली पाहिजे. भगवंताचा श्रेष्ठ भक्त ही गोष्ट जाणून असतो. निर्गुण निराकाराप्रती त्याची श्रद्धा असते. परंतु तरी देखील सर्वसामान्यांच्या मनामध्ये भगवंताबद्दल विश्वास निर्माण व्हावा आणि त्यांचीही वाटचाल सगुणाकडून निर्गुणाकडे व्हावी अशी त्याची इच्छा असते म्हणूनच तो सगुणाची देखील पूजा करतो. असे करताना त्याच्या मनामध्ये कोणतीही शंका किंवा कोणताही भ्रम असत नाही. मंदिरात अंतरात तोच नांदत आहे हे तो जाणून असतो. असा भक्त भगवंताचा त्या सर्वोत्तमाचा श्रेष्ठ भक्त होय.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या बोलण्यात आणि वागण्यात एकवाक्यता आहे का? मी इतरांना जे सांगतो ते स्वतः पाळतो का, याचा मी कधी प्रामाणिकपणे विचार केला आहे का?

२. परमेश्वराची विविध रूपे पाहताना माझ्या मनात श्रेष्ठ-कनिष्ठाचा भेद येतो का? “अनेकी एक” हे तत्त्व माझ्या उपासनेत उतरले आहे का?

३. संतांच्या निरपेक्ष वृत्तीचा आदर्श डोळ्यांसमोर ठेवून माझ्या दैनंदिन जीवनात मी एखादी तरी गोष्ट निरपेक्षपणे करतो का?

४. सगुण उपासना करताना माझ्या मनात शंका, भ्रम किंवा न्यूनगंड येतो का? माझी श्रद्धा अविचल आहे का?

५. “सर्वोत्तमाचा दास” होण्याच्या दिशेने माझी वाटचाल सुरू आहे असे मला वाटते का?

– – – 

श्लोक क्र. ५० – – 

नसे अंतरी कामकारी विकारी |

उदासीन जो तापसी ब्रह्मचारी|

निवाला मने लेश नाही तमाचा|

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा |५०|

अर्थ : ज्याच्या मनामध्ये कामवासनेसारख्या निरनिराळ्या प्रकारच्या विकार उत्पन्न करणाऱ्या वासना उत्पन्न होत नाहीत, जो वृत्तीने विरक्त असून ब्रह्मचारी राहून तपस्या करतो, ज्याच्या मनात क्रोधाचा लवलेशही उरत नाही, ज्याचे मन अत्यंत शांत आणि क्रोधरहित होते, असा मनुष्य त्या सर्वोत्तम भगवंताचा जगातील उत्कृष्ट भक्त होय.

(कामकारी – कामवासना, विकारी – विकृती/अशांती निर्माण करणारा, उदासीन – तटस्थ/निर्विकार, निवाला – शांत/तृप्त, लेश – अंश, तम – अंधार /अज्ञान/ मोह/ अविचार)

विवेचन : मागील काही श्लोकांपासून समर्थ आपल्याला खऱ्या भक्ताची लक्षणे सांगत आहेत. एकेक श्लोक वाचून त्याचा अर्थ लक्षात घेतला की आपणही मानसिकदृष्ट्या खऱ्या अर्थाने समृद्ध होत जातो. आपण जर साधक असू, तर आपण कसे असायला हवे हे यातून कळते.

कामवासना ही माणसाच्या मनातील इतर वासनांपेक्षाही अधिक बलवान असलेली वासना असते. ती अनेक विकार म्हणजेच विकृती उत्पन्न करते. जेव्हा कामवासनेवर माणसाचे नियंत्रण नसते, तेव्हा त्याची बुद्धी काम करत नाही. त्याचा विवेक हरवतो आणि मग नको त्या गोष्टी त्याच्या हातून घडतात. समाजात अनेक राजकारणी व्यक्ती, साधू, संत, बुवा, बाबांचे असे अधःपतन होताना आपण पाहतो.

भगवंताचा सच्चा भक्त मात्र कामवासनेला आपल्या मनाचा ताबा घेऊ देत नाही. वृत्तीने तो उदासीन असतो. या ठिकाणी उदासीन या शब्दाचा अर्थ आपण समजावून घेऊया. सामान्यतः आपण असे समजतो की उदासीन म्हणजे उदास, कंटाळवाणा, ज्याला कशातच गोडी वाटत नाही अशी व्यक्ती. परंतु इथे समर्थांनी हा शब्द त्या अर्थाने वापरलेला नाही. उद् म्हणजे वरच्या दिशेने. लिफ्टला मराठी शब्द उद्वाहक असा आहे. या अर्थाने उदासीन म्हणजे वरची पातळी. सामान्य लोकांपेक्षा साधक एका वेगळ्या वरच्या पातळीवर स्थिर झालेला असतो. देहसुखाला महत्त्व न देता भगवंताच्या नामात तो स्थिर असतो. असा साधक म्हणजे उदासीन.

तो तापस असतो म्हणजे तपस्या करणारा. तपस्या करण्यासाठी आपल्याला कोणी ऋषीमुनी व्हावे लागेल असे नाही तर भगवंताच्या मार्गावर चालण्यासाठी एक प्रकारची साधना आणि त्यातील सातत्य आवश्यक असते. ही साधना म्हणजेच तपस्या असे म्हणता येईल.

‘ब्रह्मचारी’ या शब्दाचा अर्थ देखील या ठिकाणी आपण समजून घेऊ. व्यवहारात आपण ब्रह्मचारी म्हणजे लग्न न केलेला किंवा ब्रह्मचर्य पाळणारा असा अर्थ घेतो. जो विवेकाचा वापर करून आपल्या मनावर संयम ठेवतो आणि ब्रह्मचर्याचे पालन करतो अशी कोणतीही व्यक्ती म्हणजे ब्रह्मचारी. मग ती लग्न झालेली असो किंवा नसो. संसारात राहून देखील ब्रह्मचर्याचे पालन करता येणे शक्य असते आणि खरा साधक त्याचे पालन करतोच. आरोग्य किंवा विद्या प्राप्त करण्यासाठी जसे ब्रह्मचर्य पाळणे आवश्यक असते त्याप्रमाणेच साधना मार्गातही ब्रह्मचर्याचे अतिशय महत्त्व आहे.

तिसऱ्या ओळीत समर्थांनी साधकाचे आणखी एक लक्षण सांगितले आहे. ते म्हणजे त्याच्या मनात तमाचा म्हणजे मोह, अज्ञान आणि त्यातून उत्पन्न होणाऱ्या क्रोधाचा लवलेशही नसतो. काम आणि क्रोध हे बहुधा जोडीनेच आपल्या मनामध्ये वास करत असतात. काम आणि क्रोध या दोन्हींचा अतिरेक झाला की माणूस आपली विचारशक्ती आणि विवेक हरवून बसतो मग त्याच्या हातून नको त्या गोष्टी घडतात. साधनेच्या मार्गावर चालणाऱ्या आणि ज्यांनी बऱ्यापैकी त्यात प्रगती केली आहे अशा व्यक्तींना देखील काम आणि क्रोध यावर नियंत्रण न ठेवता आल्यामुळे त्यांचे अधःपतन झालेले दिसून येते. महर्षी विश्वामित्रांचे उदाहरण तर आपणा सर्वांना माहिती आहे.

खरा भक्त या सगळ्या वासना आणि विचारांवर नियंत्रण ठेवतो. त्याचे मन शांत आणि तृप्त असते. म्हणून आपण जे खरे संत किंवा साधक आहेत, त्यांच्याजवळ शांतीचा अनुभव घेतो. त्यांच्या चेहऱ्यावर एक विलक्षण प्रसन्नता आणि तेज असते. ते त्यांच्या साधनेतून आणि मानसिक शांततेतून आलेले असते. संत तुकाराम म्हणतात…

शांतीपरतें नाहीं सुख । येर अवघेंची दुःख ॥१॥

म्हणउनी शांति धरा । उतराल पैल तीरा ॥ध्रु. ॥

खवळलिया कामक्रोधीं । अंगी भरती आधिव्याधी ॥२॥

तुका म्हणे त्रिविध ताप । जाती मग आपेआप ॥३||

– – म्हणून काम, क्रोध आदी विकारांवर नियंत्रण असलेला, ब्रह्मचर्याचे पालन करणारा आणि साधना मार्गावर सातत्याने वाटचाल करणारा भक्त म्हणजे त्या सर्वोत्तम परमेश्वराचा जगातील उत्कृष्ट असा भक्त होय.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या मनावर कामवासना आणि क्रोध यांचे किती प्रमाणात नियंत्रण आहे – हे मी प्रामाणिकपणे तपासले आहे का ?

२) “उदासीन” म्हणजे वरच्या पातळीवर स्थिर राहणे – माझी साधना मला या पातळीकडे नेत आहे का की मी अजून सांसारिक गोष्टींमध्येच गुंतलेलो आहे ?

३) संसारात राहूनही ब्रह्मचर्य पाळता येते – माझ्या दैनंदिन जीवनात मनावर संयम ठेवण्याचा माझा प्रयत्न किती प्रामाणिक आहे ?

– क्रमशः श्लोक ४९ आणि ५०.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हमारा जानने वाले परिवार पर आफत आ गयी। कोई ट्रक उनके घर के पास से निकलता हुआ उनकी चारदीवारी तोड़ गया। चारों ओर समाचार। पुलिस ने कार्यवाही शुरू की। कुछ दिन बाद हम उनके गर गये। पूछा क्या बना पुलिस कार्यवाही का?

-हमने अपनी अर्जी वापस ले ली।

-क्यों?

-पुलिस कार्यवाही के नाम पर आती और चार पानी पीकर चली जाती। हम काम काज करें कि इनकी आवभगत? बस। इसीलिए हमने अर्जी वापस ले ली। अर्जी वापस लेने में ही हमारी भलाई थी।

हम उनकी समझ व अनुभव पर मुस्कुरा दिए।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५३ – लघुतम कथा – जिंदा गुड़िया  ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५३ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ जिंदा गुड़िया ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

वह भीड़ में अपने बाबूजी के अंगुली को पकड़े खड़ी लड़की, खिलौनो की दुकान की तरफ देखने में मग्न थी l  जब उसका ध्यान टूटा, तो उसने  देखा कि अब वह किसी अजनबी के हाथों की  उँगुली पकडे खड़ी है l  उसने जोर से चिल्लाते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं l अबकी बार जब उसकी आंख खुली तो उसने खुद को खिलौनों के दुकान में पाया, जहां सिर्फ जिंदा गुड़ियाँ ही बिक रही थीं l

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ४ – ले लो हरि अवतार यहाँ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ले लो हरि अवतार यहाँ!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ४ ☆

☆ ले लो हरि अवतार यहाँ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

 कृष्ण कन्हैया तुम्हे दिखाऊं, बिखरे पग पग खार यहां

, जगह-जगह पर जंजालों का, लगा हुआ अंबार यहांँ ।।

*

गैया तेरी रोती कान्हा, सड़कों पर कूड़ा खाती ।

 कृषि कार्य को छोड़ा जब से, नंदी है बेकार यहांँ ।।

*

दूध दही घृत माखन होता, अमृत तुल्य यह बतलाया ।

 इन सब में ही मिला रसाय*न, होता कारोबार यहांँ ।।

*

माखन सबको बांँटा तुमने, भोग बांँटना सिखलाया।

अन्न भरा है गोदामों में, जन भूखे लाचार यहांँ।

*

युद्ध महाभारत करवाया, हर नारी को मान मिले।

धवल चदरिया ओढ़े कुछ जन, करते तन व्यापार यहांँ।।

*

चीर बढ़ाने की लीला रच, लाज अमूल्य बताई थी।

अंग-प्रदर्शन को समझे पर, नारी शिष्टाचार यहाँ ।।

*

दंश धरा अति झेल रही है, निशदिन अत्याचारों के ‌

मानव में फिर मानवता हो, ले लो हरि अवतार यहाँ ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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