Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!
🔥The Right to Protest, The Duty to Be Accountable 🌌
A democracy thrives on dissent, but it thrives equally on responsibility.
The right to protest is an essential democratic freedom. However, that right does not extend to paralysing public life, destroying public property, intimidating institutions, or coercing a duly elected government into submission.
Too often, protest leaders claim credit for mobilising crowds when all is peaceful, yet distance themselves from the consequences when violence erupts, blaming “outside elements”. Accountability cannot be so selective. Those who organise and lead a protest must also accept responsibility for its conduct and its consequences.
When barricades are breached, stones are hurled, public property is vandalised, and ordinary citizens are inconvenienced for hours or days, someone must be held accountable. The cost of repairing damaged public assets should not be borne by the taxpayer but recovered from those responsible for the violence and destruction, in accordance with the law.
Equally, criticism of the police must be fair and balanced. If law enforcement is compelled to act because protesters resort to violence or defy lawful restrictions, that context cannot be ignored.
A government elected through a democratic mandate has both the authority and the responsibility to govern in accordance with the Constitution and the promises on which it sought the people’s vote. The opposition has every right to question, criticise, and persuade—but not to replace democratic debate with coercion or disorder.
The freedom to protest is a constitutional right. The freedom to indulge in violence, destroy public property, or hold society to ransom is not.
Rights and responsibilities are inseparable. In a mature democracy, both the State and the protesters must remain within the bounds of the rule of law.
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा।)
☆ आलेख – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
भारतीय ऋतुचक्र में पावस केवल हरियाली, कृषि समृद्धि तथा वर्षा का ही नहीं, यह जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यन्त सक्रिय और रचनात्मक काल होता है। महीनों से सूखी मिट्टी में सोए हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, हिरण-लोमड़ी इसी मौसम में पैदा होते हैं, मेंढ़क-टोड प्रजनन शुरू कर देते हैं, तितलियाँ, मधुमक्खी, दीमक, जुगनू की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, नदियाँ- तालाब पानी से भर जाते हैं और इसी समय अनेक विषैले जीव — साँप, बिच्छू, मकड़ियाँ और कनखजूरे अपने आवासों से निकलकर बस्तियों में दिखाई देने लगते हैं। परिणामस्वरूप सर्प एवं बिच्छूदंश जैसी अनेक घटनाएँ घटित होने लगती हैं। इस ऋतु में तापमान, आर्द्रता और नमी बढ़ जाती है। वर्षा के कारण बिलों में पानी भर जाता है, प्रजनन काल आरम्भ होने व भोजन की उपलब्धता बढ़ने से ये विषैले जीव मानव-आवासों की ओर बढ़ जाते हैं।
भारत में तीन सौ से अधिक साँपों की प्रजातियाँ पाईं जाती हैं, जिनमें लगभग साठ प्रजातियाँ अधिक विषैली होती हैं। भारतीय कोबरा, सामान्य करैत, रसेल वाइपर, साॅस्केल्ड वाइपर सर्वाधिक घातक सर्प होते हैं। अधिकांश सर्पदंश की घटनाएँ इन्हीं से सम्बन्धित होती हैं। बिच्छू की भी यहाँ सौ से अधिक प्रजातियाँ पाईं जाती हैं। लाल और काले बिच्छुओं का डंक अत्यधिक घातक व पीड़ादायक होता है। यहाँ की अधिकांश मकड़ियाँ विषैली किन्तु हानिरहित होती हैं। कुछ प्रजातियों का विष त्वचा व स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है। कनखजूरा का विष भी प्राणघातक तो नहीं होता किन्तु पीड़ा, सूजन तथा एलर्जी उत्पन्न करता है। ततैया, बर्र, मधुमक्खियाँ तथा इल्ली भी विषैला प्रभाव उत्पन्न करती हैं। सभी विषैले साँपों का विष एक जैसा नहीं होता। कुछ का विष मस्तिष्क और स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है जिसमें पलकें झुक जाती हैं, बोलने में कठिनाई, साँस लेने में परेशानी व माँसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। नाग और करैत का विष इसी प्रकार होता है। कुछ का रक्त पर प्रभाव पड़ता है, रक्त के थक्के बनने की क्षमता को प्रभावित करता है। मसूड़ों से रक्तस्राव, मूत्र में रक्त, गुर्दों पर दुष्प्रभाव आदि इनके लक्षण होते हैं। रसेल वाइपर इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। कुछ सर्पों का विष ऊतकों को क्षति पहुँचाता है। यह विष काटे गए स्थान की कोशिकाओं को नष्ट करता है। तीव्र सूजन, फफोले, संक्रमण,ऊतकों का नष्ट होना इसके प्रमुख लक्षण होते हैं।
ये विषैले जीव जहाँ एक ओर हानिकारक हैं वहाँ दूसरी ओर पारिस्थितिकी में उपयोगी घटक भी हैं। साँप एक वर्ष में सैकड़ों चूहों को खा जाते हैं। यदि ये नहीं होंगे तो कृषि को नुकसान होगा, अनाज भंडारण कठिन होगा, चूहों से फैलने वाले रोगों में वृद्धि होगी। सर्प स्वयं खाद्य श्रृंखला का हिस्सा है। ये स्वयं गरुड, मोर, नेवला, उल्लू जैसे जीवों के भोजन बनते हैं। इनके विष से अनेक औषधियों के विकास पर अनुसंधान हो रहा है। भारत में अधिकांश साँप वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत संरक्षित हैं। इनका शिकार, अवैध व्यापार, अनावश्यक हत्या दण्डनीय अपराध माना गया है। यदि किसी घर या परिसर में ये दिखाई दें तो मारने के बजाय प्रशिक्षित वन विभाग अथवा अधिकृत सर्परक्षक को सूचना देना उचित बताया गया है।
पावस ऋतु में इन विषैले जीवों से स्वयं को बचाना अति आवश्यक है। दुर्घटनाओं से बचाव हेतु रात को टाॅर्च का उपयोग करें, ऊँचे जूते पहनकर खेतों में जाएँ, हाथ डालने से पूर्व लकड़ी,घास या पत्थरों को डण्डे से हटाएँ, झाड़ियाँ- कचरा आसपास न रखें, दरवाजों और खिड़कियों की दरारें बंद रखें। सर्पदंश से होने वाली अनेक मौतें समय पर उपचार न मिलने के कारण होती हैं। गाँवों में आज भी कई लोग झाड़- फूँक, ताबीज, मंत्र व घरेलू नुस्खों पर भरोसा करते हैं, जिससे बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। घाव को चाकू से काटना, विष चूसने का प्रयास करना, बर्फ लगाना, बहुत कसकर पट्टी बाँधना, झाड़- फूँक, रोगी को शराब पिलाना इन उपायों से लाभ नहीं होता, स्थिति गंभीर हो जाती है। समय पर अस्पताल पहुँचने से रोगियों का सफल उपचार सम्भव है। अत: सर्पदंश केवल वन्यजीवों से जुड़ी समस्या ही नहीं, जनस्वास्थ्य, ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था, समय पर उपचार और जनजागरूकता से भी जुड़ा विषय है। जब समाज ज्ञान और जागरूकता को अपनाएगा तभी पावस ऋतु की हरियाली के साथ मानव और वन्यजीवों का संतुलित सहअस्तित्व सुरक्षित रह सकेगा।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अखंड गहमरी जी द्वारा लिखित “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१२ ☆
☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)
लेखक – अखंड गहमरी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ मुख्य विषय : यात्रा, प्रकृति, संस्कृति, लोकजीवन एवं मानवीय संवेदनाएँ– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह किताब यात्रा के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य का सजीव चित्रण, स्थानीय समाज और जीवन-मूल्यों का सजीव परिचय, अनुभव प्रधान एवं संवेदनशील रोचक पठनीय अभिव्यक्ति, यात्रा, संवेदना और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है।
प्रारंभिक पृष्ठों से ही यह किताब स्पष्ट संकेत देती है कि यह केवल पर्यटन-वृत्तांत नहीं, बल्कि अनुभवों, संस्कृतियों और मानवीय संवेदनाओं का संग्रह योग्य दस्तावेज़ है। लेखक ने यात्रा को मनोरंजन या स्थल-दर्शन तक सीमित न मानकर जीवन को समझने का माध्यम माना है। अनुक्रम पर दृष्टि डालने से ही स्पष्ट होता है कि पुस्तक में विभिन्न स्थलों, प्रसंगों और अनुभवों को क्रमबद्ध रूप से स्वतंत्र अध्यायों में अभिव्यक्त किया गया है। यह संरचना पाठक को यात्रा के विविध आयामों से हिस तरह परिचित कराती है, मानो वह स्वयं सहयात्री है।
लेखक की दृष्टि केवल प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक स्थान के सांस्कृतिक परिवेश, वहाँ के लोगों के जीवन, उनकी परम्पराओं तथा मानवीय संबंधों को भी समान महत्त्व देती है। इसी कारण पुस्तक का स्वर केवल विवरणात्मक न होकर अनुभवात्मक और चिंतनपरक है। लेखक पाठक को यह अनुभव कराता है कि यात्रा का वास्तविक अर्थ बाहरी संसार को देखने के साथ-साथ उन संदर्भों में स्वयं के भीतर झाँकना भी है।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय शैली में लिखी हुई है। लेखक अनावश्यक शब्दाडम्बर से बचते हुए सरल शैली में अपने अनुभवों को व्यक्त करता है। वर्णन में दृश्यात्मकता इतनी प्रभावी है कि पाठक स्वयं को यात्रा का सहभागी अनुभव करने लगता है। प्रकृति, पर्वत, मार्ग, स्थानीय वातावरण और जनजीवन के चित्रण में गहमरी जी की संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है।
पुस्तक के स्पष्ट रूप से पठनीय अंशों में लेखक का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है— “यात्राएँ मनुष्य को केवल नए स्थानों से नहीं, नए अनुभवों से भी परिचित कराती हैं।” यह वाक्य सम्पूर्ण पुस्तक की मूल चेतना को अभिव्यक्त करता है। लेखक के अनुसार यात्रा का वास्तविक लाभ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि अनुभवों का विस्तार है। यही अनुभव व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं और उसे जीवन के विविध रूपों को समझने की क्षमता प्रदान करते हैं।
इसी तरह उनका उल्लेखनीय कथन है— “प्रकृति के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने भीतर की शांति को पहचानने लगता है।” इस विचार में लेखक की प्रकृति-दृष्टि निहित है। प्रकृति यहाँ केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का आधार बनकर उभरती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
पुस्तक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक स्थानीय संस्कृति को बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग, उनकी जीवनशैली, व्यवहार, परम्पराएँ और सामाजिक मूल्य लेखक के वर्णन में स्वाभाविक रूप से समाहित होते हैं। इससे पुस्तक केवल स्थानों का परिचय देने वाली रचना नहीं रह जाती, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ग्रहण कर लेती है।
शिल्प की दृष्टि से पुस्तक वर्णनात्मक और संस्मरणात्मक शैली का सफल समन्वय प्रस्तुत करती है। घटनाओं का क्रम स्वाभाविक है तथा प्रत्येक प्रसंग अपने आप में पूर्ण प्रतीत होता है। भाषा में आत्मीय संवाद का गुण है, जिससे पाठक लेखक के अनुभवों से सहज रूप से जुड़ जाता है।
यह कृति यात्रा-साहित्य की उस राहुल सांस्कृतायायन परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें यात्रा केवल स्थानों का भ्रमण नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और जीवन-दृष्टि की खोज है। लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठक को यह विश्वास दिलाता है कि प्रत्येक यात्रा मनुष्य को कुछ नया सिखाती है और उसके व्यक्तित्व को समृद्ध बनाती है।
समग्रतः यह पुस्तक यात्रा, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का संतुलित एवं प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करती है। इसकी सरल भाषा, आत्मीय अभिव्यक्ति, अनुभवों की प्रामाणिकता तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण इसे एक पठनीय और संग्रहणीय कृति बनाते हैं। यात्रा-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक केवल जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि संवेदनात्मक अनुभवों की ऐसी यात्रा है जो पाठक को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के संसार से भी परिचित कराती है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लाखों का सावन…“।)
अभी अभी # १०६३ ⇒ आलेख – लाखों का सावन श्री प्रदीप शर्मा
एक वह भी ज़माना था, (आप समझ गए) हाँ, वह कांग्रेस का ज़माना था, जब सावन लाखों का होता था, और नौकरी दो टके की, यानी 90 – ढाई की ! मास्टर गाँव में पड़ा रहता था, और नई नवेली बहू शहर में सास-ससुर की सेवा करते हुए आनंद बक्षी का यह गीत सुनकर पति-परमेश्वर को कोसा करती थी।
उसे भी अपने मायके के सावन के झूले याद आया करते थे।
अब वह न घर की थी, न नाथ की।
समय बदलते देर नहीं लगती।
जो नौकरी कभी टके की थी, वह लाखों की हो गई, और लाखों का सावन टके का हो गया। सावन लगने पर किसी को आज उतनी खुशी नहीं होती, जितनी तनख्वाह में इन्क्रीमेंट लगने पर होती है।
तब भी सावन लगने से ज़्यादा खुशी हमें गुरुवार को शहर के थिएटर में नई फिल्म लगने पर होती थी। आज भी अच्छी तरह से याद है कि आया सावन झूम के जब रिलीज़ हुई थी, तो झूमकर बारिश हुई थी। जिनके पास छाते नहीं थे, वे सावन का मज़ा झूमकर ही नहीं भीगकर भी ले रहे थे। ।
कितनी फुरसत थी, जब सावन आता था ! श्रावण सोमवार को गाँधी-हॉल का बगीचा खचाखच महिलाओं और बच्चों से भर जाता था। पेड़ों पर झूले बाँध दिये जाते थे, जिन पर युवतियां जोड़े से झूला करती थी। ऊपर जाना, नीचे आना, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव को हँसते-हँसते झेलना, यही तो ज़िन्दगी का मेला होता था। बच्चों के लिए तो पुंगी और फुग्गे ही काफी थे। घास में लोटना और कोड़ा-बदाम छाई खेलना। घर की बनाई पूरी/पराँठे के साथ आलू/भिंडी की सब्जी, प्याज-अचार, और गाँधी-हॉल के गेट से दो रुपये का नमकीन मिक्सचर। बगीचे की घास पर मूँगफली के बचे हुए छिलके थे। बस, यही लाखों का सावन था।
समय ने करवट बदली ! सियासत ने अपना रंग बदला, ढंग बदला।
सावन की जगह बदले का मौसम आ गया। 60 साल से सोलह साल तक का पागल मन तलत का यह गीत गुनगुनाने लग गया !
बदली, बदली दुनिया है मेरी। वह बादल की बदली की नहीं, डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, वह सावन की बारिश में भीगकर बंद एटीएम तक नहीं जाना पसंद करता। paytm का आनंद लेता है, और रेडियो मिर्ची पर मन की बात सुना करता है।
आजकल की फिल्मों ने भी सावन का दामन छोड़ दिया है,
संगीत ने मधुरता खो दी है, तो गानों ने अर्थ खो दिया है।
व्यर्थ की फिल्में करोड़ों कमा रही है तो पद्मिनी पद्मावत बनी जा रही है। सावन कहीं प्यासा है तो
कहीं अभी से ही सावन-भादो की झड़ी लगी जा रही है। संगीत की स्वर-लहरियां मेरे कानों में गूँज रही हैं। नेपथ्य में फ़िल्म आया सावन झूम के का गाना बज रहा है। मन भी आज यही कह रहा है, सावन आज भी लाखों का है, सावन को आने दो। ।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अंग्रेजी मीडियम स्कूल और चंदा।)
☆ चुभते तीर # १२१ – व्यंग्य – अंग्रेजी मीडियम स्कूल और चंदा☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
आजकल बच्चों को स्कूल भेजना किसी बड़ी कंपनी में शेयर खरीदने जैसा है। एडमिशन के नाम पर माता-पिता का जो इंटरव्यू लिया जाता है, उसे देखकर लगता है कि बच्चा स्कूल में नहीं, बल्कि नासा में जा रहा है। स्कूल की फीस इतनी होती है कि पिता अपनी एक किडनी बेचने का मन बना लेता है। ‘इंटरनेशनल स्कूल’ के नाम पर बच्चों को टाई और कोट पहनाकर गर्मियों में भी घुमाया जाता है। बच्चा घर आकर अपनी दादी से अंग्रेजी में बात करता है, जिसे बेचारी दादी सिर्फ आशीर्वाद समझकर मुस्कुरा देती है। स्कूल में पढ़ाई से ज़्यादा ज़ोर एनुअल फंक्शन के डांस और विदेशी टूर पर होता है। अगर आपका बच्चा अंग्रेजी में गाली भी दे, तो माता-पिता गर्व से कहते हैं, “देखिए, हमारा मुन्ना कितनी फ्लुएंट इंग्लिश बोलता है।”
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “श्याम पट”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ ☆
🌻लघुकथा🌻 श्याम पट 🌻
गिरधारी लाल आज कमरे की दिवाल पर काले रंग का श्याम पट बनवा रहें हैं। दौड़ता हुआ पारस—- पास आकर
दादा जी ये क्या बना रहे?
(ब्लैक ब्लैक)
आज के बच्चे रंगों को रेड ब्लू, ग्रीन, यलो—से ही पहचानते हैं
धूमिल हो गई सिंदूरी रंग, भोर की लालिमा, गोधूली की बेला—
दादा जी ने बाल सुलभ चंचलता को आंकते कहा–यहाँ तुम लिखाई करोगे और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनोगे। पारस गले में झूल गया मुझे तो आपके जैसा बनना है पापा तो दिनभर मोबाइल चलाते है क्या आपने उन्हें ये बोर्ड नही बनवाया था।
दादा ने कनकी लगा देखते फुसफुसा कर कहने लगे – – मोबाइल रिश्तों को काला करने लगा श्याम पट में आज भी वो ताकत है, जो परिवार जोड़ रखेगा।
देखते है श्याम पट पर पारस की छूअन कंचन बन कर कैसे निखरेगी। दादा श्याम पट को ध्यान से देखने लगे।
“आई, मला हे झाड काढून दे ना. ” चित्रकलेच्या वहीत चित्र काढत बसलेला चारू आईला म्हणाला. चारुच्या आईनं त्याला स्पष्ट नकार दिला. चारू थोडा हिरमुसला. आजी, आजोबा, दादा आणि बाबा कुणीच त्याला मदत करायला तयार नव्हतं. आता त्याला हे चित्र पूर्ण करावंच लागणार होतं. ते त्याचं काम होतं. त्यालाच करावं लागेल, शिकावं लागेल, आपलं काम आपणच करावं, असा एक महत्त्वाचा संस्कार एका नकारानं झाला होता. खरंच, आपणच आपल्याला घडवायचं असतं, कुबड्या न वापरता चालायला शिकायचं असतं हे मुलांच्या मनावर ठसवणं हे मोठ्यांनी शिकायला हवं.
शिकता शिकता, तरबेज होता येतं, मोठं होता येतं. आपला प्रयत्न आपला आपण करायचा असतो. ज्याचा त्यानं करायचा असतो. ‘यत्न तोचि देव जाणावा. ’, असं सांगत समर्थांनी सुद्धा प्रयत्नांवर जोर दिला आहे. काही जण मात्र सगळं दैवाच्या हवाली करून मोकळे होतात. दैव मोठं की प्रयत्न हा वादाचा मुद्दा होऊ शकतो. पण दैवाला जीवनात थोडे महत्त्व असलं तरी माणसानं जास्तीत जास्त जोर प्रयत्नांना द्यायला हवा.
“म्हणोनी अभ्यासास काही सर्वथा दुष्कर नाही. ” असं सांगणारे ज्ञानेश्वर प्रयत्नवादाला महत्त्व देतात. आत्मोन्नतीचा असा प्रयत्न आपल्याला नवीन गोष्टी शिकायला मदत करतो.
“असाध्य ते साध्य करता सायास
कारण अभ्यास”, तुका म्हणे.
अलौकिक बुद्धिमत्ता म्हणजे दुसरं तिसरं काही नसून, दोन टक्के प्रतिभा आणि अठ्ठ्याणव टक्के प्रयत्न आहे. जो स्वतः: साठी, स्वतः प्रयत्न करतो तो स्वतः, स्वतःचा मित्र असतो. जो प्रयत्न करणं सोडून देतो, दुसऱ्याची मदत घेतो, तो स्वतःच स्वतःचा शत्रू होतो. स्वत:ला पांगळा करतो, स्वतःला दुबळं बनवतो.
स्वतः प्रयत्न करणं याचा अर्थ मार्गदर्शनाची गरजच नाही असा नाही बरं. योग्य मार्गदर्शन मिळणं हे फार महत्त्वाचं आहे. पण देणाऱ्याचा हात घ्यायचा नसतो हे ध्यानात ठेवावं लागतं. एका दिव्यानं दुसरा दिवा लागतो हे खरंच आहे. पण दुसऱ्या दिव्यात तेल, वात घालून तो सुसज्ज असेल तरच तो लागणार, हो ना? तेल, वात किंवा दिवा यातलं काही एक जरी जवळ नसेल, तर दिवा पेटणार कसा? या गोष्टी तयार ठेवाव्या लागतात. तसंच केवळ गुरुकृपा, उपदेश, गुरुसंगती यांनी प्रगती होत नाही. ज्ञान मिळत नाही. ते प्रयत्न पूर्वक प्राप्त करून घ्यावं लागतं. कोणीच कोणाला सर्व ज्ञान देऊ शकत नाही. स्वतःच कष्ट करून ते मिळवावे लागतं. आयतं काही मिळत नाही. म्हणून आत्मविश्वास पूर्वक, निष्ठेनं प्रयत्न करत राहणं हाच एक योग्य मार्ग आहे. आपण तो विसरता कामा नये. मार्गदर्शन घ्यावं पण मार्गक्रमण आपल्याला स्वतःलाच करायचं आहे हे लक्षात ठेवावं. सावधानता, सातत्य, चिकाटी या गोष्टी ध्येय प्राप्तीसाठी खूप महत्वाच्या आहेत. यात कुठंही उणीव निर्माण झाली तर अंध:पतन होणारच. म्हणतात ना, “सावधानता हटी तो दुर्घटना घटी. ” विवेक, सातत्य, उत्साह हे गुण आपल्याला आपला मित्र बनवतात. आळस, अळंटळं, अशा गोष्टी आपल्याला आपलाच शत्रू बनवतात.
जे अभ्यासाचं तेच आरोग्याचं. आरोग्य संपन्न राहणं अथवा आजारी पडणं, आपल्यावरच अवलंबून असतं. योग्य आहार, योग्य विहार असेल तर आरोग्य चांगलं राहतं. आजारी पडल्यावर डॉक्टर औषध देतात. पण ते वेळेवर आणि योग्य प्रमाणात घ्यावं लागतं. तसं न केल्यास आजार बरा होत नाही. म्हणूनच आपणच आपले शत्रू असतो.
“उद्धरेदात्मनात्मानाम् नात्मानमव साधयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मन: ||”
गीतेतील सहाव्या अध्यायातील हा श्लोक प्रत्येकानं लक्षात ठेवला पाहिजे. आचरणात आणला पाहिजे. चारुच्या पालकांनी तो आचरणात आणला आहे ना, तसा.
☆ “मोक्षाच्या शोधात…” – मूळ मल्याळी लेखक : अज्ञात – मराठी अनुवाद : रामदास पाटील खानिवलीकर ☆ प्रस्तुती – शोभा जोशी ☆
मी माझ्या आजारी वडिलांना काशीतील मुक्ती भवनात घेऊन चाललो होतो, या अपेक्षेने की ते तिथे लवकरच निधन पावतील.
माझी तिथे जाण्याची इच्छा होती म्हणून नव्हे. पण वडिलांचे सततचे आजारपण, त्यांची दुर्बलता आणि औषधं व उपचारांवरील न संपणारा खर्च यामुळे मी पूर्णपणे खचून गेलो होतो. त्यांच्या देखभालीवर मी आधीच खूप खर्च केला होता, आणि आता असंच पुढे चालू ठेवणं मला शक्य नाही असं मला वाटू लागलं होतं.
तेव्हाच एका जवळच्या मित्राने मला काशीतील मुक्ती भवनाबद्दल सांगितलं.
तो म्हणाला की हिंदू श्रद्धेनुसार, काशीत मृत्यू आल्यास मोक्ष मिळतो, आणि मुक्ती भवन ही अशा सर्वात प्रसिद्ध जागांपैकी एक आहे जिथे लोक त्यांचे शेवटचे दिवस घालवतात. “तू तुझ्या वडिलांना तिथे नेलंस, तर तुला शांती मिळेल आणि तुझ्या वडिलांना मोक्ष मिळेल. “
आणि म्हणून, एके दिवशी मी वडिलांना घेऊन रेल्वेत बसलो. माझे वडील खिडकीजवळ बसून बाहेर पाहत होते. त्यांच्या चेहऱ्यावर थकव्याची चिन्हे होती, पण डोळे शांत होते.
“आपण कुठे चाललो आहोत, बाळा?” त्यांनी विचारलं.
“काशीला. “
“काशीला? अरे, माझ्या महादेवा! ही यात्रा करायची इच्छा मला कित्येक वर्षांपासून होती. “
त्यांच्या चेहऱ्यावर पसरलेला आनंद माझ्या हृदयाला भिडला. पण मी त्याकडे दुर्लक्ष केलं.
संपूर्ण प्रवासात माझे वडील भूतकाळाबद्दल बोलत राहिले. लहानपणी मला ताप आला होता तेव्हा ते रुग्णालयात माझ्यासोबत कसे थांबले होते. माझी शाळेची फी भरण्यासाठी माझ्या आईने तिच्या बांगड्या कशा विकल्या होत्या. मला हवी असलेली सायकल घेण्यासाठी ते रात्री उशिरापर्यंत ऑटो-रिक्षा कसे चालवायचे.
मी ऐकत होतो.
पण माझ्याकडे बोलायला फार काही नव्हतं.
खूप लांबच्या प्रवासानंतर आम्ही वाराणसीला पोहोचलो आणि मुक्ती भवनात आलो.
मला भयाण शांतता अपेक्षित होती, मृत्यूची शांतता.
पण मी जे पाहिलं ते वेगळंच होतं.
लहान खोल्या. पांढऱ्या भिंती. जुने छताचे पंखे हळू हळू फिरत होते. मृत्यूची वाट पाहणाऱ्यांसाठी प्रार्थना म्हणत साधू कॉरिडॉरमधून फिरत होते.
मी वडिलांना आम्हाला दिलेल्या खोलीत नेलं.
“मी खूप थकलोय, बाळा. मला जरा पडू दे. “
मी मान हलवली.
ते झोपलेले पाहताच, मी टेबलावरून माझी बॅग उचलली आणि बाहेर पडलो.
मागे न पाहता घाईघाईने निघालो असताना, एका खोलीचा दरवाजा थोडा उघडा दिसला आणि मी आत डोकावलं.
एक वृद्ध गृहस्थ खिडकीजवळ बसून बाहेर पाहत होते. त्यांच्या हातात एक जुना फोटो होता—कदाचित त्यांच्या पत्नीचा किंवा मुलाचा. अधूनमधून ते फोटोकडे पाहून हसत होते.
दुसऱ्या खोलीत, एक वृद्ध स्त्री डोळे मिटून हातात माळ घेऊन प्रार्थना करत बसली होती. तिच्या शेजारी कोणीही नव्हतं.
पण ती एकटी नव्हती.
तिच्या आठवणी तिच्यासोबत होत्या.
कॉरिडॉरच्या शेवटी, एक वृद्ध वडील बिछान्यावर पडले होते. त्यांच्या शेजारी एक तरुण त्यांचा हात धरून बसला होता.
“बाबा, मी इथेच आहे, ” तो सारखं म्हणत होता. “घाबरू नका. “
त्या वृद्धाला ते ऐकू येत होतं की नाही माहीत नाही.
पण मुलाच्या आवाजात प्रेम होतं.
तिथे प्रत्येकजण मृत्यूची वाट पाहत होता.
तरीही मला वाटलं की त्यांच्यापैकी बरेचजण दुसऱ्याच कशाची तरी वाट पाहत आहेत.
एक फोन कॉल.
एक भेट.
मुलाचे दिलासा देणारे शब्द.
मुलीची “बाबा”अशी हाक.
त्याचीच ते खरं तर वाट पाहत होते.
तिथल्या एका कर्मचाऱ्याने मला पाहिलं आणि म्हणाला:
“इथे येणारे बहुतेक लोक मृत्यूला घाबरत नाहीत, साहेब. त्यांना जास्त दुःख होतं ते या विचाराने की त्यांचे प्रियजन त्यांना विसरले आहेत. ते म्हणतात इथे मृत्यू आल्याने मोक्ष मिळतो, पण आपल्या मुलांमध्ये शांतपणे मरणं आणि इथे एकटं मरणं यात खूप मोठा फरक आहे. “
तो पुढे म्हणाला:
“इथे येणारे बरेच लोक लवकर मरतात—आजारीपणामुळे नाही, तर त्यांची मुलं त्यांना सोडून गेली आहेत हे कळल्यावर त्यांचं हृदय फाटतं म्हणून. “
त्या शब्दांनी मला हादरवून सोडलं.
मी आजूबाजूला पाहिलं.
काही डोळे दाराकडे रोखलेले होते—
कोणीतरी येण्याची वाट पाहत.
काही डोळे आकाशाकडे वळलेले होते—
कोणीतरी फोन करेल याची वाट पाहत.
आणि काही डोळ्यांत तर आशाच उरली नव्हती.
फक्त वाट पाहणं.
अचानक मला माझ्या वडिलांची आठवण झाली.
मी मागे वळलो आणि धावलो.
जेव्हा मी खोलीत शिरलो, तेव्हा माझे वडील बिछान्यावर उठून बसले होते, घामाने न्हाऊन निघाले होते, अशक्त दिसत होते.
तेही उघड्या दाराकडे पाहत होते.
मला पाहताच त्यांनी सुटकेचा श्वास सोडला.
आणि मी विचार केला:
जर मी आता निघून गेलो, तर उद्या माझे वडील त्या दाराशी वाट पाहणारा आणखी एक चेहरा बनणार नाहीत का?
त्या क्षणी, मुक्ती भवन मला फक्त एक इमारत वाटली नाही.
ते एक शांत जग वाटलं जिथे आयुष्यभर इतरांची काळजी घेणारी माणसं प्रेमाच्या एका शेवटच्या स्पर्शाची वाट पाहत होती.
मी या विचारांत हरवलो असताना, मला वडिलांची हाक ऐकू आली.
“बाळा… “
“हो, बाबा?”
“तू गेला नाहीस?”
“मी कुठे जाईन?”
“मला माहीत आहे तू मला इथे सोडायला आणलंस. “
ते थांबले.
“पण मी तुला दोष देत नाही. आई-वडील म्हातारे झाले की ते कधी कधी मुलांसाठी ओझं होतात. कदाचित मीही तुझ्यासाठी ओझं झालो असेन. “
मग त्यांनी माझा हात घट्ट धरला.
“पण एक गोष्ट लक्षात ठेव, बाळा… “
“आई-वडिलांसाठी सर्वात मोठा मोक्ष काशीत मरणं हा नाही. तो मुलांच्या हृदयातून काढून टाकलं न जाणं हा आहे. “
“कृपा करून माझा तिरस्कार करू नकोस, बाळा. मी गेल्यावर माझे विधी कर. “
त्या शब्दांनी माझं हृदय विदीर्ण झालं.
“इथे जास्त वेळ थांबू नकोस, बाळा. जा. पण जाण्यापूर्वी तुझ्या वडिलांना एक मिठी मार आणि एक पापी दे. मला तुला पुन्हा एकदा जवळ घ्यावंसं वाटतंय. “
त्यांची शेवटची इच्छा.
“बाबा… “
मी ढसाढसा रडलो.
वर्षानुवर्षांचा स्वार्थ आणि हिशेब माझ्या अश्रूंमध्ये विरघळून गेले.
त्या रात्री, मी मुक्ती भवनातील खोलीत वडिलांजवळ झोपलो.
झोपलेल्या त्यांच्या चेहऱ्यावरील सुरकुत्या पाहताना मला एक सत्य कळलं:
माझ्या आयुष्यातील सर्वात सुरक्षित जागा कधीतरी या माणसाचा खांदा होती.
मी घाबरलो तेव्हा त्यांनीच मला धरलं होतं.
मी पडलो तेव्हा त्यांनीच मला उचललं होतं.
मी अपयशी ठरलो तेव्हा ते माझ्या पाठीशी उभे राहिले होते.
मग मी त्यांना त्यांच्या शेवटच्या वर्षांत कसं सोडून देऊ शकतो?
दुसऱ्या दिवशी सकाळी, मी घरी परतण्याची तिकिटं बुक केली.
आम्ही निघायची तयारी करत असताना, मुक्ती भवनातील कर्मचाऱ्यांनी माझ्या वडिलांच्या शांत मृत्यूसाठी प्रार्थना करण्यासाठी साधूंना बोलावलं.
मी त्यांना थांबवलं.
“आता त्याची गरज नाही, ” मी म्हणालो.
“माझ्या वडिलांना मोक्ष मिळालेला नाही.
मोक्ष मला मिळाला आहे. “
माझ्या वडिलांनी माझ्याकडे आश्चर्याने पाहिलं.
“तुला काय म्हणायचंय, बाळा?”
मी त्यांचा हात धरला.
“चला बाबा, घरी जाऊया. पण आधी, गंगेत डुबकी मारून प्रभूचं दर्शन घेऊ. “
“मग, मला इथे राहावं लागणार नाही?” त्यांनी विचारलं.
“का राहावं लागेल?”
“ज्याला मुक्तीची गरज होती ते तुम्ही नव्हता.
माझं मन होतं—ते मन जे स्वतःच्या वडिलांना ओझं समजलं होतं. “
माझ्या वडिलांच्या डोळ्यांत अश्रू भरून आले.
त्या क्षणी, काशीच्या मंदिरातील घंटानादापेक्षा अधिक पवित्र होता त्या वृद्धाच्या चेहऱ्यावरून ओघळणारा तो मूक अश्रू.
सर्व मुलांना आणि सर्व वडिलांना समर्पित.
मूळ मल्याळी कथालेखक : अज्ञात
स्वैर अनुवाद : रामदास पाटील खानिवलीकर
प्रस्तुती : शोभा जोशी
कार्यकर्ती, जनजाती कल्याण आश्रम, पुणे महानगर.
मो ९४२२३१९९६२
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈