हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१७ – विश्व प्रेम आराधना… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक कविता “विश्व प्रेम आराधना… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१७ – विश्व प्रेम आराधना…  ☆

(समसामयिक रचना)

जग डूबा अवसाद में, छेड़ा जबसे युद्ध।

दोनों को समझा सकें, कहाँ से लाऊँ बुद्ध।।

 *

विश्व प्रेम आराधना, सुख शांति प्रासाद।

हिल -मिलकर सब रह सकें, हटे दूर उन्माद।।

 *

गीता के प्रतिसाद में, कर्म भाव ही तत्व।

जिसने जीवन को जिया, उसका बढ़ा महत्व।।

 *

जीव जगत को है मिला, आशीर्वाद प्रसाद।

नेक राह पर चल पड़ो, कभी न हो उन्माद।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – आशीर्वाद के अक्षत ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा आशीर्वाद के अक्षत”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻 💐आशीर्वाद के अक्षत 💐

आजकल पैसों से गरीब कोई नहीं होता। जो गरीब दिखते हैं वास्तव में वह कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर एकदम बेसहारा लाचार प्राकृतिक आपदा दिव्यांगता।

इन चीजों को परे हट कर  देखा जाए तो आज वास्तव में पैसा संस्कार, श्रद्धा, अपनापन, रीतरिवाज, मर्यादा, सम्मान सब भूला देता है। भीषण युद्ध का समाचार पढ़ते- पढ़ते अचानक पेपर पर निगाह दौड़ रही थी।

एक पूंजीपति इंसान की दर्दनाक मौत। वजह अकेलापन, अपनों की याद, जकड़े हुए रिश्ते और बोझिल होती साँसे।

आसमान साफ परंतु हल्की सी बूंदाबांदी मानो कह रही हो राहत तो अपनों से ही मिलती है। पर अपने है कहाँ??

तभी दरवाजे पर दस्तक। चश्मे से निहारते नयन दरवाजे पर जाकर अटकी। सामने महीने बंदी सामान लेकर आने वाला किराना व्यापारी खड़ा था। मालती— सुनिए भैया इस बार का राशन का सामान आप इस पते पर पहुंचा दीजिएगा।

व्यापारी बोला – – क्या बात है मैडम कहीं जा रही है और यह किसको देना है।

मालती ने बड़े भोलेपन और खुशी जाहिर करते हुए बोली– वह हम अपने बेटे के यहाँ जा रहे हैं। यहाँ घर पर जो बनेगा वह सब वहाँ बन जाएगा।

व्यापारी – मैडम बेटे के यहाँ सामान लेकर जा रही है? मैं कुछ समझा नहीं। अपना ही बेटा है न?

हमारा ही बेटा है। खूब बड़ी कंपनी में नौकरी करता है। कल उसने फोन पर कहा है–अपना दो-चार दिन रहने का इंतजाम करके आना।

मुझे समय नहीं मिल रहा हैअब कुछ खाना है। तो ले जाना पड़ेगा और उसे उपहार में कुछ देना पड़ेगा। उपहार ही समझो। पर चिंता न करो हम कुछ दिन उसके घर पर ही रहेंगे।

जलती तवे पर पानी की बूँदे जैसे चटपटाती है, ठीक उसी तरह उसके हृदय के बोल निकल रहे थे। बाबूजी की आवाज – – अब छोड़ो भी बच्चों के पास जा रहे हैं क्या यह काम है।

जन्मदिन पर बुलाया है आशीर्वाद के अक्षत तो लेकर जाना ही है। व्यापारी को आशीर्वाद के अक्षत और उपहार का सामान समझते देर न लगी। वह बोला– ठीक है जल्दी आ जाईयेगा और अपना ध्यान रखिएगा

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७३ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७३ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घर का चूल्हा ना जले, तो कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ता हैं। आप लोग अभी ये अनुभव नहीं करें होंगे। पुरानी कहावत है, जिस तन लगे वो ही तन जाने”, जिनको समझ ना आया हो तो ” it is bearer who knows where shoe pinches”

कल एक पुराने साथी का फोन आया, उसने बताया कि दस वर्ष पूर्व वो जयपुर में अपना गैस का कनेक्शन जमा करवा कर अपने गृह नगर आ गया था। अब उसको गैस बुक नहीं करने दी जा रही है। जयपुर के कनेक्शन के समय उसका आधार कार्ड लिंक किया गया था। उसको एजेंसी ने डिएक्टिवेट नहीं किया है।

मित्र ने ये भी कह दिया, यदि मेरा काम नहीं हुआ तो, वो अपने गृह नगर से हमारे यहां आ जायेगा। उसकी इस धमकी से हम भी डर गए, और तुरंत गैस एजेंसी चल पड़े।

गैस एजेंसी की दुकान से पांच सो गज़ पूर्व वाहन प्रतिबंधित थे। जिस तरफ भीड़ जा रही थी, हम भी उसका हिस्सा बन गए, अधिकतर लोग खाली सिलेंडर साथ लिए हुए थे।

हमें भी कुंभ मेले की याद आ गई, वहां जैसा मोहाल था। ऐसा लग रहा था आगे त्रिवेणी संगम हैं। सब हमसे आगे जाते हुए प्रतीत हो रहे थे। हम तो भरपेट भोजन किए हुए थे, इसलिए धीरे चल पा रहे थे। भीड़ वाले चेहरे परेशान से नज़र आ रहे थे। मानो कई दिनों से बिना भोजन किए जल्दी में थे। कुछ लोग वापिस भी आ रहे थे। खाली पेट “करो या मरो” जैसी स्थिति होती हैं। हमारे यहां भी कहा गया है, “भूखे भजन ना होई गोपाला”

अब हमें भी भूख लग रही है, आगे की जानकारी के लिए भाग 2 का इंतजार करें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६५ ⇒ खिलाड़ी भावना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खिलाड़ी भावना।)

?अभी अभी # ९६५ ⇒ आलेख – खिलाड़ी भावना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर किसी खेल में हार-जीत न हो, तो खेल का मज़ा ही क्या ! हर खेल जीतने के उद्देश्य से ही खेला जाता है। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है। हारे को हरि नाम।

हर खेल में एक ही भावना होती है, प्रतिद्वंद्विता की भावना ! खेल की एक ही नीति होती है, रणनीति ! अगर भाई भाई भी कोई खेल खेलते हैं, तो एक हारता है, और एक जीतता है। महाभारत में युधिष्ठिर ने जुआ खेला था। पासे उल्टे पड़ते गए, वे सब कुछ हारते चले गए। राजसभा देखती रही, विदुर, भीष्म, कृष्ण कुछ न कर पाए और युधिष्ठिर द्रौपदी को भी हार बैठे। जहाँ शकुनि सामने होता है, हमेशा पासे उल्टे ही पड़ते हैं।।

आजकल सभी खेल पेशेवर हो गए हैं ! जीतने वाले को अगर बड़ी राशि और बड़ा पदक दिया जाता है, तो हारने वाले भी करोड़पति होने लग गए हैं। winner न सही, runner ही सही।

राजनीति भी एक खेल ही है ! यह सेवा का खेल है ! जो जीतेगा, सरकार बनाएगा, वही सेवा करेगा, जो हारेगा, वह न तो खेल छोड़ेगा और न ही सेवा करेगा। उसका खेला तो अब शुरू होता है। जो जीता है, उसे नहीं खेलने देना। वह एक ऐसी कबड्डी का खेल खेलता है, जिसमें सिर्फ टांग खींची जाती है। अगर सामने वाला गिर गया तो बच्चों की तरह ताली बजाई जाती है।।

खेल हो या राजनीति, जीतने के लिए हर तरह के खेल खेले जाते हैं। शक्ति प्रदर्शन, सूझबूझ और साम, दाम, दंड भेद सबका सहारा लिया जाता है। एक खेल मिलीभगत का भी होता है। जहाँ आर्थिक लाभ के लालच में शक्तिशाली हार जाता है और कमज़ोर विजयी हो जाता है। आईपीएल की भाषा में इसे सट्टा कहा जाता है। यह खेल भावना के विपरीत है।

राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। ये कंडे गोबर के होते हैं और हाथ से बनाये जाते हैं। जब कभी ये हथकंडे भी काम नहीं आते, तो यही कहा जाता है, सारा गुड़ गोबर हो गया। पैसा, शराब और चुनावी वादे भी हथकंडों की श्रेणी में ही आते हैं।।

हमारे देश में दो ही तो राष्ट्रीय खेल हैं, राजनीति और क्रिकेट। राजनीति में खिलाड़ी भावना वैसे तो कम देखने को मिलती है। लेकिन सौजन्यवश, अगर जीता हुआ प्रत्याशी, हारे हुए प्रत्याशी को उसके घर जाकर बधाई दे दे, तो इसे खेल भावना का परिचय कहा जा सकता है।

चूँकि खिलाड़ी भावना, जिसे अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए अंग्रेज़ी में स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कहते हैं, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, खेल से जुड़ी होती है, इसलिए आज भी खेल की हार-जीत केवल खेल के मैदान तक ही सीमित होती है। बाद में सभी हारे हुए, और जीते हुए खिलाड़ी पुरस्कार समारोह में एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं, बधाई देते हैं। और खेल समाप्ति के बाद साथ साथ शॉपिंग करते हैं, प्रशंसकों को ऑटोग्राफ देते हैं।।

कितना विचित्र संयोग है ! इस बार चुनाव और आईपीएल टी-20 टूर्नामेंट, तकरीबन, साथ साथ ही चल रहे हैं। एक ओर अगर विश्व के सभी क्रिकेट के धुरंधर अपनी राष्ट्रीयता भूल एक बैनर के तले, पेशेवर तरीके से ही सही, अपनी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं, कोई जीत रहा है, कोई हार रहा है, लेकिन प्रशंसक हर बॉल पर, और हर शॉट पर तालियाँ बजा रहे हैं और स्टेडियम में बैठे दर्शक ही नहीं, घरों में टीवी के सामने बैठे शौकीन और जानकार इस जेंटलमैन’स् गेम अर्थात सभ्य पुरुषों के खेल का आनंद ले रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनावी माहौल में केवल एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है। लोकतंत्र के पवित्र उत्सव का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

चलिए मान लिया, everything is fair in love and war ! लेकिन क्या हम चुनावी हार जीत को क्रिकेट की हार जीत की तरह नहीं ले सकते ? नहीं कदापि नहीं ! ये चुनाव देश का भविष्य निर्धारित करेंगे, देश का भाग्य बदलेंगे। और हम मतदाता भाग्य-विधाता हैं। हमारे लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न है। आईपीएल कोई भी जीते, हमें कोई मतलब नहीं। हमारा ध्यान तो इस ओर है कि इस बार किसकी सरकार बनती है। कोई खिलाड़ी भावना नहीं। खुला खेल फरूखाबादी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ – नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा सेमिनार आयोजित ☆ साभार – डॉ. जवाहर कर्नावट ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ – नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा सेमिनार आयोजित🌹

आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय के सहयोगी 17 देश 455 एकड़ का विशाल परिसर प्राचीन और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत संगम ।

नव स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा आयोजित ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार (28-29 मार्च) में वक्ता के रूप में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस विश्वविद्यालय को 17 देशों के सहयोग से पुनर्जीवित किया गया है। भारत सरकार ने 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया और बिहार में राजगीर के पास ही 2014 में इसका शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हुआ। इस विश्वविद्यालय का नवीन परिसर 455 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है जो प्राचीन नालंदा और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत उदाहरण है । भारत सहित विभिन्न देशों के लगभग 700 विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं।

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास पांचवीं शताब्दी में शुरू होता है जब गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने बिहार के राजगीर में 427 ई के लगभग इसकी स्थापना की थी और इसे बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र माना जाता था ।यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जिसमें 10, 000 से अधिक छात्र और लगभग 2000 शिक्षक थे। चीन, तिब्बत, जावा, जापान कोरिया, म्यांमार, कंबोडिया श्रीलंका आदि देशों से यहां छात्र अध्ययन के लिए आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने यहां कई साल रहकर अध्ययन किया और नालंदा के वैभव को दुनिया तक पहुंचाया। विश्वविद्यालय का 9 मंजिला पुस्तकालय जिसे धर्मगंज कहा जाता था, में ज्ञान का विपुल भंडार था। यह विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक शिक्षा और शोध का वैश्विक केंद्र बना रहा ।ज्ञान की इस विशाल ज्योति को 1193 इस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बुझा दिया किंतु नालंदा विश्वविद्यालय अब पुनः अपने वैभव को अर्जित करने के लिए कुलपति प्रो. सतीश चतुर्वेदी के नेतृत्व में प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री श्याम परांडे, सचिन श्री गोपाल अरोड़ा और निदेशक श्री नारायण कुमार को इस सफल आयोजन के लिए बधाई और धन्यवाद।

साभार – डॉ जवाहर कर्णावट

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२३ ☆ ओठावरील मोती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२३ ?

☆ ओठावरील मोती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

संशय ऋतूस अपुला आला असेल का?

संयम समीप येता ढळला असेल का?

*

डोळ्यात भावनांचा संग्राम पेटला

भात्यात बाण होता सुटला असेल का?

*

तारा नभातुनी हा वेडा खुणावतो

त्याचा तिला इशारा कळला असेल का?

*

ओठावरील मोती नथनी मधील तो

स्पर्शात जीव त्याच्या जडला असेल का?

*

गालात लाजणारा तो चंद्र कालचा

प्रणयात आज पुरता रमला असेल का?

*

तू रंग फेकला मी डागाळले जरा

तो डाग काळजावर ठसला असेल का?

*

ओढून गंध नेतो झाडाकडे मला

मज पाहताच चाफा फुलला असेल का?

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ चैत्रातला पाऊस… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ चैत्रातला पाऊस... ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

चैत्रपालवीत पाऊस थेंबा

धगधग निववून अचंबा

शुभ्र आभाळी अशी अवकाळी

धरतीस आस ओलीत बिंबा.

ऋतू वसंती बहार भिजवा

मन सुखावून झेलती धारा

ऊष्मेचा दाह फोडून घनात

टप-टप पाऊस मातीचा तोरा.

 *

तशात कोकीळ स्वरात गोडी

पक्षी आनंदी वल्लरीची जोडी

हृदय ओथंबून स्मृती भरा

निवडुंगी चेहरा खुले कुढी.

 *

वारा वावटळीचा कावंदूळ

घरघर ढग, चमचम विजा

क्षणात गारा, खळखळते पाणी

हसला निसर्ग गाली खळी साजा.

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ५ – टिक टिक -☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ५ – टिक टिक – ☆ विभावरी कुलकर्णी

सध्या लहानमुलांसाठी खूप आकर्षक म्हणजे अगदी मोठ्या माणसांना सुद्धा भुरळ पडावी अशी खेळणी दिसून येतात. ती खूप महाग पण असतात. काही खेळणी ज्ञान वाढवणारी असतात. परंतु साधारण चाळीस वर्षांपूर्वी एक लोकप्रिय असलेले खेळणे मला आठवते. त्याची किंमत असेल दहा किंवा पंधरा पैसे. पण मुलांच्या दृष्टीने उपयुक्त! त्याचे नाव टिक टिक किंवा टीन क्लिकर

 ​या वस्तूला ‘कडकडी’ सुद्धा म्हटले जाते. इंग्रजीत याला ‘Metal Clicker’ किंवा ‘Cricket’ असेही नाव आहे. ​खेळणी म्हणून: ८० च्या दशकातील मुलांचे हे सर्वात आवडते आणि स्वस्त खेळणे होते. अंगठ्याने तो धातूचा पत्रा दाबला की ‘कडक’ असा आवाज येतो, म्हणून मुले याचा वापर गंमत म्हणून किंवा एकमेकांना खुणावण्यासाठी करत असत.

​फार कमी लोकांना माहीत आहे की, अशा प्रकारच्या क्लिकरचा वापर दुसऱ्या महायुद्धात अमेरिकन सैनिकांद्वारे (विशेषतः पॅराट्रूपर्स) रात्रीच्या वेळी अंधारात एकमेकांना सांकेतिक संदेश देण्यासाठी केला जात असे. एकदा ‘क्लिक’ केल्यास उत्तर म्हणून दोनदा ‘क्लिक-क्लिक’ करणे, ही त्यांची ओळख पटवण्याची पद्धत होती.

निर्मिती

​हे खेळणे लवचिक स्प्रिंग स्टील (Spring Steel) किंवा कथील (Tin) च्या पातळ पत्र्यापासून बनवले जाते.

​एका छोट्या धातूच्या चौकटीत किंवा डबीत हा पत्रा अशा प्रकारे बसवलेला असतो की तो थोडा फुगीर राहतो.

​ जेव्हा आपण या पत्र्यावर दाब देतो, तेव्हा तो आपला आकार बदलतो आणि पुन्हा मूळ स्थितीत येताना हवेच्या दाबामुळे एक विशिष्ट ‘टीक’ आवाज निर्माण होतो. सुरुवातीला हे अगदी साधे पत्र्याचे असायचे. कधीकधी तो पुढचा पातळ पत्रा हाताला लागायचा. किंवा ते खिशात ठेवले की पत्र्याच्या टोकामुळे खिशाला छिद्र पडायचे. पण कोणालाही कळू न देता मित्रांना संकेत द्यायला उपयोगी होते.

मुले फक्त मजेसाठी हा आवाज काढत असत.

​खेळताना (उदा. लपाछपी किंवा पकडापकडी) एकमेकांना दूरून संकेत देण्यासाठी किंवा बोलावण्यासाठी याचा वापर व्हायचा.

​ गाणी म्हणताना किंवा ठेक्यावर वाजवण्यासाठी मुले याचा वापर करत.

​ काही मुले हे आपल्या सायकलच्या हँडलला लावून बेलसारखा वापर करायची.

नंतर या साध्या दिसणाऱ्या टिकटिकला आकर्षक रंग लावून किंवा काही प्राण्यांचे आकार देऊन रंगीबेरंगी करुन आकर्षक केले गेले.

याच्या आवाजाच्या मदतीने कुत्र्यांना प्रशिक्षण दिले जात होते.

​हे खेळणे आता दुर्मिळ झाले असले तरी, आजही जत्रेत किंवा जुन्या वस्तूंच्या दुकानात पाहायला मिळते.

© विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ते लोक… (अनुवादित) – हिन्दी लेखक : सुशांत सुप्रिय ☆ उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

?जीवनरंग ?

☆ ते लोक… (अनुवादित) – हिन्दी लेखक : सुशांत सुप्रिय ☆ उज्ज्वला केळकर

रेल्वेच्या या डब्यात ते चौघे आहेत. मी मात्र एकटाच आहे. ते हट्टे -कट्टे आहेत. मी मात्र अशक्त, मरतुकडा आहे. ते उंच, तगडे आहेत, मी मात्र सर्वसामान्य आहे. घाईघाईत मी चुकीच्या डब्यात चढलो की काय? मी यावेळी त्या लोकांच्या मध्ये असायला नको आहे. माझ्या अंतरात कुणीतरी मला चेतावणी देत आहे.

देशातील अनेक भागात दंगे होताहेत. आमचा भाग त्यापासून अस्पर्शित आहे. पण केव्हा काय होईल, कुणास ठाऊक? पुढचा तासभर मला यांच्यापासून सावध राहायला हवं.. जपर्यंत माझं स्टेशन येत नाही, तोपर्यंत…

मी चोरट्या नजरेने त्यांच्याकडे बघतो. दोघांची लांब दाढी आहे. चौघांनी हिरवा कुडता आणि पायजमा घातलाय आणि पांढरी जाळीची गोल टोपी घातलीय. ते चौघे माझ्याकडे टवकारून का पहाताहेत? काही गडबड तर नाही. त्यांचे विचार धोकादायक तर नाहीत.?

भयाचा एक सूक्ष्म गंध हवेत मिसळला होता. मी तो वास घेऊ इच्छित नव्हतो, तरी तो माझ्या नाकात घुसत होता आणि डोक्यापर्यंत संदेश पोचवत होता, त्यामुळे मी अस्वस्थ होत होतो. कुठल्या तरी अघटिताची, अनिष्टाची अशुभ सावली माझ्यावर पडते आहे आणि बेचैनी माझ्या आत पंख फडफडू लागते आहे. देशातील अनेक भागात आतंकवाद्यांनी बॉम्ब -स्फोट केले आहेत. शेकडो लोक मारले गेले आहेत. त्यानंतर अनेक ठिकाणी दंगे सुरू झाले. दगडफेक, आगी लावणे, लूट-पाट होऊ लागली. त्यानंतर अनेक ठिकाणी कर्फ्यू लावावा लागला. मी शांतपणे जगू इच्छतो. पण शांतता आज एक दुर्मिळ गोष्ट झालीय. दुर्मिळ आणि अप्राप्य. नरभक्षी जनावरांसारख्या शंका मला चिरू -फाडू लागल्या आहेत.

एकदा माझे डोळे त्यांच्या डोळ्यांना भिडतात. त्यांच्या सावळ्या चेहऱ्यावर उगवलेले थंड डोळे माझ्याकडे बघताहेत. ते लोक आमच्यापेक्षा किती वेगळे आहेत. आम्ही सूर्याची पूजा करतो, तर त्यांचं चंद्रावर प्रेम आहे. आम्ही डावीकडून उजवीकडे लिहितो, तर ते अगदी उलट, उजवीकडून डावीकडे लिहितात. आमची सगळी पवित्र तीर्थस्थाने याच देशात आहेत, तर त्यांची या देशाच्या बाहेर आहेत. त्यांचं नाक, त्यांचे डोळे, त्यांचा बांधा, त्यांचं रूप-रंग सगळं आमच्यापेक्षा वेगळं आहे,

ते माझ्याकडे टक लावून का बघताहेत? ते आतंकवादी तर नसतील? त्यांच्या बॅगेत ए. के. 47 आणि बॉम्ब तर नसतील? बाहेर थंडी असूनही मला घाम येतोय. शरीर कापतय. जसं काही लाल तिखट डोळ्यात गेलय. तहानेनं माझा घसा कोरडा पडलाय. जीभ टाळूला चिकटलीय. मी ओरडू इच्छितोय, पण गळ्यातून आवाज बाहेर येत नाही. माझ्या खाका घामान भिजल्या आहेत. कपाळावरून गंगा, यमुना, सरस्वती वहातेय. आज मी बी. पी. ची गोळी खाल्ली नाही का? माझ्या डोक्यातील नसांमध्ये इतका तणाव का भरला गेलाय? माझ्या डोळ्यांपुढे अंधार पसरत चाललाय. मला चक्कर येतेय का? मला श्वास घ्यायला इतका त्रास का होतोय? माझ्या छातीवर इतका जड दगड कुणी ठेवलाय?

अरे, तो दाढीवाला माणूस उठून माझ्याकडे का येतोय? मला सुरा मारेल की काय तो… अरे देवा, डब्यात कोणी पोलिसवालाही नाही. आज काही मी वाचत नाही. त्याच्या गोळ्या आणि बॉम्बचा घास बनेन मी! नाही तर यांच्या सुऱ्याचा घास बनेन! भिंतीवर टांगलेल्या फ्रेममधील फोटो बनेन मी! भूतकाळ आणि इतिहास बनेन मी! असं मरायचं होतं तर मला! दंगेखोरांच्या हाताने… ऐन तारुण्यात. रेल्वेच्या रिकाम्या डब्यात. अकारण. पण आता माझं वय तरी काय आहे? माझ्यानंतर माझ्या बायको-मुलांचे काय होईल? नाही… नाही… थांबा थांबा. माझ्याजवळ येऊ नका. तुम्हाला तुमच्या देवाची शपथ. माझे प्राण वाचवा.

ओह! माझ्या मनात या माशा का भिणभिणताहेत?

‘भाईजान, आपली तब्बेत बिघडलीय का? इतक्या थंडीतही आपल्याला घाम आलाय. आपण कापत आहात. आपल्याला डॉक्टरांची गरज आहे, असं वाटतंय. आपण घाबरू नका. धीर धरा. आम्ही आपल्याबरोबर आहोत. अल्लाह सगळं ठीक करेल. ’ 

तो माझ्या चेतनेच्या मुखाशी टकटक करतोय. तो कुणी भला माणूस वाटतोय. आता त्याचा चेहरा १९६५च्या भारत-पाक युद्धाचा हिरो अब्दुल हमीदच्या चेहऱ्यात बदललाय. नाही… नाही… आता त्याचा चेहरा आपले भूतपूर्व राष्ट्रपती ए. पी. जे. अबुल कलामध्ये रूपांतरित झालाय…

आता त्याचा चेहरा सुप्रसिद्ध गझल गायक गुलाम अलीसाखा ओळखीचा वाटतोय. आता तो माणूस गुलाम अलीच्या अंदाजात गातोय,

 

ये बातें झूठी बातें हैं

ये लोगों नें फैलाई हैं… बातें 

आह! … ही डोकेदुखी… हा अंधार.

गाडी थांबलीय. बहुतेक स्टेशन आलं वाटतं. ते लोक मला आधार देऊन गाडीतून उतरवताहेत. आता ते मला कुठे तरी घेऊन जाताहेत… आता मी हॉस्पिटलमधे आहे… त्यांनी माझ्याकडून फोन नंबर घेऊन सुमीला, माझ्या पत्नीला बोलावून घेतलय.

नाही… नाही ते वाईट लोक नाहीत. मी चुकलो होतो. ते चांगले लोक आहेत. माणुसकी अजून जिवंत आहे.

‘यांचं बी. पी. खूप हाय झालं होतं. या लोकांनी योग्य वेळी त्यांना इथे आणलं. मॅडम, तुम्ही या चौघांचे आभार माना. औषधांनी बी. पी. आता कमी झालाय. आपण यांना घरी घेऊन जाऊ शकता. यांना जास्तीत जास्त आराम करू द्या. ’ डॉक्टर सुमीला सांगत होते.

आता मी पहिल्यापेक्षा बरा आहे. माझी पत्नी आणि ते चौघे मला हॉस्पिटलच्या बाहेर घेऊन येत होते.

‘भाईसाहब मी आपल्या सगळ्यांची अत्यंत ऋणी आहे. मी आपले आभार कसे मानू? आपल्यामुळेच आज यांचे प्राण… ’ सुमीच्या डोळ्यात कृतज्ञतेचे अश्रू होते.

‘कैसी बात करती हो बहन! आम्ही जे केलं, ते आमच्या भावासाठी केलं. अल्लाहची हीच मर्जी होती. ’ 

मी अतिशय शरमिंदा झालो. आपलं सारं कामकाज सोडून ते चौघे मला मदत करत होते. आम्ही सगळे एकाच आईची लेकरे आहोत. आम्ही एका माणसाचे दोन डोळे आहोत. आम्ही एकाच प्रदेशातील रहिवासी आहोत. आमचं रक्त आणि घाम एक आहे. ते परके नाहीत. आमच्यापैकीच आहेत.

” ख़ुदा हाफ़िज़, भाई. आपली काळजी घ्या. ’

” ख़ुदा हाफ़िज़! ’

टॅक्सी निघाली. दूर जाणार्‍या त्यांच्या पाठी खूप ओळखीच्या वाटू लागल्या. जशी त्यांची पाठ माझ्या वडलांची पाठ आहे. जशी त्यांची पाठ माझ्या भावाची पाठ आहे. असं वाटत होतं, मी त्यांना कित्येक वर्षे ओळखतो आहे.

टॅक्सी माझ्या घराकडे जात होती. बाहेर आकाशात चांदण्या लुकलुकत होत्या. उशिरा उगवणारा चंद्र्देखील आकाशात वर चढून तेजाने चमकत होता आणि माझा रस्ता प्रकाशित करत होता आणि सुमी माझ्या डोक्यावरून हात फिरवत म्हणत होती, ‘ ती माणसं नव्हती, देवदूत होते. ‘ 

 

मूळ हिन्दी कथा- ‘वे’ – 

मूळ लेखक – सुशांत सुप्रिय

मो. – 8512070086

मराठी अनुवाद – उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “नोकरीमधली एक मजेशीर आठवण (टेल्को फौंड्री)…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “नोकरीमधली एक मजेशीर आठवण (टेल्को फौंड्री)…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर

 – – रॉबर्ट यांचा विश्वास!

नोकरीमधला सगळ्यात मोठा पिरियड मी तेव्हाच्या टेल्को मधे चिंचवडला फौंड्री या विभागामधे काम केले. फौंड्री म्हणजे इथे लोखंडाचा रस तयार करतात आणि तो रस निरनिराळ्या साच्यांमधे ओतून गाड्यांना लागणारी कास्टिंग तयार करतात. मी मेंटेनन्स म्हणजे मशीन ची दुरुस्ती आणि देखभाल ह्या विभागात काम करत होतो. त्यामुळे माझ्याकरता ८ तासांची म्हणजे एक शिफ्ट ची नोकरी असा प्रकार नव्हता. बऱ्याच वेळा २ किंवा ३ शिफ्ट पण थांबावं लागायचं. एकदा शॉपमध्ये मेजर ब्रेक डाऊन आल्यामुळे, मी सलग ५ शिफ्ट शॉप मधे काम केले आहे. म्हणजे आज सकाळी कामावर गेलो आणि दुसऱ्या दिवशी रात्री १२. ३० घरी आलो. तेव्हा घरी फोन करून काही कळवण्याची सोय पण नव्हती. बायकोला माहित असायचं, कि हे आले नाहीत म्हणजे कंपनीमधे आहेत, आणि काळजीचे काही कारण नाही. जास्त थांबल्याचा फायदा म्हणजे नंतर कॉम्पेन्सेटरी ऑफ घेता यायचा.

लोखंडाच्या रसाची हाताळणी सतत होत असल्यामुळेअसुरक्षितता, मशीनचे कर्कश्य आवाज, आणि शॉपमधे चांगल्यापैकी एक्झॉस्ट सिस्टीम असूनही खूप धूळ, असे वातावरण कायमच शॉपमधे असायचे. पण सवय झाल्यानंतर त्याचे काही वाटायचे नाही.

लोखंडाचा रस करण्याकरता आमच्याकडे १२ टन क्षमतेच्या तीन विजेच्या भट्टी होत्या. अजून सुधारणा करण्याकरता ४० टन क्षमतेची होल्डिंग फर्नेस घेण्याचे मॅनेजमेंट ने ठरवले. आपली ८ फूट बाय ८ फूट खोली असते, तेवढी मोठी ही भट्टी असणार होती. १९७८ चा पिरियड होता. त्याप्रमाणे स्वीडन मधल्या ASEA या कंपनीवर ऑर्डर निघाली. भट्टीचे सगळे सामान आले. आणि भट्टीची उभारणी करण्याकरता स्वीडनचे इंजिनियर श्री निमीनन इथे आले. उभारणी करण्यात त्यांच्याबरोबर काम करण्याची मला छान संधी मिळाली. कधी कधी निमीनन यांना कार मधून हॉटेल मध्ये सोडणे किंवा तिथून ऑफिस ला आणणे हे काम माझ्याकडे यायचे. कार मध्ये बसल्यावर ते डोळे मिटून बसायचे, कां? तर, रस्त्यावरचा बेशिस्त ट्रॅफिक बघून त्यांना टेन्शन यायचे. ते म्हणायचे, स्वीडन मध्ये कोणीही कुठलाही ट्रॅफिक नियम कधीच मोडत नाही. त्यामुळे रस्त्यावर एकदम सुरक्षित वाटते. इथे अगदीच विरुद्ध आहे. मी चूप व्हायचो, काय उत्तर देणार!

निमीनन यांचे उभारणीचे काम संपले. आणि ते परत गेले. भट्टी सुरु करण्याकरता कमिशनिंग इंजिनियर ही वेगळी व्यक्ती येते. त्याप्रमाणे ASEA कंपनीचे जर्मनी मधले श्री रॉबर्ट इथे आले. कारमधून ऑफिस समोर उतरल्यावर ते बॅगेतून एक नवीनच घेतलेली कॅप काढायचे आणि डोक्यावर घालायचे. त्यावर समोरच्या फ्लॅप वर ASEA असे लिहिलेले होते. शॉपमध्ये काम करतांना त्यांच्या डोक्यावर ती कॅप कायम असायची. त्यांच्याबरोबर पण काम करण्याची मला छान संधी मिळाली. त्यामुळे शिकायला पण भरपूर मिळाले. म्हणता म्हणता रॉबर्ट यांचे काम संपले, भट्टी व्यवस्थित सुरु झाली, तिचा वापर पण सुरु झाला. रॉबर्ट यांची परत जाण्याची वेळ जवळ आली.

त्यावेळी श्री चौधरी साहेब हे फौंड्री चे मुख्य होते. रॉबर्ट यांच्या जाण्याच्या दिवशी सकाळी ११ वाजता चौधरी साहेबांनी स्पेशल मिटींग बोलावली. सगळ्या डिपार्टमेंट्स चे मुख्य, संबंधित स्टाफ, यांनां बोलावले होते. अर्थात मी पण त्यामधे होतोच. श्री रॉबर्ट पण हजर होते. ऑफिस च्या कॉन्फरन्स हॉल मधे मोठा अंडाकृती टेबल आहे. दोन्ही टोकांना एक एक खुर्ची आहे आणि दोन्ही बाजूला साधारण ८ – ८ खुर्च्या आहेत. आणि बाजूनी पण मागच्या भागात खुर्च्या आहेत. महत्वाची मिटिंग असल्यामुळे ११ ला हॉल पॅक झाला. चौधरी साहेब पहिल्या चेयर वर बसले होते आणि त्यांच्या डाव्या बाजूला श्री रॉबर्ट बसले. त्यांच्या बाजूला श्री सेठीसाहेब, राजाराव, के एस राव, नाडगर, देवधर, शेखर अशी सिनियर मंडळी होती. आणि दुसऱ्या साईडला श्री होडीवाला, इक्बाल सिंग, कोपरकर, बसूतकर, गद्रे, ताराबादकर ही सिनियर मंडळी बसली होती. माझा नंबर टेबलच्या दुसऱ्या टोकाच्या म्हणजे चौधरी साहेबांच्या बरोबर समोर दुसऱ्या टोकाच्या च्या खुर्चीवर लागला.

चौधरी साहेबांनी आधी फर्नेस च्या उभारणीचा उल्लेख केला आणि श्री निमीनन यांचे आभार मानले. फर्नेस व्यवस्थित सुरु करून दिल्याबद्दल श्री रॉबर्ट यांना पुष्पगुच्छ आणि गिफ्ट देऊन त्यांचे आभार मानले. आता रॉबर्ट यांचे काम संपले आहे आणि आज दुपारी ते आपल्या मायदेशी परत जाणार आहेत असे सांगितले. त्यांच्या संपर्कात राहून सगळ्यांनी आवश्यक ती माहिती घेतली असणार आहेच. पण अजून कुणालाही काही लास्ट मोमेन्ट शंका असतील, तर त्या त्यांनी श्री रॉबर्ट यांना आज जरूर विचाराव्या, जेणेकरून आपल्या सगळ्यांना फर्नेसचा वापर करतांना यापुढे काहीही अडचण येणार नाही. पुढचे नियंत्रण त्यांनी रॉबर्ट यांच्याकडे दिले.

श्री रॉबर्ट : (रॉबर्ट जर्मनी मधे रहात असूनही इंग्रजी छानच बोलायचे) माझ्या कामात सगळ्यांनीच मला छान सहकार्य केल्याबद्दल मी सगळ्यांचे आभार मानतो. माझे सगळेच काम खेळीमेळीच्या वातावरणात छानच झाले. माझ्या राहण्याची आणि इथे रोज जाण्या-येण्याची पण व्यवस्था खूपच छान होती. चौधरी साहेब यांनी सांगितल्याप्रमाणे तुम्ही तुमच्या शंका जरूर विचारा —

(सगळ्यांना वाटले की आता लोक शंका विचारतील आणि रॉबर्ट उत्तरे देतील)

पण रॉबर्ट यांनी एकदम गुगली टाकली. त्यांनी स्वतःच्या डोक्यावरची ASEA लिहिलेली कॅप हातात घेतली आणि टेबलवरून ती माझ्याकडे भिरकावली. कॅप बरोब्बर माझ्यासमोर येऊन थांबली.

रॉबर्ट : Karandikar, This cap is for you and cap is now yours.

रॉबर्ट : (सगळ्यांना उद्देशून) चौधरी साहेब यांनी सांगितल्याप्रमाणे तुम्ही तुमच्या शंका जरूर विचारा, पण त्यांना मी उत्तरे देणार नाही, माझ्या वतीने मिस्टर करंदीकर उत्तरे देतील.

मी स्वतःला चिमटा काढून जागे असल्याची खात्री करून घेतली. माझ्या बाजूला बसलेल्यांनी हात मिळवून माझे अभिनंदन केले.

प्रश्नोत्तरे सुरु झाली. सगळ्यांनीच सहभाग घेतला. थोड्याच वेळात चहा आणि बिस्किटे आली. १ वाजता मिटिंग संपली. सगळ्यांनी रॉबर्ट यांना बाय बाय केले आणि आम्ही जेवायला कँटीन मध्ये गेलो.

असा आणि इतका विश्वास कोणी अनोळखी परदेशी माणूस आपल्यावर दाखवू शकतो, हा एक आगळा वेगळा आणि स्फूर्तिदायक अनुभव आज मला मिळाला. (मी मनात देवाचे आभार मानले आणि फौंड्री चे आभार मानले, आणि रॉबर्ट यांचे आभार मानले)

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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