(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – स्वर्ण चंपा।)
“यह कैसी पूजा बताया है आपने? यह पुष्प मुझे कहाँ मिलेगा?”
“ऐसा करिए आप फोन करके गौरी को ही बता दीजिए, गौरी जरूर ला देगी। ठीक है मैं बता देता हूं और पूजा की विधि शुरू करते हैं।”
“यह पुष्प देवी को चढ़ाने से सारी व्यथाएं दूर हो जाती हैं”, पंडित जी ने कहा।
गौरी की माता कमला जी ने कहा- “अरे! पंडित जी आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए आए हैं?”
“आपने तो हमारी मुश्किल बढ़ा दी। अब मैं यह कहाँ से लाऊंगी? साधारण चंपा के पुष्प तो लाकर रख हैं, गुड़हल का पुष्प हम देवी को चढाते हैं।”
“आप हमेशा नई-नई विधियां बता कर मुझे हैरान करते हो।”
गौरी को पंडित जी ने फोन लगाकर पुष्प के बारे में बताया और लाने के लिए कहा।
गौरी ने कहा- “ठीक है पंडित जी चिंता मत करिए। ऑनलाइन बहुत सारे ऐप है ऑर्डर कर दिया है आप पूजा करते रहिए। मैं समय से पुष्प लेकर घर पहुंच जाऊंगी।”
सफेद गोरा रंग गौरी का था और उसने पीली साड़ी पहन रखी थी एकदम साक्षात वह स्वयं स्वर्ण चंपा लग रही थी।पुष्प की सुगंध और गौरी को देखकर संपूर्ण मंदिर ऊर्जा मान हो रहा था।
जय माँ अंबे गौरी की आरती गूंज रही थी मंदिर में।
माताजी भी प्रसन्न थी उनकी बिटिया रानी हर मुश्किल में मां का साथ देती है। स्वर्ण चंपा पुष्प आज देखकर वह प्रसन्न थी और मंदिर में सभी श्रद्धालु ने भी पहली बार इस पुष्प के दर्शन किए थे।
पंडित जी ने ढेर सारा आशीर्वाद दिया और कहा तुम्हारे घर में ही साक्षात लक्ष्मी के रूप में गौरी बिटिया है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२५ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २५ ☆ आचार्य भगवत दुबे
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक समसामयिक विषय पर आलेख – “~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८७ ☆
आलेख ~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
फेसबुक एक ऐसे विचार से शुरू हुआ था जिसमें कुछ युवा अपने विश्वविद्यालय परिसर में आपस में जुड़ने का सरल तरीका खोज रहे थे। समय के साथ वही विचार इतना विशाल रूप ले चुका है कि दुनिया के लगभग हर कोने में लोग दिन की शुरुआत और बिस्तर पर दिन का अंत इसी मंच की खिड़की पर झांककर करते हैं। इसकी शुरुआत दो हजार चार में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई थी और धीरे धीरे इंटरनेट से आज फेसबुक सीमित दायरे वाले कॉलेज नेटवर्क से निकलकर वैश्विक मंच बन गया है। इस यात्रा में इसके संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे और आज भी कंपनी का नियंत्रण मुख्य रूप से उनके हाथ में ही है। बाद में कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा प्लेटफार्म्स कर लिया, जबकि फेसबुक उसी नाम से अपनी सेवाएं देता रहा।
फेसबुक की सबसे बड़ी सफलता उसका फैलाव है। यह केवल परिचितों से संपर्क बनाए रखने का साधन नहीं रहा, बल्कि विचार, अनुभव, समाचार, कला, व्यापार, जनमत और मनोरंजन का ऐसा सम्मिलित मंच बन चुका है जिसकी तुलना किसी अन्य माध्यम से करना कठिन है। इसके उपयोगकर्ता दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में हैं और हर दिन अरबों पोस्ट, फोटो, वीडियो और संदेश यहां पर साझा होते हैं। लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं, समूह बनाते हैं, समुदायों से जुड़ते हैं, खरीद फरोख्त करते हैं, विज्ञापन चलाते हैं और अपनी पहचान को मजबूत करते हैं। यही व्यापकता इसे आज के दौर में सबसे प्रभावी डिजिटल मंचों में शामिल करती है।
फेसबुक के आर्थिक ढांचे की रीढ़ विज्ञापन है। इसका लगभग पूरा राजस्व इसी पर आधारित है। फेसबुक उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और रुचियों को समझकर विज्ञापनदाताओं को ऐसा मंच देता है जहां वे लक्षित दर्शकों तक सीधे पहुंच सकते हैं। इस सटीकता ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया है। धीरे धीरे कंपनी ने कंटेंट निर्माताओं के लिए भी अवसर खोले हैं। पेशेवर मोड, वीडियो मोनेटाइजेशन, पेड सदस्यता जैसे कई साधन उपयोगकर्ताओं को सीधे कमाई का अवसर दे रहे हैं। इस तरह फेसबुक एक साधारण सोशल नेटवर्क से विकसित होकर एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है।
फेसबुक का उपयोग समझदारी और सावधानी से किया जाए तो यह उपयोगकर्ता को अत्यंत लाभ पहुंचा सकता है। गोपनीयता सेटिंग्स की समय समय पर जांच, निजी जानकारी साझा करने में संयम, उपयोगी समूहों और पृष्ठों से जुड़ाव, संतुलित समय प्रबंधन और स्वस्थ संवाद की आदत इसे सकारात्मक अनुभव बना सकती है। जो लोग रचनात्मक हैं और नियमित रूप से लेख, फोटो या वीडियो साझा करते हैं, उनके लिए यह अपनी पहचान बनाने और लोगों तक पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी मोबाइल एप है। इसे कंप्यूटर पर भी उसी सरलता से चलाया जा सकता है, किसी तरह के व्यक्तिगत डेटा स्टोरेज की अलग से आवश्यकता नहीं होती। निजी व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए तो अब फेसबुक आधुनिक ऑनलाइन बाजार का अनिवार्य उपकरण बन चुका है।
भविष्य की दिशा में फेसबुक और उसकी मूल कंपनी मेटा नई संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है। आभासी और संवर्धित वास्तविकता के माध्यम से वे एक ऐसे डिजिटल जगत की कल्पना कर रहे हैं जिसमें लोग एक दूसरे से केवल संवाद ही नहीं करेंगे बल्कि एक साझा आभासी संसार में चल फिर सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए प्रयोग भी इस अनुभव को और उन्नत बनाने की ओर अग्रसर हैं। यह सब सफल हुआ तो सोशल कनेक्शन, मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के बिल्कुल नए स्वरूप सामने आ सकते हैं।
फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। गलत सूचना, गोपनीयता का जोखिम, अत्यधिक स्क्रीन समय से आँखें खराब होना ,सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल निर्भरता जैसे पहलू चिंता का विषय बने रहते हैं। इस कारण फेसबुक की उपयोगिता तभी अर्थपूर्ण है जब इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। एक ओर यह अवसरों की दुनिया खोलता है, दूसरी ओर यह अपने साथ अपेक्षित सतर्कता भी मांगता है।
समग्र रूप से फेसबुक आधुनिक समाज का ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें पूरी दुनिया एक साथ दिखाई देती है। यह लोगों को जोड़ता है, विचारों को दिशा देता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों के नए मार्ग खोलता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि हर तकनीक उतनी ही उपयोगी है जितनी समझदारी से हम उसका उपयोग करें।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण गीत “हो सके तो स्वार्थ…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५४ ☆ देश-परदेश – शहर बसा नहीं और चोर पहले आ गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आज के समाचार पत्र में उपरोक्त ख़बर पढ़ी, तो मन में ऊपर लिखी पुरानी किंवदंती याद आ गई हैं। विगत माह सरकार ने दरियादिली दिखाते हुए स्वास्थ बीमा से जी एस टी शुल्क जो कि 18% है, हटाने का ऐलान कर दिया। सब तरफ खुशी की लहर फैल गई, आमजन ने खुशियों मनाते हुए खूब मिठाइयां भी खाई। उनमें से इस कारण से कुछ का तो पेट भी खराब हो गया था।
बीमा कमानियों को अपने ग्राहकों की ये खुशी देखी नहीं गई। इसलिए प्रदूषण को बैसाखी बना कर उन्होंने पॉलिसी की मूल्य वृद्धि करने का निर्णय भी समय रहते ले डाला हैं। अंग्रेज़ी में इसी को “प्रो एक्टिव” भी कहते हैं।
इस पूरे गणित में उपभोक्ता को कोई हानि नहीं हुई, सरकार को जी एस टी से मिलने वाली राशि शून्य हो गई, बीमा कंपनियों की आय में पंद्रह प्रतिशत वृद्धि हो जाएगी। ग्राहक और कंपनियां दोनो खुश।
सबसे अधिक नुकसान तो ग्रुप पॉलिसी वालों का होगा। जी एस टी शुल्क पूर्व के सामान लागू रहेगा, ऊपर से 15% की बढ़ी हुई प्रीमियम दरों से ही बीमा पॉलिसी मिलेगी।
बड़े व्यापारिक घराने, कॉरपोरेट्स से लेकर छोटे व्यापारी तक मौके पर चौका लगा ही लेते हैं।
☆ माझी जडणघडण… आबा – भाग – ६५ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆
(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)
आबा
आयुष्यातले मनावरचे काही काळांचे ठसे सहजासहजी मिटत नाहीत. माझे सासरे ज्यांना आम्ही “आबा” म्हणत असू ते तसे शांत आणि गंभीर प्रवृत्तीचे होते. त्याचबरोबर ते करारी, ध्येयवादी होते. आमच्या कुटुंबात त्यांचा शब्द शेवटचा असायचा. सहसा कोणीही त्यांच्या विरोधात जात नसत. किंबहुना त्यांच्या विरोधात जाण्याचे धाडसही कोणात नव्हते. शिवाय “आबा” जे सांगतील, जे करतील ते सर्वांच्याच हिताचे आणि भल्याचेच असते अशीही एक मनोधारणा कुटुंबातल्या प्रत्येक सदस्याची होती. या पार्श्वभूमीवर आई आबांच्या सहजीवनाचा माझ्या मनात नेहमीच विचार येत असे. खरं म्हणजे आई सुद्धा तशा आबांच्या आज्ञेबाहेर नसतच. शिवाय घरातल्या कुणाही कडून आबांना न आवडणारे वर्तन, वागणं मुळीसुद्धा घडू नये म्हणून त्या फारच सावध असायच्या. “आटपा रे बाबांनो! काय पसारा घालून ठेवलाय आणि जरा हळू आवाजात बोला. आबा आल्यावर त्यांना कळलं तर रागे भरतील बरं? ” आणि खरोखरच आबांच्या सायकलच्या घंटीचा पुढच्या दालनात आवाज आला की घराच्या आतल्या भागात प्रचंड धावपळ सुरू व्हायची. सर्वात प्रथम आमचा मदतनीस आणि अत्यंत एकनिष्ठ, स्वामीनिष्ठ असलेला एकनाथ धावायचा. आबांची सायकल जागेवर लावायची, त्यांच्या हातातलं सामान धरायचं, त्यांनी काढलेली टोपी कोट खुंटीला व्यवस्थित लटकवायची वगैरे वगैरे एकनाथ तत्परतेने करायचा.
पादत्राणं काढून रांगेत ठेवून आबा धोतराचा सोगा सांभाळत न्हाणीघरात हातपाय धुवायला जात. पुढचं दालन ते न्हाणीघर १००/१५०पावलांचा रस्ता नक्कीच असेल. शिवाय दोन वेळा पायऱ्यांचा चढउतार. जवळपास माझ्या नणंदा नयना, वसुंधरा असतच. त्यापैकी कोणीतरी तत्परतेने आबांच्या हातात नॅपकिन ठेवत. या वेळी आबांचं एकच वाक्य ठरलेलं. ”माई कुठाय? ”
हात तोंड पुसून ते पुन्हा बैठकीच्या खोलीत, तिथे असलेल्या स्वच्छ पांढऱ्या बिनसुरकुतीची ताठ चादर घातलेल्या भारतीय बैठकीवर आराम करण्यासाठी विसावत. त्यांच्या लगोलगच आई थंडगार पाण्याचा स्वच्छ तांब्या- पेला घेऊन बैठकीत जात आणि दिवसभर काय काय घडलं त्याचा वृत्तांत हळूहळू आबा तिथे बसून आईंना सांगत पण त्यातही मला एक गंमत वाटायची की आबा घरात नसताना घरातलं राज्य आईंचं असायचं. जबरदस्त टिपेच्या आवाजात आई सर्वांना म्हणजे घरातल्या काम करणाऱ्या मदतनीस बायांपासून मुला-मुलींपर्यंत (अर्थात नंतर सून म्हणून मीही त्यात असायचीच) सूचना देत असत. ते सारे चित्र आबा घरात असले किंवा बाहेरून घरी आले की पालटलेलं असायचं. आता मात्र या कौटुंबिक राज्याची सारी सूत्रं आबांच्या हाती. म्हणजे आई सुद्धा प्रजाच. आणि बैठकीत आईआबांचा होणारा संवाद पुष्कळवेळा आतल्या खांबाला कान लावून इतर सारे ऐकायचे. मला अशा वातावरणाची आजिबात सवय नव्हती. या घरात माझं नक्की काय होणार या विचारांबरोबर मला या सर्वांची गंमतही वाटायची. असंही कुटुंब असतं की!
विलाससह सर्वच भाऊ बहिणींनी आबांच्या विरोधात- विरोधात म्हणण्यापेक्षा असं म्हणूया की त्यांचा अनादर होईल आणि आपला उद्धटपणा ठरेल असा एकही शब्द आबा हयात असेपर्यंत कधीही उच्चारलेला मला आठवत नाही.
विलाससह ही सारी सात भावंडं. होती आणि त्यांना काही हवं नको, त्यांच्या त्या वेळच्या विश्वातल्या काही मागण्या, अडचणी दूर करायची वेळ आली तर ते सारं काही “आबांपर्यंत” फक्त आईंच्या माध्यमातून पोहोचायचं. आई हे खालचं कोर्ट होतं आणि आबा म्हणजे हायकोर्ट. खालच्या कोर्टात मान्य केलेलं प्रकरण सहसा हायकोर्टात अमान्य व्हायचं नाही हे विशेष आणि यदाकदाचित झालंच तर पुन्हा अपील करण्याची काही राखीव शस्त्रं आईंकडे असत.
कधीकधी “नरोवा कुंजरोवा” या भूमिकेत मोठा “दादा” म्हणून विलासही बऱ्याच वेळा धाकट्या भावंडांची मने मोडू नयेत म्हणून वेगळ्या मार्गाने काही युक्त्या यशस्वीपणे पार पाडत असे. उदाहरणार्थ माझा दीर सुहास कधीकधी मित्रांबरोबर बाहेर जात असे आणि रात्री उशिरा घरी येत असे. जाताना तो फक्त दादाला (विलासला) सांगून जात असे. तेव्हा विलास आबांच्या नकळत त्याची घरी यायची वेळ झाली की दाराची कडी हळूच काढून ठेवत असे जेणे करून आबांना तो गेला आला काहीच समजत नसे. पण हा सगळा गमतीचा, शिस्तीचा, कधीकधी लपवाछपवीचा भाग सोडला तरी हा सारा एकमेकांच्या अंतःकरणातल्या प्रेमाचाच मामला होता.
आपण ज्याला कुटुंब पद्धती, जीवन पद्धती, जडणघडण, संस्कार म्हणतो ते तुम्ही ज्या गावात, ज्या वातावरणात, ज्या परिस्थितीत वाढत असता, घडत असता त्यावरच अवलंबून असतं. त्यासाठी चांगलं वाईट असं काहीच मोजमाप नसतं किंवा हे चांगलं हे वाईट, हे बरोबर ते चूक असं नाही म्हणता येत. नाही ठरवता येत.
खूप वेळा मला आबांच्यात आणि माझे पाश्चात्त्य संस्कृतीचा पगडा असलेले आजोबा(भाई) यांच्यात काही मूलभूत साम्य वाटायचे. पराकोटीचा व्यवस्थितपणा, स्वच्छता, टापटीप, मोजकं पण अर्थपूर्ण बोलणं या बाह्यबाबीं व्यतिरिक्तही त्यांच्यातल्या व्यावहारिक विचार धोरणातही मला साम्य वाटायचं. अधीरता आणि उतावळेपणाचा अभाव आणि त्यांच्या दृष्टीने त्यांनी केलेल्या भविष्याचे गांभीर्य यात मला नेहमी एकच सूर, एकच वैचारिक सूत्र जाणवायचं आणि या सगळ्यांमध्ये त्यांच्या पोटातली अपार माया लपलेली, दडलेली असली तरी ती अस्तित्वात होती याची जाणीव व्हायची. कदाचित ती अव्यक्त असेल पण वेळोवेळी ती आधारभूत ठरलेली असायची. शिवाय आबांबद्दल मी माझं वैयक्तिक मत व्यक्त करण्याचा मला अधिकार का असावा? मी तर त्यांच्या आयुष्याची मध्यान्ह उलटून गेल्यानंतरच्या आयुष्यात आले होते. एखादी व्यक्ती कळण्यासाठी त्या व्यक्तीचा गतकाळ अनुभवलेला नसला तरी परिचित तरी असायला हवा. वेळोवेळी विलास मला त्यांच्या एकेकाळच्या मोठ्या एकत्र कुटुंबाविषयी खूप सांगत असतो.
पाच भावांच्यात सर्वात धाकटे पण उच्चशिक्षित असल्यामुळे आबांनी ज्या पद्धतीने तेव्हा धडधडणाऱ्या तेल गिरण्यांचा, कापूस गिरण्यांचा (जिनिंग प्रेसींग)अवाढव्य शेतीचा डोलारा किती हुशारीने आणि सफलतेने पेलला होता आणि तेही मोठ्या भावाचे (आप्पांचे) “कर्ता करविता” हे पद सांभाळून, स्वतःकडे कसलेही अधिकार न बाळगता नि:पक्षपणे आणि निस्वार्थीपणे कुटुंबासाठी जे झटून केलं होतं त्याचा सुंदर इतिहास मला विलासमुळे अवगत होता. त्यामुळे “आबा” ही नक्कीच साधारण व्यक्ती नव्हती. कुटुंबीयांना त्यांचा अभिमान का वाटू नये? आणि या अभिमानाच्या भावनेतूनच कदाचित हा आदरणीय दुरावा असेल पण या दुराव्यातून डोकावणारा प्रेमाचा रंग मात्र नक्कीच अस्सल होता याची मी वेळोवेळी खातरजमा करत राहिले.
एक दिवस भांडारकर कुटुंबातल्याच एका सोहळ्यात एकत्र जमलेलो असताना एक ज्येष्ठ वहिनी माझ्या शेजारी येऊन बसल्या. सुरेख, रेखीव, गौरवर्णी, दागदागिन्यांनी मढलेली सौंदर्यवतीच! वेगळ्या, स्वकर्तृत्वावर रचलेल्या आमच्या सुरेख,नेटक्या, आखीव संसाराचं भरभरून कौतुकही त्यांनी केलं. भांडारकर कुटुंबाच्या वैभवशाली गतकालात त्याही बोलता बोलता रमल्या आणि नकळत म्हणाल्या “गिरण्यांचे भोंगे थांबले, मशीनची चक्र थंडावली कारण तुझ्या सासर्यांनी या कारभारातून निवृत्ती पत्करली आणि त्यानंतरच खरी घसरण सुरू झाली. त्यांनी असं करायला नको होतं. ”
हे ऐकून मी चकीत झाले पण नंतर वाटलं एक प्रकारे त्या ज्येष्ठ व्यक्तीने आबांना दोष देता देता आबांच्या कार्यावर नकळतच “तुम्ही नाही तर कोणीच नाही” असा गुणांकित शिक्काच नाही का मारला? मला वैषम्य वाटण्यापेक्षा त्या क्षणी आबांविषयी अभिमानच वाटला.
आता प्रश्न उरतो तो हा की,” त्या ज्येष्ठ व्यक्ती असं का म्हणाल्या? ”
विलासलाच विचारावं पण त्याआधी हा संवाद त्याला सांगावा लागेल मग ती मनं कलुषित करणारी आगळिक नाही का ठरणार? आणि हे ऐकून तो नक्की कसा रीअॅक्ट होईल?
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अधिनायक वादी प्रजातंत्र…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५९ – अधिनायक वादी प्रजातंत्र
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “नदी एक दूध की...”)