हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ख़ुश्बू-ए-गुलाब-से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – ख़ुश्बू-ए-गुलाब-से…!

☆ ॥ कविता॥ ख़ुश्बू-ए-गुलाब-से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सरहदों  के  पार  भी धड़कते हैं दिल,

ख़ुश्बू- ए-गुलाब-से महकते हैं दिल।

*

ये आस्मां  किसी की मिल्कियत नहीं,

स्वाधीन  पँछियों-से  चहकते हैं दिल।

*

दासता की ज़ंजीरों में जिस्म जकड़े हैं,

समंदर की  मौजों-से मचलते हैं दिल।

*

सूरज- चाँद का मिलन मुमकिन नहीं,

विरहा  की  आग  में  दहकते हैं दिल।

*

जज़्बातों पर कब किसका ज़ोर चला,

यादों  के  मैखानों  में बहकते हैं दिल।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ स्क्रीन की चमक में धुंधले होते रिश्ते… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ स्क्रीन की चमक में धुंधले होते रिश्ते…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“एक मिनट… बस ये मैसेज भेज दूँ…”

पिता ने मोबाइल स्क्रीन से नज़र हटाए बिना कहा।

बेटी कुछ देर चुप खड़ी रही।

फिर धीमे स्वर में बोली –

“पापा, आप हमेशा फोन से बात करते रहते हो…

हमसे कब बात करोगे?”

कमरे में अचानक एक अजीब-सी खामोशी उतर आई।

शायद किसी ने पहली बार महसूस किया कि घर में सब साथ होते हुए भी कहीं न कहीं एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।

 

तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है।

आज मोबाइल फोन हमारी दिनचर्या का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना कुछ घंटों की कल्पना भी कठिन लगती है। काम, पढ़ाई, खरीदारी, बैंकिंग, मनोरंजन और संवाद – सब कुछ अब स्क्रीन पर सिमट आया है।

लेकिन सुविधा की इस चमक के पीछे एक सच्चाई धीरे-धीरे और स्पष्ट होती जा रही है –

स्क्रीन जितनी चमक रही है, रिश्ते उतने ही धुंधले होते जा रहे हैं।

आज सुबह उठते ही सबसे पहले लोग अपने प्रियजनों का चेहरा नहीं, मोबाइल स्क्रीन देखते हैं। रात को सोने से पहले भी आखिरी नजर फोन पर ही जाती है। दिनभर नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और लगातार आती सूचनाएँ हमारे मन को हर समय व्यस्त रखती हैं।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर के लोगों से जुड़े हुए हैं, लेकिन अपने ही घर के लोगों से बातचीत कम होती जा रही है।

पहले परिवारों में साथ बैठकर चाय पीना, दिनभर की बातें साझा करना और बिना किसी कारण घंटों बातचीत करना सामान्य बात थी। आज वही समय मोबाइल स्क्रॉल करने में बीत जाता है।

एक ही कमरे में बैठे लोग अलग-अलग डिजिटल दुनिया में खोए रहते हैं।

बातचीत छोटी हो गई है।

धैर्य कम हो गया है।

और रिश्तों में वह सहजता भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जो कभी परिवारों की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी।

सबसे अधिक प्रभाव बच्चों और युवाओं पर दिखाई दे रहा है।

आज बच्चे मैदानों से ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताते हैं। परिवारों के भीतर संवाद की जगह वीडियो और रील्स ने ले ली है। कई बच्चे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के बजाय मोबाइल में सुकून ढूँढने लगे हैं।

दूसरी ओर, बड़े भी इससे अछूते नहीं हैं।

कई बार माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं। धीरे-धीरे स्क्रीन “परिवार” की जगह लेने लगती है।

सोशल मीडिया ने तुलना की एक ऐसी संस्कृति भी पैदा कर दी है, जहाँ लोग दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी खुशियों को कम आँकने लगते हैं। हर समय “अपडेटेड” रहने की होड़ ने मन को बेचैन बना दिया है।

 

लोग अब जीने से ज्यादा “दिखाने” में व्यस्त हो गए हैं।

किसी यात्रा का आनंद लेने से पहले उसकी तस्वीर पोस्ट करना जरूरी लगने लगा है। खाने का स्वाद लेने से पहले उसकी फोटो खींची जाती है। धीरे-धीरे वास्तविक अनुभवों से ज्यादा उनका प्रदर्शन महत्वपूर्ण होने लगा है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम ध्यान क्षमता को कम करता है, नींद को प्रभावित करता है और चिंता तथा अकेलेपन जैसी समस्याओं को बढ़ाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोग अब “अकेले बैठना” भूलते जा रहे हैं।

हर खाली पल मोबाइल से भर दिया जाता है।

लेकिन इंसान को केवल सूचना नहीं, शांति भी चाहिए।

और शांति लगातार स्क्रीन देखने से नहीं, कभी-कभी उससे दूरी बनाने से मिलती है।

यही कारण है कि आज “डिजिटल उपवास” जैसी अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उपवास किया जाता है, उसी प्रकार मन को भी समय-समय पर डिजिटल विश्राम की आवश्यकता होती है।

डिजिटल उपवास का अर्थ तकनीक छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है – तकनीक के साथ संतुलित संबंध बनाना।

यदि दिन का कुछ समय मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर बिताया जाए, तो व्यक्ति धीरे-धीरे मानसिक रूप से अधिक शांत महसूस करने लगता है। परिवार के साथ बैठना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना, टहलना या बिना किसी स्क्रीन के कुछ पल स्वयं के साथ बिताना मन को भीतर से हल्का करता है।

विशेष रूप से परिवारों को कुछ छोटे नियम बनाने की आवश्यकता है।

जैसे –

भोजन के समय मोबाइल नहीं,

सोने से पहले स्क्रीन बंद,

और दिन में कुछ समय पूरी तरह ऑफलाइन।

ये छोटे बदलाव रिश्तों में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

आज बच्चों को केवल डिजिटल शिक्षा नहीं, डिजिटल संतुलन भी सिखाने की आवश्यकता है। उन्हें यह समझाना होगा कि तकनीक उपयोग की वस्तु है, जीवन का केंद्र नहीं।

वहीं बड़ों को भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यदि माता-पिता हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से संतुलन की अपेक्षा करना कठिन होगा।

हमें यह समझना होगा कि तकनीक ने सुविधा दी है, लेकिन संवेदनाएँ अब भी इंसानी संवाद से ही जीवित रहती हैं।

एक मुस्कान,

एक बातचीत,

एक साथ बैठा हुआ परिवार –

इनका कोई डिजिटल विकल्प नहीं हो सकता।

“जहाँ बातचीत कम होने लगती है,

वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे मौन में बदलने लगते हैं।”

अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि मोबाइल हमारे हाथ में है या नहीं।

प्रश्न यह है कि क्या हमारा समय, हमारा ध्यान और हमारे रिश्ते अब उसके नियंत्रण में जा रहे हैं?

यदि इसका उत्तर हमें असहज करे, तो शायद समय आ गया है थोड़ा ठहरने का।

क्योंकि सच यही है –

स्क्रीन की चमक कुछ पल आकर्षित कर सकती है,

लेकिन जीवन की असली रोशनी रिश्तों से ही आती है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ मातृत्व ☆ मोहम्मद जिलानी ☆

मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मातृत्व.)

🌱 लघुकथा – मातृत्व🌷

“मां! आखिर तू नाराज़ किस बात से है? दो साल हो गए, तेरा गुस्सा किसी न किसी बहाने हम दोनों पति-पत्नी पर फूटता है। तू चाहती क्या है?” 

सुरेंद्र के स्वर में झुंझलाहट से ज़्यादा थकान थी।

“मैं क्या चाहती हूं, ये तुझे बखूबी मालूम है।” कह कर कमला ने मुंह फेर लिया।

“मां, जो हो नहीं सकता, उसे बार-बार दुहराने से क्या फायदा?” 

“तो सुन ले बेटा! मैं चाहती थी कि तू मेरी पसंद की लड़की से ब्याह करें। पर तूने अपनी ज़िद में उससे शादी की, जिसे मैं पहले ही दिन से नकार चुकी थी।”

“मां, सुनिधि शुरू से तुम्हारी सेवा में दिन रात लगी रहती है… फिर भी तुम हर दिन उसे किसी न किसी बात पर कोसती हो।” 

“बात तो सही है। पर छुरी कितनी भी तेज़ हो, उससे कोई अपना गला तो नहीं कटवाता न?”

सुरेंद्र की आंखें सख्त हो गईं।

“तू अच्छी तरह से जानती है कि मैं तेरा एकलौता बेटा हूं। आज तक तेरी हर बात मानी है। पर इस बार तेरी ज़िद नहीं मान सकता।”

कमला गुस्से में खड़ी हो गई। आवाज़ में अंगारे थे—

“तो सुन सुरेंद्र, अब इस घर में या तो वो रहेगी या मैं।”

यह सुनकर सुरेंद्र भीतर तक हिल गया। खुद को संभालकर धीमे से बोला— 

“ठीक है। मैं कल ही वकील से मिलकर सुनिधि से तलाक की कार्रवाई शुरू करवाता हूं।” 

एक पल रुककर, डूबे हुए स्वर में आगे कहा— “पर मां, इस वक्त उस पर ये सब करना घोर अन्याय होगा… क्योंकि वो मां बनने वाली है। कभी भी खुशखबरी आ सकती है।”

‘मां बनने वाली है’ — ये चार शब्द कमरे की गरम हवा में ठंड़े झोंके की तरह लहरा गये। कमला के चेहरे पर हास्य के रंग छा गये। कड़क आवाज़ एकदम से शांत हो गयी।

आधी रात को सुरेंद्र का मोबाइल बजा। दूसरी तरफ से उसकी सास की आवाज़ आई— “जवाई बाबू… अभी-अभी सुनिधि ने बेटे को जन्म दिया है। तुम बाप बन गए हो।”यह सुनकर सुरेंद्र खुशी से उछल पड़ा। “क्या? यह सच?” 

“अरे! क्या हुआ?” कमला ने हड़बड़ाकर पूछा। 

सुरेंद्र की आंखें चमक उठीं। गर्व से भरकर बोला— “मां, तू दादी बन गई है।”

यह सुनते ही कमला का बुझा चेहरा ऐसे दमक उठा, जैसे किसी ने दिया जला दिया हो। सारा गुस्सा, सारी कड़वाहट एक पल में बह गई। 

“चल उठ! अभी के अभी अस्पताल चलना है। मुझे मेरे पोते का मुंह देखना है।” खुशी से अधीर कमला ने बेटे को लगभग धकेल ही दिया।

अस्पताल पहुंचते ही कमला लपककर वार्ड में घुसी। अपने नन्हे पोते को गोद में उठाया और उसका माथा चूमने लगी.

अपने पति और सास को यूं खुशी से सराबोर देख सुनिधि के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। पर उसकी आंखें भर आईं और

मन ही मन सोच रही लगी—”क्या एक नारी को परिवार और समाज में इज़्ज़त, प्यार और मान पाने के लिए ‘मां’ बनना  ज़रूरी है?”यह

सोचते-सोचते उसकी नज़रे सामने दीवार पर टंगी बाल-कृष्ण और यशोदा मैया की तस्वीर पर जाकर ठहर गई।

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८१ – दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला – आम खास का खास है)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८१ ☆

☆ दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आम खास का खास है, खास आम का आम.

सलिलदाम दे आम ले, गुठली ले बेदाम..

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आम न जो वह खास है, खास न जो वह आम.

आम खास है, खास है आम, नहीं बेनाम..

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पन्हा अमावट आमरस, अमकलियाँ अमचूर.

चटखारे ले चाटिये, मजा मिले भरपूर..

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दर्प न सहता है तनिक, बहुत विनत है आम.

अच्छे-अच्छों के करे. खट्टे दाँत- सलाम..

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छककर खाँय अचार, या मधुर मुरब्बा आम .

पेड़ा बरफी कलौंजी, स्वाद अमोल-अदाम..

.

लँगड़ा, हापुस, दशहरी, कलमी चिना बदाम.

सिंदूरी, नीलमपरी, चुसना आम ललाम..

.

चौसा बैगनपरी खा, चाहे हो जो दाम.

सलिलआम अनमोल है, सोच न- खर्च छदाम..

.

तोताचश्म न आम है, तोतापरी सुनाम.

चंचु सदृश दो नोक औ‘, तोते जैसा चाम..

.

हुआ मलीहाबाद का, सारे जग में नाम.

अमराई में विचरिये, खाकर मीठे आम..

.

लाल बसंती हरा या, पीत रंग निष्काम.

बढ़ता फलता मौन हो, सहे ग्रीष्म की घाम..

.

आम्र रसाल अमिय फल, अमिया जिसके नाम.

चढ़ा देवफल भोग में, हो न विधाता वाम..

सलिलआम के आम ले, गुठली के भी दाम.

उदर रोग की दवा है, कोठा रहे न जाम..

चाटी अमिया बहू ने, भला करो हे राम!.

सासू जी नत सर खड़ीं, गृह मंदिर सुर-धाम..

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००५ ⇒ दीवारों के कान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दीवारों के कान।)

?अभी अभी # १००५ ⇒ आलेख – दीवारों के कान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुना है, दीवारों के भी कान होते हैं, कभी देखा नहीं ! वैसे हम सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन हमने भी दीवारों को हमारी बातें सुनते, देखा है। अब आंखों देखी बात तो झूठ नहीं हो सकती न। उनकी पीठ सुनती है, हमने लोगों को कहते सुना है। जब पीठ सुन सकती है, तो दीवार क्यों नहीं।

बात कभी यूं ही शुरू नहीं होती ! हम जब आपस में बातें करते हैं, तो बेचारी दीवारें कान लगाकर हमारी बात सुनती हैं। दीवार खड़ी ही इसीलिए होती है, कि कोई बाहर वाला हमारी बातें नहीं सुने। दीवार तो एक आड़ है। अगर दीवार नहीं होती तो शायद बात, दूर तलक जरूर जाती।।

हुआ यह कि अभी कुछ दिनों के लिए हम दीवारों को ताले में बंद कर बाहर गांव चले गए। आप भले ही मुंबई जाएं, या नोएडा, बाहर जाने को बाहर गांव जाना ही कहते आए हैं हम तो। खैर, हम तो घर ताला लगाकर, दीवारों के भरोसे छोड़ गए। आजकल कोई दीवार फांदकर घर में प्रवेश नहीं करता।

हो सकता है, हमारे घर से बाहर जाने के बाद, दीवारों ने यह गाना गाया हो ;

दीवारों से, ये मत पूछो

दीवारों पे क्या, गुजरी है

गुजरी है…

Who cares! मिट्टी, ईंट, सीमेंट की दीवार, हम उसे ज्यादा मुंह नहीं लगाते। खैर, दो चार दिनों में हमें वापस घर तो आना ही था, दरो दीवार से सामना करना ही था।।

हम जैसे ही मध्य रात्रि को वापस घर आए, दीवारें ज्येष्ठ की गर्मी में भट्टी जैसी तप रही थी, और सांय सांय कर रही थी। सन्नाटे का शोर हमें दीवारों से आता प्रतीत हुआ। पहले हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। यह आवाज दीवारों से आ रही है, या फिर हमारे कान बज रहे हैं।

हमें अपने कानों पर तो भरोसा था, लेकिन हमारे कानों को दीवार से आती सांय सांय आवाज पर भरोसा नहीं हो रहा था।

हमारे आने से शायद दीवारों को भी ठंडक मिली, क्योंकि हमने आते ही कूलर में पानी डाला, पंखे चालू किए और सुबह होते ही मुरझाए हुए पौधों को पानी पिलाया।।

आप मानें या ना मानें, सुबह तक दीवारें शांत हो चुकी चुकी थी। जो भी सांय सांय अथवा सिसकी जैसी आवाज थी, वह थम चुकी थी, हमें लगा, अब दीवारें हमसे बातें करना चाहती हैं।

हमने मंदिर में मूर्तियों को बोलते, बातें करते सुना और देखा है। दीवार पर लगी कुछ तस्वीरें भी बोलती हैं, हमसे बातें करती हैं। दीवारें इस घर में हमसे पुरानी हैं। नींव के साथ साथ ही खड़ी हुई हैं। हमारी एक तरह से बुनियाद है यह दरो दीवार। आज हमें महसूस हुआ, हमसे ही घर, घर कहलाया, और दीवारों ने भी यही दोहराया।।

इसे जब हम दीवाल THE WALL कहते हैं तो यह मजबूती से खड़ी रहती है, लेकिन जब यही दीवार, नफरत की दीवार हो जाती है, तो THE WAR हो जाती है। वैसे इन दीवारों का दिल भी होता है, जो धड़कता भी रहता है, लेकिन हम सब इस सत्य से अनजान, दीवारों में सूराख किया करते हैं, एक नहीं कई, और उसमें कीलें ठोका करते हैं, मानो दीवार, दीवार नहीं, कोई सलीब हो। और उस पर प्रेम से कैलेंडर और तस्वीर टांग दिया करते हैं। फिर भी दीवार कभी उफ तक नहीं करती।

अब घर हमें काटने को नहीं दौड़ता। दीवारें हमारा दुख दर्द सुनती, समझती, जानती हैं, हमने भी उसका दुख, दर्द पहचान लिया है। हम दीवारों से अब माथा नहीं फोड़ते, अपना सर नहीं खपाते, माथा झुकाकर उसका धन्यवाद करते हैं। बहुत कुछ कहने, सुनने लग गई हैं आजकल दीवारें, क्योंकि अब उसके और हमारे बीच कोई पर्दा नहीं, कोई दीवार नहीं..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (1 जून से 7 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (1 जून से 7 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कहते हैं

“हरि अनंत हरि कथा अनंता।

कहहिं सुनहिं बहुबिधि जसब संता॥

भगवान अनंत है और उनकी कृपा भी अनंत है। इसी प्रकार हमारे श्री हनुमान जी भी अनंत प्रकार से हमारी रक्षा करते हैं और उनको याद करने का सबसे अच्छा तरीका श्री हनुमान चालीसा का पठन-पाठन है। आज की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है :-

भूत पिसाच निकट नहिं आवै |

महाबीर जब नाम सुनावै ||

लाभ:- इस चौपाई के संपुट पाठ करने से बुरी आत्मा, भूतप्रेत आदि अगर आपके पास आ गए हैं तो दूर भाग जाएंगे अन्यथा आपके पास नहीं आएंगे।

नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 1 जून से 7 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, बुध और शुक्र मिथुन राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। गुरु प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेंगे तथा 2 तारीख के 1:57 दिन से कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। क्रोध की मात्रा थोड़ी बढ़ सकती है। अगर आपको श्वास संबंधी कोई रोग है तो उसमें आपको लाभ होगा। धन आने की मात्रा में थोड़ी कमी हो सकती है। आपको अपने संतान से सहायता मिल सकती है। आपकी प्रतिष्ठा में इस सप्ताह वृद्धि होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। 1 जून को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आप कचहरी के कार्यों में सफल हो सकते हैं। धन आने का उत्तम योग बनेगा। व्यापार में लाभ होगा। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपको अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए, भाग्य पर नहीं। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अगर वह कहीं कार्यरत है तो उनको वहां सफलता मिलेगी। अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपको अपने कार्य स्थल पर सावधानी पूर्वक बात करना चाहिए। क्रोध में नहीं आना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 6 तारीख की दोपहर से लेकर 7 तारीख तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता दायक है। एक, 2 और 3 जून को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें अक्षत और लाल पुष्प डालकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रह सकता है। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि संभव है। प्रेम संबंधों में स्थायित्व भी आएगा। नौकरी के मामले में सफलता का योग है। कचहरी के मामले में आपको सावधान रहना चाहिए। धन आने का उत्तम योग है। भाग्य के मामले में आप सावधान रहें। आप अपने कर्मों पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। शत्रुओं को आप थोड़े से प्रयास से परास्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून कार्यों को करने हेतु सफलता दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कार्यालय में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करने में सफलता मिल सकती है।। भाग्य से मामूली मदद प्राप्त हो सकती है।। कार्यालय में आपको अपने साथियों और अधिकारियों का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए।। इस सप्ताह आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा।। आपके संतान की उन्नति भी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख की दोपहर तक का समय कार्यों को करने में मददगार है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। भाग्य से भी आपको मदद मिल सकती है। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आप या आपके जीवन साथी में से किसी एक को शारीरिक कष्ट हो सकता है। आपको अपने संतान से कोई विशेष सहयोग नहीं मिलेगा। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन तारीख ठीक-ठाक है। 1 तारीख को आपको अपने प्रतिष्ठा और माता जी के प्रति थोड़ा सा तक रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी का ध्यान करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा उनको अपने कार्यालय में अधिकारियों एवं सहयोगियों से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा व्यापार उत्तम चलेगा अगर आप नए व्यापार का प्रयास कर रहे हैं तो एक बड़े व्यापार की नींव डाल सकते हैं। भाग्य से आपको इस सप्ताह कोई विशेष मदद नहीं मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन तारीख लाभदायक है। इन दोनों तारीखों में आपके द्वारा किए जा रहे अधिकांश कार्य सफल होंगे। इस सप्ताह 1 तारीख को आपको अपने भाई बहनों का सहयोग प्राप्तहो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी की पूजा करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद मिलेगी। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। व्यापारियों का व्यापार भी अच्छा चलेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को उनके कार्यालय में अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। परंतु उनको बहुत सावधान होकर कार्य करना चाहिए। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक हैं। 1 जून को आपको धन के मामले में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका बहुत अच्छी तरह से साथ देगा। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुके हुए हैं उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं का बड़ी आसानी के साथ थोड़े से प्रयास से ही सफाया कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपको अपने जीवनसाथी के स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 6 और 7 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल हैं। 1 तारीख को आपको अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

अगर आप अविवाहित हैं तो यह समय आपके लिए काफी अच्छा है। आपके विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। पुराना अगर कोई प्रस्ताव चल रहा है तो विवाह तय भी हो सकता है। नए-नए संबंध बन सकते हैं। पुराने संबंधों में वृद्धि हो सकती है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। व्यापार में प्रगति होगी। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। आपको अपने दुश्मनों से इस सप्ताह थोड़ा सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून परिणाम दायक हैं। 1 जून को आपको कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए काफी अच्छा रहेगा। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आपको गलत रास्ते से धन की प्राप्ति हो सकती है। धन प्राप्ति का ठीक-ठाक योग है। इस सप्ताह आपके लिए चार पांच और छे तारीख उत्तम है। दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। 1 तारीख को आपको अपने धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आप अपने भाई बहनों के साथ संबंध अच्छा रहेगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। संतान का आपको अच्छा समर्थन प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक रहेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपनी प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको कम मदद मिलेगी। आपको अपने परिश्रम से कार्यों को संपन्न करना होगा। इस सप्ताह आपके लिए 6 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 7 तारीख कार्यों को करने के लिए उत्साहवर्धक हैं। चार-पांच और 6 तारीख के दोपहर तक आपको सतर्क रहना चाहिए। 1 तारीख को आपको अपने कार्यालय में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके थोड़े से प्रयास से ही आपकी प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि होगी। लोगों के बीच में आपकी स्वीकारता बढ़ेगी। आपको सम्मान प्राप्त होगा। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक रहेगी। अगर आप व्यापारी है तो आपका व्यापार अच्छा चलेगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। आपके संतान को उनके कार्यों में सफलता मिल सकती है। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। परीक्षाओं में आपको सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून कार्यों को करने हेतु मददगार है। 6 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर और 7 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हसू… ☆ श्री राजकुमार कवठेकर ☆

श्री राजकुमार दत्तात्रय कवठेकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ हसू … ☆ श्री राजकुमार कवठेकर ☆

तुला मी हासलेले पाहिले

हसू आनंदलेले पाहिले

*

कुणी खांदा दिला माझ्या शवा?

सगे मी पांगलेले पाहिले

*

मला जे वाटले होते सुखी

मनी भेगाळलेले पाहिले

*

इथे जे हिंडती तोऱ्यामध्ये

‘तिथे’ ते वाकलेले पाहिले

*

रडू जे लागले त्यांनी मघा

हसू ते दाबलेले पाहिले

*

प्रवाही ते जरी झाले अता

तसेही साचलेले पाहिले

*

दिसायाला जरी संन्यस्त ते

मघा संतापलेले पाहिले

*

उन्हाचे ना मला अप्रूप या

उन्ही या रापलेले पाहिले

*

मनांच्या हिंडता वाटांवरी

धुके मी दाटलेले पाहिले

*

अशी ती भेट गे माझी-तुझी

क्षणांना भारलेले पाहिले

© श्री राजकुमार दत्तात्रय कवठेकर

कवी / गझलकार

संपर्क : ओंकार अपार्टमेंट, डी बिल्डिंग, शनिवार पेठ, आशा  टाकिज जवळ, मिरज मो ९४२११०५८१३

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ खाणं आणि पिणं ! ! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक

? विविधा ?

🕺🤣 खाणं आणि पिणं ! 🤣😅  श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

लेखाच शिर्षक वाचून खवय्ये आणि पिवय्ये (हा मी न पिता शोधलेला शब्द) हे दोघंही खूप खूष झाले असतील ! तशी या दोन्ही कॅटेगरी मधल्या लोकांची आपल्याकडे कधीच कमतरता नव्हती आणि पुढील काळात यातील खवय्यांची संख्या जरी डाएटच्या नवं नवीन फ्याडामुळे कमी होतं गेली तरी पिवय्यांची संख्या पुढील काळात वाढतीच राहील, हे सांगायला कोणी कुठलंही पेय प्यायची गरज नाही ! कारण न पिणारा किंवा पिणारी ही जमात हल्ली जवळ जवळ नामशेष होत चालली आहे. त्याची कारणं वगैरेचा उहापोह करण्यासाठी आणि “पिणं” या एका शब्दावर लिहायचं झालं तर त्यासाठी एक वेगळा स्वतंत्र लेख लिहावा लागेल ! आणि तो सुद्धा “संध्याकाळी व्यवस्थित बसूनच” लिहावा लागेल, हे व्होडका आणि डिस्टील वॉटर इतकं पारदर्शक सत्य आहे ! वाचकहो आता नमनाला एवढं तुम्हाला “हाय” करून झाल्यावर, (झाला नसलात तरी) मूळ विषयाकडे माझी गाडी वळवतो.

आज मी हा जो “खाणं” शब्द घेतला आहे त्याचा आपल्या हातांशी आणि तोंडाशी काडीचा संबंध नाही. त्याच काय आहे नां मंडळी, आपली मराठी भाषा इतकी प्रगल्भ आहे की आपल्या या “अभिजात मराठी भाषेत” (इतक्या वर्षांनी कां होईना, पण मिळाला बाबा एकदाचा अभिजात भाषेचा दर्जा आपल्या माय मराठीला !) असे अनेक शब्द आहेत, की त्यातील एकेका शब्दाचे अनेक अर्थ होतात हे आपण सुज्ञ वाचक असल्यामुळे जाणताच. त्यामुळे खाणं हा शब्द वाचल्या वाचल्या आपल्या डोळ्यासमोर नाष्ट्यापासून आपल्याला आपल्या जेवणात असलेले आपले आवडीचे काही पदार्थ येणं, हे आपण खऱ्या अर्थाने खवय्ये नसालत तरी, स्वाभाविकच आहे. त्याला तुमचा इलाज नाही, पण मी “खाणं” या शब्दाचे आपल्याला जे अर्थ सांगणार आहे, त्याचा वर म्हटल्याप्रमाणे खऱ्या खाण्याशी काडीचा, अगदी टूथपीकइतका सुद्धा संबंध नाही ! त्यामुळे आपण थोडा डोक्याला ताण दिलात आणि पुढील लेख, डोक्यातील आणि डोळ्यासमोर आलेले खाण्याचे पदार्थ आणि मनांतली भूक काढून टाकून वाचलात, तर मी काय म्हणतोय ते आपल्या सारख्या प्रगल्भ वाचकांना नक्कीच कळेल. लेख वाचून झाल्या नंतरच आपण आपल्या रसना देवीला आपले आवडीचे खरं खाणं खाऊन तृप्त करावे अशी नम्र विनंती ! असो !

तर मंडळी, लहानपणी आपण सगळेच घरीदारी, शाळेत दंगामस्ती करत मोठे झालो हे जवळजवळ सगळेच वाचक मान्य करतील. त्यामुळे माझ्या पिढीतील (सध्या वय फक्त ७२!) त्या वेळच्या मास्तरांच्या हातचा मार मी कधीच खाल्ला नाही, हे असं कुणी म्हणणं निदान मला तरी न पटणार आहे. अर्थात “त्याकाळी” मुलींनी आणि मुलांनी केलेली दंगामस्ती यात, “हल्लीची” हिंसक दंगल आणि एखादा खरोखरचा निषेध मूक मोर्चा इतकं अंतर होत, हे ही तितकंच खरं. पण आत्ताची मुला मुलींची दंगामस्ती एकमेकांवर सर्वच बाबतीत कुरघोडी करण्यापर्यंत गेली आहे, हे ही एक आजच वास्तव आहे, यात दुमत असण्याचं कारण नाही. म्हणून आपले आई, वडील अथवा शिक्षक कितीही प्रेमळ असले आणि त्यांच्या हातचा मार आपण कधीच खाल्ला नसेल असं आपण गृहीत धरलं तरी, आपल्याला त्यावेळेस त्यांच्या हातांच्या ऐवजी कडक “शब्दांचा मार” नक्कीच खावा लागला असेल, हे आपण आत्ता तरी नक्कीच मान्य करायला हरकत नसावी !

कधी कधी आपण एकटेच आपल्या विचारांच्या तंद्रित बाहेर पडलेले असतो. डोक्यात काही ना काही विचारचक्र चालू असतं, काहीतरी टेन्शन असतं, कसली तरी समस्या भेडसावतं असते. बाहेर पडल्यावर फिरून आल्यावर जरा बरं वाटेल, या एकाच उद्देशाने आपण निरर्थकपणे निघालेलो असतो. अशावेळी आपल्या विचारांची तंद्री भंग करणारी आपल्या नावाची हाक आपल्या कानावर पडते. आपण हाक आलेल्या दिशेने चमकून बघतो तर आपल्याला एक ओळखीचा चेहरा दिसतो. त्याच नांव आठवायचा आपण प्रयत्न करतो पण तो पर्यंत तो जवळ येताच, आपण उसन हसून “काय कसा आहॆस?” असं विचारून वेळ मारून नेतो. नंतरचा पाऊण एक तास, आपल्याला ज्या विषयात अजिबात इंटरेस्ट नाही असे अनेक वेगवेगळे विषय काढून तो आपलं डोकं “खाण्यात” घालवतो आणि आपण सुद्धा न रागावता नाईलाजाने मधून मधून त्याच्या भाषणाला प्रतिसाद देत असतो ! त्याला जरा घाईत आहे असं सुचवून देखील, तो अट्टाहासाने आपल्या डोक्याबरोबर आपला (बहुमूल्य?) वेळ सुद्धा “खात” असतो !

Other side of the grass is always greener ! ही इंग्रजी म्हण, काही काही लोकांच्या बाबतीत अगदी बररोब्बर लागू पडते मंडळी ! म्हणजे कसं असतं नां, स्वतःकडे सगळं काही असलं तरी दुसऱ्याकडे असलेली आणि आपल्याकडे नसलेली एखादी वस्तू बघून, त्याच्यावर हे अल्पसंतुष्ट लोकं उगाचच “खार” खात असतात. पण त्यात त्यांचच नुकसान आहे हे कळण्याच्या पलीकडे त्यांची विचारांची उडी तो “खार” खाण्याच्या नादात पोहचतच नाही, त्याला आपण तरी काय करणार ? एखाद्याचा असा “खार” खाण्याचा स्वभाव बदलणं हे महाकर्म कठीण !

एखाद्या कलेत अथवा कुठल्याशा विषयात थोडी फार पारंगत असलेली व्यक्ती त्याला किंवा तिला ती कला कोणी सादर करायला सांगितली, तर काहीतरी कारण सांगून तो किंवा ती उगाच “भाव” खात असते ! अशावेळी आपण त्याला किंवा तिला कितीही आग्रह केला, तरी ती किंवा तो अजिबात बधत नाही म्हणजे नाहीच ! या मागे त्याच किंवा तिच अर्थकारण सुद्धा असू शकत असं मग अनेक माणसांना तसं नसलं तरी, वाटून जातं. या अर्थकारणावरून मला काही काही लोकांचं आजकाल बोकाळलेले दुसरच खाणं आठवलं. म्हणजे कसं आहे नां मंडळी, हल्ली काही काही लोकं कुठल्याही कामात “मेरा क्या?” असा सवाल करून, तर कधी कधी असा सवाल न करताच चक्क “पैसे खातात !” आणि अशी एखादी अती खादाड व्यक्ती जर चुकूनमाकून ACB च्या जाळ्यात अडकली तर त्याला बोल लावणारे लोकं, कारण कळेपर्यंत ऑफिसात “शेण खाल्लं” असेल असं बोलायला मोकळे ! मारणाऱ्याचा हात धरता येतो, पण बोलणाऱ्याच तोंड कसं धरणार? काय बरोबर नां?

एखाद्या भांडणाचं पर्यवसान हातघाईवर येण्या आधी जेंव्हा फक्त तोंडापर्यंत मर्यादित असतं तेंव्हा, दोन्ही भांडणारे गट एकमेकांना यथेच्छ “शिव्या खायला” घालतात ! अशावेळी झालेला “अपमान खाता” येत नाही आणि त्यासोबत आलेला राग सुद्धा खायचा म्हटलं तरी कोणी खाऊ शकत नाही. पण त्याला पर्याय म्हणजे अशावेळी आलेला राग आणि झालेला अपमान हे दोन्ही “गिळायची” सोय आपल्या अभिजात मराठी भाषेत आहे ! काही काही लोकं त्यांना आलेला राग व्यक्त करण्यात पण कमी पडतात आणि मग नाईलाजाने स्वतःचेच “दात ओठ” खात बसतात ! ही अशा लोकांची हतबलता मानली तरी त्याला सुद्धा काही लोकं ऐन मोक्याच्या ठिकाणी त्यानं “कच खाल्ली” असं म्हणून मोकळे होतात, आता बोला !

काही काही लोकांच बरं असतं, म्हणजे ते लोकं कुठे बाहेर चालले आहेत आणि आपण जर त्यांना हटकून विचारलं की “कुठं पर्यंत?” तर ते लगेच उत्तर देतात “जरा हवा खाऊन किंवा ऊन खाऊन येतो!” आता या दोन्ही खाण्यामुळे त्यांच पोट नक्कीच भरणार नसतं, तरी हवा खाऊन किंवा ऊन खाऊन असे शब्द सहजपणे त्यांच्या मुखातून बाहेर पडतात आणि त्या मागचा खरा अर्थ, विचारणारा सुद्धा लगेच जाणतो हीच आपल्या अभिजात मराठीची खरी खासियत आहे, असं म्हटलं तर वावगं ठरू नये ! काही लोकं बोलतांना सांभाषणातले अधले मधले “शब्दच खातात. ” जर का अशा माणसाचा तो ड्रॉबॅक संभाषण कर्त्याला ठाऊक असेल तर ठीक, नाहीतर एखाद्या नवख्या माणसाला तो नक्की काय बोलतोय हे कळण जरा अवघडच जातं मंडळी !

वाचकहो, लेखाच्या शीर्षकातल्या पहिल्या “खाणं” या शब्दाचा माझ्या बुद्धीप्रमाणे आणि मला माहित असलेल्या न खाण्याच्या प्रकारांच्या उल्लेखाने उहापोह करून झाल्यावर, आता दुसऱ्या “पिणं” या शब्दाकडे मी कधी येतोय, याची वाट अनेक पिय्यकड लोकं घसा सुखा करून वाट बघत असतील ! पण त्यांच्या पदरी आज तरी निराशा येणार आहे आणि त्याला माझा ईलाज नाही मंडळी ! म्हणजे मी या लेखाच्या सुरवातीलाच आपल्याला क्लिअर केलं होतं, की “पिणं” या शब्दावर लेख लिहायचा झाल्यास तो लिहिण्यासाठी एखाद्या “संध्याकाळी व्यवस्थित बसूनच” लिहावा लागेल, काय आठवतंय का ? आणि न खाणं खायचा हा लेख वाचायच्या नादात आपण जर ते विसरला असाल, तर आपल्याला मी पुन्हा एकदा आठवण करून देतो. लेखाचा पहिला परिच्छेद पुन्हा एकदा नीट वाचा ! आता तरी पटली खात्री तुमची ? मग आता मला सांगा, “पिणं” या शब्दावर मी लेख लिहावा असं ज्याला वाटतंय, तो मला त्याच्या घरी (अगदी कुठेही!) एखाद्या संध्याकाळी “व्यवस्थित बसायला” कधी बोलावतोय ? काय म्हणता, माझा पत्ता माहित नाही. अहो मंडळी, असं काय करता, लेखाच्या खाली माझं पूर्ण नांव, पत्ता आणि कॉन्टॅक्ट करण्यासाठी मोबाईल नंबर पण दिला आहे. मग वाट कसली बघता ? पटकन तुमचा मोबाईल उचला आणि माझी तुमच्या बरोबरची अशी एखादी “व्यवस्थित संध्याकाळ” आजच बुक करा !

आपल्या फोनची वाट बघणारा

आपलाच,

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) ४०० ६१०

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ‘पुन्हा एकदा ‘नीट’…’- भाग १ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर ☆

श्री प्रदीप केळुस्कर 

?जीवनरंग ?

☆ ‘पुन्हा एकदा ‘नीट’…’- भाग १ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर 

मुग्धाची आई मंजुश्री मुग्धाची वाट पहात होती. मुग्धा नीट परीक्षा द्यायला सेंटरवर गेली होती. तिला अंदाज होताच.. मुग्धा हसत हसत येणार, कारण तिने फिल्डिंगच तशी लावली होती. तिच्या नवऱ्याचा मध्येच फोन आला..

‘काय आली काय मुग्धा?

‘नाही अजून.. हॉलच्या बाहेर आली कीं लावेल फोन..

एवढ्यात मंजूला मुग्धाचा फोन येतो आहे असे दिसलें…

‘तिचा फोन येतो आहे.. मग करते मी फोन तुम्हाला..

असे म्हणून मंजुने मुलीचा फोन घेतला…

‘बोल ग. कस काय?

‘येस मम्मा.. शंभर टक्के..

‘सेम टू सेम काय?

‘केमिस्ट्री, झुलॉजी सेम.. बायोमध्ये थोडे बदल होते.. पण सहाशेवर निश्चित..

‘देव पावला.. तू लवकर घरी ये.. पण बाबांना काही बोलू नकोस.. त्याना फक्त पेपर सोपे गेलेत म्हणून सांग.

‘त्याना मी कशी सांगेन ममा.. तू माझ्यासाठी शिरा करून ठेव, तोपर्यंत मी पोचतेच..

मंजूला समाधान वाटलं.. गेले वर्षंभर टेन्शन होत.. गोलमाल करायला लागलं आणि ते सुद्धा नवऱ्यापासून लपवून.

मंजुने नवऱ्याला फोन लावला.

‘अहो.. मुग्धाचा फोन आलेला.. खूष आहे ती.. सहाशेवर निश्चित म्हणते आहे..

‘कमाल आहे… कधी फारसा अभ्यास करताना दिसत नव्हती आणि मूळची पण हुशार नव्हे.. तरी म्हणते सहाशेच्यावर?

‘अहो.. क्लासमध्ये अभ्यास करायची, घरी करत नसेल कदाचित..

‘बर बर.. म्हणत मुग्धाच्या बाबांनी फोन ठेवला.

तेव्हडयात मंजूच्या लक्षात आले.. माधवला म्हणजेच तिच्या भावाला फोन करायला हवा, त्यानेच तर हे घडवून आणले..

तिने तिच्या भावाला.. माधवला फोन लावला.. पण तो बिझी येत होता.. तिच्या लक्षात आले, माधवला अनेकांचे फोन येत असणारं, आपल्यासारखे अनेकजण त्याच्या लिस्टमध्ये असणारं..

लेकीने गोड शिरा करायला सांगितलं हे मंजुच्या लक्षात आले.. गाणे गुणगुणत ती किचनमध्ये आली.. तिने रवा बशीत घेतला, निवडून घेतला.. एका पातेल्यात तूप ओतलं आणि गरम करायला घेतल, एव्हड्यात माधवचा फोन आलेला तिला दिसला..

‘काय मंजू.. खूष ना?

‘होय रे बाबा.. मुग्धाने फोन केलेला.. सहाशेच्या वर जाईन म्हणते आहे..

‘निश्चित जाईल, म्हणजे ज्या मुलांना नोट्स मिळाल्यात.. ती सर्वच मुलांची मेडिकल ऍडमिशन पक्की.

‘हो.. बर झालं बाबा… तू त्या मुल्लासरांची गाठ घालून दिलीस, नाहीतर मुग्धा मेडिकलला जाऊ शकली नसती.

‘हो ताई.. बर आठवलं.. त्या मुल्लासरांना अजून दिढ लाख दयायचे आहेत, लक्षात आहे ना..

‘हो.. नवऱ्याला न सांगता पैसे जमवणे फार कठीण असते रे माधव, विशेष करून नोकरी न करणाऱ्या बाईला.. बांगडया गेल्या आता पाटल्या..

‘पण भावोजीना कळले नाही ना अजून?

‘माधव, डुप्लिकेट दागिने कोस्मेटिक्सच्या दुकानात मिळतात ते एव्हडे ओरिजिनल सारखे दिसतात… बायका फसतात तेथे पुरुष फसयला काय?

‘हो ग.. आणि एकदा मुग्धा डॉक्टर झाली कीं खोऱ्याने पैसे मिळवील.. मग हवे तेव्हढे खऱ्या सोन्याचे दागिने कर..

खळखळून हसत मंजुने फोन ठेवला.

शिरा करता करता मंजू विचार करत होती.. ‘आपली एकुलती एक लाडकी मुलगी, आपली आणि तिची पण इच्छा, तिने डॉक्टर व्हावे, साधे नव्हे.. सुपरस्पेशालिस्ट डॉक्टर.. ज्या डॉक्टरकडे अपॉइंटमेंटशिवाय भेटता येत नाही.. अशी डॉक्टर.. पण.. मुग्धा फारशी हुशार नव्हती, म्हणजे दहावीत तिने मिळविले नव्वत टक्के.. पण सध्या नव्वद टक्के म्हणजे काय.. सर्वांनाच मिळतात.. पण मेडिकलला ऍडमिशन म्हणजे, त्यात नीट परीक्षा. ?.. त्याचा अडथळा कसा पार करणार? त्या परीक्षेत साडेपाचशेपेक्षा मार्क्स हवेत.. देशात वीस लाख मुले ही परीक्षा देतात.. त्यात मुग्धा कुठे बसणार? काही लोक पैसे भरून ऍडमिशन घेतात म्हणे.. बरेच डॉक्टर्स लोक आपल्या मुलांना पैसे भरून कर्नाटकमध्ये ऍडमिशन घेतात.. पण आपला नवरा असे कदापि करायचा नाही.. नायब तहसीलदार आहे पण पाच पैसे लाच घेणार नाही.. सारे नियमाला धरून..

या विचारात असताना आपला भाऊ.. माधव, एकदा घरी आला असताना मी त्याला म्हंटले..

‘माधव.. मुग्धाला मेडिकलला जायचे आहे रे, पण..

‘पण काय?

‘ती फारशी हुशार नाही रे आणि तिला अभ्यासाचा कंटाळा.. नीटची परीक्षा असते ना..

‘अग नीटच्या परीक्षेचेचे टेन्शन घेऊ नकोस… तुला काय वाटते गेल्या काही वर्षात जे मेडिकलला गेलेत ते खरेच हुशार होते.. त्यातील काही हुशार होते हे खरे.. बाकी..

‘बाकी काय?

‘ पैसे मोजले तर प्रश्न दोन दिवस आधी कळतात.. तशी रॉकेट्स सुरु आहेत..

‘काय सांगतोस?

‘तस हे सर्वांनाच सांगत नाही मी.. फक्त जवळच्या माणसांना.. उघड झालं तर सगळे आत जातील.. मी मुग्धासाठी प्रयत्न करतो.. पण बारा पंधरा लाख तरी दयायला लागतील आणि गुपित ठेवावे लागेल.. भावोजीना मात्र सांगू नकोस.

शिरा करता करता मंजू मागील आठवत होती. बारावी परीक्षा झाली आणि एक दिवस माधवचा फोन आला..

‘ताई.. मी व्यवस्था केली आहे, पण या कानाचे त्या कानाला कळता नये.. नाहीतर सगळे आत जातील.. केमिस्ट्री आणि झुवोलोजीचे पेपरसेटर कळले आहेत.. मुल्ला नावाचा माणूस आहे नागपूरचा.. तो फिल्डिंग लावतो आहे.. आता त्याचा तुला डायरेक्ट फोन येईल.. ओके..

मंजू आठवू लागली…

आणि अचानक एकदा एक अनोळखी नंबरवरुन कॉल आला..

‘आप मंजुजी हैं?

‘हा..

‘मैं मुल्लासरके ऑफिससे बात कर रही हूं..

‘हा..

‘माधवसरने आपको बोला होगा..

‘हा..

‘यदी आप इंटरेस्टेड हैं.. तो मैं मेसेज करती हूं.. वो नंबरपर फाईव्ह पेटी जमा करो.. और मुझे उसका स्क्रिनशॉट भेंजो..

‘पाच लाख.. ?

‘टोटल आठ लाख देना पडेगा.. पर कन्फर्म करनेका पाच.. बादमे देढ.. देढ दो बार.. और ये दो दिनमे..

त्या मुलीने फोन ठेवला.. पाठोपाठ एक मेसेज आला.

त्यावर एका बँकेचा अकाउंट नंबर आणि कोडनंबर आला.

 हे सारे आठवत असताना बाहेर स्कुटर वाजली.. तिने ओळखले मुग्धा आली.. तिने गॅस बारीक केला आणि ती लगबगीने दार उघडायला गेली.

– क्रमश: भाग १

© श्री प्रदीप केळुसकर

मोबा. ९४२२३८१२९९ / ९३०७५२११५२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ पेपर फुटी आणि त्यावर उपाय – – – ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? मनमंजुषेतून ?

☆ पेपर फुटी आणि त्यावर उपाय – – – ☆ श्री सुनील देशपांडे

 – – – पेपर फुटी आणि त्यावर उपाय खरेच हवे आहेत का?

आज-काल पेपर फुटीचा जमाना दिसतो आहे दरवर्षी कुठे ना कुठेतरी पेपर फुटी झालेले ऐकू येते. किमान आरोप तरी होत असतो. यावर्षी ती मोठ्या प्रमाणात झाली आणि गाजते ही आहे.

शिक्षणाचे व्यापारीकरण झाल्याचा हा परिणाम आहे हे उघडच आहे. व्यापारीकरण करण्यासाठी जबाबदार कोण आहे? तर सरकारच आहे हे सुद्धा उघड आहे. खरं म्हणजे शिक्षणाचं सरकारीकरण होणं आवश्यक आहे. त्याऐवजी ते व्यापारीकरण झालं आहे.

६०/६५ वर्षांपूर्वी आम्ही शालेय शिक्षण घेत होतो त्यावेळी पेपर फुटीचा कधी विषय ऐकला नव्हता. त्यावेळी आमच्या शाळेतले शिक्षक विद्यार्थ्यांच्या विकासासाठी त्यांच्या घरी शिकवणीला बोलवीत असत. परंतु कोणत्याही शिक्षकाने अशा शिक्षणासाठी वेगळी फी घेतल्याचे निदान आमच्या बाबतीत तरी झाले नव्हते. (कदाचित आम्ही ग्रामीण भागात शिकलो म्हणूनही असेल) आम्ही शाळेमध्ये इंग्रजी, हिंदी, संस्कृत इत्यादी बाह्य शैक्षणिक परीक्षा दिल्या होत्या. त्याही शिक्षकांनी आमच्याकडून कोणतीही फी न करता टिळक महाराष्ट्र विद्यापीठाच्या त्या परीक्षांसाठी वेगळे क्लास घरी घेतले होते. कोणत्याही पैशाशिवाय. ड्रॉइंगच्या परीक्षा आम्ही दिल्या त्या शिक्षकांनी सुद्धा काही किरकोळ पैसे कारण त्यासाठी बोर्ड, कागद, रंग वगैरे वगैरे साहित्य लागत असे तेवढ्यापुरते अगदीच नॉमिनल दोन चार रुपये फी घेतल्याचे आठवते. जे शिक्षक शाळेमध्ये आम्हाला शिकवत असत तेच प्रश्नपत्रिका सुद्धा तयार करीत असत. तरी सुद्धा त्यांच्याकडून आम्हाला प्रश्नपत्रिकेतले एक अक्षर सुद्धा कधी समजले नव्हते.

सातवीची व्हर्नाक्युलर फायनल परीक्षा, स्कॉलरशिपच्या परीक्षा आणि एसएससी ची परीक्षा एवढ्याच परीक्षेच्या प्रश्नपत्रिका शाळाबाह्य कुणीतरी तयार करत असत. बाकी सर्व परीक्षांच्या प्रश्नपत्रिका आम्हाला शिकवणारे शिक्षकच तयार करीत होते आणि तरीही पेपर फुटत नव्हते. बहुधा त्यावेळेला शिक्षक पैशाला हपापलेले नसावे. जे काही शिक्षक कधीतरी शाळाबाह्य शिकवणारे काही फी घेत होते ते सुद्धा इतकी क्षुल्लक रक्कम घेत होते असे अजूनही लक्षात येते. त्यांची थोडीशी आर्थिक गरज असेलही परंतु तेवढ्यापुरतीच त्यांची अपेक्षा असावी. गरज म्हणून पैसे मिळवणे आणि हाव म्हणून पैसे मिळवणं यामध्ये खूप फरक आहे. हाव ही कधी न संपणारी गोष्ट आहे आणि त्यामुळे त्याला मर्यादा नसते. ही हाव मनुष्याला दुष्कृत्य करण्यास भाग पाडते. गरज म्हणून पैसे मिळवणं आणि हाव म्हणून पैसे मिळवणे यामध्ये खूप फरक आहे.

मला आठवते जोगळेकर म्हणून गणिताचे शिक्षक होते परंतु ते एसएससी नंतर अजिबात गणित शिकलेले नव्हते. कुणाच्यातरी गणित क्लासेस वाल्या एका चांगल्या शिक्षकाकडे नोकरी करीत असताना त्यांनी ते ज्ञान आत्मसात केले. नंतर पोटाची गरज म्हणून स्वतःचे क्लासेस सुरू केले. शिकवण्याची हातोटी उत्तम आणि वक्तृत्व सुंदर. समोरच्या विद्यार्थी समूहाला संपूर्ण समजले आहे का नाही याची काळजी घेणे हा खूप मोठा गुण. त्यामुळे त्यांचे क्लासेस गर्दी खेचू लागले. कराड सांगली कोल्हापूर अशा तीन ठिकाणी दोन दोन दिवस क्लास घेत असत. त्याकाळी चार चाकी गाडी बाळगणारे खूप थोडे लोक होते त्यापैकी ते एक. परंतु ते म्हणत माझे ध्येय संस्कृत घेऊन एम ए आणि पीएचडी होणे आणि प्राध्यापक म्हणून नोकरी लागणे हे आहे. त्याप्रमाणे ते हा व्यवसाय चालू असताना संस्कृत घेऊन एम ए पी एचडी होऊन कॉलेजमध्ये संस्कृतचे प्राध्यापक म्हणून नोकरीला लागले आणि क्लासेस बंद केले. हाव म्हणून पैसे मिळवणे आणि गरज म्हणून पैसे मिळवणे यामधील फरक तेव्हा आम्ही प्रत्यक्ष पाहिला.

त्यामुळे आता सध्याची परिस्थिती पाहता माणसांमधील विश्वासार्हता शिल्लक राहिली नाही. परंतु आता तांत्रिक पद्धतीने बिनचूक परीक्षा पद्धती घेता येईल का याचा विचार केल्यास मला काही गोष्टी सुचवाव्या वाटतात.

– – सध्याच्या परीक्षा पद्धतीत सर्व विद्यार्थ्यांच्या साठी एकच प्रश्नपत्रिका असणे ही गरजेची आहे का?

– – हा पहिला प्रश्न.

साधारण क्वेश्चन बँक म्हणजे प्रश्नसंच तयार केलेल्या असतात.

समजा शंभर प्रश्नांचा एक प्रश्नसंच असेल तर त्याच्या वेगवेगळ्या अनुक्रमाने दहा प्रश्नपत्रिका तयार करता येतील. जेवढी विद्यार्थ्यांची संख्या असेल तेवढ्या संचांमध्ये त्या सर्व प्रश्नपत्रिका विविध पाकिटामध्ये बंद करून ती सर्व पाकिटे परीक्षा केंद्रावर ठेवणे आणि प्रत्येक विद्यार्थ्याने त्यातील एक पाकीट कोणतेही उचलून घेऊन जाणे ती त्याची प्रश्नपत्रिका. त्यामुळे प्रश्नपत्रिका फुटणे हा प्रकार शिल्लक राहणार नाही. प्रश्नपत्रिका आधीच फुटलेले असतील कारण त्या प्रश्नांच्या बाहेरील प्रश्नपत्रिका असणारच नाहीत. यामुळे आणखी एक फायदा असा की कोणताही चॅप्टर म्हणजेच अभ्यासाचा भाग ऑप्शनला टाकणे हा प्रकार बंद होईल आणि संपूर्ण सिलॅबस चा अभ्यास करणे प्रत्येक विद्यार्थ्याला भाग पडेल.

कॉम्प्युटरचा वापर करून सुद्धा या पद्धतीने परीक्षा घेता येतील. कॉम्प्युटरला सर्व प्रश्न फीड करून ठेवणे आणि परीक्षा गृहात जाताना प्रत्येक विद्यार्थ्याने बटन दाबताच त्याला कोणत्याही रँडम सिलेक्शन मेथडने दहा प्रश्न असलेली एक प्रश्नपत्रिका प्रिंट करून मिळेल. ती त्याची प्रश्नपत्रिका असेल. त्यामुळे परीक्षा केंद्रावर सुद्धा एकाचा पेपर बघून दुसऱ्याला कॉपी करता येणार नाही. किंवा बाहेरून कॉपी पुरवणे या प्रकारचे कोणतेही उद्योग करता येणार नाहीत. फक्त यामध्ये एकच भीती आहे किती टक्के निकाल लागेल? 

– – – याच भीतीपोटी अनेक विद्यार्थ्यांना पास करणे आणि त्यासाठी नैतिकता नष्ट करणे हे प्रकार अधिकृतपणे चालू आहेत का? शिक्षण क्षेत्राचे वाटोळे करण्याचा हा पद्धतशीर प्लॅन केला असेल का अशी शंका घेण्यासाठी पुरेसा वाव आहे असे मला वाटते? आणि तसे नसेल किंवा तसे नको असेल तर परीक्षा पद्धतीमध्ये अमुलाग्र बदल करणे अत्यंत गरजेचे आहे असे मला निक्षून सांगावेसे वाटते.

– – शिक्षण क्षेत्रामध्ये अमुलाग्र बदल करायचा आहे असे म्हणत म्हणत मागील पानावरून पुढे चालू हेच चालू आहे. खरोखरीच विद्यार्थ्यांची कसोटी घेणाऱ्या परीक्षा भविष्यात पाहायला मिळतील का?

© श्री सुनील देशपांडे 

 फोन :९६५७७०९६४०

 ई मेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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