हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ कोई नाम न दो…  –  संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक समीक्षा ☆

☆ कोई नाम न दो…  –  संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कृति–कोई नाम न दो

संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर

समीक्षक- इन्दिरा किसलय

प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली

पृष्ठ-200

मूल्य-349/-

☆ प्रेम का मनोविज्ञान -बदलाव की बयार-“कोई नाम न दो” – सुश्री इन्दिरा किसलय

श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित इस कृति में 79  लघुकथाएँ संग्रहित हैं। सम्पादक हैं बहुभाषाविद् डॉ. शैलेश गुप्त वीर। यूँ भी प्रेम को कोई नाम कैसे दिया जा सकता है। वह तो गूंगे का गुड़ है। शब्दों का सहारा लेकर  अंश-अंश ही व्यक्त हो पाता है। प्रस्तुत संग्रह समकाल में प्रेम की विविध स्थितियों, धारणाओं, सामाजिक मान्यताओं और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं का  सूक्ष्म रूपायन करता है।

पुराकाल में निसर्ग के सान्निध्य में परवान चढ़ने वाला लैला-मजनू वाला प्रेम अब इतिहास हो गया या कहें कि छुई मुई संवेदना ने जाग्रत चेतना का दामन थाम लिया है।

स्वतंत्रता, शिक्षा से उत्पन्न जागृति, आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानून की स्त्री सापेक्ष स्थिति और टेक्नोलॉजी के बढ़ते चरण मनोभावों को विशाल स्तर पर प्रभावित कर रहे हैं। उपभोक्तावाद और सोच का खुला आकाश, स्त्री-पुरुष समान अधिकारों के तल पर सामाजिक संरचना को आंदोलित कर रहा है।

लघुकथाओं के लघुतम कलेवर में प्रेम के बहुआयामी पार्श्व उभरे हैं जो समाज वैज्ञानिकों के लिए चेतावनी भी है और गहन चिंतन का विषय भी। जिज्ञासा सिंह ने ड्रिंक के केवल एक सिप में वर्जनाओं को तोड़ने की झिझक और सामाजिक मान्यताओं के बदलते स्वरूप का दर्शन करवाया है। सारी कहानियाँ सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से अनुपम हैं। कृति में कहीं प्लेटोनिक लव है, कहीं समझदार, कहीं दैहिक आकर्षण, कहीं व्यवहार और कहीं अस्तित्व के प्रति प्रचंड जागरूकता, ऐसे कितने ही रूप रिश्तों में बदलाव की सूचना दे रहे हैं। क्रांति अचानक आकार नहीं लेती शनैः शनैः असंतोष का बारूद इकट्ठा होता है। सामाजिक क्रांति में वर्षों से संचित ताप सतह पर नजर आता है। शुद्ध शब्दों में इन कथाओं को प्रेम का मनोविज्ञान समझाती, स्वप्निल अनुभूति का रूहानी विस्तार करती हुई कथाएँ कह सकते हैं।

मनोज कुमार झा ने “लिव-इन रिलेशनशिप “का एक अलग ही रूप सामने रखा है। रंजना जायसवाल ने विवाह की परंपरागत प्रथा को एक तीखे सवाल से शीशा दिखाया है—-” पिता कहते हैं अनजान व्यक्ति से बात नहीं करनी चाहिए पर शादी कर लेनी चाहिए —–?

राजेंद्र वर्मा की”” घर “”में भी प्रेम विवाह और तलाक को समान अधिकार की पृष्ठभूमि में उकेरा गया है। शिवानी की आईना भी क्रांतिकारी कथा है। अंजू खरबंदा की दृष्टि में” प्रेम पगे रिश्ते “जीवन के स्वीकार की दास्तां है। वार्धक्य को भी प्रेम और  सलीके से जिया जा सकता है। कमल कपूर की “बूढ़े प्रेमपाखी “कहानी यही कहती है। डॉ शैलेश गुप्त वीर की “सच्चा प्यार “प्रणयी जोड़ों के लिए नेत्रोन्मीलक है। डाॅ मिथिलेश दीक्षित की निर्णयकथा प्रभावित करती है। इन्दिरा किसलय कृत “चाहे जो हो ” कहानी एक नौकरीशुदा स्त्री का असफल जीवन और भटकाव की दास्तां कहती है।

कथितव्य है कि इस संग्रह में प्रख्यात लघुकथाकार –सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, संतोष सुपेकर, अंजु दुआ जेमिनी, रघुविन्द्र यादव, विनोद सागर, उमेश महादोषी, योगराज प्रभाकर, सारिका भूषण आदि ने भी अपनी महनीय उपस्थिति दर्ज की है। शिल्प की दृष्टि से देखें तो कथाएं पर्याप्त न्याय कर रही हैं। कथ्य के वैशिष्ट्य के साथ संदर्भगत संवेदना, भाषा की स्पष्ट सामयिक अभिव्यक्ति पर जोर देने की बात संपादक” वीर जी “ने की है।

विगत दो दशक से लघुकथा ने पाठकों के हृदय में भरपूर स्थान पाया है। सुकेश साहनी की “फेस टाइम” ने एक ज्वलंत मुद्दे पर प्रकाश डाला है। सोशल मीडिया के रिश्तों पर पड़नेवाले प्रभाव को दर्शाया है।

नारी अस्मिता, तकनीकी विस्फोट, परंपरा और इक्कीसवीं सदी के बदलते परिदृश्य को चित्रांकित करती है हर लघुकथा। कथाओं की मारक क्षमता अद्वितीय है। कथा चयन हेतु संपादक वीर जी बधाई के पात्र हैं। निर्दोष मुद्रण, विषयानुरूप मुखपृष्ठ के साथ समस्त कथाएं लघुकथा के इतिहास में संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ मौजूद हैं। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆  श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री राज सागरी

(जन्म दिवस 1अप्रैल पर मंगल भाव सहित)

आज जब मैं बुंदेली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे सबसे पहले तो इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रोफेसर श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि की ये प्रतिक्रिया काफी प्रभावित कर रही है कि श्री राज सागरी ने खड़ी बोली, बुंदेली और उर्दू में साधिकार रचनाएं लिखी हैं। अपने चालीस वर्ष के साहित्यिक जीवन में पूरे प्रदेश और देश में हजारों पाठकों के मन में किसी न किसी रूप में अपनी रचनाओं को प्रतिष्ठित किया है और मंचों से काव्य पाठ करके हजारों हजार श्रोताओं को मंत्र मुग्ध किया है। बार बार श्रोता उनकी रचनाओं को सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। साहित्य के त्रिवेणी संगम -प्रयाग राज सागरी के शीर्षक से श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि लिखते हैं कि वर्तमान में चुटकुले बाज तथाकथित कवियों के बीच राज सागरी जब काव्य पाठ करते हैं तो केवल वही मंच लूटते नज़र आते हैं। उनकी कविताएं न केवल मनोरंजन करती हैं बल्कि प्रेरणा भी देती हैं, ऊर्जा प्रदान करती हैं,नयी दिशा देती हैं। ऋषि के उपरोक्त नजरिए से ये बात तो स्पष्ट होती है की राज सागरी जी ने बुंदेली भाषा में काव्य सृजन करते हुए संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। उन्होंने दोहों और ग़ज़लों के माध्यम से बुंदेली को साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने में जो योगदान दिया है,वह अन्य साहित्यकारों के लिए प्रोत्साहन का विषय हो सकता है। राज सागरी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार में उनकी जो भी रचनाएं शामिल हैं वे समाज के विभिन्न पाठकों की रुचियों को ध्यान में रखकर सृजित की गई है। पाठकों को ये रचनाएं इसलिए भी पठनीय प्रतीत होती है क्योंकि बुंदेली भाषा में उन्हें ये रचनाएं अपने आसपास की घटनाओं और प्रसंगों पर आधारित महसूस होती हैं और फिर कवि ने भी अपने आसपास जो भी सामाजिक समस्याओं और स्थितियों को देखा परखा उसे पूरी ईमानदारी के साथ कलम के माध्यम से कागज़ पर उतार दिया।

राज सागरी जी की ग़ज़लों और दोहों की एक विशेषता और है कि उन्होंने आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए बड़ी बेबाकी से लिखा है और पाठकों ने इसे बेहद पसंद भी किया है। कवि ने अपने काव्य सृजन को अपना श्रेष्ठ धर्म और कर्म माना है और यही संदेश उनकी रचना में भी दिखता है –

0

गीत ग़ज़ल तुम गातई चलयो

जाग में नाम कमातई चलयो

0

कवि ने विद्वता के लिए आंखों की भाषा की समझ और सोच को भी अपनी रचना में प्रमुखता दी है और एक जगह लिखा भी है –

0

मोरी बातई छोड़ दो, मैं तौ हूं नादान

आंखें तुम जो बांच लो, तौ समजूं विद्वान

0

राज सागरी जी राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रदायिक सौहार्द को आवश्यक मानते हैं और यही बात उनकी कविता में भी झलकती है। भारत माता कविता में उन्होंने लिखा भी है कि –

0

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई

हम चारों हैं भाई

हिन्दुस्तानी प्यार सिखाते

लड़ते नहीं लड़ाई

0

राज सागरी जी का वैचारिक दृष्टिकोण उनकी बुंदेली कविता में भी परिलक्षित होता है। उनका सोचना है कि ग़लत काम करने वाले लोग निडरता से अपना काम करते हैं-

0

खा जैहें का जोन डरें हम

काय खों उनके पांव परें हम

प्यार सें बे हैरत लौ नयींया

उनपे बोलो काय मरें हम

ऐसीं बुद्धि दे अब ईसुर

कोई गलत नें काम करें हम

0

वैसे तो श्री राज सागरी जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में काफी लिखा है लेकिन उन्हें बुंदेली भाषा में सृजन के लिए अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता अर्जित हुई है। खड़ी बोली में उनका काव्य संग्रह पल भर की पारो और तारे जमीन के भी चर्चित रहा। बाल साहित्य के अंतर्गत स्कूल चलें हम, उर्दू में कदम कदम और बुंदेली में ग़ज़ल संग्रह चलो अब घर खों चलिए और जाम- ए-गजल का प्रकाशन हो चुका है जो कि पाठकों के बीच अत्यंत पठनीय सिद्ध हुए हैं।

अमन प्रकाशन सागर से प्रकाशित नदिया के ओ पार में श्री राज सागरी जी की काव्य रचनाओं को पाठकों से वैसा ही प्यार मिलेगा जैसा कि पूर्व में प्रकाशित काव्य कृतियों को मिला है और सागरी जी ने भी इसीलिए कृति के प्रारंभ में ही पाठकों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की है –

0

सारे जहां में आपने चमका दिया मुझे

मैं मुख्त़सर था आपने फैला दिया मुझे

0

मंगल भाव सहित

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४ – पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: एक आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार जैन राजनजी द्वारा संपादित पुस्तक – “वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलनकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४

☆ पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: क आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन राजन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक का नाम: वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन

लेखक/संपादक: राजकुमार जैन राजन

विधा: बाल साहित्य समीक्षा

प्रकाशक: ज्ञान मुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ बाल साहित्य की परख और पहचान का नया दस्तावेज़ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

आज के डिजिटल युग में जब बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल और इंटरनेट के बीच बीतने लगा है, तब अच्छी और संस्कारप्रद पुस्तकों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। किंतु समस्या यह है कि बाजार में उपलब्ध असंख्य पुस्तकों के बीच से बालकों के लिए उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण साहित्य का चयन कैसे किया जाए। इसी प्रश्न का सार्थक समाधान प्रस्तुत करती है राजकुमार जैन ‘राजन’ की महत्वपूर्ण कृति वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन। यह पुस्तक न केवल बालसाहित्य की श्रेष्ठ कृतियों का परिचय कराती है, बल्कि पाठकों, अभिभावकों और शिक्षकों को सही पुस्तक चयन की दिशा भी दिखाती है।

श्री राजकुमार जैन राजन

बचपन मानव जीवन का वह स्वर्णिम काल है, जिसमें अर्जित संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं। किंतु वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन, माता-पिता की व्यस्तता और तकनीकी उपकरणों का बढ़ता प्रभाव बच्चों के प्राकृतिक बचपन को प्रभावित कर रहा है। माँ की लोरियाँ, नानी-दादी की कहानियाँ और दादाजी की पहेलियाँ अब लुप्त होती हुई धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही हैं। ऐसे समय में बालसाहित्य बच्चों के संस्कार, ज्ञान, मनोरंजन और कल्पनाशीलता के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर सामने आता है।

पुस्तकें सार्वकालिक हैं। वास्तव में वे प्रकाश-स्तंभ हैं, जिनकी रोशनी में बच्चे जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते हैं और अपने व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इंटरनेट भले ही सूचनाओं का विशाल भंडार हो, किंतु पुस्तक से प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी और गहन होता है। इसलिए बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है। पुस्तकें ही बच्चों में तर्कशीलता, चिंतन मनन और कल्पनाशीलता में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस महत्व को देखते हुए यहां पर बालसाहित्य समीक्षा का महत्व बढ़ जाता है। आज बड़ी संख्या में बालसाहित्य लिखा और प्रकाशित हो रहा है, परंतु उसकी समीक्षा अपेक्षाकृत कम देखने को मिल रही है। इस अभाव को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य राजकुमार जैन ‘राजन’ ने किया है। उनकी यह पुस्तक वर्ष 2021 में प्रकाशित लगभग साठ श्रेष्ठ हिंदी बाल पुस्तकों की समीक्षाओं का संकलन है। यह संकलन बालसाहित्य की विविध विधाओं—कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, विज्ञान साहित्य, हाइकु और एकांकी—को समेटते हुए एक समृद्ध गुलदस्ते का रूप ले रहा है।

इस पुस्तक की विशेषता इसकी संतुलित और सकारात्मक समीक्षा दृष्टि है। लेखक ने कृतियों के छिद्रान्वेषण के बजाय उनके गुणों को रेखांकित करते हुए बालोपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया है। उनकी समीक्षा शैली अत्यंत सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित है। प्रत्येक समीक्षा में तीन प्रमुख आधार दिखाई देते हैं।

पहला आधार हैं संबंधित विधा का संक्षिप्त परिचय देना। दूसरा, कृतिकार के साहित्यिक व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए उसकी रचनाधार्मिता को सामने लाना है। तीसरा आधार है, कृति का समग्र मूल्यांकन करना। इसी पद्धति के आधार पर इन्होंने पुस्तक का मूल्यांकन किया है। इस पद्धति के कारण पाठकों को न केवल पुस्तक के विषय-वस्तु की जानकारी मिलती है, बल्कि उस साहित्यिक परंपरा और रचनाकार की दृष्टि को भी समझने का अवसर मिलता है।

पुस्तक में अनेक उल्लेखनीय कृतियों की समीक्षाएँ सम्मिलित हैं। जैसे “बिल्ली पढ़े किताब”, “अटकूँ-मटकूँ”, “मछुवारा का बेटा”, “जंगल का रहस्य”, “अंतरिक्ष में डायनासोर”, “इंद्र धनुष” तथा “विटामिनों से मुलाकात” आदि की समीक्षाएं सम्मिलित है। इन कृतियों के माध्यम से बच्चों के लिए मनोरंजन, ज्ञान, विज्ञान, नैतिक मूल्यों और कल्पनाशीलता का सुंदर समन्वय सामने आया है।

उसकी भूमिका लिखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उषा यादव और डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ ने भी इस कृति को अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी बताया है। उनका मत है कि यह पुस्तक भविष्य में हिंदी बालसाहित्य के इतिहास लेखन में भी सहायक सिद्ध होगी। वास्तव में यह कृति अभिभावकों, शिक्षकों, शोधार्थियों, संपादकों और बालसाहित्य प्रेमियों आदि सभी के लिए उपयोगी होकर उनके लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। ऐसी आशा की जा सकती है।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि राजकुमार जैन ‘राजन’ की यह पुस्तक हिंदी बालसाहित्य की गुणवत्ता और व्यापकता को सिद्ध करती है। यह कृति बताती है कि हिंदी में आज भी उत्कृष्ट बालसाहित्य लिखा जा रहा है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और पाठकों तक पहुँचाने की है। अपने समर्पण, परिश्रम और निष्पक्ष दृष्टि के माध्यम से लेखक ने बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही इस पुस्तक में अलका जैन आराधना की भी पुस्तकों की समीक्षाएं सम्मिलित की गई है। उनका योगदान भी उल्लेखनीय है।

यह पुस्तक न केवल जानकारी प्रदान करती है, बल्कि बालसाहित्य के प्रति नई जागरूकता भी उत्पन्न करती है। निश्चित ही वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन हिंदी बालसाहित्य की परख और पहचान का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ सिद्ध होगी। इसके लिए लेखक को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९९ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९९ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक : सुरेश पटवा

प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल

मूल्य : ₹250

☆ विसंगतियों के विरूद्ध तीखा प्रतिकार है ‘व्यंग्य पच्चीसी’- – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी साहित्य जगत में अपनी बहुआयामी लेखनी से विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ रचनाकार सुरेश पटवा अब व्यंग्य की दुनिया में अपनी नई कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के साथ उपस्थित हैं। मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित यह संग्रह पटवा जी के गहन अनुभवों और समाज की विसंगतियों पर उनके पैनी दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।

 

विविधतापूर्ण लेखन का विस्तार

१९५२ में जन्मे सुरेश चंद्र पटवा एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक हैं, जिनकी स्वीकार्यता उनके भाषाई कौशल और पाठकीय संप्रेषणीयता से स्व-प्रमाणित है। बाल साहित्य, प्रकृति वर्णन, इतिहास, फिल्म जगत और मनोविज्ञान जैसे विविध विषयों पर अधिकारपूर्वक लिखने वाले पटवा जी ‘प्रयोगवादी’ रचनाकार हैं। ‘हिन्दू प्रतिरोध गाथा’ जैसी ऐतिहासिक कृति हो या ‘जंगल की सैर’ जैसी बाल रचना, उन्होंने हर विधा में अपनी शोधपरक दृष्टि का परिचय दिया है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पटवा जी का प्रथम व्यंग्य केंद्रित संग्रह है, जो समकालीन व्यंग्य लेखन की स्थापित सीमाओं को तोड़ता है। इनके आलेख किसी अखबार की शब्द-सीमा में बंधे न होकर विषय का विस्तार से विश्लेषण करते हैं। संग्रह में शामिल ‘अथ श्री मोबाइल कथा’ और ‘स्वर्गीय फेसबुकिया से संवाद’ आज के डिजिटल युग की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करते हैं। बिना पढ़े संदेश फॉरवर्ड करने की अंधी दौड़ और आभासी दुनिया में सक्रियता की होड़ को उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से उकेरा है।

साहित्यिक जगत पर कटाक्ष

संग्रह की रचनाएं जैसे ‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ लेखकों के ही आपसी अंतर्विरोधों और साहित्यिक परिवेश के वर्तमान हाल को उजागर करती हैं। वे बड़ी बेबाकी से लिखते हैं— “साहित्यजीवी भैया, असल में ईनाम वाली किताब और बिकने वाली किताब अलग-अलग होती हैं।” लोकभाषा का पुट और संवाद शैली उनके व्यंग्यों को और भी मारक बनाती है। ‘मैथी में पका नीम चढ़ा करेला’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से वे भाषाई उन्मुक्तता के साथ समाज और व्यवस्था पर चोट करते हैं।

अनुभव की परिपक्वता

अपने बैंक अधिकारी के सेवाकाल के अनुभवों को उन्होंने ‘छिद्दी का बकरी लोन’ जैसे व्यंग्य में पिरोया है, जो भ्रष्टाचार की जड़ों तक ले जाता है। वहीं ‘ओम बजटाय नमः’ और ‘अथ श्री कल्कि पुराण कथा’ जैसे शीर्षक दर्शाते हैं कि उन पर हरिशंकर परसाई जैसी महान व्यंग्य परंपरा का गहरा प्रभाव है, जिसे उन्होंने अपनी मौलिकता के साथ आगे बढ़ाया है।

निष्कर्ष

व्यंग्य केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने के लिए होता है। पटवा जी की यह कृति पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। बदलते समय के साथ जब घटनाएं खुद को दोहराती हैं, तब ये व्यंग्य और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। निश्चित ही, ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के माध्यम से सुरेश पटवा जी समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में एक सक्षम और संभावनाओं से भरपूर व्यंग्यकार के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ेंगे।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ दलित चेतना की मुखर आवाज़ है कविता संग्रह- ‘बंद दरवाजे’ ☆ समीक्षा – श्री दयाल चंद जास्ट ☆

श्री दयाल चंद जास्ट

 

पुस्तक चर्चा ☆ दलित चेतना की मुखर आवाज़ है कविता संग्रह- ‘बंद दरवाजे’ ☆ समीक्षा – श्री दयाल चंद जास्ट

पुस्तक – बंद दरवाजे (कविता-संग्रह)

कवि : जयपाल (94666-10508)

कीमत  150/- पेपर-बैक पृष्ठ-85

प्रकाशकः यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र (90009-68400)

आज हमारा देश आजाद है।सवर्णों के जोर-जुल्म आज भी देखने को मिलते हैं।आज भी हिन्दू-धर्म में वर्ण व्यवस्था के कारण उपजी जाति व्यवस्था का कीचड़ समाज की समानता को विकृत कर रहा है।अभी हाल ही में प्रकाशित श्री जयपाल जी का काव्य संग्रह बंद दरवाजे दलित चिंतन की मुखर आवाज़ है। उन्होनें समाज का सामाजिक ऑपरेशन,आर्थिक परीक्षण,तथा नैतिक मूल्यांकन किया है।अवलोकन के दौरान दलित वर्ग के लिये दरवाजे बंद पाये गये,उनके जीवन को निम्न समझा गया,मनुस्मृति के अग्निकुंड में डाला गया। इस पुस्तक में श्री जयपाल जी अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को जागृत करते हैं तथा समाज में दलितों के प्रति घृणित स्थिति के सब दरवाजे तोड़ते हैं,वे तर्क-वितर्क के साथ जबरदस्त विचार प्रस्तुत करते हैं।वह सवर्णों के जुल्म और अत्याचारों को आज भी पहले की तरह देख रहे हैं।उनकी कवितायेँ जिन संघर्षों से निकलकर आई हैं समाज की सच्ची तस्वीर नजर आती है और वह अपनी बात तर्क-वितर्क के साथ ललकारता है।

श्री जयपाल

आज के दौर में भी दलितों के लिये उनके दिमाग के दरवाजे बंद हैं

मैं क्या कहूँ उस गाँव को

जो सबका है पर उसका नहीं

उन गाँव के कुत्तों को

जो मुझे देखकर ही भौंकते हैं।

जनकवि श्री जयपाल जी की कविताओं में दलित महिलाओं की आवाज़ भी मुखर होकर बोलती है और यह पुस्तक सदियों से चली आ रही महिलाओं के प्रति सडांध युक्त मानसिकता को मिटाना चाहती है।वह ठाकुर के कुएं से बिना झिझक पानी भरना चाहती है। यह पुस्तक ब्रह्म हत्या और दलित हत्या के अन्तर को पाटना चाहती है। सवर्ण-समाज को दलित लडके द्वारा सवर्ण जाति की लड़की से शादी करना अखरता है,दलित व्यक्ति के सरपंच बन जाने से  सवर्णों को दस्त लग जाते हैं । लेकिन अपने लिये उन्हे वोट चाहिए फिर तो वे पाँव तक पकडते हैं ,उन्हे भूख बहुत लगती है,वे झूठे बेर भी खा जाते हैं,चुनाव के समय वे दलितों के घर की गाय का गोबर और मूत तक पी सकते हैं। जूठी पत्तल के माध्यम से दलित महिला के तन-मन पर क्या गुजरती है, जूठी-पत्तल  कविता में बड़ी ही मार्मिक स्थिति का वर्णन है।

कुछ पँक्तियाँ देखिये-

गालियां खाकर,फटकार पाकर

बड़ी मुश्किल से जंग जीतकर

आती थी माँ बच-बचाकर

छिप-छिपाकर कुत्तों बिल्लों से

माँ आती थी घंटों इंतजार करवाकर।

वह मुखर होकर खड़ी हो जाती है और ‘मैं चाहती हूँ’, कविता के माध्यम से स्पस्ट कर देती है-

छोड़ देना चाहती हूँ वे रास्ते

जो सिर्फ मेरे लिये ही बनाये गये हैं

मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं

जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती है।

ये पँक्तियाँ हर महिला के लिये महत्वपूर्ण  हैं।इस कविता संग्रह में जाति के दंश को झेलती हुई बस्तियां , सवर्णों की घिनौनी हरकतों  और अत्याचारों को तो सहती हैं, मौसम की मार भी सहती है।हम उनके लिये कितना भी नाच लें या गा लें लेकिन फिर भी जाति उनके दिलों में उतर गई है– जाति है कि जाति नहीं।इन बस्तियों में रहने वाले लोगों को वे गंदी नाली के कीड़े और न जाने क्या-क्या कहते हैं।मुखिया के नाम शोक-पत्र कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए –

ना रस्सा टूटा,ना खूँटा ही

हम ही टूट गये बँधे-बँधाए

और सवर्णों की पगड़ी सदा कलफदार रही।’यह हमारा समय है’ कविता में कवि ने शूद्रों और सवर्णों दोनों के एक होने की कल्पना की है । वक्त की मार सब पर पड़ती है  

वह तुम्हारा समय था

केवल तुम्हारा

उसमें हम कहीं नहीं थे

थे भी तो तुम्हारी जूती के नीचे

यह हमारा समय है तुम्हारा भी है

यहीं रहना है हमें भी और तुम्हें भी

अपने समय के सवालों का जवाब देते हुए।

सिरफिरे कविता में  फिर से शंबूक का सिर,एकलव्य का अंगूठा नजर आने लगा है। हमारा मारा जाना उनका विकास-क्रम है। प्राकृतिक रूप से शरीर की एक समान संरचना जाति के कारण कुछ लोग पवित्र बने हुए हैं और कुछ अपवित्र। तथाकथित लोगों को घुड़चढ़ी का सवाल,घुड़चढ़ी से खतरा,घोड़ी और घुड़चढ़ी जैसी कविताएँ अप्रत्याशित जंग नजर आती हैं।उन्हें घोड़ी पर चढ़ना देश के शासन पर चढ़ने जैसा लगता है।एक बार फिर कठिनाइयों का वक्त आने लगा है,एक बार फिर कवि अपने काव्य-संग्रह के माध्यम से ये सब भेदभाव बिना लाग-लपेट के उठाता है।दलितों को संविधान से जीवन में  संपूर्ण बदलाव की स्वतंत्रता भी मिली लेकिन कवि मानता है कि कुछ नहीं बदला।कवि जोर देकर कहता है- 

मै एक हजार साल पहले की नहीं

आज के भारत की बात कर रहा हूँ।

हजारों साल से दलित बस्तियाँ  देवी-देवता,धर्म-ग्रंथ,धर्म-स्थल आदि के उत्पीड़न का शिकार रहे हैं।इस उत्पीड़न के बाद भी कवि मानवीयता  के गुण को नहीं छोड़ता।स्वर्ग-नरक की बिडंबना मनु के समर्थन के गीत गाती है लेकिन कवि समाज को सजग करने का काम करता है ,वह सतगुरु रविदास जी के बेगमपुरा और संविधान की प्रस्तावना पर काम करता हुआ नजर आता है।धर्म का आडम्बरपना और जाति का डायनासोर इक्कीसवीं सदी में भी निगलने को तैयार है। इस काव्य- संग्रह की प्रत्येक रचना दिमाग के बंद दरवाजों को धक्के मार-मारकर खोलती है।श्री जयपाल श्री ओम प्रकाश वाल्मीकि व श्री मोहन दास नैमिशराय आदि दलित चिंतन के कवियों के समान स्वतंत्रता,समानता,बन्धुत्व का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

श्री जयपाल जी की कविताओं में सरलता,स्पष्टता और आँदोलन-धर्मिता नजर आती है।उनकी मुहावरे में कविता है और कविता में मुहावरा है।भाषा की दृष्टि से कविताएँ भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण हैं।कहीं-कहीं अलंकार भी स्वतः समा गये हैं।उनकी कवितायेँ साहित्यिक दृष्टि से ऐतिहासिक हैं।कवि महोदय को बंद दरवाजे काव्य संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद !!

समीक्षाश्री दयाल चंद जास्ट

मो – 9466220146

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(26 मार्च जन्म दिवस के अवसर पर विशेष )

आज जब मैं प्रतिष्ठित साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी की चर्चित काव्य कृति अब पछताये होत का को गंभीरता से पढ़ने के बाद उस पर कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे इस कृति की शुरुआत में साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के निदेशक डॉ. विकास दवे की यह बात काफी प्रभावित कर रही है कि इस संग्रह की सबसे अच्छी बात  है रचनाओं के मनुष्य जीवन से सरोकार, उस पर सोने पर सुहागा यह कि वे आत्यांतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजे हैं। ये इस संग्रह की दो सशक्त भुजाएं हैं। डा. विकास दवे जी की ये प्रतिक्रिया कृति की उपयोगिता और पठनीयता को उजागर करती हैं। दवे जी लिखते है कि अभिजात जी लम्बे समय से लेखन के  क्षेत्र में सक्रिय हैं । आपकी रचनाओं के विषय चयन और प्रस्तुतियां पाठकों को लुभाएगें ।कृति की काव्य रचनाओं का अध्ययन और उस पर मनन करने के बाद पाठकों को उपरोक्त प्रतिक्रिया पूर्ण रूप से सही लगेगी ।  अब पछताऐ होत का संग्रह में  कवि की सार्थक सोच के अनुसार राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश की ऐसी कविताएं शामिल हैं जो कि सुधार वादी दृष्टिकोण को लेकर विभिन्न वर्गों के लिए प्रेरक संदेश देती नजर आती हैं ।इस कृति की एक विशेषता यह भी है कि इसमें त्रिपाठीजी ने पाठकों की पसंद का पूरी तरह ध्यान रखा है और काव्य रचनाओं को तीन भागों में विभाजित करके शामिल किया है याने संग्रह में गीत, ग़ज़ल और दोहे तीनों ही पाठक वर्ग को पढ़ने को मिल सकते हैं।  ये रचनाएं पढ़ने के बाद पाठक वर्ग भी इस बात को सहर्ष स्वीकार करेगा कि ये रचनाएं पठनीय और प्रभावी तो हैं ही साथ में प्रोत्साहन और प्रेरणा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं ।इस संग्रह का  शुभारंभ कवि ने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अपने एक मुक्तक से किया है जो कि पाठकों को प्रेरित भी करेगा और प्रभावित भी –

—–

जिनने अपना लहू लुटाया

उनको शीश झुकाने आये

कविताओं के शंखनाद से

सोया मुल्क जगाने आये

रात नहीं काले बादल का

छाया घुप्प अंधेरा है

सारे भारत वासी जागो

हम ये बात बताने आये

—–

संघर्ष की धूप में तपना और सुख की छांव में पलना दोनों ही को कवि जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मानता है और उन्होंने इसे स्वीकार भी किया है –

—–

सुख और दुख दोनों साथी हैं

हमने दोनों को अपनाया

—–

मित्रता के निष्ठा पूर्वक निर्वाह को कवि ने अपने ही नजरिए से देखा है और जो महसूस किया है उसे अपनी रचना में व्यक्त भी किया है –

—–

हमने जिससे हाथ मिलाया

उसने ही दर दर भटकाया

दोस्त से बढ़ के दुश्मन अच्छा

—–

इस कृति में काव्य सृजन करने वाले डा अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी का हमेशा से सोचना रहा है कि अगर आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए सृजन किया जाये तो वह अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय और पठनीय होता है। इसीलिए इस संग्रह में अधिकांश कविताएं बुंदेली भाषा में रचित की गई हैं और  ये रचनाएं इसीलिए अत्यंत रोचक और मनमोहक प्रतीत होती है।भाई श्री त्रिपाठी जी की बुंदेली भाषा में रचित कविताओं में भी  पाठकों को सार्थक संदेश ही नजर आयेगा –

—–

आईने की बात को तूं काहे झुठलात

सूरत जैसी होत है बेंसयी बौ दिखलात

—–

साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के स्वनामधन्य प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व स्व. पंडित हरिकृष्ण जी त्रिपाठी के यशस्वी पुत्र डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी का लेखन और साहित्यिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता आज सराहना और प्रेरणा का विषय है । बुंदेली के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की ये पंक्तियां मेरे विचार से डा. अभिजात कृष्ण जी त्रिपाठी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर खरी उतरती हैं  और इन्हीं पंक्तियों में आज जन्म दिवस पर मंगल भाव व्यक्त करने के लिए भी उपयुक्त समझ रहा हूं –

—–

इल्मो अमल में राज बहुत कामयाब हूं

मेरा कोई जवाब नहीं लाजवाब हूं

पन्ने पलटते जाओ तो देखोगे दोस्तों

पढ़कर जिसे न भूल सको वो किताब हूं

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆

सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

पुस्तक  : साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह)

लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर (म. प्र.)

मूल्य – 275

पृष्ठ – 154

वर्ष – 2025

सरल, चुटीली और प्रभावशाली – साहित्य की गुमटी – सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆ 

व्यंग्य के क्षेत्र में धर्मपाल महेंद्र जैन जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वह हिन्दी व्यंग्य विधा के गिने-चुने बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक हैं। पिछले वर्ष शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके व्यंग्यों का एक रोचक संग्रह आया था ‘साहित्य की गुमटी’। जितना आकर्षक पुस्तक का शीर्षक है उतने ही लुभावने और सोचने को विवश करने वाले उनके व्यंग्य हैं। इस पुस्तक में धर्मपाल जी ने साहित्य जगत की विसंगतियों, दिखावा और परिवर्तित होती प्रवृत्तियों पर हास्यपूर्ण अंदाज में तीखा कटाक्ष किया है। यह पुस्तक पाठक को हँसी-हँसी में गंभीर मुद्दों पर सोचने को भी विवश करती है।

श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

यहाँ गुमटी को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जिस प्रकार सड़क किनारे लगी गुमटी में भांति- भांति के लोग आते-जाते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार साहित्य रूपी गुमटी में भी भिन्न-भिन्न श्रेणी के यथा- लेखक, पाठक, आलोचक और प्रकाशकों की भीड़ दिखाई देती है। जो स्वयं को बहुत महान समझने का भ्रम पाले रखती है। उनकी कुंठा, उनके आग्रह, उनकी बेचारगी, यह सब इन पात्रों में, उनके संवाद और उनकी आदतों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

संग्रह की पहली रचना ‘ज़हर के सौदागर’ लेखक की एक जबरदस्त व्यंग्य रचना है, जिसमें लेखक ने समाज में फैल रही नफरत, हिंसा, अफवाह और स्वार्थ जैसे जहर पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी में ज़हर बेचने वाली एक दुकान का उदाहरण देकर लेखक समाज की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। रचना में बताया गया है कि पहले ज़हर का उपयोग सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी माँग तेजी से बढ़ने लगी। यह बढ़ती माँग केवल वास्तविक ज़हर की नहीं, बल्कि समाज में फैल रहे झूठ, नफरत और दुर्भावना जैसे मानसिक ज़हर की ओर संकेत करती है। यहाँ लेखक बड़ी कुशलता से यह दिखाते हैं कि कैसे लोग बिना सोचे-समझे इन विषैले विचारों को फैलाते हैं और समाज को दूषित कर देते हैं।

‘ वाट्सऐप नहीं भाट्सएप’ में समकालीन सामाजिक व्यवहार, विशेषकर व्हाट्सएप समूहों में दिखने वाली प्रवृत्तियों पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है। आजकल व्हाट्सएप समूहों में होने वाली ‘अतिश्योक्तिपूर्ण’ प्रशंसा और चापलूसी दिखाई गई है। यहाँ हम देखते हैं कि कैसे कुछ सदस्य एक-दूसरे की रचनाओं की अतिश्योक्ति पूर्ण प्रशंसा करते हैं। यदि भूले से उनकी रचनाओं से असहमति जता दी जाए या आलोचना कर दें तो उसे व्यक्तिगत हमले की तरह लिया जाता है। ‘भाषा के हाइवे पर गड्ढे ही गड्ढे’ में समकालीन आलोचना पर गहरा कटाक्ष किया गया है। लेखक कहते हैं कि किसी कृति पर आलोचना देखकर ही पता चल जाता है कि वह मित्र द्वारा लिखी गई है अथवा अमित्र द्वारा। यदि मित्र की रचना है तो अपने ही किसी बंदे से लिखवाकर भेज देता है परन्तु यदि वह अमित्र की है (जो की होती है। क्योंकि लेखक आपस में प्रतिद्वंदिता के चलते अमित्र ही अधिक होते हैं) तो उसपर ऐसी आलोचना लिखी जाती है कि लेखक आत्महीनता का शिकार होकर लिखना ही भूल जाए।’ ‘लाइक बटोरो और कमाओ’ में अलग ही बानगी देखने को मिलती है। यहाँ फेसबुक की उस प्रवृत्ति का प्रदर्शन है जहाँ सारा फ़साना बस लाइक कमेंट का है। अगर जिन्दा हो, तो लाइक कमेंट करके अपने जीवित होने का प्रमाण दो। ‘ईडी है तो प्रजातंत्र स्थिर है’ आज की राजनीति का ज्वलंत उदाहरण है – हम राजनीतिज्ञ हैं दोमुँहे सांप जैसे। हमारे एक तरफ ईडी है तो दूसरी तरफ सीबीआई। हमको काहे का डर?

इसी प्रकार संग्रह में एक से बढ़कर व्यंग्य हैं जो हमारे समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, धार्मिक विचारधारा, लोगों के दोगलेपन पर सटीक प्रहार करते हैं। लिखने को तो इतना कुछ है कि अगर लिखने बैठूं तो एक पुस्तक ही बन जाएगी। धर्मपाल जी के व्यंग्य से मेरा साक्ष्य पहली बार हुआ है और मैं उनकी पैनी दृष्टि से चमत्कृत हुई हूँ, कायल हुई हूँ। एक व्यंग्यकार बनने के लिए आपमें तीखी दृष्टि, हास्यबोध, बेहतरीन वैचारिक क्षमता और जागरूकता होना बेहद आवश्यक है। धर्मपाल जी ऐसे ही जीनियस रचनाकार हैं जिनकी विचारशीलता का फलक बहुत विस्तृत है। संग्रह के कई व्यंग्य बेहद तीखे बन पड़े हैं- बम्पर घोषणाओं के जमाने में, रक्तबीज का क्या मतलब, होरी खेले व्यंग्य वीरा अवध में, विदेश में परसाई से दो टूक, साहब को जुकाम है पर…, संस्कृति एक संक्रामक बीमारी है, सरकार तुम ट्रिलियन हम पाई, अफवाह को अफवाह रहने दें, सांप अब सभ्य हो गए हैं, साहित्य अकादमी-सी पान गुमटी इत्यादि।

संग्रह की भाषा सरल, चुटीली और प्रभावशाली है। वे भारी-भरकम शब्दों का कहीं भी प्रयोग नहीं करते, बल्कि बहुत सहज भाव में गहरी बात कह देते हैं। कई स्थानों पर व्यंग्य इतना तीक्ष्ण है कि पाठक मुस्कुराते हुए भी समाज और साहित्य की वास्तविकता को महसूस करता है। संग्रह में साहित्यिक आयोजनों, पुरस्कारों की होड़, लेखकों की भंगिमा, उनके स्वार्थ और आलोचना की राजनीति जैसी स्थितियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष हैं। धर्मपाल जी अपने व्यंग्यों के माध्यम से यह बताने का प्रयास करते हैं कि साहित्य केवल प्रसिद्धि पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम होना चाहिए।

यह एक ऐसा संग्रह है जो मनोरंजन के साथ-साथ साहित्यिक दुनिया की वास्तविकता को भी जाहिर करता है। धर्मजी की पैनी दृष्टि और हास्यपूर्ण शैली इस पुस्तक को रोचक और प्रभावशाली बनाती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक बेहतरीन उपहार है जो व्यंग्य साहित्य में रुचि रखते हैं। यह एक रोचक व विचारोत्तेजक व्यंग्य-संग्रह है। इसमें लेखक ने साहित्यिक दुनिया की विभिन्न प्रवृत्तियों, दिखावे और विसंगतियों पर तीखे लेकिन हास्यपूर्ण व्यंग्य किए हैं। लेखक की पैनी दृष्टि और चुटीली भाषा इस संग्रह को तीखी धार देती है। मैं इस संग्रह के लिए धर्मपाल जी को बधाई देती हूँ और उनकी आगामी कृति के लिए शुभकामनायें, प्रतीक्षा की घड़ियाँ शुरू हो गई हैं।

©  सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

18-ए, विक्रमादित्य पुरी, स्टेट बैंक कॉलोनी, बरेली 243003

मो.- 9412291372

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’  समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ☆

? पुस्तक चर्चा –  अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ? समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ?

उपन्यास का नाम: अचानक डूबता सूरज उग आया

उपन्यासकार: राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी

प्रकाशक: कोहबर प्रकाशन लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

प्रकाशन वर्ष: 2025

कुल पृष्ठ: 152

मूल्य: ₹299

☆ “अचानक डूबता डूबता सूरज उग आया” :  मानव कर्तव्य की सफलता है ☆ डॉ जयप्रकाश तिवारी

इस उपन्यास में चिंतन के अनेक, विविध उत्कृष्ट रोचक और संवेदनशील आयाम हैं जो हमे मानव होने, मानव कर्त्तव्य का बोध करते हैं।

1 – इसका उपन्यास का नायक लखनऊ निवासी राजीव रस्तोगी है जो धनाढ्य परिवार से होते हुए भी सादगी और सनातन का जीता जागता प्रतिमूर्ति है। विश्वबन्धुत्व का व्यवहार उसके चरित्र से झलक रहा है। उसकी मित्र मंडली में सहृदय युवक/युवतियों की भरमार है। वहां जाति भेद, वर्गभेद, संप्रदाय भेद नहीं है। उसके मित्र मंडली में जहां अनेक हिन्दू युवक है, वही मुस्लिम सोहेल, एजाज, वाहिबा है तो अफ्रीकी मूल की ग्रेसी भी और एंग्लो इंडियन नायिका रूबी भी है, जिससे उसका विवाह संपन्न होता है। सभी मानवता और प्रगति के पुजारी हैं। उसमें धीरता के साथ साथ एक और गुण भी है, उसे गुण नदी; सद्गुण कहना चाहिए – गुह्यं च निगूहति गुणानि प्रकटी करोति की। यह संस्कृत और हमारी संस्कृति की देन है।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

2 – इस उपन्यास के नायक का दिल यदि अपने संस्कार और प्रेम के लिए धड़कता है तो मस्तिष्कत कर कर्म दायित्व और नशा पीड़ित समाज के उन्मूलन के लिए।

3 इस उपन्यास में दिल और मस्तिष्क में अद्भुत समन्वय है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में राजीव का यह संतुलन हमे बहुत कुछ सिखाता है।

4 – यदि पाठक या समीक्षक से प्रश्न किया जाय कि राजेश हृदय की ओर उन्मुख है या मस्तिष्क, कर्तव्य की ओर? तो पाठक और समीक्षक उसे किसी एक वर्ग में नहीं रख पाएगा। उसे दोनों ही संवर्गों का श्रेष्ठ उदाहरण घोषित करना पड़ेगा। यह किसी के भी व्यक्तित्व का धनात्मक और चमत्कारी प्रभाव छोड़ने वाला चरित्र है।

5 –  ऐसा संतुलन वह अपने जीवन में कैसे रख पाया? या स्वयं को साध पाया तो इसका एकमात्र उत्तर है उसका सनातनी शिक्षा, मर्यादा और सिद्धांतों में अटूट विश्वास। वह लंदन में रिश्तेदार यहां उपेक्षित होने बावजूद अपने मां बाप को नहीं बताता कि पिता और मित्र में दरार आ जाएगी। वह पूछने पर प्रशंसा ही करता है। इस प्रकार इस उपन्यास ने सनातन संस्कृति और लखनऊ की तहजीब दोनों को निखारा है। यह जन्मभूमि और कर्मभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यही समर्पण मन में – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का भाव जागृत करती है।

6 – संचरित बीमारियों की व्यापकता, उनके समाज और उनकी विभीषिका, टूटते परिवार का वर्णन तो है ही; टूटते परिवारों को कैसे जोड़ा जाय? यह उपाय भी है। नृपेंद्र और आरती के टूटते दाम्पत्य का जुड़ना, उनके दाम्पत्य जीवन के तिमिर से दाम्पत्य की किरण फूटना ही “अचानक डूबता सूरज उग आया” शीर्षक रूप में प्रकट हुआ है। इसका बिंब चित्र देखिए – “आरती और नृपेंद्र की नजरें एक दूसरे से मिली तो वे देर तक अपने को रोक नहीं सके। … दोनों ने अतीत की बीती हुई बात को एक दुःस्वप्न मानकर उसे हमेशा – हमेशा के लिए भुला देने का संकल्प लिया। उन्हें एक दूसरे से कुछ कहने के लिए अब शेष नहीं था क्योंकि आरती ने राजीव के पीछे के कमरे में बैठकर राजीव और नृपेंद्र के बीच हुई पूरी बात को सुन लिया था। अब सारा का सारा माहौल बदल चुका था। क्योंकि अब डूबता सूरज उग आया था”।

कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जागृति उपन्यास है जो एक ओर मानवीय संबंधों को जागृत करता है और दूसरी ओर नशा उन्मूलन की गूढ़ व्याख्या कर जन जागृति करता है। मानवीय दृष्टि और जनजागरण तथा नशा उन्मूलन की दृष्टि से यह अनुपम उपन्यास है। बीमारियों को केंद्र में रखकर प्रेम, सौहार्द्र और समर्पण का ऐसा तना बना बना गया है कि पाठक का मन कभी भी उबाऊपन, थकान, नीरसता का अनुभव नहीं करता; अपितु अपने को बुराइयों के निर्मूलन का एक अंग मन लेता है। इस यात्रा में सहयात्री बन जाता है। यही उपन्यासकार की सफलता है। यह यात्रा कैसे प्रारम्भ होती है? कैसे अपने लक्ष्य का संधान कर उसे पूर्णता तक पहुंचाती है, इसे पाठक स्वयं उपन्यास क्रय करके पढ़े तो उसे अधिक आनंद आएगा। हां, इतना अवश्य आश्वस्त करना चाहूंगा कि उपन्यास क्रय करने का उसे अफसोस या निराशा नहीं होगा, उसे धन व्यय की सार्थकता की अनुभूति होगी।

एक उपन्यासकार, कवि, समीक्षक और संगठनकर्ता के रूप में श्री राजेश सिंह श्रेयस का व्यक्तित्व अत्यंत ऊर्जस्वी है। उनके लेखन को नमन और साधुवाद। उनकी लेखनी अविरल, आबाद चलती रहे, उनको बहुत – बहुत बधाई और साधुवाद।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© डॉ जयप्रकाश तिवारी

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

श्री सुदर्शन कुमार सोनी

☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – “व्यंग्य : कल आज और कल”

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पृष्ठ संख्या – १६६

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली 

मूल्य – २२४ रु 

☆ व्यंग्य: कल, आज और कल” का अवलोकन व समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

यह सारांश विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक “व्यंग्य: कल, आज और कल” का एक विस्तृत अवलोकन प्रदान करता है, जो हिंदी व्यंग्य के सैद्धांतिक आधार, ऐतिहासिक विकास और समकालीन प्रासंगिकता का एक बहुआयामी विश्लेषण है।

व्यंग्य की परिभाषा और ऐतिहासिक जड़ें

व्यंग्य की प्रकृति और उद्देश्य व्यंग्य को केवल हास्य नहीं, बल्कि साहित्य की एक सशक्त विधा के रूप में वर्णित किया गया है जो समाज के ताने-बाने में बुनी गई विसंगतियों, विडंबनाओं और कुरीतियों को उघाड़ने का साहस रखती है। यह मात्र हँसाने का साधन नहीं है, बल्कि हँसी के पीछे छिपे एक तीखे प्रहार की लेखकीय कला है, जो पाठक को झकझोरती है और उसे सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की ओर सोचने पर मजबूर करती है। स्रोतों के अनुसार, व्यंग्य समाज का दर्पण है जो व्यवस्था, परंपराओं और सामूहिक मूर्खताओं को उजागर करता है।

सैद्धांतिक आधार: हास्य बनाम व्यंग्य  पुस्तक शुद्ध हास्य (Humor और Farce) और व्यंग्य (Wit, Satire और Irony) के बीच सूक्ष्म अंतर स्पष्ट करती है। जहाँ हास्य विषय-वस्तु से संबंधित है, वहीं विट, सटायर और विडंबना (Irony) अभिव्यक्ति के कौशल और लेखक की बुद्धि से जुड़े हैं। हँसी की तीव्रता के आधार पर इसे छह प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: स्मित (मंद मुस्कान) से लेकर अतिहसित (अट्टहास) तक। एक सफल व्यंग्य वह है जो पाठक में ये बौद्धिक अनुभव उत्पन्न कर सके।

प्राचीन काल से भक्ति काल तक का विकास  : भारत में व्यंग्य की जड़ें बहुत पुरानी और गहरी हैं, जो संस्कृत साहित्य और कालिदास के प्रसंगों में भी दिखाई देती हैं। ऐतिहासिक रूप से कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों को जातिगत भेदभाव और धार्मिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करने का श्रेय दिया जाता है। विशेष रूप से कबीर को उनकी बेबाक और कठोर भाषा के लिए जाना जाता है, जिन्होंने बाहरी आडंबरों को त्यागकर आंतरिक पवित्रता पर जोर दिया। पत्थर पूजने या मस्जिदों में ऊँची अजान देने पर उनके प्रसिद्ध दोहे सामाजिक व्यंग्य के कालजयी उदाहरण हैं। यहाँ तक कि गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में भी नारद मोह और लक्ष्मण-परशुराम संवाद जैसे प्रसंगों में व्यंग्य और हास्य का अनूठा समावेश मिलता है।

हिंदी व्यंग्य के स्तंभ और अभिव्यक्ति की विविधता

आधुनिक हिंदी व्यंग्य के चार स्तंभ स्रोतों में उन व्यक्तित्वों का गहन विश्लेषण दिया गया है जिन्होंने हिंदी में व्यंग्य को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया:

  • हरिशंकर परसाई: इन्हें हिंदी व्यंग्य का पर्याय माना जाता है। परसाई ने सरल, बोलचाल की भाषा का उपयोग करके गहरे संदेश दिए। उनका व्यंग्य तर्क, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित था, जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार और पाखंड पर चोट करना था।
  • शरद जोशी: अपनी संक्षिप्तता और अनूठे रूपकों के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने लघुता में विशाल सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं को समेटने की कला में महारत हासिल की थी।उन्होने व्यंग्य पाठन को साहित्यिक कार्यक्रमों के मंचों जंहा पद्य का ही बोलबाला था वहां पर सफलतापूवर्क स्थापित किया
  • रवींद्रनाथ त्यागी: त्यागी का व्यंग्य मनोवैज्ञानिक गहराई और आत्म-व्यंग्य के लिए जाना जाता है। वे अक्सर स्वयं को भी अपने व्यंग्य के घेरे में रखते थे, यह दर्शाते हुए कि सुधार की शुरुआत स्वयं की पहचान से होती है।
  • श्रीलाल शुक्ल: उनका व्यंग्य गहरे सामाजिक यथार्थवाद में रचा-बसा है, जो विशेष रूप से ग्रामीण और शैक्षिक प्रणालियों के क्षरण पर केंद्रित है, जैसा कि उनके उपन्यास राग दरबारी में देखा जा सकता है।
  • विभिन्न विधाओं में व्यंग्य: नाटक, कविता और सिनेमा  व्यंग्य का प्रभाव निबंधों से आगे बढ़कर साहित्य और मीडिया के अन्य रूपों तक फैला है:
  • हिंदी नाटक: भारतेंदु हरिशचंद्र के अंधेर नगरी से शुरू होकर, आधुनिक नाटकों ने सत्ता प्रतिष्ठानों व प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए व्यंग्य का उपयोग किया है। हबीब तनवीर का चरणदास चोर लोक विधाओं के माध्यम से “सभ्य” समाज के पाखंड पर प्रहार करता है।
  • कविता: कविता की सघनता में व्यंग्य और भी पैना हो जाता है। हुल्लड़ मुरादाबादी, अल्हड़ बीकानेरी और काका हाथरसी जैसे कवियों ने अपनी लयबद्ध प्रस्तुतियों के माध्यम से व्यंग्य को मंचों पर लोकप्रिय बनाया।
  • फ़िल्मी गीत: बॉलीवुड में भी व्यंग्य एक शक्तिशाली माध्यम रहा है। “प्यासा” फ़िल्म का गीत ‘सर जो तेरा चकराए’ या ‘पैसा बोलता है’ जैसे गाने सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय कमजोरियों को बिना कड़वाहट के रेखांकित करते हैं।

सामाजिक प्रभाव, महिला हस्तक्षेप और भविष्य की राह

व्यंग्य में महिलाओं की भूमिका : पुस्तक “व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप” पर विशेष प्रकाश डालती है, जो अक्सर साहित्यिक इतिहास में उपेक्षित रहा है। यह नोट किया गया है कि जहाँ लंबे समय तक इस विधा पर पितृसत्ता का प्रभाव रहा, वहीं सूर्यबाला, शांति मेहरोत्रा और स्नेहलता पाठक जैसी लेखिकाओं ने अपने विशिष्ट अनुभवों से व्यंग्य को नई पहचान दी। ये लेखिकाएं घरेलू विसंगतियों, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक पहचान की राजनीति को अपनी पैनी दृष्टि से संबोधित करती हैं।

व्यंग्य एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र के रूप में : व्यंग्य को समाज के लिए एक महत्वपूर्ण “रक्षा तंत्र” (Defense Mechanism) के रूप में वर्णित किया गया है, जो इसकी बीमारियों की पहचान करता है और उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद करता है। यह सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने का एक जोखिम भरा लेकिन प्रभावी तरीका प्रदान करता है। शक्तिशाली लोगों के पाखंड का मजाक उड़ाकर, व्यंग्य जनता को याद दिलाता है कि कोई भी सत्ता मानवीय दोषों से ऊपर नहीं है।

डिजिटल युग की चुनौतियाँ  : समकालीन समय में, व्यंग्य के सामने नई चुनौतियाँ हैं। हालाँकि सोशल मीडिया मीम्स और वायरल वीडियो के माध्यम से व्यापक पहुँच प्रदान करता है, लेकिन यह सेंसरशिप और कानूनी खतरों के जोखिम भी पैदा करता है। एक चिंता यह भी है कि यदि व्यंग्य का उपयोग जिम्मेदारी से नहीं किया गया, तो यह केवल नकारात्मकता या हताशा पैदा कर सकता है। इसके अलावा, डिजिटल युग के “फिल्टर बबल्स” और गहरी बौद्धिक समझ की कमी के कारण व्यंग्य के सूक्ष्म संकेतों को अनदेखा किया जा सकता है।

लेखक का व्यक्तिगत दर्शन : लेखक, विवेक रंजन श्रीवास्तव, साझा करते हैं कि उनका व्यंग्य लेखन सामाजिक पाखंड और कथनी-करनी के अंतर से पैदा हुई आंतरिक बेचैनी का परिणाम है। वे व्यंग्य को एक “सामाजिक सफाईकर्मी” के रूप में देखते हैं जो वैचारिक कूड़े-कचरे को साफ करता है। उनका मानना है कि व्यंग्य का अंतिम उद्देश्य हमेशा सकारात्मक होना चाहिए—सामाजिक विसंगतियों का निदान करना और एक अधिक न्यायपूर्ण समाज को प्रेरित करना। उनका निष्कर्ष है कि जब तक मानव समाज में विसंगतियां रहेंगी, व्यंग्यकार की पैनी कलम की आवश्यकता बनी रहेगी।

कुल मिलाकर विवेक की यह पुस्तक ज्ञानवर्धक होकर संगहणीय व पठनीय है।

चर्चाकार… श्री सुदर्शन कुमार सोनी

संपर्क – 141 रोहित नगर फेज-2 भोपाल, मो  9425638352

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) –  श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) – श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

जब साहित्यिक क्षेत्र में लघुकथा लेखन की बात आती है तो जबलपुर से अपने समय के प्रतिष्ठित शिक्षाविद और साहित्यकार स्व. पं. आनंद मोहन अवस्थी का समर्पित योगदान अपने आप मानस पटल पर उभर कर सामने आ जाता है। मेरी जानकारी के अनुसार शायद जबलपुर से लघुकथा लेखन की शुरुआत आनंद मोहन अवस्थी ने ही की थी और उसके बाद यहां से अन्य कथाकारों ने भी लघु कथा लेखन की गौरवशाली परंपरा को  आगे बढ़ाया ।इसी तारतम्य में महिला कथाकारों ने भी अत्यंत प्रभावी और सार्थक रुप से लघुकथाएं लिखीं और पाठक वर्ग ने इसे काफी पसंद भी किया।

लघुकथा लेखन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाली सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार और शिक्षाविद श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाएं भी पाठकों के बीच काफी चर्चित हुईं ।  उनका कहानी संग्रह और यशोदा हार गयी भी अपनी विषय सामग्री, शैली और रोचकता के कारण भी पाठक वर्ग के बीच लोकप्रिय रहा और उसके बाद लघुकथा संग्रह बादल का टुकड़ा ने भी आज साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पठनीयता सिद्ध की है।लघुकथा संग्रह   बादल का टुकड़ा की अधिकांश कहानियां हमारे लिए इसलिए भी उत्सुकता उत्पन्न करती हैं क्योंकि छाया जी ने अत्यंत सरल भाषा और प्रभावी विषय सामग्री को लेकर ये कहानियां लिखी हैं। जब हम इस पुस्तक की कहानियां पढ़ते हैं तो वे हमें अपने जीवन के आसपास के प्रसंगों पर आधारित कहानियां प्रतीत होती हैं।इस संग्रह की लघुकथाएं अपनी डफ़ली अपना राग, दथरथ, ऐसा क्यों, मां, सफलता की उड़ान, देहरी, सीढ़ी, बादल का एक टुकड़ा, मानस पुत्र, मुआवजा, पीहर का नेग , आधुनिक गांधारी, प्रतीक्षा, विद्या मंदिर, किसका घर, कबाड़ वाला,  ढोंगी, भूल सुधार, हम पांच, उपहार, गंगा जल, संकल्प, हमें कुछ करना है, संकट की पाठशाला, मैं नेता नहीं हूं इत्यादि ऐसी ही लघुकथाएं हैं  जिन्हें पाठक वर्ग बार बार पढ़ना चाहता है और ये रचनाएं पाठकों को कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे की इस कृति में प्रकाशित प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी है जो पुस्तक की पठनीयता को सिद्ध करती है । उन्होंने लिखा है कि प्रस्तुत संग्रह की यह रचनाएं अपना विशेष संदर्भ रखती हैं।इन रचनाओं में समाज है, समाज के कसाव हैं, संबंधों की कसमसाहट है और तद्जन्य पीड़ा के परिणाम,प्रभाव , भी परिलक्षित होते हैं । दिव्यांगो की बात स्पष्ट करती स्पर्श की आंखें हैं तो देहदान पर आभार जैसी रचनाएं हैं तो मूक पालतू पशुओं का पक्ष स्पष्ट करती असंभव सी लघुकथाएं संजोई गई हैं।महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाओं को प्रेरक और प्रभावी निरुपित किया है। पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि नियमबद्ध और अनुशासन प्रिय छाया त्रिवेदी ने अपनी लघु कथाओं में समाज के विविध विषयों पर दिशाबोधक दृष्टि प्रदान की  है। उनकी लघुकथाओं में लघुकथा के मूल भाव का सार्थक प्रस्तुतिकरण है ।

प्रतिष्ठित शिक्षाविद डा. इला घोष भी छाया जी की लघुकथाओं से प्रभावित दिखती हैं। उन्होंने भी इस संग्रह में अपनी बात कही है कि छाया जी के पास सूक्ष्म दृष्टि, संवेदनशील हृदय और अभिव्यक्ति की क्षमता है जिसका परिचय उनकी उनके इस लघुकथा संग्रह में मिलता है।

साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं की विकास शील गतिविधियों के लिए समर्पित, साहित्य साधक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने भी लघु कथाओं को सामयिक और सराहनीय बताते हुए लिखा है कि विदुषी साहित्यकार, समता, ममता, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति, सम्माननीया श्रीमती छाया त्रिवेदी की लघुकथाएं बिन्दु में सागर को समोए  हैं। सामाजिक आलोक के लिए विकल इन लघु कथाओं की हृदय स्पर्शी पृष्ठभूमि सामाजिक संस्कार का आव्हान करती है।श्रीमती छाया त्रिवेदी जी के लघुकथा संग्रह बादल का एक टुकड़ा में 90 लघुकथाएं सम्मिलित हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्य मनीषी श्री कृष्णकांत जी चतुर्वेदी, और अपने पूज्य पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री रेवा प्रसाद दीक्षित, पूज्य मां स्व. श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित को समर्पित यह पुस्तक  साहित्यिक क्षेत्र की एक श्रेष्ठ और संग्रहणीय कृति साबित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares