हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०६ – कथा कहानी – पारो दादी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – पारो दादी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०६ – कथा कहानी – पारो दादी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बरगद का वह बूढ़ा पेड़ गाँव के उस इकलौते सरकारी दफ्तर जैसा था, जिसकी जटाएँ ज़मीन छूने को बेताब थीं, पर फाइलें कभी आगे नहीं बढ़ती थीं। पारो दादी उसी पेड़ के चबूतरे पर जमी थीं। उनके माथे पर खिंची झुर्रियों का नक्शा भारत सरकार के किसी अधूरे हाइवे जैसा था, गड्ढे ही गड्ढे, पर टोल टैक्स हर सांस को चुकाना पड़ रहा था। उनके हाथ में थमी वह डायरी किसी परमाणु बम के रिमोट कंट्रोल की तरह रहस्यमयी लग रही थी, जिस पर गाँव भर की नजरें टिकी थीं।

गाँव के चौराहे पर बैठे ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के वीसी यानी रामखिलावन ने बीड़ी का कश खींचते हुए कहा, “अरे भाई, बूढ़ी इस उम्र में इतिहास लिख रही है या भूगोल? कहीं अपनी दो बीघा जमीन सरकार के ‘स्मार्ट सिटी’ प्रोजेक्ट के नाम तो नहीं कर रही?” हमारे देश में जब तक कोई मर न जाए, लोग उसके जीने की वजह ढूंढते रहते हैं। लोग तंज कस रहे थे, और दादी अपनी टूटी रीढ़ की हड्डी को सीधा करने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

उनका बेटा? अरे, वह तो देश की जीडीपी बढ़ा रहा था। बैंगलोर के किसी शीशे वाले कॉर्पोरेट पिंजरे में बैठकर ‘वर्क फ्रॉम होम’ करता था। विडंबना देखिए, जो बेटा अपनी कंपनी की वेबसाइट पर चौबीस घंटे ‘वी आर अवेलेबल फॉर यू’ का पॉप-अप लाइव रखता था, वह अपनी माँ की आखिरी सांसों के लिए हमेशा ‘नॉट रीचेबल’ रहता था। महीने की एक तारीख को उसके अकाउंट से दादी के खाते में जो ‘पेंशन रूपी खैरात’ गिरती थी, उसका मैसेज आते ही दादी का पुराना नोकिया फोन ऐसे थरथराता था मानो कह रहा हो, “लो, इस महीने भी बेटे ने अपनी जिम्मेदारी का कफ़न खरीद लिया।”

बगल में रखा मिट्टी का घड़ा किसी ईमानदार अफसर की कुर्सी की तरह खाली और सूखा था। चारों तरफ खिले वो रंग-बिरंगे फूल इस बात का तीखा उपहास उड़ा रहे थे कि बाहर चाहे कितनी भी बहार आ जाए, अगर अंदर का आंगन बंजर हो, तो हर रंग बेगाना लगता है। दीये की वह कांपती हुई लौ किसी मिडिल क्लास आदमी की बची हुई सेविंग्स जैसी थी, जो कभी भी बुझ सकती थी। दादी की कलम कागज़ पर ऐसे रेंग रही थी, मानो कोई अंधा आदमी अंधेरी रात में अपनी खोई हुई लाठी ढूंढ रहा हो। रहस्य का मीटर सौ की स्पीड पार कर चुका था। आखिर क्या था उस डायरी में? क्या वह कोई ऐसा सच उगलने वाली थीं जिससे बड़े-बड़े रसूखदारों के मुखौटे उतर जाएं?

तभी धूल के गुबार को चीरती हुई एक चमचमाती सफारी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक युवा लड़का उतरा, जिसके गले में लाखों का कैमरा लटका था। वह ‘रूरल इंडिया’ की कंगाली बेचकर यूट्यूब पर व्यूज बटोरने वाला आधुनिक ‘डिजिटल भिखारी’ था। उसने रील्स बनाने के लिए दादी के करीब जाकर कैमरा ऑन किया और एकदम इमोशनल टोन में पूछा, “अरे दादी माँ! इस डिजिटल युग में यह कागज़-कलम? क्या आप समाज की इस बेरुखी पर कोई तीखा व्यंग्य लिख रही हैं? क्या आपका बेटा आपको प्रताड़ित करता है? बताइए दादी, आज आपका यह वीडियो ट्रेंडिंग में नंबर वन जाएगा!”

दादी ने अपनी पथराई आँखों से उस लड़के को देखा। उनकी आँखों में कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक ऐसा सन्नाटा था जो कैमरे के लेंस को भी पिघला दे। उन्होंने अपनी डायरी बंद की, उसे लड़के की तरफ बढ़ाया, और उनके सिर से पल्लू ऐसे सरक गया जैसे किसी मंदिर का पर्दा अचानक हट गया हो। उसी पल दादी की गर्दन एक तरफ झुक गई। उनकी आत्मा उस कॉर्पोरेट दुनिया को लात मारकर इस शरीर से ‘अर्ली एग्जिट’ ले चुकी थी।

लड़के ने कांपते हाथों से कैमरे को ऑन रखते हुए डायरी का पहला पन्ना पलटा। उसे लगा कि अंदर ‘मदर्स डे’ पर कोई तगड़ी स्क्रिप्ट मिलेगी जिससे लाखों लाइक्स मिलेंगे। लेकिन पन्ने पर जो लिखा था, उसने उसके कैमरे का सारा ऑटो-फोकस बिगाड़ दिया।

पूरी डायरी के हर पन्ने पर, हर लाइन में, केवल एक ही वाक्य बार-बार लिखा हुआ था, “मेरे बेटे की कंपनी वाले उसे छुट्टी नहीं देते, वह बहुत बड़ा आदमी बन गया है। उसकी कोई गलती नहीं है। हे भगवान, इस डायरी को सरकारी रिकॉर्ड में मत डालना, वरना मेरे बेटे की नौकरी चली जाएगी।” और आज की तारीख वाले आखिरी पन्ने पर स्याही से कम, पानी से ज्यादा लिखा था—”आज मैंने अपनी आखिरी सांस भी उसके नाम ट्रांसफर कर दी है, अब वह चैन से मीटिंग कर सकेगा।”

लड़के का कैमरा उसके हाथ से छूटकर उसी धूल में गिर गया जहाँ दादी के नंगे पैर टिके थे। जो लड़का दुनिया को रोता हुआ दिखाकर अपनी दुकान चलाता था, आज उसकी अपनी आह भी हलक में फंस गई थी। पूरी प्रकृति इस आधुनिक विकास पर थू-थू कर रही थी। एक माँ ने मरते-मरते भी उस ‘सिस्टम’ और ‘बेटे’ का बीमा कर दिया था, जिसने उसे जीते जी एक लावारिस लाश बना दिया था। वाह रे आधुनिक समाज, और धन्य है वह माँ जो अपने हत्यारे को ही कफ़न का कपड़ा तोहफे में दे गई!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५७ – लघुकथा – फरिश्ता ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५७ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ फरिश्ता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बेशर्म गर्मी को इतनी भी शर्म नहीं कि किसी की रोजी-रोटी और पेट पर लात मार न दे। रोड के किनारे पड़ी मौरंग की बोरियों को तीसरे माले तक ले जा रहे अचल का पसीना सिर से एड़ी की तरफ उतर रहा था। इतनी गर्मी में बेचारे अचल को लगातार चलना ही पड़ रहा था। और चले भी क्यों नहीं। घर के लिए तेल- नमक का जुगाड़ करने के साथ साथ, छोटे बेटे सोमेश के दवाई के लिए पैसे का इंतजाम करना उसकी मजबूरी थी।

आज अचल जब घर से चला, तो सोमेश ने धीरे से कहा था बाबूजी ! आज जल्दी घर आना। मुझे आज किसी डॉक्टर के पास जरूर ले चलो। सोमेश की ये बातें अचल के मजबूर कानों में बार-बार गूंज रही थी।

डॉ. प्रवीण अपने निर्माणाधीन कोठी को देखने के लिए आए हुए थे। सारे मिस्त्री मजदूर उनके पास जमा हो गए थे। शायद आज डॉ. प्रवीण में मजदूरों के लिए कोका कोला वाला कोल्ड ड्रिंक का इंतजाम करके लाए थे। इस प्रकार चिलचिलाती गर्मी में इस कोठी के मालिक ने अपने मजदूरों के लिए कुछ राहत का इंतजाम किया था।

सारे मजदूर ठंडी कोल्ड ड्रिंक का मजा ले रहे थे। ठीक उसी वक्त अचल धूप में किनारे खड़ा चंदन के फोन से अपने बेटे सोमेश से बातें कर रहा था। बात करते-करते वह रो पड़ा।

बेटा मैं अभी आता हूँ, मेरे लाल ! अब मत रोवो, मैं आ ही रहा हूँ।

ऐसा कहते हुए उसने छोटे वाले की पैड फोन को अचल को चंदन को पकड़ाते हुए कहा। भाई चंदन! मैं घर जा रहा हूँ। मेरे बेटे की तबीयत बहुत खराब है। अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है। तुम्हारे जेब में क्या दो – तीन सौ रूपये पड़े हैं। यदि पड़े हो तो भईया मुझे दे दो। मैं मेहनत मजदूरी करके मय ब्याज तुमको चुकता कर दूंगा। मुझे अपने भैया को डॉक्टर से दिखाना जरूरी है।

चंदन ने जब अपना जेब टटोला तो मुश्किल से उसकी जेब में डेढ -पौने दो सौ रुपए पड़े थे। उसने उन रूपयो को अचल को पकड़ाते हुए, कहां भाई यह पकड़ो, आज भईया को हर हाल में डॉक्टर के पास ले जाओ। अचल के चेहरे की रंगत बदल गयी, थोड़ी सी खुशी तो चेहरे पर झलक पड़ी थी।

उसने सुपरवाइजर राकेश से घर जाने के लिए छुट्टी मांगी। एकाएक एक कड़कती आवाज में सबका ध्यान उसकी तरफ खींच लिया।

कहाँ बे कहाँ जाएगा ?

तुम्हें कहीं नहीं जाना है, शाम को जाना है ?

मुझे इससे लेना देना नहीं कि तुम्हारा बेटा बीमार है या मर..%%

अचल को जैसे लकवा मार गया हो, वह भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। सारे मजदूर उसकी तरफ दौड़े।

डॉ. प्रवीण दूर से इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। उन्होंने अचल और चंदन की बात को भी सुन लिया था। उन्हें इस बात का पता भी लग गया था कि सुपरवाइजर तेज आवाज में सिर्फ इसलिए बोल रहा है की मालिक डॉक्टर प्रवीण यह जान जाए कि वह अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरुक है।

डॉ. प्रवीण अचल की ओर बढ़े। बड़े ही प्रेम से बिना इस बात की फिक्र किया कि उनके कपड़े गंदे हो जाएंगे, उन्होंने अचल को अपनी बाहों में उठा लिया और बोले चाचा! आप बिल्कुल परेशान न हो। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको आपके घर ले चलता हूँ। मैं आपके बच्चे को ले आऊंगा और आपके बच्चे का इलाज कोई दूसरा नहीं करेगा, मैं स्वयं करूंगा। रूपए पैसे की चिंता बिल्कुल छोड़िए और आपने ये जो थोड़े से पैसे उस लड़के से उधार लिए है उसे वापस कर दीजिए।

ऐसा कहते हुए डॉ.प्रवीण ने अचल को अपनी कार में बैठाया, और अचल के घर की तरफ चल दिए।

कुछ ही घंटे बाद अचल का बेटा सोमेश डॉ प्रवीण की क्लीनिक पहुंच चुका था। उसने दवा खा ली थी। उसका बुखार उतर गया था। ए सी की ठंडी ठंडी हवाएं, उसके बदन को राहत पहुंचा रही थी। अचल स्तब्ध होकर डॉ प्रवीण को निहार रहा था। वह उन्हें ऐसे देख रहा था कि मानो कोई फरिश्ता उसके सामने बैठा हो।

डॉ. प्रवीण भी सामने बैठे अचल को एकटक निहार रहे थे। वे अतीत के उन दिनों की यादों खो गए थे, जब बचपन में वे एक बार बहुत बीमार थे। उनका भी शरीर तेज ज्वर से जल रहा था। उस समय उनके पिताजी जो नोएडा के एक छोटे से कारखाने में बतौर मजदूर काम करते थे, वे भी अपने सुपरवाइजर के डांट की परवाह किए बगैर अपने प्रवीण के लिए दोपहर में काम छोड़कर वापस घर आ गए थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक : 26-06-2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

झाँसी घाट से सतधारा घाट

नर्मदा अमरकण्टक से निकलकर डिंडोरी-मंडला से आगे बढ़कर पहाड़ों को छोड़ दो पर्वत ऋंखलाओं दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में कैमोर से आते विंध्य के पहाड़ों के समानांतर दस से बीस किलोमीटर की औसत दूरी बनाकर अरब सागर की तरफ़ कहीं उछलती-कूदती, कहीं गांभीर्यता लिए हुए, कहीं पसर के और कहीं-कहीं सिकुड़ कर बहती है। उसके अलौकिक सौंदर्य और आँचल में स्निग्ध जीवन के स्पंदन की अनुभूति के लिए पैदल यात्रा पर निकलना भाग्यशाली को नसीब होता है। यह यात्रा कुछ समय के वानप्रस्थ प्रवास द्वारा सभ्रांत मोह से मुक्ति का अभ्यास भी है। जिस नश्वर संसार को एक दिन अचानक या रोगग्रस्त होकर छोड़ना है क्यों न उस मोह को धीरे-धीरे प्रकृति के बीच नर्मदा के तटों पर बिखरे अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करते हुए छोड़ना सीख लें।

पीछे टाँगने वाले हल्के बैग में एक जींस या पैंट के साथ फ़ुल बाहों की तीन शर्ट, एक शाल, तोलिया और अंडरवेयर, साबुन तेल रखकर, वैसे तो आश्रम और धर्मशालाओं में भोजन की व्यवस्था हो जाती है फिर भी रास्ते में ज़रूरत के लिए समुचित मात्रा में खजूर, भूनी मूँगफली, भुना चना और ड्राई फ़्रूट, पानी की बोतल और एक स्टील लोटा-गिलास के साथ एक छोटा चाक़ू भी रख समर में उतर पड़े। कहीं कुछ न मिले तो परिक्रमा वासियों का मूलमंत्र “करतल भिक्षु-तरुतल वास” आज़माना जीवन का एक विलक्षण अनुभव है।

हमारा नर्मदा परिक्रमा समूह एक अनौपचारिक समूह है जो नर्मदा परिक्रमा शुरू करने के आसपास मिलता है और बिखर जाता है। हम लोग समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) के आधारभूत सिद्धांत पर अमल करते हुए स्वाभाविक रूप से एक दूसरे का ध्यान रखते हैं। समूह में सदस्यों की भूमिका सहज ही विकसित हो गई है कि कौन क्या करेगा जैसे निधि कोष बनाकर ख़र्च करने की ज़िम्मेदारी अरुण भाई की निर्धारित हो गई है, अविनाश भाई फ़ोटो खान-पींन, मुंशीलाल भाई जुगाड़ु कार्य अच्छी तरह कर लेते हैं। प्रयास भाई और मुंशीलाल भाई वरिष्ठ यात्री जगमोहन अग्रवाल का ध्यान रखते चलते हैं। जगमोहन भाई पूजा-पाठ करते हैं।

समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) की मनोवैज्ञानिक अवधारणा आपसी व्यवहार और व्यवहार पैटर्न से संबंधित है। समूह की गतिशीलता चिंता करती है कि समूह कैसे बनते हैं, उनकी संरचना क्या है और उनके कामकाज में किन प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। इस प्रकार, यह समूहों के बीच संचालित होने वाली बातचीत और भूमिका से संबंधित है। एक समूह दो या दो से अधिक लोगों से मिलकर बनता है। जो सामान्य उद्देश्य अर्थात हमारे मामले में नर्मदा परिक्रमा साझा करते हैं और स्वयं का मूल्यांकन करते हैं और सामान्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक साथ आते हैं। दूसरे शब्दों में, एक समूह उन लोगों का इकट्ठा होना है जो एक दूसरे के साथ बातचीत करते हैं; अधिकारों और दायित्वों को सदस्यों के रूप में स्वीकार करके एक समान पहचान साझा करते हैं। समूह विकास चार चरणों की एक गतिशील प्रक्रिया है। समूह कैसे विकसित होते हैं? यह एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समूह गुजरते हैं। प्रक्रिया में चार चरण शामिल हैं: गठन, तूफान, सामान्यीकरण, प्रदर्शन।

समूह के जीवन में पहला चरण एक समूह बनाने से संबंधित है। इस चरण में सदस्यों को या तो कार्य आवंटन या अन्य लाभ, जैसे स्थिति, संबद्धता, शक्ति, भूमिका आदि की तलाश होती है। इस स्तर पर सदस्य या तो किसी प्रकार की गतिविधि में संलग्न होते हैं या उदासीनता दिखाते हैं। कुछ सक्रिय, कुछ बहुत सक्रिय और कुछ उदासीन रहते हैं।

समूह में अगला चरण विगठन के लक्षण प्रदर्शित करना है। सदस्य आपस में परिचित या समान व्यक्तियों की तलाश करते हैं और स्वयं की गहन साझेदारी शुरू करके समूह के अंदर उपसमूह का निर्माण करते हैं। उपसमूह, समूह में एक भेदभाव पैदा करता है और तनाव दिखाई दे सकता है। पेयरिंग एक सामान्य घटना है। समूह को नियंत्रित करने के बारे में संघर्ष होगा।

हर समूह को परिपक्वता प्राप्त करने के लिए तूफ़ान से गुज़रना होता है। तूफ़ान के दौर में अक्सर सदस्य समूह से अलग होने की सोचने लगते हैं। समूह बिखराव का अंदेशा इसी समय अधिक होता है। हमारे समूह में भी तूफ़ान पैदा हुआ जब अरुण-अविनाश का उपसमूह अविनाश का उनके रिश्तेदार होने से बन गया, दूसरा उपसमूह जगमोहन-प्रयास का इसलिए बना कि प्रयास जगमोहन को बैग टाँगने और पैदल चलने में सहयोग कर उनके साथ चल रहे थे। समूह में हम और मुंशीलाल अकेले बचे लेकिन जब समूह में उपसमूह बनते हैं तब अकेले रह गए लोगों का स्वभाविक समूह बन जाता है। थकान और भूख की झुँझलाहट कई रूप में निकलती है। ऐसे में दो उपसमूह द्वारा मुंशीलाल पर आक्रामक होने लगे, अविनाश, प्रयास और जगमोहन कई बार उनसे तेज़ स्वर में पेश आने लगे। अविनाश भाई ने उन्हें चाय बनाने के लिए सामान निकालने में पोलीथीन की आवाज़ करने पर दो-तीन बार टोंका जबकि वे सबके लिए चाय बनाने की तैयारी कर रहे थे। प्रयास भाई ने फ़ोटो निकालते समय दो बार झिड़का। जगमोहन भाई ने समनापुर में भोजन के लिए बैठने को लेकर मुंशीलाल भाई को बुरी तरह डाँटा। तब हमने मुंशीलाल जी को शांत रहने का मशवरा दिया क्योंकि समूह बिखरने का अंदेशा उसी समय सबसे अधिक था। उपसमूह बनने पर सदस्य अपनी कुंठा अकेले पड़ गए सदस्य पर उतारने लगते हैं।

समूह के विकास का तीसरा चरण कार्य प्रदर्शन के बारे में अधिक गंभीर चिंता से चिह्नित होता है। अनौपचारिक समूह में नेतृत्व उभर कर समूह में अन्य सदस्यों को खोलना शुरू कर देते हैं। कार्य प्रदर्शन के लिए विभिन्न मानदंडों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। सदस्य अपने स्वयं के समूह और संबंधों के लिए अधिक जिम्मेदारी लेना शुरू करते हैं, एक बार यह चरण पूरा हो जाने के बाद, नेतृत्व पदानुक्रम के बारे में एक स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। समूह संरचना के ठोसकरण और समूह की पहचान और दूरदर्शिता की भावना के साथ होती है।

प्रदर्शन पूरी तरह कार्यात्मक समूह का एक चरण है जहां सदस्य खुद को एक समूह के रूप में देखते हैं और कार्य में शामिल होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति योगदान देता है, समूह की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए समूह के मानदंडों का पालन किया जाता है और सामूहिक दबाव डाला जाता है। अब समूह में एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जैसा आप अपने लिए पसंद नहीं करते, सिद्धांत का पालन होने लगता है। समूह अपने लक्ष्यों को पुनर्परिभाषित कर सकता है बाहरी वातावरण से जानकारी के प्रकाश में और उन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक स्वायत्त इच्छाशक्ति दिखाएगा तब ही समूह की दीर्घकालिक व्यवहार्यता स्थापित और पोषित हो सकती है। समूह के सदस्यों की जानकारी बहुत काम की होती है।

अनौपचारिक समूह हमेशा विजातीय (heterogeneous) ही होते हैं। अमेरिका में  Deniel Goleman के Emotional Intelligence सिद्धांत प्रतिपादन उपरांत “व्यवहार-विज्ञान” से समूह गतिशीलता पर अनेकों खोज, सर्वे और अनुसंधान हुए तदानुसार मुख्यतः चार प्रकार के व्यवहार पहचाने गए।

मौलिक व्यवहार (Natural Behaviour)

अंगिकृत व्यवहार (Adopted Behaviour)

पारदर्शी व्यवहार (Transparent Behaviour)

नकारात्मक व्यवहार (Negative Behaviour)

दिल में अंदर कुछ है लेकिन कुछ और प्रदर्शित किया जा रहा है। एक ग़ज़ल के मुखड़े से इसे समझ सकते हैं।

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो।

*

ओंठों पे हँसी आँखों में नमी

क्या हाल है क्या दिखा रहे हो।

यह अंगिकृत व्यवहार है, जिसे हम से हर कोई बैंक या आफिस पहुँचते ही ओढ़ लेते हैं। अकसर लोग अंगिकृत व्यवहार के आदी हो जाते हैं, सेवनिवृत्ति के बाद भी अपने स्वभाविक व्यवहार में नहीं आते। स्वभाविक व्यवहार में आने के लिए दोस्तों की खुली महफ़िल दरकार होती है और जब उसमें गांधी-सावरकर जैसे विवाद बीच में आ जाते हैं तब दोनों तरफ़ से नकारात्मक व्यवहार शुरू होता है, एक चुप नकारात्मकता के साथ बातचीत स्थगित हो जाती है। जगमोहन भाई और अरुण भाई के व्यवहार  पारदर्शी स्वभाव के उदाहरण हैं, जो दिमाग़ में होता है वह सहजता से प्रदर्शित करते हैं। इससे बचना समूह के अच्छे परिचालन के पक्ष में होशियारी होगी। दो यात्राओं में सदस्यों के आधारभूत व्यक्तित्व ज्ञात हो गए हैं अब समूह मज़बूती ग्रहण करेगा। इसकी क्या गारंटी है कि किसी सदस्य की जगह कोई नया आएगा वह इनसे अच्छा होगा। समूह में अच्छा या बुरा होता भी नहीं है। हर व्यक्ति कुछ विलक्षणता और कुछ ख़ामियाँ जन्मजात लिए होता है, पाँच साल की उम्र तक इदम (Id) में और 18 साल की उम्र तक अहम (Ego) में विकसित होते हैं, जिन्हें बाद में बदला नहीं जा सकता है। अतः मनुष्य जैसा है वैसा ही स्वीकार्य करने से समूह गतिशीलता (Group Dynamic) ठीक तरह काम करती है।

हम सभी परिक्रमा वासियों में जगमोहन अग्रवाल सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन वे सबसे ज़्यादा मज़बूती और जूझारूपन से यात्रा में भाग लेते हैं। उनके पैरों में तकलीफ़ है इसलिए घुटने ज़मीन पर टेककर पंद्रह किलो का भार सहित खड़े हो पाते हैं। अन्य शारीरिक दिक़्क़तों के बावजूद वे निरंतर यात्रा करते रहे। उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि वे परेशानी में हैं, नर्मदा जी में उनकी आस्था प्रबल है। नरसिंहपुर जिले की गाड़रवाडा तहसील के कौंडिया ग्राम के मूल निवासी हैं। जहाँ कभी कौंड़िल्य ऋषि का आश्रम हुआ करता था। जीवंतता, जीवटता और जूझारूपन उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। जगनमोहन जी ट्रेकिंग के बहुत ही शौकीन रहे हैं। बैंक नौकरी में भी यूथ क्लब की ओर से अकसर जाते रहते थे।

अरुण दनायक के पिताजी का नाम रेवाशंकर है, वे पुत्री रेवा और पिता शंकर दोनों का आशीर्वाद  लेकर चलते हैं। उनके पिताजी रेल्वे में अधिकारी थे। उनकी माताजी 1930-40 के दशक की सुशिक्षित महिला थीं, वे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर और महात्मा गांधी  के विचारों से प्रभावित होकर स्त्री शिक्षा और कलात्मक अभिरुचि की गतिविधियों से जीवन भर जुड़ी रहीं। वे रोज़ मोतीदाना अक्षरों में डायरी लिखती थीं। इन्होंने वे डायरियाँ संभाल कर रखीं हैं जिनमे तीस से साठ के दशक का इतिहास और मुख्य-मुख्य घटनाओं का विवरण मिलता है। अरुण दनायक को लेखन के संस्कार माताजी से मिले हैं। वे गांधी जी  से भावनात्मक स्तर पर गहराई से प्रभावित है। किसी काम को सौम्यता से पूरा करने की ज़िद उन्हें अच्छा परिक्रमा वासी बनाती है।

अविनाश दवे सेंट्रल बैंक  से सेवानिवृत्त हैं, जबलपुर सेवानिवृत्त संघ की गतिविधियों से जुड़े हैं। अविनाश स्वादिष्ट भोजन प्रेमी हैं। यह गुण उन्हें उनके माता व पिता से विरासत में मिला है। अविनाश के बैग का एक खंड खाद्य सामग्री से भरा है। उसके पास चाय काफी से लेकर पोहा, नमकीन, अचार, मैगी मसाला लड्डू सब मिल जायेगा। अविनाश शौक़ीन फ़ोटोग्राफ़र हैं उनके केमरा से उतारीं गईं फ़ोटो की गुणवत्ता कलात्मक होती है। 

मुंशीलाल पाटकर पेशे से वक़ील हैं लेकिन मिज़ाज  से यायावर प्रकृति के हैं, हर दो-तीन महीनों में पर्यटन पर निकल जाते हैं। वे बहुमुखी जुगाड़ प्रतिभा के धनी हैं, बीच जंगल में चाय की जुगाड़ जैसी कई जुगाड़  से वाक़िफ़ हैं। समूह के ये त्यागी पुरुष पूरी यात्रा में गरम कपड़े दरी टोपा मोज़े सब दान करते आए। ख़ाली बैग में करेली से एक-एक किलो गुड़ और तुअर दाल भर लाए।

प्रयास जोशी एक संवेदनशील कवि और कला जगत से जुड़ाव रखने वाले दार्शनिक क़िस्म के शांत इंसान हैं। कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में गराऊ घाट पर उनकी रचनाओं का रसपान किया। वे ट्रैकर हैं, यूथ होस्टल की गतिविधियों से जुड़े हैं।       

नर्मदा परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में से दुरुह यात्रा है। हिंदू हज़ारों सालों से इस यात्रा को करते आ रहे हैं। इस यात्रा के सामने डिस्कवरी चैनल की नक़ली साहसिक यात्राएँ कहीं नहीं लगतीं क्योंकि उनमें ड्रोन केमरा, सैटलायट इमेज, फ़ोटो ग्राफ़र दल और सपोर्ट के रूप में मेडिकल टीम साथ चलते हैं, उनके पास बेहतरीन जीवन रक्षक दवाएँ और आकस्मिक जोखिम से निपटने के अस्त्र होते हैं। नर्मदा यात्रा का कोई तैयार रास्ता नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वर्ष नर्मदा के भीषण प्रवाह में सारे किनारे कट कर रास्तों को धो डालते हैं। नर्मदा तेज़ बहाव से कहीं किनारों को तोड़ डालती है, कहीं कँपा छोड़ जाती है, कहीं किसान कछारी खेतों को बखर कर पैदल चलना दूभर कर देते हैं, कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई के कारण कीचड़ से सने खेतों में क़दम रखने से ऐडी तक पैर गंपते हैं, कहीं नुकीली धारदार पहाड़ी पर चलना ठीक वैसा ही है जैसे खड़ी दीवार पर छिपकली जैसे पैर जमाकर खिसकना, कहीं पहाड़ी नालों की गहराई को फिसल कर पार करना। परिक्रमा पथ पर पड़ने वाले स्थानों की दूरी का किताबों में लिखी दूरियों से कोई मेल नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इनको नाप कर नहीं अपितु अन्दाज़ से कोस, मील या किलोमीटर में बताया गया है जो कि भ्रामक है। वे किलोमीटर मील भी हो सकते हैं या कोस भी हो सकते हैं। हम आई-फ़ोन से नाप कर सही दूरियाँ लिखते गए हैं। भोजन और ठहरने की व्यवस्था का कोई ठिकाना नहीं, ऐसी विषम परिस्थितियों में नौ दिनों में 104 किलोमीटर की पदयात्रा शरीर को मरोड़ कर और मन के सारे अहंकार तोड़ कर रख देती है। इसके सामने यूथ होस्टल की ट्रैकिंग बच्चों का मन बहलाव है। इस 9 दिवसीय कमरतोड़ 163571 क़दम की यात्रा के दौरान जिन आश्रमों और उनके स्वामियों संचालकों ने आश्रय और भोजन दिया वे साधुवाद के पात्र हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ – कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “पिता“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ ?

? कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

= 1 =

संतान के स्वप्नों का

संवाहक पिता।

परिवार की ख़ुशियों का

गुण-ग्राहक पिता।।

= 2 =

घर के विधि-विधान का

विधायक पिता।

कुटुम्ब की समृद्धि का

प्रस्तावक पिता।।

= 3 =

औलाद बे-उसूल तो

आक्रामक पिता।

धन-संसाधन जुटाए

सुख-दायक पिता।।

= 4 =

तात जनक बाप पापा

नायक पिता।

पालक वालिद परम

अभिभावक पिता।।

= 5 =

सिखाये आचरण-नियम

नियामक पिता।

आशीर्वाद-स्नेह का

परिचायक पिता।।

= 6 =

शुभकामनाएँ लाये सदा

लायक पिता।

करे जीवन लय-तालबद्ध

गायक पिता।।

= 7 =

सुखद स्वर्णिम बचपन

स्मारक पिता।

हर ज़ख़्म घाव दर्द का

निवारक पिता।।

= 8 =

कभी शीतल हिम तो कभी

पावक पिता।

हमारे यश-गौरव का

प्रचारक पिता।।

= 9 =

संतति के प्रारब्ध का

उन्नायक पिता।

पुत्र-पुत्री के भविष्य का,

उद्धारक पिता।।

= 10 =

संस्कार-कर्म प्रति सजग

विचारक पिता।

‘ राजेश ‘ प्रथम पूज्य है

विनायक पिता।।

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ – !!वक्त!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!वक्त!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ ☆

☆ !! वक्त !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सृष्टि आरंभ से जो चला आ रहा, वो चला जा रहा नित्य ही साथ में।

 बिन रुके बिन झुके बिन थके वो चले, बैठता भी नहीं वो कहीं पाथ में।

 आदि में अंत में हर्ष में दर्द में, वो अकेला रहे सर्वदा साथ में।

वक्त होता सभी के सदा संग में, एक साथी नहीं वक्त के हाथ में।।

*

नित्य संसार को वो निहारा करे, रोकता भी नहीं टोकता भी नहीं।

प्रेम को दर्द को राग को द्वेष को, जानता है मगर बोलता भी नहीं।

लोग बोले भला या बुरा बोल दे, ले तराजू कभी तोलता भी नहीं।

भोर में रात में धूप में छांँव में, कर्म को टाल दे सोचता भी नहीं।।

*

बांधता वक्त सारे युगों को सदा, वक्त को बांध दे डोर ऐसी कहाँ।

 राम भी कृष्ण भी वक्त को मान दें, जन्म ले वक्त से देख छोड़ें जहाँ।

 वो बिना भेद के नित्य ही बाँटता, ज्ञान भी एक जैसा सभी को यहाँ।

 कर्म को धर्म मानो चलो धर्म से, दंड भी मोक्ष भी ईश देते वहाँ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆ गीत – ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆

☆ गीत ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।

कोई मैं ही मैं में रहता कोई बस वहम में रहता है।।

***

अपनेपन का  अहसास ही ताकत की दवा देता है।

मत रहो सदा ही क्रोध में यह घृणा को हवा देता है।।

भटक जाता आदमी जब द्वेष ही कहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

***

खाक हो जाता बदन पर रंजिश खत्म नहीं होती है।

शत्रुता में कोई भी नीति  सफल  यत्न नहीं होती है।।

आगे बढ़ता नहीं जो अभिमान बोझ जहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

****

जो संबंध जोड़ता और निभाता वही सफल होता है।

जो स्पर्धा नहीं ईर्ष्या करता वह सफलता भी खोता है।।

दिल में घृणा आग तो मन मस्तिष्क भी दहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७२ ☆ कविता – सरदार वल्लभ भाई पटेल… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सरदार वल्लभ भाई पटेल…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७२

☆ सरदार वल्लभ भाई पटेल…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

हे देशभक्त, कर्तव्यनिष्ठ, दृढ़व्रती अनूठे सेनानी

वल्लभ भाई पटेल तुम थे एक सच्चे नेता पर दानी।

*

तब दूरदृष्टि शासन क्षमता हम सब में गर्व जगाती है

हर अग्नि परीक्षा के अवसर हमें पावन याद दिलाती है।।

*

तुमने थी निभाई प्रमुख भूमिका देश को एक बनाने में

बिखरे छोटे रजवाड़ों को भारत के साथ मिलाने में।।

*

नक्शे में भरने नया रंग एक अनुपम काम तुम्हारा है

इस कठिन काम हित सच मन से आभारी भारत सारा है।।

*

तुम आजादी के बाद शीघ्र ही छोड़ हमें जो चले गए

कितने ही नए जंजालों में फंस हम औरों से छले गए।।

*

जो काम रह गया, तब तुमसे वह काम आज भी बाकी है

पाने को किनारा तैर रहे पर हार रही तैराकी है।।

*

दो अपनी सी दृढ़ता हमको हर उलझन को सुलझाने को

नई नई समस्याओं से लड़कर उन्हें सहज निपटाने को।।

*

तुम अडिग रहे, डरा न सका न कोई जीवन संग्राम तुम्हें

करते हैं हे सरदार सभी हम बारम्बार प्रणाम तुम्हें।।

© स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक श्लोक ६३ आणि ६४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ६३ आणि ६४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ६३ – – 

घरी कामधेनू पुढे ताक मागे ।

हरीबोध सांडूनि वेवाद लागे ।

करी सार चिंतामणी काचखंडे ।

तया मागता देत आहे उदंडे । ६३ ।

अर्थ :: एखाद्याच्या घरी कामधेनू आहे. पण तो दुसऱ्याच्या घरी ताक मागू लागला तर ही हास्यास्पद गोष्ट ठरते. त्याप्रमाणे आपल्यापाशीच असणाऱ्या भगवंताकडे दुर्लक्ष करून एखादा व्यर्थ वाद घालू लागला तर त्याचे जीवन वाया जाते. एखाद्याच्या हातात चिंतामणी आहे, परंतु तो त्याच्याकडे केवळ काचेच्या तुकड्यांची मागणी करू लागला तर अशा माणसाचे वागणे हास्यास्पद आणि मूर्खपणाचे ठरते.

(हरीबोध – परमेश्वराचे ज्ञान, वेवाद – व्यर्थ /निष्फळ वाद, काचखंडे – काचेचे तुकडे)

विवेचन :: या आधीच्या श्लोकात समर्थांनी आपल्याला निजध्यास तुटला म्हणजे काय हे सांगितले. या श्लोकातही तोच मुद्दा पण वेगळ्या शब्दात ते आपल्याला समजावून सांगत आहेत. माणूस हा इतर प्राण्यांपेक्षा श्रेष्ठ आणि वेगळा ठरतो तो त्याला मिळालेल्या बुद्धीच्या वरदानामुळे. या बुद्धीचा वापर करून तो आत्मज्ञान करून घेऊ शकतो. नराचा नारायण होण्याची क्षमता त्याच्यामध्ये आहे. असे असताना कधी कधी तो अगदी हास्यास्पद वागतो. घरी कामधेनू आहे म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारी गोमाता आहे. पण याला त्याची जाणीवच नाही. हा दुसरीकडे ताक मागत फिरतो. इथे कामधेनू म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारा भगवंत. तो सदैव आपल्याजवळच असतो. पण याची जाणीव नसलेले अज्ञानी जीव मात्र त्याला शोधत इकडेतिकडे फिरतात. भोंदूबाबा, साधूंच्या नादी लागतात. भगवंत आपल्याजवळ आहे. त्याला शोधायला खरं तर कुठेच जायची गरज नाही. ‘ मंदिरात अंतरात तोच नांदताहे… ‘ पण ही गोष्ट आमच्या लक्षातच येत नाही. आम्हाला परमेश्वरासंबंधी जे काही ज्ञान झाले आहे, ते सोडून देऊन आम्ही व्यर्थ, कोरडे आणि निष्फळ वादविवाद करत बसतो.

समर्थ जसे कामधेनूचे उदाहरण देतात, तसेच ते चिंतामणी रत्नाचेही देतात. चिंतामणी हे एक दिव्य रत्न असून त्यामुळे जे हवे ते प्राप्त होते. परंतु काही मूर्ख माणसे मात्र अशा या दिव्य चिंतामणीच्या संपर्कात आले असताना देखील त्याच्याकडे काचेच्या तुकड्याची मागणी करतात. कामधेनू किंवा चिंतामणी ही रूपके समर्थांनी वापरली आहेत. परमेश्वर म्हणजे प्रत्यक्ष कामधेनू किंवा चिंतामणी! इच्छिलेले देणारा. पण आम्हाला त्याचे महत्वाच कळत नाही. एकदा परमेश्वराची कृपा झाली की काही मिळवायचे बाकी राहत नाही. पण आम्ही मात्र जवळ कस्तुरी असूनही कस्तुरीच्या शोधात फिरणाऱ्या कस्तुरीमृगासारखे रानोमाळ भटकत राहतो. ‘ तुझे आहे तुजपाशी परी तू जागा चुकलासी ‘ अशी आमची अवस्था होते.

हरीबोधाइतकी मौल्यवान कोणतीही गोष्ट नाही. आम्हाला हे समजते पण उमजत नाही. आमची श्रद्धा डळमळीत होऊ लागते. हरीबोध किंवा परमेश्वराची प्राप्ती ही इतक्या सहजासहजी होणारी गोष्ट नसते. त्यासाठी विवेक आणि श्रद्धा आवश्यक असतात. संयमाने उपासना सुरु ठेवावी लागते. पण एकदा का श्रद्धा डळमळीत झाली की नाना प्रकारच्या शंका मनात घर करू लागतात. या आधीच्या श्लोकात समर्थांनी निजध्यास सुटला म्हणजे काय घडते ते सांगितले होते. तेच अशा वेळी घडते. मग परमेश्वर आहे का? तो मला प्राप्त होईल का? मी एवढा वेळ कशाला वाया घालवायचा? त्याऐवजी माझ्या हातात जे आनंदाचे क्षण आहेत, ते मी का गमवावे? असा मनुष्य संतांशी देखील व्यर्थ वादविवाद करीत बसतो. ज्ञानेश्वरी, दासबोध, गीता वाचणारे त्यातील सांगितलेल्या गोष्टींवर श्रद्धा ठेवून त्याचे अनुकरण करण्यापेक्षा मला किती कळते हे दाखवण्याचा प्रयत्न करीत बसतात. ‘ ज्ञानेश्वरीच्या बाबतीत एक तरी ओवी अनुभवावी ‘ असे म्हटले जाते. पण आम्ही तिची अनुभूती घेण्यापेक्षा व्यर्थ, कोरडे वादविवाद करत बसतो. खरे ज्ञान तेच की हृदयापर्यंत पोहोचते.

गोंदवलेकर महाराज म्हणतात, ” मला विद्वानांबद्दल आदर आहे पण प्रेम नाही. “त्याचे कारण हेच आहे. विद्वान माणसे आपल्या पांडित्याचे प्रदर्शन करण्यात धन्यता मानतात. पण भगवंत प्राप्तीसाठी जी तळमळ, श्रद्धा आणि प्रेम लागते, तिचा अभाव त्यांच्यामध्ये असतो. भगवंत उदंड देणारा दाता आहे. त्याच्याकडे काय मागायचे हे आपल्याला कळले पाहिजे. भगवंताच्या रूपाने आपल्याकडे सर्वस्व असते. तोच असतो कामधेनू आणि चिंतामणी. तेव्हा त्याच्याकडे क्षुद्र गोष्टी कशासाठी आणि का मागायच्या? पैसा, संसार, मुलेबाळे, सत्ता, प्रसिद्धी, कीर्ती हे तर सारेच मागतात. पण मला भगवंत हवा आहे हे मला तीव्रतेने वाटले पाहिजे. त्यासाठीच समर्थांची ही तळमळ!

स्वसंवाद :: 

१) माझ्याकडे आधीपासून असलेल्या गोष्टींची (श्रद्धा, ज्ञान, साधना) मला खरी जाणीव आहे का?

२) मी बाहेर बाहेर शोधण्यात जास्त वेळ घालवतो का, की अंतर्मुख होण्याचा प्रयत्न करतो?

३) मी आध्यात्मिक ज्ञान फक्त “समजून” घेतो, की खरोखर “जगतो”?

४) मी वाचन, चर्चा, वाद यांत अडकतो का, की प्रत्यक्ष साधना करतो?

५) माझ्या मनात शंका जास्त आहेत का, की श्रद्धा दृढ आहे?

६) मी “चिंतामणी” हातात असूनही “काचखंडे” मागत तर नाही ना याचा कधी विचार केला आहे का?

– – – – 

श्लोक क्र. ६४ – – 

अती मूढ त्या दृढ बुद्धी असेना ।

अती काम त्या राम चित्ती वसेना ।

अती लोभ त्या क्षोभ होईल जाणा ।

अती विषयी सर्वदा दैन्यवाणा ।६४।

अर्थ :: मूढ म्हणजे मूर्ख मनुष्य. अशा व्यक्तीला आपले हित कशात आहे हे कळत नाही. त्याच्याजवळ साहजिकच दृढ बुद्धी म्हणजे निश्चयाचा अभाव असतो. ज्याच्या मनामध्ये विषयवासना मोठ्या प्रमाणात घर करून असतात, त्याच्या मनात साहजिकच भगवंताला स्थान मिळणे शक्य नसते. अती लोभी माणसाला शेवटी क्षोभाला म्हणजे क्रोधाला सामोरे जावे लागते. विषय विकारांच्या अती अधीन झालेला माणूस लाचार आणि दीनवाणा असतो.

विवेचन :: ‘अति सर्वत्र वर्जयेत ‘असे संस्कृत वचन आहे. कोणत्याही गोष्टीचा अतिरेक झाला की तो सर्वनाशाला कारणीभूत होतो. एखादी गोष्ट आरोग्याला हितकारक जरी असली तरी तिचा अतिरेक झाला तर तो घातक ठरतो. उत्तम प्रकृतीसाठी शरीराला व्यायाम आवश्यक असतो. पण त्याचा अतिरेक झाला तर अंतिमतः हानीच होते. त्याप्रमाणे सर्वच गोष्टींचे आहे. अती खाणे, अती बोलणे, अती निद्रा, अती उर्मटपणा अशी कोणतीही गोष्ट अती झाली की नुकसानच होते. ‘अती तिथे माती ‘ असे आपण म्हणतो ते यामुळेच.

कामवासना किंवा विषय सेवन आपल्या आयुष्यात जेवढे आवश्यक असते, तेवढे करण्याची परवानगी आपल्याला आपली संस्कृती देते. त्यासाठी एक विशिष्ट चौकट आपल्या संस्कृतीने आखून दिलेली आहे. त्यासाठी विवाह संस्कार आहे. तात्पर्य एका मर्यादेत विषय सेवन शास्त्रास मान्य आहे. परंतु विषय सुखाच्या अधीन होऊन त्यापलीकडे दुसरे काहीच न दिसणे हे तामसी वृत्तीचे लक्षण आहे. पशुसुद्धा आवश्यक तेवढाच कामवासनेचा आधार घेतात. प्रजोत्पादन हे त्यांचे उद्दिष्ट असते. परंतु माणूस मात्र कोणतीही मर्यादा पाळत नाही. कामातुराणां न भयं न लज्जा असे एक संस्कृत वचन आहे. सध्या विविध माध्यमांमुळे माणसांच्या वासना भडकवल्या जातात. त्यांचा अतिरेक झाला तर काय होते याचे प्रत्यंतर आपल्याला रोजच्या बातम्या पाहिल्या तरी येते.

अती विषयी माणूस हा मूढ बुद्धी असतो. मूढ बुद्धी म्हणजे आपल्या हिताचे न कळणारा. त्याला कोणी कितीही समजावून सांगितले तरी ते पटत नाही. पटले तरी ऐकण्याची तयारी नसते. रावण हा स्त्रीलंपट होता. विषयलोभी होता. त्यातूनच त्याने सीतेसारख्या पतिव्रतेला उचलून आणण्याचे पातक केले. बिभीषण, मंदोदरी आदींनी त्याला वेळोवेळी समजावून सांगितले पण त्याची बुद्धी भ्रष्ट झालेली असल्याने त्याला आपल्या हिताचा सल्ला देखील रुचला नाही.

ज्यांच्या मनात सदैव विषयवासनेनेच ठाण मांडलेले असते, त्यांच्या चित्तात राम म्हणजे भगवंत राहीलच कसा? परमेश्वर प्राप्तीसाठी शुद्ध आणि निर्मळ चित्त हवे. बऱ्याच वेळा अशी काही माणसे भगवंताचे नाम घेताना दिसतात. पण ते लोकांची दिशाभूल करीत असतात. त्यांचा अंतर्गत हेतू वेगळाच असतो. मुहमें राम बगलमे छुरी अशी स्थिती असते. अशा माणसांपासून सावध राहिलेले बरे.

जशी अवस्था अती कामी माणसाची होते, तशीच अवस्था अती लोभी माणसाची होते. अग्नीत जेवढे तूप टाकले तेवढा तो अधिक प्रज्वलित होतो. काम आणि लोभ यांचे देखील असेच आहे. कुठे थांबायचे हे कळत नाही. गरज आणि लोभ यात अंतर आहे. गरजा मर्यादित असतात. लोभ किंवा हाव यांना कोणतीही मर्यादा नसते. लोभापोटी माणसाच्या हातून अनेक अपराध आणि नको त्या गोष्टी घडतात. आपल्या प्रपंचासाठी जेवढे आवश्यक तेवढे मिळवणे हे प्रापंचिक माणसाचे कर्तव्यच आहे. ते देखील योग्य मार्गाने! पण लोभी माणसाचा विवेक हरवलेला असतो. त्यामुळे माझे ते माझे पण तुझे तेही माझेच अशी त्याची वृत्ती होते. येनकेन मार्गाने तो ती गोष्ट मिळवण्याचा प्रयत्न करतो. सत्ता, संपत्ती, प्रसिद्धी या गोष्टींची हाव माणसाला कोणत्याही थराला घेऊन जाते आणि त्याचे अध :पतन घडवून आणते.

आपल्याला हवी ती गोष्ट नाही मिळाली की मग अशा माणसांचा संताप होतो. म्हणूनच समर्थ म्हणतात, ‘ अति लोभ त्या क्षोभ होईल जाणा. ‘ दुर्योधनाला राज्य आणि सत्तेची एवढी हाव होती की त्याने पांडवांच्या हिश्याचे राज्य तर सोडाच परंतु त्यांना पाच गावेही देण्यास नकार दिला. दुष्ट शकुनीच्या बदसल्ल्याला तो बळी पडली. त्याच्या हिताचे सांगणाऱ्या भीष्म, विदुर, श्रीकृष्ण आदींच्या सल्ल्याकडे त्याने दुर्लक्ष केले. या सगळ्यांचा परिणाम म्हणजे त्याला मनःशांती नव्हती. त्याचे चित्त क्षोभाने व्यापलेले होते. शेवटी सत्ता आणि संपत्ती यांच्या अतिलोभाने त्याचा घातच केला.

म्हणूनच दासबोधात समर्थ सांगतात की ‘ अती सर्वत्र वर्जावे, प्रसंग पाहुनि वर्तावे. ‘ धर्माने घालून दिलेल्या मर्यादेत सर्व गोष्टींचा उपभोग घ्यावा. आधीच्या श्लोकात समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे ‘ सदाचार हा थोर सांडू नये तो, जगी तोचि तो मानवी धन्य होतो. ‘ असेच वागणे आपल्या हिताचे आहे. जे अती विषयी माणसे असतात त्यांची अवस्था व्यवहारात अत्यंत दीनवाणी होते. त्यांना किंमत राहत नाही असे समर्थ म्हणतात. दैनंदिन जीवनातही अशी अनेक उदाहरणे आपण पाहतो. त्यांच्या लोभ किंवा कामवासनेच्या अतिरेकामुळे लोकांमध्ये त्यांची छी थू होते. माणूस जेव्हा विषयांच्या अधीन होतो, तेव्हा तो त्याचा मालक न राहता गुलाम होतो. मग ही गुलामगिरी त्याला वाटेल तसे वागण्यास भाग पाडते. त्यात आपण लाचार किंवा दैन्यवाणे होत जात आहोत हेही त्याच्या लक्षात येत नाही.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या आयुष्यात कोणत्या गोष्टीचा ‘अतिरेक’ होतोय का? (उदा. सोशल मीडिया, खाणे, राग किंवा कामाचा अट्टाहास) 

२. माझी कोणतीही कृती ही ‘गरज’ आहे की ‘लोभ’, हे मी ओळखू शकतो का?

३. जेव्हा मला माझ्या आवडीची गोष्ट मिळत नाही, तेव्हा माझ्यात ‘क्षोभ’ (राग) निर्माण होतो का? तो शांत करण्यासाठी मी काय करतो?

४. माझे चित्त ‘निर्मळ’ ठेवण्यासाठी मी दिवसातला किती वेळ स्वतःला आणि परमेश्वर चिंतनाला देत

– क्रमशः श्लोक ६३ आणि ६४

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२७ ☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अभिमानी–स्वाभिमानी। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ  / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२७ ☆

☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘अभिमानी और स्वाभिमानी में केवल इतना-सा  फ़र्क़ है कि स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी से कुछ मांगता नहीं और अभिमानी व्यक्ति किसी को कुछ देता नहीं।’ अहंकार में डूबे व्यक्ति को न तो ख़ुद की ग़लतियाँ दिखाई देती है, न ही दूसरों की अच्छी बातें उसके अंतर्मन को प्रभावित करती हैं। उसे विश्व मेंं स्वयं से अधिक बुद्धिमान कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। वैसे भी छिद्रान्वेषण अर्थात् दूसरों में दोष-दर्शन की प्रवृत्ति मानव में स्वाभाविक रूप से होती है। उसे सभी लोग दोषों व बुराइयों का आग़ार भासते हैं और वह स्वयं को दूध का धुला समझता है। दूसरी ओर जहाँ तक स्वाभिमानी का संबंध है, उसमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा होता है और वह स्व अर्थात् मैं में विश्वास रखता है और उसका अहं उसे दूसरों के सम्मुख नत-मस्तक नहीं होने देता। उसे प्रभु में आस्था होती है और वह ‘तुम कर सकते हो’ के विश्वास के सहारे बड़े से बड़ा कार्य कर गुज़रता है, क्योंकि उसके शब्दकोश में असंभव शब्द होता ही नहीं है।

‘सफलता हासिल करने के लिए मानव का विश्वास भय से बड़ा होना चाहिए, क्योंकि असफलता का भय ही सपनों के साकार करने में बाधा बनता है। यदि आप भय पर विजय पा लेते हैं, तो आपकी विजय निश्चित् है’ प्लेटो का यह संदेश अत्यंत कारग़र है। यदि हमारा लक्ष्य निश्चित् और हृदय में आत्मविश्वास है, तो कोई भी बाधा आपका पथ नहीं रोक सकती। इसलिए कहा जाता है,’मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ हमारा मन ही जय-विजय का कारक है। सो! ‘विजयी भव’ एक सर्वश्रेष्ठ भाव है, जिसके साथी हैं– विद्या, विनय व विवेक। इन मानवीय गुणों के आधार पर हम आपदाओं से मुकाबला कर सकते हैं। विनम्रता सर्वोत्तम गुण है, जो अहंनिष्ठ व्यक्ति के हृदय से कोसों दूर रहता है। इसके लिए वस्तुस्थिति का ज्ञान होने के साथ- साथ यथा-समय लिया गया निर्णय भी हमें सफलता की सीढ़ियों पर पहुंचाता है। दु:ख में धैर्य का बना रहना अत्यंत आवश्यक व सार्थक है।

‘कोई भी चीज़ आपके लिए फायदेमंद नहीं हो सकती, जिसे पाने के लिए आपको आत्म- सम्मान से समझौता करना पड़े।’ मार्क्स ऑरेलियस का यह तथ्य आत्म-सम्मान को सर्वश्रेष्ठ समझ समझौता न करने का सुझाव देता है। सो! समझौता परिस्थितियों से करना चाहिए, आत्म-सम्मान से नहीं, क्योंकि जब उस पर आँच आ जाती है; तो व्यक्ति सिर उठा कर नहीं जी सकता। ऐसी स्थिति में प्रभु शरणागति कारग़र उपाय है। मुझे स्मरण हो रही हैं दुष्यंत की यह पंक्तियाँ ‘कौन कहता है आकाश में सुराख हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ से हमें यह संदेश मिलता है कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, सिर्फ़ आप में जज़्बा होना चाहिए उस कार्य को अंजाम देने का। ‘राह  को मंज़िल बनाओ, तो कोई बात बने’ में भी यही सोच व भाव निहित है। जब हम दृढ़-संकल्प कर उन राहों पर  निकल पड़ते हैं, तो हमारा मंज़िल पर पहुंचना निश्चित हो जाता है। लाख आँधी, तूफ़ान व सुनामी भी आपके पथ के अवरोधक नहीं बन सकते।

स्वाभिमान व आत्मविश्वास पर्यायवाची हैं तथा एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनकी महत्ता को नकारना असंभव है। सो! हमारे हृदय में शंका भाव नहीं आना चाहिए, क्योंकि यह तनाव की स्थिति का द्योतक है, जो हमें पथ-विचलित करता है। भगवद्गीता में भी यही संदेश दिया गया है कि सुख का लालच व दु:ख का भय मानव के अजात शत्रु हैं। यदि मानव भविष्य के प्रति आशंकित रहता है, तो वह वर्तमान के अपरिमित सुखों से वंचित हो जाता है, क्योंकि यही है दु:खों का मूल। व्यक्ति जीवन में अधिकाधिक धन-सम्पदा व पद-प्रतिष्ठा पाना चाहता है, परंतु उसको एवज़ में छोड़ना कुछ भी नहीं चाहता; जबकि संसार का नियम है ‘एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले’ अर्थात् जो भी आप इस संसार में देते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। वैसे भी आप एक साँस छोड़े बिना बिना दूसरी साँस नहीं ले सकते। यह संसार का नियम है कि इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ लौट जाना है। केवल सत्कर्म ही उसके साथ जाते हैं। इसलिए मानव हरपल प्रभु का सिमरन तथा समय का सदुपयोग करना चाहिए।

अहंनिष्ठ प्राणी आजीवन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में उलझा रहता है। वे उसे अपना गुलाम बनाए रहती हैं। उसके कदम धरा पर नहीं टिकते। वह केवल दूसरों की भावनाओं को आहत नहीं करता, बल्कि अपना जीवन भी नरक बना लेता है तथा आजीवन इसी उधेड़बुन में खोया रहता है। डॉ वसुधा छवि का यह कथन भी इस तथ्य की सार्थकता सिद्ध करता है कि ‘जब व्यक्ति के पास पैसा होता है, तो वह भूल जाता है कि वह कौन है और जब पैसा नहीं होता, तो लोग भूल जाते हैं कि वह कौन है,’ यही जीवन का कटु यथार्थ है। धन-लिप्सा उसे अपने शिकंजे साथ बाहर नहीं निकलने देती और वह इस भ्रम में अपने जीवन के प्रयोजन को भुला बैठता है। मानव स्वार्थी है और संसार व संबंध मिथ्या। मानव केवल स्वार्थ साधने हेतू संबंध साधता है और उसके पश्चात् उसे भुला देता है। इतना ही नहीं, वह माया महा-ठगिनी के मायाजाल में आजीवन उलझा रहता है और लख चौरासी से मुक्त नहीं हो सकता।

सहारे मानव को खोखला कर देते हैं और उम्मीदें कमज़ोर। मानव को अपने बल पर जीना प्रारंभ करना चाहिए क्योंकि उसका आपसे अच्छा साथी व हमदर्द कोई दूसरा नहीं हो सकता। वैसे भी ‘मंज़िलें बड़ी जिद्दी होती हैं/ हासिल कहाँ नसीब से होती हैं/ मगर तूफ़ान भी वहां हार जाते हैं/ जहां कश्तियां ज़िद पर होती हैं।’ जी हां! यदि मानव का हृदय साहस व धैर्य से लबालब है, तो तूफ़ान भी रुक जाते हैं और व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ सिद्ध होता है। जब मन रूपी कश्ती ज़िद पर होती है, तो तूफ़ानों को अपने रास्ते से हट जाना पड़ता है, क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी नहीं ठहर नहीं सकता। मानव को न तो किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उम्मीद रखनी चाहिए, क्योंकि दोनों स्थितियां उसके मनोबल को तोड़ती हैं। मानव स्वयं अपना साथी व हमदर्द है। इसलिए जीवन में अपेक्षा व उपेक्षा को त्याग कर जीवन पथ पर बढ़ते जाना चाहिए, अन्यथा यह मानव को अवसाद की स्थिति में ले जाती है। मानव को अहं को शत्रु समझ अपने आसपास नहीं आने देना चाहिए और आत्मविश्वास को धरोहर सम संजोए रखना चाहिए, क्योंकि आत्मविश्वास के बल पर आप असंभव कार्य को भी कर गुज़रते हैं। इसलिए आत्मसम्मान से कभी भी समझौता न करें, क्योंकि जिसमें आत्मविश्वास है, वह सिर उठाकर जीता है; किसी के सम्मुख घुटने नहीं टेकता और न ही नतमस्तक होता है। सो! अभिमानी नहीं;  स्वाभिमानी बनें और अपने मान-सम्मान व प्रतिष्ठा को क़ायम रखें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध … ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – युद्ध के विरुद्ध 

? रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध …  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े।

दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।।

*

 है चकित, यह धरा, शांत आकाश है।

 रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।।

 वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके।

 मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।।

 स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े।

*

नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं।

ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।।

लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते।

उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।।

आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े।

*

है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते।

भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।।

धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है।

कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।।

मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े।

*

शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया।

नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।।

रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो।

हो विजय, सत्य की, झूठ की हार हो।।

गिर गये, हैं मुकुट, भ्रात मोती जड़े।

*

युद्ध की, त्रासदी, भोगते लोग सब।

धैर्य सब, खो दिया, मौत का योग अब।।

संधि की, दूर सब, देख संभावना।

चैन की, लोग बस, कर रहे याचना।।

ये कदम, क्यों भला, युद्ध के हैं पड़े।

*

यह धरा, तो बनी, देख श्मशान है।

धूल में, है मिला, राष्ट् का मान है।।

युद्ध है, हल नहीं, शांति की बात हो‌।

विश्व को, शांति की, कृष्ण सौगात हो।।

रो रही, है प्रजा, प्रण लिए क्यों कड़े।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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