हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९८ – “प्राण पखेरू उड़े अचानक…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “प्राण पखेरू उड़े अचानक...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “प्राण पखेरू उड़े अचानक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

सारे बेटे रहे पालते

” पापा ” को स्नेह से

मरे एक दिन किन्तु पिताजी

हत्यारी मधुमेह से

 

कोई दवा काम ना

आयी तरह तरह बदली

जब भी जिस ने जो

बतलायी वह गोली निगली

 

सोया करते पूज्य पिता

तब बाहर की दालान में

जिस में भीग भीग जाते

थे चौमासे के मेह से

 

जब भी कोई व्यक्ति

माँगने दरवाजे आता

उसे मना की नहीं कभी

वह खुश होकर जाता

 

कीर्तिमान यह रहा पिता

का कुछ न कुछ देते

कहा किये थे याचक ना

खाली जाये इस गेह से

 

बहुत तसल्ली थी उनको

जायेंगे माघ मेला

तभी राम ने उन से था

खेला ऐसा खेला

 

प्राण पखेरू उड़े अचानक

रोक नहीं पाये

लगा कि सारा नेह चुक गया

उनका था इस देह से

 

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

08-092024

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ दो गज घूँघट… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ दो गज घूँघट… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

☆

सती,कन्याभ्रूण हत्या,ऑनर किलिंग

भयावह वैधव्य

बाल विवाह

जाने कितनी अमानुषिक प्रथाएं

स्त्री के अशक्त अस्तित्व को

चीख चीखकर

कहती रहीं

 

तुम हजारों वर्षों से

आक्रान्ताओं से

 उनकी

रक्षा न कर सके

तो असूर्यपश्या बनाकर दम लिया

 

नयी सदी के उजाले में

तुममें से कुछ ने

उन्हें पढ़ाया लिखाया

वे सजग हुईं अपने अस्तित्व को लेकर

वे क्रमशः अंश अंश

आत्मनिर्भर बनीं

फिर तकनीकी  क्रान्ति की सुनामी ने

सब कुछ उलट पलट कर रख दिया

 

अब तुम उसमें नजाकत

फेमिनिटी ढूँढते हो

सत्तर के दशक की

लजीली सजीली

सपनीली नायिकाओं को देखकर

आहें भरते हो

अपना बोया हुआ काटोगे नहीं ?

 

अब वह तुम्हारे कंधे से कंधा

मिलाना चाहती है

तुम्हें मंजूर नहीं

कसमसा रहे हो

स्त्री में पुरुषत्व को लेकर

काश तुम वक्त के साथ

स्त्री को सिर्फ स्त्री

रहने देते

उसको वस्तु न समझते

 

आज तुम प्रतिशोध की मुद्रा में हो !

समाज की चूलें हिल रही हैं

यह परिवर्तन है

क्या इसी परिवर्तन के आकांक्षी थे तुम?

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८० ☆ # “चिंगारी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चिंगारी…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८० ☆

☆ # “चिंगारी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

चेहरे को चमकाने यह खेल सारा है

ना कभी वह तेरा था

ना कभी वह मेरा है

 

माया जाल में उसके

 हर कोई फँसा है

उसने ऐसा प्रपंच रचा है

उलझ गए हैं धागों में सब

छोटा बड़ा कोई नहीं बचा है

वह बेच रहा है रंगीन सपने

सोची समझी साजिश से अपने

खाकर यह मादक अफीम

सब लगे हैं माला जपने

 

चारों तरफ फैला है अंधेरा

सूरज भी अब नहीं है तेरा

दीपों पर भी है पाबंदी

कैसे रोशन होगा घर तेरा

चल उठ अपनी  मुट्ठियाँ भींच  

पत्थर पर पत्थर को घिस

जो निकली है यह चिंगारी

इस रोशनी से आंखों को मीच

 

अब तू सपनों से जाग

मृगतृष्णा के पीछे मत भाग

तेरा मुकद्दर यही बनेगी

जब चिंगारी बनेगी आग

तू चिंगारी को बचा के रखना

रोशनी का यह शस्त्र है अपना

पराजित होगा डरपोक अंधेरा

बस चिंगारी को मशाल है बनना /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२४ – राम कथा है अमृत वाणी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘राम कथा है अमृत वाणी…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२४ ☆

☆ राम कथा है अमृत वाणी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

राम का नाम, सुमरि ले प्राणी,

राम कथा है अमृत वाणी।

*

जन्म अयोध्या राजमहल में,

सारी विद्या, सीखी पल में,

गाथा कहता, सरयू का पानी,

राम कथा है, अमृत वाणी।

*

वन में जाकर, ताड़का मारी,

गौतम नारी, अहिल्या तारी,

ऋषि मुनियों से बात ये जानी,

राम कथा है, अमृत वाणी।

*

जनकपुरी में धनुष को तोड़ा,

जनक सुता से नाता जोड़ा,

सिया राम मय, सब जग जानी,

राम कथा है अमृत वाणी।

*

वचन पिता के, वन को धाये,

संग संग सिया, लखन भी आए,

अपनी अपनी लिए कहानी,

राम कथा है अमृत वाणी।

*

जंगल जंगल डोल रहे थे,

कई बातों को खोल रहे थे,

शूर्पणखा की जिद न मानी,

राम कथा है अमृत वाणी।

*

सीता को रावण हर लीना,

दुखद, है मानव जीवन जीना,

सिय, वियोग की, करुण कहानी,

राम कथा है अमृत वाणी।

*

शोषित वंचित सबको जोड़ा,

ऊंच नीच के भ्रम को तोड़ा,

सागर पार करेंगे ठानी,

राम कथा है अमृत वाणी। 

*

लंका जाकर युद्ध किया,

रावण को भी मार दिया,

लिख दी जीत की नई कहानी,

राम कथा है अमृत वाणी,

*

सीता को संग लेकर आए,

ऋषि मुनि सब हर्षित गाए,

हुई अवध में भोर सुहानी,

राम कथा है अमृत वाणी.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मानवी जीवन… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ मानवी जीवन… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

☆

दिव्य सारासार

प्रमाण विचार

कर्तव्य कठोर

मनाचा निर्धार

शब्द सर्वेश्वर

धैर्य निर्विकार

गाठण्या तत्पर

यशाचे शिखर

* 

नित्य नवा भाव

लाघवी स्वभाव

वर्तनात साव

क्रोधाचा अभाव

अंतरीचा ठाव

निर्मितीला वाव

चिंतनाची हाव

प्रपंचाची नाव

* 

सुखंसमाधान

ईश्वरी चरण

नको निरुपण

अन्यही कारण

ध्येयाचे इंधन

जपे स्वाभिमान

निर्मळ पावन

मानवी जीवन

☆

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जय गणेशा…! 🌷 ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – जय गणेशा…! 🌷

☆ ॥ कविता॥ जय गणेशा…! 🌷☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

जय गणेशा हे! गणेशा,

पूर्ण  करो हमरी इच्छा।

*

मोदक को भोग लगाएँ,

हर दम तुमरो गुण गाएँ,

पूर्ण  करो हमरी इच्छा।

*

विघ्नों  के  हर्ता हो तुम,

सुखदाता  कर्त्ता हो तुम,

पूर्ण  करो हमरी इच्छा।

*

मुक्त -बँधन पाश करो,

दुर्जनों का विनाश करो,

पूर्ण  करो हमरी इच्छा।

*

वत्स आप शिव-शक्ति,

भर्ता आप रिद्धि- सिद्धि,

पूर्ण  करो हमरी इच्छा।

*

शरणागत की रक्षा करें,

हम पर  सदा कृपा करें,

पूर्ण  करो हमरी इच्छा।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ राख के नीचे… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “राख के नीचे…”।

? राख के नीचे… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

राख की तमाम परतों के 

नीचे तक जाकर देखा 

वो गुरूर, वो रुतबा, वो रुआब 

कहीं भी नज़र नहीं आया

* 

जो कल तक आसमानों में 

अपना नाम लिखते थे 

उन्हीं चेहरों को धूलों में 

बेकस और बेनिशाँ पाया

* 

महलों की ऊँची दीवारों पर 

जो गुरूर की नुमाइश थी 

वक़्त की एक ही आँधी में 

सब  ख़ाक  में  मिल  गई

तख़्तों के लिए लड़ने वाले 

ख़ुद से ही शिकस्त खा गए 

जो दुनिया जीतने निकला था 

वो एक दिल भी जीत न पाया

 *

सोने-चाँदी के बर्तनों में 

सजे हुए थे जो रिश्ते 

सूखी रोटी ने भी अक्सर 

उनसे ज़्यादा स्वाद पाया

 *

चेहरों पर नक़ाब डाले 

जो उम्र भर चलते रहे 

आईना जब सच बोल पड़ा 

तो वो दर्द से कराह उठे

 *

जनाज़ों के उस मेले में 

सब एक बराबर थे 

न कोई बादशाह ठहरा 

न ही कोई फ़क़ीर पराया

 *

बस नेकी की कुछ ख़ुशबू 

कुछ देर फ़िज़ाओं में ठहरी 

बाक़ी हर शोहरत को 

ख़ाक ने चुपचाप दबाया

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९३ – दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९३ ☆

☆ दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

घाट लहर से कह रहा, दो पल की मेहमान।

लहर कहे- युग युग जिए, तू होकर बेजान।।

.

दिल दिलवर के नाम कर, कहता है दिलदार।

दिल सुकून पाए बजा, जरा दिलरुबा यार।।

.

नादां कली अनार की, हो गुलाब पर मुग्ध।

सावन की बरसात मेँ, हाय हो गई दग्ध।।

.

पैंजन घुँघरू से कहे, मत कर तू झंकार।

गाँव न जागे पाँव से, पाँव मिले ले प्यार।।

.

पगडंडी पग चूमकर, करती दूर थकान।

राज मार्ग पर बढ़ थके, पैर हुए बेजान।।

.

गमले में पौधा हरा, झुलसा तरु सह घाम।

यह बारिश में गल गया, वह पनपा बेदाम।।

.

मुझसे मुझको ले दिया, मुझको मुझको मौन।

जिसने उससे बढ़ कहो, कारीगर है कौन?

.

खुदको खुद मुझको दिया, खुद होकर चुप दूर।

दूर उसे जो मान लें, आँखें रहते सूर।।

.

तूतूमैंमैं  कर थके, तू-तू मैं-मैं रोज।

तू मैं मैं तू हम हुए, है चहरे पर ओज।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

६.९.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संस्कार… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संस्कार… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

अपना बनकर

अपनेपन पर आघात,

बार-बार

हर बार विश्वासघात,

घाव करने का उनका

स्वभाव नहीं छूटता,

पर क्या करूँ,

विश्वास करने का मेरा

संस्कार भी नहीं छूटता।

 

?

© संजय भारद्वाज   

अपराह्न 3:57 बजे, 7 जनवरी 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १७ – राधे सरकार !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता राधे सरकार !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १७ ☆

☆ राधे सरकार !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

(राधा अष्टमी/भद्र अष्टमी पर विशेष)

☆

प्रकट हुई श्री राधिका, भाद्र अष्टमी आज ।

बरसाने में बज रहे, कई सुरीले साज ।।

 *

मातु कीर्ति वृषभानु पितु,दौ प्रसन्न छवि देख ।

आई लाली राधिका, धन्य भाग्य के लेख ।।

 *

शक्तिपुंज श्री कृष्ण तो, राधे   हरि की शक्ति ।

कृपा करें जब राधिका, तब होती हरि भक्ति ।।

 *

चरणों की रज धूल का, मुझे बना लो दास ।

रख लो प्यारी राधिका, पद पंकज  के पास ।।

 *

बज्र मंडल की लाड़ली, श्री राधे सरकार ।

राधे- राधे जो जपें, पाए भव से पार ।।

 *

बोलो राधारानी की जय हो।

लाड़ले लाल की जय हो ।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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