English Literature – Articles ☆ THE “EXPERT” BREAKDOWN ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🌌 🏏THE “EXPERT” BREAKDOWN🏏🌌

🏏Prompt:

ICC Men’s T20 World Cup, Group of 8: What are India’s chances of winning against Zimbabwe and West Indies?

What are South Africa’s chances of winning against Zimbabwe and West Indies?

Which two teams from this group will reach the semi-finals in all likelihood?

🏏Gemini AI response:

In the current landscape of the ICC Men’s T20 World Cup 2026, the Super 8 stage (the “Group of 8”) has reached a critical juncture.

India and South Africa find themselves in Group 1 alongside the West Indies and Zimbabwe.

​Here is the breakdown of the chances and the likely semifinalists based on recent results and standings as of February 24, 2026.

🏏​India’s Chances

🔸​India is currently in a “must-win” situation after a heavy 76-run loss to South Africa in their opening Super 8 match. 

🔸​Against Zimbabwe (Feb 26, Chennai): India has a dominant record (10-3 in T20Is) and is the clear favorite. However, because of their poor Net Run Rate (NRR) following the loss to the Proteas, they don’t just need to win—they need to win big. 

🔸​Against West Indies (March 1, Kolkata): This is the “danger” game. The West Indies just posted a massive 254/6 against Zimbabwe. While India leads the head-to-head 19-10, the Windies’ current form in home conditions (India/Sri Lanka) makes this a 50/50 toss-up. 

🏏​South Africa’s Chances

​The Proteas are in the driver’s seat after dismantling India in their first game.

​🔸Against Zimbabwe (March 1, Delhi): South Africa is expected to win comfortably. Zimbabwe struggled significantly against the West Indies’ pace and spin, and South Africa’s bowling attack (led by Rabada and Nortje) is arguably even more clinical.

🔸​Against West Indies (Feb 26, Ahmedabad): This is the battle for the top spot. Both teams are in high spirits. Historically, their T20I record is nearly neck-and-neck (13 wins for SA, 14 for WI).

South Africa’s chances are high, but they will need to neutralize Shimron Hetmyer, who is in record-breaking form. 

🏏​Probable Semifinalists (Group 1)

🔸​Given the current points table and momentum, the two teams most likely to reach the semi-finals from this group are:

🔸​South Africa: Having already beaten India, they likely only need one more win from their remaining two games to secure a spot.

🔸​West Indies: Their 107-run thrashing of Zimbabwe has given them a massive NRR boost. Even if they lose to South Africa, a win against India (or even a close loss) might be enough to see them through on NRR. 

🔸​The “India” Factor: For India to qualify, they likely need to win both remaining matches and hope the West Indies loses to South Africa.

If India, WI, and SA all end on 4 points, it will come down to a NRR tiebreaker, where India is currently at a significant disadvantage. 

🏏​Summary Table: Group 1 Standings (Projected)

South Africa: Strong favourite. Strong NRR; already beat India.

West Indies: Strong contender. Incredible batting form; strong NRR cushion.

India: Under pressure. Defending champions; must win remaining 2 matches.

Zimbabwe: Outsider. Effectively out after the heavy loss to West Indies.

​#T20WorldCup2026 ​#Super8 #CricketWorldCup

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४० ☆ मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४० ☆

✍ मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

क्या क्या न कह गए दिले दिलगीर के लिए

कोई न भूल सकता कभी मीर के लिए

 *

गफ़लत न कीजियेगा कभी इस्तमाल में

अल्लाह ने न आँख दी शमशीर के लिए

 *

राहत जो मुफ़लिसी से दे वो दो दवा हमें

बहला रहा है रहनुमा अकसीर के लिए

 *

मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की

पुख्ता मकाम चाहिए तामीर के लिए

 *

हिंदू व मुसलमां को चलो अब तो बख़्श दो

मौज़ू नए तलाशिये तक़रीर के लिए

 *

छाई है ज़हनो-दिल पे ज़िहालत की तीरगी

हम मुंतज़िर है ज़ीस्त में तनवीर के लिए

 *

जेहाद औ तलाक हलाला का सच है क्या

बेताब हूँ में जानने तफ़्सीर के लिए

 *

ख़ातून को भी दीजिये उड़ने को आसमां

तोड़ो हर एक रस्म की ज़ंजीर के लिए

 *

भूले मिसाल लोग भरत और राम की

भाई से भाई लड़ रहा जागीर के लिए

 *

कहते है इश्के आग सुलगती है दो तरफ़

उसपे अरुण को देखना तासीर के लिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४६ – ख़ला की जानिब चल पडती है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ख़ला की जानिब चल पडती है  ।)

✍ ख़ला की जानिब चल पडती है… ☆ श्री हेमंत तारे  

हीना की मानिंद,  अपना वजूद खो जाने के बाद

तमाम उम्र सूरज की तपिश बर्दाश्त करने के बाद

ख़ला की जानिब चल पडती है  नामालूम शै कोई

वो रूह है, फौत होती नही दफन हो जाने के बाद

 *

बेमानी है अब रहम की बेइंतिहा बरसात जनाब

गो कि फ़रमाई है इनायत आपने पर मांगने के बाद

 *

उसका दिल टूटा,  ये हरगिज कोई गजब ही न था

खोला था दर आपने पर उसके चले जाने के बाद

 *

वो नाशुक्रा भी है  “हेमंत ” और तंग दिल इंसान भी

बहाता है अश्क बेशुमार पर जश्न ऐ बर्बादी के बाद

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२७ ⇒ निःशुल्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “निःशुल्क।)

?अभी अभी # ९२७ ⇒ आलेख – निःशुल्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निःशुल्क कहें या मुफ़्त ! क्या कोई फर्क पड़ता है। मुफ़्तखोर पहले तो मुफ्त का माल ढूँढते हैं और बाद में निःशुल्क शौचालय तलाश करते हैं। 25 %डिस्काउंट और बिग बाजार के महा सेल में एक के साथ एक फ्री को आप क्या कहेंगे। वहाँ छूट भी है, मुफ्त भी है और शुल्क भी। लेकिन निःशुल्क कुछ भी नहीं है।

हमारे घर अखबार आता है, उस पर शुल्क लिखा होता है। वही अखबार अगर आप पड़ोसी के यहाँ अथवा वाचनालय में पढ़ते हैं, तो निःशुल्क हो जाता है।।

गर्मी में दानदाता और पारमार्थिक संस्थाएँ जगह जगह ठंडे पानी की प्याऊ खोलते थे, वे निःशुल्क होती थी लेकिन उन पर ऐसा लिखा नहीं होता था, क्योंकि तब पीने के पानी के पैसे नहीं लिए जाते थे। जब से पीने का पानी बोतलों में बंद होने लगा है, वह बिकाऊ हो गया है।

घोर गर्मी और पानी के अभाव में नगर पालिका पानी के टैंकरों से निःशुल्क जल-प्रदाय करती थी। लोग पानी के टैंकर के आगे बर्तनों की लाइन लगा दिया करते थे। सार्वजनिक स्थानों के नल और ट्यूब वेल की भी यही स्थिति होती थी। लेकिन पानी बेचा नहीं जाता था।।

समय के साथ पानी के भाव बढ़ने लगे। नई विकसित होती कालोनियों के बोरिंग सूखने लगे। पानी बेचना व्यवसाय हो गया। प्राइवेट पानी के टैंकर सड़कों पर दौड़ने लगे। अब पानी निःशुल्क नहीं मिलता।

शहरों में चिकित्सा बहुत महँगी है ! एलोपैथी के डॉक्टर कंसल्टेशन फीस लेते हैं, वे मुफ्त में इलाज नहीं करते। आयुर्वेदिक चिकित्सा में निःशुल्क परामर्श उपलब्ध होता है। पातंजल औषधालय हो अथवा कोई आयुर्वेदिक दुकान, निःशुल्क चिकित्सा के बोर्ड लगे देखे जा सकते हैं। बस दवाइयों की कीमत मत पूछिए।।

कुछ नागरिक, समाजसेवी संस्थाओं को अपनी स्वैच्छिक सेवाएँ प्रदान करते हैं। मुफ़्त सलाह और निःशुल्क सेवाएं देने वाले को मानद भी कहते हैं। उनकी निःशुल्क सेवाओं को सम्मान प्रदान करने के लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द गढ़ा गया है, ऑनरेरी।

समाज की विभिन्न विधाओं में निःस्वार्थ सेवाएं प्रदान करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों को ऑनरेरी डॉक्टर ऑफ लॉज़ की डिग्री से विभूषित किया जाता है। इनमें ललित कलाओं में पारंगत विद्वानों और कलाकारों को बिना डिग्री के डॉक्टर बना दिया जाता है। किसी भी सेलिब्रिटी को ऐसा डॉक्टर बनने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता।।

क्या मनुष्य जीवन हमें माँगने से मिला है, या फिर हमने इसकी कोई कीमत चुकाई है ? मुफ़्त में कहें, या निःशुल्क मिली यह ज़िन्दगी कितनी अनमोल है। ‌अक्सर लोग बड़े शिकायत भरे लहजे में कहते हैं, हमने पूरी ज़िंदगी निःस्वार्थ सेवा और त्याग में बिता दी और बदले में हमें क्या मिला।

‌वे भूल जाते हैं, इतना बहुमूल्य मानव जीवन उन्हें बिना कौड़ी खर्च किये मिला है। जिसने आपको यह जीवन दिया है, यह उसकी अमानत है। इसमें खयानत न करते हुए, कबीर की तरह इस चदरिया को ज्यों की त्यों रख देंगे तो यही एक बड़ा अहसान होगा। जो ज़िन्दगी आपको मुफ्त में मिली, आप उसकी क़ीमत लगा रहे हैं। मुझको क्या मिला।।

कुछ लोग निःशुल्क खुशियाँ बाँटते हैं। कितनी भी परेशानियां हों, हमेशा मुस्कुराहट उनके चेहरे पर नज़र आती है। दो शब्द मीठा बोलने में पैसे नहीं लगते। व्यक्तित्व की महक, तड़क-भड़क और महँगे प्रसाधनों से नहीं होती। प्रसन्नता travel करती है। बस में यात्रा करते समय, किसी माँ की गोद में खिलखिलाता बच्चा, बरबस सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह जिसकी ओर मुस्कान फेंकता है, वह मुग्ध हो जाता है। यह सब बस किराये में शामिल नहीं होता। निःशुल्क होता है।

गर्मियों में जब सुबह ठंडी हवा चलती है, और आप सैर के लिए निकलते हैं, तो वातावरण में रातरानी की खुशबू शामिल होती है। प्रकृति ने यह सब व्यवस्था आपके लिए निःशुल्क की है। आप इसकी कीमत केवल खुश रहकर, प्रसन्न रहकर, और औरों को प्रसन्न रखकर ही चुका सकते हैं। जो निःशुल्क मिला है, उसे अपने पास नहीं रखें, निःशुल्क ही आपस में बांट लें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “इस्तेमाल“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆

✍ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आदमी को आदमी

इस्तेमाल कर रहा

तरह तरह के

रिश्ते बना कर

एक दूसरे को

ठग रहा।

 

भरोसा करने वालों का

हर रोज

भरोसा टूट रहा

भरोसा तोड़ने वाला

ऐश कर रहा।

 

सत्य की खोज

करने वाला

खोज करता रहा

झूठ अपने आप में

पलता रहा।

 

ओ दुनिया बनाने वाले

सब कुछ बना कर

तुझे क्या मिल रहा

आदमी को क्यों

इस तरह

परेशान कर रहा।

 

बता दे तू भला

अक्ल देकर क्यों

अक्ल हर रहा

आदमी को क्यों

सिखाया जाल बुनना

जो बुन कर

उसी में फँस रहा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना।)

☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

कमला  अपनी कहानी के रजिस्टर को लेकर पास के साइबर कैफे में गई ।

साइबर कैफे का मालिक उसके बेटे उज्जवल  का परम मित्र था।

उज्जवल तो विदेश में नौकरी करने चला गया। अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़कर।

कमला जी विदेश जाना भी नहीं चाहती थी?

अकेले घर में खाली बैठे हुए बागवानी करती थी और कहानी लिखती थी, अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की।

मन में एक विचार आया कि चलो अमन से बात करते हैं।

कमल जी तैयार होकर तुरंत अमर के कैफे में पहुंची।

कमल जी को देखकर अमन ने कहा- “नमस्ते आंटी आप थोड़ी देर बैठ जाइए मैं कुछ फोटो को एडिट कर रहा हूं। बस थोड़ी देर में ही काम खत्म हो जाएगा, फिर आपकी बात सुनता हूँ।”

 वे किनारे रखी कुर्सी में बैठ गई उनके बगल में एक 15 साल की लड़की नेट पर कुछ मैटर  सर्च करवा रही उन्होंने देखा प्रसिद्ध हिंदी के रचनाकारों की पिक्चर थी, इसलिए उनकी जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने पूछा बिटिया “हिंदी के इन कलम के सिपाहियों के बारे में  क्या जानती हो?”

“नहीं आंटी पर मैं इनके बारे में नहीं जाना चाहती स्कूल में मुझे फेमस राइटर के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को दिया है।”

कमल जी ने कहा -“बेटा यदि तुम जानना चाहो तो मेरे पास किताबें हैं तुम लेकर प्रोजेक्ट बना सकती हो।”

“हम इंटरनेट यूजर हैं, हमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं है।”

आंटी मेरा नाम खुशी है आप मुझे बिटिया न कहें, मैडम ने कहा है, प्रोजेक्ट बनाना है अंकल सभी की फोटो निकालकर बढ़िया सा एक प्रोजेक्ट मुझे बनाकर 1 घंटे में दे देंगे।

 इधर-उधर भटकने की और मेहनत करने की मुझे क्या जरूरत है?

कमल जी की ओर देखकर उस लड़की ने बोला -“जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं सलाह देने के लिए?”

कमल जी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि वे सब उनके पसंदीदा  लेखक थे वे क्या करती इसीलिए चुप हो गई।

लड़की खुशी ने कहा-  अमन अंकल मेरी फोटो तो आपने सब एडिट कर दिए अब एक लेख के साथ अच्छा सा प्रोजेक्ट बना दीजिएगा, वीडियो भी  बना दीजिएगा बिल्कुल ऐसा लगे मैं ही बोल रही हूँ। 2 घंटे बाद में आकर ले जाऊंगी एक पेन ड्राइव में सब कर दीजिएगा, पैसे आपको पूरे मिल जाएंगे।

अमन ने कहा -“चार हजार में बढ़िया बन जाएगा।”

उस लड़की ने कहा – ठीक है और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई।

कमल जी ने कहा – “अमन बेटा आजकल बच्चे पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते तुम्हारे पास आते रहते हैं इसीलिए इतनी भीड़ है।”

अमन बोल – “हां आंटी आजकल सभी बच्चों के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट भी है सारे सवालों के जवाब पूछते हैं।”

कमल जी ने कहा- ” बेटा फिर इन बच्चों का दिमाग कैसे चलेगा जब किताब पढ़ कर प्रोजेक्ट नहीं करेंगे  तो?”

अमन ने कहा – “अरे! आंटी आजकल सारे बच्चे बदल गए हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करते हैं।”

“ठीक कह रहे हो अमन” – कमल जी ने गंभीर स्वर में कहा।

कमला जी की आंखों में आंसू आ गए रोते हुए उन्होंने कहा-

“आजकल किसी के अंदर कोई भावना और इमोशन नहीं है, रिश्ते भी बदल गए हैं।”

“हाथ में एक छोटा सा जादू पकड़ लिया है मोबाइल नामक राक्षस।”

सारा कुछ इसी में देखते हैं, आजकल लोग एकाकी हो गए हैं, इसी के जरिए लोगों को उल्लू बनाकर पैसे भी मांगते हैं, कुछ दिन पहले बेटा डिजिटल क्राइम के विषय में सुना था।

क्या कोई इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इलाज नहीं करता?

अमन ने कहा -“आंटी अभी तो दुनिया इसी पर चल रही है, जाने कितने युवाओं की नौकरी भी जा रही है भविष्य में देखते हैं क्या होगा?”

कमला जी ने कहा – “बेटा अमन तुम तकनीकी के काम करते हो और हम बुजुर्गों की बात तो सुन लेते हो। भगवान इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जादू से हम सबको बचाए मैं ऐसी प्रार्थना करूंगी।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ असे केले कधी नाही… + संपादकीय निवेदन – सौ. ज्योती कुलकर्णी – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ. ज्योती कुलकर्णी

💐 अ भि नं द न 💐

सिद्ध लेखिका समुहातर्फे आयोजित राज्यस्तरीय गझल लेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ कवयित्री सौ. ज्योती कुळकर्णी यांना प्रथम क्रमांक मिळाला आहे.

ई-अभिव्यक्ती मराठी तर्फे सौ. कुळकर्णी यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि शुभेच्छा 💐💐

पुरस्कार प्राप्त कविता ‘असे केले कधी नाही आज प्रकाशित होत आहे. 🪻

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “असे केले कधी नाही” ☆ सौ. ज्योती कुलकर्णी ☆

(सिद्ध लेखिका समुहातर्फे आयोजित राज्यस्तरीय गझल लेखन स्पर्धेत – प्रथम पारितोषिक प्राप्त)

कुणी मज नाव ठेवावे असे केले कधी नाही

जरी मी नाव काढावे असे केले कधी नाही

*

कसे देवास मी मागू? निरोगी ठेवले त्याने

नियंत्याने कमी द्यावे असे केले कधी नाही

*

जरी मी हारले असले तरी वृत्ती खिलाडू ना!

रडीचे डाव खेळावे असे केले कधी नाही

*

दिल्या जखमा मलाही तर जगाने बोचऱ्या काही

जगाने बोल लावावे असे केले कधी नाही

*

कुठे मी आपल्या केली भलाई वागण्याची का?

कुणी वाईट वागावे असे केले कधी नाही

© सौ. ज्योती कुलकर्णी

अकोला.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०३ ☆ रंग… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०३ ?

☆ रंग… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

आजकाल माझ्याशी बोलतात रंग

आपल्याच मार्गाने चालतात रंग

केशरी फुलासाठी शोधते गुलाब

त्याच त्या कहाण्या मग सांगतात रंग

 *

मोग-यास  माळूनी होता गंधधुंद

एक गोष्ट  बेरंगी  मांडतात रंग

 *

सप्तरंग सृष्टीचे वेढती मलाच

चार बोल बोलूनी रंगतात रंग

 *

झाड झाड प्रेमाने  साद घालतेच

सावलीत  हिर्वाई दावतात रंग

 *

भांडतात आकाशी नील शाम श्वेत

 वेगळेच आताशा वागतात रंग

 *

 रंगताच रंगाचा सोहळा नभात

सागरात जोशाने सांडतात रंग

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “ओ. टी. पी.” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “ओ. टी. पी.” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

मी झोपेत होतो का… हो झोपेतच होतो. अचानक मला एक प्रकाशमान गोलाकार भाग समोर दिसायला लागला. हे काय आहे… काय असेल… हा विचार करत होतो.

तेवढ्यात आवाज आला… वत्सा… घाबरु नकोस… मीच आहे. आता सध्या आईमुळे मीपण काही धार्मिक सिरीयल सुरु असतांना मोबाईल हातात घेत टि. व्ही. समोर बसतो. त्यामुळे वत्सा, आचार्य, शिष्य, नामस्मरण असे शब्द कानावर येतात त्यामुळे त्यांची थोडी सवय झाली आहे. नाहीतर मी झोपेत त्या आवाजाला घाबरण्याऐवजी वत्सा या शब्दालाच घाबरलो असतो.

जागा असतो तर कदाचित मोबाईल हातात घेऊन गुगलवर वत्सा याचा अर्थ पण शोधला असता. पण वत्सा लिहीतांना त ला स जोडायचा, का स ला त हा प्रश्न कदाचित पडला असता. आणि शाळेत शिकलेले स ला ते स ला ना ते हे व्याकरण याचा काहि संबंध आहे का हे आठवावे लागले असते.

व्याकरणात हे द्वितीय विभक्तीचे प्रत्यय आहेत. पण झोपेत द्वितीय, विभक्ती, आणि प्रत्यय याचा संबंध नव्हता, कारण मी प्रथम किंंवा प्रथमच भक्तीचा प्रत्यय घेत होतो. पण वत्सा मीच आहे यात मी म्हणजे नक्की कोण हे काही समजलंच नाही.

मोबाईलच एक बर असतं, त्याला ट्रू काॅलर लावल की कोण बोलतय हे समजत. पण नुसत्या आवाजाने मी ओळखणं मला कठीण गेलं. किंवा आवाजावरून मी कोणालाही ओळखेन असा असणारा मी पणा गळून पडला. कारण हल्ली मी आवाजावरून दुधवाला, भंगारवाला, भाजीवाला अशा काही लोकांना ओळखायला लागलो होतो. पण हा आवाज नवीन होता.

अरे तु ज्याची आराधना करतोस तोच मी… तुला भेटायला आलो आहे…

अरे देवा… काही कळलं नाही तर जागेपणात जी त्रासीक प्रतिक्रिया असते, तीच झोपेतही उमटली…

बरोबर तोच… तोच मी देव…

त्याला अरे देवा हेच समजलं असेल. त्रासीक आवाज लक्षात आला नसावा.

तोच मी देव अस म्हंटल्यावर आता माझे वरचे शब्द तेच होते, फक्त वापर वेगळ्या पध्दतीने. आणि ऊत्साहात… अरे… देवा… वा… वा… पण तुझा चेहराच दिसत नाही. तो दिसू दे…

तु नामस्मरण करतांना जे नांव घेतो तेच नांव घे. तोच तुझा ओ. टि. पी. आहे. ते अगदी मोबाईल सारखच आहे… पैसे देतांना जसं तू ओ. टि. पी. ने कन्फर्मेशन देतोस तसच माझं नांव घे. ते नांव म्हणजे ओ. टि. पी. घेतल्यावर माझा चेहरा काय संपूर्ण मीच दिसायला लागेल.

आता देवाला काय सांगणार… मोबाईल वर पैसे देतांना दोन बँक असल्यातरी आधी बँक सिलेक्ट करावी लागते मग ओ. टि. पी. येतो. इथेही ओ. टि. पी. म्हणून देव नावच घ्यायला सांगतोय. पण… कोणत्या देवाचं नांव घेऊ…

रविवारी सूर्यनारायण, सोमवारी महादेव शंकर, मंगळवारी गणपती बाप्पा, गुरुवारी दत्तात्रेय, शुक्रवारी कोणत्या देवीचं नांव घ्याव हा प्रश्न असतो, पण मी आठवेल किंवा जमेल त्या देवीच नांव घेत हा प्रश्न तात्पुरता माझ्यासाठी सोडवतो. शनिवारी हनुमान यांच नांव घेतो.

शनिवारी शनीचं नांव टाळतो. कारण खोडी काढणं याचही नांव घेणं असा अर्थ निघतो. त्या अर्थाने शनी देेवाने पाहिले तर ऊगाचच शनी मागे लागेल हि भिती.

बर्‍याचदा तर सकाळ, संध्याकाळ आणि जमल्यास दुपार, व ठराविक दिवस यांना ठरवून वेगवेगळ्या देवांची नांव घेतो. आता ओ. टि. पी. म्हणून कोणाचं नांव घेऊ. कारण चेहराच दिसत नाही…

हो, बरोब्बर वरच्या वारात बुधवार नाही. हा वार मी मुद्दाम मोकळा सोडला आहे. त्याला काही कारण आहे. पण ते सांगायचं नाही.

बर मी सगळ्यावारी वेगवगळ्या देवाचं नांव घेतो. त्यांचा चेहरा लक्षात आहे. पण आवाजाच काय? देव आपला आवाज ऐकत नाही असं आपण सहज म्हणतो. पण आपला प्रयत्न त्याने आपलं ऐकावं याचसाठी असतो. आपण कधी मनापासून त्याचा आवाज ऐकण्याचा प्रयत्न केल्याचं आठवतच नाही. मग ओळखणार कसा त्याचा आवाज…

बरं त्याची नांव तरी किती… सूर्य, रवी, शंकर, महादेव, गणपती, वक्रतुंड, दत्तात्रेय, श्रीपाद, अंबाबाई, दुर्गा, पवनसूत, हनुमान, विष्णुला तर सहस्त्र नांव आहेत. बरं ओ. टि. पी. टाकायचा म्हणजे तोच टाकावा लागेल, चुकवून चालणार नाही. ही मानसिकता.

आता झोपेत का असेना पण देवाच्या मिळणार्‍या दर्शनाला आपण मुकणार याची खंत. काय करावं हाच विचार.

तेवढ्यात देवच म्हणाला, तुझ्या ओ. टि. पी. ची वेळ संपली आहे. मला जावं लागेल कारण अजूनही काही लोकांना असेच ओ. टि. पी. द्यायचे आहेत. पण तु निराश होऊ नकोस. कारण…

एखाद्या गोष्टीचं मुल्य ठरल्यावर ते द्यायचं सध्या तुझ्याकडे वेगवेगळे पर्याय आहेत. वेगवेगळे पे तुझ्याकडे आहेत. शिवाय चेक, रोख रक्कम, क्रेडिट कार्ड असेही पर्याय आहेत. रोख रकमेत दहा, पन्नास, शंभर, पाचशे अशा वेगवेगळ्या दर्शनी मुल्यांच चलन तुझ्याकडे आहे. हे फक्त सोयीस्कर व्यवहारासाठीचे मार्ग आहेत. पण मुल्य एकच असतं.

तु वारानुसार भक्ती करत असलास तरी सगळी एकाच ठिकाणी येऊन मिळते. वार कदाचित आमच्या किंवा तुमच्या सोयीने झाले किंवा केले असतील. पण तुमची भक्ती आणि श्रध्दा यात फरक जाणवत नाही. सगळ्या वारी आमच्याबद्दल असलेला तुमच्या मनातला भाव तेवढाच आणि सारखाच असतो. त्यात ऊजवं डावं जाणवत नाही. ऊलट ज्या देवाला जे आवडेल, भावेल, रुचेल ते सर्वतोपरी करण्याचा आणि देण्याचा तुमचा ऊत्साह आणि प्रयत्न दांडगा असतो. मग यात उपवास घडला, त्रास झाला तरी चालतो. आणखीन काय पाहिजे. हिच भक्ती म्हणजे मूल्य आहे. जे तु वेगवेगळ्या पध्दतीने देण्याचा प्रयत्न करतोस. पण प्रामाणिकपणा तेवढाच असतो.

मी तुला भेटायला यायचं ठरवलं होत, तसा आलो आणि भेटलो. जाता जाता एकच सांगतो तुम्हाला हल्ली मोबाईलमुळे मराठी पण इंग्रजी शब्दांच्या सहाय्याने लिहायची सवय झाली आहे.

मी म्हणालो तो ओ. टि. पी. काहिसा तसाच आहे. ओळख Olakh तुझा Tuza परमेश्वर Parameshwar. OTP.

मनात देव कोणताही असला तरी भाव एकच असतो. आणि तो तुच नाही, तर तुझ्या सारख्या अनेकांनी ओळखला आहे. कोणाचही आणि कोणतही नांव घेतलं तरी चालतं हेच लक्षात ठेव. ज्याच नांव घेशील तोच ओ. टि. पी. परत संभ्रमात पडू नकोस. चला येतो मी. अनेक आशिर्वाद. असं म्हणत तो प्रकाश देणारा गोलाकार भाग लुप्त झाला.

पण जाता जाता अनेक ओ. टि. पी. त्याचा अर्थ आणि भक्तीभाव यासह देऊन, समजवून गेला.

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ नशीबवान आहे मुलगी – भाग – १ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

☆ जीवनरंग ☆

☆ नशीबवान आहे मुलगी – भाग – १ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

.. आय ॲम समथिंग स्पेशल 

.. आय हॅव टॅलेंट… आय ॲम ग्रेट 

.. आय से थँक्यू फॉर द लाईफ 

.. आय ॲम एन्जॉईंग…!

 एका ऑपेरात ऐकलेलं आवडतं गाणं गुणगुणत लीना बाथरूममध्ये शिरली. शॉवर घेतल्यावर तिने टबभोवतीच्या स्टॅंडमधल्या रंगीत सुगंधी मेणबत्त्या लावल्या. सुवासिक फेसाने भरलेल्या टबमध्ये अलगद बसून तिने बाजूचा बुकस्टॅन्ड जवळ ओढला. सर्वांगाला गरम सुगंधी शेक घेत तिने बुक स्टॅंडवरच्या पुस्तकांवरून नजर फिरवून एक पुस्तक निवडण्याचा प्रयत्न केला. पण डोक्यात विचारांची गर्दी उसळली होती. अस्वस्थ मनाला दिलासा देण्याचा तिचा प्रयत्न सफल होत नव्हता. नीरज आणि एमिलीची वाढती सलगी तिच्या काळजाचा ठोका चुकवीत होती. अमेरिकेतल्या गेल्या जवळजवळ वीस वर्षांच्या वास्तव्याने तिथल्या मनमुक्त स्वैर वातावरणाला ती सरावली होती. पण हे एमिली प्रकरण हाताबाहेर जातंय या भीतीने तिच्या मनात घर केलं होतं. बुडबुड्यांच्या आवाजाने तिचे विचार विचलित झाले.

टबमध्ये तरंगणारे, डुलणारे इंद्रधनुष्यी बुडबुडे न्याहाळताना तिचं मन खूप मागे, गावच्या शंकराच्या देवळ्यामागल्या तळ्यावर पोचलं. पाणी भरायला आलेल्या बायकांच्या घागरींमुळे तळ्यावर लहान- मोठे बुडबुडे नाचत होते. त्यात छोटासा दगड भिरकावत आपण शेजारी बसलेल्या इशाला म्हटलं होतं, इशा या गावंढळ गावातून सटकायचा एकच मार्ग म्हणजे लग्न. थोडी तडजोड स्वीकारून एखाद्या मोठ्या शहरातला मुलगा पत्करला तर आपल्या मनासारखं आधुनिक जीवन अनुभवायला मिळेल.

इशाची आणि आपली मैत्री लहानपणापासूनची. दहावीनंतर दोघींनीही घरी हट्ट करून, तालुक्याच्या ठिकाणी राहून बारावीपर्यंतचं शिक्षण पूर्ण केलं होतं. त्या पुढचं शिक्षण घरच्या परिस्थितीमुळे शक्य नव्हतं. नशिबानं त्याचवेळी सरकारी योजनेमुळे गावात मुलींसाठी मोफत कॉम्प्युटर शिक्षणाची सोय उपलब्ध झाली. त्या संधीचा फायदा घेऊन दोघींनी कॉम्प्युटरच्या मायाजालातल्या अनेक गोष्टी शिकून घेतल्या. एका क्लिकवर होणाऱ्या विश्वरूप दर्शनाने त्यांची शहरी, श्रीमंत, चैनीच्या आयुष्याची ओढ वाढली होती. स्वतःच्या सौंदर्यावर हुशारीच्या जोरावर काहीतरी वेगळं मिळवण्याची त्यांची धडपड होती.

त्यावेळी इशाने तिचे बदामी पिंगट डोळे आपल्यावर रोखून म्हटलं होतं,  ॓अगं तेच सांगायला मी तुला इथे बोलावलंय. माझ्या दूरच्या, डोंबिवलीत राहणाऱ्या आत्याने तिथलं स्थळ माझ्यासाठी जमवत आणलंय. तो दिसायला अगदी सामान्य आहे पण नोकरी चांगली आहे. स्वतःची जागा आहे. जबाबदारी अशी काही नाही. आमचा जोडा विजोड दिसेल पण मी ॓हो ॔म्हणायचं ठरवलं आहे. पैशांची अडवणूक नाही त्यामुळे घरचेही खुश आहेत.

काँग्रॅटस् इशा. गो अहेड. नंतर मलाही शहराचा रस्ता शोधायला मदत कर. इशाने बाजी मारल्यामुळे मनातून थोड्या नाराजीने पण वरकरणी हसून आपण तिचं अभिनंदन केलं. त्या रात्री आपल्याला झोप लागली नाही. दुसऱ्या दिवशी रविवार होता तरी ॓कॉम्प्युटरच्या बाईंनी स्पेशल क्लासला बोलवलय ॔ अशी घरात थाप मारून आपण दुपारी बाहेर पडलो. तालुक्याच्या ठिकाणाहून या गावात मुलींना कॉम्प्युटर शिकवायला आलेल्या सरकारी बाई एकट्याच एक खोली राहत घेऊन रहात होत्या. घरातून निघताना पर्समध्ये हळूच भरून घेतलेले भोपळ्याचे पाच-सहा घारगे बाईंपुढे करत आपण म्हटलं आईने दिलेत. आणि सांगितलंय की त्या कॉम्प्युटरवर स्थळं शोधता येतात ना तर बाईंच्या मदतीने बघ काही बरं ठिकाण दिसतंय का ते! घारगे पाहून खुश झालेल्या बाईंनी त्यांच्या घरातला कॉम्प्युटर उघडून दिला. नशिबाने इंटरनेट कनेक्शन होतं. दोन-तीन तास खर्च करून आपण स्वतःच अशोकचं स्थळ शोधून काढलं. अमेरिकेत नोकरी करीत होता म्हणजे हुशार असणार. पण त्याच्या चेहऱ्यावरचा बावळेपणा लपत नव्हता. अगदी साधा शामळू दिसतो म्हणून अनेक मुलींनी नाकारलेला असावा. आपण अशोकला पत्करायचं ठरवलं. घरी आल्यावर बाईंच्या नावाने या स्थळाची माहिती सांगितली. भावाच्या मदतीने पुण्याला पोहोचलो. लांब केसांचा घट्ट शेपटा घालून दोन्ही खांद्यांवरून पदर घेऊन भावी सासू-सासर्‍यांना वाकून नमस्कार केला. दोघेही खुश झाले. यथावकाश अमेरिकेहून आलेल्या, चेहऱ्यावर बावळट हसू ओघळणाऱ्या अशोकशी लग्न होऊन आपण अमेरिकेत या स्वप्न नगरीत पोचलो तेव्हा नातेवाईक आणि गावकरी म्हणावे ॓नशीबवान आहे मुलगी !॔

तीन-चार वर्षांनंतर आपल्या बाळंतपणासाठी सासू-सासरे अमेरिकेत आले. त्यावेळी आपणच पुढाकार घेऊन स्वतःच्या बेबी- शॉवरचा घाट घातला. गेल्या चार वर्षात जमविलेल्या अनेक मित्र मैत्रिणींनी हौसेने येऊन भरपूर धमाल केली. पण अशोक तोंडदेखलं बावळट हसू हसून थंडपणे त्याच्या रूममध्ये जाऊन बसला होता त्याला सोशल लाईफची मौज मस्तीची अजिबात आवड नव्हती. शिवाय एवढे डॉलर्स खर्च करणंही त्याच्या जीवावर आलं होतं. मुुलगा झाल्यावर सासू-सासर्‍यांवर मुलाला बिनधास्त टाकून आपण आपलं पूर्वीच सोशल लाईफ सुरु ठेवलं.

अशाच एका पार्टीत नीरज भेटला. आपल्या ड्रेसचं, दिसण्याचं, ग्रेसफुल डान्सचं त्यानं भरभरून कौतुक केलं. आपल्या सर्वांगावरून त्याची नजर भिरभिरत होती. आपण मनातून सुखावलो. हवं असं काहीतरी सापडल्यासारखं झालं. उच्चपदस्थ नीरज घटस्फोटीत होता. फारसा विचार न करता पुढच्या पायऱ्या भराभर ओलांडून आपण अशोक बरोबर घटस्फोट घेतला.

अशोकचं घर सोडताना चार-पाच वर्षांच्या छोट्या आनंदसाठी पाय अडखळत होते पण नीरजला मुलाबाळांचा गुंतवळा नको होता. त्याला फुलपाखरासारखं स्वच्छंदी, रंगीबेरंगी आयुष्य उपभोगायचं होतं. चैनीच्या स्वैर, विलासी आयुष्याचा आपल्यालाही मोह पडला.

जवळजवळ दहा वर्ष आपण नीरज सोबत ऐषोआरामात काढली. या काळातही तो दुसऱ्या काही स्त्रियांच्यात थोडाफार गुंतला होता. तरी आपण हुशारीने, सावधपणे नीरजवरची पकड अधिकच घट्ट केली. पण हे एमिली प्रकरण डोईजड होतंय. आपल्याला सोडून नीरजने एमिलीशी लग्न करायचं ठरवलं तर आपलं भवितव्य काय? या अफाट अमेरिकेत आपण कोणाच्या तोंडाकडे पाहायचं? कपडे घालता घालता लिनाचं विचारचक्र सुरू होतं. तिने मान झटकली आणि निश्चय केला,  ॓छे! अशी हार मानून चालणार नाही. आयुष्यातलं हेही वळण सफाईन पार केलं पाहिजे मात्र आता स्थिर आयुष्याच्या दृष्टीने विचारपूर्वक, हुशारीने पावलं टाकली पाहिजेत. पन्नाशी जवळ आलीय. चांगली संधी मिळेपर्यंत नीरजला दुखावून चालणार नाही या विचारांनी तिला थोडं हलकं वाटलं.

 ****

 नीटनेटका भरलेला डबा आणि पाण्याची बाटली लीनाने किल्ली न्यायला आलेल्या ड्रायव्हर जवळ दिली.

 पावसाचं लक्षण दिसतंय. छत्री आहे ना गाडीत? आणि दुपारी वेळेवर जेव बरं का. डब्यात वरतीच दुपारची औषधं ठेवल्येत. ती घे. मी फोन करीनच. लीनाने प्रसन्न हसऱ्या चेहऱ्याने सदानंदला बाय केलं.

  ॓अगं हो हो! किती काळजी घेशील? आणि आता जरा रेस्ट घे. काल रात्रीही एअरपोर्टवरून यायला उशीर झालाय. गेला महिनाभर धावाधाव चाललेय तुझी. मावशीनाही आज सुट्टी दे. संध्याकाळी आपण बाहेरच जाऊ. सदानंदने लीनाला अच्छा करताना प्रेमाने बजावलं.

सदानंद गेल्यावर लीना व्हरांड्यातल्या झोपाळ्यावर टेकली. आत्यानंदाने तिचं हृदय धडधडत होतं. सदानंदने सही केलेल्या फॉर्मवर परत एकदा नजर फिरवत तिने मनात म्हटलं ॓ थँक गॉड. अखेर जिंकले मी आयुष्याचा डाव. आपल्या हुशारीला, चलाखीला नशिबाने साथ दिली. आता जन्मभराची काळजी मिटली .॔

झोपाळ्याला हलकी गती देऊन लीना आठवणींच्या झुल्यावर रमून गेली.

– क्रमशः भाग पहिला 

© सौ. पुष्पा चिंतामन जोशी

कोथरूड, पुणे

मो ९९८७१५१८९०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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