हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆ # “होली के रंग में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “होली के रंग में…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆

☆ # “होली के रंग में…” # ☆

 

रंग-बिरंगी पिचकारी में

रंग-बिरंगे रंग है

पिचकारी के रंगों से

भीग रहे अंग अंग है

 

गली गली में हुड़दंग है

तरुणाई  तो उदंड है

रंग गुलाल लगा नाच रहे हैं

जोश इनमें प्रचंड है

 

सजनी की है कंचन काया

साजन ने है रंग लगाया

आरक्त हो गए गाल गुलाबी

निखर गई है सजनी की काया

 

दोनों रंगों में घुल गए हैं

दिन दुनिया को भूल गए हैं

डूबे हुए हैं फाग की मस्ती में

बाहों में एक दूजे के झूल गए

 

भांग खाओ या मिठाई

या पी जाओ खूब ठंडाई

भांग की मस्ती जब चढ़ती है

तो बस चढ़ती है जाती है भाई

 

खूब रंगों से खेलो होली

संग हो प्रीतम या हमजोली

अभद्र आचरण को त्याग कर

भाई बोलो प्रेम की बोली

 

रंगों से है रंगीन जवानी

रंग नहीं तो जीवन है फानी

रंग है जीवन का मर्म

रंग बिना अधूरी है कहानी

 

रंगों में डूब जाओ यारों

रंगों में सब भूल जाओ यारों

एक गुलाल का टीका लगाकर

सबको गले लगाओ यारों /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९७ – कान्हा तेरी बंशी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कान्हा तेरी बंशी।)

☆ अभिव्यक्ति # ९७ ☆ कान्हा तेरी बंशी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

कान्हा तेरी बंशी मन बिसराए,

सारे जगत में सबको भाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जब जब राधा तान सुने ये,

दौड़ के जमना तट को आए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जमना जल भी रुक रुक जाए,

बंशी बजाके रास रचाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

पशु पक्षी भी राह तकत हैं,

कब तू अपनी बंशी बजाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

बंशी तेरी,पर तू सबका,

सबका मन हर्षाए,

कान्हा तेरी बंशी..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – २ – रेडियो -☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – २ – रेडिओ – ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी

“नमस्कार श्रोतेहो… हे आकाशवाणीचे पुणे केंद्र आहे. सकाळचे पाच वाजून सत्तावन्न मिनिटे आणि बारा सेकंद झाले आहेत. आपल्या आजच्या सभेला सुरुवात करु या मंगलध्वनीने…

आणि मग तो मंगलध्वनी सुरु व्हायचा. अगदी लहानपणी पासून दिवसाची सुरूवात अशीच होते. आणि दर पाच मिनिटांनी बदलणारे कार्यक्रम वेळ सांगतात. सकाळच्या घाईत घड्याळ बघावे लागत नाही. ते काम रेडिओ ऐकला की आपोआप होते. शिवाय ते कार्यक्रम ज्ञानात भर घालतात हा खूप मोठा आणि महत्वाचा फायदा! आजही मला लहानपणी निवेदन करणारे निवेदक व त्यांचे निवेदन आठवते. सुधा नरवणे प्रादेशिक बातम्या द्यायला आल्या की शाळा कॉलेजला निघायची योग्य वेळ झाली हे लक्षात यायचे. आणि त्या बातम्या संपल्या की उशीर झाला असे समजायचे.

सकाळी सकाळी रेडिओ लावायची जुनी सवय बऱ्याच जुन्या आठवणी जाग्या करते. आज गाणे ऐकले शब्द शब्द जपून ठेव एकीकडे काम चालू होते. आणि इतके अर्थपूर्ण गाणे ऐकत असताना माझ्या मनात कसे विचार येतात याचे हसू आले. आणि जपून ठेवलेल्या वस्तू आठवायला लागल्या. आणि कुठे कुठे जीव अडकतो याची गंमत वाटली.

परवा सहज कपाट आवरताना जरा पिवळसर पडलेली कॅरीबॅग सापडली. उघडून बघितले तर रेडिओचे लायसन सापडले. आता असे वाटेल हा काय प्रकार आहे? पण पूर्वी (मी लहान असताना) रेडिओ साठी परवाना आवश्यक होता. एका वर्षा साठी १/२ रुपये पोस्टात भरून त्या पुस्तकावर तिकीट लावून आणावे लागायचे. आणि घरात टेबल सारखे मोठे रेडिओ असायचे तो नीट ऐकण्यासाठी ३/४ फूट लांबीची व २/३ इंचाची तांब्याची जाळी असलेली पट्टी घरात लावावी लागायची. आणि छोटा रेडिओ (ट्रांझिस्टर) सायकलच्या हॅण्डलला लावून लोक ऐटीत फिरायचे. आणि ज्याच्याकडे लायसन नसेल तो लपवून ट्रांझिस्टर नेत असे.

हे सर्वच रेडिओ मात्र नवनवीन कपडे घालायचे.

त्यात गृहिणीची कलाकुसर व दृष्टी याची जणू परीक्षा व्हायची. काही जणी तर त्यावर स्वहस्ते भरतकाम करायच्या आणि कौतुक मिळवायच्या.

आमच्या कडे मोठ्ठा रेडिओ होता. लांबून बघितले तर पुस्तकांचे कपाट वाटावे असा होता. मी कायम त्याच्या बटणावर पाय ठेवून वर चढून दूध प्यायला बसायची. मग जेवायला बसायची. ही बाल सवय त्याचा उपयोग कळायला लागल्यावर सुटली.

विशेष म्हणजे या रेडिओचे सर्वत्र दर्शन होते. शेतात, मळ्यात, चौकात, पारावर, बागेत कुठेही सूर ऐकू येतात. मधल्या काही काळात असे भय वाटत होते की सगळ्या आधुनिक साधनांच्या गदारोळात आपला रेडिओ लुप्त होईल का? पण रेडिओने आपले स्थान कायम ठेवले आहे. स्वरूप बदलले आहे. सुटसुटीत झाले आहे. पूर्वीच्या अडचणी (रेडिओ वापरातील) आता नाहीत. त्याने प्रत्येकाच्या मोबाईल मध्ये स्थान मिळवले आहे. आणि पेन सारखे छोटे स्वरूपही धारण केले आहे. आणि आता ऐकू येणारी स्टेशन्स सुद्धा वाढली आहेत.

काही वर्षांपूर्वी प्रसारित होणारे कार्यक्रम आधुनिक स्वरूप धारण करून पुन्हा प्रसारित होऊ लागले आहेत.

या रेडिओच्या अनंत आठवणी बऱ्याच जणांच्या मनात जागृत असतील.

रेडिओवर एक जाहिरात लागते. एक सखी दुसरीला विचारते, “कुटं ग शिकलिस एवढं ग्यान? ” लगेच दुसरी उत्तरते, “आपल्या रेडिओनं श्यानं केलंय की, तू बी ऐकत जा. ” हे ऐकून अगदी पटले. खरेच जे नियमित रेडिओ ऐकतात त्यांचे मन विविध माहिती, ज्ञान, आरोग्य, गृहिणींना मार्गदर्शन, मनोरंजन, यांनी भरून जाते. आणि या साठी वेगळा वेळ द्यावा लागत नाही. शिवाय डोळेही बिघडत नाहीत.

या रेडिओची सुरुवात भारतात १९२३ साली झाली. पण ती खाजगी कंपनी होती. आणि ती दिवाळखोरीत निघाली. नंतर १९३६ मध्ये ही कंपनी सरकारने ताब्यात घेतली आणि ऑल इंडिया रेडिओ असे नामकरण केले.

प्रासंगिक कार्यक्रम सादर करणे. हे तर रेडिओचे खास वैशिष्ट्य आहे.

रेडिओवर प्रसारित होणाऱ्या कार्यक्रमांवर लिहायचे म्हंटले तर एक वेगळाच लेख होईल.

आज जागतिक रेडिओ दिनाच्या निमित्ताने भारतातील रेडिओ विषयी काही लिहिण्याचा प्रयत्न केला आहे. हा विषय खूप मोठा आहे. जे माझ्या सारखे रेडिओ प्रेमी आहेत त्यांना नक्कीच असे वाटते, हा रेडिओ अजरामर होवो. या मनापासून शुभेच्छा!

© सुश्री विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२५ ☆ व्यंग्य – विदेश का गड़बड़झाला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘विदेश का गड़बड़झाला‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विदेश का गड़बड़झाला   

ऑस्ट्रेलिया से एक भारतीय लड़की ने वीडियो डाला। लड़की ने वहां के सिस्टम के बारे में जो बताया उसे सुनकर बहुत परेशान हूं। बताया कि  वहां भुगतान मेहनत के हिसाब से मिलता है, शैक्षणिक योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं। एक घंटे के श्रम के 25 डॉलर मिल जाते हैं और आदमी दिन में कम से कम 50 डॉलर कमा ही लेता है।

लड़की ने यह भी बताया कि वहां सबसे ज़्यादा भुगतान शारीरिक श्रम करने वालों— जैसे प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, खदान श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों— को मिलता है। इन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ का नाम दिया जाता है, और समाज में सबको बराबर सम्मान मिलता है, कोई ऊंचा नीचा का भेद नहीं।

लड़की की बात सुनकर दिमाग ख़राब हो गया। यह कैसा देश है, भाई, जहां पांचों उंगलियों को बराबर माना जाता है। हमारे देश में ऐसा हो जाए तो हाहाकार मच जाए। फिर जाति- प्रथा का मतलब ही क्या रह जाएगा? ऑस्ट्रेलिया में जिन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ कह कर अच्छा वेतन देते हैं उन्हें यहां दिन में चार-पांच सौ कमाने में देवता याद आ जाते हैं। समाज में इज़्ज़त पाने की बात करें तो  देश में इन ‘प्रोफेशनल्स’ को कोई बैठने के लिए स्टूल नहीं देता, कुर्सी की बात छोड़ दीजिए। ज़्यादातर को शस्य श्यामला भूमि पर ही आसन मिलता है। ‘डिगनिटी ऑफ लेबर’ यानी श्रम की प्रतिष्ठा का यह हाल है कि बड़ा आदमी वही माना जाता है जो अपने हाथ से लेकर पानी भी न पिये।

ऑस्ट्रेलिया जैसा किस्सा न्यूज़ीलैंड का भी सुनने को मिला था जहां मेरे एक परिचित प्रोफेसर किसी अध्ययन के लिए गये थे। वहां उनके दफ्तर में सफाई कर्मी आता था जिसे ‘जेनिटर’ कहते थे। जब प्रोफेसर साहब के भारत लौटने का वक्त आया तो जेनिटर ने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया और शाम को उन्हें अपनी कार से घर ले गया। वहां उनके लिए विशेष तौर से शाकाहारी भोजन तैयार कराया गया था। मैंने सोचा कि यदि भारत में कोई सफाई कर्मचारी हमें भोजन के लिए आमंत्रित करे तो हम उस आमंत्रण से बचने की कोशिश करेंगे। सोचेंगे कि इस बंदे के पास खुद के खाने को है या नहीं, या हमें ऐसे ही न्योत रहा है। लगेगा कि उसका दिमाग़ चल गया है।

हमारे यहां सबसे अधिक पैसा उन्हें मिलता है जो कम से कम श्रम करते हैं। कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों का भुगतान लाखों में होता है, लेकिन काम का आकलन कोई नहीं। इसीलिए मोटापे और उच्च रक्तचाप का रोना आम है। शारीरिक श्रम करने वाले का जीवन एक-एक दिन के हिसाब से चलता है। कल का कोई भरोसा नहीं। कभी एक अधिकारी के बारे में सुना था जिन्होंने अपना एक कोट कुर्सी पर स्थायी रूप से टांग दिया था। वे खुद दफ्तर से ग़ायब रहते थे, लेकिन किसी के पूछने पर कोट की तरफ इशारा कर दिया जाता था कि ‘यहीं कहीं गये हैं।’ ऐसे ही नौकरी करते-करते वे वैतरणी पार कर गये।

कुर्सी की शोभा बढ़ाने वालों को तनख्वाह के अलावा एक और भत्ता मिलता है जिसे रिश्वत-कम-कमीशन भत्ता कहते हैं। जितना बड़ा और ताकतवर पद, उतना ही ज़्यादा रिश्वत-भत्ता। कई अफसर हर सरकार के प्रियपात्र बने रहते हैं तो कई हर सरकार की आंख में चुभते हैं। हरियाणा में आई. ए. एस. खेमका जी हर छः महीने में ट्रांसफर झेलते अंततः रिटायर हो गये। उनके रिटायर होने पर बहुतों ने राहत की सांस ली होगी।

दूसरी तरफ, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक को पूरी मज़दूरी मिल जाए, वही बहुत है। उसमें भी ठेकेदार का कमीशन कटता है। बिना सुरक्षा- उपकरण के कहीं बिजली के खंभे पर सुधार के लिए चढ़ा दिया जाता है तो कहीं बिना सुरक्षा- उपकरण के गैस से भरे सीवर में उतार दिया जाता है। ‘चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम।’

ऐसे में हमें लगता है कि हमें अपने देश से परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन की तरह कुछ अधिकारियों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में भेजना चाहिए जो वहां के सिस्टम में ज़रूरी सुधार करवा सकें। अभी तो लड़की की बातें सुनकर मेरे दिमाग़ ने काम करना बन्द कर दिया है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९६ – वंदन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वंदन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९६ — वंदन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैंने देखा मेरी टूटी हुई वीणा ने स्वयं अपनी मरम्मत कर ली है। पर मैं तो वीणा के मामले में छलिया हूँ। मेरे पास वीणा हो सकती है, लेकिन मैं उसके तारों को झंकृत नहीं कर सकता। पर मेरी वीणा की बात कुछ और है। विशेष कर आज मेरी वीणा आकंठ जागृत थी। मैं चुप था। मेरी वीणा ने स्वयं गाया, “मॉरिशस पहुँचे उन प्रथम भारतीय मजदूरों को वंदन जिनकी कुदाल से इस देश की धरती पहली बार स्पंदित हुई थी।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

24 – 02 – 26

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२६ – शुष्क गले की ओर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

।। माँ सरस्वत्यै नमः।।

☆  संजय उवाच # ३२६ शुष्क गले की ओर… ?

कुछ दिन पहले राजस्थान के ग्रामीण अंचल में परिवार के एक विवाह समारोह में जाना हुआ। यह मेरा पैतृक प्रदेश है। परदेसी हो जाने पर भी यहाँ का सांस्कृतिक वैभव, माटी की सोंध, खान-पान का स्वाद और उसका सुवास भीतर गहरे तक बसे हैं। बचपन में देखे धूल उड़ाते टीबे या बालू के टीले अब दिखाई नहीं देते पर स्मृतियों पर धूल अभी नहीं जमी नहीं है। 

स्मृतियों की इस मधुर शृंखला को तब एकाएक झटका लगा, जब पैर से आकर कुछ टकराया। दृष्टि झुकी तो हतप्रभ रह गया। पैरों में मिनरल वाटर की एक सीलबंद बोतल पड़ी थी।

हुआ यूँ कि समारोह में विविध प्रकार के व्यंजनों के काउंटर लगे थे। एक काउंटर पर हजारों की संख्या में मिनरल वाटर की 200 मिलीलीटर वाली बोतलें थीं।

देखता हूँ कि कुछ बच्चे काउंटर से पानी की सीलबंद बोतल लेकर उन्हें खोले बिना, उनसे फुटबॉल खेल रहे हैं। मैं जड़वत हो गया। पानी को सिर नवाने वाला समाज, पानी को पैरों से ठोकर लग रहा है।

स्मृतिचक्र फिर बचपन में ले गया। पिताजी सेना में थे। उनका, भारत के विभिन्न राज्यों में स्थानांतरण होता रहता। हमारी वार्षिक छुट्टियों में माँ, हमें हमारे ननिहाल लेकर जाती। सामान्यतः यह विवाह का भी मौसम हुआ करता। इस अवधि में अनेक विवाह समारोहों में जाने का अवसर मिलता।

आज से लगभग पाँच दशक पूर्व के इन समारोहों में रामझरे से पानी से पिलाया जाता। रामझरा पानी संग्रह करने का लोटेनुमा पर आकार में बड़ा पात्र होता है, जिसमें जल पिलाने के लिए एक नली भी लगी होती है। उन दिनों काँसे से बने रामझरे उपयोग में लाए जाते थे। हमें पानी हथेलियों को आपस में जोड़कर चुल्लू से पीना होता था। राजस्थान में इसे ओक से पीना कहते हैं। हथेलियों को ठीक से बंद नहीं कर पाते तो बुज़ुर्गों से डाँट पड़ती कि पानी बर्बाद नहीं किया जा सकता।

नीति कहती है, ‘अति सर्वत्र वर्ज्येत।’ अति अंततः संकट का कारण बनती है।  मरुधरा में पानी को ठोकर लगाई जा रही है। पंचतत्वों में से एक है पानी। मनुष्य पंचतत्वों से बना है। मनुष्य पंचतत्वों को नष्ट करने पर तुला है। भावार्थ है कि मनुष्य भस्मासुर हो चला है।

बच्चों को मीठी झिड़की दी। पानी की  बोतलें एक स्थान पर जमा करने के लिए कहा। बच्चे खेल बंद करके भाग गए।

प्रश्नों से दूर भागने से प्रश्न समाप्त नहीं होते। विकास हो, वस्तुएँ उपलब्ध हों, सुविधा बढ़ें, यह सहज मानवीय भाव है पर विपुलता, जीवनावश्यक तत्वों का अपव्यय करे तो यह आशंका को जन्म दे सकता है। स्मरण रखा जाना चाहिए कि इसी अपव्यय के चलते जोहानिसबर्ग, विश्व में पहला बिना पानी का शहर होने के मुहाने पर है।

सिगरेट और अन्य तंबाकूयुक्त पदार्थों पर वैधानिक चेतावनी छपी होती है कि उनका सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। सोचता हूँ, समय आ गया है कि  मिनरल वॉटर की बोतलों पर छपा हो कि पानी की एक भी बूँद का अपव्यय, शुष्क गले की ओर एक क़दम है।

शेष चिंतन और आचरण अपना-अपना।

© संजय भारद्वाज 

प्रातः 3:29 बजे 28 फरवरी 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६९ – कविता – जोगी जी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है अप्रतिम रचना  जोगी जी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६९ ☆

जोगी जी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

सदाचार का डालिए,

चौक रंगीला द्वार।

सद्भावों की फाग गा,

मेटें सब तकरार।।

जोगी जी सा रा रा रा

बाधाओं की लकड़ियाँ,

दें होरी में बार।

पीर गुलेरी सब जलें,

बचे न एकऊ खार।।

जोगी जी सारा रा रा

राजनीति की होलिका,

करे नहीं तकरार।

नेता-अफसर कर सकें, लोकनीति से प्यार।।

जोगी जी सारा रा रा

भुज भरकर मिलिए गले,

बढ़े खूब अपनत्व।

संसद से दूरी मिटे,

बढ़े खूब बंधुत्व।।

जोगी जी सा रा रा रा

सुख पिचकारी दें भिगा,

रंग हर्ष का, डाल।

मस्तक पर शोभित रहे,

यश का लाल गुलाल।।

जोगी जी सा रा रा रा

हिंदी मैदा माढ़िए,

उर्दू मोयन डाल।

देशज मेवाएँ भरें,

गुझिया बने कमाल।।

जोगी जी सा रा रा रा

परंपरा बेसन बने,

नवाचार हो तेल।

खांय-खिलाएँ पपड़ियाँ,

जी भर होली खेल।।

जोगी जी सा रा रा रा

कविता पिचकारी बना,

भरें छंद का रंग।

रस-लय की ठण्डाई पी,

करें गीत गा जंग।।

जोगी जी सा रा रा रा

फाग कबीरा गाइए, भर मस्ती में झूम।

ढोल-मँजीरा बजाएँ, खूब मचाएँ धूम।।

जोगी जी सा रा रा रा

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१३.३.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (2 मार्च से 8 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (2 मार्च से 8 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

मैं पंडित अनिल पाण्डेय ने आपसे वादा किया था कि मैं हर सप्ताह आपको श्री हनुमान चालीसा के चौपाइयों के संपुट पाठ से होने वाले होने वाले मंत्रवत फल के बारे में आपको बताऊंगा। इसी श्रेणी में आज की चौपाई है।

“राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।। “

हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने पर हनुमत कृपा से आत्मिक और शारीरिक बल की प्राप्ति होती है।

अगली चौपाई के संपुट पाठ से प्राप्त होने वाले फल के बारे में इस वीडियो के अंत में बताया जाएगा।

अब मैं आपको इस सप्ताह ग्रहों की स्थिति के बारे में बताऊंगा। इस पूरे सप्ताह सूर्य, मंगल, राहु और वक्री बुध कुंभ राशि में रहेंगे। वक्री गुरु मिथुन राशि में और शनि मीन राशि में गोचर करेंगे। शुक्र प्रारंभ में कुंभ राशि में रहेगा तथा एक तारीख के 11:46 रात से मीन राशि में प्रवेश करेगा। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह सावधानी पूर्वक कार्य करने पर आपको कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ नरम-गरम संबंध रहेंगे। गलत रास्ते से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सफलता दायक है। चार तारीख के दोपहर के बाद से पांच और 6 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। थोड़े से प्रयास से ही आपके पास धन आ सकता है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह मिश्रित फल वाला होगा। आपको अपने साथियों का सहयोग कम मिलेगा। आपके कार्यालय में सावधान भी रहना चाहिए। भाई और बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए दो-तीन और चार तारीख कार्यों को करने के लिए मददगार है। 7 और 8 तारीख को आपको बहुत सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपके लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहने की संभावना है। पिताजी और जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। माता जी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। भाग्य के स्थान पर अपने परिश्रम पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपका आपके माता जी और पिताजी का तथा जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा भाग्य से आपको मदद मिलेगी दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करें धन आनंद धन आने की उम्मीद है भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे इस सप्ताह आपके लिए साथ और आठ मार्च किसी भी कार्य को करने के लिए फलदायक है सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है इस सप्ताह आपको चाहिए कि आपका दिन प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से सामान्य मदद ही मिल पाएगी। थोड़े बहुत धन की उम्मीद की जा सकती है। भाई बहनों के साथ संबंधों में कोई विशेष प्रगति नहीं होगी, अर्थात जैसे संबंध चल रहे हैं वैसे ही रहेंगे। कर्मचारियों को उनके सहकर्मियों की मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर ज्यादा यकीन करना पड़ेगा। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। इस सप्ताह आपके लिए दो, तीन और चार तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि एवं नए प्रेम संबंध बनना भी संभव है। आपके माता-पिता और जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से थोड़ी मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में ध्यानपूर्वक कार्य करने से सफलता मिल सकती है। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी खराबी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। दो-तीन और चार के दोपहर तक का समय सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपका, आपके जीवन साथी का और माता जी तथा पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से मामूली मदद मिल सकती है। आपको इस सप्ताह अपने पुत्र पर ध्यान देना चाहिए। छात्रों की पढ़ाई में काफी उथल-पुथल रहेगी। शत्रुओं से संधि करने का यह सबसे अच्छा समय है। अगर आपके कोई शत्रु हैं तो आपको इस समय संधि के लिए प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में कोई भी रिस्क ना लें। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ मार्च किसी भी कार्य को करने के लिए परिणाम दायक हैं। चार-पांच और 6 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

यह सप्ताह आपके पुत्र के लिए काफी अच्छा रहेगा। उसको तरक्की मिल सकती है। छात्रों की पढ़ाई उत्तम चलेगी। कर्मचारीयों और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको अपने साथियों और अधिकारियों से सहयोग प्राप्त होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। उनके प्रतिष्ठा में कमी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 2-3 और 4 तारीख कार्यों को करने के लिए शुभ हैं। सात और 8 तारीख को आपको कोई भी कार्य बहुत सजगता पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनका जन सम्मान बढ़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ऊंच नीच के चलेंगे। भाग्य इस सप्ताह आपका साथ देगा। लंबी यात्रा का भी योग बन सकता है। कर्मचारीयों और अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 मार्च लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। मात्र थोड़ी कम हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। पेट के रोग में आराम मिल सकता है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह कोई सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। भाग्य से कोई विशेष मदद नहीं मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित हैं। दो-तीन और चार तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

आपके थोड़े से प्रयासों से ही इस सप्ताह आपके पास धन अच्छी मात्रा में आ सकता है। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति सतर्क रहें। इस सप्ताह आपके लिए दो-तीन और चार तारीख के दोपहर तक का समय परिणाम दायक है। चार की दोपहर के बाद से लेकर 5 और 6 तारीख को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक तथा रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास काफी अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। अपने आत्मविश्वास के कारण आप कई स्थानों पर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। आपका और आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। जीवनसाथी को थोड़ी परेशानी हो सकती है। कचहरी के काम कार्यों में बहुत सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए चार की दोपहर के बाद से लेकर 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

आईये अब हम श्रीहनुमान चालीसा के आज की दूसरी चौपाई के बारे में चर्चा करते हैं।

आज की दूसरी चौपाई है:-

“महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी। “

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से व्यक्ति की मानसिक स्थिति ठीक होती है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५ आणि ६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५ आणि ६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

– – – श्लोक ५

मना पापसंकल्प सोडून द्यावा

मना सत्यसंकल्प जीवी धरावा |

मना कल्पना ते नको विषयांची |

विकारी घडे हो जनी सर्व ची ची ||

अर्थ : समर्थ मनाला बजावत आहेत की हे मना तू पापसंकल्प (वाईट विचार)सोडून दे आणि त्या जागी सत्यसंकल्पांना (सद्विचार किंवा परमात्मास्वरूपाचे ज्ञान) स्थान दे. हे मना तू विषयांची कल्पना देखील करू नकोस कारण विषयातून नाना प्रकारचे विकार निर्माण होतात. आणि मग तशा प्रकारची कृत्ये हातून घडतात. त्यामुळे लोकांमध्ये छी थू होते.

आधीच्या श्लोकात समर्थ म्हणतात, ” मना अंतरी सार विचार राहो ” मग मनामध्ये हे सार विचार म्हणजेच चांगले विचार कायमस्वरूपी राहावेत म्हणून काय करायला हवे ते समर्थ आपल्याला या श्लोकात सांगतात. त्यासाठी सुरुवातीला पापसंकल्प म्हणजे आपल्या मनातील वाईट विचारांचा त्याग करावा लागेल. प्रत्येकाच्या मनात चांगले वाईट असे विचार येतच असतात. त्यातही वाईट विचार लवकर येतात आणि ते नैसर्गिक असते. मग असे विचार घालवले तर त्या जागी दुसरे काहीतरी हवे कारण रिकामे मन हे सैतानाचे घर असते असे आपण म्हणतो. म्हणून समर्थ म्हणतात की पापसंकल्प म्हणजे वाईट विचारांचा त्याग केल्यानंतर मनामध्ये सत्यसंकल्पांना म्हणजे चांगल्या विचारांना स्थान द्यावे. आपले मन म्हणजे सुपीक जमीन अशी कल्पना केली तर त्यामध्ये जशा विचारांचे बीज आपण पेरू तसे ते उगवतील, अनेक पटींनी उगवतील. म्हणूनच त्यात सद्विचारांची पेरणी करावी आणि वाईट विचारांचे तण उपटून टाकावे.

पापसंकल्प आणि सत्यसंकल्प या दोन्ही शब्दात ‘ संकल्प ‘हा शब्द अतिशय महत्त्वाचा आहे. संकल्प म्हणजे आपल्याला पुढे जे काही करायचे आहे त्याचा विचार आणि उच्चार मनाशी करणे होय. जेव्हा आपण एखादे धार्मिक कार्य करतो तेव्हा सुरुवातीला गुरुजी आपल्या हातून त्याचा संकल्प सोडतात. म्हणजेच ते कार्य निर्विघ्नपणे पार पडावे आणि त्याचे परिणामस्वरूप फळ आपल्याला मिळावे असा त्यामागील हेतू असतो. नवीन वर्षात किंवा आपल्या वाढदिवसाच्या दिवशी देखील आपण संकल्प करत असतो. विद्यार्थी अभ्यासाचा, उत्तम शरीर प्रकृती कमावण्याचा निश्चय करतात. हे संकल्प साधारणपणे चांगलेच असतात. छत्रपती शिवाजी महाराजांनी स्वराज्याचा संकल्प सोडला होता आणि मग तशी कृती त्यांच्या हातून घडली आणि त्यांच्या संकल्पास मूर्त रूप आले. आधी मनात विचार येतो, त्याप्रमाणे आपल्या जिभेवर ते शब्द येतात आणि नंतर त्याप्रमाणे कृती घडते. म्हणजे विचार, उच्चार आणि आचार ही संकल्पमागील त्रिसूत्री आहे असे म्हणता येईल. मग लौकिक व्यवहारात जर संकल्प एवढा आवश्यक आणि महत्वाचा असेल तर मग अध्यात्मात तर हवाच हवा.

पण असे संकल्प करण्यासाठी मनाचा निर्धार लागतो. त्यासाठी वाईट विचारांचा, कुबुद्धीचा त्याग करावा लागतो आणि त्या जागी सद्विचारांना जाणीवपूर्वक स्थान द्यावे लागते. हे करणे सोपे नाही. त्यासाठी  मनावर नियंत्रण ठेवण्याची सवय लावावी लागते. माणसाचे मन हे नेहमी विषयांकडे ओढ घेते. मनाचे विषय, बुद्धीचे विषय आणि इंद्रियांचे विषय माणसाला आकर्षित करत असतात. इथे विषय या शब्दाचा अर्थ वासना (इच्छा)असा घेता येईल. निरनिराळ्या प्रकारच्या वासना आपल्याला आकर्षित करून त्यांच्याकडे ओढत असतात. आपण त्या वासनांना बळी पडतो. म्हणजे आधी विचार येतो, मग आपल्या मुखात तशा गोष्टी येतात आणि नंतर तशी कृती घडते. तसे होऊ नये म्हणून समर्थ आधीच बजावतात की विषयांची कल्पनाच करू नये. एकदा का विषयांची कल्पना म्हणजे त्या विषयांना मनामध्ये स्थान दिले तर त्यांना बळ मिळत जाते आणि मग माणसाची कृती त्याप्रमाणे होते. काम, क्रोध, लोभ, मोह इ. षडविकार आहेत. माणूस विषयाधीन झाला किंवा वासना आणि विकारांना बळी पडला तर समाजामध्ये त्याची छी थू होते, तो माणूस म्हणवून घेण्याच्या लायकीचा राहत नाही.

श्रीरामांनी जीवनात संयमाला स्थान दिले आणि मर्यादांचे पालन केले म्हणूनच ते मर्यादा पुरुषोत्तम आहेत. रावण विद्वान होता, शूर होता, ज्ञानी होता पण तो विकारांना बळी पडला आणि त्यामुळे त्याचे अध:पतन झाले. आपण संयमाची मूर्ती असलेल्या आणि मर्यादापुरुषोत्तम असलेल्या श्रीरामांचे पूजन करतो, रावणाचे नाही. म्हणूनच विषयांची कल्पना देखील नको असे समर्थ म्हणतात.

आपल्यासारख्या सामान्य आणि संसारी माणसाच्या मनात साहजिकच प्रश्न येईल की मग विषय भोगायचेच नाहीत का? जीवनाचा आनंद घ्यायचा नाही का? अशा प्रसंगी श्रीरामांचा आदर्श आपल्या डोळ्यासमोर ठेवावा. श्रीरामांनी जीवनाचा आनंद घेतला परंतु त्यासाठी धर्माने जी मर्यादा आखून दिली आहे, तिचे त्यांनी पालन केले. म्हणून आपल्या धर्मात, संस्कृतीत जे मान्य असेल त्याचा संयमितपणे उपभोग आपण घेऊ शकतो. आणि ते करत असताना सत्यसंकल्पाकडे म्हणजे परमेश्वराच्या प्राप्तीकडे आपली वाटचाल करू शकतो. हल्ली जग जवळ आले आहे. द वर्ल्ड इज अ ग्लोबल व्हिलेज असं आपण म्हणतो. पण प्रत्येक देशाच्या चालीरीती, संस्कृती निराळी असते. ते पाहिल्यानंतर आपल्याकडील नीतिमत्तेच्या कल्पना आपल्याला चुकीच्या वाटू शकतात. परंतु जिथे जसे वागणे योग्य असते तसेच वागायला हवे. इतर ठिकाणी अमुक अमुक गोष्ट मान्य आहे म्हणून आपण इकडेही तसं करायला काय हरकत आहे असा सोयीस्कर विचार आपल्या मनात येऊ शकतो. कारण मनाची धाव विषयांकडेच असते. पण ती गोष्ट आपल्या धर्मात, संस्कृतीत किंवा नीतिमत्तेच्या कल्पनेत बसते का याचा विचार करायला हवा. असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय अशी आपली वाटचाल जीवनामध्ये असले पाहिजे. हेच या ठिकाणी समर्थांना सांगायचे आहे.

संकल्प जसा असेल, तसे जीवन घडते. म्हणून समर्थ प्रथम मनाला शुद्ध करण्याचा आग्रह धरतात. मन शुद्ध झाले की मार्ग आपोआप प्रकाशमान होतो; सत्यसंकल्पातूनच श्रेयसाचा प्रवास सुरू होतो.

स्वसंवाद..

  • माझ्या मनात वारंवार येणारे विचार कोणत्या प्रकारचे असतात?
  • मी जाणीवपूर्वक सत्यसंकल्प करून तो पाळण्याचा प्रयत्न करतो का?
  • माझे विचार, शब्द आणि कृती यांमध्ये सुसंगती आहे का?
  • विषयांच्या आकर्षणामुळे मी कधी माझ्या मूल्यांशी तडजोड करतो का?
  • माझ्या जीवनसंकल्पाची दिशा केवळ यशाकडे आहे की मानसिक आणि अध्यात्मिक उन्नतीकडेही?

– – – 

– – – श्लोक ६.

नको रे मना क्रोध हा खेदकारी |

नको रे मना काम नाना विकारी |

नको रे मदा सर्वदा अंगीकारू |

नको रे मना मत्सरू दंभ भारू ||||

अर्थ : हे मना, क्रोधाला स्थान देऊ नकोस; तो शेवटी खेद आणि दुःख देणाराच आहे. कामवासना नाना प्रकारचे विकार निर्माण करते. मद (अहंकार), मत्सर आणि दंभ (ढोंगीपणा) या विकारांपासून दूर राहा असा समर्थांचा स्पष्ट उपदेश आहे.

मागील श्लोकात समर्थांनी “पापसंकल्प” सोडण्याची सूचना केली. येथे ते त्या पापसंकल्पांचे मूळ असलेल्या विकारांकडे आपले लक्ष वेधतात. मनाच्या अध:पतनाला कारणीभूत ठरणारे हे विकार म्हणजेच षडरिपूंपैकी प्रमुख काम, क्रोध, मद, मत्सर आणि दंभ. त्याबद्दल समर्थ प्रामुख्याने या ठिकाणी सांगतात.

क्रोध हा खरोखरच खेदकारी आहे. रागाच्या भरात उच्चारलेले शब्द आणि केलेली कृती अनेकदा नंतर पश्चातापाला कारणीभूत ठरतात. हातातून सुटलेला बाण जसा परत येत नाही; तसेच रागाच्या भरात बोललेले शब्दही.

क्रोध हा क्षणिक असतो; पण त्याचे परिणाम मात्र दीर्घकाळ मनात जखम करतात. म्हणूनच मोठी माणसे आपल्याला सांगतात की राग आला की थोडा थांबा, एक ते दहा अंक मोजा, श्वास घ्या. कोणतीही प्रतिक्रिया देण्याआधी विचार करा. हा छोटासा विरामच अनेक अनर्थ टाळू शकतो.

कामभावना ही जीवनातील नैसर्गिक शक्ती आहे. ती नाकारण्याची गोष्ट नाही; पण तिचा अतिरेक विकारांना आमंत्रण देतो. काम म्हणजे केवळ लैंगिक वासना नव्हे; कोणत्याही गोष्टीचा अतिरेकी हव्यास हा देखील ‘काम’च.

विवाहमंत्रातील “धर्मेच अर्थेच कामेच नातिचरामि” हे वचन याच संतुलनाची शिकवण देते. धर्माच्या चौकटीत राहून अर्थ आणि कामाचा स्वीकार ही आपली संस्कृती आहे. संयमित काम सृजनशील असतो तर त्याचा अतिरेक विनाशकारी ठरतो.

संत परंपरेत तीन ‘एषणा’ सांगितल्या आहेत. वित्तेषणा (संपत्तीची हाव), दारेषणा (सुंदर स्त्रीची अभिलाषा) आणि लोकेषणा (कीर्तीचा हव्यास). या तिन्ही एषणा किंवा वासना मनाला बाहेर खेचतात. अध्यात्माची वाट मात्र अंतर्मुख करते. म्हणूनच ती श्रेयस्कर!

यश, वैभव किंवा कीर्ती मिळाली की मनात ‘मीच केले’ हा अहंकार उद्भवतो. ‘ वऱ्हाड निघालं लंडनला ‘ या लक्ष्मण देशपांडे यांच्या एकपात्री प्रयोगात एक नणंदेचं पात्र आहे. काही चांगलं झालं की ते माझ्यामुळे झाला असं ती सारखं म्हणत असते. हा फुकाचा अहंकार. हा मद म्हणजेच अहंकार साधकाच्या प्रगतीत अडथळा ठरतो.

इतरांची प्रगतीने सज्जनांना आनंद होतो. पण ज्यांना ती पाहवत नाही त्यांना मत्सर निर्माण होतो आणि मत्सरातून द्वेष जन्म घेतो. आणि मग स्वतःला श्रेष्ठ दाखवण्याचा दंभ सुरू होतो. हे असते आभासी मोठेपणाचे प्रदर्शन. जर मनापासून एखादी गोष्ट कोणी करत नसेल तर टिळे, टोपी, गंधमाळा, भगवे कपडे या सगळ्या गोष्टी म्हणजे सोंग आहेत. जो सगळ्या गोष्टी मनापासून करतो त्याला असे प्रदर्शन करण्याची गरज भासत नाही. पांढरे कपडे घालून समाजसेवेचा आव आणणे, वाङ्मयचौर्य करणे हा देखील असाच प्रकार म्हणता येईल.

‘जगाच्या पाठीवर ‘ या चित्रपटात ग दि माडगूळकर यांनी लिहिलेले एक सुंदर गाणे आहे ‘ थकले रे नंदलाला ‘ हे गीत आजच्या परिस्थितीचे अतिशय सुंदर वर्णन करते यातील प्रत्येक ओळ आजच्या राजकीय आणि सामाजिक वातावरणाला लागू पडते. या गीतातील ‘ निलाजरेपण कटीस नेसले, निसुगपणाचा शेला… ‘ यासारखी ओळ असो किंवा ‘ विषयवासना वाजे वीणा, अतृप्ती दे ताला… ‘ यासारखी ओळ असो त्या आजच्या परिस्थितीचे हुबेहूब वर्णन करतात.

हे विकार सूक्ष्म असतात; पण आत्मविकासाच्या वाटेवर ते खोल दरी निर्माण करतात. राघवाच्या अनंत मार्गावर चालायचे असेल तर बाह्य शत्रूंपेक्षा अंतर्गत शत्रूंवर विजय मिळवावा लागतो. हा मार्ग दुसऱ्यांवर विजय मिळवण्याचा नाही; तर स्वतःवर विजय मिळवण्याचा आहे. साधकाला देहबुद्धी ओलांडून आत्मबुद्धीकडे वाटचाल करायची असते. या प्रवासात विकारांवर सतत लक्ष ठेवावे लागते. कारण ते हळूहळू, नकळत मनावर कब्जा करतात.

त्यासाठी मनावर एकदम नियंत्रण मिळवण्याचा प्रयत्न न करता सुरुवात छोट्या छोट्या गोष्टींनी करावी. मोठ्या प्रतिज्ञेपेक्षा छोट्या, सातत्यपूर्ण संयमाचे पाऊल अधिक प्रभावी असते.

स्वसंवाद..

  • रागाच्या क्षणी मी थांबतो का, की तत्काळ प्रतिक्रिया देतो?
  • माझ्या इच्छांमध्ये संयम आहे का, की अतिरेक?
  • इतरांच्या यशाने मला आनंद होतो की मत्सर?
  • माझ्या यशामागे ईश्वरकृपा आणि इतरांचा देखील वाटा आहे याचे भान मी ठेवतो का?
  • बाह्य जग जिंकण्यापेक्षा मी स्वतःवर विजय मिळवण्याचा प्रयत्न करतो का?

– क्रमशः श्लोक ५ आणि ६.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३११ ☆ अहंकार व संस्कार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहंकार व संस्कार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३११ ☆

☆ अहंकार व संस्कार… ☆

अहंकार दूसरों को झुका कर खुश होता है और संस्कार स्वयं झुक कर खुश होता है। वैसे यह दोनोंं विपरीत दिशाओं में चलने वाले हैं, विरोधाभासी हैं। प्रथम मानव को एकांगी व स्वार्थी बनाता है; मन में आत्मकेंद्रितता का भाव जाग्रत कर, अपने से अलग कुछ भी सोचने नहीं देता। उसकी दुनिया खुद से प्रारंभ होकर, खुद पर ही समाप्त हो जाती है। परंतु संस्कार सबको सुसंस्कृत करने में विश्वास रखता है और जितना अधिक उसका विस्तार होता है; उसकी प्रसन्नता का दायरा भी बढ़ता चला जाता है। संस्कार हमें पहचान प्रदान करते हैं; दूसरों से अलग करते हैं, परंतु अहंनिष्ठ प्राणी अपने दायरे में ही रहना पसंद करता है। वह दूसरों को हेय दृष्टि से देखता है और धीरे-धीरे वह भाव घृणा का रूप धारण कर लेता है। वह दूसरों को अपने सम्मुख झुकाने में विश्वास करता है, क्योंकि वह सब करने में उसे केवल सुक़ून ही प्राप्त नहीं होता; उसका दबदबा भी कायम होता है। दूसरी ओर संस्कार झुकने में विश्वास रखता है और विनम्रता उसका आभूषण होता है। इसलिए स्नेह, करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, त्याग व उसके अंतर्मन में निहित गुण…उसे दूसरों के निकट लाते है; सबका सहारा बनते हैं। वास्तव में संस्कार सबका साहचर्य पाकर फूला नहीं समाता। यह सत्य है कि संस्कार की आभा दूर तक फैली दिखाई पड़ती है और सुक़ून देती है। सो! संस्कार हृदय की वह प्रवृत्ति है; जो अपना परिचय स्वयं देती है, क्योंकि वह किसी परिचय की मोहताज नहीं होती।

भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में सबसे महान् है; श्रद्धेय है, पूजनीय है, वंदनीय है और हमारी पहचान है। हम अपनी संस्कृति से जाने-पहचाने जाते हैं और सम्पूर्ण विश्व के लोग हमें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं; हमारा गुणगान करते हैं। प्रेम, करुणा, त्याग व अहिंसा भारतीय संस्कृति का मूल हैं, जो समस्त मानव जाति के लोगों को एक-दूसरे के निकट लाते हैं। इसी का परिणाम हैं…हमारे होली व दीवाली जैसे पर्व व त्यौहार, जिन्हें हम मिल-जुल कर मनाते हैं और उस स्थिति में हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन हो जाता है; शत्रुता का भाव तिरोहित व लुप्त-प्रायः हो जाता है। लोग इन्हें अपने मित्र व परिवारजनों के संग मना कर सुक़ून पाते हैं। धर्म, वेशभूषा, रीति-रिवाज़ आदि भारतीय संस्कृति के परिचायक हैं, परंतु इससे भी प्रधान है– जीवन के प्रति सकारात्मक सोच, आस्था,  आस्तिकता, जीओ और जीने का भाव…यदि हम दूसरों के सुख व खुशी के लिए निजी स्वार्थ को तिलांजलि दे देते हैं, तो उस स्थिति में हमारे अंतर्मन में परोपकार का भाव आमादा रहता है।

परंतु आधुनिक युग में पारस्परिक सौहार्द न रहने के कारण मानव आत्मकेंद्रित हो गया है। वह अपने व अपने परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के बारे में सोचता ही नहीं और प्रतिस्पर्द्धा के कारण कम से कम समय में अधिकाधिक धन-संपत्ति अर्जित करना चाहता है। इतना ही नहीं, वह अपनी राह में आने वाले हर व्यक्ति व बाधा को समूल नष्ट कर देता है; यहां तक कि वह अपने परिवारजनों की अस्मिता को भी दाँव पर लगा देता है और उनके हित के बारे में लेशमात्र भी सोचता नहीं। उसकी दृष्टि में संबंधों की अहमियत नहीं रहती और वह अपने परिवार की खुशियों को तिलांजलि देकर उनसे दूर… बहुत दूर चला जाता है। संबंध-सरोकारों से उसका नाता टूट जाता है, क्योंकि वह अपने अहं को सर्वोपरि स्वीकारता है। अहंनिष्ठता का यह भाव मानव को सबसे अलग-थलग कर देता है और वे सब नदी के द्वीप की भांति अपने-अपने दायरे में सिमट कर रह जाते हैं। पति-पत्नी में स्नेह-सौहार्द की कल्पना करना बेमानी हो जाता है और एक-दूसरे को नीचा दिखाना उनके जीवन का मूल लक्ष्य बन जाता है। मानव हर पल अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने में प्रयासरत रहता है। इन विषम परिस्थितियों में संयुक्त परिवार में सबके हितों को महत्व देना–उसे कपोल-कल्पना -सम भासता है, जिसका परिणाम एकल परिवार-व्यवस्था के रूप में परिलक्षित है। पहले एक कमाता था, दस खाते थे, परंतु आजकल सभी कमाते हैं; फिर भी वे अभाव-ग्रस्त रहते हैं और संतोष उनके जीवन से नदारद रहता है। वे एक-दूसरे को कोंचने, कचोटने व नीचा दिखाने में विश्वास रखते हैं। पति-पत्नी के मध्य बढ़ते अवसाद के परिणाम-स्वरूप तलाक़ की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है।

पाश्चात्य सभ्यता की क्षणवादी प्रवृत्ति ने ‘लिव- इन’ व ‘तू नहीं और सही’ के पनपने में अहम् भूमिका अदा की है…शेष रही-सही कसर ‘मी टू व विवाहेतर संबंधों’ की मान्यता ने पूरी कर दी है। मदिरापान, ड्रग्स व रेव पार्टियों के प्रचलन के कारण विवाह-संस्था पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। परिवार टूट रहे हैं, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। वे एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं। ‘हेलो- हाय’ की संस्कृति ने उन्हें उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां वे अपना खुद का जनाज़ा देख रहे हैं। बच्चों में बढ़ती अपराध- वृत्ति, यौन-संबंध, ड्रग्स व शराब का प्रचलन उन्हें उस दलदल में धकेल देता है; जहां से लौटना असंभव होता है। परिणामत: बड़े-बड़े परिवारों के बच्चों का चोरी-डकैती, लूटपाट, फ़िरौती, हत्या आदि में संलग्न होने के रूप में हमारे समक्ष है। वे समाज के लिए नासूर बन आजीवन सालते रहते हैं और उनके कारण परिवारजनों  को बहुत नीचा देखना पड़ता है

आइए! इस लाइलाज समस्या के समाधान पर दृष्टिपात करें। इसके कारणों से तो हम अवगत हो गए हैं कि हम बच्चों को सुसंस्कारित नहीं कर पा रहे, क्योंकि हम स्वयं अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। हम हैलो-हाय व जीन्स कल्चर की संस्कृति से प्रेम करते हैं और अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूलों में शिक्षित करना चाहते हैं। जन्म से उन्हें नैनी व आया के संरक्षण में छोड़, अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं और एक अंतराल के पश्चात् बच्चे माता-पिता से घृणा करने लग जाते हैं। रिश्तों की गरिमा को वे समझते ही नहीं, क्योंकि पति-पत्नी के अतिरिक्त घर में केवल कामवाली बाईयों का आना-जाना होता है। बच्चों का टी•वी• व मीडिया से जुड़ाव, ड्रग्स व मदिरा-सेवन, बात-बात पर खीझना, अपनी बात मनवाने के लिए गलत हथकंडों का प्रयोग करना… उनकी दिनचर्या व आदत में शुमार हो जाता है। माता-पिता उन्हें खिलौने व सुख-सुविधाएं प्रदान कर बहुत प्रसन्न व संतुष्ट रहते हैं। परंतु वे भूल जाते हैं कि बच्चों को प्यार-दुलार व उनके स्नेह-सान्निध्य की दरक़ार होती है; खिलौनों व सुख-सुविधाओं की नहीं।

सो! इन असामान्य परिस्थितियों में बच्चों में अहंनिष्ठता का भाव इस क़दर पल्लवित-पोषित हो जाता है कि वे बड़े होकर उनसे केवल प्रतिशोध लेने पर आमादा ही नहीं हो जाते, बल्कि वे माता-पिता व दादा-दादी आदि की हत्या तक करने में भी गुरेज़ नहीं करते। उस समय उनके माता-पिता के पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प शेष नहीं रह जाता। वे सोचते हैं– काश! हमने अपने आत्मजों को सुसंस्कृत किया होता; जीवन-मूल्यों का महत्व समझाया होता; रिश्तों की गरिमा का पाठ पढ़ाया होता और संबंध-सरोकारों की महत्ता से अवगत कराया होता, तो उनके जीवन का यह हश्र न होता। वे सहज जीवन जीते, उनके हृदय में करुणा भाव व्याप्त होता तथा वे त्याग करने में प्रसन्नता व हर्षोल्लास का अनुभव करते; एक-दूसरे की अहमियत को स्वीकार विश्वास जताते; विनम्रता का भाव उनकी नस-नस में व्याप्त होता और सहयोग, सेवा, समर्पण उनके जीवन का मक़सद होता।

सो! यह हमारा दायित्व हो जाता है कि हम आगामी पीढ़ी को समता व समरसता का पाठ पढ़ाएं; संस्कृति का अर्थ समझाएं; स्नेह, सिमरन, त्याग का महत्व बताएं ताकि हमारा जीवन दूसरों के लिए अनुकरणीय बन सके। यही होगी हमारे जीवन की मुख्य उपादेयता… जिससे न केवल हम अपने परिवार में खुशियां लाने में समर्थ हो सकेंगे; देश व समाज को समृद्ध करने में भी भरपूर योगदान दे पाएंगे। परिणामत: स्वर्णिम युग का सूत्रपात अवश्य होगा और जीवन उत्सव बन जायेगा।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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