☆ लघुकथा ☆ ~ गर्भस्थ शिशु ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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माँ के गर्भ में फंसा शिशु, गर्भ से बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था लेकिन न जाने क्यों, वह बार-बार आगे पीछे की सोच रहा था। कभी तो उसके मन में आता कि बाहर चला आऊं और फिर कभी वह स्वयं को वापस गर्भ की ओर लेकर चला जाता।
यद्यपि वह यह सोचकर वह बाहर आना चाहता था कि उसे एक बहुत बड़ी दुनिया देखनी है, लेकिन जब उसे यह भी लगता कि बाहर आने पर जब लोग उसे वैश्या का बेटा कह कर ताना मारेंगे तो कहीं उसकी खुशहाली को तरसती जिंदगी नरक न बन जाए।
वह घोर चिंता में डूबा हुआ था। अचानक हिंदी के एक बड़े लेखक के लिखे एक लेख को जो एक पाठक द्वारा अपने मित्र श्रोता को पढकर सुनाई जा रही थी, उसकी आवाज उस गर्भस्थ शिशु के कान में पड़ गयी।
उस बड़े लेखक के व्यंग आलेख को पढ़ते हुए गंभीर श्रोता ने कहा – भाई ध्यान से सुनो! इस ख्याति प्राप्त लेखक ने क्या लिखा है। लेखक ने लिखा है कि –
“औरत ने बच्चे की गर्दन अब छोड़ी। उसने बच्चे का मुख चूम लिया और अस्पताल से चल निकलने के लिए तत्पर हो गई। उसने जाते – जाते बच्चे से कहा, “किसी तरह पल ही जाओगे। बड़ा होने पर मेरे कोठे में जरूर आना। पहचान जाऊँगी तो अपने पेट से निकला हुआ बेटा कहूँगी, न पहचानूँ तो अपने पेट के लिए तुम्हें अपना शरीर दूँगी।”
नहीं.. नहीं.. लेखक ने एक सच्चाई व्यंग्य में लिखा था, जो अक्सर होता है।
लेकिन मेरी इस कहानी का बच्चा और मां ऐसा बिल्कुल नही सोच रहे थे कि समाज क्या सोचेगा।
दरअसल मां और बेटे दोनों प्रसन्न थे। माँ यह सोचकर गदगद हो रही थी कि आगे चलकर मेरा बेटा! अपने कौशल और बुद्धि के बल पर स्वयं को ऐसी जगह स्थापित कर लेगा, जहां से मेरी पहचान बदल ही जाएगी, लोग मुझे वैश्या नहीं कहेंगे। लोग मुझे एक विद्वान बेटे की मां कहेंगे।
उधर बेटे के मन में दूसरी बात चल रही थी।
बेटा सोच रहा था, क्या हुआ मेरी मां वैश्या है तो क्या। सब कुछ बदला जा सकता है लेकिन माँ तो नहीं बदली जा सकती है। बशर्ते मैं वैश्या मां के गर्भ से पैदा हूँ, लेकिन माँ तो सिर्फ और सिर्फ यही है न। मेरी मां मुझे बहुत प्यार करेगी मुझे अपने आंचल में छुपा कर दूध पिलाएगी, मुझे खूब पढ़ायेगी और मैं पढ़ लिख कर एक बड़े मुकाम को हासिल करूँगा और अपनी माँ का नाम रोशन करुंगा।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।)
☆ चुभते तीर # १०९ – व्यंग्य – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
गंगा नदी नहीं है भाई, हम भारतीयों के लिए एक यूनिवर्सल वॉशिंग मशीन है। डिटर्जेंट की ज़रूरत नहीं, बस एक डुबकी मारो और जनम-जनम के पाप ऐसे ग़ायब, जैसे गधे के सिर से सिंग।
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं “मन चंगा तो कठौती में गंगा।” लेकिन हमने इसका प्रैक्टिकल वर्ज़न ढूंढ निकाला है: “कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।”
ऋषिकेश से लेकर बनारस के घाटों तक चले जाइए, गंगा किनारे खड़े होकर आपको लगेगा कि यहाँ मोक्ष का कोई स्टार्ट-अप चल रहा है। लोग घाट पर ऐसे आते हैं जैसे किसी बैंक की कैश-डिपॉज़िट मशीन के सामने खड़े हों। जेब से निकाला ‘घोटाला नंबर 1’, ‘झूठ नंबर 2’, ‘पड़ोसी की चुगली नंबर 3’ और ‘धपाक!’… सब गंगा जी के खाते में। गंगा मैया भी मन ही मन सोचती होंगी, “भैया, मैं मोक्षदायिनी हूँ, तुम्हारी रीसायकल बिन नहीं कि जो कचरा समाज में नहीं खपा पाए, वो लाकर मुझमें वाश आउट कर दिया।”
हमारी श्रद्धा इतनी भारी है कि वह सीधे प्लास्टिक के थैलों में बंद होकर नदी में तैरती है। हम गंगा को ‘माँ’ कहते हैं, और माँ के प्रति हमारा प्यार इतना अगाध है कि हम उनके आँचल में फूल, अगरबत्ती के रैपर, अधजली लकड़ियाँ, लाशें और ज़हरीला केमिकल सब कुछ उड़ेल देते हैं।
“गंगा पुत्र” होने का हमारा दावा तब तक ज़ोरदार रहता है, जब तक बात नारे लगाने की हो। जैसे ही बात कचरा डस्टबिन में डालने की आती है, हम सब अचानक “सौतेले” हो जाते हैं।
हम हर साल हज़ारों करोड़ के ‘नमामि गंगे’ प्रोजेक्ट्स लाते हैं। फाइलें तैरती हैं, बजट बहता है, मगर गंगा का पानी? वह आज भी इस ताक में रहता है कि कोई उसमें अपनी आस्था बहाने से पहले थोड़ा सा ‘कॉमन सेंस’ भी बहा दे।
आजकल गंगा किनारे मोक्ष कम, ‘इंस्टाग्राम रील्स’ ज़्यादा मिलती हैं। घाट की आरती में लीन भक्त का ध्यान इस बात पर कम होता है कि मंत्र क्या हैं, और इस बात पर ज़्यादा कि ‘सिनेमैटिक शॉट’ में बैकग्राउंड ब्लर सही आ रहा है या नहीं।
एक आदमी हाथ जोड़कर गंगा जी से प्रार्थना कर रहा था: “हे माँ, मेरे सारे पाप धो देना।”
तभी पीछे से आवाज़ आई, “भैया, थोड़ा राइट होना, फ्रेम में तुम्हारी वजह से सूरज छिप रहा है!”
गंगा चुपचाप बह रही है। वह पहाड़ों की पवित्रता लेकर आती है और हमारे मैदानों की चालाकियों को समेटकर समंदर की तरफ बढ़ जाती है। वह मैली इसलिए नहीं हो रही कि उसमें पानी कम है, वह मैली इसलिए हो रही है क्योंकि हमारे भीतर का ‘पाप-साफ़’ करने का लालच बहुत ज़्यादा है।
अगर गंगा सचमुच इंसानी ज़ुबान में बोल पाती, तो घाट पर डुबकी लगाते ही पहला श्राप नहीं, बल्कि एक सीधा सा सवाल पूछती: “शर्मा जी, पिछले हफ़्ते जो टैक्स चोरी की थी, उसका कीचड़ मुझमें धो रहे हो, या सीधे अकाउंटेंट का सिर मुंडवा कर आए हो?”
लेकिन माँ तो माँ है, चुपचाप ज़हर पीकर भी अमृत का आशीर्वाद दिए जा रही है। इस उम्मीद में कि किसी दिन, हम डूबने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बचाने के लिए हाथ बढ़ाएंगे।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३९ ☆ श्री सुरेश पटवा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
झाँसी घाट से बेलखेड़ी 06 नवम्बर 2019
हम सोमनाथ एक्सप्रेस से बैकपेक में एक पैंट, दो शर्ट, अण्डरवेयर तौलिया, स्लीपिंग बेग, वॉर्मर इनर, अतिरिक्त मोज़े व रुमाल, स्लीपर, तेल साबुन, कुछ नक़द राशि और सूखे मेवे खजूर रखकर भोपाल से श्रीधाम पहुँचने हेतु चल पड़े। अगले 08-09 दिन बस यही हमारी सम्पत्ति है। जीवन यात्रा में बहुत सारा सामान घर में, रक़म बैंक में, मकान शहर में रिश्ते दिलों में इकट्ठे किए है वह सब छोड़कर इतना थोड़ा सामान और नर्मदा से रिश्ता जीवन जीने के लिए काफ़ी है। रिश्तों को निभाने में बहुत सारे अच्छे-बुरे भाव मन में गाँठ बाँधकर रखे, आज न सिर्फ़ सारा सामान, आराम छोड़कर निकले अपितु अगले 08-09 दिन जब थके माँदे शरीरों को खुले आकाश के नीचे ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फेंकेंगे तो मन की गाँठे भी ख़ूब खुलेंगी। भिक्षा से भोजन प्राप्ति में अहंकार की गाँठे भी अवचेतन से ढीली होकर चेतन पटल पर आएँगी, जिन्हें ध्यान लगाकर खोला जा सकेगा। आज सुबह ध्यान के बाद कवित्व जागा।
इसके पहले कि
लोग तुम्हें छोड़ दें
रिश्ते तुम्हें तोड़ दें
तुम सीख लो उन्हें छोड़ना।
🍀🍀🍀🍀🍀
सुबह का सूरज सीखता
रोज़ पृथ्वी को घुमाकर
दिन-रात सजाकर
अपनी राह छोड़ना।
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पेड़ सिखाता नियम से
ख़ूब खिले
फूलों-फलों को
शाख़ से छोड़ना।
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रिश्ते-नाते,माया-मोह,
धन सम्मोहन, यश-यौवन
सीख लो दिल से
सब यहीं छोड़ना।
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पहले भी
करोड़ों-अरबों-खरबों को
निश्चित पड़ा था
ये जहाँ छोड़ना।
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छूटते सभी एक न एक दिन
आत्मा से देह, अपनो से नेह
भला-बुरा सब कुछ
यहीं है छोड़ना।
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नियति के सर्कस
का अटल नियम
समय पर झूला पकड़ना
समय पर छोड़ना।
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समय की दीवार में टंगे
कैलेण्डर हो तुम
खील को तुम्हें भी
पड़ेगा छोड़ना।
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मन में विचार आया कि आज से नौ दिन नर्मदा मैया के दामन में जीवन नैया खैबेंगे, वही पार लगाएगी-वही डुबाएगी, वही पलनहार, वही रुलाएगी-वही हँसाएगी। एक नारा मन में जागा, जय हो नर्मदा मैया, पार लगा दे नैया। यह सुबह से शाम तक ज़ुबान पर सज़ा रहा और यात्रा का नारा बन गया।
अरुण दनायक, जगमोहन अग्रवाल, मुंशीलाल और प्रयास जोशी के साथ सोमनाथ एक्सप्रेस में सुबह आठ बजे बैठकर दिन के दो बजे श्रीधाम पहुँचे। मुंशीलाल भाई को ख़बर मिली कि उनकी बेटी की सासु जी का निधन आमला में हो गया है जिनकी रसोई गंगाजली पूजन ग्यारह तारीख़ को रखी गई है उन्होंने निर्णय किया कि वे यात्रा जारी रखेंगे। वे दस तारीख़ को करेली पहुँच कर रेलगाड़ी से आमला जाएँगे। रसोई में सम्मिलित होकर वे आगे की यात्रा हेतु बारह तारीख़ को वापस आ जाएँगे। बाक़ी यात्री तब तक रुके रहेंगे लेकिन वे नर्मदा मैया की लगन में ऐसे डूबे कि ट्रेन में आरक्षण होने के बावजूद उन्होंने आमला जाना स्थगित कर यात्रा जारी रखी।
श्रीधाम उतरकर एक ऑटो से झाँसी घाट पहुँचे। वहाँ चाय-पानी करके नर्मदा मैया को नारियल चढ़ाया। एक व्यक्ति से घाट पर मोबाईल से फ़ोटो उतारने को कहा तो उसने कहा उसे फ़ोटो निकालना नहीं आता, हमने उसका नाम पूछा, उसने भैरव बताया। हमने कहा भैरव बाबा को दारू चढ़ती है तो उसकी आँखों में चमक आ गई। फिर वो फ़ोटो निकालने को झट तैयार हो गया, उसके बाद वह दारू के वास्ते सौ रुपए माँगने लगा तो हमने उसे दारू आचमन हेतु दस रुपए दिए। बेलखेडी की तरफ़ नर्मदा को दाहिनी किनारे रखकर पाँच किलोमीटर की यात्रा पर चल पड़े। किसान कछारी खेतों में मैथी, मिर्ची, गाजर और बेंगन उगा रहे थे जिसकी नक़द रक़म लेकर बाद में उन्ही खेतों में गेहूँ बो देंगे। तीन घंटों में 5.5 किलोमीटर की यात्रा करके बेलखेडी पहुँचे। बेलखेड़ी 250 घरों का गाँव है, 60 घर बर्मन यानि ढीमर के, चार-छः घरों के दीगर समाज और बाक़ी सब लोधियों के घर हैं। पूरा नरसिंहपुर का ग्रामीण इलाक़ा लोधियों से भरा है। जिनकी बसावट की अपनी कहानी है। नर्मदा यहाँ से सतपुड़ा का साथ छोड़कर विंध्य की हीरापुर रेंज से मिलने आगे बढ़ती है, हिरन नदी कुंडम से भागती आकर कुंड्डी खोलकर दरवाजे पर खड़ी मिलती है लेकिन नर्मदा का उसकी साँकल खटखटाना अभी थोड़ी दूर है।
बेलखेड़ी गाँव में घुसते ही गोविंद झारिया से मुलाक़ात हुई जो कि मंदिर के आश्रम में संतों की सेवा करते हैं। नर्मदा के किनारे बहुत ऊँची टेकरी पर एक शिव मंदिर है जिसके महा मंडलेश्वर गिरधारी लाल बर्मन हैं। परकम्मा वासियों के पहुँचने पर कई सेवक चाय, पानी भोजन की व्यवस्था में लग जाते है। आश्रम में जगह पाते ही हम लोगों में मोबाईल बैट्री चार्ज करने की होड़ सी लग जाती है लेकिन खो जाने का डर भी बना रहता है। हमने देखा कि बिजली के खम्भे से एक मोटा तार आँकड़ा बनाकर सीधी बिजली लाईन के नंगे तार से अटकाया गया है। उसी तार का दूसरा छोर एक दूसरे दो मुँहे तार से जुड़ा है, उसके एक छोर पर लट्टू सुलगा है दूसरा सीधा एक बोर्ड से जुड़ा है। डरते-डरते आई-फ़ोन का चार्जर बोर्ड में लगाया तो चार्जर ख़राब हो गया।
हम जैसे ही बेलखेडी आश्रम पहुँचे, वहाँ उपस्थित सेवक ने प्रश्न किया आप कितनी मूर्ति हैं? हमने चौंककर उसे देखा, उसकी आँखों में श्रद्धा भाव देखकर समझ गए कि हम मूर्ति हो गए, पूजनीय हो गए। सामने नर्मदा का लम्बा पाट देखते हुए सोचते रहे कि इस यात्रा में धार्मिकता और आध्यात्मिकता के भेद को समझ कर संस्मरण लिखेंगे। यात्रा के अंत तक हमारी बुद्धि इसी नज़रिए से लोक-व्यवहार और आस्था को परखती रही। सेवक ने एक कहावत कही “रमता जोगी बहता पानी जे रुकें तो गाद हो जाएँ” हमने कहा महाराज पूरी कहो, वे बोले इत्ति आत है। हमने पूरी कहावत इस तरह बताई :-
रमता-जोगी बहता-पानी
इनका कोई ठिकाना नाँय
ये जो रुकें तो गाद हो जाँय।
पानी रुका तो जीवाणु पैदा हो जाते हैं और जोगी रुका तो स्थान और व्यक्ति का मोह रूपी जीवाणु उसे ग्रास में लेकर साधु नहीं रहने देता, इसलिए साधक का मंत्र चरैवेती-चरैवेती होता है। नर्मदा वैराग्य की देवी मानी जातीं हैं इसका पानी कहीं रुकते नहीं देखा, निरंतर प्रवाहमान प्रकृति है। मनुष्य का जीवन भी निरंतर प्रवाहित है, समय का पानी अच्छा हो या बुरा गुज़र ही जाता है। वह अच्छे समय को पकड़ कर रोकना और बुरे को परे धकेलना चाहता है, यही मोह है-यही आसक्ति है। नर्मदा न कहीं रुकती न रुकने देती, चरैवेती-चरैवेती मंत्र जाप से चले-चलो पग-पग नर्मदा तीरे-तीरे, धीरे-धीरे।
नर्मदा परिक्रमा के आध्यात्मिक पहलू को समझने के लिए हमें धार्मिकता (Religiosity) और आध्यात्मिकता (Spirituality) के मूलभूत अंतर को समझना होगा। धार्मिकता का अर्थ ईश्वर में आस्था+कर्मकांड है जिसमें तर्कबुद्धि का कोई काम नहीं है, अर्थात ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित कर्मकांड सम्पादित करना धार्मिकता है। आध्यात्मिकता का अर्थ आस्था+तर्कबुद्धि से तत्वज्ञान के प्रश्नों का अध्ययन, चिंतन, मनन और विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालना, जैसे नर्मदा परिक्रमा के पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भ क्या हैं, उसकी परिपाटी कब से शुरू हुई। वेदों में नर्मदा का उल्लेख नहीं मिलता क्योंकि उस समय तक आर्य आज के पंजाब हरियाणा तक सीमित थे। बौद्ध काल के चरमोत्कर्ष के दौरान कुछ ऋषि-मुनि वेद उपनिषद लेकर गंगा-यमुना दोआब से विंध्याचल पार करके नर्मदा घाटी में आए तब उन्होंने नर्मदा की उद्गम से भड़ौच तक यात्रा की, जिसके प्रणेता कपिल मुनि थे जिनका सांख्य दर्शन गीता में जस का तस रख दिया है कि आत्मा अनादि-अनंत है। अमरकण्टक में अभी भी कपिल धारा है जहाँ कभी उनका आश्रम रहा होगा।
बेलखेडी के मंदिर के सामने से खुले प्रांगण में रात गुज़ारी जहाँ से चाँद की झिलमिल चाँदनी में नर्मदा का सौंदर्य लुभावना और मोहक था। वहाँ चार-पाँच सेवक चाय भोजन की व्यवस्था करते रहे। दाल चावल रोटी का सेवन किया। उसके बाद आठ-दस लोग प्रांगण में आकर बैठे, उनसे सनातन धर्म में दीपक की महत्ता पर चर्चा हुई कि हम रोज़ दीपक क्यों जलाते हैं। वे लोग बोले “सब जलात हैं सुई हम जलात हैं।” उन्हें दीपक का तात्त्विक अर्थ बताया। “हमारी देह पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के पंचभूत से अस्तित्व में आती है और आत्मा की ज्योति जीव रूप में प्रतिष्ठित होती है। दीपक पृथ्वी की मिट्टी से बनता है, उसमें तेल रूप में जल, और वायु व आकाश के खुलेपन में अग्नि प्रज्वलित करके ज्योत जलाई जाती है। इस प्रकार दीपक जीवंत देह का प्रतीक है। पंचभूत और आत्मा के सम्मान स्वरुप दीपक जलाया जाता है। यह हिंदुओं का पंचभूत+आत्मा का मौलिक सिद्धांत है, जिस पर कर्म-अकर्म, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म और मुक्ति की अवधारणा विकसित हुई।”
उसके बाद गांधी जी के जीवन पर बातचीत हुई स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं और गांधी जी की भूमिका पर संवाद हुआ। मौजूद लोगों को महात्मा गांधी के जीवन की कहानी पसंद आई, कुछ वार्तालाप महाभारत पर भी हुआ तब तक सामने आकाश में चन्दामामा पीला मुँह लिए आ गए, रात में एक चाँद है जिसे देखते हुए दूरस्त प्रेमी विरह की उदास रात में सपनों के रंग भरते हुए गीत, कविता ग़ज़ल रचते हैं। जैसे-जैसे वे आकाश में चढ़ते गए हम वैसे-वैसे उन्हें निहारते आँखें मूँदते गहन नींद के आग़ोश में चले गए।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!अनगिन भाव!!)
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “चम्पत…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – लाल बहादुर शास्त्री…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २७३ ☆
☆ लाल बहादुर शास्त्री… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ६७ आणि ६८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ६७ – –
घनःश्याम हा राम लावण्यरूपी ।
महा धीर गंभीर पूर्णप्रतापी ।
करी संकटी सेवकाचा कुडावा ।
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।।६७।।
अर्थ – – पावसाळी मेघाप्रमाणे श्यामल वर्ण हा राम अत्यंत सुंदर आहे. तो महा धैर्यवान आणि गंभीर असा असून अत्यंत पराक्रमी आहे. संकटात आपल्या भक्ताचे तो रक्षण करतो. अशा या श्रीरामाचे पहाटे चिंतन करावे.
(कुडावा – रक्षण)
विवेचन – – मनाच्या श्लोकांमधील श्लोक ६६ ते ७६ हा दहा श्लोकांचा एक वेगळा गट आहे. याचे वैशिष्ट्य असे की या श्लोकांमध्ये समर्थ रामाच्या सगुण रूपाचे वर्णन करतात. आपल्याला त्याचे ध्यान करायला सांगतात. परमेश्वराची निर्गुण भक्ती ही श्रेष्ठ आणि सूक्ष्म मानली जाते. परंतु सगुण भक्ती आपल्यासारख्या सामान्य साधकांसाठी सुलभ आहे. म्हणून सुरुवात करायची झाली तर ती सगुण भक्तीपासून करावी. या पृथ्वीवर आपण देह धारण करून आलो आहोत. परमेश्वर देखील जेव्हा जेव्हा या धरतीवर अवतीर्ण झाला तेव्हा तेव्हा त्याने देह धारण करूनच आपले कार्य केले. त्यामुळे परमेश्वराच्या सगुण रूपाची कल्पना करणे आपल्याला सोपे जाते. म्हणूनच समर्थ या दहा श्लोकांच्या माध्यमातून श्रीरामाचे (परमेश्वराचे) सगुण रूप आपल्यासमोर ठेवताहेत.
श्रीरामाचे रूप कसे आहे? तर पावसाळी मेघाप्रमाणे सावळा. ‘ सावळाच रंग तुझा पावसाळी नभापरी… ‘ त्या सावळ्या रंगात विलक्षण सौंदर्य आहे. वेद आणि पुराणात वर्णिल्याप्रमाणे आपले बहुतेक देव सावळेच आहेत. विष्णू, विठ्ठल, श्रीराम हे सावळेच आहेत. ‘ सावळे सुंदर, रूप मनोहर. राहो निरंतर हृदयी माझ्या… ‘ असे संत तुकाराम म्हणतात. तेच समर्थ आपल्याला सांगत आहेत. श्रीरामाचे रूप वर्णन करताना समर्थांनी राम सुंदर आहे असे न म्हणता लावण्यरूपी असे म्हटले आहे. ‘ लावण्य ‘ या शब्दात आणखी खोल, गहन असा अर्थ आहे. त्यात माधुर्य आहे. म्हणून संतांनी देखील विठ्ठलाला लावण्याचा गाभा असे म्हटले आहे.
या श्लोकाच्या दुसऱ्या ओळीत समर्थ श्रीरामाचे गुण वर्णन करताना म्हणतात, ‘ महा धीर गंभीर पूर्णप्रतापी. ‘ ‘ महा ‘ हे विशेषण धीर आणि गंभीर या दोन्ही शब्दांसाठी लागू होते. तो अत्यंत धैर्यशाली आहे. तसेच तो अत्यंत गंभीर देखील आहे. इथे गंभीर या शब्दाचा अर्थ शब्दशः घ्यायचा नाही. तर जीवनातील सर्व संकटांचा सामना करताना जे धैर्य आणि गांभीर्य लागते, त्या अर्थाने हा शब्द इथे आला आहे. दुसऱ्या शब्दात सांगायचे तर श्रीरामांचे धैर्य आणि शौर्य सागराप्रमाणे अपार आहे. सागराजवळ अमर्याद जलसाठा आहे. पण तरीही तो आपले गांभीर्य म्हणजेच आपली मर्यादा सोडत नाही. तसेच सर्वगुणसंपन्न श्रीराम आहेत. ते पूर्णप्रतापी आहेत म्हणजे अत्यंत पराक्रमी आहेत. श्रीराम म्हणजे मूर्तिमंत सौंदर्य, धैर्य आणि गांभीर्य, पराक्रम! असे अनेकविध गुण त्याच्या ठिकाणी वसतात.
अशा या धीर गंभीर आणि पूर्णप्रतापी श्रीरामांचे वैशिष्ट्य म्हणजे ते आपल्या सेवकाच्या संकटात धावून जातात, त्याचे रक्षण करतात. ते भक्तवत्सल आहेत. ज्या ज्या भक्तांनी संकटकाळी त्यांचा धावा केला, त्यांच्या साहाय्याला ते तात्काळ धावून गेले आहेत. पण परमेश्वरावर दृढ श्रद्धा हवी. त्यासाठी परमेश्वराची अनन्यभावाने भक्ती करावी लागते. अनन्यभावाने म्हणजे ‘ हे परमेश्वरा, मला तुझ्याशिवाय कोणी त्राता नाही. तूच माझे सर्वस्व आहेस. ‘ अशा प्रकारची वृत्ती हवी. श्रीरामांचे किंवा श्रीकृष्णाचे भक्त हे अशा प्रकारचे होते. हनुमंताला तर एका रामाशिवाय दुसरे काहीच नको होते. अशा या रामाचे (भगवंताचे) पहाटे चिंतन करायला समर्थ आपल्याला सांगत आहेत.
रात्रीची शांत निद्रा आटोपली की पहाटेच्या वेळी आपले मन एखाद्या नदीच्या डोहासारखे शांत असते. पाणी जर स्वच्छ आणि शांत असेल तर त्यात आपले प्रतिबिंब दिसते. त्याचा तळ दिसतो. पहाटेच्या वेळी अशा शांत आणि इतर विचारांची गर्दी नसलेल्या मनात रामाचे चिंतन करावे. त्याचेच प्रतिबिंब आपल्या मनात पडावे. सकाळ जर अशी पवित्र आणि सुंदर झाली तर दिवसही चांगला जाईल. आपण जेव्हा त्याचे चिंतन करू तेव्हा त्याचे रूप आणि गुण आपोआपच आपल्या डोळ्यांसमोर उभे राहतात. आपली सकाळ मोबाईल, टीव्ही किंवा वर्तमानपत्रांच्या बातम्याने बऱ्याच वेळा होते. त्यातील अपघात, खून, दरोडे, अत्याचार, राजकीय नेत्यांचे एकमेकांवर आरोप इ. नकारात्मक बातम्यांनी आपल्या दिवसाची सुरुवात न करता श्रीरामाच्या चिंतनानेच करावी.
स्वसंवाद – –
१) माझ्या दिवसाची सुरुवात कोणत्या विचारांनी होते? चिंतेने की चिंतनाने?
२) पहाटेच्या शांत वेळेत मी स्वतःसाठी आणि भगवंतासाठी काही क्षण राखून ठेवतो का?
३) संकटसमयी माझी भिस्त भगवंतावर असते का?
४) मी दिवसभरात जास्त कोणत्या गोष्टी मनात साठवतो? नकारात्मक बातम्या की सकारात्मक चिंतन?
५) रामाचे धैर्य, गांभीर्य आणि करुणा हे गुण माझ्यातही यावेत असे मला वाटते का? (क्रमशः)
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श्लोक क्र. ६८ – – –
बळे आगळा राम कोदंडधारी ।
महां काळ विक्राळ तोही थरारी ।
पुढे मानवा किंकरा कोण केवा ।
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।।६८।।
अर्थ – – धनुष्य धारण केलेला राम हा पराक्रमाने आगळावेगळा आहे. सर्व प्राणिमात्रांचा विनाश घडवून आणणारा महाकाळ सुद्धा या रामापुढे थरथर कापतो. तर अशा या रामापुढे (भगवंतापुढे) सामान्य माणसाची काय कथा? म्हणूनच प्रभात समयी रामाचे चिंतन करावे.
(कोदंडधारी – धनुष्य धारण केलेला, महाकाळ – काळाचाही काळ जो अखिल विश्वाचा विनाश घडवून आणतो, किंकर -दास/सेवक, केवा – महत्व)
विवेचन – – समर्थ या श्लोकाची सुरुवात करताना ‘ बळे आगळा राम कोदंडधारी ‘ असे म्हणतात. श्रीरामाने कोदंड म्हणजे धनुष्य धारण केले आहे. त्याच्या धनुष्याचा टणत्कार ऐकल्यावर काळाचा देखील थरकाप होतो. सज्जनांच्या रक्षणासाठी आणि दुर्जनांच्या विनाशासाठी श्रीरामाने धनुष्य धारण केले आहे. समर्थांच्या काळात जेव्हा मोगलांचे आक्रमण झाले होते, तेव्हा सगळा समाज दुर्बल झाला होता. गुलामगिरीची वृत्ती निर्माण झाली होती. अशा वेळी समर्थांनी या धनुर्धारी श्रीरामाचा आदर्श समाजापुढे ठेवला. तेव्हा साहजिकच श्रीरामाची केवळ पूजा न करता त्याचे गुण देखील अंगी बाणवणे आवश्यक ठरते. म्हणूनच तर ‘ प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ‘ असे समर्थ म्हणतात.
श्रीराम महापराक्रमी तर आहेच पण तो ‘ बळे आगळा का? ‘ तर ज्याची भिती कळीकाळालाही वाटते असा राम आपल्या शक्तीचा उपयोग सज्जनांच्या रक्षणासाठी आणि दुर्जनांच्या विनाशासाठी करणारा आहे. ज्यांच्याकडे शक्ती, सामर्थ्य आहे असे बरेचसे लोक अनादिकालापासून आपल्या शक्तीचा दुरुपयोग करताना दिसतात. रावणाजवळही सामर्थ्य होते, पण त्याने आपल्या शक्तीचा दुरुपयोग केला. महाभारतात देखील कंसाने आपल्या शक्तीच्या साहाय्याने समाजातील सज्जनांना त्रास दिला. आज समाजात ज्यांच्याकडे सत्ता, संपत्ती आणि शक्ती आहे अशी बरीचशी मंडळी आपल्या शक्तीचा दुरुपयोग करताना दिसतात. म्हणून श्रीराम ‘ बळे आगळा ‘ आहे.
जो जन्माला आला त्याला मृत्यू निश्चित आहे. काळ हा सर्वशक्तिमान आहे. सामान्य माणसासाठी यम म्हणजे काळाचेच एक रूप. सामान्य माणूस यमाचे नुसते नाव जरी काढले तरी घाबरतो. पण ज्याला सर्वच घाबरतात असा काळ देखील भगवंतापुढे थरथर कापतो. तर सामान्य माणसाची त्यापुढे काय कथा? म्हणून आपण जर अनन्यभावाने भगवंताची आराधना केली तर अशा सर्वशक्तिमान काळाच्या कचाट्यातून, मरणाच्या भीतीतून देखील तो आपल्याला मुक्त करील. जन्म मृत्यूच्या फेऱ्यातून आपली सुटका करील. मग काळाचा प्रभाव आपल्यावर राहणारच नाही. तेव्हा हे मना, प्रभात समयी श्रीरामांच्या गुणांचे चिंतन कर.
स्वसंवाद – –
१) मी श्रीरामाची भक्ती करताना केवळ पूजा करतो, की त्याच्या गुणांचे अनुकरण करण्याचाही प्रयत्न करतो?
२) माझ्याकडे असलेली शक्ती, ज्ञान, पैसा, पद किंवा अधिकार मी इतरांच्या हितासाठी वापरतो का?
३) माझ्या जीवनात “बळ” म्हणजे काय? इतरांवर प्रभाव टाकणे की स्वतःवर संयम ठेवणे?
४) माझ्या दिवसाची सुरुवात प्रभाती सकारात्मक चिंतनाने होते का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सुनना और सहना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये कैसा जग का व्यापार / स्वर- यश कीर्ति , सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२८ ☆
☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘हालात सिखाते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह ही होता है’ गुलज़ार इस कथन के माध्यम से समय व परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हैं। वैसे यह तथ्य महिलाओं पर अधिक लागू होता है, क्योंकि ‘औरत को सहना है, कहना नहीं और यही उसकी नियति है।’ उसे तो अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्राप्त नहीं है। वैसे कोर्ट-कचहरी में भी आरोपी को अपना पक्ष रखने की हिदायत ही नहीं दी जाती; अवसर भी प्रदान किया जाता है। परंतु औरत की नियति तो उससे भी बदतर है। बचपन से उसे समझा दिया जाता है कि यह घर उसका नहीं है और पति का घर उसका होगा। परंतु पहले तो उसे यह सीख दी जाती थी कि ‘जिस घर से डोली उठती है, उस घर से अर्थी नहीं उठती। इसलिए तुम्हें इस घर में अकेले लौट कर नहीं आना है।’ सो! वह मासूम आजीवन उस घर को अपना समझ कर सजाती-संवारती है, परंतु अंत में उस घर से उस अभागिन को दो गज़ कफ़न भी नसीब नहीं होता और उसके नाम की पट्टिका भी कभी उस घर के बाहर दिखाई नहीं पड़ती।
परंतु समय के साथ सोच बदली है और आठ से दस प्रतिशत महिलाएं सशक्त हो गई हैं– शेष वही ढाक के तीन पात। कुछ महिलाएं समानता के अधिकारों का दुरुपयोग भी कर रही हैं। वे ‘लिव इन व मी टू’ के माध्यम से हंसते-खेलते परिवारों में सेंध लगा रही हैं तथा दहेज व घरेलू हिंसा आदि के झूठे इल्ज़ाम लगा पति व परिवारजनों को सीखचों के पीछे पहुंचा अहम् भूमिका वहन कर रही हैं। यह है परिस्थितियों के परिर्वतन का परिणाम, जैसा कि गुलज़ार ने कहा है कि समानता का अधिकार प्राप्त करने के पश्चात् महिलाओं की सोच बदली है। वे अब आधी ज़मीन ही नहीं, आधा आसमान लेने पर आमादा हो रही हैं। मुझे स्मरण हो रही हैं स्वरचित पंक्तियां ‘मौसम भी बदलते हैं, हालात बदलते हैं/ यह समाँ बदलता है, जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं, दिल को सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का, नग़मात बदलते हैं।’ जी हां! यही सत्य है जीवन का– समय के साथ- साथ व्यक्ति की सोच भी बदलती है। वैसे स्मृतियों में विचरण करने से दिल को सुक़ून नहीं मिलता। परंतु यदि सुरों अथवा संगीत का साथ हो, तो उन नग़मों की प्रभाव-क्षमता भी अधिक हो जाती है।
‘संसार में मुस्कुराहट की वजह लोग जानना चाहते हैं; उदासी की वजह कोई नहीं जानना चाहता।’ यहां ‘सुख के सब साथी, दु:ख में ना
कोय।’ सो! इंसान सुखों को इस संसार के लोगों से सांझा नहीं करना चाहता, परंतु दु:खों को बांटना चाहता है। उस स्थिति में वह आत्म- केंद्रित रहते हुए दूसरों से संबंध-सरोकार रखना पसंद नहीं करता। अक्सर लोग सत्ता व धन- सम्पदा व सम्मान वाले व्यक्ति का साथ देना पसंद करते हैं; उसके आसपास मंडराते हैं, परंतु दु:खी व्यक्ति से गुरेज़ करते हैं। यही है ‘दस्तूर- ए-दुनिया।’
‘हौसले भी किसी हक़ीम से कम नहीं होते/ हर तकलीफ़ में ताकत की दवा देते हैं।’ मानव का साहस, धैर्य व आत्मविश्वास किसी वैद्य से कम नहीं होता। वे मानव को मुसीबतों में उनका सामना करने की राह सुझाते हैं। जैसे एक छोटी-सी दवा की गोली रोग-मुक्त करने में सहायक सिद्ध होती है, वैसे ही संकट काल में सहानुभूति के दो मीठे बोल संजीवनी का कार्य करते हैं। ‘मैं हूं ना’ यह तीन शब्द से उसे संकट-मुक्त कर देते हैं। इसलिए मानव को विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए तथा हार होने से पहले पराजय को नहीं स्वीकारना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला कहते हैं ‘हिम्मतवान् वह नहीं, जिसे डर नहीं लगता, बल्कि वह है जो डर को जीत लेता है’ तथा वैज्ञानिक मैडम क्यूरी का मानना है कि ‘जीवन डरने के लिए नहीं: समझने के लिए है। सकारात्मक संकल्प से ही हम मुश्किलों से बाहर निकल सकते हैं।’ सो! संसार में वीर पुरुष ही विजयी होते और कायर व्यक्ति का जीना प्रयोजनहीन होता है। इसके साथ हम सकारात्मक सोच व दृढ़-संकल्प से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। नैपोलियन का यह संदेश अनुकरणीय है कि ‘समस्याएं भय व डर से उत्पन्न होती हैं। यदि डर की जगह विश्वास ले ले, तो वे अवसर बन जाती हैं। वे विश्वास के साथ आपदाओं का सामना कर उन्हें अवसर में बदल डालते थे।’ इसलिए हर इंसान को अपने हृदय से डर को बाहर निकाल फेंकना चाहिए। यदि आप साहस-पूर्वक यह पूछते हैं–’इसके बाद क्या’ तो प्रतिपक्ष के हौसले पस्त हो जाते हैं। जिस दिन मानव के हृदय से भय निकल जाता है; वह आत्मविश्वास से आप्लावित हो जाता है और आकस्मिक आपदाओं का सामना करने में स्वयं को समर्थ पाता है। हमारे हृदय का भय का भाव ही हमें नतमस्तक होने पर विवश करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यही संदेश दिया है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है।’ हमारी सहनशीलता ही उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। जब हम उसके सम्मुख डटकर खड़े हो जाते हैं, तो वह अपनी झेंप मिटाने के लिए अपना रास्ता बदल लेता है। यह अकाट्य सत्य है कि हमारा समर्पण ही प्रतिपक्ष के हौसलों को बुलंद करता है।
मौन नव निधियों की खान है; विनम्रता आभूषण है। परंतु जहां आत्म-सम्मान का प्रश्न हो, वहाँ उसका सामना करना अपेक्षित व श्रेयस्कर है। ऐसी स्थिति में मौन को कायरता का प्रतीक स्वीकारा जाता है। सो! वहाँ समझौता करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भले ही सुनना व सहना हमें हालात सिखाते हैं, परंतु उन्हें नतमस्तक हो स्वीकार कर लेना पराजय है।
‘यदि तुम स्वयं को कमज़ोर समझते हो, तो कमज़ोर हो जाओगे। यदि ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो ताकतवर’– स्वामी विवेकानंद जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। हमारी सोच ही हमारा भविष्य निर्धारित करती है। इसलिए जीवन में नकारात्मकता को जीवन में कभी भी घर न बनाने दो। रोयटी बेनेट के अनुसार चुनौतियाँ व प्रतिकूल परिस्थितियाँ हमें हमारा साक्षात्कार कराने हेतु आती हैं कि हम कहां हैं? तूफ़ान हमारी कमज़ोरियों पर आघात करते हैं, लेकिन तभी हमें अपनी शक्तियों का आभास होता है। समाजशास्त्री प्रौफेसर कुमार सुरेश के शब्दों में ‘अगर हमारा परिवार साथ है, तो हमें मनोबल मिलता है और हम हर संकट का सामना करने को तत्पर रहते हैं।’ अरस्तु के शब्दों में ‘श्रेष्ठ व्यक्ति वही बन सकता है, जो दु:ख और चुनौतियों को ईश्वर की आज्ञा मानकर आगे बढ़ता है।’ सो! मानव को उन्हें प्रभु-प्रसाद व अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल स्वीकारना चाहिए। माता देवकी व वासुदेव को 14 वर्ष तक काराग़ार में रहना पड़ा। देवकी के कृष्ण से प्रश्न करने पर उसने उत्तर दिया कि इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। आप त्रेतायुग में माता कैकेयी व पिता वासुदेव दशरथ थे। आपने मुझे 14 वर्ष का वनवास दिया था। इसलिए आपकी मुक्ति भी 14 वर्ष पश्चात् ही संभव थी। सो! ‘जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा, अच्छा ही होगा। इसलिए मानव को कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिए और हर परिस्थिति का खुशी से स्वागत् करना चाहिए। समय कभी थमता नहीं; निरंतर गतिशील रहता है। इसलिए मन में कभी मलाल को मत आने दो। यह समाँ भी गुज़र जाएगा और उलझनें भी समयानुसार सुलझ जाएंगी। उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला दें, तो सब अच्छा ही होगा। औचित्य-अनौचित्य में भेद करना सीखें और विपरीत परिस्थितियों में प्रसन्न रहें, क्योंकि शरणागति ही शांति पाने का सर्वोत्तम साधन है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – प्रणय वल्लरी..।
रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’