हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३० -सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर।)  

☆  चुभते तीर # १३० – व्यंग्य  – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

ग्रीन पार्क सोसायटी में नया जिम खुलना किसी साधारण घटना की तरह नहीं था। यह उस मोहल्ले के मध्यवर्गीय सपनों के पंख लगने जैसा था, जहाँ लोग शक्कर की बोरी उठाने में कमर पकड़ लेते थे, लेकिन मुफ़्त के ट्रॉयल के नाम पर पहाड़ चढ़ने को तैयार रहते थे। जिम के उद्घाटन के दिन सोसायटी के सबसे बुजुर्ग और भारी-भरकम सदस्य मिश्रा जी भी टी-शर्ट पहनकर पहुँचे। उनका मुख्य उद्देश्य सेहत बनाना नहीं, बल्कि गुप्ता जी को यह दिखाना था कि साठ की उम्र में भी उनके डोले किसी से कम नहीं हैं।

जिम के ट्रेनर रोहन ने सबको कसरत के नियम समझाने शुरू किए। मिश्रा जी ने ट्रेडमिल पर नज़र दौड़ाई और बोले, “रोहन बेटा, यह मशीन तो मेरे घर के पंखे से भी धीमी चलती है। इसे ज़रा पूरी रफ्तार पर चलाओ।”

रोहन ने मना किया, लेकिन मिश्रा जी की ज़िद्द के आगे किसकी चली है। उन्होंने मशीन पर पैर रखा और रफ्तार बढ़ते ही उनकी टांगें इस तरह भागने लगीं जैसे दफ़्तर में छुट्टी का सायरन बजते ही कर्मचारी घर की तरफ भागते हैं। दो मिनट में मिश्रा जी के माथे से पसीने की धारा ऐसे बही जैसे पहली बारिश में छज्जे से पानी टपकता है।

अचानक ट्रेडमिल से एक कड़क की आवाज़ आई। मिश्रा जी ने पेट पकड़ लिया और ज़मीन पर बैठ गए। पूरा जिम सन्नाटे में डूब गया। लोग भागे-भागे आए। गुप्ता जी ने चुटकी लेते हुए कहा, “कहा था मिश्रा जी, उम्र के हिसाब से चला करो, अब बैठो दो महीने बिस्तर पर।”

मिश्रा जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस अपनी जेब की तरफ इशारा कर रहे थे। सबको लगा कि मिश्रा जी को दिल का दौरा पड़ा है या कमर की हड्डी खिसक गई है। तुरंत एम्बुलेंस को फोन घुमाया गया। पूरी सोसायटी जमा हो गई। गुप्ता जी मन ही मन अपनी जीत का जश्न मनाने लगे कि अब कम से कम छह महीने मिश्रा जी पार्क में टहलने नहीं आएंगे।

तभी मिश्रा जी ने बहुत मुश्किल से अपनी जेब से अपना हाथ निकाला। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज़ और बीस रुपये का नोट था। उन्होंने हांफते हुए ट्रेनर रोहन को कागज़ थमाया। रोहन ने कागज़ खोलकर पढ़ा, उसमें लिखा था, “ट्रेडमिल के नीचे मेरा तीन साल पुराना छुपाया हुआ बीस का नोट गिर गया था, वही उठाने के चक्कर में पैर फिसल गया। एम्बुलेंस रद्द करो, मुझे सिर्फ एक कड़क चाय पिलाओ।”

सारे लोग हैरान होकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। गुप्ता जी का मुंह खुला का खुला रह गया। मिश्रा जी तुरंत खड़े हुए, अपनी टी-शर्ट सीधी की और मुस्कुराकर बोले, “सेहत तो बनती रहेगी, लेकिन अपने खून-पसीने की कमाई का बीस रुपया गंवाना हमारी डिक्शनरी में नहीं लिखा।”

पूरे जिम में ठहाके गूंज उठे और सबने मिश्रा जी की इस बेमिसाल फुर्ती और कंजूसी के मेल पर ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८० ⇒ वचन, एकवचन बहुवचन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “वचन, एकवचन बहुवचन।)

?अभी अभी # १०८० ⇒ व्यंग्य – वचन, एकवचन बहुवचन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वचन तो वचन होता है, जब किसी को दिया तब वह वचन होता है, किसी महापुरुष ने दिया हुआ वचन भी वचन ही होता है लेकिन यही वचन जब किसी महात्मा के मुख से प्रकट होता है, तो यह प्रवचन हो जाता है। हिंदी व्याकरण में यही एकवचन, बहुवचन भी हो जाता है।

जिस घर में सास और अकेली बहू होती हैं, वहां भी अक्सर प्रवचन तो सास का ही होता है और बहू वचनबद्ध होती है लेकिन जब बहुओं का बहुमत हो जाता है और सास अकेली पड़ जाती है तब बहुओं के वचन सास के प्रवचन पर भारी पड़ जाते हैं।।

हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण में काल और वचन को लेकर बड़ी समानता है। हमारी तरह उनके भी तीन ही काल होते हैं। हमारा भूत, उनका past है और हमारा वर्तमान उनका present. जो हमारा भविष्य है, वही उनका future है। वे भी हमारी तरह ही एकवचन यानी singular number और बहुवचन यानी plural number में विश्वास करते हैं। जब कि हमारी देव भाषा संस्कृत का व्याकरण थोड़ा अलग और उन्नत है।

संस्कृत में दो नहीं तीन वचन होते हैं। रामायण के महाराज दशरथ के तीन वचन अलग हैं। यहां संस्कृत में एकवचन और बहुवचन के साथ द्वि वचन भी है। राम: रामौ रामा: प्रथमा।।

जीवन व्याकरण नहीं। व्याकरण दोष भाषा की विकृति है और व्यक्ति दोष चरित्र की विकृति। जब आज का इंसान अपने वचन के प्रति ही सजग और ईमानदार नहीं तो एकवचन और बहुवचन के प्रति कैसे रह सकता है।

हम अपनी आजकल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। कैसे कैसे एकवचन, बहुवचन हो जाते हैं, हमें कुछ भान ही नहीं रहता। लगता है, सरलीकरण से हम सिम्प्लीकरण के रास्ते पर चल निकले हैं। लेबरों की समस्या कोई नई नहीं। रेलवे स्टेशनों की भीड़ का हमारे पास कोई विकल्प नहीं। कारों, ट्रकों और टू व्हीलरों ने ट्रैफिक को जाम कर रखा है।।

मोबाइलों और कंप्यूटरों की दुनिया ने इंसान से उसकी असली जिंदगी छीन ली है। टाकीजों की फिल्में लोग आजकल टेलीविजनों में देखने लगे हैं। लेडिसों और जेंट्सों का पहनावा भी एक जैसा ही होने लगा है। लव मैरिजों की तो जैसे बाढ़ ही लगी हुई है।

वचन तो वचन, कैसे कैसे बहुवचन ! जब से डिजिटलीकरण हुआ है, बैंकों के कस्टमरों में कमी हुई है, पैसों का लेनदेन एटीएमों और पेटीएमों से ही होने लग गया है। महंगाई की मार के कारण लोग मल्टीस्टोरियों में टू BHK और वन BHK के फ्लैटों में रहने लगे हैं। सरकारी स्कूलों के होते हुए महंगे कॉन्वेंट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। जॉब्स का पता नहीं, कॉलेजों में भीड़ बढ़ती जा रही है। बस एक वचन अच्छे दिनों का, सभी टेंशनों को दूर कर देता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ कथा कहानी ☆

☆ लघुकथा – राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

भैया तुम  कितनी देर में आओगे?”

“आता हूँ जरा बिजी हूं।”

भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”

ट्रिन ट्रिन——“

“——–“

ट्रिन ट्रिन——–“

“———-“

अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।

दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”

हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।

नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।

अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”

तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”

 यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

☆ कविता ☆

☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

सब कुछ छोडा

हमने धीरे धीरे,

पर कमबख्त ये

ये अच्छाई न छूटी हमसे…

 

जमाने ने,

खूब ताने मारे

रूलाया भी खूब

गलत हम न थे फिर भी,

क्यों की ये अच्छाई….

 

आपसे,

दिल से प्यार

किया था हमने

गैर के बाहों में थी आप

पर न टोका हमने

क्यों की अच्छाई…

 

एक बार पूछती

उसे चाहती हूँ मैं

बीच आपके न आता

तासीर है संस्कारो का

क्यों की अच्छाई…

(तासीर = प्रभाव)

 

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाऊस… + संपादकीय निवेदन – सौ. दीप्ती कुलकर्णी – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ. दीप्ती कुलकर्णी

💐 अ भि नं द न 💐

गाडगीळ मॅनेजमेंट, सांगली आयोजित मराठी काव्य लेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती दीप्ती कुलकर्णी यांच्या काव्य रचनेस उत्तेजनार्थ पुरस्कार मिळाला आहे. ई अभिव्यक्ती मराठी तर्फे श्रीमती दीप्ती कुलकर्णी यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील वाटचालीसाठी शुभेच्छा 💐🖊️

पुरस्कार प्राप्त कविता आज प्रकाशित करत आहोत.

 संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

पुरस्कार प्राप्त कविता

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “पाऊस” ☆ दीप्ती कुलकर्णी ☆

 पाऊस आला, पाऊस आला, घेऊन मृदगंधाला

ग्रीष्मातील त्या उष्ण धरेचा, कणकण संतोषला

जलधारांनी बरसत आलाथेंबातुनी प्रगटला

बळीराजाही पेरायालाशिवारात गुंतला ||||

 *

इंद्रधनुचा मोहक पट तोआकाशी उमटला

बालचमुसह सर्वांसाठीआनंददायी बनला

जलाशयांचा, तरुवेलींचाजीवनदाता ठरला

चिंबही भिजल्या सृष्टीचा तो, सखा जणू भासला ||||

 *

धरतीनेही हिरवा शालुअंगभरी ल्यायला

गवतफुलांचा, फळाफुलांचा, सुगंध साकारला

मातीतुनी या नवकोंबांचाहर्ष दिसू लागला

तनामनाने चाहुल घेताआसमंती विहरला ||||

 *

चातकासही थेंबा घेऊनी, जन्म नवा लाभला

रिमझिम येता जलधारांचा, नाद ही झंकारला

पाऊस आला, पाऊस आला, मोद असा जाहला

नव आशांचा, नव स्वप्नांचा, झुला जणू झुलला ||||

© दीप्ती कुलकर्णी

कोल्हापूर

भ्र. ९५५२४४८४६१

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ जागतिक आदिवासी दिन… ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

संगीता कुलकर्णी

? विविधा ?

☆ जागतिक आदिवासी दिन ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

९ ऑगस्ट रोजी झालेल्या जागतिक आदिवासी दिनाच्या निमित्ताने:

जागतिक आदिवासी दिन : निसर्गसंस्कृतीचा गौरव

ज्यांच्या पावलांनी जंगलाला वाटा मिळाल्या, ज्यांच्या श्वासांनी पर्वतांना जीवन मिळाले आणि ज्यांच्या संस्कृतीने निसर्गालाच देवत्व बहाल केले त्या आदिवासी समाजाला कृतज्ञ अभिवादन करण्याचा दिवस म्हणजे जागतिक आदिवासी दिन.

“जंगल आहे म्हणून जीवन आहे आणि जीवन आहे म्हणून संस्कृती आहे, ” ही भावना ज्या समाजाच्या जगण्याच्या प्रत्येक श्वासात दडलेली आहे तो म्हणजे आदिवासी समाज… निसर्गाशी सुसंवादी नाते, श्रमाला प्रतिष्ठा, सामूहिक जीवनपद्धती आणि सांस्कृतिक वैभव यांमुळे आदिवासी समाज मानवसंस्कृतीचा एक महत्त्वपूर्ण घटक ठरतो… दरवर्षी ९ ऑगस्ट हा दिवस जागतिक आदिवासी दिन म्हणून साजरा केला जातो. हा दिवस केवळ एका समाजाचा गौरव करण्यासाठी नसून त्यांच्या परंपरा, संस्कृती, ज्ञान आणि निसर्गाशी असलेल्या अतूट नात्याचा सन्मान करण्यासाठी आहे.

भील, गोंड, वारली, संथाल, मुंडा, कोरकू, कातकरी, कोलाम, ठाकूर अशा अनेक जमाती भारताच्या सांस्कृतिक समृद्धीत भर घालतात. प्रत्येक जमातीची स्वतंत्र भाषा, लोकपरंपरा, श्रद्धा, कला, लोकनृत्य आणि जीवनपद्धती आहे. या विविधतेतून भारतीय संस्कृतीचे विशाल रूप अधिक उजळून दिसते… आदिवासी म्हणजे केवळ डोंगर-दऱ्यांत राहणारे लोक नव्हेत… ते निसर्गाचे खरे रक्षक आहेत. झाडे, नद्या, पर्वत, वन्यजीव आणि पृथ्वी यांना ते केवळ संसाधने मानत नाहीत तर कुटुंबातील सदस्यांप्रमाणे जपतात. त्यांच्या लोकगीतांत निसर्गाचे सौंदर्य आहे, लोकनृत्यांत जीवनाचा उत्सव आहे आणि लोकपरंपरांत पर्यावरण संवर्धनाचा अमूल्य संदेश आहे.

आदिवासी समाजाचे जीवन निसर्गाशी एकरूप झालेले आहे. जंगल, डोंगर, नद्या आणि वनसंपत्ती हे त्यांच्या जीवनाचे आधारस्तंभ आहेत. पर्यावरणाचे संतुलन राखण्याचे ज्ञान त्यांनी अनुभवातून आत्मसात केले आहे… आज जग पर्यावरण संवर्धनाची चर्चा करत असताना आदिवासी समाजाने ती हजारो वर्षांपूर्वीच आपल्या जीवनात उतरवली होती तसेच ही जीवनमूल्ये ही शतकानुशतके आपल्या आचार-विचारांत जपली आहेत.. त्यांनी वृक्ष तोडण्याआधी त्याची क्षमा मागितली, नदीत उतरतानाही तिचा आदर राखला आणि जंगलाचा उपयोग करतानाही त्याचे संरक्षण केले. निसर्गाशी संघर्ष नव्हे, तर सहजीवन हेच त्यांचे जीवनतत्त्व आहे. म्हणूनच त्यांच्या संस्कृतीत पृथ्वीच्या भविष्याचे मौल्यवान ज्ञान दडलेले आहे… त्यांचे पारंपरिक ज्ञान हे केवळ सांस्कृतिक नव्हे तर पर्यावरणीय दृष्टीनेही अत्यंत मौल्यवान ठरते.

आदिवासी समाज हा भारताच्या संस्कृतीच्या इंद्रधनुष्यातील एक तेजस्वी रंग आहे. त्यांच्या लोकगीतांत मातीचा सुगंध दरवळतो, लोकनृत्यांत स्वातंत्र्याचा आनंद डोलतो तर त्यांच्या चित्रकलेत निसर्गाचे स्पंदन जिवंत होते. त्यांच्या जीवनात कृत्रिमतेला स्थान नाही साधेपणा हीच त्यांची श्रीमंती आणि श्रम हीच त्यांची पूजा आहे. पहाटेच्या दवबिंदूप्रमाणे त्यांचे जीवन निर्मळ तर उंच डोंगराप्रमाणे त्यांचा स्वाभिमान अढळ आहे… सभ्यतेच्या झगमगाटात अनेकदा विस्मरणात गेलेल्या या समाजाने निसर्गाच्या कुशीत राहून मानवाला जगण्याची खरी कला शिकवली. त्यांनी जंगलाला संपत्ती नव्हे तर आई मानले, नद्यांना केवळ पाण्याचा प्रवाह नव्हे तर जीवनाची गंगा समजले आणि पृथ्वीला उपभोगाची वस्तू नव्हे तर पूजनीय माता मानले.

भारतातील आदिवासी समाजाने देशाच्या इतिहासातही मोलाचे योगदान दिले आहे. स्वातंत्र्यलढ्यात अनेक आदिवासी वीरांनी आपल्या प्राणांची आहुती दिली… अनेक आदिवासी वीरांनी अन्यायाविरुद्ध संघर्ष करत स्वातंत्र्याची ज्योत प्रज्वलित ठेवली… भारतीय स्वातंत्र्यलढ्यात आदिवासी समाजाचे योगदान उल्लेखनीय आहे… त्यांच्या संघर्षाची गाथा इतिहासाच्या पानांत सुवर्णाक्षरांनी लिहिली गेली आहे. त्यांच्या बलिदानामुळे स्वातंत्र्य, स्वाभिमान आणि न्याय या मूल्यांची जपणूक अधिक बळकट झाली… स्वातंत्र्यानंतरही शिक्षण, आरोग्य, रोजगार आणि सामाजिक न्याय या क्षेत्रांत अनेक आव्हानांचा सामना करत त्यांनी विकासाच्या प्रवाहात स्वतःचे स्थान निर्माण करण्याचा प्रयत्न केला आहे तरीही विस्थापन, वनहक्क, शिक्षणातील असमानता, कुपोषण, बेरोजगारी आणि सांस्कृतिक ओळख जपण्याची समस्या आजही गंभीर स्वरूपात दिसून येते.

आज आधुनिकतेच्या वेगवान प्रवाहात अनेक आदिवासी परंपरा आणि बोलीभाषा लुप्त होण्याच्या मार्गावर आहेत. जंगलांचे क्षेत्र कमी होत आहे, विस्थापन वाढत आहे आणि त्यांच्या पारंपरिक जीवनपद्धतीसमोर अनेक आव्हाने उभी राहत आहेत. तरीही त्यांनी आपल्या संस्कृतीची ओळख, परंपरेचा अभिमान आणि निसर्गाविषयीची निष्ठा जपली आहे. ही चिकाटी आणि आत्मसन्मान प्रत्येकासाठी प्रेरणादायी आहे.

जागतिक आदिवासी दिन आपल्याला एक महत्त्वाचा संदेश देतो विकास हा सर्वसमावेशक असला पाहिजे. शिक्षण, आरोग्य, रोजगार, जमीन, वनहक्क आणि सामाजिक न्याय या प्रत्येक क्षेत्रात आदिवासी समाजाला समान संधी मिळणे आवश्यक आहे. त्यांच्या पारंपरिक ज्ञानाचा सन्मान करून आधुनिक विज्ञानाशी त्याची सांगड घालणे ही काळाची गरज आहे. कारण निसर्गाशी सुसंवाद साधून जगण्याची कला जगाला शिकविण्याची ताकद आदिवासी संस्कृतीत आहे.

आज आपण पर्यावरण संवर्धन, जैवविविधता आणि शाश्वत विकास यांविषयी चर्चा करतो परंतु हे विचार आदिवासी समाज शतकानुशतके आपल्या जीवनातून जगत आला आहे म्हणूनच त्यांच्याकडे केवळ सहानुभूतीने नव्हे तर आदराने आणि समतेच्या दृष्टीने पाहणे आवश्यक आहे. त्यांच्या संस्कृतीचे जतन करणे म्हणजे आपल्या देशाच्या सांस्कृतिक वैभवाचे संरक्षण करणे होय…

जागतिक आदिवासी दिन हा विविधतेतील एकतेचा, मानवतेचा आणि निसर्गप्रेमाचा उत्सव आहे… हा केवळ उत्सव नाही तर आत्मपरीक्षणाची संधी आहे. आदिवासी समाजाला विकासाचा समान अधिकार देताना त्यांच्या सांस्कृतिक अस्मितेचे संरक्षण करणे, त्यांच्या ज्ञानपरंपरेचा सन्मान करणे आणि पर्यावरणपूरक जीवनशैलीचा स्वीकार करणे, हीच या दिवसाची खरी शिकवण आहे. आदिवासी संस्कृतीचे जतन म्हणजे मानवतेच्या प्राचीन शहाणपणाचे जतन होय म्हणूनच विविधतेचा सन्मान, समानतेची जाणीव आणि निसर्गाशी सुसंवाद या मूल्यांच्या आधारे आपण अधिक न्याय्य, समृद्ध आणि संवेदनशील समाजाची उभारणी करूया… आदिवासी संस्कृतीचे अस्तित्व टिकले तरच निसर्गाचे संतुलन आणि मानवतेचे भविष्य अधिक समृद्ध, सुंदर आणि सुरक्षित राहील हाच जागतिक आदिवासी दिनाचा खरा संदेश आहे… जंगलातील प्रत्येक हिरवे पान पृथ्वीचा श्वास जपते तसेच आदिवासी समाज भारताच्या संस्कृतीचा आत्मा जपतो. त्यांच्या अस्तित्वाचा सन्मान म्हणजे निसर्गाचा सन्मान, आणि त्यांच्या प्रगतीचा मार्ग म्हणजे भारताच्या उज्ज्वल भविष्याचा मार्ग होय.

दरवर्षी ९ ऑगस्ट रोजी साजरा होणारा जागतिक आदिवासी दिन हा केवळ एका समाजाचा उत्सव नाही तर मानवसंस्कृतीच्या आद्य वारशाला अर्पण केलेला सन्मानाचा मुजरा आहे.

 

©  संगीता कुलकर्णी 

लेखिका /कवयित्री

ठाणे मो. 9870451020

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “फक्त आशिर्वाद मोजावेत..” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ “फक्त आशिर्वाद मोजावेत.. ☆ संध्या बेडेकर ☆

३)  — 

 “  “ लेखिका : संध्या बेडेकर

फक्त आशिर्वाद मोजावेत – – 

“रिकाम्या भांड्यावर झाकण आणि चुकीच्या विचारांची/सवयींची पाठराखण काही उपयोगाची नसते. ” 

ताईकडे महालक्ष्मी सण मोठ्या थाटामाटात साजरा होतो. दर वर्षी तिच्या घरचे सर्व एकत्र येऊन हा सण साजरा करतात. ताईच्या सासू बाई पण असतातच. सर्व मिळून गौरींच्या आगमनाची तयारी सजावट, दुसऱ्या दिवशी ची तयारी करतात. भाज्या निवडणे वगैरे वगैरे.

 पूजेच्या दिवशी ताई कडचे पंधरा वीस जण सहज असतात. म्हणून आम्ही माहेरचे एक दिवस नंतर विसर्जनाच्या दिवशी जातो. सर्वांना प्रसादही मिळतो. ताईला खूप दगदगही होत नाही. नंतर ची आवाराआवरीची जबाबदारी आम्ही घेतली आहे.

 काम करताना गप्पा पण रंगतातच. किती तरी विषय निघतात. वेगवेगळ्या सणांच्या आठवणी निघतात. काही गोड असतात तर काही पुन्हा एकदा मनाच्या कोपऱ्यातून आपलं डोकं वर काढून जिवंत होतात.

 मन आपल्या शरीरात कुठे आहे?? किती मोठे आहे?? त्याची मेमरी डिस्क किती GB ची आहे? काही माहीत नाही. पण अगदी सर्व मनात व्यवस्थित recorded असत. चांगल्यापेक्षा सर्व वाईट प्रसंग सहज अगदी डिटेल्स मध्ये आठवतात. बहुदा त्याची उजळणी बरेचदा झालेली असावी. बरे असो,

 आम्हा तिघी बहिणींचे एकत्र येणेही या निमित्ताने होते.

 रमा (आमची सर्वात लहान बहीण) म्हणाली,  ताई!! तुझ्या घरी सर्व मजेत पार पडतं ग. आमच्या घरी एकत्र जमले की टेन्शनच असतं. एखादा तरी ‘रंगारंग कार्यक्रम’ होतोच. बहुतेक मीच टार्गेट असते. यावेळी काय ऐकायला मिळणार?? माझ्यातले दोष सांगण्यात येतात. मी कुठे चूकते?? वगैरे वगैरे. त्यानंतर आमच्या दोघांत भांडण होतं. हेही ठरलेलंच आहे.

 असं सांगताना रमाचे डोळे भरून आले.  ताईच्या सासूबाई लगेच म्हणाल्याच,  

 अग!! रमा! गौरींसमोर आहेस ना तू. मग अजिबात रडायचं नाही. अग!! तू शाळेत शिक्षिका आहेस ना,

 ‘Positive attitude’ वर भाषण देतेस ना मग स्वतः केंव्हा स्ट्रॉंग होणार??

 ताई म्हणाली,  रमा!! यात तुझी पण चूक आहेच. किती दा तुला सांगितलंय, की घरच्या गोष्टी बाहेर सांगायच्या नसतात. प्रत्येक घरात काही न काही प्रश्न असतातच. नवरा बायको मध्ये वादविवाद चालतच असतात. ते सर्व बाहेरच्या लोकांना म्हणजे अगदी आम्हाला सुद्धा सांगायची काहीच गरज नाही. असं वागून तूच लोकांना तुझ्या घरात घुसायची परवानगी देते. चर्चेला विषय देते. मग असं होणारच. आधी तुम्ही दोघे एकमेकांना समजून घ्या, सांभाळून घ्या. इथे तिथे बोलण्यापेक्षा आपापसात बोला. तुम्ही दोघे एकमेकांची किंमत ठेवत नाही. मग दुसरे त्याचा फायदा घेतात. तुमच्या घरात लुडबुड करतात. तुझी ही सवयच झाली आहे. तू त्यात रमते. सारख रडगाण का??

 या जगात कोणीच सर्व गुण संपन्न नाही.

 म्हणतात ना,

 “Talking about our problems is the greatest addiction, break the habit and talk about your joys. ” And enjoy life.

आपली किंमत आपण ठरवायची असते, दुसऱ्यांनी नाही. आपला मान आपण ठेवला तर दुसरा अपमान करायची हिम्मत करत नाही.

 अग!! प्रत्येकाच्या घरी काही न काही घडत असतच. उतार चढाव येतातच. पण ते तुला कधी काही सांगतात का??

 अग!!! काही लोकांना असते तशी सवय. आपण कितीही प्रयत्न केला तरी कोणाचा स्वभाव बदलू शकत नाही. आगीत तेल घालण्याचे काम ते उत्तम करतात.

 ” कितीही प्रेमाने कांदा कापला तरी अश्रू निघणारच. ” दुर्लक्ष करायचे कौशल्य वाढवावे. तेच आपल्या सुखी आनंदी जीवन जगायचे औषध आहे. कोणी काहीही म्हणणार आणि तू रडणार का? लोक सोयीनुसार जवळ येतात, गरज संपली की झालं. आणि त्या नुसार तुम्ही वाईट की छान ठरवतात. लोकांना ‘impress’ करायला जायचे नाही. त्यात वेळ व कष्ट वाया घालवायचे नाही.

 ” When you decide not to impress anyone, your mental freedom begins. ” 

 स्वतः ला कमी लेखू नको. मी गरीब, मी बिचारी, या कोशातून बाहेर नीघ. तुझ्यात काय आहे?? जमेची बाजू कोणती?? याचा विचार कर. त्या गुणांचा विकास कर.

 समोरचा श्रीमंत आहे, तर असू दे. म्हणून तूं गरीबीचा न्यूनगंड बाळगू नकोस. जसं स्वतः ला श्रेष्ठ समजणं अहंकार आहे, तसंच स्वतः ला गरीब, बिच्चारी समजणही चूकच.

 दुसऱ्यांची आरती ओवाळण बंद कर. स्वतः ची आरती ओवाळण सुरू कर. आवाजात करारीपणा व डोळ्यात आत्मविश्वासाचे तेज असू दे.

 अग!!! गरूडासारखी उंच झेप घेता येत नाही म्हणून बाकी पक्षी रडत बसतात का?? लहानस फुलपाखरू सुध्दा बगीच्यात स्वच्छंद बागडत.. वटवृक्षाखाली वाढणार गवत ही मजेत जगतच.

आपल्या क्षमतेप्रमाणे अगदी धाटात, मजेत व ताठ मानेने जगायचे.

आज गौराईं समोर नक्की ठरव, यापूढे हसून जगायचं की रडायचं?? धाकात जगायचं की थाटात??

यापूढे रडायचं नाहीच.

 आज ताईने अगदी मनसोक्त बोलायचं ठरवलेलं दिसतंय. बरोबर आहे किती कुरवाळायच.??? कधी कधी कान उघडणी करणे पण गरजेचे असते.  

बरोबर आहे. म्हणतात ना,

 “Stop focussing how stressed you are, and remember how blessed you are. “

“Enjoy life “

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ चारचौघे – त्यांची गोष्ट ☆ शीला पतकी ☆

शीला पतकी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ चारचौघे – त्यांची गोष्ट ☆ शीला पतकी 

तुम्ही खूप छान लिहाल हो.. चार लोकांनी वाचलं पाहिजे ना? हां बरोबर आहे… चार लोक फार महत्वाचे असतात. चार या संख्येला अत्यंत महत्त्व आहे. ते चारधाम चार वेद हे मी सांगणार नाही माझा विषय जरा वेगळा आहे आणि वेगळा विषय मांडला ही आपली खासियत आहे. चार याबद्दल आपण काय काय बोलतो बघा 

लहानपणी आपण ऐकत होतो… अरे चार मुलं बघ ती कशी वागतात तस आपण करावं वागावे वर्गामध्ये चार चांगल्या मुलांची संगत धर… चार चांगली पुस्तकं…

वाच चार बुक शिकला तर जीवनाचे कल्याण होईल 

नाही समजलं तुला तर चार लोकांना विचारवं 

इथपासून प्रवास सुरू होतो मग कधी कधी असं ऐकायला लागतं 

 

चार चौघा जणांसारखा वाढवलं नाही तुम्हाला पाहिजे ते प्रत्येक वेळी देत गेलो म्हणजे यांनी खूप थाटात वाढवले आपल्याला…

लक्षात घ्या पुढे आपण हळूहळू मोठे मोठे होत जातो 

अरे घरात गोष्टीत लक्ष घाल तुला काय स्वातंत्र्य दिलय का? … चार माणसाची चर्चा करावी चार माणसांचा विचार घ्यावा मग पुढे पाऊल टाकावं… कुठल्यातरी चार फालतू मुलांमध्ये हिंडू नकोस…

 

अजून एक सूचना चार चार दिवस घराबाहेर जातो जातोस कुठे?

अरे बापरे हे मात्र अवघड आहे बर का… “अहो चार दिवस झाले मी ओरडते तुम्हाला गॅस संपतआलाय, संपत आलाय गॅसला नंबर लावा… तुमचं महिला कुठे लक्षात नसतं घरात मेलीने मी एकटीने मरायचं”

अगं कशी चालली आहेस… लग्नाला चाललीस ना… अंगावर दागिने घालावेत… चार लोक आम्हाला नाव ठेवतील…

चार माणसात कसं उठवून दिसायला पाहिजे आमची मुलगी चारचौघेत ऊठून दिसेल अशी आहे ईति वधू पिता अर्थात हे पूर्वी होतं…

चार हात कामाला लागले तर बघता बघता कामा संपतात एकमेका साहाय्य करू हा मंत्र…!

“चार माणसात आमची अब्रू काढू नका म्हणजे झालं” वैतागलेली घरची मंडळी!

“चारदा सांगून झालं पण ऐकलं तर खरं ना… “… टोमणा 

दोनाचे चार हात झाले की सुटले बाई मी एकदाची… वैतागलेली आई!

 

घरात भांडण झाल्यावर समजूतीच्या चार गोष्टी सांगताना, “चार भिंतीच्या आत गोष्टी आहे तोवर बरं असतं लोकांना काय त्या भिंतीनाही कान लावून लोक ऐकतात लक्षात ठेवा “अनुभवी सूचना

घरातल्या कर्त्याची सूचना तुझ्यापेक्षा चार पावसाळी जास्त पाहिलेत आम्ही… धाक! कार्ट बेरकी ते म्हणाल ते सगळे दुष्काळी होते.

चार पैसे कमवून आणायची अक्कल नाही निघालेत आम्हाला सांगायला पैसे मागितले की सुरुवात म्हणून मिळेल ते काम बघून पैसे कमवावे स्वतःच्या दोन पायावर उभे राहावे 

आयुष्यात चार माणसे जोडून घेता आली नाहीत कुणाशी न पटलेल्या माणसाबद्दल बोलताना हे वाक्य

हमखास 

 

चार चाकी गाडी घ्यायचे माझे स्वप्न होते ते माझ्या मुलाने पूर्ण केले हो मध्यमवर्गीय कृतार्थ बाप

आजी… अग हातात चार बांगड्या घालाव्यात बाळा बाईच्या जातीला असे भुंडे हात शोभत नाहीत.

भाऊसाहेब रिटायर झाला पण सगळं देऊन बसू नका चार पैसे आपल्या कनवटीलाठेवा… नटसम्राट सल्ला

 

एकत्र कुटुंब पद्धतीतला घरातला मोठा माणूस काका वगैरे… “चारचौघात आमचं नाक कापलं जाईल असं काही करू नका म्हणजे झालं शिकायला हरकत नाही पण नको ती थेर घरात नकोत.

काही परदेशात वगैरे जायला नको चार चौघासारखा आयुष्य जगा समाधानाने आपल्या देशात राहा वडीलकीचा सल्ला 

 

एकदा एका सुनेला सासू म्हणाली अगं चार बायकां सारखं रहावं आपण..! हे असले कपडे… कुंकू न लावणं… मंगळसूत्र मनगटाला बांधायला शोभत नाही…! त्यावर सून म्हणाली, “सासुबाई मी पाचवी बाई आहे ती आता जरा समजून घ्या चाराच्या पलीकडे जरा जाऊ द्या ना गाडी हाय का नाही गंमत 

 

शेवटी चार माणसे येतील एवढे तरी चांगलं वागा बाबांनो एक सामाजिक वाक्य 

 

बाहेर चार माणसं तर विचारतात का आणि घरात आमच्या डोक्यावर मिरे वाटतात मनातल्या मनात म्हणाले जाणारे वाक्य

 

काळजी आणि प्रेमापोटी पण वैतागलेला मुलगा… “बाबा चार लोकात जा जरा बसा बरं वाटेल तुम्हाला. घरात काय वाचता टीव्ही बघता… इत्यादी इत्यादी

 

असो अशा अनेक गोष्टी आहेत यामध्ये चार चा उल्लेख असतो तो का हे मला खूप दिवस कळले नव्हते आता तुम्हाला उत्सुकता मग आता कळले आहे का? थोडे पुढे जाऊयात

 

मी गणिताची शिक्षिका… एका बिंदूतून असंख्य रेषा जातात. दोन बिंदूतून एकच रेषा जाते. तीन बिंदू एक प्रतल निश्चित करतात म्हणजे सपाट पृष्ठ भाग… या साठी एसएससी बोर्डाच्या पेपर मध्ये पूर्वी आठवा प्रश्न टॅलेंट क्वेश्चन म्हणून असायचा त्यामध्ये विचारलं होतं सायकल ला स्टॅन्ड का लावतात? त्याचं उत्तर असं होतं की गोल चाकाचा टेकलेला एक एक बिंदू अधिक त्याच एक बिंदू दोन नुसत्या चाकावर सायकल उभी राहू शकत नाही पण स्टॅन्ड लावला की तिसरा बिंदू मिळतो आणि प्रतल निश्चित होते आणि स्टॅन्ड वर सायकल उभी राहते म्हणजे प्रतल निश्चितेसाठी तीन बिंदू लागतात.. इत्यादी इत्यादी… पण प्रतल निश्चितीसाठी तीन बिंदू लागत असले तरी ते बॅलन्स होण्यासाठी चार बिंदू गरजेचे असतात म्हणजे पलीकडच्या बाजूला जर अजून एक स्टॅन्ड लावला तर सायकल तिरकी उभी राहणार नाही ती सरळ उभी राहिल. मग सायकल सरळ उभी राहण्याचे स्टॅन्ड सुद्धा बाजारात मिळत होते ते पाठीमागच्या टाका चाकाला पायाने सरकून लावायचे असावयाचे. म्हणजे चार मुळे समतोल साधला जातो.

याचे एक उदाहरण मी एका मुलाखतीचा ऐकलं होतं मुलाखत होती सलीम जावेद या सुप्रसिद्ध लेखकाच्या जोडी पैकी सलीम यांची त्यांनी सांगितले की डायलॉग लिहिताना त्या वाक्यांमध्ये शब्दांचे समतोल साधणे अत्यंत गरजेचे असते तरच ते डायलॉग ठळकपणे लोकांच्या लक्षात राहतात याचे उदाहरण देताना त्यांनी सांगितले होते की दिवार मधला डायलॉग

मेरे पास माँ है… हा लिहिताना त्यांनी लिहिले होते मेरे पास गाडी है बंगला है तुम्हारे पास क्या है? इती अमिताभ… मेरे पास मा है शशी… मेरे पास मा है याला वजन येईना मग त्यांनी ऍड केलं… “मेरे पास बंगला है, गाडी है, बँक बॅलन्स है तुम्हारे पास क्या है? “मग शशी कपूर शांतपणे म्हणतो, ” मेरे पास माँ है” प्रेक्षकांची शिट्टी आणि टाळ्या!

एका बाजूला तीन शब्द एका बाजूला एक त्या चार शब्दांमुळे त्या संपूर्ण डायलॉग ला वजन आलं आणि तो अजरामर झाला तर असं शब्दांना वजन आम्हाला द्यावं लागतं त्याचा बॅलन्स साधावा लागतो. हे सलीमजीने अनेक उदाहरण देऊन फार छान सांगितलं होतं

मला वाटतं हे चार माणसं काय म्हणतील? चार लोकांचा विचार घ्या… , चार माणसे तरी शेवटी येणार का? इथे सुद्धा बॅलन्सच असावा म्हणून नेहमी आपण चार आकडा वापरतो असे मला वाटते… बघा ना तुम्ही म्हणून बघा… सहा माणसं काय म्हणतील? … पाच माणसं तरी येतील का? … आठ माणसात आमच्या अब्रू घालू नको… मजा नाही यात… जे चार मध्ये आहे! अशा खूप गोष्टी आहेत. आठवा बघा आणि लिहा. चार माणसं वाचतील अशा अपेक्षांनी लिहले आहे पटलं तर घ्या आणि चार जणांना पुढे पाठवा…!

©  शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका, सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares
1

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “जगू या – जिंकू या…” – लेखक : श्री संजय आवटे ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆

श्री मोहन निमोणकर 

? मनमंजुषेतून ?

☆ “जगू या – जिंकू या…” – लेखक : श्री संजय आवटे ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर

सलमान खान हा काही विचारवंत वगैरे अभिनेता नव्हे. पण, त्याच्या एका मुलाखतीनं मला पार हादरवून टाकलं.

त्याला विचारलं गेलं होतंः “तुझं दुःख तू कोणाशी शेअर करतोस? “

तोवर पोरकट हसत जोक्स मारणारा सलमान एकदम थबकला. गंभीर झाला.

म्हणाला, “कोणाशीच नाही! कारण समजा मी माझ्या सहका-यांसोबत दुःख शेअर केलं, तर ते मला समजावतील. पण, खासगीत हसतील. माझा रडका चेहरा बघून खुश होतील. “

“माझ्या काही मित्रांशी मी ते शेअर करू शकतो. पण, मला भीती आहे की, त्यांना याचाच आनंद होईल की साक्षात सलमान आपल्याशी एवढं पर्सनल काही शेअर करतोय! ” 

“माझ्या खांद्यावर हात ठेऊन, मला समजावताना काही लोकांचा इगो सुखावेल. “

“आईसारखे काही खूप जवळचे लोक आहेत, ज्यांच्याशी मी हे शेअर करू शकतो. पण चिंता अशी आहे की, हे लोक त्यामुळे स्वतःच एवढे निराश होतील, की मला भीती वाटते. “

“त्यामुळे अद्याप तरी मला असं कोणी मिळालेलं नाही की ज्यांच्याशी मी माझं दुःख शेअर करू शकेन! “

***

मनातला हा अंधार खरंच कोणासोबत शेअर करायचा?

आपल्यापैकी प्रत्येकाच्या मनात अंधार आहे. पण, हा अंधार दाखवणारी कोणती ‘इमोजी’ नाही. तो व्यक्त करण्याची कोणाची तयारी नाही. तुझ्या अंधाराशी मी काही नातं सांगत नाही. आणि, माझ्या अंधाराशी तुझा जैव संबंध नाही!

आपल्याही नकळत या अंधाराचं मोठं साम्राज्य तयार झालं आहे, हे आपल्या गावीही नाही.

काही लोक निराश आहेत, खोल डिप्रेशनमध्ये आहेत, हे आपल्याला समजत नाही, असं नाही. पण, उलटपक्षी अनेकदा त्याचं ‘गॉसिप’ होतं, थट्टा होते आणि ‘बरं झालं, आपल्या रस्त्यातला एक स्पर्धक दूर झाला’, असंही लोकांना वाटतं.

तुम्हाला गंमत माहीत आहे? तुम्ही एखाद्या दिवशी ऑफिसमध्ये निराश दिसलात, थकलेले जाणवलात तर लोकांना काळजीच वाटेल, असं नाही. ‘त्याला प्रमोशन नाही मिळत बरं का, बघितलंस ना चेहरा कसा रडवेला दिसत होता त्याचा’, असं गॉसिप होणारच नाही, असं नाही.

कला ही आनंदाची सर्जक शक्यता. पण, आनंदाचे झरे फुलवणा-या या क्षेत्रातले लोक तर एकमेकांचं जगणं संपवून टाकण्यासाठी कसे आणि किती टपलेले असतात, हे तुम्हाला अगदी सामान्य तबलावादकांपासून ते साहित्यापर्यंत आणि गायकांपासून ते बॉलिवूडपर्यंत सर्वदूर दिसेल. कुठलंच क्षेत्र इथं अपवाद नाही.

हा मानवी स्वभाव कसा आहे, तेच समजत नाही.

आपल्यासमोर आपला एखादा मित्र चालता चालता घसरून पडला, तरी ‘रिफ्लेक्स ॲक्शन’सारखे आपल्याला आधी हसू फुटते. मग आपण त्याला उठवण्यासाठी हात देतो!

मला आठवतं, लहानपणी आम्ही सगळेच मित्र सायकल शिकायचो. एखाद्यानं जरा भारीतली सायकल आणली असेल आणि थोडं स्टाइलमध्ये सायकल चालवत गावभर फिरत असेल तर “असा बाराच्या भावात पडावा लागतो ना…” अशी शुभेच्छा असायची!

माणसं दिसतात सोबत, पण किती जखमी करत असतात एकमेकांना! बोचकारत असतात. ओरबाडत असतात. घर नावाचं भारतीय प्रारूप हे तर ऊब कमी देतं आणि ऊर्जा अधिक शोषतं. नस्ते गुंते तयार करतं. सोपं जगणं क्लिष्ट करून टाकतं. कोणीच कोणाशी बोलत नाही. ‘डिप्लोमसी’ सुरू असते सगळी. जिथं ‘प्रेमात पडले’, हे पोरगी आईला सांगू शकत नाही, तिथं आणखी काय संवाद होणार? “माझ्याशी भांडायला, खुन्नस द्यायला मी काय भावकी आहे का त्याची? “, असं गावात सहजपणे बोललं जातं. अशा नात्यांचं काय करायचं?

आपल्यासारख्या आध्यात्मिक देशात तर हा भोंदूपणा भयंकर आहे. भौतिक गोष्टींचे आकर्षण नाही, असे म्हणायचे आणि प्रत्यक्षात मात्र त्यासाठी एकमेकांचा जीव घ्यायला सज्ज व्हायचे! प्रतिभा, प्रयत्न, प्राक्तन याच्या आधारावर प्रगती करण्याची आकांक्षा बाळगण्यात गैर काही नाहीच. पण, त्यासाठी माणसं खोडण्याची, भिंती बांधण्याची ही कसली विखारी विकृती?

अशा वेळी कोण कोणाशी बोलेल? संवाद कसा होईल?

जगणं हे मूलभूत आहे. प्रसिद्धी, पैसा, यश अशी आकांक्षा असू शकतेच, पण ते काही जगण्याचे प्रयोजन नाही. जगणे हेच जगण्याचे प्रयोजन आहे.

तुम्ही कलेक्टर आहात, स्टार आहात, मंत्री आहात, शिपाई आहात, उद्योजक आहात की शेतकरी आहात, यामुळे त्यात काही फरक पडत नाही.

मी बी. एस्सी (ॲग्री) केलं. आमच्याकडं सगळे स्पर्धा परीक्षांचा अभ्यास करणारे. माझ्या एकट्या बॅचचे पन्नासेक जण तरी आयआरएस, आयपीएससह क्लास वन ऑफिसर वगैरे असतील. काही ग्रामसेवक, काही कृषी पर्यवेक्षक, व्यावसायिक, एलआयसीत ऑफिसर, काही शेतकरीही. आमच्या बॅचचं ‘गेट टुगेदर’ दरवर्षी करायचं, अशी कल्पना दहा वर्षांपूर्वी पुढे आली. सुरूवातीच्या ‘गेट टुगेदर’मध्ये ‘वर्गवाद’ असायचा. डेप्युटी कलेक्टरला आपण ग्रामसेवकापेक्षा थोर असे वाटायचे. किंवा, त्याला नाही वाटले, तरी ग्रामसेवकाला न्यूनगंड असायचा. मग डीवायएसपी मोठा, सुपरवायझर बारका असे सगळे पोटभेद होते. गेल्या दहा वर्षांत सगळ्यांच्या लक्षात आलंय की यामुळं काही फरक पडत नाही, यार. तुझ्याकडे इनोव्हा असेल, माझ्याकडं बाइक असेल, पण त्यामुळं काय फरक पडतो? जगण्यातली धमाल महत्त्वाची. जगण्यावर हक्क प्रत्येकाचा आहे. टेरेस कोणाच्या मालकीचं असलं, म्हणून त्यावरून दिसणारं आकाश त्याच्या मालकीचं थोडंच आहे! आता अशी अवस्था आहे की आम्ही दोन वर्षांपूर्वी गोव्यात आणि गेल्या वर्षी दुबईत ‘गेट टुगेदर’ केलं, तेव्हा हे सगळे भेद मुळासकट उपटले गेले होते. ग्रामसेवक कमिशनरला ×××वर लाथ घालून बेडवरून उठवत होता!

आमचा एक मित्र कॉलेजात टॉपर होता. तो पुढं सायंटिस्ट वा आयएएस होणार, अशी आम्हाला खात्री होती. पुढं अगदी सामान्य मार्कांची पोरं एसपी, कमिशनर वगैरे झाली. हा मात्र गायक झाला. आर्थिक आघाडीवर यथातथाच राहिला. पण, तहानभूक हरपून गाताना तो केवढा देखणा दिसतो! पहिल्या भेटीत सगळ्यांनाच त्याच्या नव्या रुपाचा धक्का बसला. आता मात्र आमच्या ‘गेट टुगेदर’चा खरा ‘हीरो’ तो असतो! टॉपर असताना या ‘चष्मेबद्दू’ला कधीच हा सन्मान मिळाला नाही, जो त्याला आज मिळतो.

कोणाला काही त्रास होण्याचा, मदत हवी असण्याचा अवकाश, आमची सगळी फौज कोणत्याही मित्राला मदत करायला उभी असते. मैत्र हे असतं.

केशवसुत म्हणाले तेच खरं.

‘जग केवढं, ज्याच्या- त्याच्या डोक्याएवढं’ 

त्याचा पदाशी वा पगाराशी काही संबंध नाही. हे डोक रूंदावणं, मन विशाल करणं हेच गुपित आहे, तुमचं जग व्यापक करण्याचं. मग कळतं, जगण्यात मौज आहे. मुक्कामात नाही, प्रवासात गंमत आहे.

त्यासाठी आपलं जग तर बदलावं लागेलच, पण ‘माणूस’ म्हणून हा भवतालही बदलावा लागेल. आपली जगण्याची गोष्ट आहे, तशी प्रत्येकाच्या जगण्याची गोष्ट आहे. ती समजून घ्यावी लागेल. त्यासाठी कोणाच्या पश्चात नाही. त्याच्याशी थेट बोलावं लागेल. कोणाच्या शेतातला बांध जेसीबीनं उद्ध्वस्त करण्यापेक्षा या सीमा प्रश्नावर एकमेकांशी बोलावं लागेल.

“गैरों से कहा तुमने,

गैरों से सुना तुमने!

कभी हम से कहा होता,

कभी हम से सुना होता! “

हीच तर सल आहे.

तेव्हा, बोलू एकमेकांशी आणि मुख्य म्हणजे, एकमेकांशी बोलण्याचा अवकाश जिवंत ठेऊ. नाहीतर, सुशांतसारखे काही आत्महत्या करतील, उरलेले रोज मरत-मरत दिवस काढतील.

हे जग सुंदर करायचं असेल आणि ‘जगणेबल’ करायचं असेल, तर आधी छान निखळ माणूस व्हावं लागेल. माणसांची निरपेक्ष सोबत करावी लागेल. तुम्ही कोणावर प्रेम करता, तेव्हा तुम्ही स्वतःवरही प्रेम करायला शिकता. तुम्ही कोणावर विश्वास ठेवता, तेव्हा तुमचा स्वतःवरचा विश्वास अढळ होत जातो. तुम्ही कोणाशी बोलता, तेव्हा स्वतःशीच बोलत असता! आपल्यामुळं कुणाचा गेम झाला, यापेक्षा आपल्यामुळं कोणाच्या चेह-यावर हसू फुललं, याचा आनंद किती थोर असतो! हेच तर जिंकणं आहे!

मी आहे यार, कारण तू आहेस. आपण आहोत.

सोबत राहू, असेच.

जगू या, जिंकू या!

Love u All

 

लेखक : श्री संजय आवटे 

प्रस्तुती : श्री मोहन निमोणकर 

संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो.  ८४४६३९५७१३.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares
1

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९९ आणि १०० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९९ आणि १०० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

 श्लोक क्र. ९९ – – 

जगी धन्य वाराणसी पुण्यरासी ।

तयेमाजि जाता गती पूर्वजांसी ।

मुखे रामनामावळी नित्यकाळी ।

जिवा हीत सांगे सदा चंद्रमौळी ।।९९।।

अर्थ : वाराणसी अर्थात काशीक्षेत्र पुण्याने परिपूर्ण असल्याने खरोखरच जगात धन्य आहे. तिथे गेल्यानंतर तेथील पुण्यप्रभावामुळे आपल्यासह आपल्या पूर्वजांना गती मिळते. मुखाने सदैव श्रीरामांचे नाम घ्यावे असा उपदेश भगवान शंकर तिथे आपल्या कानात करतात.

(पुण्यरासी – पुण्याने परिपूर्ण/भरलेले, गती – मृत्यूनंतर सद्गती अथवा मुक्ती मिळणे) 

विवेचन : या श्लोकात रामनामाचे महत्व स्पष्ट करताना समर्थांनी काशीक्षेत्राचे उदाहरण दिले आहे. आपल्याकडे काशीक्षेत्र सर्व तीर्थांमध्ये अत्यंत पवित्र मानले जाते. त्यावरून ‘ काशीस जावे नित्य वदावे ‘ अशी म्हण आपल्याकडे पडली आहे. म्हणजे प्रत्यक्ष काशीला जायला जमले नाही तरी मला काशीला जायचे आहे असे नेहमी म्हणत राहावे. यावरून काशीक्षेत्राचे महत्व आपल्या लक्षात येईल. आपल्याकडे भाविकांमध्ये अशी समजूत आहे की काशीला गेल्यानंतर आपल्याला आपल्या अंतकाळी उत्तम गती प्राप्त होते. केवळ आपल्यालाच नव्हे तर आपल्या पूर्वजांना देखील उत्तम गती मिळते. म्हणून ईश्वरावर श्रद्धा असणाऱ्या प्रत्येक व्यक्तीची आपण आयुष्यात एकदा तरी काशीला जावे अशी इच्छा असते. पूर्वीच्या काळी तर वृद्ध माणसे काशीला जात असताना तिकडेच देह ठेवला तर मुक्ती मिळाली असे समजत असत. तशी इच्छा मनात धरून बरीचशी मंडळी काशीला जात असत. आजही बऱ्याच भाविकांची तशी श्रद्धा आहे.

वरील श्लोकात दुसऱ्या ओळीत आलेला ‘ जाता ‘ हा शब्द दोन अर्थांनी घेता येतो. पहिला अर्थ म्हणजे काशीला गेल्यानंतर असा घेता येतो तर दुसरा अर्थ काशीला देह ठेवल्यानंतर असा घेता येतो. कोणताही अर्थ घेतला तरी काशी क्षेत्राचा महिमा अपरंपार आहे हे लक्षात येते. काशीला भगवान शंकरांचे मंदिर ‘ काशी विश्वनाथ ‘ म्हणून प्रसिद्ध आहे. देवाधिदेव महादेवाचे हे स्थान द्वादश ज्योतिर्लिंगांपैकी एक आहे असे मानले जाते. इथे येणाऱ्या प्रत्येक जीवाला भगवान शंकर स्वतः ‘ मुखाने सतत रामनाम घ्या ‘ ही आपल्या हिताची गोष्ट तेथे कानात सांगतात असे म्हटले जाते.

थोडक्यात म्हणजे समर्थांनी या ठिकाणी पुन्हा एकदा भगवान शंकरांचे उदाहरण देऊन रामनामाचे महत्व स्पष्ट केले आहे. ज्या काशी विश्वनाथाचे दर्शन घेतल्याने मोक्ष प्राप्ती होते असे आपण मानतो, ते भगवान शंकर स्वतः रामनाम घेतात आणि आपल्यालाही रामनाम घेण्याचा उपदेश करतात. तुम्ही काशीला जा किंवा जाऊ नका. पण मुखाने सतत रामनाम घ्या. तेच तुमच्या हिताचे आहे ही गोष्ट समर्थांनी इथे आपल्या मनावर ठसवली आहे. सातत्याने आपण रामनाम घेत गेलो तर आपला देह, आपले मन पवित्र, शुद्ध आणि स्वच्छ होईल. तेच काशीक्षेत्र होईल.

स्वसंवाद

१. भौतिकदृष्ट्या ‘काशीला’ जाण्याची ओढ असण्यासोबतच, मी माझ्या अंतःकरणात रामनामाची ‘पुण्यरासी’ (काशी क्षेत्र) निर्माण करण्याचा प्रयत्न करतो का?

२. जीवाला उत्तम गती प्राप्त होणे म्हणजे केवळ मृत्यूनंतर मिळणारे सुख नसून, चालू आयुष्यात रामनामाच्या अनुसंधानात राहून जन्माचे सार्थक करणे आहे, हे मला पटते आहे का?

३. “काशी विश्वनाथ स्वतः प्रत्येक जीवाच्या कानात रामनामाचा उपदेश करतात, ” हे ऐकल्यावर माझ्या दैनंदिन जीवनात रामनाम आदराने घेण्याची माझी वृत्ती अधिक दृढ झाली आहे का?

४. ‘पूर्वजांना गती मिळणे’ आणि स्वतःचा उद्धार करणे यासाठी विनामूल्य आणि अत्यंत सोपे असणारे रामनाम घेण्यासाठी मी रोज किती वेळ शांत चित्ताने देतो?

===== 

 श्लोक क्र. १०० – –

यथासांग रे कर्म ते हि घडेना ।

घडे धर्म ते पुण्य गांठी पडेना ।

दया पाहता सर्वभूती असेना ।

फुकाचे मुखी नाम ते हि वसेना ।।१००।।

अर्थ :  पुण्य प्राप्तीसाठी आपण जे कर्म करतो, ते यथासांग घडत नाही. जे काही कर्म आपण त्यासाठी करतो, त्यात काहीतरी उणीव राहिली तरी पुण्य पदरी पडत नाही. सर्व प्राणिमात्रांबद्दल मनात दयेचा भावही उपजत नाही. हे सगळे समजण्यासारखे असले तरी फुकटचे असलेले भगवंताचे नाम देखील मुखात येत नाही.

 विवेचन : समर्थांनी लिहिलेला हा शंभरावा श्लोक विशेष आहे. मानवी प्रवृत्तीवर समर्थांनी अचूक बोट ठेवले आहे. माणूस सगळेच साध्य करण्याच्या मागे लागतो. संसार करता करता पुण्यप्राप्ती व्हावी काही धर्मकार्य करतो. परंतु धार्मिक कार्य करताना त्यात बऱ्याच वेळा काहीतरी उणीव राहून जाण्याची शक्यता असते. ते यथासांग, यथाविधी पार पडेलच असे सांगता येत नाही. त्यामुळे त्यातून आपल्या गाठी काही पुण्याचा संचय होईल अशी अपेक्षा करणाऱ्या यजमानाच्या पदरी फारसे काही पडत नाही. त्यातच अलीकडच्या काळात धार्मिक कार्ये विधिवत करण्यापेक्षा त्यात ते जास्त देखणे आणि भव्य कसे होईल याकडे लक्ष असते. त्यातून अमाप खर्च केला जातो. आलेली पाहुणे मंडळी, त्यांचे आहेर इत्यादी गोष्टींकडे जास्त लक्ष द्यावे लागते. ही कोणाला अतिशयोक्ती वाटली तरी वस्तुस्थिती आहे. अशा परिस्थितीत यजमानांचे लक्ष धार्मिक कार्यात कमी आणि इतर ठिकाणीच जास्त अशी अवस्था होते.

सर्वाभूती ईश्वर असे आपण मानतो. ज्ञानेश्वरीत तर ज्ञानेश्वर माउली ‘ जे जे भेटे भूत, ते ते मानिजे भगवंत ‘असे म्हणतात. असे केले तरी त्या त्या रूपातील असणाऱ्या ईश्वराचीच पूजा आपल्या हातून घडते. सगळ्या संतांची चरित्रे या दृष्टीने आदर्श आहेत. संत एकनाथांनी तृषार्त गाढवाला पाणी पाजून त्याचा आत्मा शांत केला. ज्ञानदेवांनी सर्वांभूती एकच ईश्वर आहे हे नुसते सांगितले नाही तर रेड्याच्या मुखी वेद वदवून ते सिद्ध केले. पण आपण सामान्य माणसे. आपल्याकडून ‘ सर्वभूती दया ‘ हे तत्व देखील नीट पाळले जात नाही. प्राणिमात्रांचे तर सोडून द्या पण घरातील नोकर, मोलकरीण यांच्याशी तरी आपण समभावाने वागतो का ही विचार करण्यासारखी गोष्ट आहे.

समर्थ म्हणतात, इथपर्यंतही ठीक आहे. समजण्यासारखे आहे. पण हे मना, अरे रामनाम किंवा भगवंताचे नाम घेण्यासाठी तर काही खर्च करावा लागत नाही ना? त्यासाठी कोणतेही धार्मिक विधी किंवा खर्च करावा लागत नाही. त्यात काही न्यून किंवा उणीव राहील अशी शक्यता देखील नाही. असे असूनही हे जीवा तू फुकटचे असे भगवंताचे नाम का घेत नाही? संत सोयराबाई म्हणतात, ‘ सुखाचे हे नाम आवडीने गावे, वाचे आळवावे विठोबासी. ‘ हेच आपणही करायला हवे.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या हातून होणारी धार्मिक कृत्ये ही केवळ बाह्य प्रदर्शनासाठी होतात की त्यात अंतःकरणाची खरी शुद्धता आणि विधीवरील निष्ठा असते?

२. ज्ञानेश्वर माऊलींच्या “जे जे भेटे भूत” या वचनाचा आदर मी माझ्या दैनंदिन जीवनात माझ्या हाताखाली काम करणाऱ्या माणसांशी आदराने वागून करतो का?

३. धार्मिक विधीत काहीतरी उणीव राहून जाण्याची भीती असते; पण ज्या नामात कोणतीही उणीव राहण्याची शक्यता नाही, ते विनामूल्य असणारे रामनाम मी आवडीने घेतो का?

– क्रमशः श्लोक ९९ आणि १००

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares