(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – हिंदी दिवस।)
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “कौन बख्त के मारे नइयाँ“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६२ ☆
☆ बुन्देली कविता – “कौन बख्त के मारे नइयाँ“☆ आचार्य भगवत दुबे
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३० ☆
आलेख – हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हिंदी दिवस पर हम प्रायः एक ही बात कहते हैं, हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी पहचान है, हमें हिंदी का सम्मान करना चाहिए।
हिंदी को बचाने की आवश्यकता नहीं बची है। फिल्मी गीतों में , लोक व्यवहार में वह सुरक्षित है। आज हिंदी को सक्षम बनाने की आवश्यकता है।
लेकिन एक प्रश्न अवश्य है, क्या हिंदी भविष्य की भाषा बन रही है?
इसका उत्तर हमारी भावनाओं में नहीं, हिंदी की उपयोगिता में छिपा है।
आज यदि किसी बच्चे को हिंदी में अच्छी शिक्षा मिले, किसी युवा को हिंदी में रोजगार मिले, किसी वैज्ञानिक को अपना शोध हिंदी में दुनिया तक पहुँचाने का अवसर मिले, किसी उद्यमी को हिंदी में अपना बाजार मिले और किसी नागरिक को तकनीक अपने ही शब्दों में उपलब्ध हो , तभी हिंदी का वास्तविक विस्तार होगा।
इसलिए हिंदी के लिए हमें तीन काम करने होंगे।
पहला, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाना होगा।
विज्ञान, चिकित्सा, कानून, तकनीक, प्रबंधन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में तैयार करनी होगी। केवल अंग्रेजी शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में मौलिक ज्ञान-सृजन करना होगा।
दूसरा, हिंदी को डिजिटल भाषा की पूरी ताकत देनी होगी।
आज भाषा का भविष्य पुस्तकालयों से अधिक मोबाइल और स्क्रीन पर तय हो रहा है। हमें अच्छे हिंदी ब्लॉग, पॉडकास्ट, वीडियो, ई-पुस्तकें, डिजिटल पाठ्यक्रम और एआई आधारित हिंदी उपकरण बनाने होंगे।
हिंदी जितनी अधिक टेक्नोलॉजी फ्रेंडली होगी, उतनी ही अधिक भविष्य की भाषा होगी।
तीसरा, हमें हिंदी का बाजार बनाना होगा।
यह बात थोड़ी कठोर लग सकती है, लेकिन जरूरी है।
जिस भाषा में आर्थिक अवसर नहीं होंगे, युवा उस भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़कर भी व्यावहारिक जीवन में दूसरी भाषा की ओर चले जाएंगे।
इसलिए हिंदी में कंटेंट क्रिएशन, अनुवाद, प्रकाशन, विज्ञापन, सॉफ्टवेयर, शिक्षा और एआई, इन सबको रोजगार से जोड़ना होगा।
और एक बात और।
हिंदी का विस्तार दूसरी भाषाओं को हटाकर नहीं होगा।
हमें अंग्रेजी से डरने की नहीं, उससे संवाद करने की आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा की नहीं, सहयोग की आवश्यकता है।
हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहणशीलता है। वह संस्कृत से लेती है, उर्दू से लेती है, अंग्रेजी से लेती है और लोकभाषाओं से भी सीखती है।
हम हिंदी के केवल अच्छे वक्ता न बनें,
हिंदी के अच्छे निर्माता बनें।
एक अच्छी किताब लिखें।
एक अच्छा डिजिटल पाठ तैयार करें।
एक उपयोगी हिंदी ऐप बनाएँ।
एक वैज्ञानिक विषय को सरल हिंदी में समझाएँ।
एक बच्चे को हिंदी में कुछ नया सिखाएँ।
क्योंकि भाषा केवल बोलने से नहीं बढ़ती।
भाषा तब बढ़ती है, जब उसमें नया ज्ञान, नया विचार और नया भविष्य लिखा जाता है।
आइए, हिंदी को केवल अपनी पहचान न बनाएँ।उसे अपनी सृजन-शक्ति, अपनी तकनीक और अपने भविष्य की भाषा बनाएँ।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे – कविता ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३४ ☆
☆ मनोज के दोहे – कविता ☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी “चौपाई – श्री गणेशाय नमः”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ ☆
🌻 चौपाई – श्री गणेशाय नमः 🌻
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शंकर सुवन भवानी नंदन, वेद मंत्र से पूजन वंदन।
ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।
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लंबोदर है सुंदर प्यारे, हैं अनंत महिमा है न्यारे।
कृपा दृष्टि से पूरन काजा, हे गणनायक मूषक राजा।।
चरण पखारे निशदिन सेवा, यमुना गंगा निर्मल रेवा।
ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।
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चार भुजाएं छबि है न्यारी, कटि पीताम्बर तुमको प्यारी।
एक दंत है भगवन धारें, संकट विपदा सबकी टारें।।
बाल मुकुंद मनोहर पुरवा, भोग लगे है लड्डू मेवा।
ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।
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वक्रतुड की बात निराली, मंद – मंद मुस्काते लाली।
माँ गौरी आँखों के तारें, अरि दानव है तुमसे हारे।।
लौंग पान से सज्जित मेवा, चढ़ता छप्पन भोग कलेवा।
ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।
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मातु-पिता सर्वोत्तम जानें, बुध्दि देव सब तुमको मानें।
रिद्धि-सिद्धि है संग तिहारे, बाल सखा सब रोज पधारे।।
आन विराजे मेरे ठेवा, मंगल मूरत मंगल देवा।
ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९२ – देश-परदेश ☆
☆ त से तोता ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आज प्रातः फ्लैट की बालकनी से पास के एक घर की छत पर तोतों का झुंड बैठा हुआ देखकर, हमारी दादी द्वारा पाले गए तोते की याद आ गई। घरों में पाला जाने वाला सबसे प्रिय पक्षी हमारा तोता। प्यार से इसको मिट्ठू भी बुलाया जाता है। “हरे रंग का है, ये तोता” बच्चों की एक पसदीदा कविता हुआ करती थी, अब तो “जैक एंड जिल” का समय भी जा चुका है।
पौराणिक कथाओं में राक्षस की जान तोते में हुआ करती थी। हमारे बॉलीवुड ने भी तोते का उपयोग अधिकतर “तोता मैना” के रूप में किया था। कहानियों में भी बहेलिये और तोते के बहुत सारे किस्से पढ़े और सुने थे।
तोते की संगत उसको राम राम कहना या फिर भद्दे शब्द भी सिखा देती है। कार्यालयों में जो लोग, उच्च अधिकारियों के करीब रहते है, उनको भी तोता कहा जाता है। जब किसी कार्यक्रम में जो लोग आयोजकों की तारीफ़ में कशीदे पढ़ने लग जाते हैं, उनको भी तोते की संज्ञा मिल जाती है।
यदि मुहावरों की बात करें, तो तोते के ऊपर बहुत सारे मुहावरे बन चुके हैं, जैसे कि तोता पालना, हाथ के तोते उड़ जाना, तोते की तरह आंखें फेरना, रट्टू तोता आदि। महिलाओं ने भी तोते के नाम से ही “तोतिया” रंग ईजाद कर दिया है। “तोतिया नाक” शब्द भी व्यक्ति के नयन नक्श की जानकारी देने के लिए उपयोग होता हैं।
तोते द्वारा पेड़ों पर कुछ फलों को चोंच मार दी जाती है। फल विक्रेता उसको सबसे मीठा होने का सर्टिफिकेट देकर, क्रेता को उल्लू बना देते हैं। तोतापरी आम की एक किस्म का रंग तोते जैसा ही होता हैं।
तोता पुराण को अब विराम देते हैं, वर्ना कुछ लोग हमें भी तोते का तोता कहने लग जायेंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…५।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०० ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…५ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
मान होता है मशीनों का
और मास्टर
मर-मर के जीता है।
तो मैं कह रहा था कि
शिक्षक के मन में
राशन या रकम का
प्रश्न प्रमुख नहीं है।
उसे हार्दिक सम्मान दीजिये
उसके लेखे
इससे बड़ा कोई सुख नहीं है।
मैं नहीं कहता कि
वो दूध का धुला है,
या उसमें कोई कमी नहीं है।
वो गल्ती करता है जरूर
पर हुजूर
क्या वो आदमी नहीं है ?
आप कहेंगे
तो मैं नौकरी छोड़ दूँगा।
मुझे कोई मोह नहीं है।
मैनें साफ बात कही है
ये कोई विद्रोह नहीं है।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “पूज्य पिता जी...”।)
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अंधकार…”।)