हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३६ ☆ भावना के दोहे – रक्षा बंधन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – रक्षा बंधन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रक्षा बंधन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रक्षा बंधन प्यार का, प्यारा सा त्योहार।।।

खुशियां भाई बहिन की, मना रहा संसार।।

 *

भैया घर पर आ रहे, यही बहन की चाह।

धागा राखी का लिए , देख रही है राह।।

 *

लगी द्वार पर टकटकी, देख रही हूँ राह।

राखी का त्योहार है, है बहना को चाह।।

 *

चौमासे की धूम है, हर दिन है त्यौहार।

संग सखी, भाई बहन, मिले पिया का प्यार।।

 *

धागा प्यारा लग रहा, है बहन का प्यार।

यह केवल धागा नहीं, रक्षा का त्योहार।।

 *

भाव समाहित हो रहे, मिलता है आशीष।

भाई आदर कर रहा, झुके सदा ही शीष।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१७ ☆ संतोष के दोहे – रक्षा बंधन ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है संतोष के दोहे – रक्षा बंधन आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१७ ☆

☆ संतोष के दोहे – रक्षा बंधन ☆ श्री संतोष नेमा ☆

राखी पावन पर्व है, धागे का त्यौहार

सजी कलाई प्रेम से, मिला बहिन का प्यार

*

रक्षा का बंधन बंधे, होता जो अनमोल

बहिन सुरक्षित हो सदा, भाई के यह बोल

*

भाई को आशीष दे, करती बहिन पुकार

ईश्वर से यह कामना, सुखी रहे परिवार

*

खुशियाँ लेकर आ गया, राखी का यह पर्व

भाई पर करतीं बहिन, सबसे ज्यादा गर्व

*

सावन सुखद सुहावना, सजे सावनी गीत

रक्षाबंधन,कजलियाँ, बांट रहे हैं प्रीत

*

भाई की यह कामना, मिले बहिन का प्यार

बहिन हमेशा खुश रहे, ईश्वर से दरकार

*

दिखने में दो तन दिखें, बहे एक सा खून

पावन राखी पर्व पर, खुशियाँ होतीं दून

*

इंद्रधनुष सी राखियाँ, भरतीं मन उत्साह

प्रेम बढ़ाती परस्पर, रिश्तों की यह राह

*

दे शीतलता चाँद सी, भ्रात-भगिनि का प्यार

दिल में भी “संतोष”हो, बढ़े प्रेम व्यबहार

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆ आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख वृद्धावस्था ।)

☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆

? आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ? ?

?

हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन रूपी रथ के चार पहिये माने जाते हैंl

1-ब्रम्हचर्य

2-ग्रहस्थ

3- वानप्रस्थ

4- सन्यास

वृद्धवस्था शरीर में होने वाला प्राकृतिक परिवर्तन हैl इस समय व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती हैl शरीर में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैंl साथ ही ऊर्जा क्षक्ति का क्षय होना शुरु हो जाता हैl

आज के समय में वानप्रस्थ की आयु 70 वर्ष हैl इस अवस्था में आते आते मानव के मन की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती हैl उसे अपनों से ही असुरक्षा, डर, संकोच के साथ निर्भरता का भाव झकझोर देता हैl वहीं वह कुछ नया करने की तमन्ना भी जगाए रखता हैl जो उसने युववस्था में नहीं किया उसे ही करने का निश्चय करता हैl

आज समाज वानप्रस्थ के पश्चात् सन्यास लेने की बात करता हैl पर क्या आज की परिस्थिति में सन्यास लेना सम्भव है?? यदि आदमी घर बार छोड़ भी दे तो क्या वह वास्तविकता में जंगल में रह पायेगा?? जंगल…… कौन सा जंगल?? प्राकृतिक घना पेड़ों से भरा जंगल ?? पर वह तो देखने में बहुत कम मिलता हैl आज तो जहाँ तक दृष्टि जाए वहाँ तक सीमेंट और कोंक्रीट के ही जंगल देखने को मिलते हैंl

आज की चकाचौध की दुनिया में वानप्रस्थ होना ही असम्भव सा है तो सन्यास तो बहुत दूर की बात हो गईl

आज वृद्धवस्था में हमें आयुनुसार स्वयं को ढालना बहुत जरूरी हो गया हैl वानप्रस्थ अर्थात मोहमाया से अलिप्त होने की शुरुवात और अपने अंतिम गंतव्य को ध्यान में रख अंतर्मुख होने की प्रक्रियाl सन्यास आश्रम हेतु आपको कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं अपितु संसार में रह कर ही यदि आपने अंतर्मुखी होने की कला सीख ली तो आप पूर्ण रूप से सन्यासी हो गएl

 ये जरूर है कि आयु बढ़ने के साथ हम सुविधाओं की तरफ ज्यादा बढ़ते हैं क्यूंकि हमें जीवन व्यापन में आसानी हो जाती हैl बढ़ती आयु के साथ कई वस्तुए तो आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैंl वास्तविकता तो ये हैं कई जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक हम पूर्णतः मोहमाया का त्याग नहीं कर सकतेl अगर देखा जाए तो ये मोह ही हमको हमारे परिवार से जोड़े रखता हैl आयु के इस पड़ाव में कुछ गतिविधियां, कुछ आदतें अपने आप ही छूट जाती हैंl कुछ लोग तो आज भी 60 वर्ष की आयु के पश्चात कार्य करना बंद कर देते हैं या स्वयं को रिटायर समझकर किसी काम करने में रूचि ही नहीं रखतेl पर मेरा ऐसा मानना है कि जब तक शरीर में प्राण है काम करते ही रहना चाहिएl और अपनी रूचि भी बनाए रखना चाहिएl इससे शरीर तंदुरुस्त और मन भी प्रेरणा से भरा होगाl पर कुछ लोग आयु बढ़ने से नहीं वरन इसलिए वृद्ध हो जाते हैं क्यूंकि उनके पास जीवन जीने का कोई लक्ष्य ही नहीं होताl सादगी से जीवन व्यतीत कीजिए पर सादगी का मतलब ये नहीं कि आप जीवन से पलायन कर, कंजूस बनकर, अकर्मन्यता से या असामान्य अवस्था से जीवन व्यापन करेंl व्यस्त रहना और कर्म करना दोनों ही बातें जहाँ मानव का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं वहीं समाज में सम्मान का पात्र भी बनाते हैंl अपनी उपयोगिता कभी भी खत्म ना करेंl स्वयं को संकुचित दायरे में रखने की जगह घरपरिवार और समाज हेतु सहयोग की भावना रखेंl वृद्धावस्था में हम जीवन को वास्तविकता में अधिक सार्थक और गरिमापूर्ण बनना चाहें तो संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे व्यापक बनाना होगाl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३७ – कविता – तेरा रह जाना… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘तेरा रह जाना।)

☆ शशि साहित्य # ३७ ☆

? कविता – तेरा रह जाना…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर रंग धूमिल पड़ जाते हैं,

ताजा से बदल, फीके पड़ जाते हैं…

हर पल बदल कर, बीता हुआ बन जाता है…

हर सांस…. जीवन कम कर जाता है,

बूंद बूंद टपक कर सागर रीता जाता है…

सुबह हुई और सांझ ढली,

दिन यूं ही ढलता जाता है…

मनुज रूप का जीवन दुर्लभ,

बेकार ही बीता जाता है…

उठ जाग मुसाफिर.. अब तो गुन ले,

तू रह जाए” याद” वह राह पकड़ ले !!!!!,

कुछ ऐसे रंग भी होते हैं,

जो कभी ना फीके पड़ते हैं…

मेहनत कह लो, भक्ति कह लो,

ज्ञान कहो या दान ही कह लो…

परहित को जीवन आनंद बना लें,

दूजे होठों को मुस्कान थमा दें…

त्याग करें स्वार्थ का और सद्गुण को व्यवहार बना लें,

निश्चित फिर ये हो पाएगा,

अनंत काल तक रह जाएगा…

चला जाएगा… फिर भी तू “रह जाएगा”

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०५ – नारळी पुनव…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०५ – विजय साहित्य ?

☆ नारळी पुनव…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(अष्टाक्षरी)

आली श्रावण पौर्णिमा

कोळी बांधवांचा सण

शांत झाला दर्या राजा

देई रोजी रोटी धन…!

*

सुरू झाली मासेमारी

शिरे दर्यामधे होरी

बघ नटल्या सजल्या

गोड कोलियाच्या पोरी.

*

रंग रंगोटी करून

बघ सजविली नाव

पूजा करू सागराची

मिळो अंतरात ठाव…! ‌

*

दर्या राजा द्येव त्याचा

आहे नारळाचा मान

भात नारळाचा केला

सजे नैवेद्याचे पान…!

*

गंध फूल अक्षतांनी

होई सागराची पूजा

कर आमुचे रक्षण

ठेव बळकट भूजा…!

*

मासेमारी करताना

ठेव सुरक्षित धनी

तुझ्या पुजेसाठी बघ

किती जमल्या साजणी..!

*

कृपा प्रसादाने तुझ्या

राहो भरलेले घर

होरी खेळू देत माझी

तुझ्या लाटा लाटांवर…!

*

तुझ्या जीवावर करे

कोळी बांधव संसार

आली नारळी पुनव

कर पुजेचा स्विकार…!

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्रावण… ☆ उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ श्रावण… ☆ उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

झोपाळ्यावर झुलता झुलता

श्रावण हिंदोळे घेतो..

पर्जन्याची रिमझिम झेलत

श्रावण अंगणी येतो…

*

चाहुल देई आषाढ डुंबत

 नाचत तळ्यात मळ्यात

 धुंद होऊन फुलता श्रावण

 खेळे माझ्या अंगणात..

*

श्रावणधारा बरसून जाती

 ऊन पाऊस साजरा..

 सूर्याच्या किरणातून

 नाचत येती जलधारा..

*

 श्रावण येई घेऊन सोबत

 सणवारांच्या दिवसांना..

सृष्टी सारी आनंदून जाई

 उधळून देई गंधांना..

*

रंग गंधांच्या संगती

 श्रावण आणी मोरपिसे

कृष्ण जन्माच्या वेळेचे

 लागे सर्वांच्या मनी पिसे…

© उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/ सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ अहंकार… ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

दीपा नारायण पुजारी

?विविधा ?

☆ अहंकार…  ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

संस्कृत मध्ये अहं म्हणजे मी. अर्थात अहंकार म्हणजे मी पणा. मी करतो तेच बरोबर असा विचार जिथं येतो, तिथं त्या क्षणापासून मीपणा पोसला जाऊ लागतो.

जी व्यक्ती अशी अहंकारी असते ती, स्वतःच्या विचारांना मतांना जास्त महत्त्व देते. इतरांचं मत, विचार किंवा त्या गोष्टीकडं बघण्याचा दृष्टिकोन समजून घेऊ शकत नाही. अशी व्यक्ती दुसऱ्यांना कमी लेखू लागते. कोणालाही न जुमानता आपण करतो तेच बरोबर असं वाटू लागतं. समोरच्या व्यक्तीला किरकोळ मानून त्या व्यक्तीकडं, दुर्लक्ष करणं सुरू होतं. दुसऱ्यांच्या भावनांचा विचार न करण्याची वृत्ती हे एक या मागचं कारण आहे. स्वतः विषयी अभिमान वाटणं हे जसं नैसर्गिक, तशी अहंकार ही देखील नैसर्गिक भावना आहे. स्वतःच्या यशाचा अती गर्व, मी इतरांपेक्षा श्रेष्ठ कसा हे सांगण्याची धडपड या गोष्टीतून ही भावना वाढीस लागते. काही वेळा असुरक्षितता, सतत आपलंच कौतुक व्हावं ही अपेक्षा अशा गोष्टींमुळे ही भावना मोठी होते. कधी कधी संपत्ती, रूप, बुद्धिमत्ता याला कारणीभूत ठरतात; तर कधी नोकरीत, कुटुंबात अधिकारामुळे आलेला गर्व वाढीस लागतो, तट्ट फुगतो आणि अहंकाराच्या फुग्यात रूपांतरित होतो.

आपणच तेवढे हुशार आपल्याला कोणाची गरज नाही मी समर्थ आहे अशा धुंदीत ही माणसं वावरत असतात. स्वतःच्या नजरेत स्वतःला मोठे समजू लागतात. अचानक कधीतरी या माणसांची फजिती होते. कुणालाही न विचारता मोठे मोठे व्यवहार करताना फाजील आत्मविश्वासनं मोठे निर्णय घेतले जातात. हितचिंतकांना बेदखल केले जाते. परंतु हा निर्णय चुकीचा ठरला तर फजिती होऊ शकते मोठे संकट उडवू शकते.

गर्व किंवा अहंकार हा माणसाचा शत्रू आहे. अहंकाराने उद्ध्वस्त झालेल्या माणसांची अनेक उदाहरणं आहेत. अहंकार हा षड्रिपुंपैकी एक रिपू आहे. शक्ती, बुद्धी, संपत्ती, रूप याचा माणसाला अभिमान जरूर असावा पण त्या अभिमानाचं रूपांतर गर्वात किंवा अहंकारात होणार नाही याची काळजी घेणं जरुरीच आहे आणि महत्त्वाचं आहे.

अहंकार कमी करण्याचा प्रयत्न करत राहायला हवा. त्यासाठी अंगी नम्रता हा गुण बाणवायला पाहिजे. नेहमी नम्र राहायला हवं. इतरांचं ऐकून घ्यायला हवं. सतत शिकण्याची वृत्ती ठेवायला हवी. आपली चूक झाली असेल, तर ती मान्य ही करायला हवी. दुसऱ्यांचा वेगळा दृष्टिकोन समजून घेतला तर, आपलीही समज वाढते. अहंपणा कमी करण्यास ही गोष्ट उपयुक्त ठरते.

विजय माझाच होणार, मीच जिंकणार, माझंच बरोबर असा हेका धरू नये. प्रत्येक वादात मीच बरोबर असं होणार नाही. कधी कधी दुसरा जिंकू शकतो, तर कधी समोरच्याचं म्हणणं ऐकून वाट वाद मिटवणं जास्त फायदेशीर ठरतं. असे समोपचारानं वागणं जमलं तर अहंकार कमी होण्यास मदत होते.

“जै जगा धाकुटे होईजे | तै जवळीक माझी ||” असे ज्ञानोबा म्हणतात.

जगाला मी जितका लहान आहे असे वाटेल तितके जग माझ्या जवळ येईल. समाजात मिसळायला, लोकांना आपलंस करायला पाहिजे असेल, तर आपण आधी लहान व्हायला हवं. साधेपणा अंगात असेल तर लोक संपत्ती वाढते. लोकसंग्रह वाढतो. अहंकाराचा लवलेश जिथे नाही तिथे, आपुलकी वाढ वाढते. जवळीक वाढते, स्नेहभाव वाढतो हाच खरा ज्ञानजन्य निरहंकार होय.

शरीराची तसेच मनाची कामं प्रकृतीच्या नियंत्रणाखाली चालतात. पण अहंकाराच्या आधीन गेलेला माणूस स्वतःला सर्व गोष्टींचा कर्ता समजतो. असा माणूस स्वतःला दु:खाच्या खाईत लोटून देतो. हे दु:ख नको असेल तर, भगवद्गीतेच्या तिसऱ्या अध्यायातील हा श्लोक आपण आचरणात आणण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे.

 प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

© दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/ सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “हरवलेले शेजारी…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? जीवनरंग ?

☆ “हरवलेले शेजारी…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

झालं असं की,

महत्वाच्या कामामुळं अनिलला ऑफिसमधून निघायला रात्रीचे नऊ वाजले. धो धो पाऊस होता. त्यात कॅब बुक होत नव्हती. गरजेच्या वेळी कॅब बुक होत नाही हा नेहमीचा अनुभव. चालत निघालेला अनिल छत्री असूनही बसस्टॉपला पोहचेपर्यंत भिजलाच. आधीपासून तिथं एकजण थांबलेला. अर्धा तास झाला तरी एकही बस आली नाही. वाट बघून वैतागलेल्या अनिलनं रिक्षानं जायचं ठरवलं पण चार-पाच रिक्षावाल्यांनी नकार दिला. शेवटी एकजण मीटरपेक्षा शंभर रुपये जास्त देण्याच्या बोलीवर तयार झाला. रात्रीची वेळ, कोसळणारा पाऊस, लाइट गेलेले, जवळपास निर्मनुष्य रस्ता या परिस्थितीचा विचार करून अनिल तयार झाला. परिस्थितीनुसार काही निर्णय घेताना शहाणपण बाजूला ठेवावे लागते. रिक्षात बसल्यावर अनिलनं बसस्टॉपवर उभ्या असलेल्याला हाक मारली.

“हॅलो, चला. पुढच्या स्टॉपला सोडतो. ”

“थँक्स, मी जाईन. ”

“अहो या हो. बराच वेळ थांबलो. एकही बस आली नाही. ” नाही-हो करत तो रिक्षात बसला.

“हॅलो, मी अनिल”

“मी सुनील, थँक्यु सो मच”

“वेलकम, इथं कुठे”

“ऑफिस”सुनील.

“माझीपण कंपनी इथंच आहे. आज जरा निघायला उशीर झाला. ”

“सेम हीयर, नेहमी बाईकवर येतो पण आज… ”

“कुठे राहता? ”अनिलनं विचारलं.

“आनंदनगर, नवीन डी पी रोड”

“अरे वा!! मी पण आनंदनगरला राहतो”अनिल.

“चांगला योगायोग आहे. एक रिक्वेस्ट, मला आनंद नगरला सोडता. रिक्षा भाडं शेयर करू”

“ओफकोर्स सोडतो पण भाडं शेयर वगैरे नको. ”

“अहो.. पण.. ”

“मित्रा, भयाण पाऊस पडतोय. नशिबानं रिक्षा अन सोबत दोन्ही मिळालय. ”

“सो नाईस ऑफ यू”सुनील.

“आनंदनगरला कुठं राहता”

“नील सोसायटी”सुनीलच्या उत्तरावर अनिलनं डोळे विस्फारले आणि मोठमोठ्यानं हसायला लागला. त्याच्या अनपेक्षित वागण्यानं सुनील गोंधळला.

“एकदम हसायला काय झालं. ”

“दुनिया गोलयं. मीसुद्धा नील सोसायटीतच राहतो”

“काय सांगता”सुनील किंचाळला.

“एच बिल्डिंग, फ्लॅट नंबर १५. ”

“मी जी २०. ”

“म्हणजे आपण चक्क शेजारी आणि आपल्याला माहीतच नाही. ”अनिल, सुनील दोघंही मोठ्यानं हसले अन पुढच्या क्षणाला एकदम गप्प झाले. म्हटलं तर साधी बाब पण खोलात जाऊन विचार केला तर…

काळाच्या ओघात खूप काही बदललं. सध्या मी, मला, माझं यापलीकडं विचार नसल्यानं जो तो मोबाइलसोबत एकटा. आपसातल्या भेटीगाठी कमी झाल्यात तर काही वर्षांपूर्वी जगण्याचा भाग असलेले ‘शेजारी’ तोंडदेखले राहिलेत. आता परिस्थिती अशी आहे की आसपास कोण राहतं हे देखील माहिती नसतं अन तशी गरजही वाटत नाही. चाळीत, वाड्यात सताड उघडी असलेली मनं आणि दारं आता फ्लॅटसारखीच कायम बंद असतात. प्रायव्हसीच्या नादात ‘सोशल लाईफ’ हळूहळू संपत चाललीये.

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “राखीची गोष्ट…” ☆ श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला ☆

श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला

? मनमंजुषेतून ?

☆ राखीची गोष्ट☆ श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला ☆

सांगतो. जरा वेगळीये. म्हणूनच तर तुम्हाला सांगायचीय. महिनाभरापूर्वीची गोष्ट. लेकीच्या पाच सहा मैत्रिणी आल्या होत्या आमच्या दुकानात.. इंडियन आर्मीसाठी एखादी स्पेशल राखी आहे का हो तुमच्याकडे? त्यातल्या एकीनं विचारलं. मला कन्सेप्ट आवडली. मी लगेच सूरत ला आमच्या सप्लायरला काॅल लावला. त्यालाही कन्सेप्ट आवडली. तिरंगा, आर्मी टँक आणि स्टेनगनधारी वीर जवान असं डिझाईन असणारी तिरंगा राखी आलीये या वर्षी मार्केटमधे.. त्यावर ‘वीर जवान, देश की शान’ असं लिहलंय… लोकांनाही खूप पसंत पडत्येय ही राखी.

लेक खूप मागे लागलीये. तिच्या पाच सहा मैत्रिणींचा ग्रुप जायचाय तिकडे जैसलमेरला. खरं तर काजल राखी घेऊन जायचीये. तीच ती आर्मीवाली राखी. काजलचे आई बाबाही आहेत बरोबर. तिचे बाबा रिटायर्ड कर्नल कृष्णप्रकाश सिन्हा. आर्मीवालं घराणं आहे त्यांचं. प्रत्येक पिढीत एक तरी आर्मीत आहेच. ग्रेट.

तर काय सांगत होतो? परमिशन्स, रिझर्व्हेशन्स वगैरे सगळे सोपस्कार झालेत. माझाच धीर होत नव्हता. काल कर्नलसाहेबांचा फोन आला. “बच्ची की चिंता मत करो, हम है ना! “. मी कशाला नाही म्हणतोय…?

लेक खुष. लेक खुष तर तिचा बाबाही खुष.

आत्ता लेकीचा फोन आला होता. जाम एक्सायटेड होती.

ती काय म्हणाली ते ऐका.. “बाबा, आज सकाळी जेसलमेरला पोचलो. तिथून चाळीस किलोमीटरवर आहे ही चेकपोस्ट. इकडेतिकडे नुसतं वाळवंट. रणरणतं ऊन. चाळीसच्या वर टेम्परेचर. वाळूत रेघ मारावी तसलं तारांचं फेन्सींग. पलीकडे नापाक पाकिस्तान. तिथल्या प्रत्येक गोळीच्या टप्प्यात होतो आम्ही. मोस्ट थ्रिलींग. असं वाटलं स्टेनगन घ्यावी, धडधड फायर करावं आणि Let’s close the matter forever”

“280 किलोमीटरच्या आसपास पसरलेली बाॅर्डर आहे इथली. 150 च्या आसपास चेकपोस्ट. काही ठिकाणी दलदल, चिखल. दिवस, रात्र, ऊन, पाऊस नो एक्स्यूझ. 24×7 चा खरा इथं समजला. ऑलवेज ऑन ड्यूटी.

बाबा मोस्ट शाॅकींग… आम्ही राख्या घेवून गेलेलो. उडालोच. काजलचा भाऊ नाही मोठी बहीण होती तिथं. राखी नाव तिचं. तिच्यासारख्या अजून 399 होत्या तिथं. 400 जणींची बटालियन आहे ही. या बटालियनचं नावच कसलं भारीये. ‘सीमा भवानी’. आम्ही राखीताई आणि तिथल्या काही जणींना औक्षण केलं. राखी बांधली. मिठाई भरवली. दे वेयर व्हेरी हॅप्पी. दुर्गा होती प्रत्येक जण. मर्दानी. प्रहारी. पलीकडच्या बाजूला ओरडून सांगितलंय. ‘चड्डीत रहायचं, नाहीतर… ‘ बाबा, आयुष्यात विसरणार नाही आजचा दिवस… “

तासाभरानं मी कर्नलसाहेबांना फोन लावला. मनापासून थँक्स म्हणलं. ते गहिवरून बोलत होते.

’93 की बात है. कश्मीर में पोस्टींग थी हमारी. अनंतनाग के पास एक सर्च ऑपरेशन चालू था. पंडित के घर को अॅटॅक किया था, मिलिटंटस् ने. आधा घंटा फायरिंग चालू था. दो को मारा. दो भाग गये भौxxके. घर के अंदर घुसे तो सब खत्म हुआ था. पूरी फॅमीली लाल रंग की होली खेल चुकी थी. बेचारा बाप आखरी सास गिन रहा था. कपाट के अंदर तीन साल की बच्ची को छिपाया था. इसे संभालो’ बोल के 

वो बाप मर गया. मैं भी बाप हूँ. गोद ले लिया वो नन्हीसी परी को.. वही हमारी बडी बेटी राखी. ‘

शाॅक्ड मी होतो आता. राखीची गोष्ट. मी कधीच ऐकली नव्हती. जो रक्षण करतो तो भाऊ. आता रक्षण करणारी बहिण सुद्धा. राखीचा धागा किती स्ट्राँग आहे, ते समजलं आज. सीमेवरच्या एका तरी ‘जवाना’ला नाहीतर ‘सीमाभवानी’ला राखी पाठवायलाच हवी. वुई केअर, वुई रिस्पेक्ट, वुई सॅल्यूट. हा राखीचा धागाच देश बांधून ठेवतोय. सॅल्यूट इंडियन आर्मी. सलाम नमस्ते! येणाऱ्या 

रक्षाबंधनाच्या हार्दिक शुभेच्छा.

 

©  श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ साठा उत्तराची कहाणी… ☆ उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

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☆ साठा उत्तराची कहाणी☆ उज्ज्वला केळकर

श्रावणातला मनोहारी निसर्ग बघून बालकवी म्हणतात, ‘श्रावण मासी हर्ष मानसी. ’ श्रावणात, केवळ लेखक कवींनाच हर्ष होतो, असे नाही, तर जनसामान्यांच्याही मनात हर्ष दाटून येतो. त्याचं कारण, या महिन्यात अनेक सण, समारंभ, उत्सव येतात. रोजच्या दैनंदिन जीवनातील चाकोरीपेक्षा, काही वेगळं करताना, नवा उत्साह, नवचैतन्य, नवी उर्जा निर्माण होते.

माझ्या लहानपणी मी या सण-समारंभाच्या कहाण्या माझ्या आजीला वाचून दाखवायची. उदा. नागपंचमीची, दिव्याच्या आवसेची, जीवतीची, शीळासप्तमीची. याशिवाय प्रत्येक दिवसाची कहाणी असे. मला वाचायला त्या खूप आवडत. बाहेरच्या सारखे गूढ, अद्भूत वातावरण कहाणीत असे. त्या मनोरंजकही होत्या, तशाच बोधप्रदही असत. प्रत्येक कहाणीतील कथा वेगळी. त्यांची सुरुवात असे, एक आटपाट नगर होतं. तिथे एक गरीब ब्राह्मण. किंवा एक राजा होता. मग त्या कथेत एक वसा सांगितलेला असे. म्हणजे वागण्याचा नियम. वसा करणार्‍याला सुख मिळे. तो मोडणार्‍याला दु:ख, संकटे भोगावी लागत. आशा किती तरी कहाण्या. प्रत्येक कहाणीची कथा वेगळी, पण प्रत्येक कहाणीचा शेवट असे, ही साठा उत्तराची कहाणी. पाचा उत्तरी सुफळ सपूर्ण. कहाणी कोणतीही असो, तिचा शेवट याच वाक्याने होत असे.

त्यावेळी मी आजीला विचारायची, ही ‘साठा उत्तराची कहाणी. पाचा उत्तरी सुफळ सपूर्ण’ म्हणजे काय? तिला काही सांगता आले नाही. त्यानंतर मी मोठी होत गेले. खूप काही ऐकलं, वाचलं, पण ‘साठा उत्तरीचं कोडं काही सुटलं नाही. अनेक भाषेच्या अभ्यासकांना, विचारवंतांना, संशोधकांना विचारलं, पण मला काही समाधानकारक उत्तर मिळालं नाही.

शेवटी एक प्रयत्न म्हणून गुगल बाबाला विचारले. त्यांनी सांगितले, ‘साठा उत्तरी म्हणजे, साठ उतारे असलेली कहाणी म्हणजे कथा. ’. ती पाचा उत्तरी म्हणजे, ’ पाच उतार्‍यात सांगितली. ’ म्हणजे मोठ्ठी लांबलचक कहाणी, थोडक्यात… पाच उतार्‍यात सांगितली.

‘पाचा उत्तरी सुफळ सपूर्ण’ म्हणजे मोठ्ठी कहाणी ऐकून जे पुण्य, फळ लाभेल, ते, ही थोडक्यात सांगितलेली कहाणी ऐकूनही लाभेल. तोच तत्त्वबोध लहान कहाणी ऐकूनही होईल.

लोक हो, मला हे पटलं. तुम्हाला ते पटतय का, बघा!

 

© उज्ज्वला केळकर 

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈ संस्थापक संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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