☆ सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में है सामाजिक संचेतना – चर्चित काव्य कृति ‘रंग मेरे जीवन के’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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अभी पिछले कुछ दिनों पहले साहित्यिक क्षेत्र में पाथेय प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध कवि श्री सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य कृति रंग मेरे जीवन के पाठकों के मध्य काफी चर्चा में रहा। इस संग्रह की कविताएं वास्तव में एक सामाजिक व्यक्ति के जीवन में सुख दुख के विभिन्न रंगों का विशविश्लेषण करती नज़र आती हैं और इसीलिए कृति की कविताओं ने पाठकों को ज्यादा प्रभावित किया है।कवि ने अपने आसपास जो भी देखा और महसूस किया वह उनकी कलम से कागज पर उतर आया और जो भी उन्होने रचा वह पाठकों के लिए पठनीय बन गया । सुवीर जी की रचनाएं किसी व्यक्ति के मानस पटल पर एक अनूठी छाप छोड़ती हैं।कवि की अधिकांश कविताएं पाठकों को अत्यंत सार्थकता और गंभीरता के साथ कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं जैसे उनकी इस कविता की ये पंक्तियां देखिए –
0 अब जबकि मेरे बाजू/ बड़े हो गये हों/ साथ साथ अब बूढ़ा पेड़/मेरे बाजुओं में/ समाता नहीं है— /मैं आंखों ही आंखों में नापता हूं / मोटाई इसकी /और/सोचता हूं/मन ही मन/ बढ़ते कुनबे के लिए/कमरा एक और बनाना है/ सोफ़ा भी घर का / हो गया पुराना है/ मेरे आंगन का पेड़/ बूढ़ा हो गया है। 0 कवि न तो निराशा की बात सोचता है और नहीं निराशा की बात करता है बल्कि कवि आज की व्यवस्था और परिस्थितियों में भी पूर्ण रूप से आशावादी नजर आता है । कवि की रचना में गंभीर सोच का ये उदाहरण भी देखें – 0 बहुत अंधेरा है, सूरज का कोई टुकड़ा लाओ चिपका दो किसी दीवार पर फेविकोल से 0
इस काव्य कृति की शुरुआत में प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी की प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी और महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं कि- इन कविताओं में रसभाव और प्रभाव है। मुक्त छंद का यही पक्ष मुक्त छंदीय कविताओं के सौंदर्य को बनाए रखता है। परिवेश की विकृति के प्रति आक्रोशित इन रचनाओं में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि है ।
इस संग्रह में सुप्रसिद्ध साहित्यकार,पाथेय प्रकाशन के संयोजक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने रचनाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि सामाजिक पाखंड, दोगलापन और मूल्य हीनता से व्यथित कविवर सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में द्वन्द और वेदना के साथ दृष्टिबोधक तत्व मुखरित हुआ है।उनकी आस्था मन की श्रेष्ठता के संधान में है।भाई श्री सुवीर श्रीवास्तव वीर जी की 98 काव्य रचनाओं के इस संग्रह की सोचनीय और सार्थक कविताओं से साहित्यिक क्षेत्र को काफी आशाएं हैं और पाठकों के मध्य वर्ष 2025 की ये एक श्रेष्ठ कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित “बिट्टू…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०५ ☆
☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक – ‘बिट्टू’
लेखक डॉ. संजीव कुमार
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ मातृत्व की पावन तपस्या पर अभिनव उपन्यास – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
डॉ. संजीव कुमार का ‘बिट्टू’ कालजयी और शाश्वत साहित्यिक मूल्यों को रेखांकित करता नया रोचक उपन्यास है। वे विविध नवाचारी विषयों, और विधाओं में इतना सारा मौलिक रच चुके हैं कि रिकॉर्ड बुक्स में लगातार दर्ज होकर साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं।
हिंदी उपन्यास साहित्य का मूल उद्देश्य मानव मन की अतल गहराइयों को छूना और समाज को एक संवेदनशील आईना दिखाना है। यह कृति इस साहित्यिक मानक पर शत प्रतिशत खरी है।
उपन्यास एक बंधी-बंधाई कहानी नहीं है, बल्कि स्त्री के अस्तित्व, उसकी अदम्य जिजीविषा और मर्मस्पर्शी त्याग का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह समाज को करुणा और संवेदना के शाश्वत मूल्यों से जोड़ता है। उपन्यास की नायिका ‘बिट्टू’ एक शांत, विनम्र और बेहद हँसमुख स्त्री है, जिसका जीवन विवाह के शुरुआती दिनों में किसी मधुर गीत की तरह खुशियों से भरा हुआ था। किंतु, कहानी का मुख्य साहित्यिक द्वंद्व ‘माँ बनने की अभिलाषा’ से शुरू होता है। दस वर्षों का लंबा और मरुस्थल जैसा इंतज़ार, समाज के तीखे ताने और पारिवारिक दबाव के बीच बिट्टू का संघर्ष पाठक को भावनात्मक रूप से अपने साथ बहा ले जाता है।
लेखक ने यहाँ बड़ी कुशलता से दिखाया है कि कैसे एक स्त्री का मातृत्व केवल उसकी व्यक्तिगत इच्छा नहीं रह जाता, बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का एक क्रूर प्रश्न बना दिया जाता है।
इस कथा-प्रवाह में बिट्टू का चरित्र अटूट विश्वास और संकल्प के एक ऊंचे शिखर की तरह प्रस्तुत किया गया है। जहाँ एक ओर बिट्टू का पति उसके मातृत्व को लेकर मौन धारण कर लेता है और रूढ़िवादी समाज उसे ‘दोषी’ ठहराने लगता है, वहीं बिट्टू अपनी आस्था की लौ को बुझने नहीं देती।
वह मंदिर, मन्नत, व्रत और डॉक्टरों के चक्कर काटकर भी हार नहीं मानती। यहाँ तक कि अपनी जान दांव पर लगाकर सर्जरी का बड़ा जोखिम उठाना, उसके इसी संकल्प को दर्शाता है कि वह अपने मातृत्व को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
लेखक की भाषा सरल होते हुए भी गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है। पूरी रचना में प्रतीकों और उपमाओं का बहुत ही सुंदर और ललित प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, जब बीमारी की रिपोर्ट आती है, तो लेखक उसे “वज्रपात” के समान बताते हैं। यह ललित शैली पाठक के हृदय में आदि से अंत तक करुणा का संचार करती चलती है।
उपन्यास में संतान हीनता पर सामाजिक प्रताड़ना के यथार्थ को चित्रित करते हुए लेखक लिखते हैं कि, “शुरू-शुरू में घरवाले उसे समझाते, लेकिन धीरे-धीरे ताने और फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं। कोई कहता- ‘शायद इसी में कोई दोष है।’ कोई कहता- ‘इतने साल हो गये, अब क्या उम्मीद!'”, यह अंश हमारे समाज की उस कड़वी और नग्न सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ बाँझपन का सारा दोष केवल और केवल स्त्री के माथे मढ़ दिया जाता है। लेखक ने यहाँ सीधे प्रहार के बजाय “फुसफुसाहटों” शब्द का जो प्रयोग किया है, वह उस मानसिक पीड़ा को दर्शाता है जो किसी सीधे वार से भी अधिक गहरी और जानलेवा होती है। परंतु, इस घने अंधकार के बाद मातृत्व की उपलब्धि और परम तृप्ति का वह उजला क्षण भी आता है, जब वह पहली बार अपने बच्चे को गोद में लेती है। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकलती हैं और वह मन ही मन कहती है, “हे भगवान, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए… तूने मुझे माँ बना दिया।”, यहाँ बिट्टू के दस वर्षों के तप और संघर्ष का एक सुखद अंत होता है। “अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए” का यह भाव यह सिद्ध करता है कि एक भारतीय स्त्री के लिए जीवन का चरम लक्ष्य और उसकी संपूर्णता मातृत्व की प्राप्ति ही है।
परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहानी का सबसे कारुणिक मोड़ तब आता है जब वह ब्रेन ट्यूमर जैसी घातक बीमारी की चपेट में आ जाती है। लेकिन इस काल के सामने भी बिट्टू टूटती नहीं है, बल्कि वह नियति और मृत्यु पर अपनी ममता से विजय प्राप्त करती है। अपने अंतिम दिनों में, वह काँपते हाथों से अपने मासूम बच्चे के सिर पर हाथ रखती है और कहती है, “बेटा, मज़बूत बनना। माँ ने तेरे लिए बहुत इंतज़ार किया था… अब तू ही मेरा संसार है।” मृत्यु के द्वार पर खड़ी होकर भी अपने बेटे के भविष्य की यह चिंता और उसके चेहरे की शांति यह संकेत देती है कि उसने अपनी जीवन-साधना पूरी कर ली है। अब उसे मृत्यु का कोई भय नहीं है।
साहित्यिक मानकों की कसौटी पर यदि हम इस कृति को परखें, तो ‘बिट्टू’ बांझपन की सामाजिक विसंगति पर एक अत्यंत सफल, प्रौढ़ और श्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध होता है। अरस्तू के प्रसिद्ध ‘विरेचन सिद्धांत’ के अनुसार, जो साहित्य पाठक के मन के विकारों को धोकर उसे करुणा से पवित्र कर दे, वही उत्तम साहित्य है। यह उपन्यास पाठक के भीतर इसी पवित्र करुणा का संचार करता है। भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों वस्तु, अर्थात् पात्र-चित्रण, रस और उद्देश्य के कड़े मानकों पर यह रचना पूरी तरह सुदृढ़ और संतुलित है। इसका शिल्प और इसका कथ्य दोनों ही उच्च कोटि के हैं। डॉ. संजीव कुमार ने एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कृति हिंदी साहित्य को सौंपी है, जो पाठकों को पुस्तक बंद करने के बाद भी देर तक सोचने पर विवश करती है। यह उपन्यास दुःख की राख से अपनी खुशियों का संसार बुनने वाली एक साधारण स्त्री के असाधारण और कालजयी महागाथा बनने की अमर कहानी है।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ इंद्रजीत सिंहजी द्वारा लिखित “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०४ ☆
☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ इंद्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति: ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’
लेखक : इंद्रजीत सिंह
प्रकाशक : प्रकाशन विभाग
मूल्य : 330 रु
आलेख: विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
☆ यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
“अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ लता…” ड्राइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गई, माध्यम बदल गए, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मर कर भी अमर हो जाती हैं। सुख हो या दुख, राष्ट्रीय पर्व हो या कोई पावन त्योहार, हमारी हर भावना को स्वर देने के लिए लता दीदी का कोई न कोई गीत हमारी चेतना में सहज ही तैर जाता है। अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, वे पहले लता जी की आवाज़ से फिल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।
ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ , राजू भारतन द्वारा लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तक जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेजी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखाई देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।
इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आई है, शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ₹330 मूल्य की यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।
लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।
लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह, को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।
लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम,
गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र,सम्मान और पुरस्कार अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।
डॉ. इन्द्रजीत सिंह के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नई आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है।
1942 में पिता दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की नन्हीं उम्र में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर अभिनय और गायन की दुनिया में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शुरुआती दौर में कुछ निर्माताओं द्वारा उनकी आवाज़ को “बेहद पतली” कहकर नकार दिया जाना और फिर उसी आवाज़ का पूरे विश्व पर राज करना, यह संघर्ष गाथा पाठकों के भीतर नई ऊर्जा भरती है।
लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।
पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।
पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गई है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना, और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोंसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।
कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण: डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किए गए अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।
संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।
इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है । उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है:”लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिए बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।
‘न भूतो न भविष्यति’
संगीत की लंबी और यशस्वी पारी को जीते हुए लता जी जब सराहना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थीं, तब उनका इस नश्वर संसार से जाना पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए एक मर्मांतक और स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। उस भावुक क्षण में हर संवेदनशील हृदय रो उठा था।
इसी मर्म को अभिव्यक्त करती मेरी तब प्रकाशित हुई , काव्य पंक्तियाँ इस विमर्श को पूर्णता देती हैं:
स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी, हम सब का है प्यार लता,
भारत रत्न, रत्न भारत का, गीतों का सुर, सार लता ।
रागों का जादू, जादू गज़ल का, सरगम की लय, तार लता,
तबले की धिन् पर, सितारों की धड़कन, नगमों की रस धार लता ।
बनारस घराना, जयपुर तराना, गीतों का इकरार लता,
बैजू सुना था सुर बावरा वो, तानसेन दीदार लता।
सरहद की रेखा से सुर ही बड़ा है, नूपुर की झंकार लता,
भारत-पाक लाख दुश्मन हों, जनता की सरकार लता ।
तुम्हारा ये जाना न माने ज़माना, रहेंगी सदा गुलज़ार लता
… विवेक रंजन श्रीवास्तव
आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नई प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति। यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नई लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी।
मशहूर शायर जावेद अख्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”
डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीके और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।
☆ कवियत्री सिद्धेश्वरी सराफ शीलू की काव्य कृति – आर्यावर्त की अनुपमायें (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में
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सुप्रसिद्ध कवि स्व श्री जयशंकर प्रसाद की ये काव्य पंक्तियां इस बात की प्रतीक हैं कि नारी शक्ति ने वीरता, कर्मठता और ममता के क्षेत्र में हमेशा से एक कीर्तिमान स्थापित किया है और राष्ट्र को विश्व के रंग मंच पर गौरवान्वित किया है। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाली सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रिय बहन सिद्धेश्वरी सराफ शीलू ने भी मातृ शक्ति पर आधारित ऐसी ही प्रभावी कविताओं की रचना की है जिनका काव्य संग्रह आर्यावर्त की अनुपमायें का विमोचन पाथेय के तत्वावधान में गरिमामय कार्यक्रम के साथ आज आयोजित है।
श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
वैसे तो सिद्धेश्वरी जी लम्बे समय से कविताएं लिख रही हैं और काफी अच्छा लिख रही हैं और पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी कविताओं का ऐसा पाठक वर्ग है जिनके बीच इनकी कविताओं की पठनीयता सिद्ध भी हुई है। सिद्धेश्वरी जी की अधिकांश कविताएं राष्ट्रीयता, सामाजिकता और आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत हैं, इसीलिए उनकी कविताओं में भी राष्ट्र और समाज के लिए एक सार्थक और प्रेरक संदेश भी निहित है। शीलू जी के काव्य सृजन में देश की महान नारी की गौरव गाथा इस प्रकार से शामिल की गई है कि वह समाज के लिए अत्यंत प्रेरक प्रतीत होती है। क्रिकेट टीम की महिला कप्तान सुश्री हरमनप्रीत कौर की यशोगाथा का कुछ इस प्रकार वर्णन किया है –
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चयन हुआ है खेल में, जीत बनी पहचान
श्रेष्ठ नारी है बनी भारत की है शान
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सिद्धेश्वरी जी ने नारी शक्ति को अपनी कविताओं में इस प्रकार महिमा मंडित किया है कि इन कविताओं में ज्ञानवर्धक जानकारी भी उपलब्ध होती हैं। उन्होंने प्रथम महिला चिकित्सक श्री आनंदी बाई जोशी को भी अपनी कृति में शामिल किया है –
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बनी प्रेरणा हिन्द की, लिखा गया इतिहास।
स्वास्थ्य चिकित्सा भाग में, आनंदी है खास। ।
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इस देश की महिलाओं ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सक्रियता और दक्षता का परिचय देते हुए कीर्तिमान स्थापित किया है और यही बात कवियत्री की काव्य पंक्तियों में दृष्टिगोचर होती है –
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शुभ कर्णम मल्लेश्वरी
ओलंपिक का खेल।
सिडनी ओलंपिक चली
दक्षिण भारत रेल। ।
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भारत की महान नारियों की महान गाथा का गौरव गान करते हुए शीलू जी की ये प्रथम महिला नौ सेना पायलट शिवांगी सिंह के विषय में भी कविता की एक झलक देखिए –
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सोने की गुड़िया सजी
नौ सेना के संग।
वीरों से हम कम नहीं
फौलादी हैं अंग।
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इस काव्य कृति में चर्चित साहित्यकारों ने भी अपनी प्रतिक्रियाओं के रूप में मंगल भाव व्यक्त किए हैं। प्रतिष्ठित साहित्यकारों के क्रम में श्री विजय नेमा अनुज जी, श्री संतोष कुमार सिंह जी, मथुरा, श्री अशोक पटसारिया नादान जी, टीकमगढ़, डा. संध्या जैन श्रुति जी, श्री राजेश पाठक प्रवीण जी, श्री संतोष नेमा संतोष जी की प्रभावी प्रतिक्रियाओं ने कृति की पठनीयता सिद्ध की है। श्री नर्मदा प्रकाशन से प्रकाशित इस काव्य संग्रह में मातृ शक्ति के रुप में 101 महान नारियों पर आधारित 5-5 दोहें शामिल हैं।
इन सशक्त और सार्थक काव्य रचनाओं का अध्ययन और मनन करने के पश्चात मेरा तो यह विश्वास है कि मातृ शक्ति के प्रति असीम श्रद्धा और नमन भाव से सृजित कवियत्री सिद्धेश्वरी सराफ शीलू जी की ये काव्य कृति साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद सिद्ध होंगी, इसलिए शासन के शिक्षा विभाग से मेरी अपेक्षा है कि इस काव्य कृति की महत्वपूर्ण कविताएं अगर पाठ्यक्रम में शामिल की जायें तो इन कविताओं की उपयोगिता और सार्थकता दोनों ही का महत्व प्रतिपादित होगा।
शिक्षा – एम.एम., एम.एड.(स्वर्ण पदक), पी.एच.डी.( मनोविज्ञान )
संप्रति –
पूर्व व्याख्याता, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
मनोवैज्ञानिक सलाहकार,
साहित्य एवं समाज सेवी, देहदानी
अनुवादक, समीक्षक, सम्पादक
अनेक मंचों की संरक्षक, निदेशक, मार्गदर्शक
प्रकाशन / प्रसारण –
12 पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें चार ई-ऑडियो बुक अमेज़न पर उपलब्ध(मेरी अपनी ही आवाज़ में )
अनेकों साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में (सविशेष हरिगंधा, राष्ट्र वीणा-गुजरात, सदीनामा, गर्भनाल, सेतु, ऑस्ट्रियांचल, नारी अस्मिता, व्यंग्यलोक में लेख-आलेख, समीक्षा आदि अनवरत प्रकाशित।
दैनिक पत्र हरियाणा प्रदीप के स्थायी स्तम्भ में देश भक्ति भाव जागरण संदेश मुक्तक रूप में, सतत कई वर्षों से प्रकाशित। *अनेकों प्रतिष्ठित संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित।
साझा संकलनों में रचनाएँ, प्रकाशित।
चार साझा संकलन जिन्हें गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान प्राप्त, लघु योगदान अपना भी।
नाटक गुजरात राज्य, प्रथम पुरस्कार प्राप्त, दूर दर्शन पर गुजराती अनुवाद के साथ प्रसारित।
सम्मान और पद –
राय व्योम फ़ाउण्डेशन दिल्ली द्वारा “ लाइफ़ टाइम एचीवमेंट अवार्ड, 2024”
”संस्थापक अवार्ड “अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच द्वारा।
विदेश में मकाम की प्रथम इकाई का शुभारम्भ, सैन डिएगो, कैलीफॉर्निया, अमेरिका में, मेरे द्वारा किया गया। आज विश्व के 42 देशों में 83 इकाइयाँ सक्रियता से कार्यरत हैं। प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। हिन्दी भाषा के प्रचार -प्रसार एवं विस्तार हेतु कृत संकल्प।
साहित्य सेवा के लिए मकाम की विदेश संरक्षक पद पर पदासीन।
संत साहित्य अकादमी और दधीचि देहदान समिति की कार्यकारिणी सदस्य।
साहित्य सेवा द्वारा देश की सेवा हेतु कृत संकल्प।
आज प्रस्तुत है आपके द्वारा डॉ मुक्ता जी द्वारा लिखित पुस्तक “मोती उजास के ” पर चर्चा।
☆ सूक्ष्मावलोकन की दृष्टि वातावरण में बिखरे गहरे सिद्धान्तों को उजागर करती है ☆ चर्चा – डॉ दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ☆
“स्व पहचान से आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर मन
आत्मोदय से अंधकार में प्रकाश के मोती पा सकता है।”
माँ शारदा की स्तुति से प्रारम्भ होती 100 नज़्मों से सजा यह काव्य-संग्रह “मोती उजास के” आशावाद से भरपूर है। “ज़िन्दगी ख़ुशनुमाँ हो जाएगी,” “ख़ुद पर विश्वास कर” प्रारम्भिक दो रचनाएँ मन में सकारात्मकता का संचार करती हैं तथा उत्साह से भर रही हैं। प्रोत्साहन से परिपूर्ण एक-एक शब्द सराहनीय है; पठनीय और संग्रहणीय है। “सबका मंगल होय” की कामना करने वाला हृदय कितना कोमल होगा– इसका अंदाज़ा लग जाता है। “ग़िले शिक़वे” भले ही हज़ार हों लेकिन “अपनत्व का अहसास” बना रहे और “संवादों का सिलसिला” सिमटना नहीं चाहिए। “स्वयं बनिए अपने सारथी” कितनी अच्छी बात कही है, क्योंकि “अपना सहारा ख़ुद बनना होगा“ ‘कशमकश’ जब दूर हो जाएगी, तब “ख़ुदा को पा जाएगा इंसान” शीर्षक के नाम की कविता “मोती उजास के” यही सार्थक संदेश देती है कि सपने साकार होंगे। “मत व्यर्थ कयास कर” हमारे सोचने से कुछ नहीं होगा, जो कुछ है और हो रहा है, वह पूर्व निर्धारित है। कर्मों के फलों का लेखा-जोखा है। विधि के विधान को न कोई समझ पाया है, न ही बदल पाया है। उतना तो हर किसी को झेलना ही पड़ता है। “वक्त के करिश्मे हैं” समय बहुत बलवान है। जिस समय जो घटित होना है, वह घटित हो कर ही रहता है। कभी हमें लगता है कि हमारे साथ बुरा क्यों हुआ? किन्तु वस्तुतः ईश्वर हमारे भले के लिए ही करता है। अध्यात्मवाद का उल्लेख भी है तो पुरुषार्थ का समर्थन भी है। प्रयास कर “ख़ुद को पा जाएगा” ख़ुद को पा गया तो ख़ुदा को भी पा जाएगा।
“ मैं और तुम के भँवर में फँसी ज़िन्दगी/ लाख चाहने पर भी व्यूह से बाहर नहीं आ पाती है।
‘अयं निजः परोवेत्ति’ का भाव हर्गिज़ न रखें। इस संसार में कोई अपना और दूसरा पराया नहीं है। सब अपने ही हैं। सभी के प्रति समभाव होना चाहिए।” चाहिए “कह कर आदर्शवाद की दिशा का निर्देश किया है। होना तो सचमुच यही चाहिए कि सब अपने हैं, कोई पराया है ही नहीं। लेकिन यह कहाँ सम्भव हो पाता है। सभी अपने-पराए के दायरे में बँधे हैं। इन सीमित दायरों से कोई भी मुक्त नहीं हो पाता। मेरा धर्म- मेरी जाति, मेरे लोग । “दर्द भी दवा भी” ज़िन्दगी दर्द भी है, ज़िन्दगी दवा भी है ।सच ही तो है एक व्यक्ति हमें बुरा-भला कह कर चला जाता है तो दूसरा हमारी तकलीफ़ों को, पीड़ाओं को महसूस करता है, मरहम लगाता है, सान्त्वना देता है और हमारे साथ खड़ा होता है। परस्पर का साथ सहयोग ही तो दुःख-दर्द की दवा बनता है। यूँ आज कल जग के “मिथ्या बंधन” में ही दिल उदास रहता है। आपस का भरोसा ख़त्म हो गया है। विश्वास नहीं रहता। बदल गया है दुनिया का चलन। काश! मिट जाता दिलों से वैमनस्य भाव। मानव राग-द्वेष व वैर से ऊपर उठ कर क्यों नहीं जी पाता है । उस एक ईश्वर के अंश सभी हैं फिर परस्पर परायापन कैसा और क्यों ? स्व से ऊपर उठ कर क्यों विचार नहीं कर पाता?
डॉ. मुक्ता
मुक्ता जी की सभी नज़्में सीधे-सादे शब्दों में गहन चिंतन-मनन की बातें करती हैं। कभी ऐसा भी लगता है मानो सीधा ईश्वर से संवाद करती हैं। प्रश्न पूछती हैं, समाधान मांगती हैं। ’जाने क्यों मन’ खोया रहता है। जग के मोह-माया में भटका मन खोया ही तो रहता है। उलझनें सुलझाते-सुलझाते और भी उलझ ही जाता है। “नव वर्ष की आमद” नव वर्ष ,नव उत्कर्ष, भोर की स्वर्णिम रश्मियाँ जीवन में उमंग भर देती हैं। हर दिन एक नया दिन है। हर दिन का स्वागत करें पूरे जोश पूरे उत्साह से करें व वैराग्य भाव भी रखें । मोह में इतना भी न उलझें कि बिछुड़ना घातक हो जाए। कारण कुछ भी अपने साथ नहीं जाना है। हर कोई चाहे कितना भी बलशाली-शक्तिशाली क्यों न हो, कुछ भी अपने साथ ले कर नहीं जा पाता है। यही जीवन का अंतिम सत्य है। जब धरा का धरा पर ही धरा रह जाना है तब मोह कैसा और मौत से भी क्यों घबराना है।
“सब यहीं रह जाना है” सब कुछ जानते-समझते हुए भी यह इंसान न जाने क्यूँ ख़ुद को धोखा ही देता रहता है। “परेशान हर इंसान है,” “हुनर सीख ले” हर हाल में ख़ुश रहने का। हुनर यही कि सबको “अपना बनाता चल” बस फिर बेफिक्र कटेगी ज़िन्दगी। ऊपर वाले पर भरोसा कर। जिसने जन्म दिया है, वही पालन भी करेगा । आज दुःख है तो कल सुख भी देगा। यह विश्वास यह भरोसा विकसित कर। आस्था और विश्वास पर टिकी ज़िन्दगी ही सुखी ज़िन्दगी हो सकती है।
लेखिका की सूक्ष्मावलोकन की दृष्टि वातावरण में बिखरे गहरे सिद्धान्तों को उजागर करती है। सरल-सहज भावाभिव्यक्ति विचार और भाव सम्प्रेषण में सफल है। कहीं-कहीं आवश्यकतानुरूप क्षेत्रीय भाषा का पुट भी मिलता है। कुछेक रचनाएँ हैं जैसे “मनवा मानत नाहीं” कह कर उस समाज, उस वर्ग के साथ निकटता व आत्मीयता का भाव रखते हुए अपनी बात बखूबी उस वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास किया है।
साहित्य जगत् में मुक्ता जी का नाम वर्षों पुराना है। सतत साहित्य साधना में रत मुक्ता जी ने हर विधा में लिखने की कोशिश की है और सफल लेखिका के रूप में साहित्य जगत में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। डॉ० मुक्ता जी राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हैं।साहित्य अकादमी और ग्रंथ अकादमी की निदेशक रह चुकी हैं। वर्तमान में स्वतंत्र लेखिका के रूप में कार्यरत हैं। मेरे लिए तो मेरे मन में मुक्ता जी के प्रति एक अलग ही विशिष्ट स्थान है। मुक्ता जी की सशक्त लेखनी को नमन। भाव सम्प्रेषण और अपने विचारों को सभी तक पहुँचाने में सफल साहित्यकार के रूप में आप प्रसिद्धि प्राप्त चुकी हैं। अनेकों प्रमुख संस्थाओं से पुरस्कृत हो चुकी हैं। आप इसी तरह अपने विचारों और भावों से जग को समृद्ध करती रहें, आपकी पुस्तकें लोगों के मन में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाती रहें–यही ईश्वर से प्रार्थना है।
हर रचना एक महत्वपूर्ण संकेत करती है। संदेश देती है। सीख देती है। पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक !
अशेष शुभकामनाएँ !
समीक्षक – डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘
पूर्व व्याख्याता-मनोविज्ञान, बी.एच.यू., वाराणसी
मूलतः बनारस से, स्थायी निवास – फरीदाबाद, हरियाणा, भारत।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना जी द्वारा लिखित “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष ” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०२ ☆
☆ “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष” – लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक : स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष
लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ स्मृतियों का वोल्टेज: कर्मयोग और जीवंत अनुभवों की प्रेरक साहित्यिक यात्रा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति ‘स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन, मेरा संघर्ष’, सफल इंजीनियर अनिल अस्थाना जी के करियर का लेखा-जोखा, सिद्धांतों की आंच पर तपे कर्मयोगी के अनुभवों का सार है।
यह आत्मकथा पाठक को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव फुलेस की धूल भरी पगडंडियों से विद्युत मंडल के शीर्ष नीति-निर्धारक पदों तक की शब्द यात्रा पर ले जाती है। पूरी पुस्तक में लेखक ने अपनी स्मृतियों को एक ऐसे प्रवाह में पिरोया है कि पाठक स्वयं को उस कालखंड और उन परिस्थितियों का हिस्सा महसूस करने लगता है।
लेखक ने अपनी जड़ों और पारिवारिक पृष्ठभूमि का चित्रण बहुत ही आत्मीयता और यथार्थ भाव से किया है। उनके पिता द्वारा संघर्षों के बीच गढ़े गए स्वाभिमान और श्रम की गरिमा ने लेखक के व्यक्तित्व की आधारशिला रखी। पंतनगर विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान ‘श्रम की गरिमा’ के जो पाठ उन्होंने सीखे, चाहे वह घास काटना हो या खेल के मैदान की चुनौतियां, वे उनके आगामी पेशेवर जीवन में मार्गदर्शक सिद्धांत बने।
बीएचयू से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदिशा में उनकी पहली पोस्टिंग ने उन्हें यह अहसास कराया कि वास्तविक इंजीनियरिंग फाइलों के बजाय ग्रामीण भारत के उन अंधेरे कोनों में है, जहाँ बिजली की एक किरण जीवन बदल देती है।
लेखक के पेशेवर सफर में रायसेन के घने जंगलों की चुनौतियाँ हों या ग्वालियर की वर्कशॉप में किए गए नवाचार, हर अध्याय उनके ‘लीक से हटकर’ सोचने की क्षमता को दर्शाता है। विशेष रूप से रीवा में उनके कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और बिजली चोरों के खिलाफ की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ उनके निर्भीक और स्पष्टवादी चरित्र को रेखांकित करती है।
यह पुस्तक व्यवस्था के भीतर रहकर मेहनत, समर्पण और ईमानदारी के साथ काम करने की जटिलताओं और उनसे उबरने की कला को सादगी से साझा करती है।
लेखक का दक्षिण कोरिया यात्रा का अनुभव और वहां से सीखे गए प्रबंधन के सूत्र भारतीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने की उनकी दूरदृष्टि का परिचय देते हैं।
व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के संतुलन को लेखक ने अपनी पत्नी डॉ. नीलम अस्थाना के सहयोग और समर्पण के माध्यम से सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वे स्वीकार करते हैं कि एक सफल जीवन के पीछे पारिवारिक संबल और विश्वास की कितनी बड़ी भूमिका होती है। सेवानिवृत्ति के बाद की उनकी ‘दूसरी पारी’ का विवरण, जिसमें ब्लॉगिंग, अध्यात्म और देश-विदेश की यात्राएं शामिल हैं, यह संदेश देता है कि सक्रियता और रचनात्मकता किसी उम्र की मोहताज नहीं होती।
अंततः, ‘स्मृतियों का वोल्टेज’ एक ऐसी रचना है जो प्रवाही भाषा और रोचक संस्मरणों के माध्यम से पाठकों को प्रेरित करती है। यह केवल एक व्यक्ति की विजय गाथा मात्र नहीं, बल्कि उन सभी ईमानदार अधिकारियों के संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने सार्वजनिक सेवा में नैतिकता के उच्चतम मानक स्थापित किए। यह कृति युवा पीढ़ी, विशेषकर, उभरते हुए युवा इंजीनियरों के लिए एक ‘प्रकाश-स्तंभ’ की तरह है, जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर अडिग रहने का हौसला प्रदान करती है।
इस लेखन के लिए मै व्यक्ति गत रूप से मेरे वरिष्ठ आदरणीय अस्थाना जी का अभिनंदन करता हूं। उनसे अब अन्य विभिन्न विधाओं में और भी किताबों की प्रतीक्षा रहेगी, क्योंकि उन्हें सोशल मीडिया पर नियमित पढ़ने मिल रहा है।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ तुमसे क्या छुपाना – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ☆
उपन्यास: तुमसे क्या छुपाना
उपन्यासकार : राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
प्रकाशक – युगधारा फाउंडेशन
पृष्ठ संख्या – २८८
मूल्य – ₹ ३८०/-
समीक्षक – डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र
☆ क्षय मुक्त भारत की संकल्पना को आधार बनाकर लिखा गया संभवतः प्रथम उपन्यास – डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ☆
संभवतः राजेश कुमार सिंह “श्रेयस” जी ऐसे पहले साहित्यकार हैं जिन्होंने २०२५ तक क्षय मुक्त भारत की संकल्पना को आधार बनाकर कोई उपन्यास लिखा हो। “श्रेयस” जी हिंदी साहित्य-पटल पर एक रचनाकार के रूप में अपनी उपस्थिति विगत कई वर्षों से लगातार दर्ज़ करते रहे हैं। “काव्य कथा वीथिका”, “कविता के फूल”, “मानस में गुरु गंगा महिमा” और “गद्य द्रुपद” उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियां हैं। “तुमसे क्या छुपाना” उनका पहला उपन्यास है। हालांकि इस उपन्यास के केंद्र में क्षय रोग है, किंतु उसके साथ ही यह देवंती के संघर्ष की कहानी भी है। सौ से अधिक चरित्रों को लेकर लिखा गया ये एक बृहत उपन्यास है। श्रेयस जी इस उपन्यास की नायिका को एक गरीब तबके से उठाते हैं और उसको व्यक्तित्व विकास के शिखर पर पहुंचा देते हैं।
श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
सुखदेव और देवंती, ये कहानी एक पिता और पुत्री के भावनात्मक रिश्ते की भी है। जिस लड़की की मां उसके बचपन में ही गुजर गई हो उसके पिता को पिता के साथ – साथ एक मां का दायित्व भी निभाना पड़ता है। सुखदेव ने देवंती को उसकी मां सुरसती की कमी कभी भी महसूस नहीं होने दी। ये कहानी सुधीर और रामानंद जैसे कलुषित चरित्र की भी है। व्यभिचार ही जिसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है। जिसके लिए गांव-समाज के रिश्ते भी मूल्यहीन हो जाते हैं। ये कहानी देवंती और शशांक के उज्ज्वल प्रेम की भी है। एक ऐसा प्रेम जिसमें वासना को स्थान नहीं है। ये कहानी भावेश जैसे निःस्वार्थ सेवक की भी है जो समाज सेवा में शशांक के पथ – प्रदर्शक का कार्य करता है। तो वहीँ ये कहानी रामचन्दर मुखिया जैसे दोहरे चरित्रों की भी है।
सुरसती के चरित्र से क्षय रोग को उठाया गया है जिसका उद्देश्य समाज में इस रोग के प्रति जागरूकता लाना है। इसमें श्यामलाल और रामचंद्र चौधरी (रामचन्दर मुखिया) जैसे धूर्त चरित्रों के साथ राजकुमारी चाची और जसवंत चाचा जैसे परोपकारी भी हैं।
दुर्गावती के माध्यम से इसमें दहेज़ प्रथा जैसे अभिशाप को भी उठाया गया है। दहेज़ रुपी दानव का आकार निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। श्रेयस जी इस प्रसंग के माध्यम से लोगों को दहेज़ मुक्त विवाह के लिए प्रेरित करने का प्रयास करते हैं।
इस उपन्यास में कोरोना की विभीषिका भी बड़े मार्मिक ढंग से दिखाया गया है।
कुछ लोग बाहर से नेक बने रहने का आडंबर डाले रहते हैं पर अंदर से वे उतने ही कुटिल होते हैं। बुधिया काकी का चरित्र भी कुछ ऐसा ही है। इसमें डॉ. साहनी और उनके बेटे राहुल द्वारा जर्जर हो चुके मानवीय मूल्यों को भी दिखाने का प्रयास किया गया है।
श्रेयस जी सामाजिक परम्पराओं, प्राचीन रीति – रिवाजों, ऋतुओं, नक्षत्रों, आदि की कितनी गहरी समझ रखते हैं ये इस उपन्यास में कई स्थानों पर दिखाई देता है। कुल मिलाकर ये एक पठनीय उपन्यास है जिसे हर हिंदी साहित्य प्रेमी को पढ़ना चाहिए।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है प्रो. अरुण कुमार भगत जी द्वारा लिखित “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०२ ☆
☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक ..’संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक’
लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत (सदस्य , बिहार लोक सेवा आयोग, पटना)
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन , नयी
दिल्ली
मूल्य : 325 रु, पृष्ठ 160
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।
\संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरुआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुजरना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है ।
संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है ।संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।
मेरा मानना है कि शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97)
शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
संपादन का शिल्प-विधान और शैली-पुस्तिका (पृष्ठ 98-108) संपादन में ‘शैली’ (Style Book) का क्या महत्व है, इस पर लेखक ने विशेष बल दिया है। भाषा-शैली की एकरूपता और शुद्धता ही किसी प्रकाशन की पहचान बनाती है। यह खंड भाषाई अनुशासन के प्रति लेखक की आदर्श प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
संपादन-प्रक्रिया, विलोम पिरामिड से चित्र-संपादन तक (पृष्ठ 109-140) अध्याय सबसे अधिक तथ्यात्मक और क्रियात्मक है। इसमें ‘आमुख (Lead) की बनावट’, ‘विलोम पिरामिड शैली’ (Inverted Pyramid) और ‘समाचार का पुनर्गठन’ जैसे गंभीर विषयों पर नवाचारी चर्चा की गई है। साथ ही, ‘चित्र-संपादन’ का समावेश यह बताता है कि विजुअल मीडिया के दौर में एक संपादक की आँखें कितनी पैनी होनी चाहिए।
मुझे स्मरण है कि मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार ‘ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था, लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे , पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई, और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।
आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया । जब तक एक खबर पर भरोसा करो , उसका खंडन आ जाता है। खबरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टि कोण से यह किताब अध्ययन मनन और सीखने , पढ़ते , गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।
मेरी समझ में असंपादित न्यूज की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गई थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है।
पुस्तक में पृष्ठ-सज्जा और अभिकल्प (पृष्ठ 141-160) पर पूरा अध्याय है।
पुस्तक का समापन ‘पृष्ठ-सज्जा’ (Page Layout) के संतुलन और सौंदर्यबोध के साथ होता है।
एक संपादक को केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि रिक्त स्थान और विजुअल बैलेंस का भी ज्ञान होना चाहिए, यह इस खंड का मुख्य संदेश है। प्रकाशन रीडर्स फ्रेंडली होना चाहिए। छोटे अक्षरों में बेतहाशा पठनीय सामग्री उड़ेल देना उचित नहीं होता।
यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।
प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तार पूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है।
पत्रकारिता जगत से जुड़े हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है । किताब संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला में पारंगत बनाती है।
पुस्तक अमेजन पर सुलभ है। संदर्भ हेतु अपने स्टडी सेल्फ में रखने की अनुशंसा अपने पाठकों को करता हूं।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. सुलभा कोरे जी द्वारा लिखित “शिव और शिवालय – ज्ञात से अज्ञात तक…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०१ ☆
☆ “आपकी अरु” – लेखिका… अर्चना नायडू ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
कृति : आपकी अरु
कहानी संग्रह
प्रकाशक इंडिया नेट बुक्स , नोएडा
लेखिका : अर्चना नायडू
☆ स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध करती कहानियाँ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ई. अर्चना नायडू जी द्वारा रचित कहानी संग्रह ‘आपकी अरु’ समकालीन हिंदी साहित्य में एक ताजीऔर मानवीय संवेदनाओं से भरपूर कृति है।
यह संग्रह वर्तमान परिवेश की स्त्री विमर्श लेखन केंद्रित जीवंत समस्याओं और मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म जालों को बड़ी ही कुशलता से बुनता है। पुस्तक की अनूठी विशेषता इसकी केंद्रीय पात्र ‘अरु’ है। लेखिका ने एक ही नाम के माध्यम से स्त्री के विभिन्न आयु वर्गों किशोरी, युवती, और प्रौढ़ा, की मानसिक अवस्थाओं और उनके संघर्षों का प्रभावी चित्रण किया है। एक तरह से उपन्यास ही है आपकी अरु । अरु के बिंब तथा परिवेश में हम आप और पाठिकाएं स्वयं के ही कई स्वरूप देख समझ सकते हैं । यह किताब महीने से ज्यादा मेरी तकिया के निकट टेबल पर अपनी स्थिति बदलती रही है।इसकी कहानियों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संस्कार, आधुनिकता का द्वंद्व और टूटते-जुड़ते रिश्तों की कसक दिखाई देती है। अर्चना जी का लेखन ‘मालती जोशी’ जी की परंपरा को आगे बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा अलंकार है।
’लिव-इन रिलेशनशिप’, कहानी में लेखिका ने इस आधुनिक मुद्दे को पारिवारिक दृष्टिकोण से देखा है। जब अरु को पता चलता है कि उसका बेटा आदित्य और सौम्या एक साथ रहते हैं, तो वह क्रोध करने के बजाय समझदारी और सहजता दिखाती है। वह सौम्या से कहती है “तुमने बिरला मंदिर नहीं देखा है न, चलो हम परसों चलते हैं… हम मंदिर में ही तुम दोनों की इंगेजमेंट कर देते हैं। क्यों ठीक है न मेरी बहू रानी!”, यह संवाद पीढ़ीगत अंतराल को सहानुभूति से पाटने का सुंदर उदाहरण है।
इसी प्रकार ’पुनर्मिलन बनाम रीयूनियन’ कहानी दबी हुई प्रेम भावना और वर्तमान कर्तव्य के बीच के संतुलन को दर्शाती है। कॉलेज के पुराने साथी ऋषि कुमार से मिलने पर अरु के मन में उद्वेलन होता है, लेकिन वह एक आदर्श भारतीय स्त्री की तरह अपनी भावनाओं को अनुशासित रखती है। अंत में वह कंधे पर सिर रखकर मौन स्वीकृति देती है, जो भारतीय समाज की ‘प्रेम को दबाकर जीने वाली स्त्री’ के यथार्थ को स्पष्ट करता है।
’आपकी अरु’ (शीर्षक कहानी) , कहानी पिता-पुत्री के निश्छल प्रेम और कर्तव्यपरायणता पर आधारित है। पिता की मृत्यु के शोक के बीच भी अरु अपनी परीक्षा देने जाती है क्योंकि उसके भाई ने कहा था, “अगर अरु यह एग्जाम देगी तो यह पापा के लिए अंतिम श्रद्धांजलि होगी”। अरु तनाव में भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है, जो उसके चरित्र की दृढ़ता को रेखांकित करता है।
कहानी लेखन का आर्ट इन कहानियों में परिलक्षित होता है। अर्चना नायडू की शैली सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है। उनके वाक्य छोटे और स्पष्ट हैं, जो पाठक को पात्रों के साथ सीधे संवाद का अनुभव कराते हैं। उन्होंने ‘यथार्थ’ को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। भाषा में एक सहज लय है, जो कहानी को पानी की धार की तरह बहने में मदद करती है। उनके पास समृद्ध शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति की क्षमताएं हैं।
इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त विरोधाभासों और विडंबनाओं को दूर कर एक सकारात्मक राह दिखाना है। लेखिका का लक्ष्य केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ना’ और खत्म होते जा रहे मानवीय मूल्यों को बचाना है। ये कहानियाँ एक बेहतर मनुष्य बनने की मर्मस्पर्शी शिक्षा देती हैं।
’आपकी अरु’ केवल कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह बदलते हुए समाज का दर्पण है। जिस सहजता से अर्चना नायडू जी ने स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध किया है, वह आने वाले समय में निश्चित ही उन्हें कथा-साहित्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाएगा। भविष्य में यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक मार्गदर्शिका सिद्ध होगी जो आधुनिकता की चकाचौंध में भी अपनी जड़ों और संस्कारों की मिठास को जीवित रखना चाहते हैं। इस लेखन में मानवता को जोड़ने की जो प्रबल संभावना है, वह निसंदेह इसे एक दीर्घजीवी कृति बनाती है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं अर्चना जी के इस सारस्वत प्रयास के साथ हैं। इंडिया नेट बुक्स से डॉ संजीव कुमार चुनिंदा साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं, उन्हें भी बधाई।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित “साफ़ – सुथरा…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०० ☆
☆ “साफ़ – सुथरा – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति : लघुकथा संग्रह साफ सुथरा
लेखक :सुरेश पटवा
प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन भोपाल
मूल्य : 399 रु
☆ समकालीन विसंगतियों के बीच एक ‘साफ़-सुथरा’ हस्तक्षेप – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लघुकथा समकालीन साहित्य की एक ऐसी सशक्त विधा है, जो सीमित शब्दों में जीवन के अनगिन पहलुओं को छूने की सामर्थ्य रखती है। इसी विधा की गरिमा को केंद्र में रखते हुए सुरेश पटवा का नवीन लघुकथा-संग्रह ‘साफ़-सुथरा’ (मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल) सामने आया है। यह संग्रह न केवल विधागत अनुशासन को बनाए रखता है, बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय विमर्श को नई दिशा भी प्रदान करता है। संग्रह की विविध लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों, धार्मिक विडंबनाओं और मानवीय अंतर्द्वंद्वों की गहरी पड़ताल करती हैं, जिनसे लेखक की वैचारिक सघनता स्पष्ट रूप से उजागर होती है।
संग्रह की कथाभूमि अत्यंत व्यापक है। जहाँ एक ओर ‘तीन-तलाक’ जैसी कथा मुस्लिम समाज में व्याप्त धार्मिक पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी होती है, वहीं ‘सौम्या का ख़्वाब’ शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता की सूक्ष्म व्याख्या करती है। लेखक यहाँ मनोवैज्ञानिक गहराई से स्पष्ट करता है कि वास्तविक संघर्ष सपनों को देखने में नहीं, बल्कि उन्हें हर हाल में ज़िंदा रखने में है। राजनीति के क्षेत्र में सामाजिक रूप से हाशिये पर पड़ी अस्मिताओं, जैसे ट्रांसजेंडर समुदाय के उभार को ‘काँटे की टक्कर’ में बखूबी चित्रित किया गया है, जो हमारे लोकतंत्र की रूढ़ियों पर एक तीखा कटाक्ष है।
सुरेश पटवा के लेखन में दार्शनिकता और व्यंग्य का अनूठा संगम है। ‘भगवान’ जैसी कथा बच्चों के भोले प्रश्नों के माध्यम से ईश्वर की संकल्पना को संवेदनात्मक रूप में प्रस्तुत करती है, तो ‘लालच पर काबू’ आत्मनिरीक्षण के जरिए मनुष्यता की कसौटी को परिभाषित करती है। लोककथा की पुनर्रचना करती ‘राजा का परिधान’ आज के राजनेताओं के मिथ्याचार और चाटुकारिता पर प्रहार करती है, जहाँ सत्य कहने के लिए एक बच्चे जैसा निष्कलुष साहस अनिवार्य बताया गया है।
साहित्यिक जगत की विसंगतियों पर भी लेखक की दृष्टि पैनी रही है। ‘लंच का समय’ और ‘छपास सम्मान सुख में सेंध’ जैसी कथाएँ साहित्यिक आयोजनों के बौद्धिक दिखावे, खोखली आत्ममुग्धता और सम्मानों के पीछे छिपे सांस्कृतिक संकट को उजागर करती हैं। इसके विपरीत, ‘सच्चा हिंदुस्तानी’ जैसी रचनाएँ भारत की साझी संस्कृति और सहिष्णुता की पक्षधर बनकर उभरती हैं, जो यह संदेश देती हैं कि सच्ची राष्ट्रभक्ति धार्मिक कट्टरता से नहीं बल्कि मनुष्यता से शुरू होती है।
संग्रह की शीर्षक कथा ‘साफ़-सुथरा’ प्रतीकात्मकता के सहारे बाहरी स्वच्छता बनाम नैतिक गंदगी पर गहरा प्रश्न खड़ा करती है। यह कहानी अंतरात्मा की शुचिता को सर्वोपरि मानती है। अंततः, सुरेश पटवा का यह लेखन एक जागरूक दृष्टा का लेखन है, जो हास्य-व्यंग्य और तर्क की त्रयी से एक सशक्त सामाजिक आलोचना निर्मित करता है। यह संग्रह सिद्ध करता है कि लघुकथा केवल क्षणिक प्रभाव नहीं, बल्कि एक गहन विचार का बीज है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक अंकुरित होता रहता है।