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आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (37) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।।37।। इन स्वजनों धृतराष्ट्रों का तो उचित नही वध तात कैसे सुख दे पायेगा,अपनों का आघात।।37।। भावार्थ :  अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?॥37॥ Therefore, we should not kill the sons of Dhritarashtra, our relatives; for, how can we be happy by killing our own people, O Madhava (Krishna)? ।।37।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * शहादत * – डा. मुक्ता

डा. मुक्ता शहादत (डा. मुक्ता जी का e-abhivyakti में स्वागत है। आप हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है एक सामयिक एवं सार्थक कविता 'शहादत')   आज मन बहुत हैरान-परेशान सा है दिल में उठ रहा तूफ़ान-सा है हर इंसान पशेमा-सा है क्यों हमारे राजनेताओं का खून नहीं खौलता पचास सैनिकों की शहादत को देख उनका सीना फट क्यों नहीं जाता   कितने संवेदनहीन हो गए हैं हम चार दिन तक शोक मनाते कैंडल मार्च निकालते,रोष जताते इसके बाद उसी जहान में लौट जाते भुला देते सैनिकों की शहादत राजनेता अपनी रोटियां सेकने में मदमस्त हो जाते सत्ता हथियाने के लिए विभिन्न षड्यंत्रों में लिप्त नए-नए हथकंडे अपनाते   काश हम समझ पाते उन शहीदों के परिवारों की मर्मांतक पीड़ा अंतहीन दर्द, एकांत की त्रासदी जिसे झेलते-झेलते परिवार-जन टूट जाते हम देख पाते उनके नेत्रों से बहते अजस्र आंसू पापा की इंतज़ार में रोते-बिलखते बच्चे दीवारों से सर टकराती पत्नी आगामी आपदाओं से चिंतित माता-पिता जिनके जीवन में छा गया है गहन अंधकार जो काले नाग की भांति फन फैलाये उनको डसने को हरदम तत्पर   दु:ख होता है यह देख कर जब हमारे द्वारा चुने हुये नुमाइंदे सत्ता...
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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – * अवचित एका सायंकाळी * – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस अवचित एका सायंकाळी (प्रस्तुत है  सुश्री ज्योति  हसबनीस जी  द्वारा  एक सुमधुर संगीत के कार्यक्रम की अति सुंदर व्याख्या ।  ) कधी कधी ध्यानी मनी नसतांना अचानक एखादा खजिना गवसावा तसं काहीसं काल झालं . सिव्हील लाईन्सच्या वसंतराव देशपांडे हॉलकडे जाणाऱ्या रस्त्याचं उत्सवी रूप बघून हरखूनच गेले मी आणि नकळतच पावलं उत्सुकतेने हॉलच्या दिशेने वळली, रस्त्याच्या दुभाजकावर रोवलेले, आणि फडफडणारे रंगीबेरंगी झेंडे, मुख्य प्रवेशद्वारावर उभारलेली अत्यंत आकर्षक कमान ,हाॅलपर्यंतच्या रस्त्यावर घातलेला रेड कार्पेट, सुरेख रंगसंगतीतली संस्कारभारतीची रांगोळी, हाॅलच्या प्रवेशद्वारासमोर मंद ज्योतींच्या प्रकाशात जणू कलेचा सारा वैभवशाली इतिहासच उजळून काढणारा भव्य दीपस्तंभ, गच्च मोगऱ्याचं घमघमणारं मुख्य दारावरलं तोरण, आणि आत हाॅलमध्ये जाण्यासाठी असणाऱ्या प्रत्येक प्रवेशद्वारावर सोडलेले मोगऱ्याचे कलात्मक पडदे, सारं वातावरणच गंधभारलं झालं होतं. 'सूर -वसंत' च्या रूपांत जणू वसंतच फुलला होता, परिसरात, मनामनात! आज अगदी मेजवानी होती रसिकांना ! सुरेल वाद्यांची जुगलबंदी, आणि ऊस्ताद रशिदखान  यांचे खणखणीत सूर ! डायसवर सारी दिग्गज कलाकार मंडळी आपापल्या वाद्यांशी थोडंसं हितगुज करतांना जाणवत होतं, हळूहळू पडदा उघडला, आणि थोर कलाकारांचा परिचय करून दिल्यानंतर ज्याची रसिक...
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आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (36) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्‌हत्वैतानाततायिनः।।36।। धृतराष्ट्रों को मारकर क्या हित होगा श्याम वध इन आताताइयों का होगा पाप का काम।।36।। भावार्थ :  हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा॥36॥   By killing these sons of Dhritarashtra, what pleasure can be ours, O Janardana? Only sin will accrue by killing these felons.।।36।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * सबको रंगो  तिरंगे से !! * – श्री वैभव गुप्ता

श्री वैभव गुप्ता  सबको रंगो  तिरंगे से !! (e-abhivyakti में सुप्रसिद्ध युवा कवि एवं मंच संचालक श्री वैभव गुप्ता जी का स्वागत है। आपकी कविता "मैं नारी हूँ" सोशल मीडिया पर सर्वाधिक देखी/सुनी गई कविताओं में से एक है। ) क्यूँ पाक तुम्हारे करम नहीं रंगों का कोई धरम नहीं भगवा इसका और उसका हरा कहने में तुमको शर्म नहीं क्या मिला है बाँट के इंसान को क्या मिला है तुमको दंगे से ! इस होली पर एक हो जाओ  और सबको रंगो  तिरंगे से !! केसरिया रंग बलिदानी है और हरा बसंती धानी  है आजादी में अशफ़ाक़ भगत दोनों की ही क़ुरबानी है हिन्दू मुस्लिम हो अलग अलग तो दीखते हैं बेरंगे से !! इस होली पर एक हो जाओ  और सबको रंगो  तिरंगे से !! केसरिया हरा इक साथ चले रंग श्वेत शांति की बात चले फिर बने तिरंगा ये भारत दुश्मन को पता औकात चले हम का जमुना का सम्मान करें तुम्हे प्यार हो हर हर गंगे से !! इस होली पर एक हो जाओ  और सबको रंगो  तिरंगे से !! © वैभव गुप्ता ...
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आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (35) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ।।35।। इन्हें मारना कब उचित,चाहे खुद मर जाऊं धरती क्या,त्रयलोक का राज्य भले मैं पाऊं।।35।।   भावार्थ :  हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?॥35॥   These I do not wish to kill, though they kill me, O Krishna, even for the sake of dominion over the three worlds, leave alone killing them for the sake of the earth! ।।35।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yah oo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – * साहित्यिक सम्मान की सनक * – श्री मनीष तिवारी

श्री मनीष तिवारी  साहित्यिक सम्मान की सनक  (प्रस्तुत है संस्कारधानी जबलपुर ही नहीं ,अपितु राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध साहित्यकार -कवि  श्री मनीष तिवारी जी का एक सार्थक एवं सटीक व्यंग्य।)   सच कह रहा हूँ भाईसाब उम्र को मत देखिए न ही बेनूर शक्ल की हंसी उड़ाइये, मेरी साहित्यिक सनक को देखिए सम्मान के कीर्तिमान गढ़ रही है, सनक एकदम नई नई है, नया नया लेखन है, नया नया जोश है ये सब माई की कृपा है कलम घिसते बननी लगी, कितनी घिसना है कहाँ घिसना है ये तो अभी नहीं मालूम, पर घिसना है तो घिस रहे है। हमने कहा- "भाईसाब जरूर घिसिये पर इतना ध्यान रखिए आपके घिसने से कई समझदार पिस रहें हैं।" वे अकडकर बोले-  "आप बड़े कवि हैं इसलिए हम पर अत्याचार कर रहें हैं।आपको नहीं मालूम हम पूरी दुनिया में पुज रहे हैं। हमारी रचनाएं दुनिया के अनेक देशों में उड़ते उड़ते साहित्य पिपासुओं द्वारा भरपूर सराही जा रहीं हैं।" मैंने एक चिंतनीय लम्बी साँस खींची और कहा - "आपकी इसी प्रतिभा...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * मैं लिफ्ट नहीं हूँ * – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी  मैं लिफ्ट नहीं हूँ  (आज  प्रस्तुत है सुदूर पूर्व की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की  भावप्रवण  कविता “मैं लिफ्ट नहीं हूँ ”। )   तुम समझते क्यों नहीं मुझ में भी जान है कहा न- सच में प्राण है मुझमें दर्द भी होता है मुझे महसूस होती है थकावट मेरे पास भी एक अरमानों का किला है जिसे तुम बुहारने नहीं देते लिफ्ट समझ मुझको ऊपर नीचे ढकेलते रहते हो चीख को अनसुना कर बटन दबाते रहते हो मैं बेजान मशीन नहीं जो रात-दिन की गुलाम समझ ठेल देते हो मैं भी एक कोमल सा दिल रखती हूँ जिसे तुम जब जी चाह आहत कर तोड़ देते हो भेद स्त्री पुरुष का तुम क्यों नहीं छोड़ देते पंख खोल उड़ने का हक सबका है यह पांच तत्व दोनों के लिए हैं तुम्हारी तरह मेरा भी बहुत कुछ पर्सनल है मैंने भी सपनों के फंदों को जोड़ कर रखा है जिसे तुम कुरेद कुरेद कर फंदे गिरा उधेड़ देते हो मेरी जात को कोसते वक्त क्यों भूल जाते हो अपनी माँ को न जाने कितने तीरों से घायल हो जन्म दिया होगा तुमको बहन के जन्म पर मातम मनाया था तुम सबने बहुत की थी अधखिली को मारने की कोशिश पर जन्म...
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आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (34) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन)   आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥   पिता,पितामह,पुत्र औ" सब गुरूजन हो अंध भूल ससुर साले तथा मामा के संबंध।।34।।   भावार्थ :  गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं ॥34॥   There are teachers, fathers, sons and also grandfathers, grandsons, fathers-in-law, maternal uncles, brothers-in-law and relatives.।।34।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yah oo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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सूचना / Information – प्रख्यात साहित्यकार नामवर सिंह जी नहीं रहे

प्रख्यात साहित्यकार नामवर सिंह जी नहीं रहे जन्म: 28 जुलाई 1926 (बनारस के जीयनपुर गाँव में) निधन: 19 फरवरी 2019 (नई दिल्ली) हिन्दी के शीर्षस्थ शोधकार-समालोचक, निबन्धकार तथा मूर्द्धन्य सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उपन्यास लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्य रहे।  अध्ययनशील तथा विचारक प्रकृति के नामवर सिंह हिन्दी में अपभ्रंश साहित्य से आरम्भ कर निरन्तर समसामयिक साहित्य से जुड़े हुए आधुनिक अर्थ में विशुद्ध आलोचना के प्रतिष्ठापक तथा प्रगतिशील आलोचना के प्रमुख एवं  सशक्त हस्‍ताक्षर थे। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आदरणीय नामवर सिंह जी ने हिन्दी साहित्य में आलोचना को एक नया आयाम दिया। प्रमुख रचनाएँ: छायावाद, इतिहास और आलोचना, कहानी नयी कहानी, कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परम्परा की खोज, वाद विवाद संवाद आदि। सम्पादन : जनयुग और आलोचना प्रोफेसर : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, सागर विश्वविद्यालय, जोधपुर विश्वविद्यालय  और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अब आदरणीय स्व. नामवर सिंह जी की स्मृतियाँ शेष हैं। e-abhivyakti परिवार उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर नमन! ...
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