(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
आज प्रस्तुत है लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा दर्शाती सुप्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक सर्वश्रेठ लघुकथा – स्टिकर। हम आपके साथ भविष्य में भी श्री कमलेश भारतीय जी की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ आपसे साझा करते रहेंगे। कृपया आत्मसात करें।
☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा : स्टिकर ☆
एक पार्टी के लोग मुझसे चंदा मांगने आए । उनके भले चेहरों को देखकर मैं इंकार न कर सका । चलते चलते वे अपनी पार्टी का स्टिकर भी ड्राइंगरूम में लगा गये । मैं विचारों से सहमत न होते हुए भी लोकलज्जावश चुप रह गया ।
अब जो भी आता, पहले मुझको, फिर स्टिकर को घूरने लगता । घुमा फिरा कर पूछ ही लेता कि क्या मैं फलां पार्टी का सदस्य हूं । मैं इंकार में सिर हिला देता । अगला सवाल फिर होता, यदि सदस्य नहीं तो क्या इस पार्टी के हमदर्द हो ? मैं मासूम सा इंकार फिर कर देता । फिर तो जैसे तोप का मुंह मेरी ओर हो जाता ।
मोटी सी बात कही जाती- जब सदस्य नहीं, हमदर्द नहीं, तो फिर चंदा किसलिए ?
अब मेरा माथा ठनका । यह मामूली सा स्टिकर मेरी जान का जंजाल बन गया । बात ठीक भी लगने लगी । यदि किसी पार्टी का स्टिकर मेरे ड्राइंगरूम में लगेगा तो मेरे ही विचारों का प्रतिरूप माना जायेगा । मैं मामूली से स्टिकर को अपना मुखौटा क्यों बनने दूं ? किसी की विचारधारा को मैं क्यों ढोता फिरूं ?
एक फैसले के तहत मैने चाकू लेकर स्टिकर को काट दिया और मुक्ति की सांस ली
(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास – बीच का आदमी… को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)
☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ४ ☆ श्री मदन शर्मा
(चित्र साभार – श्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)
≡ चार ≡
आशी के हल्का सा झंझोड़ते ही मैं उठ बैठा हूं। उसने हड़बड़ाहट मचा रखी है। मालूम भी नहीं पड़ा, सोचते सोचते कब आंख लग गई और हाथ में पकड़ी पत्रिका, कब बर्थ से नीचे जा गिरी।
वह बोली, ”बड़ी अजीब बात है! आप तो कभी, सफ़र में सोते नहीं थे। आज कैसे नींद आ गई और वह भी इतनी गहरी?”
”मैं, ढाई बजे तक तो जाग ही रहा था। उसके बाद का, कुछ पता नहीं!”
वह अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख, कहती है, ”बीस मिनट और रहते हैं हमारे डेस्टीनेशन तक पहुंचने मंे। आप फटाफट सामान इकटठा कराइये।”
कितने दिन बाद, आज इधर फिर से आना हुआ है। यहां का तो पूरा नक़्शा ही बदल गया है! क्या यह वही एस्टेट है?
नये तामीर हुए, पीले से दुमंज़िला क्वार्टरों की क़तारें, दूर दूर तक नज़र आ रही हैं। पुराने क्वार्टरों की भी काया पलट हो गई लगती है।
पार्क, स्कूल और चिकित्सालय, सभी का निर्माण, नये सिरे से हुआ है। कई एक नई सड़कें, चैक और दुकानें भी दिखाई पड़ रही हैं।
इस दौरान, अर्चना को, एक प्रमोशन मिल जाने के बाद, दो कमरों वाला बढ़िया-सा क्वार्टर मिल गया है। बहुत साफ़ सुथरा, आधुनिक बाथरूम। बिजली की फिटिंग भी मुकम्मल। दोनों कमरों में बिजली के पंखे भी लगे हैं।
बड़ी ही व्यस्त नज़र आ रही है अर्चना! सुबह, जब हम यहां पहुंचे, थ्री व्हीलर की आवाज़ सुनते ही वह ‘आ गये!’ कह कर भागती हुई आई और आशी से लिपट गई।
”मैं भी आया हूं।” मैंने कहा, तो वह लज्जित-सी, हाथ जोड़, मेरी ओर देखने लगी।
मैंने सस्नेह पूछा, ”इतनी दुबली कैसे हो गई?”
”यहीं बताना होगा सड़क पर?” वह हंस कर बोली और आशी को बांह से लपेट कर भीतर ले गई। मैं सामान सम्भालने लगा।
कितने सारे लोग, अर्चना ने एकत्रित कर लिये हैं। सभी, जैसे अपने घर का काम समझ, भाग दौड़ में लगे हैं। इनमें से कुछ ने मुझे पहचान कर हाल चाल भी पूछा है।
“अर्चना, कोई काम मुझे भी तो बताओ।”
”क्या बतांऊ?” उसने थकान भरे चेहरे पर मुस्कान लाते पूछा।
“मुझे भी तो कुछ करना चाहिये।”
वह सोचने लग पड़ी। फिर बोली, ”आप दोनों इस अवसर पर पहुंच गये, मेरे लिये यह बहुत बड़ी बात है। सफ़र से थके होंगे, थोड़ा आराम कर लें।”
“वाह! मैं यहां आराम करने आया हूं।”
”तो ठीक है। आप बस, सभी ओर थोड़ी नज़र रखिये। जहां गड़बड़ दिखाई दे, वही सम्भाल लीजिये। देखिये, किसी मूर्ख ने कितने ग़लत मौके़ का रिक़ार्ड लगा रखा है!”
अरूणा, ज़मीन पर बिछी दरी पर, मैलेे-कुचैले कपड़े पहने, सिर झकाये बैठी है। वह समूची ही, पीली पीली-सी दिखाई पड़ रही है। शायद कुछ ही देर पहले, उसे उबटन लगाया गया है। लड़कियां विवाहोत्सव वाले गीत गाने में व्यस्त हैं। दो एक साथ मिलकर, ढोलक पर थाप दे रही हैं।
अरूणा, दृष्टि ज़रा सी ऊपर उठाती है। हाथ जोड़ती है और फिर गरदन झुका लेती है।
“अरूणा, ठीक हो न?”
वह तनिक सा सिर, फिर ऊपर उठाती है।
”पगली! रोती क्यों है?”
वह टप्टप् आंसु गिराती जा रही है।
बारात आ गई है… वरमाला हो रही है… सेहरा पढ़ा जा रहा है… बारात खाना खा रही है… बेदी तैयार हो रही है… पंडित जी पूजा की तैयारी कर रहे हैं… लड़के को बुलाइये… मंत्रोच्चारण जारी हैं… कन्या को लाइये… अरे फ़ोटोग्राफ़र कहां गायब हो गया?… फेरे हो रहे हैं… वर-वधु को शिक्षा दी जा रही है… सभी की आंखांे में धुआं, घी और डालो, थोड़ा और…
सुबह हो गई है… बारात नाश्ता कर रही है… सामान, बस की छत पर चढ़ाया जा रहा है। अब रस्सों से बांधा जा रहा है…
अरूणा की विदाई हो रही है। वर का पिता, थैली से कई मुटिठयां सिक्के निकाल, बस की छत के ऊपर से उछाल देता है…
अरूणा को विदा कर, अर्चना, चारपाई पर टूटी डाल की तरह गिर गई है।
आशी उसे राय देती है, ”थोड़ा सो लो।” वह कहना मान लेती है मगर पांच मिनट बाद ही, वह उठ बैठती है।
“क्या हुआ?” आशी पूछती है।
”अभी तो बहुत काम पड़ा है!”
“कौन सा काम?”
”सामान वापिस करना है।”
आशी ग़ुर्राती है, ”चुपचाप लेटी रहो। हम लोग यहां क्या सिर्फ़ फ़ोटो उतरवाने आये हुए हैं?”
”आप दोनों, एक मिनट के लिये भी चैन से नहीं बैठ पाये।”
अभी कुछ ही देर पहले, यहां कितनी चहलपहल थी। और अब सभी ओर, शांत और उदास सा माहौल हो गया है!
मैं एक घंटा नींद लेकर उठ बैठा हूं। दूसरे कमरे में, आशी और अर्चना, बेसुध-सी पड़ी, गहरी नींद में हैं। कुछ देर पहले, खाने की छुट्टी का हूटर बजा था। फैक्टरी की ओर से, क्वार्टरों को लौटते हुए कर्मचारी, खिड़की में से नज़र आ रहे हैं।
उस दिन, अर्चना बड़ी नर्वस लग रही थी। सुबह उसके क्वार्टर से मैं उसे साथ लेता गया और उसे निश्चित स्थान तक पहंुचा कर, अपने सेक्शन में चला आया था।
मैंने रोज़मर्रा की तरह, वर्करों को काम बांट दिया। जिन्हें ड्राइंग या औज़ार चाहियें थे, स्टोर से दिला दिये। फ़ोरमैन के कमरे में जाकर, पिछली शाम तक की प्रोग्रेस बताई। कठिनाइयां और व्यवधान बयान किये। आगे के लिये ज़रूरी निदेश प्राप्त किये और अपनी सीट पर आकर, रजिस्टर आदि को ठीक ठाक करने लगा।
बीच में एक बार, अर्चना को देखने, उसके दफ़तर चला गया। वह कुर्सी पर चुपचाप बैठी थी। सामने मेज़ बिल्कुल साफ़ थी।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
”अभी तक तो किसी ने मुझे कोई भी काम नहीं दिया।”
“कोई बात नहीं। पहला दिन है न आज। चाय पी?”
”कैन्टीन वाला आया तो था। मगर मेरे पास गिलास नहीं था।”
“गिलास ले लेना था किसी से।”
”अच्छा थोड़े ही लगता, गिलास मांगना किसी से!”
“उधर मेरे पास एक स्पेयर पड़ा है, भिजवा देता हंू।”
”लंच टाइम में घर तो जाना ही है, लेती आउंगी।”
“ठीक है, घर से ही ले आना।” कहकर मैं चलने लगा, तो वह बोली, ”एक मिनट, दोपहर को घर तो मुझे साथ लेते जायेंगे न?”
“मगर मैं तो कैन्टीन में खाना खाता हूं। खैर मैं एडजस्ट कर लूंगा। एक बजे यहीं मिलंूगा।”
लंच टाइम का हूटर होने में अभी एक घंटा शेष था। मेरा कहीं से फ़ोन था।
फ़ोन पर मीता थी, जो बेहद घबराई लगती थी।
”आप इधर चले आइये।”
“बात क्या है?”
फ़ौरन चले आइये, प्लीज। आंटी ने फिर कुछ कर लिया है।”
“क्या?”
”टिकटुएंटी की शीशी।”
“माई गाॅड!… साहब बाहर से लौटे?”
”नहीं।” प्लीज़ कम इम्मीडीएटली, मैं बहुत…”
”घबराओ नहीं, अभी पहंुच रहा हूं, पांच मिनट में।”
यह मैं किस झंझट में पड़ गया! इन बड़े लोगों के कोठी-बंगलों में तो सुबह से शाम तक, जाने क्या कुछ होता रहता है। कैसे कैसे गुल खिलते रहते हैं!
ऐसे में पुलिस केस बन गया, तो? कहीं मैं स्वयं ही धर लिया गया, तो?
तो, क्या करूं? किनारा कर जाऊं?
मगर मीता?
मीता के भयभीत चेहरे की कल्पना कर, मैं तुरंत, फैक्टरी के मेनगेट से बाहर होकर, एन0 मोहन के बंगले की ओर भाग खड़ा हुआ।
बड़ी ही विकट स्थिति थी। एक ओर, मृत्यु के द्धार पर खड़ी आंटी और दूसरी ओर, अजीब हरकतें करती हुई मीता। लगने लगा, जैसे मृत्यु से पूर्व, आंटी अपना पागलपन, मीता को, धरोहर के रूप में सौंप जाना चाहती हैं।
“मीता, होश मे आइये!” मैंने उसे कंधे से पकड़ कर झकझोंर दिया। किंतु छूते ही, वह छोटे बच्चे की तरह, मुझ से लिपट कर रोने लगी।
मैंने तुरंत निर्णय ले लिया। मीता के साथ, थोड़ा सख़्ती से पेश आया और भागता सा हुआ, फैक्टरी-अस्पताल जा पहंुचा।
मैं सीधा लेडी डाक्टर के कमरे मेें जा पहुंचा। मुझे इस तरह अपने कमरे में देख, डाक्टर चिल्लाई, ”यह क्या है मिस्टर? आप उधर जाइये डाक्टर भट्टाचार्य के पास।”
“डाक्टर साहिबा, मुझे इस वक़्त आप की ही सहायता चाहिये, प्लीज़!”
”ठीक है, बोलिये, क्या तकलीफ़ है?”
मैंने इधर उधर देखा। डाक्टर ने बाकी पेंशेंट्स को थोड़ी देर के लिये बाहर जाने के लिये कहा।
“हां, अब कहिये।”
मैंने संक्षेप में, पूरी बात बता दी। सुनकर वह उचक सी पड़ी।
”कितनी देर हुई इस बात को?”
“पौन घंटा।”
”यह बात किसी और से तो नहीं कही?”
“मैं सीधा यहीं चला आ रहा हूूं।”
”अच्छा किया। चलिये, देखते हैं।” कह कर वह उठ खड़ी हुई।
बाहर निकल, उसने कतार में लगी स्त्रियों से कहा, ”मैं एक सीरियस पेशेंट को देख कर अभी आ रही हूं। आप लोग थोड़ा रूकिये।”
आंटी, इस बार भी बच गईं। मगर, इस तरह कब तक चल पायेगा, मैं यही सोचे जा रहा था।
लंच टाइम में, अर्चना मेरी प्रतीक्षा करके, अकेली ही घर चली गई थी। दोपहर के बाद, मैंने उससे क्षमा मांग ली। मगर उसे सही बात नहीं बताई।
शाम ढले, मैं फिर बंगले पर जा पहुंचा। सोचा, पता करूं, अब वहां क्या स्थिति है।
एन0 मोहन की कार गैराज में मौजूद थी। मैं सोच रहा था, अब मेरे भीतर जाने की ज़रूरत है भी या नहीं? मगर यहां तक आकर, लौट जाना भी मुझे कुछ ठीक नहीं लगा। क़दम आगे बढ़ाया।
बरामदे में पहुंचते ही, मुझे ठिठक जाना पड़ा। भीतर कुछ गड़बड़ लग रही थी।
एन0 मोहन मीता पर झुंझला रहा था, ”तुम्हारे जैसी मूर्ख लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”
“मगर मैं करती भी क्या?” यह मीता थी।
”तुम्हें लेडी डाक्टर के पास सीधे कान्टेक्ट करना चाहिये था। फैक्टरी फ़ोन करके, उसे बुलाने की क्या ज़रूरत थी?”
“मैं बुरी तरह नर्वस हो गई थी। कुछ सूझ ही नहीं रहा था।”
”और सूझा भी तो क्या!… कुछ तो सोचा होता। वह बाहर का आदमी है। बात कहीं भी लीक आउट हो सकती है।”
“नो… ही केन नेवर डू देट… मैं अच्छी तरह जानती हूं।”
”अच्छी तरह?”
“प्लीज़, ग़लत मतलब मत लगाइये।”
”मैं तो किसी की भी बात का ग़लत मतलब नहीं लगाता। मगर, वह एक सुपरवाइज़र है। जानती हो न, फैक्टरी में एक सुपरवाइज़र की क्या हैसियत होती है?”
“मैं तो मैनेजर की भी…”मीता न जाने, क्या कहने वाली थी। एन मोहन ने उसे वहीं डपट कर कहा, ”शटअप!”
मेरा वहां और अधिक खड़े रहना कठिन था। वापिस लौटने के लिये मुड़ने लगा, तो खटाक से दरवाज़ा खुला और वह ठीक मेरे सामने था।
”कम इन… कम इन प्लीज़।”
मैं झिझकता हुआ भीतर चला गया।
“बैठिये… आई एम रियली ग्रेटफुल… युडिड ए-लाॅट फ़ारमी।”
”नहीं सर, मैंने तो कुछ भी नहीं किया।”
“नो नो… बहुत ज़यादा किया। वरना कुछ भी हो सकता था। अब मैं जल्दी ही इसे किसी”अच्छे से मेंटेल हाॅसपिंटल भेजने की सोच रहा हूं… मैं भी कितना बदकिस्मत हूं! दोनों बेटे अमेरिका में हैं और यहां पर, यह चल रहा है!”
“आप धैर्य रखिये, सब ठीक हो जायेगा।”
”शायद ठीक हो जाये!” उसने जेब से रूमाल निकाल कर आंखों से लगा लिया। मालूम नहीं, उस रूमाल पर, उसकी आंखों की नमी का कोई अंश, चिपका भी या नहीं!
मैं अपने कैबिन में बैठा, प्रोग्रेस रिपोर्ट पर नज़र घुमा रहा था। पता चला, किसी का मेरे लिये फ़ोन है।
सोचा, मीता होगी।
फ़ोन पर मीता की नहीं, अर्चना की आवाज़ थी। वह अपने दफ़तर से बोल रही थी।
“क्या बात है?” मैंने पूछा।
”आप पांच मिनट के लिये इधर हमारे दफ़तर मेें आ सकेंगे?”
“उधर क्या है जी, आप के दफ़तर में?” मैंने मज़ाक के मूड में कहा।
”इधर मैं हूं और… एक बहुत स्वादिष्ट चीज़ घर से बना कर लाई हूं।”
“मैडम! यह फैक्टरी है। कोई फ़िल्म स्टूडियो नहीं!”
”एक ज़रूरी बात भी करनी है।”
“बात निःसन्देह ज़रूरी होगी। मगर देखो, मैं अभी एक बहुत ही ज़रूरी काम में उलझा हूं। शाम को छुट्टी के बाद, ज़रूरी बात कर लेंगे और वो आलू का परांठा, अचार भी है न?”
”नहीं, परांठे में अनारदाना डाला है।”
“ठीक है, रूमाल में बांध कर रख लो। मगर सिर्फ़ मेरे हिस्से का।”
न जाने मैं यह कैसे माने बैठा था, कि उन दिनों तेज़ी से घट रही घटनाओं के बारे में, कुछ एक को छोड़ कर, शेष सभी अनिभिज्ञ हैं। जबकि स्थिति, इसके पूर्णतः विपरीत थी।
किंतु जो कुछ वास्तव में था, वह चर्चित कुछ दूसरे ही ढ़ग से हो रहा था। निश्चित रूप से, उन काल्पनिक कथाओं में, मेरा नाम भी बराबर शामिल किया जा रहा था। हालांकि यह सब, मुझे थोड़ा बाद में मालूम पड़ा।
इस प्रकार की सूचनाएं फैलाने वाले, साधारणतया, अपनी कला में पर्याप्त निपुण हुआ करते हैं। ‘ऐसा मैं कह रहा हूं। ’ यह कोई भी नहीं कहेगा! ‘उसको, अमुक से यह बात कहते, मैंने अपने कानों से सुना है। ’ ऐसा कहने वाले, अनेक मिल जायेंगे!
तब, कभी कभी मैं यह सोच कर हैरान हो जाता, कि आखि़र मैं स्वयं कैसे इस झमेले में उलझ कर रह गया। कोई रिश्तेदारी नहीं। किसी के साथ बराबरी या मित्रता नहीं। अफ़सरों को मस्का लगाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। तब क्यों, मैं इस कंटीले जाल में फंसता ही चला जा रहा था।
किसी एक मामूली आधार पर, लोगों के अनुमान लगा लेने का ढंग भी, शायद अलग अलग ही होता होगा। अतः आधार को पूर्णतः नकारा जाना भी व्यर्थ ही था। देखने वाले, यह तो देखते ही होंगे, कि कितनी ही बार, शाम ढले, वर्कर काॅलोनी के एक कमरे वाले क्वार्टर में, मैं घंटों के हिसाब से, बातें करता और चाय-परांठा उड़ाता रहा था। जहां दो जवान बहनें, अपनी विधवा मां के साथ, सहमा सा जीवन व्यतीत कर रही थीं… अथवा उसी एस्टेट के एक अन्य भाग में, अर्थात बेंगलो एरिया की ओर, मैं चुपके चुपके जाता दिखाई पड़ता, जहां एक बड़े अफ़सर की भव्य कोठी के चैड़े से फाटक को धकेल कर, मैं बिना इधर-उधर देखे, भीतर प्रवेश करता… जहां वह बड़ा अफसर कार में बैठ कर, क्लब या बाज़ार गया होता। उसकी मेम साहिबा को, अकसर पागलपन का दौरा पड़ गया होता। और वहीं एक जवान और खूबसूरत लड़की, कोई चुस्त और भड़कीला लिबास पहने, लम्बे बरामदे में, फूलों के गमलों के समानांतर चहल क़दमी करती हुई, बार बार बाहर वाले गेट की ओर ताक रही होती…
”आज कुछ देर से नहीं पहुंचे?” मीता ने पूछा।
“क्या यहां भी फैक्टरी का मेनगेट है, जहां हूटर हो जाने के पांच मिनट से छह मिनट हो जाने के बाद, मायूसी का सामना करना पड़ जाये!”
उत्तर में वह मुस्करा पड़ी और बोली, ”आइये, अन्दर चल कर बैठते हैं।”
“चलिये… आंटी कैसी हैं अब?”
”पूरी तरह गुम हैं।”
“उन्हें मेंटल हाॅस्पीटल ले जाने को कह रहे थे।”
”अंकल इन दिनों खुद ही नार्मल फ़ील नहीं कर रहे। अपने आप थोड़ा बेहतर होंगे, तभी कुछ हो सकेगा। आप को आज, डिनर इधर लेना है। डु यु रिमेम्बर?”
“खाना तो, मैं खा चुका।”
”व्हाई? मैंने फ़ोन जो किया था?”
“साॅरी! बिल्कुल ही याद न रहा। फैक्टरी से लौटते ही हर रोज़ की तरह, खाना बनाने में लग पड़ा। पता नहीं कैसे भूल गया!”
”याद नहीं रहा, फिर इधर कैसे चले आये?”
“सच बताऊं? चार रोटियां पेट में पड़ जाने के बाद, मुझे कई भूली हुई बातें भी याद हो आती हैं।”
”तब ठीक है। हो सकता है, दो चपातियां और पेट में पहुंच जाने के बाद, कोई और अच्छी सी बात याद हो आये!”
मैंने कहा, ”एक बात तो बताइये?”
”नो, पहले मेरी एक बात का जवाब दीजिये।”
“ठीक है, पूछिये?”
”आप मुझे आंटी कह कर क्यों बात नहीं किया करते?”
अपनी हंसी पर सप्रयास नियंत्रण पाते, मैंने उत्तर दिया, ”ऐसी नौबत, आठ दस साल बाद तो आ सकती है!”
”डांेट यु फ़ील एशेम्ड? मैं छह सात साल छोटी हूं और मुझे आप-आप कह कर टीज़ करते रहते हैं!”
“ओह!”
”व्हाट ओह! मैं कितना शाई फ़ील करती हूं!”
“तो क्या कहा करूं?”
”मेरे नाम का प्रानाऊंसिएशन क्या इतना डिफ़ीकल्ट है?”
मैं सोच में पड़ गया… न जाने क्या कारण है, कि मैंने दूसरों के सामने हमेशा ही, अपने को सीमाओं में बांध कर रखा है और मालूम नहीं, क्यों मैंने अपने मान सम्मान की रक्षा के लिये, अपने दायरे, इस क़द्र तंग कर रखे हैं!
“अब क्या सोचते ही जायेंगे?… क्या सोचे जा रहे हैं, बताइये न प्लीज़?”
”सोच रहा हूं कि… मीता कह कर बात करूं, या साथ किसी अन्य शब्द का भी सम्बोधन के लिये प्रयोग करूं… या फिर मौसम के ठंडा-गरम होने का ज़िक्र करूं और फिर किसी दिन… विवाह का प्रस्ताव भी प्रस्तुत कर दूं!… अरे, क्या बात हुई? क्या हुआ?”
अनुमान था, मेरा मज़ाक सुनकर वह ठठा कर हंसेगी या हंसते-हंसते दोहरी हो जायेगी। किंतु वह तो देखते ही देखते, कितनी गम्भीर दिखाई पड़ने लगी थी। एक ही मिनट में, उसके चेहरे का गुलाबीपन अदृश्य हो चला था, जैसे किसी ने, बड़ी सिरिंज से, उसका पूरा रक्त शरीर से बाहर खींच लिया हो!
“हुआ क्या?” मैं काफी सहम गया था।
”कुछ नहीं? … कुछ भी तो नहीं।”
“कुछ नहीं? फिर ऐसा क्यों?… अरे, रोने क्यों लगीं? हुआ क्या? कुछ तो पता चले?”
उसने चेहरा, दूसरी ओर घुमा लिया।
”मीता!” मैंने धीरे से कहा।
“मुझे यहां से ले चलो… कहीं भी ले चलो… यहां मेरा दम घुटा जा रहा है… मैं अब यहां और नहीं रह सकती…”
”यह क्या हो रहा है!… प्लीज़, होश में आइये… देखिये, शायद बाहर कोई है।”
वह थोड़ा संतुलित हुई।
इधर-उधर झांक कर देखा, कोई न था।
वह टकटकी लगाये, मेरी ओर ताके जा रही थी।
अकस्मात ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी।
“यह क्या हो रहा है?” मैंने खीज कर पूछा।
”एक्टिंग! क्या ख़याल है, मुंबई पहंुच जाऊं, तो कोई छोटा मोटा रोल, किसी फ़िल्म में मिल सकेगा?”
“मैंने कोई फ़िल्म-कम्पनी नहीं खोल रखी।” मैंने जलभुन कर कहा।
”आप इसे रियल समझ गये थे न? सच बताइये, एक्टिंग अच्छी कर लेती हूं न?”
“यह एक्टिंग थी? मतलब क्या था इसका?”
”मतलब? पहले जो बताया था।”
“मैं नहीं मान सकता।”
”मानना, या न मानना, कुछ भी ज़रूरी नहीं। अच्छा, आप बताइये आप क्या पूछना चाहते थे?”
“मुझे याद नहीं।”
”आप काफ़ी नाराज़ हो गये लगते हैं!”
मेरी ओर से कोई उत्तर न पाकर वह कहने लगी, ”चलिये, मैं ही कुछ और पूछ लेती हूं।”
मैंने उसकी ओर देखा।
”आप अर्चना से शादी क्यों नहीं कर लेते?”
मैंने अब उसकी ओर तीखी निगाह से देखा और कहा, ”शायद यह नाटक का दूसरा अंक है!”
”नहीं, यह उसी सीन का, एक छोटा सा हिस्सा है!”
“एक अच्छी लड़की के बारे में, ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये थी।”
”मतलब, जिस लड़की से आप मैरेज करेंगे, वह अच्छी नहीं होनी चाहिये?”
“अजीब मज़ाक है!”
”एक बात मैं बता दूं, अर्चना से बेहतर लड़की आपको नहीं मिल सकेगी।”
“यह आप का ख़याल है?”
”ख़याल, जहां तक मैं सोचती हूं, खूबसूरत ही है!
“होगा!”
”होगा, मींस?”
“मींस… अगर मैं यह कहूं, कि अर्चना से बढ़कर एक और लड़की है, जो बेहद खूबसूरत है और मैं उसी से शादी करना चाहता हूं, तो यह ख़याल, पहले ख़याल से ज़यादा खूबसूरत नहीं होगा?”
”ख़यालात की खूबसूरती में तब भी कोई डिफ्रेंस नहीं आयेगा। मगर उस खूबसूरत लड़की के भारी भरकम अंकल के पास, एक छोटा सा खूबसूरत रिवाल्वर भी है, जो कभी कभी अचानक चल जाया करता है और जब चल जाता है, तो आवाज़ बिल्कुल नहीं होती!
”और कुछ?”
“इज़ इट नाॅट सफ़िशियेंट?”
”मीता, मुझे लगता है, बाहर कोई है।”
“नाइस! वेरी नाइस! डरपोक आदमी भी खूबसूरत लड़कियों को पा लेने के डिज़ायरस हैं!… हाऊ स्ट्रेंज!”
निःसन्देह मैं डरपोक था। तभी, अपने आप को चेतावनी दिये जा रहा था… यह खेल अच्छा नहीं। इसका परिणाम काफ़ी भयानक हो सकता है। इसलिये, जितना शीघ्र हो सके, यहां से भाग खड़े होना चाहिये। नौकरी छोड़ देनी चाहिये, या कम से कम, ट्रांस्फर के लिये तो तुरंत ही आवेदन पत्र दे देना चाहिये…
किंतु उस समय, मैं नौकरी नहीं छोड़ सका। ऐसा करना, तब शायद सम्भव ही न था। बल्कि यह शिकंजा, तो पल प्रतिपल, मेरे गिर्द और अधिक मज़बूत होता चला जा रहा था। इस जकड़न से, मैं कभी कभी बुरी तरह सिहर उठता। किंतु बेहद भयानक होने के बावजूद, उस सिहरन में भी एक आकर्षण था।
एक परिवर्तन अकस्मात ही देखने में आया। मुझे वर्कशाप से हटा कर, इंस्पेक्शन अनुभाग में पोस्ट कर दिया गया। मेरा यह स्थानांतरण, किस आधार पर हुआ था, यह किसी की भी समझ में न आया।
वैसे एक तरह से यह अच्छा ही हुआ था। यहां का वातावरण वर्कशाप के मुकाबिले कुछ बेहतर और शांत सा था। मशीनों का लगातार होने वाला शोर, प्रत्येक चार-पांच मिनट बाद, किसी न किसी की शिकायत। कोई छोटी या बड़ी समस्या, कोई नोंक झोंक, यहां पर इन सभी से निजात थी। इस नई सीट पर बैठ कर, सम्मानपूर्वक व्यवहार भी मिलता था। जो भी आता, विनम्र होकर ही बात करता। वर्कशाप से तैयार होकर आया सामान, यहां पर मेरे अधीन कर्मचारियों द्धारा पारित किया जाना अपेक्षित था। वे एक एक आइटम का निरीक्षण करते और मेरे हस्ताक्षर होने के बाद, वह लाॅट, पारित स्वीकार कर लिया जाता। पास हुआ सामान स्टोर में भेज दिया जाता और उसी पारित सामान की संख्या अनुसार वर्करों को रूपये की अदायगी कर दी जाती थी।
यहां पर, मेरे अधीन कुल सात वर्कर थे। मालूम पड़ा, ये सभी वर्करों से पैसा खाकर, सामान पास करते हैं। मैंने मन ही मन, निर्णय ले लिया, मैं इस धांधलेबाज़ी को समाप्त करके ही दम लूंगा। कोशिश करूंगा, मेरे अधीन एक भी कर्मचारी ऐसा काम न कर पाये।
किंतु मेरी इस कड़ाई का तो उल्टा ही प्रभाव देखने में आया। मेरे अधीनस्थ वर्कर, मेरे साथ ही सीधे मुंह बात नहीें कर रहे थे। वर्कशाप से बनकर आये सामान का जो भी लाॅट, किसी को चेक करने के लिये दे दिया जाता, वह उसी को पकड़ कर बैठ जाता। जल्दी करने को कहा जाता, तो तुरंत उत्तर मिलता, ”यह तो पूरे का पूरा लाॅट ही बेकार बना है। इसे कैसे पास किया जा सकता है!”
उधर ऊपर से ज़ोर पड़ता, ”काम क्यों नहीं निकल रहा?”
वर्कशाॅप वाले कहते, ”हमने तो कभी का तैयार करके भेज दिया है। पता नहीं, इंस्पेक्शन वाले क्यों होल्ड करके बैठै हैं।”
चेक करने वाले, काम में बीसियों नुक़्स निकाल देते… काम ड्राइंग के मुताबिक नहीं बना। ड्राइंग के हिसाब से ठीक है, तो कार्य या अपेक्षित परिणामनुसार संतोषजनक नहीं। यह भी सही है, तो फ़िनिश अच्छी नहीं आई!
एक बार मैंने झुंझला कर कहा, ”इस लाॅट को तो आज हर हालत में निकल जाना चाहिये।”
“हमें क्या है! उठा ले जाइये।”
”मगर पहले पास तो करो।”
“काम, जब बना ही ठीक नहीं, तो पास कैसे कर दें?”
”देखो, यह लाॅट तो निकाल ही दो।”
“हमने कब मना किया! ले जाइये। समझिये, सभी काम पास हैं। मगर हम नीचे साइन नहीं करेंगे।”
”वह कौन करेगा?”
“आप करेंगे और कौन करेगा!”
अर्चना का फ़ोन था।
”आज शाम आप हमारे यहां आ रहे हैं?”
“कोई विशेष बात है?”
”बहुत ही विशेष है।”
“अभी आ जाऊं, तुम्हारे दफ़तर में?”
”नहीं, यहां दफ़तर में नहीं।”
“क्यों? बड़ी अफ़सर बन गई हो?”
”ऐसा कहने का मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानूंगी। मगर यहां वह बात बताना बिल्कुल ठीक न होगा। फ़ोन रख रही हूं।”
शाम को अर्चना के क्वार्टर पर ही बात हुई।
“आप का एन0 मोहन से कोई झगड़ा हुआ था?”
”नहीं तो।”
“वह जेनरल मैनेजर से, आप के खि़लाफ कुछ उल्टा सीधा बोल रहा था। मैं तब एक लेटर साइन कराने गई थी। बस, थोड़ा सा ही सुन सकी।”
”क्या कह रहा था?”
“आप का नाम लेकर कह रहा था… यह आदमी तो बिल्कुल होपलेस है। फैक्टरी को काफ़ी नुक़्सान पहुुंचा सकता है। काम को देर तक अपने पास रोके रखता हैै और पैसे लेकर ही काम पास करता है।”
”उसने नाम मेरा ही लिया था?”
“बिल्कुल! मगर उसने ऐसा क्यों किया होगा? आप तो कभी इस तरह का काम नहीं करते।”
मुझे बार बार, वही दृश्य याद आ रहा था, जब मीता मेरे सामने, अपना असली या नक़्ली अभिनय दर्शाने में मस्त थी और मुझे बार बार, किसी के बाहर मौजूद होने का आभास हो रहा था और मीता ने उस समय मेरे पुरूषत्व पर ही छींटा कसा था।
तब कहीं, वही तो बाहर खड़ा हुआ, हमारी बातें नहीं सुन रहा था? अर्चना बोली, ”आप अधिक चिंता न करें। जेनरल मैनेजर भला आदमी है। वह कानों का कच्चा भी नहीं। बस, आप थोड़ा सतर्क ज़रूर रहें। कोई उल्टी सीधी बात होगी, तो पता चल ही जायेगा।”
कितने सहज भाव से वह यह बात कह रहीे थी। स्थिति गम्भीर होते हुए भी, मैं ज़रा सा मुस्कराया और कहा, ”दफ़तर की गोपनीय बातें बता कर, नियम भंग नहीं हो जायेगा?”
वह आवेश में आकर बोली, ”नियम भंग? कोई व्यक्ति, हमारे अपने ही विरूद्ध षडयंत्र रच रहा हो, तो क्या हम बिल्कुल आंखें मंूद कर बैठे रहेंगे?”
अरूणा का अनुरोध था, कि उसके हाथ से बना हलवा चख कर ही जाऊं। वह इस समय, मां के साथ, रसोइघर में व्यस्त थी। हलवे के लिये सूजी भूनी जा रही थी। भुन जाने की सुगन्ध, इधर मेरे नथुनों में पहुंच रही थी। तभी छन्न से, चाशनी छोड़ने और खट्खट् करके, हलवा घोंटने का स्वर भी क्रम से सुनाई पड़ा।
“क्या सोच रहे हैं?” अर्चना ने पूछा।
”कुछ नहीं।”
“मीता को मैंने बहुत दिन से नहीं देखा। कैसी है वह?”
”ठीक ही है। किसी दिन कोठी पर जाकर मिल आना उससे।”
“वहां अकेली जाते तो मुझे डर लगता है। किसी दिन वह उधर आप के क्वार्टर में आये, तो बताइयेगा, वहीं मिल लंूगी।”
”मेरे यहां तो वह अब तक, सिर्फ़ एक बार आई है।”
“ऐसा क्यों? मैं तो कभी भी पहुुंच जाती हूं वहां।”
”तुम्हारी बात और है।”
“हां, यह बात तो है। वे लोग ठहरे कोठी कार वाले!”
”कोठी कार वाले बेशक हैं, मगर जहां तक मीता की बात है, उसमें अहंकार नाम की चीज़ बिल्कुल नहीं। वह एक अच्छी लड़की है।”
“मुझे तो वह बहुत ही अच्छी लगती है। सुन्दर भी तो बहुत है।”
अरूणा ने, हलवे से भरी दो प्लेटें लाकर मेज़ पर टिका दीं और बोली, ”लीजिये, चख कर बताइये, कैसा बना है!”
“इतना!” मैंने भरी प्लेट देख कर कहा।
”इसी को इतना कह रहे हैं! आपने भी कमाल कर दिया भाई साहब! अरे, मैं चमच लाना तो भूल ही गई!”
वह लपक कर गई और दो चमच उठा लाई।
“बस झटपट खा डालिये। वरना, ठंडा हलवा खाने से तो न खाना ही भला।”
मैंने चमच भर कर मुंह में डाला।
”कैसा बना है? मीठा तो ठीक है न?” अरूणा ने पूछा।
किंतु मैं अरूणा की बात का उत्तर न दे पाया।
जीभ और तालू, बुरी तरह जल गये थे। आंखों में पानी आ गया।
“क्या हुआ?” अर्चना ने पूछा और फिर मेरी शक्ल देख और बात को समझ, वह अरूणा को झिड़क कर कहने लगी, ”पागल कहीं की! ठंडा करके नहीं ला सकती थीं?”
तब तक मैं सम्भल चुका था। कहा, ”भला इस बेचारी का क्या दोष! बेवकूफी तो मेरी थी, जो हलवा देख, बच्चों की तरह झपट पड़ा।”
अरूणा सहमी सी खड़ी थी। जैसे सचमुच उसी का दोष रहा हो! बड़ा तरस आया। मैंने दो एक इधर उधर की बातें कह कर, उसे हंसाने का भी प्रयास किया, किंतु वह उसी तरह लज्जित सी, सिर झुकाये ही खड़ी रही। फिर चुपचाप बाहर निकल गई। अर्चना फिर मीता की बात ले बैठी।
”कुछ भी हो, वह आप को बहुत मानती है।”
मैंने सिर हिलाकर उसकी बात का समर्थन किया।
“कभी कभी मैं सोचती हूं कि…”
”क्या सोचती हो, कभी कभी?” मैंने मुस्करा कर पूछा।
“मीता जैसी किसी लड़की से आप का विवाह हो जाये, तो कितना अच्छा हो!”
”मीता जैसी? मीता ही क्यों नहीं।”
”वे, बड़े लोग! इतनी बड़ी कोठी, शानदार कार, सोफे क़ालीन, टी वी. फ्रिज… हम तो चाहेंगे, उसी से हो जाये। मगर कहां! और फिर आप के वो मैनेजर!”
किंतु उस समय, मैं मैनेजर के बारे में कुछ भी न सोच, मन ही मन, अर्चना और मीता के बीच तुलना किये जा रहा था। अलग अलग परिवेश होने के बावजूद, दोनों में कितनी साम्यता थी।
”आप क्या सोचे जा रहे हैं?” नहीं खाया जाता, तो रहने दीजिये।
“नहीं, यह तो पूरे का पूरा खाकर ही रहूंगा।”
”भले ही मुंह जल जाये!”
“वह तो पहले ही जल चुका!” मैं कह कर हंसा।
व्ह मेरी ओर ताके जा रही थी। बोली, ”पहले इस प्लेट को ख़ाली हो जाने दीजिये, सोचना बाद में होता रहेेगा। वैसे आप सोच क्या रहे हैं?”
मैंने मुस्करा कर कहा, ”मीता जैसी लड़की के बारे में।”
वह पश्चाताप-सा करती बोली, ”मुझ से शायद ग़लती हो गई। सच मानिये, मेरा ऐसा कुछ भी कहने या मज़ाक करने का इरादा नहीं था।”
“मगर, मैंने तो तुम्हें कुछ भी नहीं कहा!”
”शक्ल से तो यही लगता है, कि आप मेरी बात का बुरा मान गये।”
“नहीं, मैंने बिल्कुल बुरा नहीं माना।”
”लेकिन, मैं किसी दिन मीता से मिलना ज़रूर चाहंूगी।”
“मिल लो।”
”मगर मिलूं कहां, यही समझ में नहीं आता।”
“दफ़तर में, दिन भर फ़ोन तुम्हारे पास मौजूद रहता है। बात करके, उसी से पूछ लेना, कि वह कहां मिलेगी।”
अर्चना के क्वार्टर से मैं बाहर निकला, तब काफी रात हो चली थी। कई कुत्ते, युद्ध की प्रारम्भिक तैयारी में, ग़ुर्रा रहे थे… कुत्तों पर कहे गये, कई मुहावरे, मुझे एक एक करके याद आने लगे, जैसे धोबी का कुत्ता…
इधर रात के समय, अब कम रौनक़ नज़र आने लगी थी। मौसम थोड़ा ठंडा और लुभावना-सा हो चला था। सड़क के किनारे, बराबर के फ़ासले पर स्थित खम्बों से लगे बिजली के बल्ब, मद्धम और ज़र्द-सा प्रकाश फेंक रहे थे।
सामने से तीन चार आदमी, झूमते चले आ रहे थे। नशा शायद इतना गहरा नहंीं चढ़ा था, क्योंकि मद्धम रोशनी में भी, उन्होंने मुझे पहचान लिया था।
”कहो बाबू, खूब सैरें हो रही हैं!”
बदबू का भभका, जैसे पूरे परिवेश में फैल गया। मैं चुप रहा और वे सभी हिनहिनाते हुए, समीप से निकल आगे बढ़ गये।
पीछे से कोई बोला, ”इस साले के तो मज़े ही मज़े हैं। दोनों तरफ एक साथ हाथ मारे जा रहा है!”
महीने के अंत में, काम के ढेर लग जाते। वर्कशाॅप से तैयार होकर आये सामान की कतारों से, अनुभाग का बड़ा कमरा पूरा भर जाता। कितने ही आइटम, बक्सों के भीतर, यों ही गडमड से पड़े रहते। मेज़ पर, उन्हीं कार्यों से सम्बंधित काग़ज़ों के गत्थे, पड़े फड़फड़ाते। उस महीेने में जितना काम तैयार हुआ होता उस पूरे के पास या रिजेक्ट होने की रिपोर्ट देना ज़रूरी था, क्योंकि उसी के आधार पर, वर्करों को रूपये का भुगतान करना होता था।
एसिसटेंट मैनेजर सहगल, सुबह ही सिर पर आ सवार हुआ।
”भई, इस काम का क्या हुआ?” वह शायद बहुत जल्दी में था।
“यह तो अभी चेक नहीं हो पाया।” मैंने बताया।
”चेक नहीं हुआ! महीना तो ख़त्म होने को है!” वह नाराज़ सा होता हुआ बोला।
“तो क्या हुआ, अगले महीने में बुक हो जायेगा।”
”वर्करों को पेमेंट होनी है मिस्टर!” उसने चेतावनी सी दी।
“तो आप ही बताइये, क्या करूं?”
”मामूली काम है, ऐसे ही चलता करो।”
“बिना चेक किये ही?”
”अरे, इस में है ही क्या चेक करने को।”
“तब भी…”
”डरने की क्या बात है। मैं जो मौजूद हूं इधर। जब तक मैं बैठा हूं, घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। कहीं कोई गड़बड़ निकल भी आई, तो हाथ के हाथ ठीक करा दूंगा… यू डोंट वर्री एट आल। आई विल वी रिसपांसिबल।”
साहब लोगों का आदेश कैसे टाला जा सकता था। दरिया में रहकर, मगरमच्छ से वैर, कैसे निभ सकता था। फिर वह तो पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले रहा था। मैंने काग़ज़ात पर हस्ताक्षर किये और माल छोड़ दिया।
मैंने रिसीवर उठा कर कान से लगाया। अर्चना की आवाज़ थी।
“आप को मीता से मिले कितने दिन हो गये?”
”कई दिन पहले मिला था। क्या बात है?”
“मुझे लगता है, वह कुछ ठीक नहींे है।”
”मतलब, बीमार है?”
“शायद।”
”तुम्हें कैसे पता चला?”
“मैंने यहां से उसे फ़ोन किया था। उसकी आवाज़ से मुझे ऐसा ही लगा, जैसे बीमार होने की वजह से, बेहद कमज़ोर हो गई हो।”
”मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं!”
“चलिये, शाम को उधर हो आयें।”
”ठीक है, छुट्टी के बाद, यहां से सीधे निकल लेंगे।”
“ओ0 के0 मैं आप को मेनगेट के पास मिलंूगी।”
इस क्षेत्र में सब से अधिक भीड़, शाम को छुट्टी के समय, फैक्टरी गेट से क्वार्टरों की ओर जाने वाली सड़क पर ही नज़र आती थी। कई हज़ार कर्मचारी, रेलों की शक्ल में, गेट से निकल कर, मुख्य सड़क पर पहुंचते, तो जैसे कोई बड़ा मेला या भारी जलूस ह ीनज़र आने लगता। यद्यपि यह सारी रौनक, पांच-सात मिनट में ही, कभी कभी कितनी अनहोनी-सी घटनाएं, अकस्मात ही घट जातीं। ऋृण वसूल करने वाले लाला या पठान कम वेतन पाने वाले मज़दूरों से इसी दौरान भेंट किया करते। राजनीति पर गरमागरम बहस। फैक्टरी के भीतर से ही पीकर आने वालों के बीच गाली गलौज, मुंह में पान बीड़ी ठोंसे, ज़ोर ज़ोर से हंसते और खुले आम चीख़ चीख़ कर वह सभी कुछ कहते, जो सड़क पर चलते हुए, नहीं कहा जाना चाहिये।
…जलूस, एक ख़ामोश जलूस, या बेहद शोर मचाता हुआ लम्बा जलूस… मशीनी लोगों का मशीनी जलूस!
अर्चना, मेनगेट से थोड़ा हट कर, मोड़ के पास खड़ी, मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। वह वहां मुझ से थोड़ा सा पहले पहुंच गई थी, क्योंकि लड़कियों को, हूटर से पांच मिनट पहले, मेन गेट से बाहर निकल जाने की अनुमति थी।
हम दोनों को, उस जलूस के साथ साथ चलने में अटपटा सा महसूस हो रहा था। आगे चलने वाले भी, पीछे घूम कर हमें बारबार देखे जा रहे थे। आसपास चलते कुछ सज्जन, अपनी मुस्कराहट को दबाने का प्रयास किये जा रहे थे, या एक दूसरे को संकेत से कुछ बताना चाह रहे थे।
चैराहे से थोड़ा इधर, मोची अपने निश्चित स्थान पर बैठा दिखाई दिया, तो अर्चना ने कहा,
”मुझे ज़रा अपनी चप्पल ठीक करानी है।”
“करा लो, मैं तब तक, स्टोर से एक दो चीज़ों का पता कर लंू।”
”चीज़ें साथ लिये फिरेंगे?”
“ख़रीद कर वहीं रख छोडूंगा और लौटते हुए उठा लूंगा।”
”अच्छी बात! जल्दी आइयेगा।”
इसी बीच, भीड़ गु़ज़र चुकी थी, अर्चना की चप्पल का स्ट्रैप ठीक हो गया था और मेरा स्टोर का काम भी हो गया था।
स्ट्रीट लाइट जल चुकी थीं। हर शाम की तरह, इस ओर की सड़कें, वीरान नज़र आने लगी थीं।
“वही कोठी है न, सामने वाली?” अर्चना ने पूछा।
”वही है। तुम तो एक बार पहले भी आ चुकी हो यहां।”
“हां।”
अर्चना कुछ और न कह पाई। उसे ही नहीं, मुझे भी अनिल की याद आ गई। कोठी की सीमा में प्रवेश करते, अर्चना ने कहा, ”यहां तो बिल्कुुल सुनसान पड़ा है!”
“यहां अकसर ऐसा ही रहता है।”
”मैनेजर साहब की कार भी दिखाई नहीं दे रही।”
“कहीं गये होंगे।”
तीन बार घंटी का बटन दबाने पर भी, दरवाज़ा नहीं खुला। एक बार लगा, जैसे कोई दरवाज़े तक आकर, पीछे लौट गया हो।
”मामला क्या है, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा!” अर्चना ने कहा।
“यही मैं सोच रहा हूं!”
”लौट चलें?”
“वही ठीक रहेगा।”
उसी समय, पीछे की ओर से घूम कर, बाहर ही बाहर से, नौकर आता नज़र आया।
”साहब तो नहीं हैं।” वह अर्चना से बोला।
“मीता जी भी कहीं गई हैं?”
”जी नहीं। वह तो…“ वह झिझक रहा था।
“अन्दर हैं या नहीं?” अर्चना ने पूछा।
”जी, हैं तो अन्दर ही।”
यहां पर पहली बार इस प्रकार का व्यवहार देख, मुझे आश्चर्य हो रहा था। अर्चना के साथ होने के कारण, मुझे लज्जा भी आ रही थी।
अर्चना ने उकताये से लहज़े में मुझ से पूछा, ”क्या पहले भी यहां ऐसा ही हुआ करता है?”
मैंने उत्तर दिया, ”ऐसा तो आज, पहली बार ही देख रहा हूं!”
अर्चना ने नौकर से पूछा, ”मीता जी मिल सकती हैं या नहीं?”
तभी भीतर से आवाज़ आई, ”इन्हें पीछे के दरवाज़े से अन्दर ले आओ।”
आवाज़ तो मीता की ही है! मगर, यह कैसा स्वर है?
मैं चकित था और अर्चना बेहद सहमी हुई।
अंधेेरे में, पीछे के रास्ते से, पेड़ों से गिरे पत्तों को रौंदते हुए, हम आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़े।
भीतर वाले बरामदे का बल्ब कम पाॅवर का था। एक कमरे का दरवाज़ा खुला था। नौकर ने हमें उसी ओर चले जाने का संकेत किया और स्वयं न जाने कहां ग़ायब हो गया।
अर्चना, जो अब तक मेरे बराबर चल रही थी, अब कुछ पीछे थी।
हम दोनों को ही झटका लगा था…
वह इस समय, कोई और ही दिखाई पड़ रही थी। किसी अस्पताल में महीनों से लगातार पड़ी बीमार स्त्री की तरह, जैसे उसके शरीर में, जिगर ने अपना कार्य करने से, बिल्कुल ही इन्कार कर दिया हो।
उसका चेहरा, ज़र्द या सफ़ेद… नहीं, जैसे हल्की स्याही सी पुत गई हो पूरे चेहरे पर!
वह फ़र्श पर बेसुध सी बैठी थी। सिर के बाल बिखरे हुए और बेतरतीब, उसके पहने लिबास की ही तरह। उसके शिकनों भरे लिबास में, आज किसी भी शौखी, तेज़ी या रंगीनी का कहीं नाम न था।
वह चुप थी। हमारी ओर उसने अभी तक देखा तक नहीं था। जैसे हमारी उपस्थिति से उसे कोई भी सरोकार न हो।
“मीता!” मैंने धीरे से उसे पुकारा।
उसने गर्दन उठा कर, बारी बारी से हम दोनों की ओर, निराशा से देखा। महसूस हुआ, वह किसी भी वक़्त बिलख पड़ेगी।
”मीता, बात क्या है?”
“क्यों आये हो यहां?”
ग़ौर किया, क्या ये शब्द मीता के मुख से ही निकले थे?
”चले जाओ… यहां से चले जाओ।” वह बेहद रूखी थी।
मैंने ठीक तरह से देखा, उसी के अधर हिले थे।
“मीता…?”
”भाग जाओ… दोनों भाग जाओ यहां से। अभी।”
मैंने अर्चना की ओर देखा। वह थरथर काँप रही थी। मेरी ओर देख, वह लड़खड़ाती सी आवाज़ में कहने लगी, ”चलिये, चले यहां से।” कह कर वह पीछे की ओर मुड़ने लगी।
”रूको तो।” कहकर मैं साथ वाले कमरे के दरवाज़े पर झूलते पर्दे की ओर बढ़ा।
पर्दा एक ओर हटा कर, भीतर झांका।
फ़र्श पर, आंटी लेटी थीं। बिल्कुल सीधी। तना शरीर, जिसमें तनिक भी जुम्बिश नहीं थी।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
मुंशी प्रेमचंद
संजय दृष्टि – हँसी
(३१ जुलाई को मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती थी। उन्हें नमन। बचपन में मुंशी जी की कहानी ‘घासवाली ‘ पढ़ी थी। उसकी नायिका के धुँधले-से अक्स और कहानी की पृष्ठभूमि ने बीस वर्ष बाद लिखी कविता को भी प्रभावित किया। मुंशी जी को समर्पित कविता साझा कर रहा हूँ। – कविता संग्रह- “चेहरे’ – प्रकाशन वर्ष- 2014)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.
His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.
His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.
Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.
Key Accolades and Works
Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.
Some precious moments of life
Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.
Today we present his satire The Luxury Housing Market.
☆ Witful Warmth# 98 ☆
☆ Satire ☆ The Luxury Housing Market… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆
Real estate developers have mastered the art of linguistic deception, turning architectural disasters into “luxury boutique living spaces.” If an apartment is described as “cozy,” it means you can fry an egg on the stove while lying on your bed. “Industrial aesthetic” translates to the builder forgetting to paint the concrete walls and leave the pipes exposed. They add a communal rooftop with two dying plants and suddenly the rent equals the GDP of a small nation. Young professionals spend seventy percent of their income to live in a glass box, listening to their neighbor’s alarm clock through the paper-thin walls. But it is all worth it because the lobby has a distinct signature scent and a concierge who judges your life choices every time you order takeout.
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)
मुंशी प्रेमचंद
☆ आलेख – समाज के शुभचिंतक प्रेमचंद: सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
(प्रेमचंद जयंती – 31, जुलाई)
प्रेमचंद हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ युगप्रवर्तक एवं समाज के शुभचिंतक कथाकार थे। उन्होंने विपुल संख्या में कहानियाँ, उपन्यासों, निबंधों आदि का प्रणयन किया, पत्र-पत्रिकाओं का सफल सम्पादन किया। आपका लेखन पूर्ण सोद्देश्य था। समाज की विकृतियों एवं समस्याओं का चित्रण कर उसे विशिष्ट आदर्श की ओर ले जाने के हेतु अपने विचारों में वे कहा करते थे कि‐- ‘ मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल, प्रपंच और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है। ‘ इससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद साहित्य के माध्यम से कुशलता से, कलात्मक रीति से समाज के शुभचिंतक व सुधारक थे। शुभचिंतक वही होता है, जो आलोचना भी करे और रास्ता भी दिखाए। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से यही कार्य किया। उनकी आलोचना में सहानुभूति निहित थी। वे गरीब का मज़ाक नहीं उड़ाते थे। गोदान उपन्यास का होरी हारता है पर उसकी मेहनत और इज्जत को लेखक सलाम करता है। वे महाजन, पंडित की निंदा करते हैं, पर नफ़रत नहीं फैलाते।
प्रेमचंद समाज को राजा- महाराजाओं की दृष्टि से नहीं अपितु गाँव की चौपाल, किसान के खेत, विधवा की रसोई और महाजन के बहीखाते से देखा। गोदान का किसान होरी, कफ़न के माधव की गरीबी सिर्फ दया का विषय नहीं, शोषण की व्यवस्था का परिणाम है। बूढ़ी काकी, ठाकुर का कुआं आदि अनेक कहानियों में दहेज, पर्दाप्रथा, विधवा विवाह व घरेलू हिंसा को सवाल बनाया। वे किसी विशेष वर्ग के लेखक नहीं थे। उन्होंने किसान, मजदूर,स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग, बेरोजगार युवा, वृद्ध, अनाथ, वंचित आदि सभी को साहित्य का नायक बनाया। आपने उन लोगों को आवाज़ दी, जिनकी पीड़ा समाज सुनना नहीं चाहता था। वे भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव से व्यथित थे अत: उनकी कहानियाँ सामाजिक अन्याय का प्रतिरोध प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने बताया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसका चरित्र और कर्म है।
प्रेमचंद का अधिकांश जीवन गाँव में व्यतीत हुआ था, अत: उनको गँवई गाँव का चितेरा कहा जाता है। ग्राम्य जीवन के हर पहलू का उनको व्यक्तिगत अनुभव था लेकिन शहरी जीवन व वातावरण से भी वे अछूते नहीं थे। शहरी झलकियाँ आपके गोदान व गबन उपन्यास में देखी जा सकती हैं। गबन उपन्यास में शहरी निम्न मध्यवर्ग का चित्रण है तो गोदान में उच्च वर्ग के जमींदार, मिल-मालिक, शिक्षित प्रोफेसर पार्टियाँ देते-लेते रहते हैं, शराब- कबाब आम चलता है, खुला खर्चीला जीवन बिताते हैं, कारों में घूमते हैं। उन्मुक्त भोग और स्वच्छंद विहार शिक्षित नारियों और पुरुषों का जीवन-सिद्धांत बनता जा रहा है। शिक्षित नारी पाश्चात्य रंग में रँगी फैशन की पुतली बन रही है, जीवन में स्वार्थ अधिक मात्रा में घुसता जा रहा है। इस प्रकार वे शहरी जीवन की अनेक झाँकियाँ प्रस्तुत करके सामयिक समाज और वातावरण का सच्चा चित्रण करते हैं,जिससे इनके साहित्य में युगधर्म की पूरी रक्षा होती है।
सारत: प्रेमचंद ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने साहित्य का लक्ष्य मनुष्य को ही माना और उसके समस्त भावों-विचारों, उत्कर्षों व अपकर्षों को चित्रित किया। आपका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता पूर्व था। उनकी कहानियाँ पुरानी नहीं लगतीं क्योंकि मुद्दे वही हैं– कर्ज, बेरोजगारी, नारी, धर्म की राजनीति, अंतर सिर्फ इतना है कि स्वरूप बदल गया है। जमींदार के स्थान पर काॅर्पोरेट आ गया है। अत: प्रेमचंद का शुभचिंतक होना यही था कि वे समाज को कोसते नहीं थे, समझते थे और समझदार उसमें मनुष्यता बचाने का प्रयास किया करते थे।
☆ आलेख ☆ ~ पाँच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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आज मेरे पांच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें है। इनमें श्री रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी, मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि’, जयशंकर प्रसाद का ‘कंकाल’, रामदेव धुरंधर का पथरीला सोना एवं विनोद कुमार शुक्ला की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी है।
एक पाठक के रूप में मैं जब मैंने इन चारों साहित्यकारों की इन पुस्तकों के कुछ अंशों को पढ़कर उनकी लेखन शैली, भाव प्रवर्षण पर एक तुलनात्मक दृष्टि डालने की कोशिश किया तो मेरे पाठक मन में जो चित्र अंकित हुए, वे कुछ निम्नवत थे ।
रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ की रश्मिरथी तृतीय सर्ग से
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” हो गया पूरा अज्ञातवास, पाण्डव लौटे वन में सहास,
पावन में कनक सदृश्य तप कर, विरत्व लिए कुछ और प्रखर,
नस-नस में तेज प्रवाह लिए, कुछ और नया उत्साह लिए।”
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” सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,
सुरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काटों मे राह बनाते हैं।”
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विशेष: राष्ट्रकवि की राष्ट्र भावना और भारतीय शौर्य उनकी लेखनी से, बारंबार उमड़ता है। विरत्व का प्रवाह काव्य की पंक्तियों में, योद्धा यह शौर्य का वंदन करता है। विषम परिस्थितियों में भारतीय जन मानस कैसे मार्ग प्रशांत करता है राष्ट्रकवि की कविताएं बोल पड़ती हैं।
मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि से (भाग – ३ खंड- २)
“अमरकांत का पत्र लिए हुए नैना अंदर आई, तो सुखदा ने पूछा -किसका पत्र है?
नैना ने खत पाते ही पढ़ डाला था।बोली- भैया का।
सुखदा ने पूछा -अच्छा उनका खत है ? कहां हैं?
‘हरिद्वार के पास किसी गांव में है।’
आज पाँच महीना से दोनों में अमरकांत के कभी चर्चा नहीं हुई थी मानो वह कोई घाव था, जिसको छूते ही दोनों के ही दिल काँपते थे ।
विशेष – संवाद ऐसे मनमोहन, मानो आंखों के सामने सब कुछ चल रहा हूँ। शैली ऐसी की कोई भी समझ ले। यही तो मुंशी प्रेमचंद का कथा लिखने का शिल्प है ।
जयशंकर प्रसाद की कृति कंकाल -७ से
किशोरी और उसकी सहेलियां स्नान करके लौट आई अब यमुना अपनी धोती लेकर बजरे से उतरी और बालू की एक ऊंची टेकरी के कोने में चली गई।
यह कौन ए काम था यमुना गंगा के जाल में पर डालकर कुछ देर तक चुपचाप बैठी हुई विस्तृत जलधारा के ऊपर सूर्य की उज्जवल करने का प्रतिबिंब देखने लगी जैसे रात के तारों की फूल -अंजलि जाह्नवी के शीतल वृक्ष पर किसी ने बिखेर दी हो ।
विशेष: सब कुछ विशेष ही विशेष संवाद मधुर । कथानक प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता को लेखक की कलम से निकलकर अपने ऊपर बिखरते हुए देखत है, शब्द पुष्प लगातार मुस्कुराते है। यह है श्री जयशंकर प्रसाद का लेखन शिल्प।
रामदेव धुरंधर की कृति पथरीला सोना से
भारतीय तीर तलवार के साथ ना जाकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ जाते थे और वहां रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे भारतीय धरती ने कैसे इस तरह से संस्कार स्वयं में पल्लवित उपस्थित किए हो और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो “मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ जहाँ इसे ऐसे रोप दो कि उगे तो स्वयं भारत उगे”.
तब तो हिमालय ऐसे ही खेल-खेल में वयोवृद्ध नहीं हुआ। गंगा ऐसे ही जननियों की महाजननी मनहीं हुई। इसके पीछे स्वर्ण अक्षरों में अंकित विराट अतीत है। हिमालय ने अपनी अटलता से संदेश दिया जहां रहो अपनी पहचान से रहो और गंगा ने बह कर कहा,सतत गतिशील बने रहने की शर्त रखो।
विशेष: भारतीय संस्कृति को सात समुंदर पार की धरती मॉरीशस से जोड़ता पथरीला सोना के कथानक का यह अंश देखिए न कैसे सब कुछ कह देता है। लेखक के दिल में भारत बसता है, यह मैं नहीं कह रहा उनकी कलम कहती है। यह है श्री रामदेव धुरंधर के लेखन शैली का शिल्प।
विनोद कुमार शुक्ल की कृति दीवार में एक खिड़की रहती थी से
खिड़की की चौखट पर एक साँवली लड़की खड़ी थी। वह दोनों हाथों में चौखट पकड़े हुए खड़ी थी। वह तैयार होकर आई थी। चौखट पर उसके दोनों हाथों की एक-एक छोटी उंगलियों में नेल पॉलिश लगी हुई थी। सोनसी उसके पास आई।
“अंदर आओगी?”
“नहीं।उसने शरमाकर कहा।
“अच्छा रुकना । सोनसी ने कहा।
विशेष: हिंदी लेखक विनोद कुमार शुक्ल के लिखे उपरोक्त पुस्तक के कथानक के इस अंश में पात्रों का संवाद एवं लेखक द्वारा शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत दृश्य आपस में मिलकर कथानक को जीवंत करते हुए प्रतीत होते हैं। लेखक के भाव और लेखन शैली दोनों में ही जीवंतता है।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४३ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
घुग़री से गरारू घाट 11नवम्बर2019
घुग़री से आगे बढ़ने के पहले लोगों से आगे के रास्ते के बारे में जानकारी लेने नीचे घाट पर उतरे तो पता चला कि नर्मदा किनारे का रास्ता ख़राब है। बहुत ऊबड़-खाबड़ या कीचड़ मिलेगी इसलिए नहर के किनारे चलने लगे। सुबह जब चलना शुरू करते हैं तब स्फूर्ति से लंबा रास्ता तय करने का प्रयास रहता है लेकिन एकाध किलोमीटर चलने पर माँस पेशियाँ तैयार होतीं हैं परंतु साँस को आराम देने के लिए थोड़ा आराम ज़रूरी रहता है। कोई दो किलोमीटर दूर एक गौड़ परिवार का खुला घर दिखा, नर्मदे हर उद्घोष के बाद रुके। उनका नाम मुन्ना ठाकुर राजगौड़ था, उनके तीन मुस्कुराते निश्छल चेहरे वाले बच्चों से बच्चा बनकर बतियाया, एक बच्चे ने सीताफल खाने को दिया और भैंस का ताजा दूध बासी रोटी के साथ पिया। उसकी बीबी चतुर थी उसने वहाँ 30 रुपए लीटर मिलने वाला दूध का भाव हमसे 40 रुपए लीटर तय करके ठग लिया। हमें कबीर की उलटवासी याद आ गई।
कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय
आप ठगाए सुख ऊपजे, और ठगे दुःख होय।
वैसे हम भी ठगाए नहीं थे क्योंकि शहरों में 50 रुपए मिलने वाले नक़ली दूध की जगह सामने भैंस से दुहता असली दूध 40 रुपए लिया था। अरुण भाई ने ख़ुश होकर उसे 100 रुपए दिए। इस मामले में अरुण भाई काइयाँ गुज़ारती न होकर ठेठ बुंदेलखंडी हैं, दिल ख़ुश-तिजोरी फुक्क। मुन्ना ठाकुर राजगौड़ की पत्नी तीन बच्चों की माँ होने के बाद भी स्वाभाविक सुंदर, फ़ुर्तीली व चपल थी, वह मेहनतकश नारी देह की मालकिन थी। उसने शायद ही कभी ब्यूटी पार्लर का मुँह देखा हो जहाँ शहरी औरतें शरीर में क़ैद माँस पिंडों को क्रीम से थ्रेडिंग करवा कर सौंदर्य का आभास ख़रीदती रहती हैं। उनके भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों हैं। उन्हें बटेर, खरगोश और मछली भोजन हेतु आसानी से मिल जाते हैं। उन्होंने खुलकर हमसे बातें कीं। असल में इंसान प्यार और बातचीत का भूखा होता है, लोगबाग अहंकारी चित्त होने के कारण खुलना नहीं चाहते।
रहीमन पैडा प्रेम को निपट सिलसिली गैल
बिलछत पैर पीपिलि को लोग लदावत बैल।
प्रेम व्यवहार की गली अत्यंत चिकनी फिसलन भरी है, लोग उस पर भी कंधों पर अहंकारी बैल को लादकर चलना चाहते हैं, यह कैसे सम्भव है।
हमारे एक साथी की बवासीर भड़क गई बहुत सारा ख़ून बह जाने से कमज़ोरी स्वाभाविक थी, अविनाश भाई ने उन्हे ग्लूकोज़ का घोल पिलाया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यात्रा करना जारी रखा। रास्ते में एक स्थान पर चढ़ाई करते हुए उन्हें चक्कर आ गया। पुनः खजूर और गुड खिलाया, वे दस मिनट में दुरुस्त होकर चलने लगे। उन्हें समझाया कि ज़्यादा तेज़ चलना ठीक नहीं है। उन्होंने सामान्य गति से चलते हुए नियत यात्रा पूरी की लेकिन आख़िरी दिन सतधारा में नहाते हुए मुँह के बल गिरे, उनकी नाक पर गहरी चोट आई। उन्हें तैरना नहीं आता था। ग़नीमत है कि वे नर्मदा की गहराई में नहीं गिरे वरना बड़ा हादसा हो सकता था।
नरसिंहपुर जिले का पूरा इलाक़ा लोधियों से आबाद है। लोधी एक बहुत मेहनतकश और जूझारू क़ौम है। खेतों में बेतहाशा मेहनत करते दिखते हैं। चारों तरफ़ गन्ने की दस-बारह फ़ुट ऊँची और पीले फूल से सजी तुअर दाल की फ़सल लहरा रही थी। एक खेत में एक लोधी किसान उसकी पत्नी और दो पुत्र सहित आलू की बौनी कर रहे थे। उन्होंने बताया छोटे अंकुरित आलुओं की ख़रीद नरसिंघपुर से करके लाए हैं। चार भैंसों का गोबर इकट्ठा करके खाद बनाकर क्यारियों में पहले खाद बिछाते हैं फिर अंकुरित आलू रखकर मिट्टी से पूर देते हैं। एक आलू से दस-बारह आलू उपजते हैं। आलुओं की बातों में हमने धीरे से बात ऊठाई कि यार आलू चिप्स के साथ चाय मिल जाती तो मज़ा आ जाता। कहने भर की देर थी, किसान की पत्नी चाय बना लाई। किसान ने बताया कि किसानी से घर का ख़र्च मुश्किल से निकलता है। किसान की क़िस्मत छलनी में दूध छानने जैसी है। अच्छी फ़सल आए तो दाम गिर जाते हैं और फ़सल ख़राब हो जाए तो लागत नहीं निकलती है। आदर्शवादियों ने “किसान को अन्नदाता बताकर” उसकी आशान्वित समृद्ध सम्भावनाओं को निरस्त कर दिया। व्यापारियों और कारोबारियों के हाथों किसान दोहरे शोषण के शिकार हैं, वे एक तरफ़ खाद, बीज, कीटनाशक और उपकरणों की क़ीमत बढ़ाकर भारी मुनाफ़ा कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ़ किसान के उत्पाद अनाज मंडी, फल मंडी, सब्ज़ी मंडी में औने-पौने में ख़रीद कर तिजोरी भरते हैं। इस शोषण तंत्र को किसान-नेता और कारोबारियों का नेतृत्व राजनैतिक दबंगई से किसान हितैषी बनकर बड़ी कुशलता पूर्वक चलाते हैं, वे किसानों की ऋण माफ़ी का आंदोलन करके उन पर अहसान का बोझ डालकर वोट-बैंक पक्का कर सत्ता के भागीदार हो शोषण तंत्र अनवरत चलाते रहने में सफल हैं। किसान अब सिर्फ़ किसान नहीं बना रहना चाहता वह यूरोप और अमेरिकी किसानों की तर्ज़ पर यथार्थवादी कारोबारी बनना चाहता है, लेकिन कारोबारी शोषण तंत्र का शिकंजा उसे साँस नहीं लेने देता उसका दम घुटते रहता है किसानों की मानसिक प्रताड़ना की भयावहता आए दिन उनकी आत्महत्या की घटनाओं से समझी जा सकती है। स्वार्थी और कलुषित मनुष्यों का षड़यंत्रकारी तंत्र देखिए किसान को अन्नदाता कहकर भिखारी और क़र्ज़ न चुकाने वाला बेईमान बना दिया और महिलाओं को देवी बताकर उनकी इज़्ज़त लूट साक्ष्य मिटाने हेतु जलाने लगे।
गरारू घाट के एक आश्रम में पहुँचने पर एक अद्भुत स्वामी जी के दर्शन हुए। वे बंगाली स्वामी पहुँचते से ही बोले यहाँ जगह नहीं है, आप लोग चाय पीजिए और आगे मंदिर पर रुकने का इंतज़ाम कीजिए। हमने कहा “स्वामी जी यहाँ रुकते तो आपसे वेदांत ज्ञान लेते।” उन्होंने डाँटते हुए कहा वेदांत जानने के लिए एक-दो साल भी कम है फिर तुरंत पैंतरा बदल कर बोले “ब्रह्म क्या है, हम, तुम सबमे यहाँ तक कण-कण में ब्रह्म है, आपको जानकारी मिल गई न, अब आप स्वयं पढ़ो और जानो, आप आगे जाओ।” हमने कहा “स्वामी जी ज्ञान हेतु गुरु का माध्यम ज़रूरी है।” वे फुफकारते हुए बोले बाबा “लो चाय पीओ आगे बढ़ो।” बाद में अगले दिन उनके एक सेवक ने बताया कि बंगाली बाबा अपने व्यवहार के लिए दुखी हो रहे थे।
तक़रीबन एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर ऊपर पहुँचे वहाँ एक कथा वाचक का पंडाल लगा था उनके सेवक नरेश लोधी ने स्वागत किया और खुले में टेंट में सोने की जगह दे दी। रात में एक भद्र महिला द्वारा भेजे दूध में अविनाश भाई का पोहा शक्कर मिलाकर खाकर सोने की कोशिश की तब नर्मदा के बहाव की ध्वनि सुनाई दी, पूरे खिले चाँद की चटक चाँदनी में दूर से आती कलकल मद्धिम ध्वनि लोरी सी लग रही थी। सोने के पूर्व प्रयास भाई ने कविताएँ सुनाईं। दो-चार जुगलबंदी हमने भी बांचीं।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता जरा इतिहास को पढ़ लो !!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १३ ☆
☆ जरा इतिहास को पढ़ लो !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काली टोपी लाल रूमाल…“।)
अभी अभी # १०६० ⇒ आलेख – काली टोपी लाल रूमाल श्री प्रदीप शर्मा
सन् १९५९ में एक फिल्म आई थी, काली टोपी लाल रूमाल, वैसे वह समय भी टोपी और रूमाल का ही था। महिलाएं तो ठीक, पुरुष भी खुले सिर नहीं घूमते थे। टोपी कहें या पगड़ी, असली इज्जत वही थी।
गांधीजी ने कभी टोपी नहीं पहनी, लेकिन गांधीवादी लोग सफेद टोपी पहनने लगे। नेहरू आधुनिक विचारों के होते हुए भी, टोपी पहनते थे। राजनीति में टोपी पहनी भी गई, जनता को पहनाई भी गई, और दूसरों की टोपी उछाली भी गई।।
वह समय था जब हर सज्जन और सभ्रांत पुरुष काली टोपी पहनता था। ग्रामीण अंचल में किसान पगड़ी बांधते थे, और पसीना पोंछने के लिए रूमाल नहीं, लाल गमछा रखते थे, कहीं कहीं यह अंगोछे की शक्ल का भी होता था।
हमारा विद्यालय तब एक तरह से सरस्वती का मंदिर ही था, बस उसका नाम गणेश विद्या मंदिर था। शहर की महाराष्ट्र साहित्य सभा उसका संचालन करती थी, और अधिकांश वरिष्ठ शिक्षकों का परिधान धोती, कुर्ता, कुर्ते पर खुले गले का कोट, काली टोपी और आंखों पर चश्मा ही होता था। वे तब के शिक्षा, संस्कार और नैतिकता के ब्रांड एम्बेसडर थे। उनका आचरण छात्रों के लिए अनुकरणीय होता था।।
वह समय था, जब घरों में, मोटी मोटी दीवारों में खूटियां हुआ करती थीं, जिन पर छाता, कुर्ता और टोपी टांगी जाती थी।
हम आज भले ही वाहन चलाते वक्त सुरक्षा हेतु हेलमेट ना पहनें, लोग घर से बाहर जाते समय सर पर टोपी लगाना और हाथ में छाता ले जाना नहीं भूलते थे।
जब परिवेश बदलता है तो परिधान भी बदलता है। सर की टोपी और पगड़ी आजकल गायब हो चुकी है, विदेशी परिवेश में धोती कुर्ते की जगह सूट बूट ने ले ली है और गले के रूमाल का स्थान टाई ने ले लिया है। पहले कैप आई और पश्चात् मंकी कैप।।
सर पर टोपी अथवा पगड़ी अनुशासन और अस्मिता का प्रतीक है। पुलिस, और फौज में आज भी वर्दी और कैप अनिवार्य है। पब्लिक स्कूलों में आज भी यूनिफॉर्म अनिवार्य है। बेचारा रूमाल तो आजकल शर्म के मारे छोटा होकर पर्स का नैपकिन हो गया है।
हमारे परिवार में पिताजी की आज एक ही तस्वीर उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने काली टोपी लगा रखी है।
क्या समय था, जब मांगलिक अवसरों पर की जाने वाली पुरुषों की कपड़ा रस्म में धोती कुर्ता, रूमाल अथवा अंगोछे के साथ टोपी भी रखी जाती थी।।
महिलाएं आज भी धार्मिक स्थलों में जाते वक्त सर पर पल्लू ले लेती हैं, कई पूजा स्थलों में पुरुष को भी सर ढंकना होता है, जेब का रूमाल तब बहुत काम आता है। लोग तो रूमाल रखकर, बस की सीट तक रोक लेते हैं। सर कहें अथवा मस्तक, यह अगर सदके में झुकता है तो गर्व से उठता भी है।
आज भले ही टोपी हमारे सर से गायब हो गई हो, रूमाल ने आज भी हमारा साथ नहीं छोड़ा। हमारी साख ही हमारी पगड़ी है। दूल्हा आज भी जीवन में एक बार ही सही, पगड़ी जरूर पहनता है। जो आज भी अपनी अस्मिता और गौरव को बनाए रख रहे हैं, उनके लिए टोपी और पगड़ी आभूषण है, सम्मान, सादगी और अभिमान का प्रतीक है।।