(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४११ ☆
आलेख – साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।
साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा, तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के ‘प्राण’ को अपनी कल्पना में जिया है।
सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है, व्यावसायिकता से किंचित परे है, वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय, निर्देशन, संपादन, लोकेशन, फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत, गायन वगैरह ढेर सारे लोग नहीं होते ।
जब प्रसाद जी लिखते हैं”तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन”तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है। फिल्मी धुनों में ऐसे गीत ‘शब्दनाद’ और गांभीर्य को खो देते है, जो मूल कृति की आत्मा थी।
फिल्मकार की कोशिश उसे ‘लोकप्रिय’ और ‘दृश्य-योग्य’ बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।
दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’ से लेकर अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’, आर.के. नारायण की ‘गाइड’ और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित ‘साँवरिया’ जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। ‘तीसरी कसम’ में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम ‘देवदास’ या ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।
फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके ‘उद्देश्य’ और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।
अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो ‘शब्दनाद’ हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है।
जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – “बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४६ ☆
☆ व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।
“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”
हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”
बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।
हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”
“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।
सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।
सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।
अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।
सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।
बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।
इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।
उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुगली पुलिया…“।)
अभी अभी # ९७३ ⇒ आलेख – चुगली पुलिया श्री प्रदीप शर्मा
ताल तो भोपाल का, बाकी सब तलैया है। आजकल बड़े बड़े फ्लाई ओवर बन रहे हैं, जब संसाधनों की कमी थी, नदियों पर पुल बनाए जाते थे और छोटे छोटे नालों पर बरसात के मौसम में आने जाने के लिए छोटा पुल बनाया जाता था।
हमारे शहर में आज भी कृष्णपुरा पुल है जो कभी सबसे बड़ा पुल कहलाता था। रामबाग और कृष्णापुरे के बीच, आज भी एक पुल है, जिसे बीच वाला पुल कहते थे। घर से स्कूल हम इसी पुल से जाते थे। दिन में तो ठीक, रात में इस पुल से गुजरने में डर लगता था। जब यह पुल बना होगा, किसी ने पुल की फर्शी पर ॐ लिख रखा था। चलते वक्त हमें ध्यान रखना पड़ता था, कहीं इस पर पांव न पड़ जाए। पुल के खत्म होने के पहले, एक पिलर से सटा हुआ, कुछ कटा हुआ, एक शब्द लिखा था कग्। रोज पुल पार करते वक्त ध्यान इसी पर रहता था, ॐ आ गया, अब कग् आएगा।।
पुल को अंग्रेजी में ब्रिज कहते है। मेरे शहर में मेरे देखते देखते, कितने ब्रिज बन गए। मुझे अच्छी तरह याद है, आज तिलक पथ पर कहां लोखंडे ब्रिज है, वहां कभी एक छोटी सी पुलिया थी। इस पार से उस पार जाने के लिए खतरों के खिलाड़ी की तरह, संभल संभल उतरे पारा वाला मामला था। हम बच्चे लोगों का तो कई बार पांव भी फिसल जाता था। पानी ज़्यादा नहीं होता था। एक तो mud स्नान और बाद में घर पर पहले तबीयत से पूजा, तत्पश्चात ठंडे पानी से स्नान।।
सारे पुल ब्रिज हुए अब ! ब्रिज तो हावड़ा का, बाकी सब culvert यानी पुलिया है। आज हमारे शहर में नदी तो एक ही है, जिसका सौंदर्यीकरण चल रहा है, लेकिन पुलियाओं की कोई कमी नहीं। बरसाती पानी के निकास के लिए नालों पर पुलिया बनाई जाती थी। नाले तो बंद हो जाते थी, पुलिया मशहूर हो जाती थी।
आज शहर में जगह जगह कई पुलियाएं हैं। किसी को तीन पुलिया कहते हैं, तो किसी को गमला पुलिया। सुबह की सैर पर जाने वाले स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए, ये पुलियाएं सुस्ताने के काम आती हैं। सुबह की सैर अकेले नहीं की जाती। चार पांच लोगों का ग्रुप हो, तो समय भी कट जाता है, और थकान भी महसूस नहीं होती। राजनीति, शेयर मार्केट, फिल्म और अफवाहों के अलावा और भी कई मसले होते हैं, जिन पर इन पुलियाओं पर विस्तृत चर्चा होती है।
कुछ पुलियाएं जो मंदिर के करीब स्थित हैं, शाम की आरती के बाद मोहल्ले की महिलाओं के लिए सुरक्षित होती हैं। वहां सड़क के दोनों ओर, आमने सामने एक एक पुलिया है जिसका नाम किसी ने निंदा पुलिया और चुगली पुलिया रख दिया है। निंदा और चुगली में भी अंतर होता है। निंदा तो किसी की भी की जा सकती है, लेकिन चुगली तो अपनों की ही हो सकती है।।
ऐसा माना जाता है कि निंदा खुले आम की जाती है लेकिन चुगली किसी से छुपाकर की जाती है। मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो, यह चुगली नहीं तो और क्या है।।
सास को बहू की निन्दा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए वह खुले आम निंदा पुलिया पर किसी भी बहू की निन्दा कर सकती है। बचपन में हम निंदा नहीं समझते थे, केवल चुगली से ही काम चला लिया करते थे। किसी के कान भरना क्या चुगली करना नहीं।
अगर पुलिया न होती, तो हम अपने दिल की बात कहां करते। दीवारों के भी कान होते हैं, पुलिया के कान, मुंह, आंख कुछ नहीं होते। आज तक किसी पुलिया ने इधर की बात इधर नहीं की। न कुछ लिया, न कुछ दिया। बस जो उस पर बैठा, उसको थोड़ा आराम दिया। उसे अपने मन की बात कहने का मौका दिया। कितनों ने पुलिया पर बैठकर अपनी फिक्र धुएं में उड़ाई है, कितने थके हुए राहगीरों ने यहां बैठकर राहत की सांस पाई है। क्या आपको कभी किसी पुलिया की याद आई है।।
– स्मृतिशेष वरिष्ठ पत्रकार मोहन शशि नहीं रहे – भावपूर्ण श्रद्धांजलि – ☆ साभार – श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’ –
हमारे आदरणीय श्री मोहन शशि जी
हमारे मोहल्ले के श्याम कक्का, लीला कक्का, एवं मोहन कक्का यह ऐसे नाम थे, जो सभी के जुबान में रटे थे। हम सभी मित्रों की नगर के समाचार पत्रों की पाठशाला उनके घर पर हुआ करती थी। संपादक होने के कारण उनके घर जबलपुर के सभी अखबार आया करते थे और लेखन अभिरुचि बचपन से होने की वजह से मुझे पढ़ने का बड़ा शौक रहता था। श्री मोहन शशि अपने भाइयों में सबसे छोटे थे।
समाचार पत्र नवभारत में पत्रकार होने के नाते पूरे शहर में उनकी धाक थी। मिलन संस्था का एक बड़ा नाम था। मोहन शशि जी ने जबलपुर में नौटंकी, कव्वाली, बेलबाग की मुजरा पार्टी जैसे कार्यक्रमों की जगह शहर में सांस्कृतिक एवं साहित्य कार्यक्रमों से हवा का रुख बदला और बड़े-बड़े स्टेज बनाकर या गीत संगीत का वातावरण बनाया।
उन्हीं कार्यक्रमों से नगर में के के नायकर, यंग आर्केस्ट्रा के रजनीकांत, दत्तात्रेय-हेमंत कुलकर्णी बंधु, निरंजन शर्मा जैसे अनेक कलाकार उभर कर आए और पूरे देश में छा गए।
उनके बड़े भाई श्री श्यामलाल यादव बाद में पार्षद भी बने। मोहल्ले के लड़के बिगड़े न इसलिए आदर्श छात्र मंडल संस्था को बनाया। लालचबूतरा एक मंच बना। जिसमें वर्ष भर ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते थे। जिसमें श्री लीलाधर यादव संयोजक बने। उस समय मिलन मित्रसंघ संस्था की धूम थी। सन् 1974-75 में श्री नाथ की तलैया में मिलन का एक भव्य कार्यक्रम होने वाला था। और उसी समय इलाहाबाद नाट्य संघ का कार्यक्रम भी तीन दिवसीय शहीद स्मारक में होने वाला था।
शशि जी इस कार्यक्रम में असुविधा महसूस कर रहे थे। तब उन्होंने हमारी संस्था को यह कार्यक्रम को करने का आफर दिया। हम लोगों ने कमर कसी मधुकर सरोज कोष्टा, शैलेश साहू, सुंदर लाल कोष्टा, महेश सिंह ठाकुर, मगन ठेकेदार सहित अनेक मित्र थे, मै (मनोज कुमार शुक्ल) सचिव था।
शहीद स्मारक में गेट के अगल-बगल दो खिड़कियां हुआ करतींः उसमें टिकट काउंटर के द्वारा अंदर प्रवेश मिलता था। अर्थात लोग टिकट खरीद कर ही कार्यक्रम को देखने जाते थे। इस तरह कार्यक्रम तीन दिनों तक चला जिसमें कई नाटक दिन में तीन नाटक संपन्न हुए। शशि जी समय निकालकर एक दो बार राउंड लगाते और खुश होते की आदर्श छात्र मंडल ने बखूबी अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। शहर में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए थे। पोस्टर बनाने में मधुकर सरोज कोष्टा सिद्ध हस्त थे। जिनकी आज देश में कई जगह चित्र प्रदर्शनी लग चुकीं हैं।
1978- 79 के दौरान हमारे एक कहानी संग्रह क्रांति समर्पण में श्री मोहन शशि ने भूमिका लिखी थी। इस कहानी संग्रह में पिता पुत्र की कहानियां थीं। श्री रामनाथ शुक्ल श्रीनाथ मेरे पिताजी थे। मिलन में मैं वर्षों कोषाध्यक्ष रहा। नौकरी की वजह से मैं इस शहर से उस शहर जाता रहा। जब गृह नगर आता तो उनसे अवश्य मिलता। तबसे लेकर आज तक उनका सानिध्य मुझे मिलता ही रहा है।
हमने नगर ही नहीं प्रदेश में सांस्कृतिक एवं साहित्यिक वातावरण की अलख जगाने वाले एक पुरोधा को खोया है। ईश्वर उन्हें अपने चरणों में जगह दे।
साभार – श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’, जबलपुर
🙏💐ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृतिशेष मोहन शशि जी को विनम्र श्रद्धांजलि💐🙏
≈संस्थापक संपादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. इन्द्र बहादुर खरे
☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ ☆
☆ “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(73 वी पुण्य तिथि 13 अप्रैल पर शत शत नमन)
बड़ी भली है अम्मा मेरी
ताजा दूध पिलाती है।
मीठे मीठे फल लेकर
मुझको रोज खिलाती है।
अपने समय में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल उपरोक्त मनमोहक काव्य पंक्तियों के रचयिता, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविदस्व श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपनी साहित्य साधना से राष्ट्रीय स्तर पर जबलपुर को गौरवान्वित किया था। खरे जीने अपने साहित्यिक जीवन में गद्य और पद्य में जो कुछ भी साहित्य सृजन किया उसने उनके समय में तो अपार लोकप्रियता अर्जित की ही बल्कि वह आज भी चर्चित, पठनीय और प्रभावी है।
हितकारणी कालेज के प्रारंभिक काल के प्रसिद्ध प्राध्यापक, जबलपुर के माडल हाई स्कूल के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विजन के फूल और भोर के गीत जैसी अनेक काव्य कृतियों के रचियता स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपने समय में अनेक साहित्यिक पुस्तकों के प्रतिष्ठित लेखकों के रुप में चर्चित रहे हैं लेकिन यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने समय में ऐसी पाठ्य पुस्तकों की रचना की जो कि उनके समय में पाठ्यक्रम में न केवल शामिल की गई बल्कि उपयोगी और ज्ञानवर्धक भी सिद्ध हुईं। शिक्षा जगत के लिए काफी पहले भारत के गौरवशाली इतिहास से छात्रों को परिचित कराने के लिए भारत वैभव के नाम से 3 भागों में विभक्त पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल की गई थीं जिसमें भारत वैभव के भाग 3 की रचना स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे नेकी थी।
सुभाष प्रिटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक में 21 अध्याय शामिल किये गए थे जिसमें हमारा देश, भारतीय स्वतंत्रता, 1857 की जनक्रांति, गांधीजी और असहयोग आंदोलन, हमारी राजनीतिक प्रगति, बारडोली सत्याग्रह और सरकारी दमन, 1934 से 1941 और 1942 से 1947 तक का कालखंड, आजादी के बाद का घटना चक्र इत्यादि प्रमुख विषयों से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण बातें समझाईं गयी थी।
आज अगर हम इस पुस्तक की विभिन्न बातों पर ध्यान दें तो हम आज भी ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से इस पुस्तक को शिक्षा जगत के लिए प्रासंगिक और उपयोगी पाते हैं। इस सबंध में स्व. श्री खरे जी के सुपुत्र आदरणीय श्री अमित रंजन जी ने भी पुस्तक में लिखा है कि आदरणीय पाठक स्वयं तय करें कि 150 में लिखी पुस्तक आज भी कहाँ तक उपयोगी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्व श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की अन्य पठनीय और लोकप्रिय कविताओं को पूर्व में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था जिनमें बड़ी भली है अम्मा मेरी, ताजा दूध पिलाती है, शिक्षा जगत में काफी लोकप्रिय और प्रभावी मानी जाती थी।
भोपाल के संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन खरे परिवार के सहयोग से किया गया है। इस पुस्तक का आवरण पृष्ठ भारत के नक्शे में महात्मा गॉंधी के चित्र के साथ काफी आकर्षक लग रहा है। इस पुस्तक के प्रकाशन से आदरणीय स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी का प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व और भारत के ऐतिहासिक महत्व की बातें दोनों ही दिल और दिमाग में ताजी हो गईं।
साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के ऐसे श्रद्धेय और प्रेरणा स्रोत पितृ पुरुष स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की पुण्यतिथि पर सादर स्मरण के साथ शत शत प्रणाम।
(पूर्वसूत्र- माझ्या नकळत्या वयापासूनच मनात रूजत गेलेला ‘त्या’च्या अस्तित्वाबद्दलचा विश्वास नंतरच्या असंख्य अनुभवांमुळे अधिकाधिक दृढ होत गेलेला आहे आणि माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीनंतरच्या काळातही वेळोवेळी मला जाणवत राहिलेला त्याचा अलौकिक स्पर्श माझं जगणं अधिकच अर्थपूर्ण करतो आहे!
त्या सगळ्याच अनुभवांबद्दल सविस्तर न लिहिता त्यातले प्रातिनिधिक ठरतील असे दोन अनुभव मात्र या संदर्भात मला आवर्जून सांगावेसे वाटतायत.)
पुण्याच्या ‘क्वेस्ट टूर्स’ तर्फे २०१६ साली आम्ही नॉर्थ ईस्टच्या ‘सेव्हन सिस्टर्स’ टूरला गेलो होतो तेव्हाची गोष्ट. प्रवास कालावधी २१ दिवसांचा. सहप्रवासीही आमच्यासारखेच प्रवासाची आवड असलेले. पहिल्या दिवशी परस्परांच्या औपचारिक ओळखीचा कार्यक्रम. नंतर अल्पकाळातच त्या ओळखी मनमोकळ्या गप्पांमुळे अधिकच घट्ट झालेल्या. पहिल्या दहा दिवसांचा एक टप्पा पूर्ण होऊन आता नागालँड, मणिपूर, त्रिपुरा आणि मिझोराम ही स्थळे बाकी होती. आमचा पुढचा मुक्काम होता नागालॅंडसाठी. त्याआधीचा ‘काझीरंगा’ अभयारण्याजवळ असलेल्या एका हाॅटेलमधील आमच्या वास्तव्यातला तो अखेरचा दिवस होता.
त्यादिवशी चेक आऊट करून आम्ही नागालॅंडला निघालो आणि अचानक दुधात मिठाचा खडा पडावा तसं झालं. मग तोवरचा आमचा आनंद, उत्साह सगळा नासूनच गेला. कारण ध्यानीमनी नसताना नागालॅंड बाॅर्डरच्या अलिकडे असलेल्या चेकपोस्ट जवळ आमची टुरीस्ट बस अडवली गेली. नागालॅंडमधे दोन दिवसांपासून कांही मागण्यांसाठी आंदोलन सुरू होतं ज्याला नेमकं आजच अचानक हिंसक वळण लागलं होतं म्हणे. पाठोपाठ नुकतेच दोन बाॅंबस्फोटही झाल्याने १४४ कलम जाहीर होऊन संचारबंदीची घोषणा झाली होती. त्यामुळे पुढे अर्थातच ‘नो एंट्री’! नाईलाजाने बस परत फिरली. आम्हाला पुन्हा आधी चेक आऊट केलेल्याच हाॅटेलवर घेऊन आली आणि अखेर उर्वरीत दहा दिवसांची टूर रद्द होऊन सर्वांची परतीच्या प्रवासाची तयारी सुरू झाली.
अचानक असं विघ्न येऊन टूर अर्धवट सोडून घरी परत फिरावं लागल्याने आम्हा सर्वांचाच विरस झाला पण त्याला पर्याय नव्हता. कदाचित हेच हिंसक वळण आणि संचारबंदी आम्ही नागालँडमधल्या हॉटेलमधे चेकइन केल्यानंतर उद्भवली असती तर? त्या परिस्थितीत याहीपेक्षा भयंकर असं कांहीही घडू शकलं असतं. परिस्थिती अनिश्चित काळापर्यंत चिघळलीही गेली असती आणि आम्ही बंद दाराआड तिथं अडकून पडलो असतो. त्यापेक्षा हे बरं म्हणत आहे ते स्वीकारण्याशिवाय पर्याय कुठे होता? माझ्यासाठी मात्र ते तेवढंच असणार नव्हतं. मी ट्रीप अर्धवट टाकून असं परत यायची वेळ आलीच नसती तर त्यामुळे पुढच्या आयुष्यभराचं सगळंच स्वास्थ्य मी हरवून बसलो असतो असं वाटायला लावणारं एक आक्रित तिथं घरी माझी वाट पहात होतं! मला घरी जाईपर्यंत त्याची कल्पना नव्हती एवढंच!
आम्ही मधेच कां परत येतोय ते तिथून निघाल्यानंतर घरी मोघम कळवून ठेवलं होतं. त्यामुळे आम्ही रात्री लवकर घरी पोचल्यावर सलिल/अनघाशी आधी जुजबी चर्चा झाली ती त्यासंबंधीच. पण कां कुणास ठाऊक ते दोघे नेहमीसारखे मोकळे वाटत नव्हते. जेवणं आवरून आम्ही दोघे बॅगा आवरायला आमच्या रूममधे आलो तसे पाठोपाठ सलिल/अनघाही आले.
” बाबा, तुम्ही टेन्शन घेणार नसाल तर एक सांगायचंय. ” सलिल म्हणाला.
” असं कां विचारतोयस? काय झालंय? “
“कोल्हापूरहून उदयदादाचा परवा फोन आला होता. पुष्पाआत्याबद्दल. “
“कां रे? पुष्पाताई बरी आहे ना…? ” हे विचारतानाही माझा आवाज थरथरतोय हे लक्षात येताच मनात येऊ पहाणाऱ्या कुशंका मी झटकून टाकल्या…
उदय माझ्या पुष्पाताईचा मुलगा. काळजी करण्यासारखं कांही असल्याशिवाय तो असा फोन करणं शक्यच नव्हतं.
“सांग ना,.. काय झालंय? ”
सलिलनं सांगितलं ते ऐकून माझ्या काळजाचा ठोकाच चुकला. पुष्पाताईचं डाव्या हाताच्या अंगठ्याजवळचं बोट खूप दिवसांपासून दुखत होतं. अलिकडे त्या बोटाला सूजही येऊ लागली म्हणून लगेच ऑर्थोपेडिकला दाखवलं. ट्रीटमेंट सुरू झाली. ट्रीटमेंटनंतरही बोटाचं इन्फेक्शन वाढतच गेलं. त्या बोटाच्या हाडाचा भुगा होऊ लागलाय हे लक्षात आलं आणि मग नाईलाजाने ते बोट कापायचा निर्णय झालाय. परवा सोमवारी कोल्हापूरला आॅपरेशन करायचं ठरलंय. सलिलने सांगितलं त्याचा हा सारांश.
ऐकता ऐकता मी गंभीर झाल्याचं लक्षात येताच सलिल म्हणाला,
“बाबा, जवळच्या बोटांपर्यंत इन्फेक्शन पोचू नये म्हणून हे आॅपरेशन आवश्यक आहे म्हणालेत डाॅक्टर. आत्ता नऊच तर वाजतायत. आत्या अजून झोपली नसेल. तुम्ही आत्याशी फोनवर बोला हवंतर. तुम्हा दोघांनाही बरं वाटेल. “
” नको. मी उद्या सकाळी लवकरच कोल्हापूरला जाऊन समक्षच भेटतो तिला. तरच माझं समाधान होईल… “
मी वरवर शांतपणे म्हणालो खरं पण रात्रभर माझ्या डोळ्याला डोळ्या नव्हता. आम्हा सर्व लहान भावंडांसाठी तिच्या कोवळ्या वयापासून परोपरीने झटणाऱ्या आमच्या या बहिणीचं माझ्या आयुष्यातलं स्थान ती अशी संकटात असताना मला नव्याने जाणवलं! हे दुखणं आणि ऑपरेशनचा निर्णय सगळं हू़ की चू न करता नेहमीच्याच अतिशय शांत आणि धीरोदात्तपणानं तिनं स्वीकारलं असेलही कदाचित पण मलाच ते स्वीकारता येईना. ट्रीप अर्धवट सोडून इथं आलो म्हणून हे आपल्याला आधीच सगळं समजलं तरी. एरवी ट्रीप निर्विघ्नपणे पूर्ण झाली असती, दहा दिवसांनंतर आपण आलो असतो, तर तिचं बोट कापून टाकलेला पंजाच पहावा लागला असता. नुसत्या कल्पनेनेही माझ्या अंगावर सरसरून काटाच आला! पण हे आधी आपल्याला समजून उपयोग काय? आताही वेगळं काय होणाराय? मी तिचं बोट थोडंसं वाचवू शकणाराय? उघड्या डोळ्यांनी पहात रहाण्याशिवाय काय करु शकतो मी?? अशाच सगळ्या नकारात्मक विचारांनी मन अधिकच अंधारून आलं. त्या रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली तरी स्वस्थता नव्हतीच. मी कांहीतरी करायला हवं होतं पण कांहीच करू शकत नव्हतो…! मनाच्या त्या असहाय, हतबल अवस्थेत प्रवासाने थकलेलं शरीर शांत झोपेसाठी आसुसलेलं पण मनात मात्र हे सगळे उलटसुलट विचार ठाण मांडून बसलेले. अर्धवट ग्लानी, अर्धवट जागेपण याच अवस्थेत माझी घुसमट वाढत चालली. त्यातच रात्र उलटली तरी मिटल्या नजरेसमोरची असंख्य काटेरी प्रश्नचिन्हं बोचतच राहिलेली! आणि.. आणि.. अचानक त्या प्रश्नांचा गुंता दिसेनासा होत अगदी पुसटसा असा एक चेहरा माझ्या मिटल्या नजरेसमोर क्षणभर तरळून अलगद विरून गेला न् मी शहारलो. दचकून जागा झालो. उठून बसत अलगद डोळे उघडले तेव्हा पहाटेचे ४ वाजून गेले होते. मन मात्र माझ्या मिटल्या नजरेसमोर क्षणभर तरळून गेलेल्या त्या चेहऱ्याभोवतीच घुटमळत राहिलं… आणि… आणि अचानक ओळख पटली! .. ते.. ते.. डाॅ. चंद्रशेखर परांजपेच.. हो… नक्कीच. पण मग माझ्या मनातल्या घुसमटीचा अर्थाअर्थी यांच्याशी काय संबंध? असंही क्षणभर वाटून गेलं आणि दुसऱ्याच क्षणी त्या प्रश्नाचं उत्तर दिल्यासारखा एक आशेचा किरण मला स्वच्छ दिसू लागला..!
यातून कांहीतरी चांगलंच निष्पन्न होणार असेल. नक्कीच. पण कसं? हे सगळे माझ्या मनाचे खेळच तर नसतील? पण परांजपे डाॅक्टरांचा विचार अलिकडे कणभरसुध्दा मनात नव्हता मग भास म्हंटलं तरी तो परांजपे डाॅक्टरांचा चेहराच कां?? …
हा.. हा ईश्वरी संकेत तर नसेल? हा प्रश्न मनात उभारला आणि तोच मला मी याक्षणी काय करायला हवं त्याची नेमकी दिशा दाखवून गेला. आत्ताच्या माझ्या अस्वस्थतेचं कारण ठरलेल्या ताईच्या प्राॅब्लेमबद्दल सगळं मनापासून बोलून मन मोकळं करायला डॉ. परांजपेंखेरीज माझ्यासाठी दुसरं होतंच कोण?
डाॅ. परांजपे आमचे फॅमिली डॉक्टर. शांत. हसतमुख. अभ्यासू. हुशार. आणि विश्वासू! त्यांना पिढीजात चालत आलेला वैद्यकीचा वारसा तर मिळाला होताच शिवाय त्यांचं वेगळेपण म्हणजे त्यांनी आयुर्वेद(एम्. डी.) नंतर एम्. बी. बी. एस्. पदवीही प्राप्त केली होती. त्यामुळे आयुर्वेदीक औषधांचाच नव्हे तर गरजेनुसार अॅलोपथीचा उपयोगसुध्दा करु शकणारे डाॅ. परांजपे हे आमच्या माहितीतलं अपवादात्मक उदाहरण होतं! त्यांच्याशी बोलून निदान मनावरचं ओझं हलकं तरी होईल असं वाटलं आणि मी लगेच डाॅ. परांजपेना फोन करून त्यांच्या भेटीची तासाभरानंतरची वेळ ठरवली.
त्यांच्याकडे जाण्यासाठी बाहेर पडलो तेव्हा मनातला अंधार दूर करणारा त्यांच्या रुपातला तो आशेचा किरण त्या प्रकाशवाटेवर माझी सोबत करीत होता..! !
☆ शॉर्टकट… – भाग – २ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆
(स्वतःच्या आणि कुटुंबाच्या उज्वल भविष्याची स्वप्न पाहत चित्रानं आईचा, दीदी आणि भाईसाहेबांचा आशीर्वाद घेतला. भावांना जवळ घेऊन निरोप घेतला आणि मोठ्या हिमतीनं विमानात पाय ठेवला. दुबई एअरपोर्टवर सुरेंद्र सुलेखा तिला न्यायला आले होते. चित्रा सुखरूप दुबईला पोचल्याचा फोन आला तेव्हा सर्वांचा जीव भांड्यात पडला होता.) – इथून पुढे – –
साऱ्या विचारांनी, आठवणींनी शिणून राजश्रीला झोपाळ्यावरच डुलकी लागली. जाग आली तेव्हा सुनंदाबाई स्वयंपाक करून निघून गेल्या होत्या. रमेश येऊन त्याचं आवरून पेपर वाचत होता. राजश्री जागी झालेली पाहून त्यानं काळजीन विचारलं, ॓बरं वाटत नाहीये का? किती थकलेला दिसतोय तुझा चेहरा!॔
“ काही नाही. थोडी डुलकी लागली होती. देवाजवळ देवा लावते आणि जेवून घेऊया “ राजश्री उठत म्हणाली.
जेवण झाल्यावर राजश्रीने संध्याकाळी बँकेत कळलेली चित्राच्या अकाउंटची हकीगत रमेशला सांगितली. चित्रा चोरी करणार नाही याबद्दल दोघांचीही खात्री होती.
मग नेमकं काय झालं असेल? चार-पाच महिन्यात एवढे कसले पैसे जमा झाले असतील? अशा विचारांच्या आवर्तात केव्हातरी राजश्रीला झोप लागली. दुसऱ्या दिवशी लवकर उठून आवरून रमेश दौऱ्यावर चालला होता तेव्हाच राजश्रीलाही जाग आली होती पण तिला उठावसंच वाटेना. पुन्हा चित्राच्या विचारात ती बुडून गेली..
*****
सुरुवातीला आठवड्यातून एकदा चित्राचा ठराविक वेळी फोन येई तेव्हा तिची आई, भाऊ येऊन बसत. स्पीकरवर फोन ठेवला की साऱ्यांना तिचं बोलणं ऐकता येई. आणि तिच्याशी बोलताही येई. दुबईच्या कितीतरी गोष्टी ती उत्साहाने सांगत असे.
॓दीदी इथला एअरपोर्ट, रस्ते अगदी स्वच्छ आणि सुंदर आहेत. रस्त्यावर छान झाडं, फुलं आहेत आणि दिनेश रस्त्यावर इतक्या प्रकारच्या सुंदर मोटारी बघितल्या ना की मला तुझी खुप आठवण येते. किती प्रकारची गाड्यांची चित्रं तू जमविली आहेस. मी येताना आणीन आणखी चित्रं तुझ्यासाठी.
दीदी, सुलेखाताईची जागा पण आपल्यासारखी छान आहे. इथे मॉल्सपण खूप मोठे आहेत. ही दोघही मला बरोबर घेऊन जातात. आम्ही खरेदी करतो, खातो पितो. काळजी करू नका मी मजेत आहे.॔ असं उत्साहाने सांगायची तर कधी आपुलकीने दीदीची, भाईसाहेबांची चौकशी करायची. दहावीत गेलेल्या दिनेशला नीट अभ्यास करायलाही सांगायची.
घरकाम आणि स्वयंपाक या दोन्ही जबाबदाऱ्या चित्रानं घेतल्याने, सुलेखाला अगदी मोकळं छान वाटत होतं. गेली चार वर्ष स्वतः सगळं काम आणि नोकरी करण्यात तिची फार धावपळ झाली होती.
असाच एकदा चित्राचा ठरल्यापेक्षा वेगळ्या वेळी फोन आला होता. ॓दीदी इथे येऊन आता दोन महिने होऊन गेले. मी सुलेखा ताईला माझ्या होम सायन्सच्या कोर्सबद्दल विचारलं. माझी सर्टिफिकेट तिच्याजवळ दिली. पण सुलेखा ताई म्हणाली की तू येईपर्यंत इथलं शैक्षणिक वर्ष अर्धं संपून गेलं आहे. आता तू घरच्या कॉम्प्युटरवर दुपारी प्रॅक्टिस कर. काही नवीन माहिती मिळव.॔ हे सारं ऐकताना चित्राच्या आवाजातली निराशा झाली जाणवत होती.
त्या रात्री मुद्दाम फोन करून राजश्री सुलेखाशी बोलली. पण ॲडमिशनचे काही अवघड नियम गोड भाषेत सांगून सुलेखानं वेळ साजरी केली. पुढच्या वर्षीच्या ॲडमिशनची आत्ताच चौकशी करते असेही ती म्हणाली. पण राजश्रीच्या मनातही शंकेची पाल चुकचुकली. पूर्ण शैक्षणिक वर्ष फुकट गेल्याने चित्राचाही जीव हळहळत होता. तिला मुकाट्याने घर काम आणि बाजारहाट करण्यावाचून गत्यंतर नव्हतं. तिच्या पगाराचे पैसे मात्र सुलेखा नियमित पाठवत होती. तरी हळूहळू चित्राच्या फोनमधला उत्साह कमी होत असल्याचं राजश्रीला जाणवलं.
काल बँकेत कळालेल्या माहितीने तर राजश्रीला आणखीनच कोड्यात टाकलं होतं. सुलेखाला सकाळीच फोन करावा असं ठरवून राजश्री स्वतःचं आवरत होती. तेवढ्यात सुनंदाबाई आल्या त्या सांगतंच की, ॓अहो दीदी, चित्रा आज पहाटे अचानक घरी आलीय. तुम्हाला सर्वांना भेटावसं वाटलं म्हणून आले. इतकंच बोलली आणि डोक्यावर पांघरून घेऊन आडवी झाली. आज रात्री ती तुम्हाला भेटायला येणार आहे. माझ्याशी धड काही बोललीच नाही. तुमच्याजवळ बोलेल काहीतरी कदाचित !॔हे ऐकून राजश्रीला चांगलाच धक्का बसला. सुलेखानं साधं फोन करून चित्राच्या येण्याबद्दल कळवलंही नव्हतं. काय झालं असेल नेमकं? राजश्री विचारात पडली. आता रात्रीची आणि चित्राची वाट बघण्याखेरीज उपाय नव्हता.
चित्रा आल्यावर राजश्रीनं तिला स्वतःजवळ सोफ्यावर बसवून घेतलं. पाठीवरून हात फिरवला आणि प्रेमानं विचारलं,॓ बरी आहेस ना बेटा?॔ पण राजश्रीच्या या प्रश्नावर चित्रा बांध फुटल्यासारखी गदगदून रडू लागली. राजश्रीने तिला थोडं रडू दिलं. शांत झाल्यावर चित्रा म्हणाली, ॓दीदी, माझ्या हातून मोठी चूक झालीय. मला क्षमा करा. मी तुमचा माझ्यावरचा विश्वास मोडलाय. काय आणि कसं सांगावं तेच कळत नाहीये….. पण आता मला सगळं सांगायलाच हवं.
तिथे माझा सगळा दिवस कामात जात होता पण रात्री मात्र माझ्या खोलीमध्ये झोपायला गेल्यावर तुमच्या सर्वांच्या आठवणीनं मला फार रडू यायचं. एकटं.. एकटं वाटायचं. तिथे खायला प्यायला कमी नव्हतं पण ज्या उद्देशाने मी इथे आले होते त्या माझ्या शिक्षणाचं काहीच पुढे होत नव्हतं.
सुट्टीच्या दिवशी त्या दोघांबरोबर मला फिरायला मिळायचं. चकचकीत, डोळे दिपवणाऱ्या त्या श्रीमंत जगाचं दर्शनही मोहात पाडणारं होतं. त्या दोघांबरोबर मी पहिल्यांदा मॉलमध्ये गेले तेव्हा त्या उंच सरकत्या जिन्यांवरून मला सावरण्याच्या निमित्तानं सुरेंद्रने माझा हात दाबून धरला, तेव्हाच त्याचा स्पर्श मला वेगळा वाटला. मग लक्षात यायला लागलं की, सुलेखाताई अंघोळीला गेली असेल तेव्हा स्वयंपाकघरात काहीतरी मागायच्या निमित्ताने येऊन तो मला जाणूनबुजून स्पर्श करायचा. दीदी, खरं सांगते इथे तुमच्याकडे मला कसलीच भीती वाटली नाही. भाईसाहेबांबद्दल तर नेहमी आदरच वाटला. पण तिथे सुरेंद्रचं लागट वागणं जाणवायला लागलं होतं.॔
चित्रा पुन्हा हुंदके देऊन रडू लागली. चित्राच्या डोळ्यांपुढे तो पहिलाच प्रसंग उभा राहिला…
एकदा सुरेंद्र अचानक ऑफिसमधून लवकर घरी आला. सुलेखाताईला घरी यायला अजून वेळ होता. आपण सोफ्यावर बसून कादंबरी वाचण्यात गढलो होतो. वॉश घेऊन आल्यावर सुरेंद्रनं बॅगेतून एक छान मोठं चॉकलेट काढून आपल्या पुढे धरलं. चॉकलेट घ्यायला हात पुढे केल्यावर तो म्हणाला, ॓अगं, नको. पुस्तक वाचतेयस ना? ते खराब होईल. मीच देतो तुला… असं म्हणत त्यानं अगदी जवळ बसून आपल्या तोंडात चॉकलेट भरवलं. आपण वाचत असलेल्या कादंबरीत नुकताच अशा प्रकारचा प्रसंग रंगवला होता. त्यानं लावलेल्या भारी सेंटचा मंद सुवास, तोंडात विरघळणाऱं चॉकलेट, त्याची भुरळ घालणारी नजर सारं मोहात पाडणारं होतं. त्याच्या मिठीला आपण केलेला प्रतिकार लटका आहे हेही त्याच्या केव्हाच लक्षात आलं होतं…
पण हे सगळं दीदीला कोणत्या तोंडानं सांगणार?
हुंदके थांबल्यावर चित्रा दीदीला एवढंच म्हणाली, दिवसेंदिवस दिवस त्याची लगट वाढत चालली होती. आणि मी कबूल करते की माझाही पाय मोहाच्या घसरगुंडीवर पडला होता. मला सावरायला कुणी नव्हतं.
सुरेंद्र– सुलेखा ताईच्या लग्नाचा वाढदिवस जवळ आला होता. खरेदी करायला आम्ही तिघं एकत्रच गोल्डसुक मार्केटला गेलो होतो. सोन्याचा तो चमचमणारा बाजार पाहून डोळे दिपून जात होते. ताईंची पसंती चालली होती. मीसुद्धा मला आवडलेला एक सोन्याचा नेकलेस पुन्हा पुन्हा गळ्याला लावून बघत होते. मागच्या आरशात पाहिलं तर सुरेंद्र ॓छान दिसतोय ॔ अशी पसंतीची मान डोलावत, मोठ्या डोळ्यांनी माझ्याकडेच पाहत होता. दोन-चार पगार आपल्याला इथेच द्यायला सांगून तो सेट खरेदी करता आला तर किती छान होईल, या विचाराने झोपेतसुद्धा मला तो हार दिसत होता.॔
थोडं थांबून, पाणी पिऊन चित्रा पुढे सांगू लागली, ॓एखादं सामान आणायचं राहिलं असलं तर मी आमच्या घराजवळ असलेल्या स्टोअरमध्ये जात असे. तिथेच माझी आणि हमीदाची चार-पाच वेळा गाठ पडली होती. ती सुद्धा काही सामान घ्यायला स्टोअर मध्ये यायची. तिच्याशी बोलताना कळलं की तीही हैदराबादहून इथे एका कुटुंबात काम करण्यासाठी आली होती. तिला आठ नऊ भावंडे होती. वडिलांच्या बांगड्या विकण्याच्या व्यवसायात त्यांचं भागत नव्हतं. कुणाच्या तरी ओळखीनं ती दुबईला आली होती. साधारण माझ्याच वयाची होती. इथे तिला घरकाम पुष्कळ होतं. फक्त नियमितपणे तिच्या घरच्यांना तिचा पगार मिळत होता आणि हमीदाला पंधरा-वीस दिवसांनी अम्मीशी फोनवर बोलता येत होतं.
त्या दिवशी सामान घ्यायला मी स्टोअरमध्ये गेले तर हमीदा भेटली. कोणीतरी बोलायला भेटलं म्हणून बरं वाटलं. ॓ठहरोना हमिदा. साथ जायेंगे.॔ असं म्हणत तिला थांबवून माझं सामान घेऊन झाल्यावर आम्ही बरोबर निघाले. थकल्यासारखी दिसणारी हमीदा पावले ओढीत सावकाश चालत होती.