हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२९ – हिंदी दिवस… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – हिंदी दिवस।)

☆ लघुकथा # १२९ – हिंदी दिवस ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

हिंदी दिवस पर विद्यालय में विशेष समारोह था। मंच पर हिंदी के सम्मान में भाषण हो रहे थे।

शिक्षक ने छात्र से कहा—

“आज हिंदी दिवस है, हिंदी में ही बात करना।”

छात्र ने पूछा—

“सर, आज ही क्यों?”

“क्योंकि आज हिंदी दिवस है।”

छात्र मुस्कराया—

“तो बाकी दिन किसके हैं?”

शिक्षक निरुत्तर हो गए।

छात्र ने फिर पूछा—

“सर, हिंदी को सम्मान भाषणों से मिलेगा या व्यवहार से?”

शिक्षक ने कहा—

“व्यवहार से।”

“तो फिर हम इसे सिर्फ आज क्यों निभाएँ?”

शिक्षक के पास कोई उत्तर नहीं था।

तभी मंच से घोषणा हुई—

“अब हिंदी दिवस पर हिंदी के महत्व पर भाषण दे रहे थे ।”

छात्र ने मंच की ओर देखा और धीमे से कहा—

“सर, हिंदी को आज फिर वही मिला—सम्मान का भाषण और व्यवहार में छुट्टी।”

तालियाँ गूँज उठीं।

शिक्षक चुप थे।

मंच पर हिंदी का सम्मान हो रहा था और मंच से उतरते ही हिंदी फिर अपने घर का रास्ता खोज रही थी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३३० ☆ मी… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३३० ?

☆ मी… ☆  प्रभा सोनवणे ☆

☆

मी एक रेणू

तू विशाल आभाळ !

कसे समजेल तुला,

मन घायाळ घायाळ !

माझ्या वेदनेचे कुळ,

तुज सांगेल गोकुळ,

दूर वाजताच वेणू…..

होई राधिका व्याकुळ! !

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६२ – बुन्देली कविता – ”कौन बख्त के मारे नइयाँ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “कौन बख्त के मारे नइयाँ“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६२ ☆

☆  बुन्देली कविता – “कौन बख्त के मारे नइयाँ“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

कौन बख्त के मारे नइयाँ

कइ नें दाग उघारे नइयाँ

* 

कौन गवाही दैबे जैहै

प्राण कौन खें प्यारे नइयाँ

 *

उन दलितों के रंग न देखौ

कौनऊँ मन के कारे नइयाँ

 *

बाड़, बिजूके काम न दैहें

जे साँचे रखबारे नइयाँ

 *

कथरी में लुक के घी खा रय

बे कौनऊँ बेचारे नइयाँ

 *

महनत की कन्दील बुझै नें

छँटे अबै इंधयारे नइयाँ

 *

धन की बाजी जीत गए तुम

‘भगवत’ मन सें हारे नइयाँ

☆

 

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३० ☆ हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३० ☆

?  आलेख – हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी दिवस पर हम प्रायः एक ही बात कहते हैं, हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी पहचान है, हमें हिंदी का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को बचाने की आवश्यकता नहीं बची है। फिल्मी गीतों में , लोक व्यवहार में वह सुरक्षित है। आज हिंदी को सक्षम बनाने की आवश्यकता है।

लेकिन एक प्रश्न अवश्य है, क्या हिंदी भविष्य की भाषा बन रही है?

इसका उत्तर हमारी भावनाओं में नहीं, हिंदी की उपयोगिता में छिपा है।

आज यदि किसी बच्चे को हिंदी में अच्छी शिक्षा मिले, किसी युवा को हिंदी में रोजगार मिले, किसी वैज्ञानिक को अपना शोध हिंदी में दुनिया तक पहुँचाने का अवसर मिले, किसी उद्यमी को हिंदी में अपना बाजार मिले और किसी नागरिक को तकनीक अपने ही शब्दों में उपलब्ध हो , तभी हिंदी का वास्तविक विस्तार होगा।

इसलिए हिंदी के लिए हमें तीन काम करने होंगे।

पहला, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाना होगा।

विज्ञान, चिकित्सा, कानून, तकनीक, प्रबंधन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में तैयार करनी होगी। केवल अंग्रेजी शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में मौलिक ज्ञान-सृजन करना होगा।

दूसरा, हिंदी को डिजिटल भाषा की पूरी ताकत देनी होगी।

आज भाषा का भविष्य पुस्तकालयों से अधिक मोबाइल और स्क्रीन पर तय हो रहा है। हमें अच्छे हिंदी ब्लॉग, पॉडकास्ट, वीडियो, ई-पुस्तकें, डिजिटल पाठ्यक्रम और एआई आधारित हिंदी उपकरण बनाने होंगे।

हिंदी जितनी अधिक टेक्नोलॉजी फ्रेंडली होगी, उतनी ही अधिक भविष्य की भाषा होगी।

तीसरा, हमें हिंदी का बाजार बनाना होगा।

 यह बात थोड़ी कठोर लग सकती है, लेकिन जरूरी है।

 जिस भाषा में आर्थिक अवसर नहीं होंगे, युवा उस भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़कर भी व्यावहारिक जीवन में दूसरी भाषा की ओर चले जाएंगे।

 इसलिए हिंदी में कंटेंट क्रिएशन, अनुवाद, प्रकाशन, विज्ञापन, सॉफ्टवेयर, शिक्षा और एआई, इन सबको रोजगार से जोड़ना होगा।

 और एक बात और।

हिंदी का विस्तार दूसरी भाषाओं को हटाकर नहीं होगा।

हमें अंग्रेजी से डरने की नहीं, उससे संवाद करने की आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा की नहीं, सहयोग की आवश्यकता है।

 हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहणशीलता है। वह संस्कृत से लेती है, उर्दू से लेती है, अंग्रेजी से लेती है और लोकभाषाओं से भी सीखती है।

 हम हिंदी के केवल अच्छे वक्ता न बनें,

हिंदी के अच्छे निर्माता बनें।

एक अच्छी किताब लिखें।

एक अच्छा डिजिटल पाठ तैयार करें।

एक उपयोगी हिंदी ऐप बनाएँ।

एक वैज्ञानिक विषय को सरल हिंदी में समझाएँ।

एक बच्चे को हिंदी में कुछ नया सिखाएँ।

क्योंकि भाषा केवल बोलने से नहीं बढ़ती।

भाषा तब बढ़ती है, जब उसमें नया ज्ञान, नया विचार और नया भविष्य लिखा जाता है।

 

आइए, हिंदी को केवल अपनी पहचान न बनाएँ।उसे अपनी सृजन-शक्ति, अपनी तकनीक और अपने भविष्य की भाषा बनाएँ।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३४ – मनोज के दोहे – कविता ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे – कविता ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३४ ☆

☆  मनोज के दोहे – कविता  ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

कविता संग की दोस्ती, थामा उसका हाथ।

मुझसे जब-जब रूठती, तब-तब हुआ अनाथ।।

*

प्रश्न करे जग बावरा, लिखता जो दिन रात ।

कौन पढ़ेगा यह सभी, तेरे दिल की बात ।।

*

कुछ अपनेे ही कोसते, देख मेरा यह काज।

प्रतिपल समय गवाँ रहा, आती है ना लाज।।

*

तन की ताकत के लिये, पौष्टिक हैं आहार ।

मन की शक्ती के लिये, जीवन में सुविचार ।।

*

कविता कभी न चाहती, मानवता पर घात ।

जिसमें जग का हित रहे, उसे सुहाती बात ।।

*

मिटे विषमता देश की, अरू मानव मन भेद ।

प्रगति राह में सब बढ़ें, व्यर्थ बहे न श्वेद ।।

*

जगे हृदय संवेदना, या बदले परिवेश ।

यही सोच कर लिख रहा, शायद बदले देश ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ – चौपाई – श्री गणेशाय नमः ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी  “चौपाई – श्री गणेशाय नमः”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ ☆

🌻 चौपाई – श्री गणेशाय नमः 🌻

☆

शंकर  सुवन  भवानी  नंदन,  वेद  मंत्र  से  पूजन   वंदन।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

लंबोदर   है   सुंदर   प्यारे, हैं   अनंत   महिमा   है  न्यारे।

कृपा दृष्टि से पूरन  काजा, हे  गणनायक  मूषक  राजा।।

चरण   पखारे   निशदिन   सेवा,  यमुना गंगा निर्मल रेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

चार भुजाएं छबि है न्यारी, कटि पीताम्बर तुमको प्यारी।

एक  दंत  है  भगवन  धारें, संकट  विपदा  सबकी  टारें।।

बाल   मुकुंद   मनोहर   पुरवा, भोग  लगे  है  लड्डू  मेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

वक्रतुड  की  बात  निराली,  मंद –  मंद  मुस्काते  लाली।

माँ  गौरी  आँखों  के  तारें,  अरि  दानव   है तुमसे हारे।।

लौंग  पान से  सज्जित मेवा, चढ़ता  छप्पन  भोग  कलेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

मातु-पिता  सर्वोत्तम  जानें, बुध्दि  देव  सब  तुमको  मानें।

रिद्धि-सिद्धि  है संग तिहारे,  बाल सखा सब रोज  पधारे।।

आन    विराजे    मेरे    ठेवा,  मंगल   मूरत   मंगल    देवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा,  भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९२ – देश-परदेश – त से तोता ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९२ – देश-परदेश ☆

☆ त से तोता ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज प्रातः फ्लैट की बालकनी से पास के एक घर की छत पर तोतों का झुंड बैठा हुआ देखकर, हमारी दादी द्वारा पाले गए तोते की याद आ गई। घरों में पाला जाने वाला सबसे प्रिय पक्षी हमारा तोता। प्यार से इसको मिट्ठू भी बुलाया जाता है। “हरे रंग का है, ये तोता” बच्चों की एक पसदीदा कविता हुआ करती थी, अब तो “जैक एंड जिल” का समय भी जा चुका है।

पौराणिक कथाओं में राक्षस की जान तोते में हुआ करती थी। हमारे बॉलीवुड ने भी तोते का उपयोग अधिकतर “तोता मैना” के रूप में किया था। कहानियों में भी बहेलिये और तोते के बहुत सारे किस्से पढ़े और सुने थे।

तोते की संगत उसको राम राम कहना या फिर भद्दे शब्द भी सिखा देती है। कार्यालयों में जो लोग, उच्च अधिकारियों के करीब रहते है, उनको भी तोता कहा जाता है। जब किसी कार्यक्रम में जो लोग आयोजकों की तारीफ़ में कशीदे पढ़ने लग जाते हैं, उनको भी तोते की संज्ञा मिल जाती है।

यदि मुहावरों की बात करें, तो तोते के ऊपर बहुत सारे मुहावरे बन चुके हैं, जैसे कि तोता पालना, हाथ के तोते उड़ जाना, तोते की तरह आंखें फेरना, रट्टू तोता आदि। महिलाओं ने भी तोते के नाम से ही “तोतिया” रंग ईजाद कर दिया है। “तोतिया नाक” शब्द भी व्यक्ति के नयन नक्श की जानकारी देने के लिए उपयोग होता हैं।

तोते द्वारा पेड़ों पर कुछ फलों को चोंच मार दी जाती है। फल विक्रेता उसको सबसे मीठा होने का सर्टिफिकेट देकर, क्रेता को उल्लू बना देते हैं। तोतापरी आम की एक किस्म का रंग तोते जैसा ही होता हैं।

तोता पुराण को अब विराम देते हैं, वर्ना कुछ लोग हमें भी तोते का तोता कहने लग जायेंगे।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # ३०० – प्रायमरी का मास्टर…५ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…५।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०० ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…५ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

मान होता है मशीनों का

और मास्टर

 

मर-मर के जीता है।

तो मैं कह रहा था कि

शिक्षक के मन में

राशन या रकम का

प्रश्न प्रमुख नहीं है।

 

उसे हार्दिक सम्मान दीजिये

उसके लेखे

इससे बड़ा कोई सुख नहीं है।

 

मैं नहीं कहता कि

वो दूध का धुला है,

या उसमें कोई कमी नहीं है।

 

वो गल्ती करता है जरूर

पर हुजूर

क्या वो आदमी नहीं है ?

 

आप कहेंगे

तो मैं नौकरी छोड़ दूँगा।

मुझे कोई मोह नहीं है।

मैनें साफ बात कही है

ये कोई विद्रोह नहीं है।

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९७ – “पूज्य पिता जी…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “पूज्य पिता जी...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “पूज्य पिता जी...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

बेटों ने तय की एक खटिया,

पूज्य  पिता जी को ।

देख रही है चुपके बिटिया,

पूज्य पिता जी को ॥

 

जो आगन में पड़ी हुई

है , टूटी- टाटी सी ।

वैसे वो है बची पलंग से

बेढंग काठी सी ।

 

जिसमें पड़े  रहेंगे बेबस

उनके पूज्य पिता ।

बेटों का बस यही समर्पण

पूज्य पिता जी को ॥

 

पड़े पड़े देखा करते है

उसी झिंगोले में ।

सिर्फ निराशा बची दिखे

आँखों के गोले में ।

 

किन्तु अभी भी कुछ आशा

रोटी पा जाने की ।

यही एक विश्वास वचाये

पूज्य पिताजी को ॥

 

कितना खाँसे और खँखारे

कोई नहीं सुनता ।

लुढ़क जाये पानी का डबला

किसको है चित्ता ?

 

बेटों का यह ढोंग

“बहुत सेवा करते हैं वे ।”

वही आज तक रहे बचाते

पूज्य पिताजी को ॥

 

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

06-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७९ ☆ # “अंधकार…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अंधकार…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७९ ☆

☆ # “पलकों ने खता की…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

पलकों ने खता की

आंखों ने सजा पाई

दिल से हाय निकली

आंखें हैं डबडबाई

 

कुछ टूट गया अंदर

कुछ टूट गया बाहर

टूटते हुए रिश्तों ने

हकीकत है समझाई

 

चेहरे पर रोष है

इरादों में जोश है

बहते हुए लावे ने

हर भीख है ठुकराई

 

शब्दों के हंसी फंदे

सब लूटने के धंधे

बहेलियां ने मुखौटे में

सूरत है छुपाई

 

अंगारों पर चल रहे हैं

मुफलिसी में पल रहे हैं

यह चुप्पी यह खामोशी

यह किस्मत कहां ले आई

 

अब टूट रहा है सब्र

बन जाए यहीं पर कब्र

सरमायेदारों के खिलाफ

“श्याम” तुमने आवाज है उठाई

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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