(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण “आम और खास”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६३ ☆
🌻संस्मरण 🌻 आम और खास ☆
बचपन की घटना याद हो आई। गर्मी का मौसम, तपती दुपहरी और भरे पूरे परिवार में एक कमरे में लगा हुआ एक तीन बाँहों वाला पंखा।
जो बहुत खास था। कुछ खास मौके पर चलता था और जब चले तब बड़े थोड़े ऊंचे जगह पर बैठे जैसे तखत, पलंग, जो मध्यम थे वह स्टूल, बेंच, छोटी चौपाई। और हम बच्चे दरी या चटाई बिछा है तो भी ठीक, नहीं तो लिपा- पुता घर का सुंदर महकता हुआ वह कमरा, जानते हैं इसकी कीमत क्यों थी क्योंकि वह खास था जहाँ पर बड़े बुजुर्गों का साया था, भोजन कक्ष जहाँ से दादी और माँ की चूड़ियों की आवाज, रुतबे से बाबा और चाचा बाबा की आवाज, पिताजी अपनी सादगी और कुशल वाकपटुता से पूरे परिवार के लिए एक रामलाल की भांति प्यारे।
जाने कहाँ गए वो दिन अब न वह जगह बची और न लोग। कहते हैं 80- 100 वर्षों के बाद घर बदल जाता है, गाँव बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं, बोली बदल जाती है, और संस्कार संस्कृति भी बदल जाती है और तो और जो खास होता है वह आम होते देर नहीं लगती।
वैसा ही हाल कुछ पंखे का हो गया। गर्मी पहले से और बेहतर हो गई है। और पंखे खास से आम हो गए हैं। न उनमें परिवार है और न वह ठंडक वाली हवा।
आज हर कमरे में एक पंखा और ए सी लगा हुआ है। देखा जाए सब कहते हैं यह वह खास वाला है परंतु मुझे लगता है यह खास नहीं यह तो आम हो गया है। जो हर कमरे पर है परंतु कमरे में वह नहीं है जो खास होते हैं।
बस मन की बातें थी। जो थोड़ी सी बात आप सभी के साथ साँझा कर ली। हृदय के साथ उन सभी बीती बातों को गर्मी में आम से खास और खास से आम होते देखा गया। आप सभी के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और बहुत-बहुत अभिनंदन। खास बने रहियेगा– शीतल, ठंडक, धीरज, श्रद्धा, निष्ठा और संस्कार को लिए। ममता, सेवा पूजन, परहित, जनहित, दया, करुणा संस्कृति को लेकर आम बने रहियेगा।
सदैव प्रभु कृपा बरसती रहेगी। जिसमें मै, मेरा को जगह न मिले, हमारे- अपने को खास बनाते रहियेगा।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७५ ☆ देश-परदेश – जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना ? ☆ श्री राकेश कुमार ☆
बचपन से ये ही सब सुनते आ रहें हैं।सयाने कहा करते थे,उस गली का रास्ता क्यों पूछना, जहां जाना ही नहीं हैं ? अपने काम से मतलब रखो, अपने उद्देश्य की तरफ ध्यान लगाओ आदि।
विगत कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार से संपूर्ण विश्व से पल पल की खबर कुछ क्षणों में हम सबकी स्क्रीन पर रहती हैं।
आज चुनाव परिणाम आने हैं, सभी लोग टीवी पर बड़ी खबर / ब्रेकिंग न्यूज सुन सुन कर अपने आप को अपडेट कर रहें हैं।
सड़कों पर भीड़ बिल्कुल भी नहीं है, सरकारी दफ्तर/ बैंक आदि खुले है,परंतु ग्राहक नगण्य हैं।दोपहर में जब सब्जी के ठेले पर पहुंचे, तो विक्रेता गिड़गिड़ाने लगा, बोला सुबह से बोहनी नहीं हुई हैं। सस्ते भाव में सब्जी खरीद लेवें, गर्मी से सब्जी खराब हो जाएगी। हमने भी उसकी आपदा से अवसर निकाल कर आवश्यकता से अधिक सब्जी खरीद ली है।
सुबह एक मित्र को फोन किया तो बोला कल बात करना आज चुनाव परिणामों में व्यस्त हैं। एक अन्य मित्र को फोन किया, वो तुनक कर बोला तुम्हे कोई काम नहीं है, क्या ? आज चुनाव का मज़ा लो।हमने उसको बताया एक अन्य मित्र की तबियत बहुत नाज़ुक बनी हुई है, उसकी कुशल क्षेम पूछने अभी चलते हो क्या ? उसने आज के लिए मना कर दिया।
आज के चुनाव परिणाम पूर्व और दक्षिण के दो दो राज्यों के आने हैं। हम यहां उत्तर भारत में रहते हैं। उन चारों राज्यों में हमारा कोई संबंधी भी नहीं रहता है। हम जीवन में कभी वहां गए भी नहीं हैं, फिर वहां के परिणामों से हमें क्या लेना देना ? मोहल्ले के एक परिचित कुछ समय से बीमार हैं, वहां कभी झांका तक नहीं है। बाकी पूरी दुनिया की ख़बर हमें रहनी चाहिए।
मुकेश जी का पुराना गीत “जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा, उस गली से हमें गुजरना नहीं” के बोल अब बेमानी हो चुके हैं। आजकल तो हम लोग किसी भी गली में जाकर नया बलमा बना लेते है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८२ – संकल्पित रहो… – १
लूट, हत्या, बलात्कार
आज/समाज
बेशर्मी की चादर ओढ़कर सो गया है
इसीलिये भ्रष्टाचार/ राष्ट्रीय धर्म हो गया है।
ईमान को दकियानूसी
और अहिंसा को कहा जा रहा है
कायरता का पर्याय
हाय!
क्या हो गया है मुझे और मेरे देश को
कौन तोड़ेगा जड़ता के परिवेश को?
शायद
झंकृत हो रहे हैं कृष्ण चेतना के तार
खुल रहे हैं किरनों के द्वार
कोई कहता है
कैसे हुआ होगा/ सृष्टि का जन्म और विस्तार
और हर बार कैसे होता है संहार!
है
अन्तः करण होता है मुखर
निकलते हैं स्वर
जब सम्बन्धों की सुगंध चुक जाती है।
जीवन की प्रगति रुक जाती है
और आरंभ होता है/ महाप्रलय महाविनाश
काश ! हम सोचते
कि हम अमृतपुत्र हैं
हमारी जिन्दगी वरदान है बाजार नहीं
और हम
मनुष्य हैं चीज नहीं
मगर हमें इतना भी तमीज नहीं
हम भूलते हैं भ्रमते हैं
और बाट जोहते हैं।
किसी अवतार की
गौतम, महावीर शंकराचार्य
या गाँधी की
या किसी चमत्कारिक आँधी की ।
दोस्तो!
चमत्कार एक भ्रम है
अट्टू अथक श्रम ही
परिवर्तन का उद्गम है।
संकल्पित रहो
आतंक का अंगुलिमाल
शरण में आयेगा
मन की दृढ़ता से
पूरा पर्यावरण शुद्ध हो जायेगा।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “माँ तो माँ है, नहीं...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “माँ तो माँ है, नहीं...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जिंदगी दुश्वार हो गई है…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘यादें…‘।)
☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ४. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆
एमिली शेंकल
समिधाच सख्या या!! …
सन १९४५, ऑगस्ट महिना, संध्याकाळ ची वेळ! ती स्वयंपाकघरात नेहमीसारखी कामात… आणि अचानक रेडिओ वर ऐकायला येते… ‘ सुभाषचंद्र बोस यांचा विमान अपघातात मृत्यू! ‘
ती हळूच उठते, बेडरूममध्ये जाते, जिथे तिची जेमतेम ३ वर्षे वयाची मुलगी झोपलेली असते. बिछान्याजवळ गुढगे टेकून बसते आणि आयुष्यात पहिल्यांदाच मनाने कोसळते… अश्रूंचा बांध फुटतो, मनसोक्त रडते. जिच्या दृढतेसाठी, साहसी स्वभावासाठी तिचा पती बाघिन म्हणत असतो… ती रडत होती, शक्तीच संपल्या सारखी!!
ती होती… एमिली शेंकल… कॉंग्रेस योद्धा म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांची पत्नी!!
एमिली च्या डोळ्यांपुढून सगळा जीवनपट सरकू लागला. आठवला तिला तो दिवस… सुभाषबाबूंच्या परिचयाचा!
सविनय कायदेभंगाच्या चळवळीमुळे तुरूंगात गेलेल्या सुभाष बाबूंची तब्येत ढासळू लागली, ब्रिटिश सरकारने उपचारासाठी त्यांना व्हिएन्ना मध्ये ठेवले. हॉस्पिटलमध्ये सुद्धा देशाचाच विचार करणा-या सुभाष बाबूंनी, भारतीय युवकांना स्वातंत्र्य लढ्यासाठी एकत्रित करण्याचं ठरवलं. द इंडियन स्ट्रगल या नावाने पुस्तक लिहायला घेतलं. त्यासाठी टाइपिस्ट ची गरज भासली. आणि मुलाखतीत निवड होऊन एमिली शेंकल चा सुभाषबाबूंच्या आयुष्यात प्रवेश झाला. हळूहळू रोजच्या भेटीतून… सौम्य स्वभाव, हसतमुख, स्पष्टवक्ती, निस्वार्थी, कामाला वाघ… अशा एमिली कडे सुभाषबाबू आकर्षित झाले. देशप्रेम अग्रस्थानी असलेल्या मनात… एका उदात्त अशा प्रेमाने अलगद प्रवेश केला. आजपर्यंत घरच्यांना लग्नासाठी नेहमीच नकार देणारे दोघेही… नकळतपणे गुंतले.
२६ डिसेंबर १९३७ या दिवशी… एमिली च्या वाढदिवशी… दोघांनी अखेर गुप्त विवाह केला. आणि शेवटपर्यंत तो गुप्तच ठेवला. कारण सुभाष बाबूंसाठी देश सर्वोपरि होता. हे एमिली पूर्णपणे जाणून होती. म्हणूनच उदात्त हेतू आणि एक शोकांतिका असलेलं नातं तिने जोडलं. उदात्त हेतू ला उदात्त अशी साथ देऊन त्यांची खरी हमराज बनली. तिनं सुभाष बाबूंच्या संघर्षाला समजून घेतलं. त्या नात्यात एमिली ने अदम्य साहस, सर्वोच्च गरिमा आणि उच्च त्यागाची भावना… हे गुण पेरले, रूजवले.
लग्नबंधनात बांधल्या नंतरही तिने सुभाषचंद्र ना मात्र आपल्या प्रेमात बांधून न ठेवता… आजाद ठेवलं.
सुभाषचंद्र जरी एक सैनिक, एक योद्धा, एक कूटनीतिचा महारथी होते तरीही… या सगळ्याच्या आंत/आड आणखी एक सुभाष आहे… हे एमिली ने ओळखलं होतं. आणि फक्त त्या मौन स्नेहातलं एक आगळं-वेगळं प्रेम, ते जपणं तिनं ओळखलं. त्यामुळे च तर… १२ वर्षांच्या लग्नाच्या आयुष्यात फक्त ३ वर्षे सहवास लाभला तरीही एमिली ने हे… दुराव्यातलं दृढ नातं ही जपलं! कधीच दुरावू दिलं नाही. सुभाषबाबू आणि तिच्यातलं हे अनोखे, गुप्ततेतले पती-पत्नीचं नातं, हे स्नेहबंध… ख-या अर्थाने बद्ध झाले ते… सुभाषबाबूंनी विविध ठिकाणाहून एमिली ला पाठवलेल्या पत्रांमध्ये! ही पत्रे त्यांच्या मर्मबंधातली ठेव बनली.
पण ही पत्रे… प्रेम पत्रे होती कां? की दोन जीवांचं तादात्म्य पावणं? एकमेकांसाठी संबल… सहयोगी, आधार, ख-या अर्थाने, सहचर बनंत, दूर राहूनही एकमेकांना भेटणं, जपंत रहाणं होतं ते! नात्यातील संबोधने सुद्धा बघा… ते फ्राऊलिन शेंकल ने सुरूवात करीत, आणि तिच्या पत्राची सुरूवात असे.. श्री बोस!!
त्यांनी एकमेकांना लिहिलेल्या पत्रात… राजनीती, विविध पुस्तके संगीत, विनोद, आध्यात्मिकता, आणि एकमेकांच्या नाजूक तब्येतीची चौकशी… हा असे… पत्रातल्या मायन्याचा आयना!!!
सुभाष बाबूंनी एकदा आपल्या मनातलं प्रेम व्यक्त करणा-या… गोएथे या कवीच्या, कालिदासाच्या शाकुंतल मधल्या अनुवादित ओळी शोधायला सांगून… अप्रत्यक्षरित्या भावना प्रकट केल्या. त्या ओळी अशा…
क्या तुम युवा वर्ष के फूलों और उसके पतन के फूलोंको पसंद करोगे?
और वह सब जिससे आत्मा आनंदित हो, तृप्त हो…
क्या तुम स्वर्ग और पृथ्वी को एक ही नाम से मिला दोगे?
हे, शकुंतले, मैं तुम्हारा नाम लेता हूं!
बस्स्… हीच ती मनतळातली जाणीव… जिच्या बोधावर एमिली ने नंतरंचं संपूर्ण आयुष्य एक… समर्पित पत्नी, एक आदर्श माता, वृद्ध आईची काठी, लेक अनिता ची सखी, बनून स्वाभिमानाने, स्वबळावर व्यतित केलं.
एमिली ने आपल्या लेकीला… एक अतिशय बुद्धीमान आणि शैक्षणिक रूची असलेली स्त्री बनवलं. एक अर्थशास्त्रज्ञ बनली तिची लेक. विश्वविद्यालयात प्रोफेसर झाली. प्रोफेसर मार्टीन फाफ यांच्या शी विवाह बद्ध झाली.
एमिली… एक आदर्श पत्नी च नाही, तर एक आदर्श माता ही सिद्ध झाली. तिने आपल्या लेकीत… पित्याच्या नावाने मोठी न होता, स्व प्रयत्नाने आपलं आयुष्य उभं करण्याचे, आणि स्व कर्तृत्वाने मोठं होण्याचे, जगाला काहीतरी सकारात्मक देण्याचे संस्कार रूजवले!!!
अशी ही एमिली… जी एका महानायका च्या पाठीशी खंबीरपणे उभी राहिली, त्याच्या नंतर ही तितक्याच खंबीरपणे, स्वाभिमानाने, पतीच्या परिवाराकडून भारतात येण्याचा आग्रह नाकारून, एका छोट्या टेलिग्राफ ऑफिस मध्ये, कमी पगारावर नोकरी करून, वृद्ध मातेचा सांभाळ करंत, लेकीला सत्याचा सामना करणारी लढवय्यी बनवंत… शेवटच्या श्वासापर्यंत आपल्या मनातल्या नायका ची आणि जनातल्या महानायका ची मूक नायिका बनून जगली.
या मौन, मूक संवेदनेला, देश प्रेमासाठी राखरांगोळी करणा-या त्या त्यागकुंडातील राखेच्या कणातला एक भाग बनणारी ही… समिधा च ना?
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘साहित्यकारी के दांव-पेंच‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३३ ☆
☆ व्यंग्य ☆ साहित्यकारी के दांव-पेंच ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
सयानेलाल ‘साहित्यप्रेमी’ जल्दी ही साहित्य के मामले में सयाने, समझदार हो गये। कुछ दिन कविता कहानी लिखी, फिर समझ गये कि इससे कुछ ठोस हासिल होने वाला नहीं। ऊसर में खेती करना है। संपादक, प्रकाशक के चक्कर काटते रहो। कोई लेखक दूसरे को पढ़ता नहीं, पाठक पीठ देकर बैठा है। कितनी भी चिरौरी करो, कान नहीं देता।
लेकिन इस मायूसी के बीच सयानेलाल ने साहित्य में निहित मुनाफे की संभावनाओं को खोज लिया। लिखने से भले कुछ न मिले, साहित्य-सेवा के और भी आयाम हैं जो फलदायी हो सकते हैं। ‘जिन खोजा तिन पाइयां।’ सिर्फ अक्ल दौड़ाने की ज़रूरत है। उन्होंने सोच विचार करके लेखन के बजाय सम्मान-विमोचन का तुरत फल देने वाला धंधा शुरू कर दिया। अब दस-बीस लेखक उनके चक्कर लगाते रहते हैं, दिन भर फोन आते हैं— ‘बड़े भैया, दो साल से सम्मान नहीं हुआ। कब तक सबर करें? एक बार तो करा दो।’
जल्दी ही सयानेलाल पूरे प्रदेश में सम्मान-विमोचन के विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो गये। अब साल में तीन चार सम्मान कार्यक्रम हो ही जाते हैं। हर कार्यक्रम में कवि-लेखक परिवार और इष्ट-मित्रों सहित पहुंचते हैं। मेले का माहौल बन जाता है। कई सम्मानित भावुक होकर परिवार से लिपटकर रोते हुए दिखायी पड़ते हैं।
सयानेलाल जी की पॉलिसी बिल्कुल साफ है। सम्मान-विमोचन का पूरा खर्चा लेखक को उठाना पड़ेगा। खर्चे की रकम और हिसाब सयाने लाल जी के पास रहेंगे। हिसाब पूछने की मुमानियत है। जो पूछे उससे आंखें तरेरकर कहते हैं, ‘हिसाब मांगना है तो अब आगे सम्मान कराने के लिए हमारे पास मत आना। दो ठो दोहे लिखे नहीं कि सम्मान की लाइन में लग गये।’ सम्मानित सिकुड़ जाता है, दांत निकाल कर कहता है— ‘रहने दीजिए। गुस्सा मत होइए। हमने तो वैसइ पूछ लिया था।’ ज़ाहिर है खर्चे में से सयानेलाल पर्याप्त सेवा-शुल्क बचा लेते हैं।
सयानेलाल पर दबाव सिर्फ विमोचन और सम्मान के लिए ही नहीं होता, उनके कार्यक्रमों में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए भी होता है। कुर्सी-प्रेमी अनेक लोग अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए कुछ ‘त्याग’ करने को भी तैयार हो जाते हैं।
एक दिन सयानेलाल नगर के जाने-माने विद्वान डॉक्टर त्रिपाठी के पास पहुंचे। चरण छूकर बोले, ‘आदरणीय,16 तारीख को बीस पच्चीस लेखकों का सम्मान करना है। आप कृपा करके कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार कर लें तो कार्यक्रम में चार चांद लग जाएंगे।’ त्रिपाठी जी भले आदमी थे। राज़ी हो गये। बोले, ‘वाहन की व्यवस्था कर देना। मैं आ जाऊंगा।’
सयानेलाल जी पुन: चरण छूकर खुशी खुशी विदा हुए।
कार्यक्रम से तीन दिन पहले अचानक वे फिर त्रिपाठी जी के घर उपस्थित हुए। बड़ी देर तक बैठे उंगलियां मरोड़ते रहे, जैसे किसी असमंजस में हों। थोड़ी देर में बोले, ‘आदरणीय, बड़े धर्मसंकट में हूं। कैसे कहूं? आप विकल जी को जानते होंगे। कविता लिखते हैं। वे पीछे पड़ गये हैं कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता का मौका उनको दूं। दरअसल वे अगले महीने बेटी के पास बंबई जा रहे हैं। कह रहे थे पता नहीं कब लौटना हो, इसलिए मेरे मार्फत आपसे प्रार्थना की है कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्हें कर लेने दें। कहा है कि इस कृपा के लिए आपके बहुत आभारी होंगे। लेकिन मेरे लिए यह बड़े संकट की बात है।’
त्रिपाठी जी ठहरे सज्जन व्यक्ति। तुरंत बोले, ‘ठीक है। वे ही अध्यक्षता करें। क्या फर्क पड़ता है?’
सयाने जी चेहरे पर पश्चात्ताप का भाव पहने बाहर निकले, लेकिन स्कूटर पर बैठते ही उनका भाव बदला और वे मुस्कराते हुए आगे बढ़ गये।
दूसरे दिन त्रिपाठी जी के पास नगर के साहित्यकारों में ‘नारद’ की उपाधि पाये ‘बेदर्द’ जी का फोन आ गया। पूछने लगे, ‘सुना है आप सयाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता नहीं कर रहे हैं?’ त्रिपाठी जी ने पूरी जानकारी दी तो ‘बेदर्द’ जी बोले, ‘सयानेलाल बहुत काइंयां है और आप बहुत भोले हैं। विकल जी बड़े प्रचार-प्रेमी हैं। उन्होंने अध्यक्षता के लिए सयाने को ग्यारह हज़ार रुपये का वादा किया है। वे अपने साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर बीस पच्चीस श्रोता भी लाएंगे। साथ ही वे सभी श्रोताओं की चाय का खर्चा भी उठाएंगे। यह सब मुझे खुद सयानेलाल ने बताया। वह विकल जी को बुलाकर बहुत खुश है। आप आजकल की साहित्यकारी के लटके झटके से वाकिफ़ नहीं हैं।’
त्रिपाठी जी हंसकर बोले, ‘ठीक कहते हो, भैया। यह आजकल की साहित्यकारी समझना हम जैसे अनाड़ियों के बस का नहीं है।’
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कसौटी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १०४ — कसौटी —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
ईश्वरीय कसौटी की एक अद्भुत कहानी है। सम्राट अनादिकाल से जन्म लेता आया है और उसी अनुपात से उसकी मृत्यु होती रही है। उसके जन्म और मृत्यु के इस परिवेश में देखा तो यही जाता है आधा संसार ही उसकी जीत में आता है और आधा उसकी जीत से मुक्त रह जाता है। शेष आधे की जीत उसके वश में हो भी नहीं सकती। यह ईश्वरीय है। ईश्वर उसे आधा ही ताज पहनाता है और आधा पहनाये बिना उसे बुला लेता है।