हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

☆ आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

नेतृत्व वह प्रक्रिया है जिसमें एक दूसरों को प्रभावित करके, प्रेरित करके और मार्गदर्शन देकर किसी साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करता है। नेतृत्व सिर्फ़ बाॅस बनना नहीं, पद नहीं बल्कि प्रभाव है, भरोसे और सम्मान से लोगों के साथ मिलकर मंज़िल को पाना है। एक प्रभावशाली नेतृत्व हमेशा ही अपनी क्षमता, निर्णयशक्ति और व्यक्तित्व के कारण लोगों का विश्वास अर्जित करता है किन्तु जब यही नेतृत्व अहंकार से ग्रस्त हो जाता है तब वही गुण संगठन, समाज और राष्ट्र के लिए संकट का कारण बन जाता है। अहंकार नेतृत्व की विवेकशीलता को कुंठित करता है, संवाद को बाधित करता है, आलोचना को अस्वीकार करता है और स्वयंभू बनकर निर्णयों को एकांगी बना देता है। अहंकार नेतृत्व का सबसे खतरनाक शत्रु है। प्रारम्भ में नेतृत्व अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है फिर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है और अंतत: वह स्वयं को अचूक समझ बैठता है, यही अवस्था नेतृत्व के पतन का आरम्भ होती है। नेतृत्व जब आलोचना को अस्वीकार करे, दूसरों की उपलब्धियों का सम्मान न करे, निर्णयों में एकाधिकार स्थापित करे, सलाहकारों की उपेक्षा करके,स्वयं को अपरिहार्य समझे, सफलता का पूरा श्रेय स्वयं लेने लगे, असफलता का दोष दूसरों पर थोपने लगे तो समझ लेना चाहिए कि अहंकार की शुरुआत हो चुकी है।

नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती अहंकार ही होता है। अहंकारी नेतृत्व अपने निर्णय को अंतिम सत्य मानता है। वह वैकल्पिक विचारों और विशेषज्ञों की सलाह को महत्व नहीं देता, इससे निर्णय प्रक्रिया एकपक्षीय हो जाती है और त्रुटियों की सम्भावना बढ़ जाती है। प्रभावशाली नेतृत्व सदैव ही दूसरों के विचारों को सुनता है। नेतृत्व का आधार विश्वास है जबकि अहंकार विश्वास को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। किसी भी समाज या समुदाय की प्रगति नए विचारों पर निर्भर करती है किन्तु जब कोई व्यक्ति अपने को सर्वज्ञ समझने लगता है तब नई सोच को प्रोत्साहन नहीं मिलता, रचनात्मकता का स्थान चापलूसी ले लेती है। अहंकारी व्यक्ति को भ्रम होता है कि उसके लिए नैतिक नियम लागू नहीं होते! ऐसी स्थिति में पारदर्शिता घटती है, पक्षपात बढ़ता है, सत्ता का दुरूपयोग होने लगता है, टीम भावना विघटित हो जाती है।

नेतृत्व में अहंकार के आ जाने का दुष्परिणाम यह होता है कि व्यक्ति स्तर पर आत्ममूल्यांकन की क्षमता कम हो जाती है और वास्तविक मित्रों का दायरा सीमित हो जाता है, मानसिक तनाव बढ़ता है। संगठन के स्तर पर साथियों का मनोबल गिरता है, निर्णयों की गुणवत्ता में कमी आती है, भ्रष्टाचार में वृद्धि होने लगती है, समाज और राष्ट्र स्तर पर जनविश्वास में कमी आ जाती है, संवाद और सहमति की संस्कृति प्रभावित होती है। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में विनम्र नेतृत्व को विशेष महत्व दिया जाता है। गीता का कर्मयोग यही सिखाता है कि नेतृत्व का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं, लोकसंग्रह और कर्तव्य पालन होना चाहिए। केवल बड़ा पद या प्रतिष्ठा पर्याप्त नहीं, यदि उससे समाज को लाभ नहीं मिलता तो उसका महत्व सीमित है। नेतृत्व में अहंकार के समाधान हेतु व्यक्तिगत आत्मानुशासन, संगठनात्मक संस्कृति तथा नैतिक मूल्यों का समन्वय आवश्यक है। आत्मचिंतन और आत्ममूल्यांकन त्रुटियों का बोध कराता है तथा अहंकार को नियंत्रित रखने में सहायक होता है। विनयी व्यक्ति सफलता का श्रेय टीम को देता है, असफलता की जिम्मेदारी स्वयं लेता है। संगठन में नियमित संवाद, खुली चर्चा, रचनात्मक आलोचना की संस्कृति अहंकार को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नेतृत्व का उद्देश्य आदेश देना नहीं, लोगों की क्षमता का विकास करना होना चाहिए। सत्य, ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे मूल्य नेतृत्व को स्थायी सम्मान प्रदान करते हैं।

सारत: प्रभावशाली नेतृत्व वही है जो अपने व्यक्तित्व से नहीं, अहंकार से ऊपर उठकर अपने चरित्र, सेवा और प्रेरणा से लोगों के हृदयों में स्थान बनाता है। अहंकार क्षणिक विजय दे सकता है किन्तु विनम्रता स्थायी सम्मान दिलाती है। आधुनिक प्रबंधन और भारतीय दर्शन दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि पद या नेतृत्व वह बड़ा नहीं होता जो स्वयं को बड़ा समझे अपितु महानता इसी में है कि नेतृत्व दूसरों को भी बड़ा बनने का सुअवसर प्रदान करे। हमारी ज्ञान परम्परा का संदेश भी यही है कि विद्या से विनय प्राप्त होती है, विनय से पात्रता, पात्रता से समृद्धि, समृद्धि से धर्म  और अंतत: सुख की प्राप्ति होती है। यही सूत्र आदर्श नेतृत्व का भी शाश्वत आधार है।

 

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २११ ☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. अनुराग वाजपेयी जी द्वारा लिखित  “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २११ ☆

☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)

(समकालीन विसंगतियों का आईना)

लेखक – डॉ. अनुराग वाजपेयी

प्रकाशक – प्रकाशन, जयपुर

(संस्करण – 2026)

मूल्य-  रु 250/-

☆ समकालीन विसंगतियों का आईना – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

आजादी के बाद से देश ने प्रत्येक क्षेत्र में खूब प्रगति की है।

यदि कुछ ह्रास हुआ है तो वह है नैतिकता , आचरण और जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट स्पष्ट दिखती है।

साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य वह  औजार है जो इन विसंगतियों पर सफलता से प्रहार कर रहा है।

डॉ. अनुराग वाजपेयी उनके पिछले आधा दर्जन व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। उनके द्वारा रचित यह नव प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘ईमान का बोझा’ इसी कसौटी पर खरा उतरने वाला एक प्रभावशाली संग्रह है। यह किताब समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, प्रशासन और आधुनिक जीवनशैली की उन परत-दर-परत विसंगतियों को खोलती है, जिनसे आज का सामान्य नागरिक नित्य जूझ भी रहा है, तथा विडंबना और हास्यास्पद है कि जहां भी जिसे जो अवसर मिल रहा है वह बेइमानी से बाज नहीं आ रहा। बेईमानी नया सामाजिक लोकाचार बनता जा रहा है।

पुस्तक का शीर्षक ‘ईमान का बोझा’ मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। लेखक ने बड़े ही तीखेपन से यह स्थापित किया है कि आज के दौर में ईमानदारी एक भारी पत्थर की तरह है, जिसे ढोना कठिन हो गया है। जो व्यक्ति जितना अधिक ‘हल्का’ (यानी सिद्धांतहीन) है, वह उतनी ही तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। यह आधुनिक भौतिकवादी समाज में कड़वा यथार्थ है।

लेखक ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली, बाबुओं की मानसिकता और भ्रष्टाचार के जो चित्र खींचे हैं, वे यथार्थ के दर्शन करवाते हैं। रिश्वतखोरी के नए तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए लेखक दिखाते हैं कि कैसे समाज में अनैतिकता को अब ‘सभ्यता’ का लबादा ओढ़ा दिया गया है।

कोरोना काल, एवं लॉकडाउन के कुछ व्यंग्य किताब में शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि ये सारे व्यंग्य समय समय पर लिखे हुए हैं, तथा इस पुस्तक में  संकलित हैं।डिजिटल युग के प्रभावों को जिस तरह से पुस्तक में पिरोया गया है, वह पाठकों को वैचारिक मंथन के लिए विवश करता है। ‘छुट्टियों’ के प्रति देश के उत्साह और ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ के नाम पर किए जा रहे छलावे पर लेखक की टिप्पणियां व्यंग्य की शास्त्रीय परंपरा को पुष्ट करती हैं।

व्यंग्य के मूल्यों की कसौटी पर परखें, तो ‘ईमान का बोझा’  समाज को आईना दिखा रहा है। लेखक  केवल हास्य  रंजन करने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं।  वे समाज के प्रति अपनी ‘अकुलाहट’ और चिंता उनकी कलम से व्यक्त करते हैं।

अनुराग वाजपेयी की भाषा सहज है, वाक्य रीडर्स फ्रेंडली हैं। लेकिन उसमें कटाक्ष की धार पैनी है। वे कठिन विषयों को भी रोचक किस्सागोई के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो व्यंग्य अभिव्यक्ति की  बड़ी ताकत है।

पुस्तक केवल समस्याओं को नहीं गिनाती, बल्कि उन कारणों पर भी प्रहार करती है जो व्यक्ति को ‘बेईमान’ बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

‘ईमान का बोझा’ आज के दौर का यथार्थ पाठ है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो व्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं और जो ईमानदारी का बोझ ढोकर भी मुस्कान बनाए रखना चाहते हैं।

डॉ. अनुराग वाजपेयी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि व्यंग्यकार का काम केवल व्यवस्था को कोसना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर छिपे उस जागरूक नागरिक को जगाना है, जो शोर-शराबे में कहीं खो रहा है।

यह संग्रह व्यंग्य साहित्य के प्रेमियों और  अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

किताब खरीद कर पढ़ने की सलाह है। ये 100 पृष्ट एक दस्तावेज हैं। 34 आलेख हैं, सभी एक दूसरे से बेहतर सुगठित ललित साहित्यिक मूल्यों पर खरे हैं।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मानित लेखक, समालोचक, समीक्षक, व्यंगयकार

(लंदन से, ई बुक पढ़कर)

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११६ – न्यूज़ चैनलों का सर्कस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – न्यूज़ चैनलों का सर्कस)  

☆  चुभते तीर # ११६ – व्यंग्य  – न्यूज़ चैनलों का सर्कस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शाम के नौ बजते ही टीवी स्क्रीन एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो जाती है, जहाँ एंकर बिना किसी हथियार के सिर्फ अपनी आवाज़ से दर्शकों के कान के पर्दे फाड़ देता है। पैनल में दस लोग बैठे होते हैं, जिनमें से कोई किसी की बात नहीं सुनता, लेकिन सब चिल्ला रहे होते हैं। चाहे जो भी हो—देश की अर्थव्यवस्था हो या किसी अभिनेता की बिल्ली का खो जाना—बहस का स्तर हमेशा पाताल में ही रहता है। स्क्रीन पर लाल रंग की पट्टियाँ इस तरह चमकती हैं मानो तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका हो। ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के नाम पर आपको वह सब दिखाया जाता है जिसका आपके जीवन से कोई वास्ता नहीं है। सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि इसे ‘सूचना’ कहा जाता है। दो घंटे के इस शोर-शराबे के बाद दर्शक मानसिक रूप से इतना थक जाता है कि वह भूल जाता है कि वह क्या जानने के लिए टीवी के सामने बैठा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५२ ⇒ चातुर्मास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चातुर्मास ।)

?अभी अभी # १०५२ ⇒ आलेख –  चातुर्मास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घंटा, मिनिट और सेकंड करते करते, दिवस, मास और बारहमास व्यतीत हो जाता है। इसी तरह पल करते हमने ज़िन्दगी के कितने वर्ष गुज़ार दिए। क्या खोया, क्या पाया, इस पर सोचने का वक्त अभी नहीं आया।

एक समय था, जब बारिश के समय में जीवन ठहर सा जाता था। आवागमन के साधन सीमित रहते थे। सड़कें पक्की नहीं थी। फ्लाई ओवर, रेलवे की सुविधा और आकाश मार्ग केवल महानगरों तक के ही लिए उपलब्ध था। विदेश यात्रा को bon voyage यानी शुभ विदेश यात्रा कहा जाता था, जिसमें समंदर पार बाहर जाया जाता था।।

साधु संत, महात्मा इस चातुर्मास में एक ही स्थान पर रहकर साधन भजन, ध्यान धारणा, कथा प्रवचन किया करते थे, जिसका लाभ श्रद्धालु जनता को मिल जाया करता था। सभी व्रत, उपवास, सत्संग इसी दौरान संपन्न होते थे। यही सनातन परम्परा आज भी अनवरत चली आ रही है।

लेकिन प्रकृति के इस क्रम में इस बार एक ऐतिहासिक बदलाव आया, जिसका न तो किसी को पूर्वानुमान था न ही किसी भविष्यदृष्टा की कोई चेतावनी। अचानक कोविड 19 ने हमला बोला और पूरी दुनिया को घर बैठा दिया। आप इसे आपातकालीन चातुर्मास भी कह सकते हैं। जिनका एक एक मिनिट कीमती था, वे बीस सेकंड तक केवल हाथ ही धोते रहते थे। वह भी एक बार नहीं, दिन में कई बार।

अगर कोरोना नहीं होता, तो उनके लिए मानसिक चिकित्सालय के दरवाज़े खुले हुए होते।।

मेरा चातुर्मास अभी भी कायम है ! नदी नारे न जाओ श्याम पैंया पड़ूं की तर्ज पर अनावश्यक बाहर न जाओ श्याम पैंया पड़ूं वाला निवेदन रोज सुनने को मिलता है। ध्यान धारणा बहुत हो गई, शायद यही एक सच्चे वानप्रस्थी की निशानी भी है। यानी बिना कुछ किए आसानी से तीसरे आश्रम में प्रवेश।

केश, जटा, दाढ़ी और वक्त किसी का इंतजार नहीं करते। इधर केश बढ़े, उधर सन्यास शुरू ! घर पर ही केश कर्तनालय खुल गए हैं, कोई बाबा नहीं बनना चाहता। सन्यासी तो कतई नहीं। भला हो राजनीति का, जिसने एक नया आश्रम सबके लिए उपलब्ध करवा दिया है। सोच रहा हूं, वानप्रस्थ के स्थान पर यह आश्रम कैसा रहेगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०४ ☆ पाँच शिशु कविताएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०४ ☆ 

☆ पाँच शिशु कविताएँ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

 १. सूरज नारंगी 

साँझ ढली सूरज नारंगी

चले जा रहे पश्चिम ओर।

करें नमस्ते हाथ जोड़कर

कल को आकर करें सुभोर।।

 २. चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं 

 

सूरज करते रोज सवेरा।

दूर भगाते रोज अँधेरा।

चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं

आलस सारा दूर भगातीं।।

३. हाथी जैसी सूंढ़ न मेरी 

भिन – भिन – भिन – भिन ,

भिन – भिन – भिन ।

मच्छर हूँ कानों से सुन ।

गज जैसी सूंढ़ न मेरी,

काटूँ जैसे चुभती पिन।।

☆☆☆☆

४. इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर 

फूल बड़े होते हैं सुंदर।

इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर।

तोड़ेगे तो पाप पड़ेगा।

कहतीं नदियाँ कहे समुंदर।।

५ . दाना खातीं फुदक – फुदक कर 

चीं – चीं – चीं – चीं गीत सुनातीं।

सूरज के उगते आ जातीं।

दाना खातीं फुदक – फुदक कर।

पानी पीतीं मटक – मटक कर।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पहाट… ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

राधिका भांडारकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ पहाट… ☆ राधिका भांडारकर ☆

(उद्धव वृत्त २-८-४)

 दिनमणी अंबरी येतो

विहगांचा कलरव होतो

राऊळी घंटा घुमते

ती पहाट सुंदर असते..

*

 ते दव पाती ओघळते

भासती जणू मोती ते

दाटते धुकेही शिखरी

ती वाट दिसेना नजरी..

*

 केशरात न्हाते प्राची

किरणे हिरण्यगर्भाची

दिन नवा आणतो आशा

 तिमिरातुनी ने प्रकाशा ….

*

 गोठ्यात गाय हंबरते

पाडसे सडांशी लुचते..

अंगणी फुलसडा सांडे

वृंदावनी तुळस नांदे

*

ही पहाट ऊर्जा देते

मज ध्येयापाशी नेते

ते थकणे सारे नुरते

 मन पुन्हा एकदा स्फुरते

© राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अंधाराची सावली… ☆ डॉ. शैलजा करोडे ☆

डॉ. शैलजा करोडे

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ अंधाराची सावली… ☆ डॉ. शैलजा करोडे

“निलिमा मॅडम, 28 फेब्रुवारी विज्ञानदिन. यानिमित्ताने आपल्या शाळेत विज्ञान कथास्पर्धेचे आयोजन करुया, जेणेकरून विद्यार्थ्यांच्या कल्पना शक्तीला वाव मिळेल व त्यांच्या मनात विज्ञानाविषयी गोडीही निर्माण होईल. कथेचा विषय व इतर नियमावली तुम्ही तयार करुन नोटीस बोर्डवर लावायला द्या. कथांचं परीक्षण करून विद्यार्थ्यांना प्रोत्साहन म्हणून काही बक्षीसंही देऊयात “. ” होय मॅडम, मी करते सगळं आयोजन. स्पर्धा यशस्वी होईल मॅडम ” “दॅट्स गुड. किप इट अप. शुभस्य शीघ्रम मॅडम. कारण वेळ फार कमी आहे. आज 21फेब्रुवारी, आपल्या हातात फक्त चार/पाच दिवस आहेत.

मी स्टाफ रूममध्ये आले. पुढचा पिरेड मला आँफ होता. चला विज्ञान कथेचा विषय ठरवायला वेळ मिळाला. काय बरं विषय ठरवावा. होय सुचला कि विषय ” कृष्णविवरातील अंधाराचा भेद “होय हाच विषय ठेवूया. मुलांच्या कल्पनाशक्तीला चांगलाच वाव मिळेल. छान छान काल्पनिक विज्ञान कथा तयार होतील. येस, वाॅव, माझ्या चेहर्‍यावर स्मित झळकलं. काय निलिमा मॅडम खुश आहात “, माझी सहकारी अपर्णा पोतनीस स्टाफ रूममध्ये प्रवेश करीत बोलत होती. “काही नाही गं, असंच ‘. ‘असंच कसं, काहीतरी तर कारण असेल ना ‘ ” काही विशेष नाही ग अपर्णा ‘ ‘ नसेल सांगायचं तर नको सांगूस निलिमा. पण आनंद वाटून घेतल्याने द्विगुणित होतो म्हणतात ” मी माझी कल्पना अपर्णा बरोबर शेअर केली. ‘ अरे वाह, किती छान विषय आहे ग. मुलांनाही आवडेल आणि स्पर्धेला भरघोस प्रतिसाद मिळेल बघ. खूप खूप शुभेच्छा. ‘ धन्यवाद अपर्णा ‘ तास संपल्याची घंटा वाजली आणि आमचा संवाद थांबला. मी खडू, डस्टर घेऊन वर्गात जाण्यासाठी निघाले.

स्पर्धेला खरंच भरघोस प्रतिसाद मिळाला. जवळ जवळ चाळीस मुलांनी कथा लिहिल्या होत्या.

कृष्णविवर, महा भयंकर अंधार, प्रकाशालाही गिळंकृत करणारा, अभेद्य, पण या अंधाराचाही शोध वैज्ञानिकांनी घेण्याचा प्रयत्न केलाय. मी कथांचं परीक्षण करीत होते.

इव्हेंट होरायझन टेलिस्कोप (EHT): जगभरातील रेडिओ टेलिस्कोप एकत्र करून तयार केलेल्या या आभासी टेलिस्कोपमुळे मानवाला इतिहासात पहिल्यांदाच २०१९ मध्ये ‘M87*’ आणि २०२२ मध्ये आपल्या आकाशगंगेतील ‘Sgr A*’ या कृष्णविवराची थेट छायाचित्रे घेणे शक्य झाले.

हॉकिंग रेडिएशन सिद्धांत: महान शास्त्रज्ञ स्टीफन हॉकिंग यांनी सिद्ध केले की कृष्णविवरे पूर्णपणे काळी नसतात;

त्यातून पुंज भौतिकशास्त्राच्या (Quantum Mechanics) नियमांनुसार सूक्ष्म किरणोत्सर्ग बाहेर पडतो, ज्यामुळे ती हळूहळू नाहीशी होऊ शकतात.

गुरुत्वीय लहरी (Gravitational Waves): २०१५ मध्ये ‘LIGO’ वेधशाळेने दोन कृष्णविवरांच्या टक्करीतून निर्माण झालेल्या गुरुत्वीय लहरींचा शोध लावला, ज्यामुळे कृष्णविवरांचा अभ्यास करण्यासाठी विज्ञानाला ‘नवे डोळे’ मिळाले.

अॅक्रेशन डिस्कचा प्रकाश: कृष्णविवराच्या भोवती फिरणारा वायू आणि धूळ तीव्र वेगाने फिरताना प्रचंड घर्षणामुळे चमकू लागतात, या प्रकाशाच्या मदतीने कृष्णविवराच्या सीमांची (Event Horizon) अचूक रचना समजते.

कृष्णविवराचे मुख्य भाग

सिंग्युलॅरिटी (Singularity): कृष्णविवराचा केंद्रबिंदू जेथे संपूर्ण वस्तुमान एका अनंत सूक्ष्म बिंदूत एकवटलेले असते तेथे भौतिकशास्त्राचे नियम कोलमडतात.

इव्हेंट होरायझन (Event Horizon): कृष्णविवराची ती अंतिम सीमा ज्याच्या आत गेलेली कोणतीही वस्तू किंवा प्रकाश कधीही परत येऊ शकत नाही.

विज्ञानाने अत्यंत प्रगत टेलिस्कोप, गणिताची सूत्रे आणि भौतिकशास्त्राच्या सिद्धांतांच्या जोरावर कृष्णविवराच्या अंधाराचा भेद करून त्याची छायाचित्रे आणि अस्तित्व जगासमोर आणले आहे.

बाप रे बाप, मुलांनी काय अभ्यास केलाय. किती सविस्तर आणि सखोलात जाऊन लिहिण्याचा प्रयत्न केलाय. खरंच मानलं पाहिजे आजच्या पिढीला. माहिती तंत्रज्ञान, सगळी इलेक्ट्रानिक माध्यमं आणि AI ची होणारी मदत, जणू ज्ञानगंगा दारी आलीय आजच्या युगात.

आजच्या या प्रगत तंत्रज्ञानाच्या युगात कृष्णविवराचा शोध घेऊन त्या अंधाराला भेदण्याचे प्रयत्न सुरु आहेत.

असाच, असाच अंधार वारंवार जीवनातही येतो, माझ्याही जीवनात अनेकदा आला. म्हणतात ना जेव्हा अंधार येतो ना तेव्हा आपली सावलीही सोबत सोडते म्हणतात. पण, पण, सावली आपल्या सोबतच असते. कारण आपण तिथे असतो, फरक एवढाच कि आपल्याला ती दिसत नाही. जेव्हा संकटे येतात, वादळे येतात, परीक्षेचे क्षण येतात तेव्हा या अंधाराला भेदते आपली सावली, होय सावलीच, मग ती आपला आत्मविश्वास जागवते, मनाला खंबीरता देते, संकटांशी झुंजण्याची शक्ती देते तर चोहीकडे पसरलेल्या अंधारातही प्रकाशकिरण शोधण्याची हिंमत देते.

सात आठ वर्षाची असेन मी, घरात आई कॅन्सरशी झुंज देत होती, दोन लहान भावंडे, सगळी जवाबदारी माझ्यावर, जमेल तसा कच्चा पक्का स्वयंपाक मी करायची, आईची सेवा करुन शाळेत जात होती. आणि तो काळा दिवसही आला, आईने जगाचा निरोप घेतला.

आम्हां भावंडासाठी बाबांनी पुन्हा संसाराची घडी बसविली. सावत्र आई, तिला कसलं प्रेम माया, सातत्याने मला कामाला जुंपायची, जेमतेम 13 वर्षाची असेल मी. बाबांना माझे हात पिवळे करायला लावले. माझे शिक्षण सातव्या इयत्तेतच थांबले.

लहान लहान भावंडे सोडून मी सासरी आले. माझं लक्ष भावंडांकडे लागायचं.

“लग्न झालंय तुझं आता, विसर सगळं माहेर आणि लाग संसाराला ” सासूबाईंची टोचणी. नणंदेचा तोरा होताच. पतीराजही बायकोला नेहमी धाकात ठेवले पाहिजे या विचारसरणीचे. घरात कोणाला उलटून बोलण्याची हिंमत नाही. काही चुकल्यास, मनाविरूद्ध घडल्यास मारहाणही व्हायची मला. जीवनाची गाडी अशी चालू असतांनाच मातृत्वाचं ओझंही माझ्यावर लादलं गेलं केवळ सतराव्या वर्षीच. गोंडस, गोड गोजिरं बाळ कुशीत आलं आणि या प्रकाशाने माझ्या जीवनातील अंधाराचा भेद केला. बाळाला कुशीत घेतांना ब्रम्हांड सुखाचा अनुभव मी घेत होते.

आणि एक दिवस कोसळणार्‍या पाऊसधारा, दाटलेला अंधार, विजेच्या कडकडाटासह, घोंघावणारा वारा, जणू प्रलयाची नांदी देणारा, पतीराज अजून घरी आले नव्हते. माझी अस्वस्थता वाढलेली. दरवाज्यातून, खिडकीतून यांची वाट पाहात होते. हळूहळू पाऊस थांबला पण माझ्यासाठी धरणी दुभंगणारी बातमी घेऊन आला. वादळी पावसात घरी येतांना रस्त्याच्या कडेला असलेला वृक्ष उन्मळून पडला होता, तो नेमका माझे पती अशोकच्या अंगावरच, सोबत वीजेच्या तारा. तत्क्षणीच त्यांचा मृत्यू झालेला.

कुशीत सहा महिन्याचा माझा गौरव व मी पुन्हा अंधाराने वेढले गेलो. सगळ्या नातेवाईकांनी पाठ फिरवली. पण बाळासाठी मला पुन्हा मला उभं राहाणं भाग होतं. शिवणकला मी शिकलेली होती. शहरातीलच सुधर्मा फाऊंडेशन विद्यार्थ्यांना गणवेष, पुस्तकं, जलमंदिर अर्थात पिण्याच्या पाण्याची सोय, तसेच अपंगाना सायकल व निराधार भगिनींना शिवणयंत्राचे वाटप करायचे. माझा आर्थिक प्रश्न काही प्रमाणात सुटला असला तरी तो पुरेसा नव्हता. मला पुढील शिक्षण घेणं भाग होतं. मी बहिःस्थ विद्यार्थी म्हणून दहावीची परीक्षा दिली, उत्तीर्ण झाले. डी. एड. साठी अर्ज केला, प्रवेशही मिळाला. प्रश्न होता गौरवला सांभाळण्याचा. यावेळी मात्र बाबांनी सगळा विरोध पत्करून गौरवला सांभाळण्याची जवाबदारी घेऊन माझा मार्ग सुकर केला.

यथावकाश माझे शिक्षण पूर्ण होऊन मला शाळेत नोकरीही मिळाली. आर्थिक स्वावलंबनाने माझ्या जीवनातील अंधार कमी झाला होता. आता मी पदवी परिक्षेचाही अभ्यास सुरू केला होता. यशाची दालनं हळूहळू उघडत गेली आणि मी आज ज्युनियर काॅलेजमध्ये प्राध्यापिका होते.

माझा गौरवही एमबीबीएस च्या शेवटच्या वर्षाला होता. अंधाराचा भेद झाला होता.

अंधारातील माझ्या आत्मविश्वासरूपी सावलीनेच मला प्रकाशाचा मार्ग दाखविला होता.

© डॉ. शैलजा करोडे

नेरुळ नवी मुंबई मो. 9764808391

ईमेल – karodeshailaja@gmail.com 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “स्वयम्…” ☆ मोहिनी किंहिकर हेडावू ☆

मोहिनी किंहिकर हेडावू

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☆ “स्वयम्…☆ मोहिनी किंहिकर हेडावू 

असते क्षितिजावर नजर..

पण मातीत पाय घट्ट रोवलेले…

स्वतःचा शोधता शोधता अवकाश…

जपत असते नाती हळूवार सावकाश..

मनात खोलवर जाणवत की आपल्यालाही जपावं… हळूवार पणे.. अलवार..

 

जगाच्या व्यवहारात गाडून घ्यायचे नाही…!

 

आणि मनातले अंकुरणे सोडायचे नाही…!

वाटतं दिमाखात.. डौलाव…

आत्मविश्वासाने…!

 

प्रेयस.. श्रेयस… निती.. अनिती…

च्या संघर्षापेक्षा…

मनातले संघर्ष कोलाहल जास्त करतात…

ते शांतपणे हाताळावे लागतात…

 

काही खोलवर गाडून जगावे..

आशेवर! इच्छेवर!! प्रार्थनेवर!!!

© मोहिनी किंहिकर हेडावू

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ”Supporting Role..” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “Supporting Role.. ☆ संध्या बेडेकर ☆

इतक्यातच गोवर्धन असरानी च्या निधनाची बातमी वाचली. आणि अनेक सिनेमे… त्यातील असरानी चा Supporting role आठवला.

 हम अंग्रेजोंके जमाने के जेलर है.

शोले तील हा डायलाॅग तर सर्वांच्याच लक्षात असेल.

मुख्य भूमिकेत नसले तरी Supporting role खूप महत्वाचा असतो. सिनेमातील मिर्च मसाला, खोडकरपणा, light कॉमेडी supporting role मुळेच असते. त्या भूमिकेशिवाय सिनेमा पूर्ण वाटत नाही. खूपदा तर मूख्य पात्राच्या भूमिकेला supporting actor मुळे रंग चढतो. त्याची भूमिका रंगते. सहज होते. नाट्य प्रभावशाली होत.

 काल आम्ही नाट्य अभिवाचनाची प्रॅक्टिस करत होतो. मुख्य कलाकारांचा रोल अर्थातच मोठा होता, परंतु वेळेवर, योग्य ठिकाणी, supporting कलाकारांनी दिलेल्या responses मुळे आमचा कार्यक्रम छान रंगला. प्रेक्षकांवर गोष्टचा प्रभाव पडला. आवडला सगळ्यांना. बक्षीस ही मिळाल.

आपल्या आयुष्यातही आजूबाजूला बघीतल तर सहायक भूमिकेत काम करणारे किती तरी जण असतात. त्यांच्या support शिवाय आपलंही रोजचे जीवन आयुष्य व्यवस्थीत चालू शकत नाही.

असरानीची बातमी ऐकून सहजच मनात हे विचार आले.

मी आणि ताईने हा सिनेमा दोनदा बघितला होता.

याच विचारात असताना ताई चा फोन आला.

म्हणाली… अग! वाचली का बातमी?

असरानी गेला बाई…

अग! Supporting role किती महत्वपूर्ण असतो. ते फक्त सिनेमातच नाही तर आपल्या आयुष्यात ही त्यांच महत्व असतच. नाही का?

आपल आयुष्य म्हणजे सिनेमाच नाही का ग?

अग! आता माझच बघ… माझ्या Real life picture मध्ये प्रसन्न साक्षी शिल्पा supporting role ची भूमिकाच तर करतायेत.

खरच रक्ताच काही नात नसताना आपल्या आयुष्यात किती माणसांची entry होत असते नाही.

मला थोड हसूच आल. गम्मतच वाटली

 ताईची… आता supporting role चे कौतुक करणारी,… हीच ती वर्ष भरापूर्वीची ताई आठवली. सर्व काम मीच करेन, असा हट्ट असणारी. कोणाचही न ऐकणारी…

 आयुष्याच्या प्रत्येक फेज मध्ये आयुष्य व्यवस्थीत चालू ठेवायला अनेक गोष्टींबरोबर adjustment करायच असत/ कराव लागत/करायला पाहिजे. Support घ्यावा लागतोच.

 आज ताई -भाऊजीं Super senior zone मध्ये आहेत. दोघेही छान राहतात. एकमेकांना सपोर्ट करतात. न चूकता औषध घेतल ना हे काळजीने विचारतात.

सांपत्तिक स्थिती चांगली म्हणजे 

खाऊन पिऊन सुखी आहेत. गाठीशी थोडा पैसाही आहे. दरमहा येणारी पेंशन म्हणजे तर महिन्याचा energy dose आहे. Life Line आहे.

मुलगा अमेरिकेत नोकरी करतोय. तेथील citizenship मिळाली आहे. आता त्याची मुल मोठी झाली आहेत. त्यामुळे कधी मुलगा, कधी सून मधून मधून येऊन जातात. आता ताई भाऊजीं मात्र जात नाहीत. एकतर लांबचा प्रवास, तेथे आजारी पडण खूप महागात पडत. आणि मुख्य म्हणजे तिथे करमत नाही.

इतक्यातच अनघा भारतात येऊन गेली. मागच्या वर्षी अजय आला होता. यावर्षी अनघा.

अजयने यावर्षी मुद्दामच अनघाला पाठवलं. आई बाबांचे काम जरा व्यवस्थित करून ये, हे सांगूनच पाठवलय.

 दोन तीन दिवस तिने ताई ची घरातील काम, इतर गोष्टी बघून घरातील system थोडी reconstruct- Reorganize Redesign केली…

ताईचे सकाळपासून दुपारपर्यंतची काम बघून, यावेळेस अनघा रागवलीच.

अहो आई! काय हे? मी करते, मी करेन हे अस किती दिवस करणार आहात तुम्ही?

आणि किती पैसे वाचवणार आहात?

खर सांगू आई.. तुमच्याकडून आता पहिल्यासारखी काम होत नाहिये. तुम्ही रागवू नका… पण हे बघा अनेक ठिकाणी dusting ची गरज आहे. खर तर deep cleaning ची गरज आहे. तुम्ही नेहमी म्हणता… तेवढाच शरीराचा व्यायाम होतो. पण घर काम करणे म्हणजे exercise नाही तो व्यायाम होत नाही, ते फक्त कामच असत.

अहो! फ्रिज केंव्हा स्वच्छ केलाय सांगा बर तुम्ही?

आता यावेळेस मी काही ऐकणार नाहीच.

अनघाने यावेळेस सर्व आपल्या ताब्यात घेतल.

भाऊजी म्हणाले… अनघा I am with you. मी सांगून सांगून थकलो.

अनघाने…

आधी स्वयंपाक घरातील जूना तवा, हॅन्डल नसलेल चहाचे भांड, प्लास्टिक च्या गाळण्या सर्व बदलल. किती तरी जून्या गोष्टी फेकायलाच हव्या होत्या.

एजेंसी मधून माणस बोलवून घराचे deep cleaning करून घेतले. अनेक उपयोगात नसलेल्या वस्तू, कपडे बाहेर टाकल्या. नवीन आणल्या.

मुख्य म्हणजे घरकामाला आता दोन मावशी येतात. स्वयंपाक करायला, भांडी फर्शी, डस्टिंग करायला येतात.

अनघाच ताई बरोबर च बोलण ऐकून तिसर्या व्यक्तीला… अनघा म्हणजे ताई ची सून नाही मुलगी आहे असच कोणालाही वाटेल..

सोसायटीच्या सेक्युरीटी गार्डचा मुलगा चांगला आहे पण नोकरी करत नाही. त्याला अनघाने बोलवून भाऊजींची महिन्याच्या कामांची लिस्ट सांगितली त्याबरोबरच वरची काम करायला सांगीतल. महिनाचे पैसे द्यायचे ठरले.

भाऊजी जरी on line काम करत असले तरी आता हाताशी प्रसन्न असतो. अगदी लिफाफे, पेंसील काहीही वस्तू आणायची असली, वरून सामान काढायचे किंवा ठेवायचे असले तरी प्रसन्न हाजिर असतो.

खरतर हे सर्व ताई स्वतःच करू शकली असती. पण अस न करण्यामागे काय कारण असतात माहित नाही.

पैसे खर्च करण खूप जणांना जमत नाही. या उलट काही घर मदतनीसांच्या भरवशावरच चालतात. ही दोन extreme टोक आहेत.

याचा मध्य पण असूच शकतो ना.

ताई सारखे वागण बरेच घरात दिसत.

त्यांना स्वतःच कौतुकही वाटत. शरीराला हालचाल नक्की पाहिजेच. पण त्यासाठी वयाच्या पंचाहत्तरीत झाडू फर्शी करण किती योग्य आहे?

 Active रहायला बाकी बर्‍याच गोष्टी आहेतच की.

आपल्या पिढीने खूप पैसा बघीतला नाही. हे खरय. पण छान आरामात रहायला खूप पैसा लागतही नाही. छान व्यवस्थित राहण ही आवड असायला हवी. आणि त्याप्रमाणे पैसा खर्च करावा. घरच्या स्त्रीने अगदी हक्काने त्यानुसार सर्व सोई करून घ्याव्या.

बरे असो…

 आज ताई डबल आनंदात आहे. एकतर सर्व छान व्यवस्थित झालेल बघून, तिला छान वाटतय. , दुसर सूनेनी केलय. तो आनंद वेगळाच असतो. त्या आनंदात वेगळ सूख, समाधान असत.

 आज अनघा आई बाबांना घेऊन बाजारात गेली. दोघांसाठी नवीन कपडे घेतले. आईंसाठी गाऊन घेतले. पायात अडकायला नको म्हणून लगेच टेलरकडून त्यांची उंची बरोबर करून घेतली.

घरातील repair work करून घेतले. बाबांबरोबर बॅंकेत जाऊन त्यांची सर्व काम केली.

पंधरा दिवसांच्या आपल्या भारत visit मध्ये अनघाने आई – बाबांच रोजच काम व्यवस्थित होईल याचा विचार करून सर्व काम केली.

आज ताईने विचारले… अग! अनघा तुझी खरदी केंव्हा करणार आहेस?

अनघा म्हणाली… यावेळेस मी माझ काहीच काम आणल नाहिये.

अनघाची सुट्टी संपत आली आहे.

तिला भेटायला म्हणून मी आज ताईकडे गेले. साक्षी अनघाला न्यायला म्हणून चकल्या तळत होती.

निघताना अनघाने आई- बबांना नमस्कार केला. दोघांचे हात हातात घेऊन म्हणाली…

आई- बाबा मजेत रहा. आता आपण परिस्थितीत बदल करू शकत नाही. आमचे येथे कायमचे येणे, किंवा तुमचे अमेरिकेत येणे दोन्ही शक्य नाही.

आम्हाला तुमची काळजी असते.

आई मजेत रहा. खूप फिरा, बाहेर जा. अस म्हणून अनघा आईंच्या गळ्यात पडून रडू लागली.

बरोबर आहे…

म्हणतात ना…

त्रास निवडायचा की आनंद?

निवड फक्त तुमची आहे.

स्वतःसाठी जगा.

स्वतःला निवडा 

आनंदाने पूढे चला…

स्वतः साठी वेळ द्या. ,

कारण आपण आहोत तर जग आहे.

हे जरी खर असल तरी 

आज दुसरी अतिशय महत्त्वाची गोष्ट अनघाने शिकवली… ती म्हणजे… दुसर्यांसाठी पण वेळ द्या, कारण ते नसतील तर आपल्या असण्याला काहीच अर्थ नाही…

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ शास्त्रस्तुती ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ शास्त्रस्तुती ☆ श्री दिवाकर बुरसे

 शास्त्रस्तुती

 – – – ज्ञान, अनुशासन आणि मुक्तीचा दिव्य प्रवास

शास्त्र म्हणजे काय?

शब्दाचा उगम आणि अर्थवैभव– – 

‘शास्त्र’ या शब्दात ‘शास’ हा मूळ धातू आहे. संस्कृत भाषेतील ‘शास’ धातूला ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय लावून ‘शास्त्र’ हा शब्द निर्माण झाला आहे. ‘शास’ या धातूचा अर्थ— उपदेश करणे, शासन करणे, अनुशासित करणे असा आहे.

म्हणूनच ‘शास्त्र’ म्हणजे—

जे मार्गदर्शन करते, अनुशासन घडवते आणि जीवनाला योग्य दिशा देते ते शास्त्र.

शास्त्राची तात्त्विक व्याख्या

भारतीय वैचारिक परंपरेनुसार शास्त्र म्हणजे केवळ संग्रहग्रंथ नव्हे; तर ते क्रमबद्ध, सुसूत्र आणि जीवनदर्शी ज्ञान आहे.

प्राचीन व्याख्या सांगते—

“शासनात् शंसनात् शास्त्रम्”

म्हणजे जे अनुशासन करते आणि ज्ञानाची ओळख करून देते ते शास्त्र. तसेच—

“शास्ति च त्रायते च शास्त्रम्”

म्हणजे जे योग्य-अयोग्याचा निर्णय शिकवते आणि अज्ञानापासून रक्षण करते ते शास्त्र.

शास्त्र : ज्ञानाचे संरचित रूप

कोणत्याही विषयाचे क्रमबद्ध, तर्कसुसंगत आणि अनुभवाधिष्ठित ज्ञान म्हणजे शास्त्र.

या अर्थाने शास्त्रे अनेक असली तरी भारतीय तत्त्वज्ञानात विशेष मान्यता असलेली षट्दर्शने अशी आहेत—

न्याय, योग, सांख्य, वैशेषिक, मीमांसा आणि वेदांत (उपनिषदे)

यांखेरीज—

वेद, पुराणे, स्मृतिग्रंथ, तसेच अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, खगोलशास्त्र, नाट्यशास्त्र, छंदशास्त्र, आयुर्वेद इत्यादींचाही शास्त्रांत समावेश होतो; परंतु त्यांचे प्रामाण्य हे श्रुति आणि वेदांताधिष्ठित तत्त्वांवर आधारित असणे आवश्यक मानले गेले आहे.

शास्त्रांचे प्रामाण्य : अनुभव, तर्क आणि आचार

भारतीय तत्त्वज्ञानात शास्त्र हे आंधळ्या श्रद्धेचे नव्हे, तर प्रज्ञेच्या जागृतीचे साधन आहे.

शास्त्रांचा पाया उभा आहे—

श्रुति (अध्यात्मिक परंपरा)

युक्ति (तर्कबुद्धी)

अनुभूति (प्रत्यक्ष अनुभव)

शास्त्र सांगते, पण त्याची सत्यता आचरणातून अनुभवल्याखेरीज ज्ञान परिपूर्ण होत नाही.

म्हणूनच शास्त्र हे—

वाचनापुरते नसून, जीवन जगण्याची कला शिकवणारे मार्गदर्शक आहे.

शास्त्र आणि विवेकबुद्धी

शास्त्राचा खरा उद्देश मनुष्याला विचारस्वातंत्र्य आणि विवेक प्रदान करणे हा आहे, अंधानुकरण नव्हे.

ते शिकवते—

सत्य आणि असत्य यातील भेद.

नित्य आणि अनित्य यातील भेद

आत्मा आणि अनात्म याची ओळख

परंतु—

शास्त्राचा अभ्यास जर केवळ वादासाठी झाला, तर तो ज्ञान न राहता अहंकाराचे साधन बनतो.

म्हणूनच शास्त्राध्ययनासाठी आवश्यक आहेत—

विनय, श्रद्धा आणि चिंतनशीलता

शास्त्र आणि साधकाची भूमिका

नम्र विद्यार्थ्याने, ज्ञानेच्छु साधकाने आणि सूज्ञ व्यक्तीने शास्त्रांचा आदर करावा. त्यांचा सखोल अभ्यास करावा. उथळपणे त्यांना नाकारू नये. एखादा विचार पटला नाही तर

शास्त्राला दोष देण्यापूर्वी स्वतःच्या तर्काची चिकित्सा करावी.

बहुधा दोष आपल्याच आकलनात असतो, आणि सखोल विचारांती हे उमगते आणि मन नम्रतेने शास्त्रापुढे नतमस्तक होते.

कालपरत्वे शास्त्रांचे पुनर्वाचन

काळ बदलतो, परिस्थिती बदलते; परंतु शास्त्रातील मूलतत्त्वे शाश्वत असतात. त्यातील काही दृष्टांत, उदाहरणे, तपशील कालबाह्य होऊ शकतात; परंतु तत्त्वे मात्र चिरंतन सत्य असतात.

म्हणूनच प्रत्येक युगात शास्त्रांचे

नव्या दृष्टिकोनातून पुनर्वाचन आवश्यक ठरते.

शास्त्र : कुमार्गापासून सन्मार्गाकडे

थोडक्यात—

जे ज्ञान माणसाला कुमार्गापासून दूर नेऊन सन्मार्गावर आणते, त्याचे कल्याण करते—तेच शास्त्र.

शास्त्र हे—

जीवनाला दिशा देते

मनाला स्थैर्य देते

बुद्धीला स्पष्टता देते

समारोप : प्रकाशाचा अखंड स्रोत

शास्त्र म्हणजे केवळ अक्षरांचा संग्रह नाही; ते जीवनाचा दीपस्तंभ आहे.

शास्त्र —

अज्ञानातून ज्ञानाकडे नेते

अस्थिरतेतून स्थैर्याकडे नेते

मर्यादिततेतून अमर्यादतेकडे नेते

म्हणूनच—

शास्त्र हे नुसते वाचायचे नसते—ते जगायचे असते,

ते नुसते समजायचे नसते—ते आत्मसात करायचे असते.

🙏🏻

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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