हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी पर ऐसे विराजमान थे जैसे किसी सल्तनत के आखिरी वारिस हों और मैं उनकी प्रजा का सबसे फर्जी फरियादी। मैंने जैसे ही हांफते हुए कहा कि “सर, लूट हो गई,” उन्होंने अपनी मूंछों को कड़क चाय के भाप से सहलाया और बोले, “अबे ओ केस डायरी के फटे हुए पन्ने, ये जो तू सांसें उखाड़कर ‘मुलजिम’ जैसी शक्ल बना रहा है, इसके लिए कोई अलग से ‘धारा’ लगवाऊं या सीधे ‘रोजनामचा’ में तेरी किस्मत का एनकाउंटर कर दूँ?” मैंने दलील दी कि सर चार नामालूम बदमाशों ने मेरा रास्ता रोका, तो उन्होंने बगल में खड़े सिपाही को इशारा किया, “देख हवलदार, प्रार्थी को वारदात से ज्यादा अपनी स्टोरी की चिंता है। लिखो इसमें—मजकूर शख्स अपनी लापरवाही की नुमाइश कर रहा था और बदमाशों ने इसे सरकारी माल समझकर कुर्क कर लिया।” उनके चेहरे पर वो दफा-302 वाली गंभीरता थी, जिससे लग रहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मेरा ‘पंचनामा’ पक्का है।

​मुंशी जी ने अपना वो खानदानी रजिस्टर ऐसे निकाला जैसे वो किसी मुजरिम की हिस्ट्रीशीट हो। दरोगा जी ने पेन की निब से मेज पर दस्तक देते हुए कहा, “बेटा, ये जो तूने बैग छिनने की दास्तान सुनाई है, इसमें ‘सबूत’ कम और ‘सिनेमा’ ज्यादा है। बैग में क्या था? कोई ‘खुफिया दस्तावेज’ या बस तेरी ‘बेरोजगारी’ का कच्चा चिट्ठा?” मैंने जैसे ही लैपटॉप और गैजेट्स की लिस्ट गिनानी शुरू की, उन्होंने हाथ उठाकर मुझे बरामदगी के पहले ही खामोश कर दिया। बोले, “इतना तामझाम लेकर तू इस गली में ‘गश्त’ कर रहा था जैसे तू इस इलाके का ‘बीट ऑफिसर’ हो? ये तो वही बात हुई कि ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’। चोरों ने तो तुझ पर एहसान किया है कि तुझे बोझ से आजाद कर दिया, वरना तू तो ताजीरात-ए-हिंद की किताब बनकर ही घूमता रहता।” वहां मौजूद स्टाफ ऐसे ठहाके लगा रहा था जैसे थाना न होकर कॉमेडी सर्कस का रिमांड रूम हो। मुंशी जी ने चुटकी ली, “साहब, लिख दो कि बैग को जमानत मिल गई है, इसलिए वो प्रार्थी के पास से फरार हो गया।”

​जब मेरी आंखों से आंसू मुलजिम की तरह टपकने ही वाले थे, तभी दरोगा जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और मेज के नीचे से वही बैग निकाल कर मेरे सामने पटक दिया। मेरी तो जैसे शिनाख्त ही खो गई! वो मुस्कुराकर बोले, “अबे ओ ‘चश्मदीद गवाह’, ये बैग बाहर बेंच पर लावारिस पड़ा था। हम तो बस ये देख रहे थे कि अगर सच में तेरी ‘कुर्की’ हो जाए, तो तू थाने में बयान दर्ज कराएगा या सीधा सुसाइड नोट लिखेगा? ये जो अभी तूने सस्पेंस ड्रामा झेला है, ये तेरी सुरक्षा का चालान था।” मैंने कांपते हाथों से बैग उठाया, तो उन्होंने पीछे से आवाज दी, “अरे सुन, जाते-जाते इस मुठभेड़ की मिठाई तो खिलाता जा, वरना अगली बार हम तेरी एफआईआर में ‘क्लाइमेक्स’ ऐसा डालेंगे कि तू खुद को ही मुजरिम घोषित कर देगा!” मैं बैग लेकर ऐसे नौ-दो-ग्यारह हुआ जैसे कोई सजायाफ्ता कैदी जेल तोड़कर भागा हो, और पीछे से पूरा थाना ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के बजाय ‘हाहाकार जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९० ☆ गीत – हँसता जीवन ही बचपन… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९० ☆ 

☆ गीत – हँसता जीवन ही बचपन ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

भोला बचपन कोमल मन है

प्यार तुम्हारा सदा अमर है।

मुझको तो बस ऐसा लगता

तू पूरा ही गाँव  – नगर है।।

 *

रहें असीमित आशाएँ भी

जो मुझको नवजीवन देतीं।

जीवन का भी अर्थ यही है

मुश्किल में नैया को खेतीं।

 *

हँसता जीवन ही बचपन है

दूर सदा पर मन से डर है।

भोला बचपन कोमल मन है

प्यार तुम्हारा सदा अमर है।।

 *

पल में रूठा, पल में मनता

घर – आँगन में करे उजारा।

राग, द्वेष, नफरत कब जागे

इससे तो यह तम भी हारा।

 *

बचपन तू तो खिला सुमन है

पंछी – सा उड़ता फर – फर है।

भोला बचपन कोमल मन है

प्यार तुम्हारा सदा अमर है।।

 *

बचपन का नाती है नाना

खेल करे यह खूब सुहाए।

सदा समर्पित प्यार तुम्हीं पर

तुम ही सबका मिलन कराए।

 *

झरने, नदियाँ तुम ही सब हो

जो बहता निर्झर – निर्झर है।

भोला बचपन कोमल मन है

प्यार तुम्हारा सदा अमर है।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४७ ⇒ बुढापे की लाठी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुढापे की लाठी।)

?अभी अभी # ९४७ ⇒ आलेख – बुढापे की लाठी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Walking stick)

गिरधर कविराय ने लाठी में जितने गुण बताए हैं, उसमें उन्होंने न तो बुढ़ापे का जिक्र किया है और न ही किसी दृष्टिहीन व्यक्ति का।

यानी कविवर शायद लठैत किस्म के व्यक्ति रहे हों, अधिकतर प्रवास पर रहे हों और उन्हें कुत्तों से अधिक डर लगता हो। बैलगाड़ी के जमाने में कवियों की दृष्टि भी नदी नालों के आगे नहीं जा पाती थी। लाठी उनके लिए कभी एक हथियार था तो कभी मात्र एक सहारा।

भले ही युग बदल जाए, लेकिन इंसान कुत्ते के पीछे लठ लेकर दौड़ना नहीं छोड़ेगा।

आजकल लाठी का नहीं, छड़ी का युग है। बुढापे की लाठी का उपयोग अब उम्र के हर पड़ाव पर होने लग गया है। लाठी को अगर सहारा कहें तो मन को अधिक सुकून मिलता है। बूढ़े आजकल सीनियर सिटीजन कहलाते हैं और अंधे को तो आप दृष्टिहीन भी नहीं कह सकते, क्योंकि आजकल वे भी दिव्यांग परिवार के सदस्य हो गए हैं। अब इस दुनिया में कोई असहाय, वृद्ध, अपाहिज, मूक बधिर, अथवा सूरदास नहीं।।

कोई व्यक्ति नहीं चाहता, उसे कभी लाठी का सहारा लेना पड़े। पहले घर परिवार ही इतने बड़े होते थे कि बच्चे ही बुढ़ापे की लाठी हुआ करते थे। यह एक ब्रह्म सत्य है, जब बच्चे छोटे होते हैं, तो बड़े ही उनका सहारा होते हैं। बड़ों की उंगली पकड़कर ही तो पहले चलना सीखते हैं और बाद में अपने पांवों पर खड़े हो जाते हैं।

जिस तरह बचपन के बाद जवानी आती है, जवानी के बाद तो बुढ़ापा ही आना है। उंगली वही रहती है, लेकिन कंधे और कमर अब वैसी नहीं रहती। अगर किसी इंसान का सहारा नहीं, तो छड़ी मुबारक। हमें तो लाठी उठाए बरसों बीत गए।

राजनीति में कल जिसके पास सिर्फ लाठी थी, उसने आज भैंस भी पाल ली है।।

जिस तरह दिन और हालात बदलते हैं, उसी तरह बुढ़ापे और लाठी की परिभाषा भी बदल चुकी है। आखिर लाठी क्या है, आलंबन, विकल्प अथवा सहारा ही न! और बुढ़ापा क्या है, बाल सफेद होना, दांत गिरना, कमर झुकना और आंखों – कानों से कम दिखाई देना। मुझे कम दिखाई देता है तो मैं लाठी नहीं ढूंढता, अपना चश्मा ढूंढता हूं। मेरा चश्मा ही मेरे लिए लाठी है।

बस इसी तरह सफ़ेद बाल की मुझे चिंता नहीं, रोज डाय करता हूं, बत्तीसी बाहर हुई नहीं कि, डेंचर मौजूद है। पेंशन क्या किसी लाठी से कम है। ये सब ही तो मेरे बुढ़ापे की असली लाठी हैं। जिसका पांव नहीं, वहां जयपुर फुट ही बुढ़ापे की लाठी का काम करता है। नाच मयूरी।।

लेकिन इतना सब होने के बावजूद मेरी असली बुढ़ापे की लाठी तो आज भी मेरी धर्मपत्नी ही है। वह कभी मेरा सहारा है तो कभी मैं उसका आलंबन।

कहीं कोई बेटा अपनी मां की लाठी है तो कहीं कोई पोता अपने दादा जी की लाठी।

जीवन के किस मोड़ पर हमें किस लाठी की आवश्यकता पड़ जाए, कुछ कहा नहीं जाता। सहारा लें, तो किसी को सहारा दें भी। लाठी में कर्ता भाव नहीं होता सिर्फ सेवा भाव होता है। लाठी ही सहारा है, सहारा ही ईश्वर है। एक सहारा तेरा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ ​म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती आयोजित ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ जहाँ गिरता है पसीना, वहाँ चाँद उगता ही है ! – मुकुटबिहारी “सरोज” ☆

म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती आयोजित

सतपुड़ा की उपत्यका में फैले नीलाभ अंधेरे, महुआ, आम, नीम, बाँस और पलाश के दहकते फूलों की सुंदरता तथा उष्मा से अनुप्राणित अगर कोई कार्यक्रम हो, वह भी काव्यांजलि का तो उसके मोहक स्वरूप की कल्पना सहजतः की जा सकती है।

मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया।

सुख्यात बुन्देलखण्डी कवि महेश कटारे सुगम की अध्यक्षता में संपन्न इस सारस्वत आयोजन का शुभारंभ मानवीय समाज रचना के संकल्प से हुआ। प्रथम वक्ता हेमेन्द्र राय ने सरोज जी की पंक्ति से आह्वान किया—“इन हवाओं पर कभी विश्वास कर लेना न तुम”

“तब तलक मत लिख, जब तलक आँख पानी से न भर जाए”–कवि की इन पंक्तियों के साथ प्रसिद्ध गीतकार कवयित्री डाॅ मालिनी गौतम ने कहा–समय की धड़कनों को गहराई से सुनती हैं उनकी रचनाएं। जागरण के आग्रह की कविता है उनकी।

सरोज जी का काव्यपाठ का अनूठा अंदाज़ श्रोताओं को बाँधे रखता था। पिता श्री से जुड़े संस्मरणों को श्रोताओं से साझा करते हुये पुत्री मान्यता सरोज ने कहा कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया तो डी डी और रेडियों से ब्लैकलिस्ट कर दिये गए।

वे जैसा जीते थे वैसा लिखते थे। वे एक डेमोक्रेटिक पिता थे। अपने बच्चों पर पिता होने का भार नहीं ढोया।

डॉ मनीषा जैन ने उनके दो काव्य-संग्रह किनारे के पेड़ और पानी के बीज के हवाले से उनके विद्रोही व्यक्तित्व को रेखांकित किया–“जहां गिरता है पसीना। वहाँ चाँद उगता ही है। “सरोज की कविता जीवन का आसव है। “जिसमें मानव मन की पीड़ा है, आक्रोश है और कश्मकश है।

प्रो लक्ष्मीकांत ने उन्हें पूर्ण कवि निरूपित किया। उन्होंने कम लिखा पर पूरी ईमानदारी से जनमन तक पहुँच जाए ऐसी भाषा में लिखा। “जिसने सहा नहीं उसने कहा नहीं। “उनके कृतित्व पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं।

अध्यक्ष महेश कटारे सुगम की दृष्टि में वे किसान कवि थे। सर्वथा एवं सर्वदा अनुकरणीय।

मुख्य अतिथि इन्दिरा किसलय ने कहा कि समय के विशाल अंतराल के बावजूद उनकी कविताएं उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कभी थीं। जिनमें दहक और महक दोनों हैं। यही उनके सृजन को कालजयी बनाती है। उनमें संघर्ष का शंखनाद तो है पर आशावाद भी उतना ही प्रबल है। व्यवस्थागत दिद्रूपताओं ने उनकी कविता को उर्वरक प्रदान किया– ” सृजन कभी मंजूर नहीं करता पहरे तलवार के”। “वे निष्कपट अभिव्यक्ति के बादशाह हैं। “

इस अवसर पर “यादों में सरोज” इस जन्मशती विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया।

द्वितीय सत्र में सर्व श्री महेश कटारे सुगम, इन्दिरा किसलय, मालिनी गौतम, अभिषेक वर्मा, लक्ष्मणप्रसाद डेहरिया, ओमप्रकाश नयन, हेमेंद्र राय, विनयप्रकाश जैन, अंजुमन आरजू, श्रृति कुशवाहा, महेश दुबे, प्रभात कटारे, अवधेश तिवारी, आशीष मोहन, तथा राकेश राज ने बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत कीं। नन्ही बच्ची आन्या ठाकुर ने सरोज जी की कविताओं की धारासार प्रस्तुति दी।

चित्रकार कवि रोहित रूसिया ने सरोज जी के गीतों का सस्वर सरस पाठ किया। कार्यक्रम का प्रारंभ ही ओशिन धारे की सांगीतिक प्रस्तुति से हुआ जिसने वातावरण को सुरों की बारिश में भिगो दिया।

चित्रकार ध्रुव के, सरोज के काव्यांशों पर आधारित पोस्टरों की धूम रही।

सचिव शेफाली शर्मा का सधा हुआ सहज संचालन मंत्रमुग्ध कर गया।

बीना, भोपाल, छिंदवाड़ा आदि स्थानों से पधारे कवियों ने भावपूर्ण कविताएं पेश कीं।

प्रबुद्ध गंभीर एवं जिन्दादिल साहित्यजीवी मान्यवरों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऊँचाई एवं अपूर्व गरिमा प्रदान की। सर्व श्री– गोवर्द्धन यादव, पवन शर्मा, रणजीतसिंह परिहार, डाॅ उर्मिला खरपुसे, डॉ अमर सिंह, अशोक जैन, शैलेन्द्र तिवारी, मोहिता जगदेव, हेमंत झा, राजकुमार चौहान, पद्मा जैन, दीप विश्वकर्मा, शरद मिश्रा, अंकुर वाल्मीकि, रामलाल सराठे, रश्मि, राजेन्द्र यादव, अनुराग श्रीवास्तव, अभिनव श्रीवास्तव, संजय औरंगाबादकर आदि प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति ने आयोजन को प्रकाम्य ऊँचाई प्रदान की।

“मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन” के अध्यक्ष एवं देशबंधु पत्र समूह के संपादक आदरणीय “पलाश सुरजन सर” इस महनीय आयोजन के श्रेयार्थी रहे।

दिनेश भट्ट के आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

 साभार – सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ ​बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की कार्यशाला संपन्न ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की कार्यशाला संपन्न ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बच्चों के संवेगात्मक विकास में कहानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं – ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश’

भोपाल। बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् द्वारा आयोजित बाल साहित्य लेखन कार्यशाला बड़ी सफलता के साथ संपन्न हुई। इस एक दिवसीय कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और अभिभावकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बच्चों के लिए रोचक, मनोरंजक, उपदेशात्मक और ज्ञानवर्धक साहित्य सृजन को प्रोत्साहित करना था।

मुख्य अतिथि शासकीय कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. मंगलेश्वरी नेशी ने अपने उद्बोधन में कहा कि बच्चों का साहित्य रोचकता से भरपूर, मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक होना चाहिए, ताकि बच्चे स्वाभाविक रूप से पढ़ने और सीखने की ओर आकर्षित हों।

बीज वक्तव्य देते हुए बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने कहा कि बाल साहित्य में कहानी, कविता, लोरी, पहेलियाँ, गीत आदि सभी विधाएँ शामिल हैं। इसमें बच्चों की बाल-सुलभ जिज्ञासाओं, कल्पनाओं और अभिव्यक्ति का स्थान होना चाहिए। यह रोचक और मनोरंजक होने के साथ-साथ उनके संवेगात्मक विकास में सहायक होना चाहिए।

प्रथम सत्र कहानी लेखन कार्यशाला पर केंद्रित रहा है। वरिष्ठ बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ने कहा कि कहानी बच्चों के संवेगात्मक विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने रोचक ढंग से दो-तीन कहानियाँ सुनाकर समझाया कि कहानी कैसे लिखी जाती है। बाल मन की कहानियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बच्चों से विविध विषयों पर कहानी लेखन करवाया। बच्चों ने मंच पर आकर अपनी रचनाएँ पढ़ीं। उनकी प्रेरणा से हिंदी की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. अर्चना भट्ट ने भी एक बाल कहानी सुनाकर सभी को चकित कर दिया।

द्वितीय सत्र कविता और बाल गीतों पर आधारित था। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेक्षा सक्सेना ने बाल गीतों पर दिशा-निर्देश दिए और क्षेत्रीय बोलियों के गीतों के माध्यम से बच्चों से सीधा संवाद किया। बच्चों ने विविध विषयों पर कविताएँ लिखकर मंच पर उत्साह से पाठ किया।

कार्यक्रम के संचालनकर्ता डॉ. शोभना तिवारी ने कहा कि बच्चों का साहित्य ज्ञानवर्धक होने के साथ उपदेशात्मक भी होना चाहिए, जिससे जीवन की नींव मजबूत हो और संस्कारों की अभिवृद्धि हो। रहीम और कबीर के दोहे इसके सशक्त उदाहरण हैं, जो प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक जीवन की संचित निधि बने रहते हैं।

वैदेही कोठारी ने पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति संरक्षण पर जोर देते हुए प्रकृति-परक रचनाओं के लेखन को रेखांकित किया। श्वेता नागर ने पढ़ने की अभिरुचि बढ़ाने के लिए पुस्तकालय सृजन उत्सव आयोजित करने और डायरी लेखन के दिशा-निर्देश दिए। रश्मि पंडित ने मुहावरे और लोकोक्तियों की कार्यशाला चलाई तथा कहा कि ये शिक्षाप्रद, रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होते हैं।

कार्यशाला में शहर के विभिन्न विद्यालयों और महाविद्यालयों के 55 से अधिक छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता की। सभी प्रतिभागियों का स्वागत हिंदी पंचांग से समन्वित पॉकेट डायरी और कलम भेंट करके किया गया। प्रमाण-पत्र भी वितरित किए गए। अर्थ दशोत्तर प्रतिष्ठा तिवारी और हार्दिक अग्रवाल ने डॉ. मीनू पांडे को शाल, स्मृति चिन्ह और साहित्य भेंट कर स्वागत किया। सरस्वती वंदना प्रिया उपाध्याय ने प्रस्तुत की।

विभिन्न विद्यालयों के पचपन से अधिक छात्र-छात्राएं, उनके अभिभावक, माता -पिता, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, महाविद्यालय के प्राध्यापक आदि सौ से भी अधिक सहभागी उपस्थित रहे। आभार ज्ञापन डॉ. मीनू पांडे ने किया। यह कार्यशाला बाल साहित्य सृजन में नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाली सिद्ध हुई।

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ भावरंग ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ भावरंग ☆ शालिनी जोशी

 सौंदर्याचा साज लेवून बहरतात रोज नवी फुले

 उत्सवाच्या गंधात तो परमेश्वर रंगभाव उधळे

 सुवासिक कुंद मदनबाण मोगरा

 शुद्ध पावित्र्य स्वच्छतेचा रंग पांढरा

 जपापुष्प सजे लालभडक रंगात

 प्रेम उत्साह धैर्य आणि राग सांगत

 पिवळ्या धमक रंगी शेवंती देखणी

 आशा आनंद सात्विक वृत्तीची ही खाणी

 अबोलीलाही कौतुक केशरी रंगाचे

 मौनव्रती प्रतीक ऊर्जा आणि त्यागाचे

 गगननील तो गोकर्णीचा आवडता

 सांगे तोच गुढता स्थिरता व शांतता

 गुलाबी गुलाब गालावरच फुलतो

 शृंगारासह कोमल निरागसता तो

 शोभा खरी फुलांना पानांच्या मखरात

 हरित वर्णात सृजनाची सुरुवात

 

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९६ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९६ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र –‘या पत्राबद्दल साहेबांना आत्ताच कल्पना द्यायला हवी. त्यांनी माझा अॅप्लीकेशन फॉरवर्ड करण्याआधी त्यांना हे समजायलाच हवं… ‘ हा विचार मनात येताच मी ते पत्र घेऊन तत्परतेने वखरे साहेबांच्या केबिनकडे निघालो. या क्षणी माझी पावलं प्रकाशवाटेकडे धाव घेतायत की मिट्ट काळोख्या अंधारवाटेकडे हे मात्र फक्त ‘त्या’लाच… त्या कर्त्या-करवत्यालाच माहित होतं!!)

“सर, माझा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड करण्यापूर्वी तुम्हाला कल्पना असावी म्हणून आजच माझ्याकडे आलेलं हे पत्र तुम्ही एकदा वाचून पहावं असं मला वाटतं. ” हातातलं एन्व्हलप त्यांच्याकडे देत मी म्हंटलं.

“कसलं पत्र? “

“मला नागपूर रिजनल आॅफिसकडून आलेला ‘शो काॅज’ मेमो आहे हा… “

माझं बोलणं सुरु असतानाच त्यांनी ते पत्र नजरेखालून घातलं आणि शांतपणे मला परत दिलं.

” आजपर्यंत आलेले सगळे अर्ज आज एकत्रच फाॅरवर्ड होतील. तुमचा एकट्याचाच अर्ज या कारणासाठी रोखून धरायची गरज नाहीय. तुम्ही या पत्राला तुमचं उत्तर तातडीने देऊन टाका. पुढं काय करायचं ते आपण पाहू. ” ते आत्मविश्वासाने म्हणाले. हे एरवी मला दिलासा देणारं वाटलंही असतं पण आज…?

” सर, आधीच्या पत्रात हेच सगळे आक्षेप होते. त्याला मुद्देसूद उत्तर मी आधीच दिलंय. ते त्यांना मान्य नाही एवढंच त्यांनी लिहिलंय. ते कां मान्य नाही, मी लिहिलंय त्यात नेमकं काय खोटं आहे, हे मी त्यांना विचारू शकत नाही. मग मी त्याच त्या प्रश्नांना तीच ती उत्तरं देत रहायचं आणि त्यांनी ते नाकारायचं याला शेवट नसणारच. त्यापेक्षा…? “

मी बोलावं की बोलू नये या संदर्भात…

“बोला ना.. ” ते म्हणाले.

“ज्यामुळे हा सगळा प्रश्न निर्माण झालाय किंबहुना केला गेलाय त्याची नेमकी पार्श्वभूमी मी तुम्हाला सांगू कां सर? कारण.. रिजनल मॅनेजर कांहीही म्हणत असले तरी त्यांचे वरिष्ठ म्हणून फायनल निर्णय तुम्हालाच घ्यायचा आहे ना सर? मी माझी बाजू तुम्हाला समजावून सांगितल्यानंतरच तुमच्याशी चर्चा करून त्यांच्या या पत्राला योग्य पद्धतीने उत्तर देऊ शकेन असं मला वाटतं… “

त्यांनी क्षणभर विचार केला…

” मी आज रिजनल मॅनेजरशी एकदा फोनवर सविस्तर बोलून घेतो. त्यांना नेमकं काय म्हणायचंय पाहू तरी. अशा बऱ्याच गोष्टी कम्युनिकेशन गॅपमुळे विनाकारण चिघळत जातात. तसं होऊ नये म्हणून. बाकी कांही नाही. यू डोन्ट वरी.

आपण बोलू नंतर ” ते म्हणाले.

त्यांचंही बरोबरच होतं.

मी निरूत्तर झालो. आता मूळ प्रश्न कांही काळ तरी असाच लटकत रहाणार होता. दुसरा पर्यायच नसल्याने मी वाट पहायचं ठरवलं.

मी वखरेसाहेबांच्या केबिनमधून बाहेर पडलो ते अशा अधांतरी अवस्थेतच. माझ्या केबिनमधे माझी रोजची कामं वाट पहात होतीच पण प्रयत्न करूनही आज माझं कामात मन लागेना. माझा स्वेच्छानिवृत्तीचा अर्ज प्रलंबित ठेवला जाईल म्हणून मी अस्वस्थ नव्हतो. तो मी न केलेल्या चुकीची शिक्षा म्हणून प्रलंबित ठेवला जाईल या कल्पनेने मी अस्वस्थ होतो. आजवरच्या तीस वर्षांच्या माझ्या स्वच्छ रेकाॅर्डवर कुणीही इतक्या सहजपणे शिंतोडे उडवू पहाणं मला अपमानास्पद आणि अन्यायकारक वाटत होतं याची ती अस्वस्थता होती. मी प्रतिकूल परिस्थितीत अकोला ब्रॅंचसाठी घेतलेले कष्ट, बॅंकेचे आर्थिक नुकसान होऊ नये म्हणून जीव तोडून केलेली धडपड, क्रिमिनल केसेस् योग्य वेळेत तातडीने फाईल करण्यासाठीची माझी यशस्वी धावपळ हे सगळं विचारात न घेता, एका महत्त्वाच्या खुर्चीवर बसलेली ‘रिजनल मॅनेजर’ सारखी महत्त्वाच्या पदावर काम करणारी व्यक्ती बॅंकेच्या आर्थिक नुकसानीला मलाच विनाकारण जबाबदार ठरवण्याचा विचार करूच कशी शकते? ‘ हा प्रश्न माझं मन कुरतडत राहिला होता. हे माझ्यासाठी अतिशय क्लेशकारक आणि संतापजनकही होतं. आता मला कांहीही न करता स्वस्थ बसून रहायचीही भीति वाटू लागली

पण वाट पहाण्याशिवाय माझ्याकडे दुसरा पर्यायच नव्हता. या विरोधाभासातून निर्माण झालेलं हे अधांतरीपण माझी घुसमट वाढवू लागलं.

मला यातून बाहेर तर पडायचं होतं पण ते कसं हेच समजत नव्हतं. या अशाच विचारात दंग असताना शिपायाने मला वखरेसाहेबांनी बोलावल्याचा निरोप दिला आणि अंधारल्या मनात आशेचा एक किरण ओझरता डोकावून गेला!

” मी बोललोय रिजनल मॅनेजरशी. अकोला ब्रॅंचमधल्या थकीत कर्जखात्यांबद्दलच्या स्टाफ अकाऊंटॅबिलीटी बाबत सेंट्रल आॅफिसच्या त्यांना स्ट्रिक्ट इन्सट्रक्शन्स आल्यात. बऱ्याच थकित कर्जखात्यांबाबत रिजनल आॅफिसच्या रेकाॅर्डनुसार वसुलीबाबत तुमच्याकडून कांहीच पाठपुरावा झालेला नाही असं त्यांचं म्हणणं आहे” वखरेसाहेब म्हणाले.

” थकीतच नव्हे तर थकीत होऊ पहाणाऱ्या इतर सर्व खात्यांचाही मी नियमित पाठपुरावा केलाय सर. ते कसं हे मी कागदोपत्रीही सिध्द करू शकतो, पण त्यातील नेमक्या कोणत्या खात्यांबाबत मी समाधानकारक पाठपुरावा केलेला नाही हे आधी त्यांनीही सांगायला नको कां? माझ्यावर सरसकट आरोप करून ते समाधानकारक स्पष्टीकरणाची कशी अपेक्षा करू शकतात सर? म्हणूनच या सर्व प्रश्नांबाबतची नेमकी पार्श्वभूमी मी सविस्तर सांगू कां असं तुम्हाला विचारलंही होतं सर. त्यानंतर तुमच्याच सल्ल्याने मी काय उत्तर द्यायचं ते ठरवणार होतो. ” मी म्हटलं.

मी कितीही शांतपणे आणि सहज बोललोय असं मला वाटलं तरीही त्यातली अस्वस्थता त्यांच्यापासून लपलेली नसावी. म्हणूनच ते मला समजावल्यासारखं म्हणाले, “जे कांही सांगायचंय ते तु्म्ही मला जरूर सांगा पण या सगळ्याचं असं विनाकारण दडपण घेऊ नका. होईल सगळं व्यवस्थित. नका काळजी करू. मी आहे ना? “

वखरेसाहेबांनी उच्चारलेल्या या शब्दांमधून ‘तो’च जणूकांही मला आश्वस्त करतो आहे हा विचार मनाला स्पर्शून गेला आणि एखाद्या तृषार्ताला घोटभर पाणी मिळालं तरी तो अगदी तृप्त होतो ना तसा दिलासा मला मिळाला. नाहीतरी रिजनल आॅफिसरनी कोणताही निर्णय घेतला तरी त्यावर सेंट्रल आॅफिसने शिक्कामोर्तब करण्यापूर्वी झोनल आॅफिसचं म्हणजेच पर्यायाने वखरेसाहेबांचं रेकमेंडेशन आवश्यक होतंच. मग मला भीति कसली? म्हणूनच ‘नका काळजी करू. होईल सगळं व्यवस्थित. मी आहे ना? ‘ हे वखरेसाहेबांचे शब्द मला अनेकार्थांनी वरदान मिळाल्यासारखेच वाटत राहिले. पण…?

पण.. पुढे अचानक घटनाच अशा घडत गेल्या कीं कांहीतरी विपरीत होणार असल्याच्या आशंकेने माझं मन सैरभैर झालं.. आणि..?

 क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ गुढीपाडव्याचे महात्म्य ☆ पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई ☆

पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

?  विविधा ?

☆ गुढीपाडव्याचे महात्म्य ☆ पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई ☆

नवीन वर्ष सुरू करण्याच्या प्रथा अनेक आणि वेगळ्या आहेत. एक जानेवारीपासून व्यावहारिक वर्ष सुरू होते. एक एप्रिल पासून आर्थिक वर्ष, कार्तिक शुद्ध प्रतिपदेपासून व्यापारी वर्ष, एक जून पासून शैक्षणिक वर्ष, त्याचप्रमाणे हिंदू संस्कृतीचे वर्ष हे चैत्रशुद्ध प्रतिपदेपासून सुरू होते. त्यालाच आपण ” गुढीपाडवा ” असे म्हणतो. याला वर्ष प्रतिपदा, तसेच युगादी तिथी असेही म्हटले जाते. वर्षारंभाचे दिवस जरी वेगवेगळे असले तरी, एक गोष्ट समान आहे, ती म्हणजे वर्ष हे बारा महिन्यांचे आहे. ” द्वादश मासौ संवत्सर:/” असे वेदाने प्रथम सांगितले. आणि जगाने ते मान्य केले आहे. या सर्वांमधे चैत्रशुद्ध प्रतिपदा हा वर्षारंभ दिवस सर्वात योग्य प्रारंभ दिवस आहे. त्याची कारणेही तितकीच महत्त्वाची आहेत. नैसर्गिक आणि भौगोलिक — गुढीपाडव्याच्या आसपासच सूर्य वसंत संपावर येतो. (संपातबिंदू, क्रांतीवृत्त व विषुववृत्त हे दोन वर्तुळे ज्या बिंदूत परस्परांना छेदतात तो बिंदू) आणि त्यावेळी वसंत ऋतू सुरू होतो. त्या काळात उत्साहवर्धक आणि समशीतोष्ण असे हवामान असते. झाडांनाही नवीन पालवी येत असल्याने तीही टवटवीत दिसतात. कधीही नवनिर्मिती ही आनंददायीच असते. तेव्हा अशा वातावरणात नवीन वर्षा ची सुरुवात करणे योग्य आणि आदर्श आहे.

‘गुढीपाडवा ‘ या सणाला पौराणिकही आधार आहे. प्रभू रामचंद्रांनी वालीचा वध केला, तो हा दिवस. महाभारताच्या आदी पर्वात उपरीचर राजाने, त्याला इंद्राने दिलेल्या कळकाची काठी जमिनीत रोवली. आणि नवीन वर्षाच्या सुरुवातीला त्याची पूजा केली. या परंपरेचा आदर म्हणून “गुढीपूजन ” केले जाऊ लागले. एका कथेनुसार, शंकर पार्वती यांचे लग्न चैत्रशुद्ध प्रतिपदेला ठरले आणि तृतीयेला झाले. म्हणून या दिवशी आदिशक्ती पार्वतीचीही पूजा करतात.

ऐतिहासिक दृष्टीने विचार करता, “शालिवाहन” नावाच्या कुंभाराच्या मुलाने मातीचे सैन्य केले. आणि त्यावर पाणी शिंपडून, त्याला जीवन दिले. आणि प्रबळ शत्रूचा पराभव केला. शालिवाहनाने क्षात्रतेज संपलेल्या समाजात आत्मविश्वास निर्माण केला. आणि शत्रुवर विजय मिळविलेला हा दिवस. आणि शालिवाहन शक सुरू झाले.

अध्यात्मिक दृष्ट्या या दिवसाचे महत्व सांगायचे तर, या दिवशी ब्रह्मदेवाने सृष्टी निर्माण केली म्हणजे सत्ययुगाला सुरुवात झाली असे मानतात. त्यामुळे हा दिवस वर्षारंभ मानला जातो. व्यावहारिक दृष्ट्या गुढीपाडवा हा साडेतीन मुहूर्तातील एक मानला गेला आहे. या दिवसातील कोणतीही घटिका ही शुभ मुहूर्तच असल्याने वेगळा मुहूर्त काढावा लागत नाही. गणेशयामल या तंत्र ग्रंथात सांगितले आहे की, 27 नक्षत्रांपासून निघालेल्या लहरींमध्ये सत्वगुण निर्माण करणाऱ्या प्रजापती लहरी चैत्र महिन्यात आणि विशेषतः चैत्रशुद्ध प्रतिपदेला सर्वात जास्त असतात. म्हणून तो दिवस वर्षारंभ मानणे रास्त आहे

या दिवशी पूजा करण्याची ही एक विशिष्ट पद्धत आहे आजच्या पिढीला याची उपयुक्तता सांगणे गरजेचे आहे. प्रत्येक रूढी परंपरेला शास्त्रीय आधार आहे. या दिवशी अभ्यंग स्नान करून ब्रह्मदेवाची दवणा (थंड असतो म्हणून) वाहून नंतर महाशांती केली जाते. ” नमस्ते बहुरूपाय विष्णवे नमः’/ हा मंत्र म्हणून विष्णूची पूजा करतात. इतिहास, पुराणे यांचे दान देतात. गुढीपाडव्या दिवशी जो वार असेल, त्याच्या देवतेचीही पूजा केली जाते. संवत्सर पूजा केल्याने आयुष्य वृद्धी होते. शांती लाभते. आरोग्य लाभते. समृद्धी येते. अशी समजूत आहे. प्रत्यक्ष गुढी उभी करताना, एका उंच वेळूच्या टोकाला भरजरी खण किंवा साडी, साखरेच्या गाठींची माळ, फुलांचा हार, आंब्याची आणि कडुलिंबाची डहाळी आणि या सर्वांवर तांब्याचा किंवा

चांदीचा कलश अशी सजवून गुढी दाराशी किंवा खिडकीशी उभी केली जाते. याला ब्रह्मध्वज असेही म्हटले जाते. विजयाचे, मांगल्याचे, उत्साहाचे, आणि आनंदाचे प्रतीक म्हणून ही गुढी असते. समोर रांगोळी काढून गुढीची पूजा केली जाते. कडूलिंब आणि आंब्याच्या झाडांच्या पंचांगाचे आयुर्वेद शास्त्रातील महत्त्व ओळखून हा सन्मान त्यांना दिला आहे. (ते देव वृक्ष आहेत). कलशरुपी सूत्राच्या सहाय्याने वातावरणातील सात्विक लहरी घरात प्रवेश करतात. (अँटेनाच्या कार्याप्रमाणे). या दिवशी नववर्षाच्या पंचांगाची पूजा करून वर्षफल श्रवण केले जाते. जेवणात पक्वान्न करून, प्रसाद म्हणून कडुलिंबाच्या चटणीचा प्रसाद ग्रहण केला जातो. कटू संबंध दूर करून साखरेप्रमाणे एकमेकात संबंध वाढवून एकमेकांना सदिच्छा देतात. शेतकरी जमीन नांगरणी सुरुवात करतात. पारंपारिक वेशभूषा करून मिरवणुका काढून आनंद लुटतात.

आपल्या प्रत्येक सणाला शास्त्रीय आधार आहे. तो नवीन पिढीने अभ्यासायला हवा. आज काल आपल्या संस्कृतीचे प्रतिक म्हणून अगदी छोट्या टेबलवर ठेवण्यासारख्या गुढ्या परदेशी लोक घेऊन जायला लागले आहेत.

या शुभदिनानिमित्त येणारे नवीन संवत्सर “परभाव ” संवत्सर, शालिवाहन शके 1948 सर्वांना सुखाचे आनंदाचे आणि आरोग्यदायी जावो ही सदिच्छा.

©  सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

बुधगावकर मळा रस्ता, मिरज.

मो. ९४०३५७०९८७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ मैत्र जिवांचे… – भाग – १ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

☆ जीवनरंग ☆

☆ मैत्र जिवांचे… – भाग – १ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

नेहा मॅडमनी सांगितलेलं काम पूर्ण करून पार्लरमधून बाहेर पडायला सोनलला थोडा उशीरच झाला होता. ठरलेल्या कॉर्नरजवळ सुरेखा तिची वाट पाहत होती. हातातली प्लास्टिक बॅग सोनल पुढे करत सुरेखा म्हणाली,

  ॓ आज शेठाणिच्या सुनेने दोन छान ड्रेसेस दिलेत. तुला आवडेल तो घे यातला.॔

 सुरेखा आणि सोनियाची बालपणापासूनची घट्ट मैत्री चाळीतल्या सगळ्यांच्या कौतुकाचा विषय होता. मैत्रीचा धागा अतूट होता. घेतलेली किंवा मिळालेली प्रत्येक गोष्ट वाटून घेण्याची दोघींची सवय कायम होती.

  ॓ बरं झालं तू इथे बोलावलंस ते! खूप दिवसांनी असं भेटायला, बोलायला मिळालं आपल्याला.॔

  ॓ एक बात कहूॅं क्या?॔ मूळची उत्तर प्रदेशची असल्यामुळे सुरेखाच्या तोंडून सहजपणे हिंदी येत असे.

  ॓हो. सांग ना.॔

॓ तुझा तो बॉयफ्रेंड मनोज अलीकडे दुसऱ्या एका मुलीबरोबर भटकताना दिसतो. ये नादान लडके भॅ॑वरे जैसे होते है.॔

  ॓चूक झाली. अगदी कंटाळले होते मी घरातल्या वातावरणाला! एकदा सुनील मार्गाला लागला की तुझ्या लग्नाचं बघता येईल असं घरातील लोक सतत सांगायचे.॔

  ॓पगली है तू. तुझा बॉयफ्रेंड, तुझे आई-बाबा, भाऊ सगळे तुला ब्लॅकमेल करताहेत. तुझी आई चार ठिकाणी घरकाम करते. पण तुझा पप्पा काय करतो? सुनील तरी कुठे स्टडी करतो? माझ्या बड्या भाईने सुनीलला दोन-तीनदा सांगितलं की मी तुला टॅक्सी चालवायला शिकवतो. रविवारी सकाळी येत जा. कुठे आला? मेहनत करायला नको त्याला. उलट तू सांगितलंस की आईकडून भांडून एक हजार रुपये घेऊन मित्रांबरोबर तिरुपतीच्या ट्रीपला गेला. काय बोलणार?॔

  ॓माझं लग्न होईल तेव्हाच मी या सगळ्यातून सुटेन. पण मी ही अशी काळी. सगळ्यांची माझ्या पैशावर नजर. पण रात्री झोपायला सुरक्षित जागा लागते ना म्हणून सगळं सहन करायचं.॔

  ॓माझ्या मॉ ने तर सगळ्यांना मेहनत करून कमवायला शिकवलं. सोनल, तू बारावी पास आहेस. सावळी पण स्मार्ट आहेस. पार्लरमध्ये नोकरीही करतेस. थोडे- थोडे तरी पैसे बँकेत जमा कर. वहीं तेरे काम आयेंगे.॔

 घर जवळ आल्यावर सुरेखा म्हणाली ॓आता मी या रस्त्याने जाते. इकडे नवीन बांधलेल्या टॉवरमध्ये एका घरी रात्रीचं बर्तन साफ करायचं काम करते हल्ली. मेरी पैसेवाली बात ध्यान मे रख. बाय.॔

 सुरेखाला बाय करायला सोनलनेही हात उंचावला. सुरेखाच लक्ष नकळत सोनलच्या उंचावलेल्या हाताकडे गेलं. त्या हातावरची भाजल्याची खूण अजूनही आपलं अस्तित्व दाखवत होती. क्षणभर त्याच्याकडे पाहून सुरेखाने चटकन पुढे होऊन सोनलला गळामिठी मारली. जिव्हाळ्याच्या मैत्रीचा आश्वासक ओलावा त्यात होता. दोघींच्या मनात तो प्रसंग जागा झाला होता. शाळेत असताना एका दिवाळीत सुरेखा नवीन ड्रेस घालून पणतीवर फुलबाजी लावत होती. फुलबाजीची ठिणगी ओढणीवर पडून तिने पेट घेतलेला सुरेखाच्या लक्षात आलं नव्हतं. त्याचवेळी आपला नवीन ड्रेस सुरेखाला दाखवायला आलेल्या सोनलने कसलाही विचार न करता हाताने ती पेटती ओढणी खेचून दूर केली म्हणून सुरेखा जीवानिशी वाचली होती. घाबरलेल्या दोघीजणी नंतर एकमेकींना मिठी मारून रडत राहिल्या. त्यांना शांत करायला, सोनलच्या भाजलेल्या हातावर औषध लावायला सुरेखाची मॉ॑ आणि शेजारी धावून आले होते.

 घराच्या दिशेने जाताना सोनलच्या मनात आलं,॓ गेल्या काही वर्षात किती भराभर बदल होत गेला. स्वप्नातल्यासारखे टॉवर्स उभे राहिले. मनोजच्या बाईकवरून भन्नाट वेगाने जाताना आपणही असाच संसाराच्या स्वप्नांचा टॉवर उभारला होता. मनोजनं बाईक दुसरीकडे वळविल्यावर तोसुद्धा कोसळला. आता काय म्हणे तर लोअर परळला अप्पर वरळी म्हणायचं. ज्यांच्या जीवावर हे टॉवर्स उभे राहिले त्यांच्या नशिबी फक्त माना उंचावून या टॉवर्सचं ॓ दूरदर्शन घेणं आलं.॔ विचारांच्या भोवऱ्यात गरगरत चाळीचा जिना चढून सोनल वर गेली. खोलीच्या दाराशी सँडल्स काढताना तिला आतलं बोलणं ऐकू आलं. रडवेल्या आवाजात आई म्हणत होती, ऀकिती वर्षं काम करतेय मी त्यांच्याकडे. त्यांचा सगळ्यांचा पूर्ण विश्वास आहे हो माझ्यावर. आता हे किल्लीचं असलं काम करायचं म्हणजे…

 ॓ काय झालं पपा?  ॔

॓काही नाही ग. माळ्यावरच्या एका जुन्या ट्रंकेची चावी शोधायला सांगितलय मी तुझ्या आईला.॔

 स्वतःचा विचारात गुंतलेल्या सोनालीचे आईच्या भेदरलेल्या चेहऱ्याकडे लक्ष गेले नाही.

 ताई आणि सुमन यांचं लग्न झालं तेव्हा घरातील परिस्थिती तशी ठीक होती पण बाबांच्या फॅक्टरीत संप सुरू झाला आणि आयुष्याला एक वेगळीच कलाटणी मिळाली. मी आणि सुरेखाने तेव्हा नुकतिच दहावीची परीक्षा आटोपली होती.

 दहावीचा रिझल्ट लागायच्या आधीच सुरेखाचं तिच्या मनाविरुद्ध लग्न करण्यात आलं. जास्त शिकली तर बिरादरीमध्ये कोण लग्न करेल हिच्याशी! सुरेखाच्या वडिलांच्या जुनाट विचारसरणीमुळे, प्रचंड कर्ज काढून सुरेखाच्या लग्नाचा घाट घातला होता. सुरेखाच्या कोरड्या डोळ्यातली उदासी लपत नव्हती. जिवलग मैत्रीण दूर अलाहाबादच्या पुढे सासरी जाणार म्हणून आपण रडत आहोत असं वाटून सर्वजण आपलीही समजूत घालीत होते. सुरेखाला एवढ्यात लग्न करायचं नव्हतं. तिने कॉलेज बघून येण्याचा हट्ट धरला. कॉलेजच्या आवारात हमसाहमशी रडणारी सुरेखा आपल्या डोळ्यापुढे येत होती. दहावीचा रिझल्ट लागण्यापूर्वीच सुरेखा विवाह बंधनात अडकली. तिच्या स्वप्नांची पूर्ती करण्यासाठी आपण काही मदत करू शकलो नाही याचं दुःख त्यावेळी आपल्या डोळ्यातून वाहत होतं.

– क्रमशः भाग पहिला 

© सौ. पुष्पा चिंतामन जोशी

कोथरूड, पुणे

मो ९९८७१५१८९०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “दुपारी ढाराढूर झोपणाऱ्या बायका…!” ☆ शीला पतकी ☆

शीला पतकी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ “दुपारी ढाराढूर झोपणाऱ्या बायका…!” ☆ शीला पतकी 

निशा तणतणतच ऑफिस मध्ये आली. ” काय झालं बाई आज मूड नाही तुमचा”… “काही नाही ग जावेच आणि माझं जरा वाजलं ती म्हणाली तुम्हाला काय पानावरून उठता आणि ऑफिसला जाता आता बाकी मला करावा लागत”. मी तीला सुनावल ” पण तुम्ही दिवसभर दुपारी ढाराढूर झोपता आम्हाला तिथे विश्रांती मिळत नाही काही ऑफिसमध्ये “.. चिडली थोडा वादही झाला… मी म्हणलं, ” चल सोड आज आपल्याला मुख्य ऑफिसमध्ये जाऊन रिपोर्ट द्यायचा आहे. दुपारी दोन वाजता बोलवले, दीड वाजता आपण जाऊ. आम्ही दोघीही कामाला लागलो… दीड वाजता मुख्य ऑफिस मध्ये जायला निघालो. आम्ही बनवलेले प्रेझेंटेशन त्यांना दाखवलं, त्याबाबत चर्चा केली त्याप्रमाणे थोडे फेरफार करून सगळी सामग्री त्यांच्या ताब्यात दिली आणि ऑफिस बाहेर पडलो.

निशाला मी म्हणलं, ” निशा अग लीला आत्याचं घर जवळच आहे आपण जाऊया का तिथे? ऑफिसमध्ये जाऊन डबा खाण्यापेक्षा तिच्या घरी खाऊ”. ती म्हणाली, ” चालेल आपलं काम लवकर झालं आहे आपण थोडीशी शॉपिंग पण करून घेऊयात इथे “… मी म्हणलं, “ठीक आहे” लीला आत्याला फोन केला… ” आत्या आम्ही येतोच ग अर्ध्या तासात. तुझ्या घरी बसून डबा खाणार आहोत. दुपारी येणार असल्यामुळे तुला काही डिस्टर्बन्स तर नाही ना? … ” ती मला म्हणाली, ” चमे मला कधीपासून डिस्टर्बन्स व्हायला लागला आणि आमच्या पिढीला असल काही होत नाही बरं! , ये मुकाट्याने”… मला हे उत्तर माहीतच होतं तिचं… आम्ही थोडं शॉपिंग केलं आणि लीलाआत्याच्या घरी गेलो. तिने गार पाण्याने आमचं स्वागत केलं.. म्हणाली ” हात पाय धुऊन घ्या आणि पहिल्यांदा जेवायला बसा”. मी म्हणाले “. छे ग डबे आहेत ना आमचे” त्यावर तिने माझा कान पकडला. म्हणाली, “चमे आत्याच्या घरी डबा घेऊन येती होय? .. ” 

मग हातपाय धुवून आम्ही जेवणाच्या टेबलवर गेलो आत्याचं स्वयंपाक घर आवरलेलं.. टेबलावर दोन ताट वाट्या चमचे, पाण्याने भरलेले ग्लास… कुकर नुकताच पडला होता त्याचा खमंग वास… तिने वाढायला घेतलं… डाव्या हाताला मीठ चटणी कोशिंबीर… या बाजूला बटाट्याच्या काचऱ्याची भाजी.. वाटीत दोन गुलाबजाम, कडेला मठ्ठ्याचा ग्लास… आणि कुकर उघडून तिने कमालीची खमंग सुंदर वासाची खिचडी पानात वाढली. त्याच्यावर खोबरं कोथिंबीर पेरलं आणि भरपूर लोणकढं तूप घातलं, दोन पोह्याचे पापड आमच्या पानात ठेवले म्हणाली, ” चमे (हे तिचे लाडके नाव) पोटभर जेव. ” निशाकडे बघून म्हणाली “तू पण पोटभर जेव बाई” …

आणि मग जेवताना बऱ्याच गप्पा झाल्या. तिची ती चविष्ट खिचडी, पेरलेले कोथिंबीर खोबरं आणि लोणकढं तुपाचा खमंग वास.. मेंदूने सूचना दिली ‘चला चालू व्हा’ आणि आम्ही भराभर जेवायला सुरुवात केली शेवटी ग्लासभर मधुर ताक आणि स्वीट डिश म्हणून गुलाबजाम खाल्ले. तृप्तीची ढेकर दिली म्हणाले,

“लीला आत्या सुखी भव”.. नंतर हातावर सुपारी घेत आम्ही सगळे हॉलमध्ये आलो. मी तिला म्हणलं,

“आत्या सॉरी आमच्यामुळे तुझी दुपारची झोप… ” त्यावर ती पटकन म्हणाली, ” तुम्हाला नोकरी करणाऱ्यांना असंच वाटतं की आम्ही दुपारी ढाराढूर झोपतो “.. निशाने पटकन चमकून बघितलं “अग बाई हिला कसं कळलं “… असच वाटलं.

“सगळ्यांचा हा गैरसमज आहे ही घरी बसणाऱ्या बायका फार निवांत असतात. टीव्ही पाहतात. मासिक वाचत बसतात. सगळे घरातले कामाला आणि शाळेला निघून गेले की या निवांत… नोकरी करणाऱ्यांचा गैरसमज आहे. अगं घरात बसणाऱ्या महिलाना 24 तास काम आहे. तुम्हाला एकच बॉस आहे… आम्हाला… विचारूच नकोस.. पहाटे पाचला उठते मी. माझी सून नोकरी करते ना.. तिची दोन मुलं त्यांना नऊला शाळेत सोडावं लागतं. त्यांचा नाष्टा आणि टिफिन, सुनबाईचा नाष्टा टिफिन, समीर आणि हे एकाच दिशेने ऑफिसला जातात त्यामुळे समीर त्यांना सोडून जातो.. त्यांचा डबा… मग काय मी आणि आबा आम्ही दोघेच. आबाना छोटी गरम पोळी लागते. तिच्यावर तूप घालून त्यांना कुस्करून करून मी खाऊ घालते… हल्ली जेवणाला नको म्हणतात मग रोज काहीतरी वेगळे वेगळे करून त्यांना द्यावं लागतं. म्हातारं माणूस आहे काळजी घेणार कोण ग माझ्याशिवाय? अक्का गेल्यापासून फार एकटे पडलेत. तरी मला जमेल तेवढं करते मी. म्हणतात… ‘लेकीसारखं करतेस बाई’…

सकाळी या सगळ्यांचे करेस्तोवर अकरा वाजतात. मध्ये आबांचा नाश्ता असतो पथ्याचा… त्यांना दोनदा चहा लागतो. मग दुपारनंतर घर आवरणं, कामवाल्या धुणेवाली, भांडेवाली, झाडू पोचावाली.. अंगण झाडणं एक मोठं काम झाले “… मग तिने आम्हाला खिडकीतूनच तिची छोटी बाग दाखवली… मी चाटच झाले… ” अग आत्या किती भाज्या लावल्यास? ” ती म्हणाली, ” कोथिंबीर मिरची काही पालेभाज्या काही वेल त्यामुळे आडीनडीला घरच्या भाज्या मिळतात. तर फार मेहनत नाही. घरातलं पालेभाज्यांचं खत घालते. पाच साडेपाच ला अर्धा तास बागेत वेळ घालवते. मनही प्रसन्न होतं आणि नातवंडही माझ्याबरोबर काम करतात.. मज्जा येते… हल्ली संध्याकाळचा स्वयंपाक असतो कुठे चमे? … संध्याकाळी सगळ्यांना वेगळं काहीतरी हवं असतं… मग दुपारपासून त्याची तयारी करून ठेवते… कधी बटाटेवडे, कधी कटवडा, कधी पावभाजी.. सगळ्याची तयारी करून ठेवते मग. मात्र सुनबाई… ती ऑफिस मधून दमून आलेली असते, हाताशी सगळे तयारी असली की ती पटकन करते अर्थात मी करते तिला मदत… शिवाय दुपारी काय नको काय हव काय संपले का त्या डब्यातला उरले का सगळं मला बघावं लागतं. फ्रिज स्वच्छ करून घेते. हव नको ते काढून ठेवते. सगळ्यांच्या चादरी उशीचे अभ्रे क्रमाने मशीनला लावते. त्या बाईकडून ते सगळे नीट वाळत घालून घेते… पाच वाजता वाळलेले कपडे घरात आणावे लागतात… घरच्या बाईला खूप काम असतात.. आबांना दुपारी पुन्हा चार वाजता चहा लागतो त्याबरोबर ते दोन बिस्कीट खातात त्यांचा हात थरथरत असल्यामुळे चहा हाताने पाजावा लागतो त्यांना. व्यायाम देणारा माणूस पाच वाजता येतो त्याच्याकडे लक्ष ठेवावं लागतं. सगळ्यातून एक पंधरा मिनिटे वीस मिनिटं मिळाली तर झोप मिळते…

तुम्हाला नोकरी करणाऱ्या मुलींना वाटतं घरी बसणारी बाई डाराडूर झोपते… चुकीचा समज आहे…! तुम्ही तुमच्या ऑफिस मध्ये एखादी डुलकी घेत असाल पण आम्हाला ती मुभा नाही. घरी बसणारी बाई म्हणजे बिन पगारी, पूर्ण वेळचा, मायाळू, कर्तव्यदक्ष नोकर “… यावर आम्ही खूप हसलो.. “. खरंच लिला आत्या किती करता हो घरासाठी”… निशा म्हणाली. आत्या म्हणाली… ” हे बघ बेटा घर सगळ्यांच असत. घरात एकट्याला सुख घेण्याचा अधिकार नसतो.. सगळे राबतात ना.. मी घर सांभाळते… ही विभागणी आहे. प्रत्येकाचे योगदान तेवढेच असतं आणि हे समजून घेतलं ना तर आपण घराला मंदिर बनवू शकतो नाहीतर मग काय वादविवादाचा कोंबड्याचा खुराडा व्हायला वेळ लागत नाही “.

मी निशाकडे पाहिलं. ती समजायचं ते समजली. तासा दीड तासाने आम्ही लिला आत्याच्या घरातून बाहेर पडलो. निशा काहीच बोलत नव्हती. कॅब केली आणि आम्ही ऑफिसकडे निघालो. तिने माझा हात हातात घेतला आणि म्हणाली, ” आपल्यापेक्षा तुझ्या आत्याचं आत्ताचं प्रेझेंटेशन छान झालं बाई! जाताना मी माझ्या जावेला एक गिफ्ट घेऊन जाणार आहे आणि चक्क गळ्यात हात घालून तिला म्हणणारआहे “माझं चुकलं, मी तुला उगीचच म्हणाले.. तुम्हाला काय डाराडून झोपता येत दुपारी…” काही म्हण तुझ्या आत्या ग्रेट आहेत एवढं खर”… “मग आत्या कोणाची आहे आणि कळलं ना तुला” निशा आता दुपारी घरी बसून डाराडूर झोपणाऱ्या बायका काय काय करतात ते कळल ना? “

“ हो ग हो “ म्हणून निशानी माझा हात हातात घेतला आणि आपली चूक कबूल केली…!

घर सांभाळून नोकरी करणाऱ्या आणि नोकरी न करता घर सांभाळणाऱ्या समस्त महिलांना मुजरा आणि हा लेख समर्पित आहे.

बायकांनो तुमच्यामुळे कुटुंब संस्था टिकली आहे आणि ती मजबूत आणि सुसंस्कृत झाली आहे..

… फक्त घरातल्या दोन महिलानी एकमेकांना समजून घेणे गरजेचे आहे.

… असो

© सुश्री शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका, सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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