हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५० – भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – भरोसा।)

☆ हेमंत साहित्य # ५० ☆

✍ भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे  

बिजली की तार पर

या

पतली सी डगाल पर

सोते,

ऊंघते,

परिन्दे देखकर

लगता है ऐसा

 

कि

नही गिरेंगे वो

कभी भी नींद में

किसी भी तार से

किसी भी डगाल से ।

 

कि

भरोसा है उन्हें

उस पर

जो दिखता तो नही

पर है

यहाँ,

वहाँ,

सर्वत्र ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “अपने पराये“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆

✍ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सुभाष और मनोज बचपन से दोस्त हैं।  हालांकि सुभाष मनोज से तीन चार साल बड़े हैं पर दोस्ती में कोई फ़र्क नहीं । पढाई में भी दो साल का अंतर रह। यह अंतर आखिर तक बना ही रहा क्योंकि पढाई में दोनों एक जैसे थे। पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद सुभाष की पोस्ट ऑफिस में नौकरी लग गई और पोस्टिंग आगरा में हुई। 

सुभाष का विवाह हो गया।  मनोज सुभाष की पत्नी को बड़े आदर के साथ भाभीजी कहा करता।

मनोज ने एम.ए. करते ही  मुंबई में एक कंपनी में मैनेजर के पद पर नौकरी लग गई। दोनों दोस्तों का संपर्क ऑनलाइन बना रहा लेकिन दोनों गृहस्थी के चक्कर में फँसते गए। दोनों के बच्चे भी हुए, उनकी शादी भी हो गई। और उनकी बातचीत में अंतराल बढ़ गया, मिलने जुलने का तो सवाल ही नहीं।

एक दिन मनोज दादर में सब्जी खरीद रहे थे कि उन्हें सुभाष दिखाई दिए।  लेकिन बाल पक गए थे तो विश्वास नहीं हो रहा था। इसलिए वह उनके पास गए और पहचान कर पुकारा, “सुभाष भाई”। सुभाष ने मुड़कर देखा तो मनोज को तुरंत पहचान गए। मनोज ने कहा,”आप मुंबई में, कब और कैसे?” सुभाष ने कहा कि मुझे एक्साइज में डेपुटेशन मिल गया तो मुंबई आ गया। दो साल हो गए। आओ, तुम्हें तुम्हारी भाभी से मिलाता हूँ, वह यहीं एक दूकान में कुछ खरीद रही है।” मनोज ने भाभी पुकारते हुए प्रणाम किया तो उन्होंने चौंक कर देखा, बोली,”मनोज, अरे तुम यहाँ?” सुभाष और मनोज बड़े अरसे के बाद मिलकर बहुत खुश हुए। भाभी ने अपना पता लिखवाते हुए कहा, “दीपावली आ रही है, घर  जरूर आना। और हाँ भोजन हमारे साथ ही करना। मनोज खुशी के मारे “जी हाँ ” ही कह पाए।

दीपावली की जगमगाहट में मनोज अपने परिवार के साथ सुभाष के घर खुशी खुशी पहुंचे। दरवाजा एक युवती ने खोला। मनोज सकपकाये कि कहीं गलत घर में न आ गए हों। वह युवती बोली, “आप मनोज अंकल, मम्मी पापा ने बताया था, मैं उनकी बहू सुप्रिया, आइए अंदर आइए।”  आवाजें सुन कर सुभाष और उनकी पत्नी ड्राइंग रूम में आए। दोनों गले मिले। बहू सुप्रिया बोली, “आप लोग बात कीजिए, मैं पानी पूरी लेकर आती हूँ। आज हमारे यहाँ पानी पूरी का कार्यक्रम है।” सुभाष और उनकी पत्नी तथा मनोज और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुंह देखने लगे। भाभी जी ने मनोज को सपरिवार दीपावली के उपलक्ष्य में खाने पर बुलाया था। सुप्रिया की बात सुनकर एकदम गंभीर हो गई। मुंह से बोल नहीं फूटा। भोजन प्रश्न चिह्न बना रहा और अपने पराए दोनों दोनों अवाक् ।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०८ – दिखावा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दिखावा।)

☆ लघुकथा # १०८ – दिखावा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

डी जे की धुन पर कुछ लोग नाच गा रहे थे और कुछ लोग कुछ लजीज व्यंजनों का आनंद ले रहे थे।

नवरात्रि का पहला दिन था, पास में माता का पंडाल भी लगा हुआ था। अचानक बहुत सारे लोग उसे पंडाल में आ गए और डांस फ्लोर पर डांस करने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई कि ज्यादातर लोग नीचे ही थिरकने लगे। एक तरफ पटाखे चलने लगे।

वहाँ काम करने वाले दो किशोरवय लड़के आपस में बात करने लगे।

एक ने कहा “नए साल के आने पर इतनी खुशी की क्या बात है? मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की है। नया साल हो या नवरात्रि, हमें तो रोज यही साफ सफाई का काम करना है। अच्छा है, हमें काम मिल जाता है।”

दूसरे लड़के  ने जवाब दिया- “बड़ी पार्टी है, इनका शहर में बहुत बड़ा शोरूम है, देर तक काम करेंगे, तो मालिक से कुछ पैसे ज्यादा मांग लेंगे, हमारे लिए तो यही खुशी की बात हो जाएगी।”

तभी अचानक पटाखे की आवाज से पास खड़ी एक बुजुर्ग महिला के हाथ से एक कांच का ग्लास टूट जाता है। डांस करते हुए सभी लोग एक दूसरे के ऊपर गिर जाते हैं कुछ को कांच लग जाते हैं, भाग दौड़ मच जाती है, लोग इधर-उधर भागने लगते हैं।

वे दोनों लड़के कहते हैं चलो मित्र तुम सब्जी उठा लो और मैं पूड़ी यह दोनों बड़े पतीले उठा कर घर चलते हैं पैसे तो नहीं मिलेंगे।

 हम दोनों के परिवार के लोग मिलकर नव वर्ष मनाएंगे।

 घर चलकर आरती करके माँ दुर्गा की आराधना करेंगे।

बड़े लोग ऐसे ही नव वर्ष मनाते हैं इसीलिए यह हुआ है?

दूसरे ने कहा दोस्त ठीक बोल रहे हो सच्चे दिल से मन की प्रार्थना करनी चाहिए दिखावे में यही हाल होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०८ ☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०८ ?

☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

 माझ्याच माणसांनी केलाय डाव सारा

मी एकटीच आहे त्यांचा जमाव सारा

*

नाही..नको मला ते साम्राज्य स्थापितांचे

माझा मला असू दे  हा सान गाव सारा

*

आहेत या इथेही  मोकाट बैल काही

गोठ्यात माणसांचा आता निभाव सारा

*

मी कोंडले स्वतःला देवालयात तेव्हा

 देवास वाटले  की त्याचा प्रभाव सारा

*

कल्लोळ अंतरीचा आहे तसाच आहे

केला जगावयाचा आता सराव सारा

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १६ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १६ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

पद्मविभूषण श्री दत्तात्रेय उर्फ काकासाहेब कालेलकर यांनी कविवर्य ‘ऋग्वेदी’ यांच्या ‘अभंग गीतांजली’ (टागोर यांच्या ‘गीतांजली’चा मराठी भावानुवाद) साठी लिहिलेल्या प्रस्तावनेतील वेचक भाग आपल्या माहितीसाठी आज प्रस्तुत करीत आहे.

श्री काकासाहेब कालेलकर हे थोर स्वातंत्र्यसेनानी, म. गांधींचे अनुयायी व सहकारी, थोर समाजसेवक, मराठी, गुजराती, हिंदी व इंग्रजी भाषांतील साहित्यिक, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेते लेखक, अनेकविद्यापीठांचे कुलगुरू असले तरी तेकविवर्य ‘ऋग्वेदी’ यांचे एके काळचे विद्यार्थी होते व रविंद्रनाथ टागोरांबरोबर शांतिनिकेतन मध्ये राहिले असल्यामुळे त्यांच्यामधील माणूस व कवी यांना जवळून ओळखणारे होते; याच कारणांमुळे त्यांनी ‘ऋग्वेदी’ यांच्या ‘अभंग गीतांजली’स प्रस्तावना लिहिण्याचे मान्य केले असावे.

कालेलकर लिहितात, “गीतांजली मध्ये टागोरांनी परमात्म्याला हृदयापासून साद घातली आहे. आपल्या हृदय सागरात भरती /ओहोटी, लहान मोठ्या लाटांचा महोत्सव अखंड चालूच असतो आणि जोपर्यंत असे आहे तोपर्यंत गीतांजली सारख्या हृदय काव्याची आवश्यकता मनुष्याला असणारच. गीतांजली वाचत असताना आपण काव्यसुख घेत आहोत असा अनुभव येत नाही तर हृदयाला दिव्य आहार मिळत आहे, पौष्टिक रसायन पोहोचत आहे, असे वाटते. म्हणूनच गीतांजली हा ग्रंथ जगाच्या धार्मिक साहित्यात कायमचे स्थान मिळवणार आहे याविषयी शंका नाही. ” 

“रवींद्रनाथांनी मानसशास्त्र आणि समाज शास्त्र यामध्ये खूप खोल उतरून कवित्वाचा एक नवाच आणि कष्टसाध्य असा आदर्श आपल्यापुढे ठेवला आहे. या कवीने भारतीय संस्कृतीच्या अंगप्रत्यंगाचे आकलन केलेले असले पाहिजे. प्रेम भावना आणि धर्म भावना यांचे रहस्य त्याला अवगत असले पाहिजे. कोणत्याही कवी मध्ये अद्भुत वशीकरण विद्या असते. तो परिचित आणि अपरिचित सर्वच लोकांचे हृदय काबीज करतो. आणि जणू कांही त्याची ही मोहिनी विद्या पाहूनच सरस्वती देवी त्याला वाचाशक्तीचे वरदान देते. जो भाव व्यक्त करावयाचा असेल त्याला अनुरूप असे शब्द जणू कांही आपोआप न बोलावता येऊन उभे राहतात. एकही शब्द प्रयत्नपूर्वक आणून बसवला असेल अशी शंका देखील मनात येत नाही. तद्वतच या विभुतीने मनुष्य जीवनाचा ठाव घेण्याचा प्रयत्न केला आहे. म्हणूनच त्यांच्या वाणीमध्ये आत्मविश्वास, सामर्थ्य आणि व्यापकता आली आहे. टागोरांनी कवित्वाचा एक महान आदर्श जगापुढे मांडला आहे. “

“रवींद्रनाथांची प्रतिभा जितकी स्वतंत्र आहे तितकीच ती आर्य संस्कृतीचे परिपक्व फळ आहे. त्यांच्या लेखात, भाषणात, कवितेत आणि नाटकात हिंदुस्थानातील साहित्याच्या उत्तमांशाची छाप स्पष्ट दिसते. भास, कालिदास यांचा हा कवी वारस आहे, हे ओळखावयास फारसे परिश्रम पडत नाहीत. हिंदुस्थानच्या संत कवींच्या साहित्याचे त्यांनी आकंठ पान केले आहे; याची गीतांजलीतील कोणतेही पद्य साक्ष देऊ शकेल. उपनिषदे, बौद्ध वाङ्मय, वैष्णव संप्रदायाचे साधुसंत आणि महर्षी देवेंद्रनाथ अशा अनेक तत्वज्ञांची छाप रवींद्रनाथांच्या काव्यावर पडलेली दिसते. “

“गीतांजलीत सर्वत्र आर्य भावनाच दिसून येते. गीतांजली ही एक कवी वृत्ती नसून एक सबंध संस्कृतीच आहे. येथून तेथून सर्वत्र ईश्वरभक्ती, ईश्वरनिष्ठा आणि मांगल्याचीच उपासना या कवितांमधून दिसून येते. “

शांतिनिकेतन मध्ये असताना एके दिवशी काकासाहेब त्यांना म्हणाले, ” गुरुदेव, आपल्याकडून काही बोध ऐकावा अशी माझी इच्छा आहे. ” तेव्हा टागोर म्हणाले, “मी कवी आहे. कवीची वृत्ती हीच माझी साधना! मी कोणाचा गुरु होऊ शकत नाही. “

अशा यानिरभिमानी, निरलस, व निरुपाधिक महाकवीस सादर प्रणाम!

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☆ गीत : ४९ ☆

YOU came down from your throne and stood at my cottage door.

I was singing all alone in a corner, and the melody caught your ear. You came down 

and stood at my cottage door.

Masters are many in your hall, and songs are sung there at all hours. But the simple carol of this novice struck at your love. One plaintive little strain mingled with the great music of the world, and with a flower for a prize you came down and stopped at my cottage door.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ४९ ☆

गात होतो तुझीच गीते

सूर, लय, ताल काहीच नव्हते

*

होती फक्त भक्तीने ओथंबलेली

म्हणूनच तुला ती इतकी भावली

*

शाही तुझे तख्त सोडून आलास

बावरलो मी, पाहून हसलास

*

पाऊल तुझे माझ्या कुटीत

अडखळलो मी तिथेच ताटीत

*

वाटलं, तुझा यक्ष-किन्नरांचा दरबार

मी गीतसागरातील एक तुषार

*

तुझे सारेच प्रहर गीतांचे

माझे सारे तुझ्याच नादाचे

*

भाग्य थोर, ते तुझ्या कानी पडावे

अन् तू माझ्या झोपडीत यावे

*

एक फूल माझ्या हाती दिलंस

आणि हे तुझं बक्षीस म्हणालास

*

अजून कवटाळतो ते फूल उराशी

अन् तुझी चरणधूळ कपाळाशी

*

– भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—–

☆ गीत : ५० ☆

I HAD gone a-begging from door to door in the village path, when thy golden chariot 

appeared in the distance like a gorgeous dream and I wondered who was this King of all kings! 

My hopes rose high and me thought my evil days were at an end, and I stood waiting for 

alms to be given unasked and for wealth scattered on all sides in the dust.

The chariot stopped where I stood. Thy glance fell on me and thou earnest down with a smile. I felt that the luck of my life had come at last. Then of a sudden thou didst hold out thy right hand and say “What hast thou to give to me?” 

 

Ah, what a kingly jest was it to open thy palm to a beggar to beg! I was confused and 

stood undecided, and then from my wallet I slowly took out the least little grain of corn and gave it to thee.

 

But how great my surprise when at the day’s end I emptied my bag on the floor to find a least little grain of gold among the poor heap. I bitterly wept and wished that I had had the heart to give thee my all.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ५० ☆

भीक मागत होतो दारोदार,

मी एक भिक्षेकरी

सुरेख स्वप्नांसारखा,

दिसला रथ तुझा सोनेरी

*

तू फेकलेल्या सुवर्णमुद्रा,

गोळा करीन म्हणतो

वाईट दिवस सरले,

आशेचे किरण पाहतो

*

अचानक थांबला रथ,

माझ्याच समोर येऊन

त्याचं तेज चमकलं,

नशीब उभं दार उघडून

*
‘ओम् भवती भिक्षां देही’ 

तू म्हणालास हात पसरून

असा कसा हा राजा जगतो 

भिकाऱ्याकडे भीक मागून

*

गोंधळलो मी, झोळीतून चार 

दाणे काढून दिले तुला

आल्यावर केली झोळी रिकामी,

तितकेच सुवर्ण दिलेस तू मला

*
मी रडलो, नाही ओळखले 

तुला कसे मी रे!

देण्यासाठी सर्वस्व होते,

सोने झाले असते की रे!

*

– भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९४५०२२८६५८

—–

☆ गीत : ५१ ☆

THE night darkened. Our day’s works had been done. We thought that the last guest 

had arrived for the night and the doors in the village were all shut. Only some said, The king was to come. We laughed and said “No, it cannot be!” 

It seemed there were knocks at the door and we said it was nothing but the wind. We put out the lamps and lay down to sleep. Only some said, “It is the messenger!” We 

laughed and said “No, it must be the wind!” 

There came a sound in the dead of the night. We sleepily thought it was the distant 

thunder. The earth shook, the walls rocked, and it troubled us in our sleep. Only some said, it was the sound of wheels. We said in a drowsy murmur, “No, it must be the rumbling of clouds!” 

The night was still dark when the drum sounded. The voice came “Wake up! Delay not! “We pressed our hands on our hearts and shuddered with fear. Some said, “Lo, there is the king’s flag!” We stood up on our feet and cried “There is no time for delay!” 

The king has come but where are lights, where are wreaths? Where is the throne to seat him? Oh, shame! Oh utter shame! Where is the hall, the decorations? Some one has said, “Vain is this cry! Greet him with empty hands, lead him into thy rooms all bare!” 

Open the doors, let the conch-shells be sounded! In the depth of the night has come the king of our dark, dreary house. The thunder roars in the sky. The darkness shudders with lightning. Bring out thy tattered piece of mat and spread it in the courtyard. With the storm has come of a sudden our king of the fearful night.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत: ५१ ☆

दिवस सरला, रात्र झाली

कष्टकरी दमला, दारे लागली

*

कुणी म्हणालं,

“राजा अजून यायचा आहे”

*

आम्ही हसलो, थाप पडली

वारा असेल, ज्योत विझली

*

कुणी म्हणालं,

“राजाचा दूत आला आहे”

*
गडगडू लागलं, पृथ्वी हलली

थरथरल्या भिंती, सारी दचकून उठली

*

कुणी म्हणालं,

“रथाच्या चाकांचा आवाज आहे”

*

आणखी गडद रात्र, ढोल वाजले

उठा, उशीर नको, शब्द कानी आले

*
कुणी म्हणालं,

“राजाचं निशाण फडकतं आहे”

*

रडू लागलो, दिवे कुठे आहेत?

रथ, दरबार कुठे, पुष्पहार कुठे आहेत?

*

कुणी म्हणालं,

“आता रडणं व्यर्थ आहे “

*

दारे उघडा, रिकाम्या खोलीत बोलवा

रिकाम्या हातांनीच भेटा, शंख वाजवा

*

कुणी म्हणालं,

“मध्यरात्री, भकास घरात राजा आला आहे “

*

अंधाराचा थरकाप, वीज आकाशात

फाटकी चटई, पसरा आवारात

*
कुणी म्हणालं,

“वादळाबरोबर, भयावह रात्रीचा राजा आला आहे”

*

कांही तयारी नको, दार फक्त उघडे ठेवा

तो भावाचा भुकेला, मन मात्र शुद्ध ठेवा

*

कुणी हुषार बोलला, “त्रैलोक्याचा राजा आला आहे”

*

– क्रमशः भाग १७..

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४३ – बुन्देली कविता – ”रिश्ते-नाते टोरत जा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – रिश्ते-नाते टोरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४३ ☆

☆ बुन्देली कविता – रिश्ते-नाते टोरत जा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

रिश्ते-नाते टोरत जा रय

मन की खीब बहोरत जा रय

*

हाँत फेर खें बे समझाउत

तुम उनखें झकझोरत जा रय

*

निकरौ बाहर खीब सपर लव

गैरी नदिया लोरत जा रय

*

कैत भले की, काय सुनत नइँ

जबरइँ दाँत निपोरत जा रय

*

राम-लखन ने तिलक लगाये

तुलसी चंदन गोरत जा रय

*

बे गोबिन्दा पहलमान हैं

कई मटकियाँ फोरत जा रय

*

पंडत जी खें काय भिड़ा दव

‘भगवत’ सपरत-खोरत जा रय

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९९ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९९ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक : सुरेश पटवा

प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल

मूल्य : ₹250

☆ विसंगतियों के विरूद्ध तीखा प्रतिकार है ‘व्यंग्य पच्चीसी’- – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी साहित्य जगत में अपनी बहुआयामी लेखनी से विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ रचनाकार सुरेश पटवा अब व्यंग्य की दुनिया में अपनी नई कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के साथ उपस्थित हैं। मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित यह संग्रह पटवा जी के गहन अनुभवों और समाज की विसंगतियों पर उनके पैनी दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।

 

विविधतापूर्ण लेखन का विस्तार

१९५२ में जन्मे सुरेश चंद्र पटवा एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक हैं, जिनकी स्वीकार्यता उनके भाषाई कौशल और पाठकीय संप्रेषणीयता से स्व-प्रमाणित है। बाल साहित्य, प्रकृति वर्णन, इतिहास, फिल्म जगत और मनोविज्ञान जैसे विविध विषयों पर अधिकारपूर्वक लिखने वाले पटवा जी ‘प्रयोगवादी’ रचनाकार हैं। ‘हिन्दू प्रतिरोध गाथा’ जैसी ऐतिहासिक कृति हो या ‘जंगल की सैर’ जैसी बाल रचना, उन्होंने हर विधा में अपनी शोधपरक दृष्टि का परिचय दिया है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पटवा जी का प्रथम व्यंग्य केंद्रित संग्रह है, जो समकालीन व्यंग्य लेखन की स्थापित सीमाओं को तोड़ता है। इनके आलेख किसी अखबार की शब्द-सीमा में बंधे न होकर विषय का विस्तार से विश्लेषण करते हैं। संग्रह में शामिल ‘अथ श्री मोबाइल कथा’ और ‘स्वर्गीय फेसबुकिया से संवाद’ आज के डिजिटल युग की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करते हैं। बिना पढ़े संदेश फॉरवर्ड करने की अंधी दौड़ और आभासी दुनिया में सक्रियता की होड़ को उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से उकेरा है।

साहित्यिक जगत पर कटाक्ष

संग्रह की रचनाएं जैसे ‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ लेखकों के ही आपसी अंतर्विरोधों और साहित्यिक परिवेश के वर्तमान हाल को उजागर करती हैं। वे बड़ी बेबाकी से लिखते हैं— “साहित्यजीवी भैया, असल में ईनाम वाली किताब और बिकने वाली किताब अलग-अलग होती हैं।” लोकभाषा का पुट और संवाद शैली उनके व्यंग्यों को और भी मारक बनाती है। ‘मैथी में पका नीम चढ़ा करेला’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से वे भाषाई उन्मुक्तता के साथ समाज और व्यवस्था पर चोट करते हैं।

अनुभव की परिपक्वता

अपने बैंक अधिकारी के सेवाकाल के अनुभवों को उन्होंने ‘छिद्दी का बकरी लोन’ जैसे व्यंग्य में पिरोया है, जो भ्रष्टाचार की जड़ों तक ले जाता है। वहीं ‘ओम बजटाय नमः’ और ‘अथ श्री कल्कि पुराण कथा’ जैसे शीर्षक दर्शाते हैं कि उन पर हरिशंकर परसाई जैसी महान व्यंग्य परंपरा का गहरा प्रभाव है, जिसे उन्होंने अपनी मौलिकता के साथ आगे बढ़ाया है।

निष्कर्ष

व्यंग्य केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने के लिए होता है। पटवा जी की यह कृति पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। बदलते समय के साथ जब घटनाएं खुद को दोहराती हैं, तब ये व्यंग्य और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। निश्चित ही, ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के माध्यम से सुरेश पटवा जी समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में एक सक्षम और संभावनाओं से भरपूर व्यंग्यकार के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ेंगे।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१६ – भारत की है शान, वंदेमातरम ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “भारत की है शान, वंदेमातरम। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१६ ☆

☆ भारत की है शान, वंदेमातरम… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

भारत की है शान, वंदेमातरम।

बंकिम जी का गान वंदेमातरम।।

 *

गोरों से लड़ी लड़ाई थी सबने।

आजादी का ज्ञान वंदेमातरम।।

 *

गाथाएँ बलिदानों की भरी हुईं।

जनता की अब तान, वंदेमातरम।।

 *

गांधी सुभाष आजाद भगत नारा।

स्वतन्त्रता बलिदान, वंदेमातरम।।

 *

झुका न पाया कभी तिरंगा कोई।

रखे हथेली जान, वंदेमातरम।।

 *

परिवर्तन आंदोलन का शस्त्र बने।

इस पर अब अभिमान, वंदेमातरम।।

 *

सैनिक कर्ज चुकाएँगे सीमा पर

कर्तव्यों का भान, वंदेमातरम।।

 *

राष्ट्रभक्ति की अलख जगाएंगे हम।

गाएंगे सब गान, वंदेमातरम।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६१ आद्या कीआराधना – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित लघुकथा आद्या कीआराधना ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६१ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕आद्या कीआराधना 🚩

बड़े भक्ति भाव से जिन कन्याओं को सिध्दी दात्री नवदुर्गा पूजन के बाद मंदिर में तामझाम के साथ कन्या भोज कराया गया था। समाज सेवक और कुछ शुभ चिंतकों की तस्वीरें दिखाई दे रही थी। लग रहा था, श्रद्धा की भावना उमड़ रही है।

आज भोर होते ही आसपास की सभी बिटिया मंदिरों पर सफाई करते नजर आई।

पान चबाते वही सब कहते जा रहे थे – – – देख वहाँ से सब साफ होना चाहिए। एक भी कचरा नही होना चाहिए।

माथे पर जय माता दी की पट्टी लगाये सभी बालिकाएं मंदिर की साफ सफाई करते भगवती को सुना रही थी–झुन झुन झननन बाजे मैय्या पाँव पैजनियांँ।

कैसी आद्या शक्ति की भक्ति।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७२ – देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७२ ☆ देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज उपरोक्त ख़बर दैनिक समाचार पत्र में पढ़ी तो बड़ा सुकून मिला। जबसे होश संभाला है, जीवन में जब भी कोई मिला, हर व्यक्ति ये ही कहता रहा, “तुम कुछ भी नहीं करते हो”।

आज इस खबर से बड़ी राहत मिली। बचपन में पाठशाला के शिक्षक, परिजन आदि सभी ये ही कहते थे, कब तुम कुछ करोगे? अब बड़े हो रहे हो, कब कुछ करोगे ?

महाविद्यालय के गुरुजन भी ये ही तोहमत दिया करते थे। जीवन में क्या करोगे? आदि आदि। विवाहोपरांत भी पत्नी ये ही कहती आ रही हैं, तुम तो निठल्ले हो, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है।

कार्यालय के साथी भी वरिष्ठ अधिकारी से कह देते थे, हमारे पास तो कोई काम है, ही नहीं, इसी चक्कर में सभी सीटों का पेंडिंग कार्य हमें ही करना पड़ता था। ठप्पा जो लगा हुआ था, कि हमारे सीट पर कुछ भी काम नहीं है।

बच्चे, अब बड़े हो गए हैं, वो भी मीठे शब्दों में ऐसा ही कुछ कह देते हैं। जो करना है, जल्दी करना आरंभ कर देवें। जीवन में एक्टिव रहना चाहिए।

मित्र मंडली भी खुले आम, भरी महफिलों में हमारी फुरसतिया आदत का मखौल उड़ाते रहते हैं।

अब सब का मुंह बंद हो जायेगा, जब उनको मालूम चलेगा हम वर्षों से कुछ नहीं कर, दिमाग को ब्रेक दिए हुए हैं। अब जब भी ब्रेक समाप्त होगा, हम बहुत कुछ कर सकने लायक बन जाएंगे। बस दिल साथ नहीं दे रहा, वो कमबख्त तो ये चाहता है, हम कभी भी कुछ ना करें।

हद, तो तब हो जाती है, दिल के निकट वाले दोस्त इस लेख को पढ़ कर ये कह देते हैं, उसके पास कोई काम नहीं है, बस मोबाइल में कुछ भी लिख कर सांझा कर देता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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