श्री मदन शर्मा
(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वीपंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास – बीच का आदमी… को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)
☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ३ ☆ श्री मदन शर्मा
(चित्र साभार – श्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)
≡ तीन ≡
आशी आराम से लेटी सो रही है। ट्रेन में भी वह कैसे, निश्ंिचत हो कर सो जाती है! एक मैं हूं, जिसे सफ़र के दौरान, बढ़िया सीट उपलब्ध होने के बावजूद, कभी नींद नहीं आती।
अभी, सिर्फ़ साढ़े ग्यारह हुए हैं। गाड़ी किसी जंक्शन पर रूकी खड़ी है। शायद दो एक अतिरिक्त डिब्बे, यहां से गाड़ी के साथ जोड़े जायेंगे।
बर्थ से उतर कर, खिड़की में से, चाय वाले को, दो कप चाय देने को कहता हूं।
आशी को जगा कर, चाय का गिलास, उसे थमा देता हूं। वह बिना संवाद ही, चाय पीने के बाद, ख़ाली गिलास मुझे पकड़ा देती है और पुनः लेट कर आंखें बंद कर लेती है। चाय भी उसकी नींद को प्रभावित नहीं कर पाती। एक मैं हूं जो…
बैग से, पत्रिका निकाल और बिस्तर में थोड़ा-सा फैल कर, पढ़ने का प्रयास करता हूं। किसी समांतर लेखक की कहानी मालूम पड़ती है ‘हड़ताल’।
हड़ताल तब पूरी तरह असफल रही थी और हड़तालियों के हौसले, वर्षों तक के लिये, पस्त हो चुके थे। हालांकि चंद बाहरी नेताओं ने, ऊपरी तौर पर, मामला रफ़ा दफ़ा करा दिया था। जिन कर्मचारियों की सर्विस ब्रेक हुई थी, उनकी एक दिन की, अवैतनिक छुट्टी स्वीकार कर ली गई थी और नौकरी से डिस्चार्ज कर दिये जाने वालों से, मुआफ़ी नामे के छपे फार्म भरा कर, उन्हें पुनः नौकरी पर ले लिया गया था। इस अभियान में, प्रशासन को विशेष सहयोग देने वालों में से, कुछ को प्रमोशन दे दिये गये थे।
हड़ताल को असफल बनाने का श्रय, एन0 मोहन को ही जाता था। यूनियन की तो उसने कमर ही तोड़ कर रख दी थी। वह अब सड़क पर, और भी अधिक तन कर चलता। कोई वर्कर इधर उधर घूमता नज़र आता, तो उसे वहीं थाम लेता और अच्छी ख़बर लेता। साथ ही आदेश हो जाता,
“स्टाॅप हिज़ ओवर टाइम फ़ाॅर ए वीक!”
स्टाफ़ की मजाल नहीं, कि उस वर्कर की सिफ़ारिश करें। वरना, उसका अपना ओवर टाइम भी, महीने भर के लिये बंद।
देखा, सामने से वही चला आ रहा है। मैंने नमस्ते की, जिस पर उसने ध्यान नहीं दिया।
“मिस्टर, क्या बात है, आप आज कल अपने काम में दिलचस्पी नहीं ले रहे?”
मैं कुछ नहीं बोला।
“आपके आदमी, हूटर होने से बीस मिनट पहले ही, साबुन से हाथ धोकर, बारातियों की तरह खड़े हो जाते हैं और आप उन्हें कुछ भी नहीं कहते!”
“सर, पहले से तो हालत बहुत सुधर गई है।”
“क्या?… जुआ खेलना बंद हो गया?”
“स्ट्राइक के बाद तो ऐसा नहीं देखने में आया।”
“आप को पता ही क्या चलता होगा। आप को यह मालूम है, कि आप के चंद वर्कर, शाम को घर जाने से पहले, यहीं से स्पिरिट पीकर घर जाते हैं?”
“स्पिरिट तो सर, ताले में रखी जाती हैं।”
“डुप्लीकेट चाबी बनाने के लिये, उन्हें लंदन तो नहंीं जाना पड़ता।”
उसके तर्क के आगे, मैं भला कहां टिक सकता था!
“देखो मिस्टर, एक बात बता दूं… अच्छा बनने, या अच्छा कहलाने का ख़याल दिल से निकाल दो। प्रमोशन चाहिये, तो नीचे वालों की नज़र में कभी अच्छे मत रहो। यु फ़ालो माई प्वाएंट?”
“येस सर।”
“हां, वो ढाई सौ वाशर तैयार हो गये?”
“जी सर।”
“डिस्पैच कब तक हो जायेंगे।”
“आज सुबह भेज दिये।”
“ज़यादा रिजेक्ट तो नहीं हुए?”
“सभी पास हो गये सर।”
“ओ0 के0… अपना काम थोड़ा आंखें खोल कर किया करो।”
एन0 मोहन का दफ़तर, हमारे सेक्शन से अधिक दूर न था और हमारे फ़ोरमैन के दफ़तर में ट्रेलीफोन मौजूद था। तब भी वह, किसी को बुलाने के लिये, हमेशा लोकराम को भेजता था, ताकि व्यक्ति विशेष को वह साथ लेकर ही पहुंचे।
वह कुछ ही देर पहले, मुझे पैरेड करा कर गया था। अपने दफतर में पहंुचते ही उसने मुझे बुलाने लोकराम को भेज दिया।
वह उस समय, अकेला ही बैठा था। अब मूड कुछ बेहतर मालूम पड़ रहा था।
“बैठिये।”
मैं ‘थैंक्स’ कह कर बैठ गया।
“क्या नाम बताया था आपने उस लड़की का, अर्चना?”
“जी।”
“मैंने उसका नाम इधर मंगवा लिया है। उसे टाइप सीखने के लिये कह दिया था न?”
“जी, सीख रही है।”
”थोड़ा बहुत आना चाहिये। बाक़ी यहां प्रैक्टिस हो जायेगी। सोच रहा हूं, उसे रखा कौन से सेक्शन में जाये। स्कूल और अस्पताल में तो कोई जगह ख़ाली नहीं। वर्कशाप में हम किसी लड़की को लगा नहीं सकते। वर्कर लोग वक़्त-बेवक़्त सीटियां ही बजाते रहेंगे और इधर दफ़तर में… हां, इधर ही कहीं एडजेस्ट करना पड़ेगा और टाइपिंग का काम तो ज़यादातर एडमिन साइड में ही होता है। क्या ख़याल है?”
“आप जैसा भी ठीक समझें।”
“अच्छा, एक बात तो बताइये, आप का मैथ्स कैसा है?”
“ठीक ही है।”
“ठीक ही है, मतलब बेकार है? हाई स्कूल में कौन सी डिवीज़न थी।”
“सर, डिवीज़न तो फ़स्र्ट ही थी।”
“तब, काम चल जायेगा… बात ऐसी है, वो हमारी लड़की है मीता। देखा तो होगा उसे?”
“जी।”
“उसे एक कम्पीटीशन में बैठना है। बाकी तो वह सब कर लेगी। मगर उसे मैथस में थोड़ा गाइड करने की ज़रूरत है। करा तो मैं भी देता, मगर टाइम कहां है मेर पास! वैसे भी, आउट आफ टच हूं और भाई, अब बूढ़ा भी तो गया हूं।” कह कर वह हंसने लगा।
लेकिन मैंने देखा, उसके गालों पर, जवान लोगों से भी अधिक लाली झलक रही है। लम्बा चैड़ा तगड़ा शरीर और बड़ी बड़ी आंखों में हर समय तैरती कोई नई शरारत!
“तो?”
“ठीक है सर, मुझ से जितना बन पायेगा, ज़रूर करूंगा।”
“तो, मेरा मतलब है, कब से आ सकोगे?”
“कल से, छुट्टी होने के बाद आ जाया करूंगा।”
“आज, कहीं ख़ास काम है?”
“सर, आज मैंने किसी को टाइम दे रखा है।”
“ओ0 के0 जेंटलमैन, थैंक यु।”
मैंने झूठ बोला था। उस शाम के लिये, मैंने किसी को कोई टाइम नहीं दे रखा था। न जाने क्यों, मैं यह पूरी शाम, अकेले गुज़ारना चाहता था, चुपचाप ख़मोश!
दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। आधी आधी रात तक, नाटक और नृत्य की रिहर्सिल, तबला, हारमोनियम और घुंघरूओं की छनछन। देवी प्रतिमा, को बनाने, संवारने और सजाने में महीना भर से भी अधिक समय लग जाता। इस अवसर पर, मामूली हैसियत का बंगाली भी, सपरिवार, नये वस्त्र सिलाकर पहनता, नाचता, गाता और पूजा पर्व पर आयोजित कार्यक्रमों में, बड़े उत्साह से भाग लेकर, संतुष्ट और आनन्दित महसूस करता। मिठाई का भोग लगाता और मित्रों आदि को भी अपने यहां आमंत्रित करता। ख़ूब जशन मनाया जाता, भले ही इस सप्ताह भर के आनन्द के बदले, उसे पूरा साल, ऋणभार तले ही दबा रहना पड़ता।
मैं भी कैसी कैसी बातें सोचना शुरू कर देता हूं! सभी में कुछ न कुछ विशेषता होती है। किसी में कुछ तो किसी में कुछ और…
मीता!
मीता, कई तरह से बहुत आगे थी। बी0 ए0 कर चुकी थी। उसकी इंगलिश अच्छी थी। उच्चारण भी उम्दा था। दूसरे के मन की बात, तो वह खुली किताब की तरह पढ़ लेने में वह समर्थ थी… वह खूबसूरत थी, काफ़ी खूबसूरत। शरीर, जैसे सचमुच ही, सांचे में ढला हो। सब से बड़ा आकर्षण था, उसकी अनींदी सी आंखांे और नशीली आवाज़ में।
शुरू में, उसे ठीक से देखने का साहस नहीं जुटा पाया था। कई अवसरों पर, मैंने पूरा समय, दृष्टि को इधर उधर उलझा कर ही स्वयं को सुरक्षित बनाये रखा था। किंतु मैथस के प्र्र्र्रश्न समझाते समय, जब वह थोड़ा नज़दीक बैठ जाती, तो कभी कभी वह मुझे काफ़ी नज़दीक महसूस होने लगती।
“यह प्राॅब्लम, आप को समझ में आ गई?” मैंने पूछा।
“बिल्कुल! आप के समझाने का तरीक़ा ही कुछ ऐसा है, कि बात समझ में आये बिना रह नहीं सकती।”
उसके दांत देख, कभी कभी ईष्र्या होने लगती। सफ़ेद और चमकीले। न जाने क्यों, बढ़िया से बढ़िया टुथपेस्ट का प्रयोग करने के बावजूद, मेरे दांतों पर पीलापन सा जमा, रह ही जाता है।
“क्या देख रहे हैं?” उसने हंसते हुए पूछा।
“आप की हंसी देख रहा हूं।”
“मैंने आप को, कभी हंसते नहीं देखा… आप का कभी हंसने को मन नहीं होता?”
मैंने बात को घुमाते हुए पूछा, “साहब क्लब चले गये?”
“वे तो आप के आने से पहले ही चले गये थे।”
“आंटी? वे भी साथ गई हैं?”
“नो… बहुत ही कम आती जाती हैं वे कहीं।”
“मतलब, घर में ही हैं।”
“हां, अन्दर एक छोटा कमरा है न, वहीं बैठी रहती हैं।”
“वहां क्या करती हैं?”
“बस, सोचती ही रहती हैं?”
“क्या सोचती रहती हैं?”
“आई डोंट नो, मैंने कई बार पूछा। मगर कोई जवाब नहीं। बस, चुपचाप टकटकी लगाये, छत या दीवारों को ही घूरती रहती हैं।”
“मैंने देखा है, वे अकसर सफ़ेद कपड़े ही पहने रहती हैं।”
“टंªक अलमारियां सब भरे पड़े हैं, क़ीमती रंगीन कपड़ों से, आंटी के पास हर प्राॅविंस की ड्रेस है। मगर पहनेंगी वही सफ़ेद साड़ी ब्लाउज़“
“बोलती भी बहुत कम हैं।” मैंने कहा।
“बहुत ही कम। अंकल के साथ तो उनकी बातचीत, ना के बराबर है।”
“और आप के साथ?”
“कई बार लगता है, मेरे साथ वे कोई बात करना चाहती हैं। कुछ कहने भी लगती हैं। मगर एकाएक ही न जाने क्या हो जाता है। जैसे कोई शाॅक से लग गया हो। बस, तभी चुप। सामने वही दीवारें या छत को घूरना।”
मैंने कहा, “चलिये, नेक्स्ट प्राॅब्लम पर आ जाइये।”
“ठीक है, शुरू कीजिये।”
ढोल बजने की आवाज़, लगातार कोनों में पड़ रही थी। दुर्गापूजा का मुख्य आयोजन, मेरे क्वार्टर के ठीक सामने, सड़क के पार, छोटी क्लब के बड़े से प्रांगन में था। ढोल की आवाज़ वहीं से आ रही थी। आरती नृत्य का समय था, तभी बाहर सड़क पर इतनी चहल पहल नज़र आ रही थी।
पुरूष, नये सिले पैंट-कमीज़ या धोती कुरते में, पर्याप्त उत्साहित दिखाई पड़ रहे थे और महिलाएं, चटकदार साड़ियां पहने, पूरा बनाव-श्रृंगार किये, हाथों में पूजा की थालियंा लिये, मस्ती भरी चाल से चलती, हंस हंस कर बातें करती और कुछ गुनगुनाती सी हुई, पूजास्थल की ओर चली जा रही थीं।
अर्चना कुछ ही देर पहले इधर आई थी और अब सामने चुपचाप बैठी थी।
“तुम भी उधर हो आओ थोड़ी देर के लिये।” मैंने अर्चना से कहा।
“मैं वहां क्या करूंगी!”
“देवी दर्शन, सभी जा रहे हैं वहां।”
“मन नहीं होता।”
“कहते हैं, मां बिगड़े काम बना देती हैं।”
“जब बना देेंगी, तब चली जाउंगी दर्शन करने!”
“नौकरी तो तुम्हारी, लगी ही समझो।”
“तब भी, मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता।”
उसकी आंखें भर आई थीं।
सांत्वना देने के लिये मुझे उपयुक्त शब्द नहीं मिल पा रहे थे। सोचने लगा, अर्चना के भी पहले कम शौक न रहे होंगे। नाटक, नृत्य, सभी में उसकी रूचि रही होगी। वह भी अपने अनिल भइया के साथ, रात के दो-दो बजे तक मंचित होने वाले नाटक देखती ही होगी। ठीक तो है, अब इसे क्या भायेंगे ये खेल तमाशे!
उसने आंखें पोंछ लीं। फिर थोड़़ा सामान्य होने का प्रयास करते कहने लगी, ”मगर, आप तो जाकर दर्शन कर आइये देवी मां के।”
“मेरा भी जाने को मन नहीं।”
“क्यों भला?… मुझे दरअसल आज इधर आना ही नहीं चाहिये था।” कह कर, वह उठ खड़ी हुई।
“अरे! क्या हुआ?”
“काफ़ी देर हो गई। अब चलंू।”
“थोड़ा रूको। अंधेरा हो गया है। मैं साथ चलकर छोड़ आउंगा। … चिंता की अब तो कोई भी बात नहीं, नियुक्ति पत्र, दो तीन दिन में मिल ही जायेगा।”
बाहर वाले बरामदे में खटखट की आवाज़ हो रही थी, जैसे कोई ऊंची एड़ी के सैंडिल पहने, चहल क़दमी कर रहा हो। बाहर जाकर देखा।
“अरे, मीता!”
“फ़ीलिंग सरप्राइज़्ड?” उसने मुस्करा कर पूछा।
“ऐसी कोई बात नहीं, अन्दर आइये न।”
“सोचा, दुर्गा पूजा के साथ साथ आप का बंगला भी देखती चलूं। ओह साॅरी!” उसने कमरे में किसी को उपस्थित देख कहा, “साॅरी की कोई बात नहीं, अर्चना है। आप तो जानती हैं न?”
‘श्योर!… कहां बैठूं?”
“इसी कुर्सी पर बैठ जाइये।”
“थैंक्स।”
मैं उन्हें छोड़, किचिन में चला गया और चाय के लिये पानी रख दिया। कुछ देर पहले, चाय बनाने लगा था, तो अर्चना ने मना कर दिया था। कहने लगी, ज़यादा चाय पी लेने पर, उसे मतली होने लगती है।
प्लास्टिक का डिब्बा खोल कर देखा, एक भी बिस्कुट नहीं है। बड़ी शरम महसूस हुई।
कमरे में वे दोनों न जाने क्या बात कर रही थीं। पानी खौलने लगा था। देखा, खटखट करती हुई, मीता वहीं आ पहंुची है।
“यह क्या हो रहा है?”
“चाय तैयार हो रही है।”
“मेरे लिये मत बनाइयेगा।”
“क्यों?”
“प्लीज़, मेरे लिये नहीं, मैं चाय नहीं पियूंगी।”
“यह तो अब बन चुकी है।”
इस बीच मैं चायपत्ती, चीनी और दूध, खौलते पानी में छोड़ चुका था।
“तब क्या करेंगे?” उसने पूछा।
“नाली में तो मैं इसे नहीें फंेकूंगा।”
“फिर?”
“फिर क्या! पीनी पड़ेगी।”
“ठीक है… पी लेंगे!” कह कर वह हंसने लगी।
दो कप, जिन मेें मैंने चाय डाली थी, वह उठा कर कमरे में ले गई। तीसरा कप, मैंने स्वयं उठा लिया।
तीनों चाय पी रहे थे और शायद तीनों ही यही सोच रहे थे, कि क्या बात की जाये!
मैं ही बोला, “रात के समय आप अकेली कैसे चली आईं इस इलाक़े में?” मैंने मीता से पूछा।
“क्यों, आप का यह इलाक़ा, क्या डिसट्रिक्ट मुरैना में पड़ता है?”
मीता की बात सुन कर अर्चना की हंसी छूट गई।
“थैंक्स!” मीता ने अर्चना की ओर देख विनम्रता से कहा।
“किस बात के लिये?” अर्चना ने मीता की ओर चकित होकर देखा।
“आप जैसी गुमसुम लड़की का हंसना, कोई मामूली बात तो नहीं! फिर हंसिये न एक बार। सच, आप बहुत अच्छी लगती हैं हंसती हुई।”
किंतु अर्चना, पुनः नहीं हंस पाई।
“आज का नाटक देखेंगे?” मीता ने शायद हम दोनों से ही पूछा था।
“कौन सा नाटक?” मैंने पूछा।
“बादल सरकार का पगला घोड़ा, दुर्गा पूजा वाले, जो सामने वाले मैदान में करने जा रहे हैं। उनके छपे प्रोग्राम में यही लिखा था।”
मैंने कहा, “मुझे तो कभी शौक नहीं रहा नाटक वाटक देखने का।”
“मुझे भी नहीं।” अर्चना ने कहा।
“स्ट्रेंज!… अच्छा, तो मैं चलूं। अंकल को उधर छोड़ कर आई थी। दो मिनट के लिये कहा था, बीस मिनट लग गये।”
“साहब भी आये हैं? उन्हें क्यों नहीं लाईं यहां?”
“उन्हें नाटक शुरू होने से पहले, स्टेज पर जाकर छोटा सा भाषण देना है। मालूम है, आज अंकल धोती कुरते में हैं। बिल्कुल महात्मा लग रहे हैं!” कह कर वह हंसने लगी।
मैंने अर्चना से कहा, “चलो, हम भी उधर हो आयें थोड़ी देर के लिये।”
“मैं तो अब घर ही जाऊंगी।”
“घर इस वक्त अकेली कैसे जा सकोगी।”
“आप चिंता ने करें, मुझे कुछ नहंीं होगा।” कहते ही अर्चना उठ खड़ी हुई।
तभी मीता बोल पड़ी, “मैं अंकल से कह देती हूं, वे कार से छोड़ आयेंगे।”
कार वाली बात सुन, अर्चना सकपका सी गई। बोली, “नहीं नहीं, आप कष्ट न करें, मैं पैदल चली जाऊंगी।”
मीता ने हंसते हुए, अर्चना का हाथ पकड़ लिया और बोली, “आप क्या समझती हैं, मैं आसानी से पीछा छोड़ देने वाली हूं? नो नो माई डियर, आप को हमारी कार में ही जाना पड़ेगा।”
“मगर…”
“अरे उठिये भी और आप, क्वार्टर को ताला लगाइये।”
उसका चेहरा देख, कोई भी नया शख़्स, आसानी से धोखा खा सकता था। वह हरदम हल्के हल्के मुस्कराता ही नज़र आता। सांवला वर्ण, तीखे नक़्श, दरम्याना क़द, शरीर छरेहरा और फुर्तीला सा। चाल में तेज़ी और आवाज़ में शीरनी घुली हुई!
वह कहता, “आज आपका काम, हर हालत में हो जायेगा। लीजिये, मैं आप का नाम, डायरी में सबसे ऊपर लिख लेता हूं और क्वार्टर नम्बर… यही है न आपका क्वार्टर नम्बर, बहत्तर का पांच?”
“जी हां, यही है।”
“तो समझिये, आप का काम हो गया!”
क्या मजाल, जो कभी किसी ने, उसके चेहरे पर शिकन देखा हो, या उसने किसी को उसके काम के लिये कभी मना किया हो।
फैक्टरी में वह भी सुपरवाइज़र था। किंतु मेरी तरह नहीं। वेतन तो उसे, मुझ से भी कम मिलता था। मगर उसकी चलती बहुत थी। उसका काम ही कुछ ऐसा था, कि एस्टेट के प्रत्येक निवासी को, उससे कभी न कभी, काम पड़ ही जाता था।
बिजली, पानी, नल फ़्लश अथवा क्वार्टर की छोटी मोटी मरम्मत और देखभाल, सब उसी के ज़िम्मे था। स्टाफ़ कम था और उसके हिसाब से, क्वार्टरों की संख्या और रोज़मर्रा की समस्याएं बहुत अधिक। कारीगर और मज़दूर, सभी ऐसे थे, जैसे आमतौर पर सरकारी कर्मचारी हुआ करते हैं। पूरे दिन में, दो घंटे भी काम कर ल, ें तो समझ लिया जाये, सरकार और देश की जनता पर, भारी उपकार हो गया। चार आदमी मिलकर एक छोटे क्र्वाटर की, चार दिन में पुताई करते। उसे करने के लिये भी, वे बड़े ही नख़रे और हील हुज्जत के बाद तैयार होते। मगर यदि उन्हीं में से, किसी एक को, प्राइवेट तौर पर अर्थात अपनी जेब से पैसे ख़र्च करके, उसी काम के लिये पक्का कर लिया जाता, तो वह अकेला ही, ढाई तीन घंटे में, पूरा काम निबटा और रूपये अपनी जेब में डाल कर चलता बनता।
अस्तु, उन लोगों से काम लेने वाला और अनेक क्वार्टर-निवासियों को संतुष्ट करने हेतु, वही एक मात्र व्यक्ति था। ऊपर वाले तो, आवेदन पत्रों को, केवल ‘उचित कार्यवाही हेतु’ वाली संक्षिप्त टिप्पणी लिख कर खिसका देते। सभी मामले घूमफिर कर, उसी के पास पहुंचने होेते थे। इसीलिये, सभी ज़रूरतमंद, अकसर उसी के पास सीधे पहंुचते थे और वह सभी को यही आशवासन दे दिया करता, “आप का काम जल्दी हो जायेगा।”
वह, जिस का नाम रोशन लाल था, किसी को ‘न’ कहना तो जानता ही न था। किंतु वह किसी का काम कब करेगा, करेगा भी या नहीं, कोई नहीं कह सकता था।
मगर चंद लोगों का काम वह तुरंत करा डालता था। अफ़सर, युनियन के बड़े नेता या उनके मुख्य चमचे, उसका कोई बहुत ही परिचित या कोई ऐसा व्यक्ति, जिस से उसका कोई अपना काम निकलता हो।
एक बार लिखकर, चार बार फ़ोन पर और पांच बार व्यक्तिगत सम्पर्क करके, मैं उससे निवेदन कर चुका था, कि मेरे क्वार्टर में फ़्लश काम नहीं कर रहा। फ़र्श कई जगह से उखड़ गया है और बाथरूम का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता।
इनमें से कोई भी बात ऐसी न थी, जिसके कारण, फैक्टरी के उस ‘मेनटिनेंस-अनुभाग’ में भगदड़ मच जाती। किंतु जब मेरे क्वार्टर के पिछले आंगन का बाहरी दरवाज़ा जिसकी लकड़ी पूरी तरह गल सड़ चुकी थी, एक ओर को झूलना शुरू हो गया, तो मैंने रोशन लाल को चेतावनी देते कहा, “यदि मेरे क्वार्टर में चोरी हो गई, तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी आप पर होगी।”
वह हंस कर बोला, “चोरी हो जाने पर हर्जाना मैं दूंगा! मगर मुझे विश्वास है, कि आप के क्वार्टर में चोरी नहीं होगी। चोर भला अकेले आदमी के घर, क्या चुराने आयेंगे!”
“फिर भी मिस्टर रोशन लाल…”
“आप का काम हो जायेगा, आप बिल्कुल चिंता न करें।”
“चिंता न करूं।”
“परेशानी तो यह हैं, कि आपके क्वार्टर में हर वक़्त ताला लगा रहता है। रिपेयर का काम हो तो कैसे?”
“ताला खुल भी तो सकता है।”
“कैसे? तोड़ कर?” उसने मुस्करा कर पूछा।
“तोड़ने की ज़रूरत नहीं। जिस दिन भी आप अपना अमूल्य समय देने में समर्थ हों, चाबी मिल जायेगी।”
“यह हुई न बात! मेरे पास कल चाबी पहंुचा दें और फिर देखिये, कितनी जल्दी होता है आपका काम!”
मेरे पास क्वार्टर की डुप्लीकेट चाबी थी, जो मैंने रोशन लाल को दे दी। वैसे इतना तो मुझे पता ही था, कि इतने मामूली काम में भी, आठ दस दिन लग जाना मामूली बात है।
किंतु उस साधारण मरम्मत में तो, मेरे अनुमान से बहुत अधिक समय लग चुका था और काम अभी तक अधूरा पड़ा था। फ़र्श पहले से भी बुरी हालत में था। दरवाज़े ज़रूर ठीक हो गये थे। फ़्लश भी काम करने लगा था। मगर फ़र्श! उसकी हालत ने, बुरी तरह परेशान कर रखा था। सभी ओर मिट्टी और हर चीज़ पर धूल। खाना तैयार तो कर लेता, मगर खाने को मन न होता। इसी वजह से, रात को, गांव के छोटे से बाज़ार में जाकर, ढाबे में खाना खाने लगा।
तंग आकर, एक दिन फिर पूछा, “रोशन लाल जी, कब तक हो जायेगा, इस मरम्मत का हिसाब किताब पूरा?”
“जब भी आप हुक्म दें, तभी। बात यह है, कि अपने आदमी का काम संतोष जनक न हो, तो हमारे ऊपर सौ बार लानत! आपका काम होगा एक दम फ़्र्सट क्लास!”
मैंने कहा, “अरे भई, यह कौन सी हमारे पिता जी की जायदाद है। आप बस, जैसा भी होता है, इसे पूरा करा दें।”
“बस, अब तो सिर्फ़ दो तीन दिन का काम और रह गया है। आप तो जानते हीे हैं, ये सब बहन के यार, काम करने में कितने सुस्त हैं और भाई साहब, आजकल टाइम बहुत ही ख़राब है। जिस किसी को ज़रा सी बात भी कह दो, वही साला जाकर यूनियन के मुसटंडों को लाकर हमारे सिर पर सवार कर डालता है।”
“आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।” मैंने उसकी बात की ताईद की।
“मगर आप निश्चिंत रहें। मैं इन हरामियों से निबटना खूब जानता हूं। आप का काम, बस हुआ ही जानें।”
अपना कोई भी दोष न होने के बावजूद, मेरी गर्दन शरम से झुकी जा रही थी। मेरे पास, अर्चना की बात का कोई भी उत्तर न था।
मुझे उसका कोई ऋण नहीं चुकाना था और न मैंने अब तक, उससे किसी तरह का कोई वायदा ही किया था और न अभी तक हमारे बीच कोई रिश्ता ही क़ायम हुआ था। तब भी…
मगर उसने भी तो अपनी बात, कुछ कटुता या व्यंग्य में नहीं कही थी। मामूली सा प्रश्न था, ”कौन थी वह लड़की?”
मुझे नहीं मालूम, वह कौन थी, जिसे अर्चना ने मेरे क्वार्टर से बाहर निकलते देखा था।
मैंने पूछा, “ठीक से याद है, मेरा ही क्वार्टर था?”
“कमाल है! मैं आप के क्वार्टर को कैसे भूल सकती हूं!”
“समय क्या रहा होगा?”
“चार-सवा चार का होगा।”
“मैं तो उस समय फैक्टरी में होता हूं।”
“वही तो मैं हैरान थी।”
“अब इस बारे में क्या कहूं?”
“इस बारे में मैंने आप से पूछा तो कुछ नहीं, सिर्फ बताया है। मेरा मतलब, मामला चोरी का तो नहीं?”
“चोरी तो कुछ नहीं हुआ। मगर…”
मैं बात, अर्चना से कर रहा था और सोच कुछ और ही रहा था।
अर्चना ने कहा, “आप तो सचमुच ही मेरी कही बात का बुरा मान गये। विश्वास कीजिये, मेरा वैसा कुछ भी इरादा न था और फिर मेरा अधिकार भी तो…“
मैंने बीच में ही टोका और खीज कर कहा, ”क्या वाहियात बात है!”
मैं अकस्मात ही इस प्रकार खीज कर बोला, तो वह सहम गई। देखते ही देखते, उस के माथे पर पसीने के क़तरे उभर आये। मैंने उसे इस तरह देख, अपना मूड सप्रयास बदला और मुस्कराने की भी चेष्ठा की।
“मैं पता कर के बताऊंगा, वह लड़की कौन थी।”
“कोई भी हो, मुझे नहीं जानना!” उसने उकता कर कहा।
“यह तुम्हारे जानने की हो तो बात नहीं। तुम्हारी तरह, किसी और ने भी तो उसे देखा होगा। क्वार्टर मेरे नाम पर है। बदनामी भी मेरी ही होगी।”
वह कुछ सोचने के बाद बोली, “क्वार्टर क्या खुला ही पड़ा रहता है दिन में?”
“खुला तो नहीं रहता। मगर मैंने डुप्लीकेट चाबी रोशन लाल को दे रखी है।”
“मरम्मत अभी तक चल रही है।”
“अभी तक तो चल ही रही है!”
यह एक तरह से ठीक ही हुआ, कि अर्चना ने बात को मन में न रख कर, अपनी शंका मेरे सामने व्यक्त कर दी।
अनुमान था, रोशनलाल अपने ऊपर लगे लांछन की बात सुनते ही आग बगूला हो उठेगा और लांछन लगाने वाले का नाम तुरंत जानना चाहेगा। मगर मेरी बात सुन कर वह तटस्थ ही बना रहा। फिर मुस्करा कर पूछने लगा, “आप से किस ने कहा?”
“किसी ने भी कहा हो! बात सच है या झूठ?”
“सच और झूठ के बीच, एक सूत का भी फ़ासला नहीं होता। और फिर अन्तर ही क्या पड़ता है ऐसी मामूली बातों से?”
मैंने पर्याप्त कटु होकर कहा, “मिस्टर रोशन लाल, अन्तर मुझे पड़ता है। क्वार्टर मेरे नाम पर है। वहां मैं रहता हूं।”
“गरम होने की भला क्या ज़रूरत है! वैसे मैं समझ तो गया, आप तक यह बात किस ने पहंुचाई!”
“किसी ने भी पहुंचाई हो, बात है तो बुरी न!”
“अरे भाई साहब, बात कुछ भी नहीं है! आप सुबह से शाम तक फैक्टरी की चारदीवारी में बंद रहते हैं। आप को क्या मालूम, बाहर एस्टेट के क्वार्टरों में दिन भी क्या क्या गुल खिलते हैं। मैं तो एक एक के कारनामों से वाक़िफ हूं, मियां शाम तक फैक्टरी में ओवर टाइम किया करते हैं और बीवी साहिबा पीछे घर में…”
“छी छी! कैसी बातें आप किये चले जा रहे हैं!”
वह बदस्तूर ढीट सा बना हुआ था।”कौन, किस के पीछे लगा हुआ है, मेरे पास तो पूरी लिस्ट मौजूद है।”
“प्रत्येक क्वार्टर में अपनी पहंुच का यही लाभ कमाया है आपने!”
“भाई जान, लाभ हानि के प्रश्न, मैं कक्षा सात में हल किया करता था। अब नहीं सोचता इन छोटे मोटे प्रश्नों के बारे में! सही बात तो यह है, कि जब आम, पेड़ पर से अपने आप टपक कर किसी की झोली में आ पड़े, तो बेचारा झोली वाला क्या करे! मैं फिर कोई साधू संत या धर्मात्मा टाइप आदमी भी नहीं, जो…”
मैंने अपनी कटुता में, मामूली-सी कृत्रिम विनम्रता का घोल मिला कर कहा, आप की बड़ी ही कृपा होगी। जो शीघ्र अति शीघ्र्र, मेरे क्वार्टर से अपना कबाड़ उठा लें। मुझे मरम्मत नहीं करानी!”
“मरम्मत का काम तो पूरा हो चुका।”
“मुझे आप से यह उम्मीद न थी!” मैंने पुनः निराशा जताई। वह चलते चलते बोला, “आप से जिसने शिकायत की, मैं उसे एक अच्छी लड़की समझता था!”
“बात मुझ तक पहंुचाने के बाद, वह अच्छी से बुरी लड़की बन गई?”
उसने उत्तर नहीं दिया।
समझ में नहीं आता, ये लोग किसी की कही बात को समझने की कोशिश क्यों नहीं करते! कितनी बार कहा है, कि जब काम न करना हो, तब कहीं इधर उधर जाने से पहले, मशीन का स्विच ज़रूर आॅफ़ कर दिया करें। मगर किसी को कोई परवाह नहीं! मोटर लगातार गरम होती रहती है। पाॅवर अलग ज़ाया जा रही है। ऐसे में कोई दुर्घटना हो जाये, तो लेने के देने पड़ जायेंगे।
इधर मशीन चल रही है और उधर दूर खड़े वर्कर साहब, किसी से बतिया रहे हैं। खुद ख़ाली हैं और दूसरे को भी अपना काम नहीं करने दे रहे!
“यह क्या हो रहा है मिस्टर?” मैंने एक को टोकना चाहा।
”होना क्या था! ज़्ारा इंस्पेक्शन तक जा रहा हूं।”
“वहां क्या है?”
“देखना है, मेरा पहले भेजा हुआ लाॅट, पास हुआ या नहीं।”
“यह मालूम करना, आप का नहीं, मेरा काम है।”
“अच्छी बात है! बहुत अच्छी बात है! आप जाकर मालूम कर लीजिये। मेरा नया लाॅट रिजेक्ट हो गया, तो आप पर ज़िम्मेदारी होगी।”
“अरें, लाॅट आप बना रहे हैं, तो मैं कैसे ज़िम्मेदार हूंगा?”
“तभी तो कहा, मेरे वहां पहुंचे बिना, काम पास नहीं होगा।”
“क्यों नहीं होगा, यह तो पता चले?”
“जाकर देख लीजिये। समोसे और चाय की टेª के अलावा, पिक्चर दिखाने का जब तक वायदा नहीं होगा, काम थोड़े ही पास हो जाया करता है!”
“इसी तरह रिश्वतें दे दे कर, आप ने उन लोगों को सिर चढ़ा रखा है!”
“आप थोड़ी कोशिश कर देखिये। शायद आपके कुछ करने से ही, देश की हालत में सुधार आ जाये!”
मैं चुप हो रहा। दोनों वर्कर हंसने लगे। फिर तीन चार और इधर उधर से पास आकर, उनकी हंसी में शामिल हो गये।
वे हंस रहे थे और हंसते ही चले जा रहे थे। मैं ‘कहीें कुछ भी नहीं किया जा सकता’ मान कर कुढ़ता चला जा रहा था।
हंसना और कुढ़ना! और कुछ भी नहीं!
प्रश्न फिर वही! क्या सही और क्या ग़लत?
तंग आकर कहना ही पड़ा, “आप लोग काफी हंस चुके। अब अपना काम शुरू कर दें, तो बेहतर होगा।”
“आप को काफ़ी परेशानी होती है, हमें हंसते देख?”
“मगर कोई मतलब भी तो हो हंसने का?”
मैंने महसूस किया, कि वे लोग, इससे पहले भी मुझे देख, कई बार हंसते रहे थे। मगर मैं कारण नहीें समझ पाया था।
मैंने अपने कैबिन में काम करने वाले लड़के को भेज कर, उस्ताद को बुला भेजा।
“बैठिये उस्ताद साहब।”
“शुक्रिया!” कह कर वह सामने पड़े स्टूल पर बैठ गया।
“कहिये, आप की शायरी कैसी चल रही है?”
“हयात का माहौल खुशगवार न होने की वजह से, शायरी कुछ जम नहीं रही इन दिनों।”
“ख़ैरियत तो है?”
“ख़ैरियत क्या! घर में किसी को ख़ांसी जुकाम तो किसी को पेट दर्द। बीवी साहिबा की तो हमेशा कमर ही टूटी रहती है। या मतवातर दर्द से सिर फटा रहता है। अब ऐसे हालात में, कोई कुछ लिखना भी चाहे, तो कैसे!”
“हां, बड़ा मुश्किल है ऐसे में शेर वगैरा लिखना। अच्छा, एक बात तो बताइये।”
“फ़र्माइये?”
“कई वर्कर मुझे देख, इन दिनों बहुत हंसते हैं। क्या मामला ह। ?”
“बच्चे हैं। आप कुछ ख़याल न करें।”
“फिर भी, बात क्या है?”
“मुझे कुछ सही तौर पर तो इल्म नहीं। मगर वो देवी लाल हैं न। वही उल्टी सीधी हांकता रहता है।”
“क्या कहता है?”
“अजी कहना क्या, बकता है। आप के क्वार्टर मेें कोई रिपेयर चल रही है न?”
“अब तो सब क़ाम पूरा हो चुका है वहां। क्यांे?”
“बस, उसी बारे में ये लोग, बातेें बनाते रहते हैं। कहते हैं, सुपरवाइज़र साहब के क्वार्टर में रिपेयर चल रही है और इसलिये वे खुद इधर उधर चक्कर काटते रहते हैं।”
“इधर उधर?”
“बदमाश हैं! कहते हैं, कि शाम के वक़्त सुपरवाइज़र साहब से मिलना हो, तो मज़दूर कालोनी में चले जाओ, या फिर बेंगलो एरिया में।”
ऐसा कई बार देखने में आया है कि जब भी कभी किसी काम की बहुत जल्दी हो, तभी रोज़मर्रा के साधारण कार्यों में भी मामूल से अधिक समय लगने लगता हैं। जेनरल मैनेजर के हस्ताक्षर किये अधिपत्र अनुसार, वे सभी कार्य, अगले दिन तक अवश्य पूरे हो जाने चाहियंे थे। किंतु कार्य विशेष आरम्भ होने के दस मिनट बाद ही ग्राइंडिंग मशीन की बेल्ट टूट गई। यह बिल्कुल मामूली मरम्मत का काम था। मगर अन्य अनुभाग से पधारे मिस्त्री लोग, मशीन को इस तरह घेर कर बैठे थे, कि इसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मैं उनसे बार बार निवेदन कर रहा था, कि बेल्ट को ठीक करके मशीन छोड़ दें, मगर कोई सुन ही नहीं रहा था।
मशीन ठीक नहीं हो रही, यह परेशानी मेरी अपनी थी। ठीक करने वालों के आगे, मेरे गिड़गिड़ाने का कोई भी अर्थ न था और ऊपर वालों के पास, मेरे लिये वही नपे-तुले शब्द थे… बहाने मत बनाइये… कहानियां मत सुनाइये… नो आर्गूमेंटस मुझे फ़ौरन यह काम मुकम्मल चाहिये, वरना…
“आप का फ़ोन है।” किसी ने कहा।
“मेरा?”
वर्कशाप में मेरा फ़ोन कम ही आया करता था। सोचने लगा, किस का होगा?
फ़ोरमैन, अपने दफ़तर में नहीं था। मैंने रिसीवर उठाया।
मीता, कोठी से बोल रही थी। पूछ रही थी, “आप बीमार हैं?”
“नहीं तो! क्यों?”
“आये क्यों नहीं इतने दिन से?”
“ऐसे ही।”
“ऐसे ही, मींस? समथिंग सीरियस?”
“नथिंग सीरियस।”
“फिर क्या बात हैं?”
“बात तो कुछ भी नहीं।”
“या बात मुझे बताने वाली नहीं, मैं शायद कुछ हैल्प कर सकंू?”
“ठीक है, मैं आज शाम को आ जाउंगा।”
“कितने बजे? जल्दी ही न?”
“यहां फैक्टरी से छुट्टी होगी, सात बजे। उसके बाद…”
“ओवर टाइम छोड़ नहीं सकते एक दिन के लिये?”
“ना… वह तो नहीं छोड़ा जा सकता।”
“बड़े ही लालची हैं! शायद बोनस वग़ैरा भी मारा जाता है, एक दिन की छुट्टी लेने पर?”
“फैक्टरी की ये बातें, आप को कैसे मालूम पड़ गईं? वैसे रूपये पैसे की कोई बात नहीं, यहां काम में बुरी तरह उलझा हूं। काम पूरा न हुआ, तो आप के अंकल मेरी पैरेड ले लेंगे।”
“तो, आठ बजे तक तो पहंुच ही जायेंगे न?”
“बिल्कुल।”
“एक ज़रूरी बात करनी है।”
“मुझे मालूम है।”
“अरे, आप को कैसे मालूम है?”
++++
“ज़रूरी काम न होता, तो आप फ़ोन क्यों करती!”
”ओ0 के0 एक बात और… शाम को कुकिंग वग़ैरा में टाइम वेस्ट न करें। डिनर इधर ही हो जायेगा।”
“एक बात बताने का तो कष्ट करेंगी मीता जी?”
”अभी? ख़ैर पूछिये।”
“आप का कहीं मुझे नौकरी से निकलवा देने का तो इरादा नहीं?”
उत्तर में वह हंस कर बोली, ”ऐम आई सो क्रूएल?”
पहली बार, मैंने उसे, गहरे के बजाये, हल्के रंग के लिबास में देखा। हल्का गुलाबी, बिल्कुल उसके चेहरे के रंग जैसा, या मेज़ पर रखे गुलदस्ते में सजे और भीनी भीनी खुशबू बिखेरते गुलाब के फूलों जैसा।
इस बात पर भी ध्यान गया, कि पहली बार उसने आगे बढ़ कर, भरपूर मुस्कराहट के साथ, मोतियों जैसे दांतों की नुमाएश करते हुए, मेरा स्वागत नहीं किया।
उसके होंठ बंद थे। आंखें, वहीं अनींदी सी।
सोफ़े पर बैठते ही मैंने अनुमान लगाया, यह अब अपना वही प्रश्न दोहरायेगी… आये क्यों नहीं इतने दिन से?
किंतु वह चुप थी और गरदन झुकाये, फ़र्श की ओर देखे चली जा रहीे थी। बिल्कुल अर्चना की तरह!
एकाएक ही वह गरदन ऊपर कर पूछने लगी, ”अर्चना की नौकरी लगने वाली थी। क्या रहा उसका?”
”लगने ही वाली है। कल मेडिकल हो जायेगा और शायद परसों से काम पर जाने लगेेगी।”
वह पुनः विचारों में गुम हो गई। मैं आज उसके इस तरह गम्भीर होने का कारण, कुछ भी समझ नहीं पा रहा था।
ज़रा सा रूक कर मैंने पूछा, ”वह ज़रूरी बात क्या थी?”
”ज़रूरी बात?” वह चकित सी मेरी ओर देख, पूछ रही थी।
“फ़ोन पर जो कहा था, कोई ज़रूरी बात है।”
”शायद कहा था। बट, आई डोंट रिमेम्बर! क्यों कहा होगा?” वह कुछ अनमनी सी बोल रही थी।
“मीता! बात क्या है?”
”बात… कुछ भी नहीं… आइये, पहले डिनर ले लिया जाये।” वह उठते हुए बोली।
“मगर पहले…”
”उठिये, प्लीज़!”
मैं उसके साथ डाइनिंग रूम में चला गया। ऐसा लगा, जैसे अभी अभी कोई खाना यहां लगा कर चलता बना हो।
“खाना तो मैं…”
”क्या? फ़ोन पर मैंने कुछ कहा था न!”
“कहा तो था।”
”आप, बैठ जाइये। प्लीज़!”
मैं बैठ गया, तो वह भी बैठ गई।
“शुरू कीजिये।”
मैं चुप बैठा रहा। अकस्मात ही वह खिलखला कर हंस पड़ी। मैं भौंचक्का सा रह गया। हंसते हुए तो मैंने उसे इससे पहले भी कई बार देखा था, मगर इस तरह की खोखली और कृत्रिम हंसी, वह भी मीता की!
”मामला क्या है?” मैंने पूछा।
“आप एक रिक्युस्ट मानेंगे?”
”कहिये?”
“चुपचाप खाना शुरू कर दीजिये।”
”अच्छी बात।” कह कर मैंने हाथ आगे बढ़ाया।
मैं खाने लगा तो उसने भी शुरू कर दिया। किंतु इस तरह, जैसे उसको बिल्कुल भूख न हो और सिर्फ़ मेरा साथ देने के लिये, सूप के प्याले में चमच हिलाती जा रही हो।
मैंने पूछा, ”साहब तो क्लब में होंगे?”
”वे बाहर गये हैं, आप को नहीं पता?”
“आज दिन में तो फैैक्टरी में ही थे।”
”शाम को कार में ही निकल गये हैं दो दिन के लिये।”
“और आंटी?”
”मैंने आप से एक रिक्युेस्ट की थी।”
“साॅरी!”
खाने के बाद, हम पुनः ड्राइंगरूम में पहले की तरह जा बैठे और पहले की ही तरह गुम सुम से हो गये।
”वह ज़रूरी बात, अब तो शायद बताई जा सकती है।”
“वह बाद में। पहले यह बताइये, आप मुझ से किस बात पर नाराज़ हैं?”
”किसने कहा, मैं नाराज़ हूं?”
“पूरा वीक निकल गया और आज भी आप मेरे बुलाने पर आये हैं वजह जान सकती हूं?”
”वजह बतानी ही पड़ेगी?”
“बिल्कुल बतानी पड़ेगी!”
मैंने संक्षेप में बात बता दी। सुन कर वह सोच में पड़ गई। फिर कहा, ”इसका मतलब तो यही हुआ, कि आपने अर्चना के घर जाना भी बंद कर रखा है।”
“हां, वहां भी मैं नहीं जा सका।”
”यह ज़यादती है। इसमें भला उस बेचारी लड़की का क्या दोष?”
“दोष तो किसी का भी नहीं!”
वह फिर किसी सोच में पड़ गई।
मैंने पूछा, ”क्या बात है?… क्या सोचे जा रही हैं, कुछ तो पता चले?”
वह कुछ देर चुप रही। फिर कहने लगी, ”मैं तो आपको बहुत बोल्ड समझ रही थी, मगर आप तो बहुत ही डरपोक निकले!”
मैंने कहा, ”इसके बिना भी तो काम चल सकता है।”
“किस के बिना?”
”किसी से मिलेजुल बिना।”
“आप शायद ठीक ही सोचते हैं!”
”आप ने अभी तक अपनी वह ज़रूरी बात नहीं बताई।”
“मैं कोई डिसीशन नहीं ले पा रही हूं, वह बात कहनी भी चाहिये या नहीं।”
समझ में न आया, उसकी इस बात का क्या उत्तर दूं। तब भी कहा, ”मेरे लिये आप थोड़ा बहुत भी अपनापन महसूस करती हों, तो कह देना चाहिये।”
वह थोड़ा सा रूक कर बोली, आंटी की हालत कुछ नार्मल मालूम नहीं पड़ रही।”
”क्या हुआ उन्हें?”
“उनकी मेंटल कंडीशन ख़राब लगती है।”
”वे इस वक़्त हैं कहां?” अस्पताल में?
”नहीं, वहीं हैं अपने उसी कमरे में… कई दिन से लगातार बड़बड़ा रही हैं। खानापीना भी बंद कर रखा है। सोती भी नहीं। रात मे न जाने, अपने से ही क्या कहती रहती हैं।”
“यह तो सचमुच ंिचंता की बात है!” मैंने कहा।
”परसों, नींद की गोलियां खा गईं।”
“ओह माई गाॅड!… फिर?”
”अंकल को बहुत भागदौड़ करनी पड़ी। आप को तो इस बात का कुछ भी पता न होगा?”
“किसी को भी नहीं पता।”
”अच्छा ही हुआ! वरना बहुत बदनामी होती।”
“वे जब बड़बड़ाती हैं, तो कोई बात समझ में आती है?”
”दो ही बातें समझ में आती हैं… मैं सब जानती हूं, और मैं पागल नहीं हूं।”
मैंने थोड़ा सोच कर कहा, ”मेंटल केस ही मालूम पड़ता है।”
”अंकल का भी यही ओपनियन है।”
हम कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर मैंने कहा, ”इस समय तो बड़बड़ाने की आवाज़ नहीं आ रही।”
”डाक्टर ने, सुलाने के लिये कोई मेडिसिन दे रखी है।”
“कौन से डाक्टर का इलाज चल रहा है?”
”यहीं की लेडी डाक्टर। उसी का ट्रीटमेंट चल रहा है।”
कुछ देर के लिये फिर निस्तब्धता छा गई। वह पुनः गरदन झुका कर सोच में डूब गई। झुकी हुई गरदन, कुछ टेढ़ी हो जाने के कारण, उसके घने लम्बे बाल, एक ओर को छितरा गये थे और गरदन का दुधिया रंग चमकने लगा था।
मैंने उसे सांत्वना देने के विचार से कहा, ”इतना सोचने की ज़रूरत नहीं। अच्छा ट्रीटमेंट मिलने पर सब ठीक हो जायेगा।”
नौकर काॅफ़ी ले आया।
कप हाथ में लेकर पहला घंूट भरने ही लगा था, कि साथ वाले कमरे का पर्दा हिला और दरवाज़े में आंटी खड़ी नज़र आईं।
वही सफ़ेद लिबास, मगर बेहद मैला। आंखें बिल्कुल सुर्ख नज़रें, मीता को घूरती हुईं।
”क्या पिला रही है इसे? ज़हर?”
मीता का चेहरा सफ़ेद पड़ता जा रहा था।
“बोलती क्यों नहीं? ज़हर ही है न?”
मैंने साहस बटोर कर कहा, ”ज़हर नहीं, काॅफ़ी है।”
वे मेरी ओर बढ़ीं… समीप और समीप!
महसूस हुआ, कप मेरे हाथ से छूटने को है। मैंने सप्रयास, इसे मेज़ पर टिका दिया।
“यह कप भी, चीनी मिट्टी का नहीं, ज़हर का बना हुआ है। इस कॅाफ़ी में भी, मीठे के बजाय, ज़हर घोला गया है… यहां के हर दरोदीवार पर, ज़हर का लेप फिरा है… तुम बच नहीं सकते… इसे ज़हर से तुम कभी नहीं बच सकते… कोई नहीं बचा सकता तुम्हें… तुम मरोगे… ज़रूर मरोगे…!”
मैं रात भर, भयानक और अजीब से सपनों में भटकता रहा… बाजे बज रहे हैं। बारात चढ़ने लगी है… जल्दी करो, जल्दी करो… वक़्त गुज़रा जा रहा है और अभी तक कुुुछ भी तैयारी नहीं हुई… मगर यह शादी, किस की हो रही है? दूल्हा कौन है?… शादी तो शायद मेरी ही हो रही है… मगर मैं तो मैले कपड़े पहने हंू। नहाया भी नहीं। अन्य सभी सजे संवरे, घूम रहे हैं और मैं… नहीं, यह शादी तो अर्चना की हो रही है। मगर उसका लिबास, बिल्कुल मीता की तरह है… अरे, यह तो मीता की शक्ल है… दूल्हा इस तरह सिर क्यों झुकाये चला जा रहा है? … वह एड़ियां उठाकर, वरमाला गले में डालने की कोशिश कर रही है। तब भी, माला गले में न पड़कर, फ़र्श पर जा पड़ी है… वह उसे ज़मीन से उठा लेती है और इधर उधर देखती है… दूल्हा अब छोटा और नीचे हुआ जा रहा है… छोटा होते होते, अब धरती से ही लग गया है… वह फिर इधर उधर नज़र दौड़ाती है और वरमाला को झटपट मेरे गले में डाल देती है… हां, यह मेरा ही तो गला है। मगर यह हार, इसमें तो काले रंग के फूल पिरो रखे हैं… सामने, उसी लिबास में, मीता, नहीं अर्चना खड़ी है… नहीं, यह तो अर्चना भी नहीं लगती… यह तो कोई अन्य लड़की है। इस लड़की को तो मैं बिल्कुल नहीं पहचानता। एक अनजान लड़की से, भला मैं कैसे शादी कर सकता हूं?… मैं यह शादी नहीं करूंगा… नहीं, बिल्कुल नहीं… मगर, करोगे कैसे नहीं? कैसे नहीं करोगे?… आंटी खड़ी हैं, हाथ में नंगी तलवार, आंखें बिल्कुल अंगारा। शरीर पर वस्त्र, नाममात्र… करोगे कैसे नहीं? कैसे नहीं करोगे?… तलवार की नोक, मेरे सीने पर आ टिकी है और…
मैंने अर्चना से कहा, ”कल रात, मैंने एक सपना देखा।”
“आप सपने भी देखा करते हैं?” कह कर वह मुस्करा पड़ी।
देखा, वह अब पहले की तरह तरोताज़ा-सी लगने लगी है। चेहरे पर से पीलापन अदृश्य हो चला है। कपड़े भी वह पहले की ही तरह नफ़ासत से पहनने लगी है।
”क्या देखा सपने में?” वह अभी तक मुस्करा रही थी।
“देखा, तुम्हारी शादी हो रही है।”
सुनते ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी।
”और कुछ? आप स्वयं क्या कर रहे थे सपने में? बारातियों के लिये, हलवाई से पूड़ियां तलवा रहे होेंगे!”
“नहीं, मैं गली में झंडियां लगवा रहा था।”
उसने विषय बदल कर कहा, ”आज मेडिकल तो ठीक ठाक हो गया।”
“गुड! इसका मतलब, कल से तुम काम पर जाने लगोगी?”
”हां।” कह कर वह उदास सी हो गई।
“क्या सोचने लगीं?”
”बड़ा अजीब लग रहा है। पता नहीं, नौकरी मैं कर भी पाऊंगी या नहीं!”
“ऐसी भी क्या बात है! आजकल हज़ारों लड़कियां, दफ़तरों में काम करती हैं।”
”मुझे तो बहुत ही डर लग रहा है।”
“समझ में नहीं आता, इसमें डरने की क्या बात है!”
”चलिये, आप तो वहां मौजूद ही होंगे।”
“मैं वहां क्या तुम्हारे पास बैठा रहूंगा!”
”आप मेरी कोई सहायता नहीं करेंगे?”
“क्या पता, तुम्हेें ही कहीं मेरी सहायता करनी पड़ जाये।”
”वह कैसे?”
“तुम्हारी पोस्टिंग ऐसे ख़ास दफ़तर में की जा रही है, वहां पर सब की ए0 सी0 आर0 तुम्हारे हाथों से गुजर कर, साहब लोगों के पास पहुंचा करेगी।
“ए0 सी0 आर? वह क्या बला है?”
”सब मालूम पड़ जायेगा।”
क्रमशः…४
© श्री मदन शर्मा
देहरादून, उत्तराखंड
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





















