हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५६ ☆ कुछ दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके “कुछ दोहे” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५६ ☆

☆ कुछ दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सावन रिमझिम लिख रहा, बूँदों का दीवान।

खेत सरोवर बन गए, डूबे सभी मचान।।

नदी उठाए घाघरा, पहुँची चढ़कर घाट।

बाढ़ बहा कर ले गई, घर की जूनी खाट।।

 *

आँगन को दिखला रही, छानी घायल पाँव ।

छप्पर के नीचे छिपा, बैठा बेबस गाँव।।

 *

जलधर वारधि मेघ घन, सब बादल के रूप ।

वारिश से भरते सभी, नदिया सरवर कूप।।

 *

बादल बैठा मेड़ पर, देह उघारे खेत।

बूँद बूँद की आस में, नदी हो गई रेत ।।

 *

विरही मन की पीर को, हरो मेघ बन दूत।

रातें जोगन हो गईं, दिन हो गए भभूत ।।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६३ ☆ जिधर भी जाती है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जिधर भी जाती है “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६३ ☆

✍ जिधर भी जाती है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जिधर भी जाती है फ़्ह्मो-नज़र तबाही है

ये कैसी आग की बरसात या इलाही है

सभी के सामने करते हो तुम ज़लील मुझे

ज़फ़ा की बात नहीं ये तो कम- निगाही है

 *

वतन के वास्ते सरहद पै जो खड़ा मुस्तैद

वो देशभक्त है इस देश का सिपाही है

 *

यहाँ पै शाहो-गदा में नहीं है कोई फ़र्क़

ये मयकदा यहाँ इक जाम इक सुराही है

 *

करूँ मैं जुर्म से कैसे बरी भला तुझको

फ़्ररेबकारों की इस जा भी बादशाही है

 *

हक़ीक़तों पै अमल कर रहा है कौन यहाँ

फ़ुज़ूल होठों पै लोगों के वाह- वाही है

 *

न बात दीन-धरम की “अरुण” अभी कर तू

ख़िलाफ़ तेरे बज़िद दिह्र की गवाही है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६७ – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े।)

☆ हेमंत साहित्य # ६७ ☆

✍ बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे  

दिल ने कहा था

जिस दिन उमड़ेंगे बादल,

घिरेंगे घनघोर,

बरसेंगे झमाझम,

उसी दिन तलेंगे पकौड़े

और होगी चाय के साथ

कुछ जुगत, कुछ चुहल

और नई पुरानी यादों की जुगाली

 

बेसन, हरी मिर्च, धनिया, प्याज़, आलू

सभी को कर दिया ताकीद

कि

हो जाए मुस्तैद,

एक आवाज पर कटने

खौलते तेल में गिरने के लिए

 

बादल आए भी कई बार,

काले-काले,

रोबदार,

सूरज की रोशनी को कर गए गटक,

और माहौल बनाया ऐसा

कि बस अब बरसे

कि तब बरसे।

 

मैंने भी खिड़की से पूछा—

भाई साहब, शुरू करें?

बादल गरजे

हाँ… हाँ… अभी आते हैं।

और फिर…

हो गए लापता यूं

कि ढूंढो हमे, गर खाना है पकौडे

 

बारिश भी नेताओं से कम नही,

घोषणा जोरदार,

अमल नदारद!

पकौड़ों का सामान

मुँह ताकता रहा,

तेल बेचारा ठंडा पड़ा रहा,

और मेरा मन

बारिश की राह देखता रहा।

 

लेकिन आज

दिल और दिमाग—

दोनों की छुट्टी कर दी मैंने।

 

सोचा,

बारिश आए तो भी पकौड़े,

न आए तो भी पकौड़े!

आखिर पकौड़ों का

बारिश से क्या लेना-देना?

और तभी याद आई

हुकूमत में बैठे

उस नेता की वह

अमर अर्थव्यवस्था,

जिसमें नौकरी न मिले,

काम न मिले,

तो नौजवानों से कहा गया था

पकौड़े तलो!

 

तेल चढ़ाया,

बेसन घोला,

प्याज़ डाला,

आलू मिलाए,

हरी मिर्च ने थोड़ी बहादुरी दिखाई

और मैंने…

 

तल डाले पकौड़े.

 

आज पहली बार

उस महान दर्शन की

गहराई समझ में आई।

बारिश नहीं आई

कोई बात नहीं,

रोजगार, हाथ न आए

कोई बात नही

पकौड़े तलो और

कर लो जुगाड

लल्ला – लल्ली के दूध की

मेहरारू की बिंदी, टिक्की लाली की

 

आज तल लिये हैं पकौड़े मैंने

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆ कविता – प्रेम गीत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण  कविता – “प्रेम गीत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆

✍ कविता ☆ प्रेम गीत☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

गाते जाओ, गाते जाओ, प्रेम के गीत गाते जाओ,

जो भी मिले दीन-दुखियारा, गले उसे लगाते जाओ।

*

नफरत की हर एक चिंगारी, मिलकर आज बुझानी है,

प्रेम-सुधा की गंग बहाकर, दुनिया नई सजानी है।

*

जो बाँटें मानव-मानव को, वे बंधन टूट जाने दो,

दिल से दिल का सेतु बनाकर, प्रेम-ध्वजा लहराने दो।

*

भूखे के घर रोटी पहुँचे, प्यासे को जल भी मिल जाए,

रोती हुई हर माँ की आँखों में,  नया तराना फिर से आए।

*

जिसके तन पर वस्त्र न हों, अपना आँचल बिछा देना

जिसके मन में दर्द भरा हो, अपना ही दिल  थमा देना।

*

मंदिर मस्जिद बाद में जाना, पहले मन को मंदिर कर,

ईश्वर वहीं विराजेगा जहाँ, प्रेम बहे निष्कलुष निर्झर।

*

पत्थर में भगवान खोजने वालों, इतना याद रख लेना,

रोते हुए इंसान के आँसू, पहले हँसकर पोंछ सुखा देना।

*

तलवारों से जग जीता है, यह इतिहास तो पुराना है,

प्रेम से जो दिल जीत सके, वही सच्चा वीर सयाना है।

*

क्रोध अगर अंगार बने तो, प्रेम उसे शीतल कर देगा

करुणा का एक दीप अकेला, युग का तम भी हर लेगा।

*

आओ ऐसा युग रच डालें, जहाँ रहे  न कोई पराया हो,

हर आँगन में प्रेम खिले, और हर चेहरा मुस्काया हो।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२५ – आईना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आईना।)

☆ लघुकथा # १२५ – आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“नेहा! तुम हमेशा मेरे दुश्मनों से ही क्यों बात करती हो? मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं। आज ही मेरा मकान खाली कर दो।”

मकान मालकिन शांता देवी का स्वर गुस्से से काँप रहा था।

नेहा बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। पीछे से शांता देवी की बड़बड़ाहट सुनाई देती रही—”किराए के घर में रहती है और तेवर महारानी जैसे!”

शाम को संदीप घर पहुँचा तो शांता देवी ने फिर वही बात दोहरा दी। कमरे में आकर उसने पूछा, “आख़िर बात क्या हुई?”

नेहा ने शांत स्वर में कहा, “कोने वाले घर में हमारे गाँव की पूजा रहती है। वह मुझसे दो बातें कर लेती है। आंटी उसे अपना दुश्मन मानती हैं। उनकी दुश्मनी में मेरा क्या दोष?”

संदीप ने कहा, “ठीक है, दोस्त का मकान खाली है। वहीं चलेंगे।”

दोनों सामान समेटने लगे। अलमारी बंद करते हुए नेहा की नज़र अपने पुराने पारिवारिक फोटो पर पड़ी। उसने उसे देर तक देखा, फिर धीमे से बोली, “एक बार सास-ससुर से दूर होकर सोचा था कि शांति मिल जाएगी। अब यहाँ भी वही कड़वाहट… क्या हर बार घर ही बदलना समाधान है?”

संदीप उसकी ओर देखने लगा।

कुछ क्षण बाद नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं… गाड़ी विश्वकर्मा नगर नहीं जाएगी।”

“तो कहाँ?” संदीप ने पूछा।

नेहा की आँखें नम थीं।

“रामपुर… माँ-पिताजी के पास। अब किराए के मकान नहीं, अपने व्यवहार को बदलने की कोशिश करूँगी। शायद रिश्ते घर बदलने से नहीं, रवैया बदलने से सँवरते हैं। आज मैंने स्वयं को आईने में देख लिया है।”

गाड़ी रामपुर की ओर मुड़ चुकी थी और नेहा के जीवन की दिशा भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२६ ☆ चंद्राची ती कोर… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२६ ?

☆ चंद्राची ती कोर ☆  प्रभा सोनवणे ☆

ती मस्त रात्र,

तिच्या आणि त्याच्या

मधूर मीलनाचा

 सुरेख सोहळा

चंद्र आणि चांदणीचा….

 

निसर्गाने निर्मिलेली

एक सुंदर गोष्ट,

शिव आणि सतीच्या,

मैथुना इतकीच पुनित!

 

क्षण एक पुरे…..

म्हणता म्हणता…

सरकणारी रात्र…

आणि खिडकीतून

दिसणारी चंद्राची ती कोर,

भाग्यच की थोर,

लाभलाय….

जन्मोजन्मीचा चितचोर!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५८ – बुन्देली कविता – ”वे पथरा खों दूद पिवा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – वे पथरा खों दूद पिवा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५८ ☆

☆  बुन्देली कविता – वे पथरा खों दूद पिवा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे पथरा खों दूद पिबा रय

देखौ कैंसो भ्रम फैला रय

आइ महामारी, व्यापारी

रोज कफन कौ, रेट बढ़ा रय

 *

पंडत जी छप्पन भोगों की

ओ गरीब खें कथा सुना रय

 *

दिवता सें कम नइँ बे सेवक

जो भूखों के पेट भरा रय

 *

ऐड़ी-चोटी कर चुनाव में

नेता अपने दाँव लगा रय

 *

बम्म पटकबे बारे भग गय

घायल रिश्ते, घाव दिखा रय

 *

भगवतसाम्हूँ प्यासो तड़पत

बे नदिया कौ पता बता रय

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१३ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१३ ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी की कृति पर विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक चर्चा

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों लंदन में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३० – बरगद बनकर छाँव बनाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई...। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३० ☆

☆  बरगद बनकर छाँव बनाई…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

(समांत—- पदांत -आना, मात्रा भार-16, (चौपाई छंद))

सोते को है सरल जगाना।

पर जगते को कठिन उठाना।।

*

जीवन दाँव लगाया फिर भी।

मात-पिता का लुटा खजाना।।

*

बरगद बनकर छाँव बनाई।

चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

*

उँगली थामे बड़े हुए पर।

सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

*

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।

पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

*

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।

कैसा आया नया जमाना।।

*

संस्कृति और सभ्यता रूठी।

जागो मानव क्यों पछताना।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ – स्वतंत्रता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “स्वतंत्रता”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ ☆

🌻लघु कथा🌻 स्वतंत्रता 🌻

आज 15 अगस्त तिरंगे झंडे की टोकरी लिए बैठी सड़क पर स्वतंत्रता दिवस की भोर देख रही थी। अभी कुछ झंडे और छोटे – छोटे बैच बिकने को बाकी रह गया था। सोच रही थी अब तो लगभग सभी भीड़ खत्म होने चली है।

मेरी टोकरी में  यह बच गया नही बिक पाया। तभी एक नौजवान दौड़ता भागता आया, पूरा सामान उठा कई गुना ज्यादा राशि देकर चलता बना।

वह खुश होकर टोकरी उठा, मुखड़े पर मुस्कान और सरपट चल दी घर की ओर।

दरवाजे पर पहुची ही थी कि झपट्टा मार टोकरी को फेंकते उसका पतिदेव पैसे झींनते हुए

—मना आई स्वतंत्रता दिवस

अब देख गुलामी क्या है। इससे तू आजाद नही हो सकती।

धम्म से धरा पर बैठते सिसक पड़ी – – क्या स्वतंत्र होना इतना निर्मोही होता है। अश्रुं धारा बह चली तुझे तो उम्र भर की गुलामी मिली है जो सदैव जीवन्त रहेगी।

शायद शहीद होने के बाद ही स्वतंत्र हो सकूंगी. 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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