हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२३ – हमें तेरा ही सहारा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘हमें तेरा ही सहारा…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२३ ☆

☆ हमें तेरा ही सहारा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मुझे तेरा ही सहारा, भगवान,

और कोई जग में नहीं,

 

हम तो तेरे ही भरोसे, भगवान,

भरोसा कोई और नहीं,

हमें तेरा ही सहारा,

 कोई और न हमारा,

तेरी कृपा हो कृपा निधान,

 और कोई जग में नहीं,

 

तू है करुणा का सागर,

 मेरी छोटी सी है गागर,

छलके न करुणा निधान,

और कोई जग में नहीं,

 

 तूने दुनिया बनाई,

 इसमें प्रीत जगाई,

 जुदाई न रहे भगवान,

और कोई जग में नहीं,

 

मुझे तेरा ही सहारा भगवान,

और कोई जग में नहीं.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३४० ☆ देशभक्तिचे वेड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३४० ?

☆ देशभक्तिचे वेड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

देशभक्तिचे वेड लागले पुजतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

युद्ध खेळणे केवळ नाही काम एवढे

कुठल्याही कामाचे नसते इथे वावडे

पूर वादळा सोबतसुद्धा झटतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

पालन नियमांचे करण्याची सक्ती आहे

देशावरती नितांत कायम भक्ती आहे

म्हणून आम्ही धारातीर्थी पडतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

डोंगर सोडा हिमालयावर चढतो आम्ही

कण वाळूचे तप्त जाळती जळतो आम्ही

देशासाठी आनंदाने भिजतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

या पायांना हिरवळ सांगा कोठे दिसते

ढग युद्धाचे नसतानाही पळपळ असते

ओझे असते पाठीवरती पळतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

विझण्यासाठी आम्ही पेटुन उठतो येथे

देशासाठी बाधा ठरती काही नेते

विचार त्यांचा मनास अमुच्या छळतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४७ ☆ आलेख – फ्रांस में भारत का डंका (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘फ्रांस में भारत का डंका  (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४७ ☆

☆ आलेख ☆ फ्रांस में भारत का डंका  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

इस समय फ्रांस के पेरिस नगर में भारत का डंका गूंज रहा है। प्रसिद्ध ऐफ़िल टावर के कर्मचारी हड़ताल पर चले गये हैं। पेरिस के पास हिंदुओं के स्वामीनारायण संप्रदाय के एक विशाल मंदिर का उद्घाटन हुआ और उसके बाद संप्रदाय के बड़े गुरु जी ने एफ़िल टावर देखने की इच्छा प्रकट की, साथ ही यह निर्देश कि उनकी  उपस्थिति के समय टावर पर से महिला कर्मचारियों को हटा दिया जाए। टावर के प्रबंधक भी ऐसे आज्ञाकारी निकले कि उन्होंने इस निर्देश का पालन किया। फ्रांस जैसे लिंग-भेद से मुक्त देश में यह कदम अभूतपूर्व था।इसी पर बाद में पूरे देश और पूरी दुनिया में जो हल्ला मचा वह अभी तक चल रहा है। सारी दुनिया में हमारे महान देश की जो छवि बन रही है वह बताने की ज़रूरत नहीं है।

स्वामीनारायण संप्रदाय के विश्व में हज़ारों मंदिर है जो अपनी भव्यता और स्थापत्य के लिए जाने जाते हैं। यह बताना ज़रूरी है कि भारत में जो हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण मंदिर हैं उनका स्थापत्य बहुत साधारण है।

वर्तमान घटना के संदर्भ में यह समझना मुश्किल है कि धार्मिक लोगों को नारी से इतना परहेज़ क्यों है। हमारे देश में नारी सभी रूपों में पूज्य है— चाहे वह मां हो, बहन हो या बेटी। पत्नी के रूप में सीता, पार्वती हमारी आदर्श हैं तो देवी के रूप में हम दुर्गा, काली, लक्ष्मी या सरस्वती के आराधक हैं। वस्तुत: संसार में रौनक स्त्री से ही है। स्त्री का मधुर कंठ, उसके वस्त्रो का रंग, अपने घर को सजाने संवारने की उसकी उत्कंठा, सभी प्राणियों के प्रति उसका स्नेह इसे प्रमाणित करते हैं। जो आज स्त्रियों से दूर रहने का ढोंग करते हैं वे कहां होते अगर स्त्री उन्हें नौ महीने अपनी कोख में आश्रय नहीं देती और अपने पैरों पर खड़े होने तक हर वक्त उनकी देखभाल नहीं करती। हर युग में स्त्रियां संतानों के लिए अपने जीवन को होम करती रही हैं।

अभी एक भावुक कर देने वाला वीडियो देखा जिसमें बेटा मां से पूछता है, ‘यदि तुम्हें एक घंटे बाद मृत्यु होने की सूचना मिले तो कौन सा काम पूरा करना पसंद करोगी?’ और मां का जवाब है, ‘तेरे लिए चार रोटियां सेंक जाऊंगी ताकि तू भूखा न सोये।’

लगे हाथ हम एक और देवी को याद कर लें जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को सुख और सुकून से भर दिया। ये देवी लता मंगेशकर थीं जो आज भी करोड़ों लोगों के कानों में अमृत टपकाती रहती हैं। सदियां गुज़र जाएंगीं लेकिन लता हमारे बीच में रहेंगीं। वे हमेशा हमारे दुःख-सुख में हमारे बगल में खड़ी रहेंगीं। हमारी देवियों की तरह लता जी भी अमर हो गयीं।

आदि शंकराचार्य ने कभी नारी को ‘नरक का द्वार’ कहा था। भाष्यकारों ने समझाया कि उनका आशय यह था कि स्त्री का संसर्ग साधकों में वासना को जागृत करता है, उसे मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग से विचलित करता है। यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि संन्यासी को इंद्रयजित कहा जाता है, यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों पर विजय पा ली हो। फिर साधक के विचलन की गुंजाइश कहां रह जाती है? अर्थ यह निकलता है कि साधक को अपने ऊपर भरोसा नहीं होता, इसीलिए वह स्त्री से दूर भागता है। यानी रोग कहीं और है और दवा कहीं और लगायी जाती है। नारी सृष्टि में पुरुष की पूरक है, उसके बिना सृष्टि की कल्पना असंभव है। सृष्टि के परिचालन का जितना बोझ स्त्री के हिस्से में आता है उसका सौवां अंश भी पुरुष के हिस्से में नहीं आता। इसके बावजूद भी पुरुष स्त्री को अपमानित करने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता।

इस प्रसंग में परसाई जी की एक बहुत दिलचस्प रचना ‘राग विराग’ याद आती है। बस यात्रा का वर्णन है। बस में दो-दो की सीटें हैं। एक पर एक सन्यासी विराजते हैं, 40-50 की उम्र। थोड़ी देर में उनके बगल वाली सीट पर एक महिला बैठ जाती है। सन्यासी परेशान हो जाते हैं। स्त्री से कहीं अन्यत्र बैठने का अनुरोध करते हैं, लेकिन कोई सीट खाली नहीं है। सन्यासी कहते हैं, ‘मैं स्त्री के साथ नहीं बैठ सकता। स्त्री का संग मुझे वर्जित है।’ यह भी कहते हैं, ‘माता और पुत्री का संग भी हमारे लिए निषिद्ध है। धर्म का आदेश है।’ लेखक सन्यासी से कहता है, ‘बैठ जाने दीजिए। आप तो वीतराग हैं।’

बस चल पड़ती है और थोड़ी देर बाद स्त्री परेशान होने लगती है। सन्यासी जी जो श्लोक पढ़ रहे थे वे गड़बड़ाने लगते हैं। स्त्री बार-बार सन्यासी से ठीक से बैठने को कहती है। अंत में वह उठकर सन्यासी जी को एक थप्पड़ मारती है, कहती है, ‘लुच्चा बदमाश कहीं का’। सिद्ध हुआ कि जो संयम मन से न होकर कृत्रिम उपायों से होता है, उसका यही हाल होता है। गांधी जी ने स्त्रियों के संसर्ग में अपने संयम की बाकायदा परीक्षा ली थी और उसमें सफल हुए थे, यद्यपि उनका यह प्रयोग विवाद का कारण भी बना था।

कई वर्ष पहले मुझे एक धार्मिक भोज में एक युवा साधु मिले थे। वे मेरे ही नगर के थे, वहीं शिक्षा प्राप्त की थी। भोजन के लिए दूर से पैदल चलकर आये थे। बात बात में उन्होंने बताया कि उन्हें स्त्रियों के साथ एक ही आसन पर बैठने से परहेज़ है। मुझे लगा उनकी दृष्टि में स्त्रियों के शरीर में कोई ‘करंट’ होता है जो आसन के मार्फ़त उन तक पहुंच कर उनकी साधना को खंडित कर देता है।

पता चला है कि स्वामी नारायण संप्रदाय के बड़े गुरु जी की उम्र 93 साल है। इस उम्र में तो वैसे ही आदमी के लिए स्त्री-पुरुष का भेद ख़त्म हो जाता है। फिर ऐसे स्त्री-विरोधी विचार क्यों?

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११८ – माध्यम… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– माध्यम…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११८ — माध्यम — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

किसी एक देश के राजकुमार की कथा मुझे याद आ गयी। पर वह कथा मेरी अपनी बनायी हुई है। वह लिखित कथा अब तो खो गयी है। बस वह मुझे जुबानी याद है। मैं वह फिर से लिख दूँगा। लोग पढ़ कर मानेंगे वह राजकुमार तो था। लिखित शब्दों ने तो भगवान को भी साकार और बोलता सा बना दिया है। शायद शब्दों ने भगवान की साधना से ही यह गुण अर्जित किया हो। लिखने वाले तो माध्यम होते हैं।

© श्री रामदेव धुरंधर

09 – 09 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५२ – जीव, वन, जीवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५२ ☆ जीव, वन, जीवन… ?

एक पाठशाला के परिसर की दीवार खड़ी करने का काम चल रहा है। इस प्रक्रिया में उसकी सीमा पर उगे छोटे-बड़े‌ पौधे उखाड़ दिए गए हैं। वर्षों से खड़े कुछ वृक्ष भी काट दिए गए हैं। यद्यपि इन वृक्षों को सुरक्षित रखते हुए भी दीवार बनाई जा सकती थी। वृक्षों को काटने का कारण पूछने पर उत्तर मिला “जंगली थे, इसलिए हटा दिए। यहाँ आर्नामेंटल ट्री लगाएँगे। सुंदर दिखेंगे।”

‘जंगली’ शब्द सुनकर मैं हँस पड़ा। संस्कृत में ‘अरण्य’ या ‘वन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसी के चलते ‘नैमिषारण्य’ शब्द का उल्लेख हमारे ग्रंथों में मिलता है।

जीवन पर विचार करें। जीव और वन के अतर्संबंध को प्रतिपादित करने के लिए यह शब्द पर्याप्त है। वन है तो जीव है। जीव के लिए वन अनिवार्य है। दोनों का सम्मिलन ही जीवन है। विज्ञान इसे कुछ इस तरह से कहता है कि ऑक्सीजन है तो जीवन है। ऑक्सीजन के लिए वृक्ष महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र या इकोसिस्टम के लिए वृक्ष अनिवार्य हैं। वृक्ष, जिन पर पक्षी घोंसले बना सकें। वृक्ष, जो वर्षा को आकर्षित कर सकें। वृक्ष जिनके तनों पर जाने कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े जीव अपना निवास बनाते हैं। वृक्ष जिनके फल खाकर  कितने ही पंछी अपना पेट भरते हैं। वृक्ष जिनकी छाया के नीचे पथिक विश्राम करते हैं। वृक्ष जिनसे जंगल बनते और बसते हैं।

वस्तुत: ‘जंगली’ शब्द का उपयोग ऑक्सीजन से घिरे वातावरण में रहने वाले के लिए किया जाना चाहिए था, प्रकृति के सानिध्य में निवास करने वालों के लिए किया जाना चाहिए था। बाज़ारवाद ने जंगली शब्द को अनुपयोगी, क्रूर, हिंसक और असभ्य के संदर्भ में परिवर्तित कर दिया।

यूँ देखें तो न्यूनाधिक जंगली तो हम सब हैं। जिन्हें ‘जंगली’ शब्द अपशब्द लगता है, उन्हें ज्ञात हो कि हम सब के पूर्वज भी कथित जंगली ही थे। हम सब ने विद्यालयीन जीवन में ‘रेफरेंस टू कॉन्टेक्स्ट’ अर्थात संदर्भ के अनुसार आकलन करने को समझा है।  इस प्रक्रिया के अंतर्गत देखें हमारे लिए अंडमान-निकोबार के वनों में निर्वस्त्र रहने वाली जारवा जाति के लोग जंगली हैं। सिक्के का दूसरा पहलू है कि बहुत हद तक संभव है कि उनके लिए हम वस्त्रधारी जंगली हों। अपनी छोटी-सी त्रिज्या से एक वृत्त खींचकर उसे अंतरिक्ष मान लेना हास्यास्पद है। प्रकृति ने देह के कर्म सबके लिए समान रखे हैं। आहार, निद्रा, मैथुन, आभिजात्य  और कथित आदिम दोनों के लिए समान हैं। प्रकृतिगत समानता को अपनी सुविधा के आधार पर वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता।

‘जंगली’ कहकर हम आज ऑक्सीजन के स्रोतों का नाश कर रहे हैं। कल जब हमारे गले प्राणवायु के अभाव में सूखेंगे तो जंगली बहुत याद आएँगे।

अपनी एक कविता स्मरण हो आ रही है-

काट दिये गए हैं

पेड़ों के मुंड,

छील दी गई है

पूरी की पूरी छाल,

धरती को

पच्चीस-पचास मीटर तक

घनी छाँव से ढकनेवाले,

अब स्वयं खड़े हैं

निर्वस्त्र और विवश,

इनकी असहाय देह पर

घातक रंगों से

पोती जा रही हैं

रंग- बिरंगी पत्तियाँ,

उकेरे जा रहे हैं

कई तरह के फूल,

एल.ई.डी.की रोशनी में

प्रदर्शन के लिए रखी

अनावृत लाज पर

चस्पां हो रहे हैं

कई स्लोगन,

और इनके इर्द-गिर्द

फल-फूल रही है

बेख़ौफ़ ब्यूरोक्रेटिक घास,

सारा माज़रा

आशंका मिश्रित भय से

निहार रहे हैं

जवानी की दहलीज़ पर खड़े

आसपास के कच्चे पेड़,

मैं लिखता हूँ ख़त

आयोजकों को-

माफ कीजियेगा

हरित शहर अभियान के

उद्घाटन के लिए

नहीं आ पाऊँगा।

मतभिन्नता हो सकती है तथापि मनुष्य जाति की  अब तक की यात्रा के अनुभव से स्थूल रूप से यह देखने में आया है कि आभिजात्य के प्रदर्शन के विरुद्ध जंगली का दर्शन, जीवन से अधिक जोड़े रखता है। इति‌।

 

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 7:36 बजे, 14 जून 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९२ – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – पुरुष दिवस।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९२ ☆

☆ हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

 भारती भाषा प्यारी की।

आरती हिन्दी न्यारी की…  

०

‘लोक‘ की भाषा है हिंदी,

‘तंत्र‘ की आशा है हिंदी।

करोड़ों जिव्हाओं-आसीन

न कोई सकता इसको छीन।

ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की

आरती हिन्दी न्यारी की।।

०

वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार,

पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।

बोलते जो वह लिखते आप-

वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।

नागरी लिपि सुविचारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

० 

एकता पर हिंदी बलिहार, 

वचन दो लिंग क्रिया व्यापार।

संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-

विशेषण हैं हिंदी में चार।

पाँच अव्यय व्यवहारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

वर्ण हिंदी के अति सोहें,

शब्द मानव मन को मोहें।

काव्य रचना सुडौल सुन्दर

वाक्य लेते सबका मन हर।

छंद-सुमनों की क्यारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,

सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।

विषय जो कठिन जटिल नीरस-

बना देती हिंदी रसवान। 

विश्ववाणी गुणकारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९१ ⇒ विचारक और प्रचारक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक…“।)

?अभी अभी # १०९१ ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।

पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।

चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।

एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।

आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।

हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।

आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (14 सितंबर से 20 सितंबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (14 सितंबर से 20 सितंबर) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। आज आपको 14 सितंबर से 20 सितंबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु साप्ताहिक राशिफल के पहले मैं श्री हनुमान जी की जय का नारा लगाना चाहूंगा और आपको यह बताना चाहूंगा कि श्री हनुमान जी अपने भक्तों के रक्षक हैं। उनसे प्रार्थना है कि एक गुरु की तरह वे मुझ पर ज्ञान की वर्षा करें। श्री हनुमान जी से प्रार्थना है कि आप मुझ पर श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए। इस संबंध में हनुमान चालीसा की चौपाई है।

जय जय जय हनुमान गोसाईं |

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ||

इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं आपको 14 सितंबर से 20 सितंबर 2026 तक के सप्ताह के राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल के पहले मैं आपको इस सप्ताह में ग्रहों के गोचर के बारे में पूरी जानकारी दूंगा।

इस सप्ताह गुरु कर्क राशि में, शुक्र तुला राशि में, बुध कन्या राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्य प्रारंभ में सिंह राशि में रहेगा तथा 17 तारीख के 11.37 रात से वह कन्या राशि में प्रवेश करेगा। मंगल देव प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेंगे तथा 18 तारीख की दिन के 3: 03 से कर्क राशि में गोचर करेंगे। आइए अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के सुंदर-सुंदर प्रस्ताव आएंगे। अगर विंशोत्री दशा ठीक है तो आपका विवाह तय भी हो सकता है। आपको अपने संतान से लाभ प्राप्त हो सकता है। आपके व्यापारी प्रतिद्वंदी आपका नुकसान करने का प्रयास कर सकते हैं परंतु सफल नहीं होंगे। भाग्य से मामूली लाभ मिल सकता है। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों से संबंध ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। व्यापारियों का व्यापार भी ठीक चलेगा। भाग्य के कारण आपको सफलता मिल सकती है। दुर्घटनाओं से नुकसान नहीं होगा। शत्रुओं से सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। छात्रों को सफलताएं प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। धन आने की संभावना है। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आपको अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए मददगार हैं। 16, 17 और 18 को आपको कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की संभावना है। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपको भाग्य के स्थान पर अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 14, 15 और 16 तारीख लाभदायक है। 19 और 20 तारीख को आपको अपने कार्यों के प्रति सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। घर में कोई अच्छा कार्य होगा जिसमें काफी धन व्यय हो सकता है। धन लाभ होने की पूर्ण संभावना है। प्रयास करें। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। अधिकारियों एवं कर्मचारियों को इस सप्ताह थोड़ा सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। उनको सफलताएं मिलेंगी। भाग्य से कोई विशेष आशा नहीं रखना चाहिए। कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को बड़े आसानी से थोड़े ही प्रयास से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख उपयोगी है। 16, 17 और 18 को आपको थोड़ा सतर्क रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्तुओं का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

यह सप्ताह सामान्यतः आपके लिए अच्छा रह सकता है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा फल देने वाला होगा। धन की प्राप्ति होगी। व्यापार में लाभ होगा। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको थोड़ा मानसिक तनाव हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से थोड़ी मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख फलदायक है। 16, 17 और 18 तारीख को आपका अपने भाइयों के साथ संबंध थोड़ा ठीक हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं शनिवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह आपके लिए ठीक रहेगा। अविवाहित जातकों को विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में सावधानीपूर्वक धन व्यय करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आप को कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 तारीख की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। 16 तारीख के दोपहर से 17 और 18 तारीख को आपको धन के मामले में सतर्क रहना चाहिए अन्यथा आपका धन बर्बाद हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर विशेष रूप से हनुमान चालीसा का तीन बार वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। अगर आप प्रयास करें तो आपको अपने व्यापार में बहुत अच्छा लाभ होगा। सामान्य तौर पर व्यापारियों को इस सप्ताह लाभ प्राप्त होगा। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। अधिकारी एवं कर्मचारियों को कार्यालय में सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख कार्यों को करने हेतु परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी पूर्वक, सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

यह सप्ताह अधिकारी और कर्मचारियों के लिए बहुत उत्तम है। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी

। धन लाभ भी होगा। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख शुभ और लाभप्रद हैं। 16, 17 और 18 को कचहरी के कार्यों में अधिक प्रयासों के बाद सफलता मिल सकती है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। कार्यालय में उनको अपने साथियों से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। मकर राशि के जातकों को अपने भाग्य से इस सप्ताह काफी मदद मिल सकती है। गलत रास्ते से धन आने का योग है। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े खराब हो सकते हैं। अविवाहित जातकों के लिए विवाह के नए-नए संबंध प्राप्त हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 14, 15 और 16 की दोपहर तक का समय प्रकार से लाभप्रद है। 19 और 20 तारीख को आपको सतर्कता पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। 16 की दोपहर से लेकर 17 और 18 तारीख को आपको अपने धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह भाग्य अद्भुत रूप से आपकी मदद करेगा। धन आने का भी योग बन सकता है। दुर्घटनाओं से आप बचेंगे। पेट पेट का अगर कोई रोग है तो उसमें आपको लाभ प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। धन लाभ में कमी रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए 14, 15, 18 19 और 20 तारीख ठीक-ठाक है। 16, 17 और 18 तारीख को आपके कार्यालय के कार्यों में बहुत सतर्कता बरतनी चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका व्यापार उत्तम गति से चलेगा। ‌व्यापार में आपको काफी लाभ प्राप्त हो सकता है। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। दुर्घटनाओं से आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से अच्छी मदद मिल सकती है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। अधिकारियों को इस सप्ताह नुकसान हो सकता है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख प्रभावशाली हैं। 14 और 15 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। 16, 17 और 18 तारीख को आपको भाग्य के स्थान पर कर्म पर विश्वास करना चाहिए। परंतु इन तारीखों में आपको भाग्य से कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा इस सप्ताह आपको चाहिए क्या प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६६ – लघुकथा – सपनों का राजकुमार ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६६ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ सपनों का राजकुमार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

सपनों में आया राजकुमार बहुत ही सुन्दर लग रहा थाl उसके आंगन में प्रवेश करते ही ऐसा लगा,मानों हजारों बल्बों की रोशनी जल गई होl बूढ़े बाप को अपनी सुकुमारी सी बेटी के लिए, इससे सुंदर वर क्या हो सकता था, लेकिन आंगन की चमचमाती रोशनी अचानक अंधेर कूप में इसलिए बदल गई क्यों कि बरामदे में खड़ी, मोटरसाइकिल को वह राजकुमार इस बार ही अपने साथ ले जाना चाहता था, जबकि बुजुर्ग ने बेटे को स्कूल जाने के लिये इस मोटरसाइकिल को महंगे ब्याज पर कर्ज लेकर खरीदा था l

 ♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

8.गढ़चिरौली यात्रा

नक्सलियों के मायके में

कैलाश मेश्राम की स्टेट बैंक के भोपाल स्थित स्थानीय कार्यालय में पदस्थी के दौरान मेरी उनसे हुई मुलाक़ात मित्रता में बदल गई। कुछ समय बाद कैलाश की पदोन्नति सहायक महाप्रबंधक की श्रेणी में होने के साथ उनका तबादला अंकेक्षण (Audit) विभाग में हो गया। दोनों घूमने-फिरने के शौक़ीन थे इसलिए कैलाश जहाँ भी आडिट करने जाते वहाँ मुझे घूमने-फिरने बुलाते। अनेकों बार कार्यक्रम बनता परंतु किन्ही कारणों से बिगड़ जाता। नवम्बर 2020 के पहले हफ़्ते में कैलाश को आडिट हेतु पंद्रह दिन गढ़चिरौली में रहना था। उन्होंने मुझे गढ़चिरौली भ्रमण हेतु आमंत्रित किया।

मैंने गढ़चिरौली के वनीय वैभव, गोंडी-तेलुगु-मराठी लोगों की मिलीजुली जीवंत संस्कृति, बाबा आमटे के पुत्र प्रकाश आमटे एवं उनकी पत्नी मंदाकिनी आमटे द्वारा पलकोटा, वेडिया और इंद्रावती नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थापित लोक बिरादरी सेवा आश्रम, अल्लापल्ली के प्रसिद्ध सागौन वन क्षेत्र और मार्क्सवादी नक्सल आतंकवाद के मायके के नाम से मशहूर कमलापुर वनक्षेत्र के बारे में सुन रखा था। गढ़चिरौली भ्रमण की बड़ी पुरानी इच्छा कुलबुला उठी। नौ नवम्बर 2020 को कार के टैंक में सिरे तक पेट्रोल भराकर सुबह छः बजे भोपाल से गढ़चिरौली के लिए निकल लिए।  

ठंडी हवा के झोंकों से बतियाते जैसे ही अब्दुल्लागंज पार किया विंध्याचल पर्वत के सुहाने दृश्य और ताज़ी हवा के झोंकों ने मन प्रसन्न कर दिया परंतु वह प्रसन्नता अधिक देर नहीं टिकी रही क्योंकि आगे आठ-दस किलोमीटर लम्बा धूल भरा ट्रैफ़िक जाम उसका स्वागत करने को तैयार था। फ़र्स्ट ग़ैर में घिसटते-घिसटते एक घंटे का रास्ता तीन घंटों में पूरा कर इटारसी पार करके केसला और पथरौटा से गुज़र कर शाहपुर पहुँचने ही वाले थे कि सतपुड़ा की लुभावनी हरीतिमा को छूकर आए हवा के झोंकों ने उसकी तबियत खुश कर दी। पता चला कि बैतूल ज़िला लग चुका है। हरे भरे पहाड़ों से घिरे एक ढ़ाबे पर मुँह-हाथ धोकर घर से लाया टिफ़िन ख़ाली करके पेट में भरा और वहाँ पड़ी खटिया पर पटिया को सिरहाना बनाकर लेट गए। लेटते ही दिमाग़ में बैतूल ज़िले की भौगोलिक संरचना और बसावट के विचार तरंगित होने लगे।

बैतूल

बैतूल समुद्र तल से 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित वनों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र  है, जो पूरे वर्ष यहाँ जलवायु को सुखद व मनमोहक बनाता है। यह सतपुड़ा रेंज के मैदानी इलाकों में स्थित होने से धूल भरे शहर के जीवन से एक सुखद, शांतिपूर्ण भ्रमण हेतु उपयुक्त है। बैतूल ज़िला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 180 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा, नागपुर, खंडवा, होशंगाबाद, हरदा जिलों की गोद में सतपुड़ा पर्वत के दक्षिणी पठार से नागपुर की तरफ़ फैले मैदान तक फैला हुआ है।

इतिहास की किताबों में यह क्षेत्र वाकाटक वंश, राष्ट्रकूट, सतवाहन, मुगल, गोंड, भोंसले, ब्रिटिश के अधीन रहा बताया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, बैतूल क्षेत्र बदनूर का इलाक़ा के नाम से जाना जाता था। इस स्थान और ज़िले का वर्तमान नाम इसके दक्षिण में लगभग 5 किमी की दूरी पर बसे एक छोटे से शहर बैतूल-बाजार के कारण पड़ा है। लेकिन बैतूल शब्द कहाँ से आया? बैतूल का शाब्दिक अर्थ “बिना बाढ़” का है। इस क्षेत्र के चारों तरफ़ कपास की खेती बहुतायत से होती थी। किसानों ने यहाँ भी कपास लगाना शुरू किया लेकिन यहाँ की ज़मीन पथरीली और जलवायु नम से होने से यहाँ कपास का पौधा बढ़ता (तूल) नहीं था। जैसे “बातों को तूल  न देना” याने  न बढ़ाना एक मुहावरा है। वैसे ही कपास के पौधों का न बढ़ना बैतूल हो गया।

वहाँ आदिवासियों की छोटी हाट लगती थी जिसे बैतूल बाज़ार पुकारा जाने लगा। उन्नीसवी सदी में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ फ़तह करके लौटते वक्त चौथ-सरदेशमुखी वसूली हेतु बिरार का इलाक़ा शिवाजी के वंशज राघोजी भोसले को सौंपा गया था। मराठा साम्राज्य विखंडन होने पर अंग्रेजों ने बैतूल को राजस्व तालुक़ा बना दिया। 1822 में जिला मुख्यालय को वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया, तभी से स्थानीय बोली में बदनूर इलाक़ा बैतूल के नाम से जाना जाने लगा।

बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में मराठों ने मंदिरों और पूजा स्थलों के रूप में अपने अमिट निशान छोड़ हैं। कई हिंदू और जैन मंदिर इस क्षेत्र के आसपास उसी समय के बने हैं। एक पहाड़ी की चोटी पर बना, मुक्तागिरी जैन मंदिर जैनियों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। सबसे प्रसिद्ध मंदिर शहर के केंद्र से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बालाजीपुरम मंदिर है। 15 एकड़ में फैला, मंदिर 2001 में बनाया गया एक लंबा ढांचा और वास्तुकला में आधुनिक है। बसंत पंचमी के त्योहार पर हर साल मेला भरता है। कुकरुखमाला, सोना घाटी, मुलताई और शापना जलाशय आसपास के अन्य पर्यटन स्थल हैं।

अमरावती जिले में हाटीघाट और चिकलदा पहाड़ियों के किनारे ताप्ती की सहायक नदियाँ मोरंड और गंजल दक्षिणी-पश्चिमी सीमा निर्धारित करती  हैं। मोरंड नदी और ढोढरा मोहर रेलवे स्टेशन के आगे से तवा नदी ज़िले की उत्तरी सीमा बनाती हैं।  पूर्वी सीमा छोटी नदियों और पहाड़ियों से गुलज़ार हैं। जिनमें से खुरपुरा और रोटिया नाला बरसात के दिनों में बादलों से ढँके अनेकों प्रपातों का निर्माण करते  हैं। गोंड, कोरकु, भरिया, कुर्मी, कुनबी, मेहरा और चमार इस ज़िले के मुख्य निवासी हैं। क़रीब आधा घंटा आराम के बाद पुनः यात्रा शुरू करके शाम को पाँच बजे के आसपास नागपुर शहर के मकान दिखने लगे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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