ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 मार्च से 29 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 मार्च से 29 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जयश्री राम। मैं पंडित अनिल पांडे पहले की भांति आज भी आपको श्री हनुमान चालीसा की चार चौपाइयों के बारे में बताऊंगा जो की आपकी परेशानियों में मंत्र जैसा कार्य करेंगी। पहली दो चौपाइयां मैं अभी बताऊंगा तथा बाद की दो चौपाइयां इस वीडियो के अंत में बताई जाएंगी।

आज की श्री हनुमान चालीसा की पहले दो चौपाइयां ये है।

लाय सजीवन लखन जियाए,

श्री रघुबीर हरषि उर लाए।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई,

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

हनुमान चालीसा की इन चौपाइयों के संपुट पाठ करने से शारीरिक व्याधियों का निवारण होता है तथा अपने से बड़ों की कृपा प्राप्त होती है। अगर आपका बॉस आप से नाराज है या आप रोगों से ग्रस्त हो गए हैं तो आपको इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।

साप्ताहिक राशिफल में आज सबसे पहले मैं आपको 23 मार्च से 29 मार्च 2026 के सप्ताह के ग्रहों के परिवर्तन के बारे में बताऊंगा। उसके बाद राशिवार राशिफल की बारे में चर्चा की जाएगी।

इस सप्ताह सूर्य और शनि मीन राशि में मंगल, बुध और राहु कुंभ राशि में और गुरु मिथुन राशि में भ्रमण करेंगे। शुक्र प्रारंभ में मीन राशि में रहेंगे तथा 25 तारीख के 3:53 रात से मेष राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह सतर्कता पूर्वक कार्य करके आप कचहरी के कार्यों में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि संभव है। व्यापारियों को लाभ होगा। भाई बहनों के साथ संबंध स्थिर रहेंगे। आपके संतान को लाभ होगा। संतान का आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको इस सप्ताह धन अर्जित करने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। व्यापारियों के लिए सप्ताह अच्छा है। कर्मचारी और अधिकारियों को सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख सफलता प्रदान करने वाले हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर वे चाहेंगे और प्रयास करेंगे तो उनको सही पदस्थापना मिल सकती है। भाग्य से मामूली लाभ होगा। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा नहीं है। भाई बहनों के साथ संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको 25 और 26 तारीख का विशेष रूप से उपयोग करना चाहिए। इन दोनों तारीखों में आपके अधिकांश कार्य सफल होंगे। 23 और 24 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। भाग्य की मदद से आपके सभी कार्य संपन्न हो सकते हैं। मगर प्रयास तो करना ही पड़ेगा। आपके व्यय में वृद्धि होगी। कर्मचारियों अधिकारियों को सावधान रहना चाहिए। आपका, आपके जीवनसाथी का और माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों को भी इस सप्ताह में सावधानी के साथ व्यापार करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 27 के दोपहर से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को पूर्ण करने में मददगार है। 25 और 26 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। मामूली मात्रा में धन आने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर विश्वास करके कार्यों को करना चाहिए। माता जी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कर्मचारियों और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख लाभदायक है। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सावधानी पर जोर देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

व्यापारियों के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह प्रतिष्ठा दायक रहेगा। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। 25 और 26 तारीख को आपको अधिकांश कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर पर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। अविवाहित जातकों के नए-नए विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। संतान का सहयोग आपको कम मिलेगा। परीक्षाओं में सफलता के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकते हैं। भाग्य से थोड़ा बहुत लाभ प्राप्त होगा। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख उपयोगी हैं। 23 और 24 तारीख को आपको सावधान रहने की सलाह दी जाती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके संतान की उन्नति हो सकती है। संतान से आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को पढ़ाई में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको शत्रुओं से सावधान रहना चाहिए। अविवाहित जातकों के विवाह के प्रस्ताव में कुछ लोग बाधक बन सकते हैं। धन प्राप्त होने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार सामान्य रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक है, परंतु उनको अपने विचारों पर नियंत्रण रखना होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए सावधान रहने का समय है, अन्यथा उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख परिणाम मूलक हैं। 25 और 26 तारीख को आपको कोई भी कार्य बहुत सोच समझकर करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवारहै।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपका इच्छित स्थान पर स्थानांतरण हो सकता है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अत्यंत उत्तम है। उनके प्रतिष्ठा में भरपूर वृद्धि हो सकती है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधानी से कार्य करना चाहिए। व्यापारियों का व्यापार सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन गुरुवार है।

मकर राशि

आपका, आपके जीवनसाथी का, आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ अच्छे संबंध बनेंगे। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर अधिक विश्वास करना चाहिए। भाग्य पर नहीं। छात्रों को पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। आपको अपने संतान का सहयोग बहुत कम मिलेगा। शत्रुओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख परिणाम दायक हैं। 25 और 26 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें साथ ही रुद्राष्टक का भी पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको धन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपको ब्लड प्रेशर, डायबिटीज आदि रोगों से सावधान रहना चाहिए। आपके माता-पिता जी का और जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपको अपनी संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक है। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सचेत रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आप अपने बहुत सारे कार्य अपने आत्मविश्वास के बल पर कर लेंगे। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। धन प्राप्त करने में सावधानी बरतें। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से भी थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख विभिन्न रूप से मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र की तीन माला का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

आईये अब हनुमान चालीसा के मंत्रवत चौपाइयों की चर्चा कर लें। आज की दो चौपाइयां हैं;-

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥

हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से यश, सम्मान, प्रसिद्धि और कीर्ति बढ़ती है। अगर आपको मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करना हो तो इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ एनी बेझंट ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ एनी बेझंट ☆ शालिनी जोशी ☆

ॲनी बेझंट  –परदेशी असूनही भारतासाठी कार्य करणाऱ्या

जन्माने ख्रिश्चन पण मनाने हिंदू असलेली एक ब्रिटिश महिला म्हणजे  ॲनी बेझंट.भारतीय स्वातंत्र्य लढ्यातील एकनिष्ठ व्यक्ती त्या ठवल्या.ॲनी बेझंट यांचा जन्म एक ऑक्टोबर १८४७ रोजी लंडन येथे झाला. त्या पाच वर्षाच्या असताना वडील विल्यम पेजवुड यांचे निधन झाले. ते विद्वान, तत्त्वज्ञ व बहुभाषी होते. आई एमिली ही धार्मिक, कष्टाळू होती. पण पेजवुड यांच्या निधनानंतर आई कौटुंबिक अडचणीत सापडली. त्यामुळे त्यांच्या मैत्रिणीने ॲनीचे शिक्षण व पालन पोषण केले. त्या धार्मिक बनल्या. पुढे १८६७ मध्ये रेव्हरंट फ्रॅंक बेझंट या ख्रिस्ती धर्मोपदेशका बरोबर त्यांचा विवाह झाला. देवावरील श्रद्धेवरून दोघात मतभेद झाले आणि बेझंट यांनी घटस्फोट घेतला.

त्या स्त्री सुधारणावादी होत्या. कामगारांची युनियन स्थापन केली. महिला कामगारांचा संप घडवून आणला. लेखन भाषण मार्गाने समाज सुधारण्याचा प्रयत्न केला. पुढे १८८९ मध्ये थिओसॉफिकल सोसायटीची त्यांचा संबंध आला. ही संस्था अध्यात्मिक तत्त्वज्ञानाचा शोध घेणारी व विश्वबंधुत्वाला प्रोत्साहन देणारी होती. त्यात त्या सामील झाल्या. १८९३ च्या सर्व धर्म परिषदेत थिओसाॅफिकल सोसायटीचे प्रतिनिधित्व त्यांनी केले.  १८९३ मध्ये या सोसायटीच्या प्रसारासाठी त्या भारतात आल्या.

भारताच्या स्वातंत्र्याचा त्यांनी सक्रिय पुरस्कार केला. लोकमान्य टिळकांबरोबर होमरूल चळवळ उभारली. तुरुंगवासही भोगला.१९१७ च्या भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसचे (कलकत्ता) अध्यक्ष पद त्यांनी भूषविले. या पदावरच्या त्या पहिल्या महिला ठरल्या. स्वातंत्र्य लढ्यात पंडित नेहरू, महात्मा गांधी यांनाही त्यांनी सहकार्य केले. त्यांच्या प्रयत्नाने भारतात अनेक शैक्षणिक संस्था उभ्या राहिल्या. महिला शिक्षणावर त्यांनी विशेष लक्ष केंद्रित केले. १८९८ मध्ये बनारस येथे सेंट्रल हिंदू कॉलेजची स्थापना केली. यातूनच पंडित मदन मोहन मालवीय यांचे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थापन झालं. मुलींसाठी सेंट्रल हिंदू स्कूल फॉर गर्ल्स ची स्थापना करून शैक्षणिक सुधारणांचा पाया घातला.

भारतीय तत्त्वज्ञान, संस्कृती आणि अध्यात्म यांचा सखोल अभ्यास त्यांनी केला. लेखिका व व्याख्याता म्हणून प्रसिद्ध झाल्या. भारतभर प्रवास करून रामायण, महाभारत, उपनिषदे यावर अनेक व्याख्याने दिली. १९०५ मध्ये गीतेचे इंग्रजी भाषांतर केले. २५० ग्रंथ लिहिले. भारतीयांनी प्राचीन परंपरा विसरू नये यासाठी त्यांचा हा प्रयत्न होता. पाश्चात्य स्त्रीने भारतीय संस्कृतीचा मोठेपणा सांगावा हे पाहून लोक प्रभावित झाले. त्यांना मानू लागले. पण सनातनी हिंदू मात्र त्यांना आपल्या शत्रू समजत. सहभोजने, बालविवाह प्रतिबंध, स्त्रियांची सुधारणा इत्यादी क्षेत्रात त्यांनी काम केले. मद्रास येथे ‘कॉमन विल’ आणि न्यू इंडिया’ ही वृत्तपत्रे सुरू केली. असहकार व सत्याग्रह या बाबतीत मात्र गांधींची त्यांचे मतभेद झाले.

मद्रास येथे १९३३ मध्ये ॲनी बेझंट यांचे निधन झाले. पार्थिव देहाचे दहन करून रक्षेचा अंश गंगेत विसर्जित करण्यात आला. ब्रिटिश असूनही भारतीयांविषयीची आत्मियता, समाज सुधारण्याची तळमळ होती. त्या प्रकांड पांडित्य, वक्तृत्व, कार्यक्षमता, स्मरणशक्ती, दीर्घोद्योग, वक्तशीरपणा अशा अष्टपैलू होत्या. ॲनी बेझंट एकदा भारतात आल्या  त्या इथल्याच होऊन राहिल्या. पुढील पिढ्यांना प्रेरणादायी असे समर्पित जीवन त्या जगल्या.

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १५ आणि १६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १५ आणि १६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक पंधरावा – – 

मना पाहता सत्य हे मृत्यूभूमी |

जिता बोलती सर्वही जीव मी मी`

 चिरंजीव हे सर्वही मानिताती |

अकस्मात सांडूनिया सर्व जाती १५|

अर्थ:

आपल्या भोवताली दिसणारे सुंदर जग म्हणजे मृत्यूभूमी आहे ही सत्य गोष्ट आहे. असे असले तरी माणूस जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत अहंकारामुळे मी मी करीत असतो. आपण अमर आहोत अशीच सर्वांची भावना असते. परंतु एक दिवस अचानक हे सगळेच सोडून जावे लागते.

आधीच्या श्लोकात समर्थ आपल्याला महाथोर ते मृत्यूपंथेची गेले असे सांगतात. या श्लोकात आपण ज्या पृथ्वीवर म्हणजेच इहलोकांत राहतो तो इहलोक किंवा ही पृथ्वी मृत्यूभूमी कशी आहे हे समजावून सांगतात. हे जग नित्य बदलते आहे किंबहुना बदल हाच या जगाचा स्थायिभाव आहे. उत्पत्ती, स्थिती आणि लय या तीनही अवस्था पृथ्वीवर आपल्याला बघायला मिळतात. भासमान असणाऱ्या या दृश्य जगात प्रत्येक गोष्ट आपल्याला उत्पत्ती, स्थिती आणि लय या अवस्थातून जाताना दिसते. माणसाला देखील याच अवस्थांमधून जावे लागते. तरीसुद्धा प्रत्येक माणूस स्वतःला चिरंजीव समजतो आणि आपण केलेल्याचा अहंकार मिरवत असतो. हा अहंकार भल्याभल्यांचा घात करतो. ज्यांना साधना मार्गावर चालायचे आहे, त्यांना तर अहंकार विषाप्रमाणे वर्ज्य आहे. संत, सद्गुरू किंवा सद्ग्रंथ यांच्यामध्ये अहंकार दूर करण्याचे सामर्थ्य असते. म्हणून साधकाने त्यांचा आश्रय घ्यावा.

माणूस आयुष्यभर सुखाच्या मागे लागून पैसा कमावतो. घरदार, मुलेबाळे सगळे नाती निर्माण होतात. परंतु या सगळ्या गोष्टी इथेच राहतात. माणूस गेला की पैसा, धन, संपत्ती जागच्या जागीच राहते आणि इतरांची मालमत्ता होते. पत्नी त्याला दारापर्यंत पोहोचविण्यास येते, समाजातील लोक त्याला स्मशानापर्यंत पोहोचवतात. मात्र अगदी अंगावरचा कपडा देखील सोबत येत नाही. सोबत जाते ते फक्त आपले कर्म. परंतु तरीही माणसाचा ताठा किंवा गुर्मी शेवटपर्यंत कायम असते. मी एवढा पैसा कमावला, मी एवढे वैभव मिळवले, मला एवढे यश मिळाले, हे सगळे माझ्या कर्तृत्वामुळे ! माझी मुले, माझी बायको असे सगळे तो मी मी करत असतो.

काही लोक गैरमार्गाने अमाप संपत्ती कमावतात परंतु अंत्यसमयी त्यातील काहीही कामी येत नाही. करोडोंची संपत्ती असते परंतु एखाद्या दुर्धर आजाराने दवाखान्यात दाखल व्हावे लागले की पैसा सुद्धा त्याला बरे करू शकत नाही. आयुष्य वाढवून मिळत नाही की गेलेले क्षण परत येत नाहीत. हे सगळे सोडून कधीही अचानक जावे लागते. ‘नाही घडीचा भरवसा, कोण काळ येईल कैसा‘ हेच खरे. समर्थ म्हणतात

घटका गेली, पळे गेली, तास वाजे ठणाणा,

आयुष्याचा नाश होतो राम कारे म्हणाना”

प्रत्येक क्षण मृत्यूच्या दिशेने जात असताना, संसाराच्या मायेत न अडकता ईश्वराचे (रामाचे) नामस्मरण करावे, कारण तोच कायमचा आधार आहे. म्हणून जोपर्यंत आयुष्य आहे तोपर्यंत आपण आपला प्रत्येक क्षण सार्थकी लावला पाहिजे आणि परमेश्वर प्राप्तीच्या दिशेने पाऊल टाकले पाहिजे. तेच मानवी जीवनाचे अंतिम ध्येय आहे.

स्वसंवाद :

  • माझ्या आयुष्यात मी हे केले किंवा हे सगळे माझ्यामुळे आहे असा अहंकार बाळगतो का ?
  • पैसा, पद, प्रतिष्ठा या गोष्टी कायमच्या नाहीत हे मला खरोखर पटते का?
  • माझ्या आयुष्यातील सत्कर्मेच माझ्यासोबत येतील यावर माझा विश्वास आहे का ? ( क्रमशः )

– – – 

श्लोक सोळावा – – 

मरे एक त्याचा दुजा शोक वाहे। 

अकस्मात तोही पुढे जात आहे॥ 

पुरेना जनीं लोभ रे क्षोभ त्याते। 

म्हणोनी जनीं मागुता जन्म घेते॥१६॥

अर्थ : आपली प्रिय किंवा जिव्हाळ्याची व्यक्ती गेली, मरण पावली म्हणजे दुःख होणे स्वाभाविक आहे. परंतु अशा व्यक्तीच्या निधनाचे दुःख करीत बसणारा देखील त्याच रांगेत उभा असतो आणि अकस्मात त्याला देखील हे जग सोडून जावे लागते. शोक हा लोभ किंवा मोहापोटी असतो. त्यातून क्षोभ म्हणजे नाशालाच जन्म मिळतो म्हणून माणूस पुन्हा पुन्हा जन्म मरणाच्या फेऱ्यात अडकतो.

आधीच्या श्लोकात समर्थ आपल्याला काळ हा आपल्या पाठीशी लागलेला आहे हे अटळ सत्य सांगतात. भगवद्गीतेत सांगितल्याप्रमाणे जातस्य हि ध्रुव मृत्यू. जो जन्मला त्याला मृत्यू निश्चित आहे. या श्लोकात ते मृत्यूबद्दलच अधिक सांगून आपल्याला जागृत करण्याचा प्रयत्न करतात. आपली प्रिय व्यक्ती मरण पावली म्हणजे दुःख होणे स्वाभाविक आहे. आपण आपल्या प्रिय व्यक्तीच्या दुःखाचा शोक करत बसतो परंतु हा शोक लोभ किंवा मोहाच्या पोटी असतो असेच समर्थांना सांगायचे आहे. कारण त्यातून क्षोभ निर्माण होतो आणि हा क्षोभ सर्वनाशाला कारणीभूत ठरतो.

मृत्यू पावलेल्या व्यक्तीबद्दल दुःख करीत बसताना आपल्यालाही एक दिवस त्याच वाटेने जायचे आहे हे आपण लक्षात ठेवले पाहिजे. दुसऱ्या शब्दात सांगायचे तर मृत्यूची जाणीव आपल्याला कायमस्वरूपी असली पाहिजे. म्हणजे आज माझी प्रिय व्यक्ती मला सोडून गेली परंतु उद्या मला देखील त्याच मार्गाने जायचे आहे. हे लक्षात घेतले तर आपोआपच जगण्याची आसक्ती आणि इहलोकीचा लोभ कमी होतो. असे झाले म्हणजे व्यक्ती आपल्या कर्तव्यापासून च्युत होत नाही.

उपकार या हिंदी चित्रपटात अभिनेता प्राणच्या तोंडी जीवनाचं तत्त्वज्ञान सांगणारं एक फार सुंदर गाणं आहे. त्यात कवी म्हणतो,” कस्मे वादे प्यार वफा सब बाते है, बातों का क्या ? कोई किसी का नही है, झूठे नाते है नातोंका का क्या ?”

गाडगे बाबा कीर्तन करीत असताना कोणीतरी त्यांना त्यांचा एकुलता एक मुलगा गोविंदा गेल्याची बातमी सांगितली. तेव्हा ते म्हणाले

किती मेले कोट्यानुकोटी

काय रडू एकासाठी ?

लोकमान्य टिळक केसरीचा अग्रलेख लिहित असताना त्यांना देखील आपला मुलगा वारल्याची बातमी कळाली. परंतु त्यांनी आपले दुःख बाजूला ठेवून अग्रलेख पूर्ण केला आणि दुसऱ्या दिवशी नेहमीप्रमाणेच केसरीचा अंक निघाला. ही सगळी मंडळी महान असली तरी त्यांना दुःख झाले नसेल का ? निश्चितच झाले असणार. परंतु त्याचे रूपांतर त्यांनी शोकामध्ये होऊ दिले नाही आणि आपल्या कर्तव्य मार्गावर ते अग्रेसर राहिले. कारण त्यांना देखील पुढे आपणही त्याच मार्गाने कधीतरी जाणार आहोत याची जाणीव होती.

समर्थ असे सांगतात की अति शोक हा मोहातून निर्माण होतो. मोह म्हणजेच लोभ किंवा वासना. असे षडरिपूंचे मायाजाल आपल्याला जगण्यात किंवा ज्या अनंत अशा राघवाच्या मार्गावर आपल्याला चालायचे आहे त्यापासून परावृत्त करते. माणसाने त्यातून बाहेर पडले पाहिजे.

इच्छेतून वासना निर्माण होतात. वासनेतून काम किंवा षडरिपू निर्माण होतात. त्यात आपण अडकलो की जन्ममरणाच्या चक्रातून आपली सुटका नाही. आपण पुन्हा पुन्हा जन्म घेत राहतो आणि मृत्यू पावत राहतो. माणसाचे अंतिम ध्येय मोक्ष हेच आहे. म्हणूनच मरणाचा अति शोक न करता आपल्यालाही एक दिवस त्याच मार्गाने जायचे आहे हे लक्षात ठेवून आपले कर्तव्य करीत राहणे महत्त्वाचे आहे.

आपल्या संस्कृतीत जे चार आश्रम सांगितले आहेत, त्यातील वानप्रस्थाश्रमाची कल्पना फार सुंदर आहे. ती यासाठी फार उपयोगी पडते. वानप्रस्थाश्रमात संसारातील लक्ष हळूहळू काढून घ्यायचे असते. आजच्या काळात प्राचीन काळाप्रमाणे वानप्रस्थाश्रम शक्य नाही. परंतु काही ठराविक वयानंतर मुलांच्या बरोबर संसारात राहताना आपली आसक्ती हळूहळू कमी करायला हवी. ही आसक्ती जोपर्यंत कमी होत नाही, तोपर्यंत मुलांच्या संसारात अप्रत्यक्षपणे आपली ढवळाढवळ सुरूच राहते आणि त्याचे प्रमाण अति वाढले म्हणजे मुलांना देखील आपण नकोसे होतो. ही आसक्ती सोडता आली तर अंतकाळी जो मोह किंवा लोभ शिल्लक राहतो, तो राहणार नाही आणि त्यामुळे जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यातून आपली सुटका होऊ शकेल.

स्वसंवाद : 

  • माझ्या प्रिय व्यक्तींबद्दल असलेले माझे प्रेम हे आसक्तीत तर बदलत नाही ना?
  • मृत्यू अटळ आहे ही जाणीव मी खरंच मनापासून स्वीकारली आहे का?
  • दुःखाच्या प्रसंगी मी खचून जातो की कर्तव्य मार्गावर स्थिर राहण्याचा प्रयत्न करतो?
  • संसारातील मोह आणि लोभ कमी करण्यासाठी मी काही प्रयत्न करतो का?
  • माझ्या आयुष्याचे अंतिम ध्येय केवळ संसारापुरते मर्यादित आहे की आत्मोन्नतीकडेही माझे लक्ष आहे?

– क्रमशः श्लोक १५ आणि १६.  

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “अनकहा सा कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “अनकहा सा कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– सुनो!

– कहो !

– मैं तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ ।

– कहो न फिर !

– समझ नहीं आता कैसे कहूं, किन शब्दों में कहूं?

– अरे! तुम्हें भी सोचना पड़ेगा?

– हां ! कभी कभी हो जाता है ऐसा !

– कैसा ?

– दिल की बात कहना चाहता हूँ पर शब्द साथ नहीं देते !

– समझ गयी मैं !

– क्या.. क्या… समझ गयी तुम ?

– अरे रहने भी दो ! कब कहा जाता है सब कुछ !

– बताओ तो क्या समझी ?

– कुछ अनकहा ही रहने दो ।

– क्यों ?

– ऐसी बातें बिना कहे, दिल तक पहुंच जाती हैं !

– फिर तो क्या कहूं‌ ?

– अनकहा ही रहने दो !

– क्यों?

– तुमने कह दिया और दिल ने सुन लिया! अब जाओ !

– क्यों ?

– शर्म आ रही है बाबा! अब जाओ !

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विश्व कविता दिवस विशेष – मैं मंच का नहीं, मन का कवि हूँ! ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  विश्व कविता दिवस विशेष – मैं मंच का नहीं, मन का कवि हूँ! ☆

जी हाँ!

मैं स्वांतः सुखाय ही लिखता हूँ।

 

जब अन्तर्मन में कुछ शब्द बिखरते हैं

जब हृदय में कुछ उद्गार बिलखते हैं

 

तब जैसे

शान्त जल-सतह को

कंकड़ तरंगित करते हैं।

तब वैसे  

शब्द अन्तर्मन को स्पंदित करते हैं।

 

बस

कोई घटना ही काफी है।

बच्चे का जन्म

बच्चे की किलकारी

फूलों की फुलवारी

राष्ट्रीय संवाद

व्यर्थ का विवाद

यौवन का उन्माद

गूढ़ चिंतन सा अपवाद। 

इन सबके उपरान्त

किसी अपने का

किसी वृद्ध का देहान्त 

हो सकता है एक कारण

कुछ भी हो सकता है कारण

तब हो जाता है कठिन

रोक पाना मन उद्विग्न।

 

तब जैसे

मन से बहने लगते हैं शब्द

व्याकुल होती हैं उँगलियाँ

ढूँढने लगती हैं कलम

और फिर

बहने लगती है शब्द सरिता

रचने लगती है रचना

कथा, कहानी या कविता।

शायद इसीलिए

कभी भी नहीं रच पाता हूँ

मन के विपरीत

शायरी, गजल या गीत।

नहीं बांध पाता हूँ शब्दों को

काफिये मिलाने से

मात्राओं के बंधों से

दोहे चौपाइयों और छंदों से।

 

शायद वो प्रतिभा भी

जन्मजात होती होगी। 

जिसकी लिखी प्रत्येक पंक्तियाँ

कालजयी होती होंगी

आत्मसात होती होंगी।

 

मैं तो बस

निर्बंध लिखता हूँ

स्वछंद लिखता हूँ

मन का पर्याय लिखता हूँ

स्वांतः सुखाय लिखता हूँ। 

 

जी हाँ!

मैं स्वांतः सुखाय ही लिखता हूँ।

 

किन्तु, 

मन को आपसे साझा जो करना है

शायद इसीलिये

मैं मंच का नहीं मन का कवि हूँ।

 

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग-२७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ज़िम कार्बेट-नैनीताल

जिम ने कुछ समय छोटी हल्द्वानी में भी बिताया, जिसे उन्होंने गोद लिया था और जिसे कॉर्बेट्स विलेज के नाम से जाना जाने लगा। जंगली जानवरों को परिसर से बाहर रखने के लिए कॉर्बेट और ग्रामीणों ने 1925 में गांव के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया। 2018 तक दीवार अभी भी खड़ी है, और ग्रामीणों के अनुसार इसे बनाने के बाद से दीवार ने ग्रामीणों पर जंगली जानवरों के हमलों को रोका जा सका था। उनकी यादों को मोती हाउस के रूप में बरकरार रखा गया था, जिसे कॉर्बेट ने अपने दोस्त मोती सिंह के लिए बनवाया था, और कॉर्बेट वॉल, एक लंबी दीवार (लगभग 7.2 किमी) गाँव के चारों ओर फसलों की जंगली जानवर से रक्षा के लिए बनाई गई थी। उन्होंने जंगली बिल्लियों और अन्य वन्यजीवों की घटती संख्या के बारे में लिखना और चेतावनी देना जारी रखा।

1947 के बाद, कॉर्बेट और उनकी बहन मैगी न्येरी, केन्या चले गए थे, जहां वे होटल आउटस्पैन के मैदान में ‘पक्सटू’ कॉटेज में रहते थे, जो मूल रूप से उनके दोस्त लॉर्ड बैडेन-पॉवेल के लिए बनाया गया था। जिम कॉर्बेट अपनी बहन मैगी कॉर्बेट के साथ गुर्नी हाउस में रहते थे। नवंबर 1947 में केन्या जाने से पहले उन्होंने श्रीमती कलावती वर्मा को घर बेच दिया। घर को एक संग्रहालय में बदल दिया गया है और इसे जिम कॉर्बेट संग्रहालय के रूप में जाना जाता है। आज हम कालाढुंगी के उसी संग्रहालय के प्रांगण में उन्हें याद करके आदरांजलि अर्पित कर रहे हैं।

केन्या भी कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहा था। रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय केन्या गई थीं। तब उनके लिए ट्रीटॉप हट बनाई है थी जिसमें कॉर्बेट 5-6 फरवरी 1952 को राजकुमारी एलिजाबेथ के अंगरक्षक के रूप में ट्रीटॉप्स पर (एक विशाल फ़िकस के पेड़ की शाखाओं पर बनी एक झोपड़ी) साथ रहे। उस रात राजकुमारी के पिता, किंग जॉर्ज VI की मृत्यु हो गई, और एलिजाबेथ रानी बन गई। दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा राजकुमारी के रूप में पेड़ पर चढ़ी और अपने सबसे रोमांचक अनुभव के रूप में वर्णित करने के बाद वह अगले दिन पेड़ से इंग्लैंड की रानी बनकर नीचे उतरी। अपनी छठी पुस्तक, ट्री टॉप्स को समाप्त करने के कुछ दिनों बाद दिल का दौरा पड़ने से कार्बेट की मृत्यु हो गई, और उन्हें न्येरी में सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च में दफनाया गया।  कॉर्बेट और उनकी बहन की लंबे समय से उपेक्षित कब्रों की मरम्मत और जीर्णोद्धार जिम कॉर्बेट फाउंडेशन के संस्थापक और निदेशक जैरी ए. जलील द्वारा 1994 और 2002 में किया गया।

जिम कॉर्बेट की कुल सात किताबें भारत में प्रकाशित हुई हैं। जिनके हिंदी संस्करण भी  आ चुके हैं। वन्य जीवन में रूचि रखने वालों के लिए उनका साहित्य अद्भुत ख़ज़ाना से कम नहीं है। 

1.जंगल की कहानियां। 1935 में निजी तौर पर प्रकाशित (केवल 100 प्रतियां)

सामग्री: गांव में वन्य जीवन: एक अपील, पीपल पानी टाइगर, मेरे सपनों की मछली, एक खोया स्वर्ग, आतंक जो रात में चलता है, पूर्णा लड़की और इसकी रहस्यमय रोशनी, चौगढ़ टाइगर्स।

2.कुमाऊं के आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, बॉम्बे 1944

सामग्री: लेखक का नोट (आदमखोर होने के कारण), चंपावत मानेटर, रॉबिन, चौगढ़ टाइगर्स, द बैचलर ऑफ पोवलगढ़, द मोहन मानेटर, फिश ऑफ माय ड्रीम्स, द कांडा मैनेटर, द पीपल पानी टाइगर, द ठक मैन-ईटर, जस्ट टाइगर्स।

3.रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1947

सामग्री: द पिलग्रिम रोड, द मैन-ईटर, आतंक, आगमन, जांच, पहली हत्या, तेंदुए का पता लगाना, दूसरा किल, तैयारी, जादू, ए नियर एस्केप, द जिन ट्रैप, द हंटर्स हंटेड, रिट्रीट, फिशिंग इंटरल्यूड, एक बकरी की मौत, साइनाइड जहर स्पर्श, सावधानी में एक सबक, एक जंगली सूअर का शिकार, एक देवदार के पेड़ पर सतर्कता, आतंक की मेरी रात, तेंदुए से लड़ता है तेंदुए, अंधेरे में एक शॉट, उपसंहार।

4.मेरा भारत। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1952

सामग्री: समर्पण और परिचय, गांव की रानी, ​​कुंवर सिंह, मोती, पूर्व लाल टेप दिन, जंगल का कानून, ब्रदर्स, सुल्ताना: भारत का रॉबिन हुड, वफादारी, बुद्धू, लालाजी, चमारी, मोकामा घाट पर जीवन।

5.जंगल विद्या। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1953

सामग्री: मार्टिन बूथ, डैनसे, लर्निंग टू शूट, मागोग, लुकिंग बैक, जंगल एनकाउंटर, कैटेगरी, जंगल विद्या, जंगल की पुकार, स्कूल के दिन / कैडेट, जंगल की आग और बीट्स, गेम ट्रैक्स, जंगल संवेदनशीलता परिचय।

6.कुमाऊं का टेंपल टाइगर और अन्य आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1954

सामग्री: द टेंपल टाइगर, द मुक्तेसर मैन-ईटर, द पनार मैन-ईटर, द चुका मैन-ईटर, द तल्ला देस मैन-ईटर, उपसंहार।

7.माई कुमाऊं: अनकलेक्टेड राइटिंग्स। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012

सामग्री: प्रकाशक का नोट; समयरेखा; प्रस्तावना: ‘मैं कैसे लिखने आया’; ए लाइफ वेल लिव्ड: एन इंट्रोडक्शन टू जिम कॉर्बेट बाय लॉर्ड हैली; खंड एक: अप्रकाशित कॉर्बेट—रात जार का अंडा; ‘हम में से एक’; माई जंगल कैंप से; रुद्रप्रयाग पत्र; रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर कॉर्बेट; द मेकिंग ऑफ कॉर्बेट्स माई इंडिया: कॉरेस्पोंडेंस विद हिज एडिटर्स; ‘शूटिंग’ टाइगर्स: कॉर्बेट एंड द कैमरा; गांव में वन्यजीव: एक पर्यावरण अपील; भारत में एक अंग्रेज; केन्या में जीवन; खंड दो: कॉर्बेट एंड हिज़ ऑडियंस-‘द आर्टलेसनेस ऑफ़ हिज़ आर्ट’; द मैन रिवील्ड: कॉर्बेट इन हिज़ राइटिंग्स; जिम कॉर्बेट की सार्वभौमिक अपील: पत्र और समीक्षाएं; रुद्रप्रयाग के लिए उद्धार: कॉर्बेट द्वारा आदमखोर तेंदुए की हत्या पर प्रतिक्रिया; कॉर्बेट का प्रभाव: कुमाऊं के आदमखोर और छिंदवाड़ा कोर्ट केस; सूक्ति

उनकी किताब  मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं (कुमाऊं के आदमखोर) भारत, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बड़ी सफलता थी, अमेरिकन बुक-ऑफ-द-मंथ क्लब का पहला संस्करण 250,000 प्रतियां था। बाद में इसका 27 भाषाओं में अनुवाद किया गया। कॉर्बेट की चौथी पुस्तक, जंगल लोर, उनकी आत्मकथा है। 1948 में, कुमाऊं की सफलता के आदमखोरों के मद्देनजर, एक हॉलीवुड फिल्म, मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं, बायरन हास्किन द्वारा निर्देशित और साबू, वेंडेल कोरी और जो पेज अभिनीत, बनाई गई थी। फिल्म ने कॉर्बेट की किसी भी कहानी का अनुसरण नहीं किया; एक नई कहानी का आविष्कार किया गया था। फिल्म फ्लॉप रही, हालांकि बाघ के कुछ दिलचस्प फुटेज फिल्माए गए। कॉर्बेट ने कहा है कि “सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बाघ था” ‘कॉर्बेट लिगेसी’ का निर्माण उत्तराखंड वन विभाग द्वारा किया गया था और बेदी ब्रदर्स द्वारा निर्देशित किया गया था, जिसमें कॉर्बेट द्वारा शूट की गई मूल फुटेज थी। 1986 में, बीबीसी ने जिम कॉर्बेट की भूमिका में फ्रेडरिक ट्रेव्स के साथ मैन-ईटर्स ऑफ़ इंडिया नामक एक डॉक्यूड्रामा का निर्माण किया।

कॉर्बेट की किताबों पर आधारित एक आईमैक्स फिल्म इंडिया: किंगडम ऑफ द टाइगर, 2002 में क्रिस्टोफर हेअरडाहल द्वारा कॉर्बेट के रूप में अभिनीत थी। 2005 में जेसन फ्लेमिंग अभिनीत रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर आधारित एक टीवी फिल्म बनाई गई थी। पूरी शाम प्रिय शिकारी और वाइल्ड लाइफ़ पर रोचक व रोमांचक किताबें देने वाले बेहतरीन इंसान की यादों में गुज़ारी। उनकी सभी किताबें और उनके हिंदी अनुवाद सब आसानी से आमेजोन पर उपलब्ध हैं। जिम कार्बेट के संग्रहालय में गुज़ारी। उनके द्वारा उपयोग की है सामग्रियों को निहारा। उनके फ़ोटोग्राफ़ कुर्सियाँ मेज़ कटलरी सब कुछ देखा। रात आठ बजे के आसपास नैनीताल पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २५ – कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २५ ?

? कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

-1-

ये तथ्य हैं उनींदे, जगाओ झिंझोड़कर

रखा गया है जिनको, गर्दनें मरोड़ कर

-2-

ये तो मुँह तलक़ हैं, लबालब भरे हुए

ज़ोख़िम ले कौन ऐसे चिकने घड़े फोड़कर

-3-

भूमिका पढ़ी न, उपसंहार ही पढ़ा

रख दी क़िताब उसने, एक पृष्ठ मोड़कर

-4-

न दी ज़मीन जिसने, सुई की नोंक बराबर

एक दिन चला गया वो साम्राज्य छोड़कर

-5-

मांग सजाने की थी जो, मांग तुम्हारी

लाया हूँ आसमाँ से, चाँद-तारे तोड़कर

-6-

सरकार बना डाली, गुणा-भाग जोड़कर

खा रहे हैं माल आप, कथरी ओढ़कर

-7-

चिंतन की धूप बिन लगे, ज़ेहन में फफूँदी

‘राजेश’ ने लाया है, सार यह निचोड़कर

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆ मुक्तक – ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆

☆ मुक्तक ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

सुबह शाम की  आरती और माता का जयकारा।

सप्ताह का हर दिन बन गया शक्ति का भंडारा।।

केसर चुनरी चूड़ी रोली हे माँ करें तेरा सब श्रृंगार।

सिंह पर सवार माँ दुर्गा आयी बन भक्तों का सहारा।।

=2=

तेरे नौं रूपों में समायी शक्ति बहुत असीम है।

तेरी भक्ति से बन जाता व्यक्ति संस्कारी प्रवीण है।।

हे वरदायनी पपनाशनी  चंडी रूपा कल्याणी तू।

लेकर तेरे नाम मात्र से हो जाता व्यक्ति दुखविहीन है।।

=3=

नौं दिन की  नवरात्रि मानो कि ऊर्जा का संचार है।

भक्ति में लीन तेरे  भजनों  की नौ दिन भरमार है।।

कलश सकोरा जौ और  पानी आस्था के  प्रतीक।

हे जगत पालिनी माँ दुर्गा  तेरा वंदन बारम्बार है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६१ ☆ कविता – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६१ ☆

☆ जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो

मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

* 

है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो

मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है

नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला

हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है

जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं

जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१४ ☆ परखिए नहीं–समझिए… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख परखिए नहीं–समझिए। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१४ ☆

☆ परखिए नहीं–समझिए… ☆

जीवन में हमेशा एक-दूसरे को समझने का प्रयत्न करें; परखने का नहीं। संबंध चाहे पति-पत्नी का हो; भाई-भाई का हो; मां-बेटे का हो या दोस्ती का… सब विश्वास पर आधारित हैं, जो आजकल नदारद है; परंंतु हर व्यक्ति को उसी की तलाश है। इसलिए ‘ऐसे संबंध जिनमें शब्द कम और समझ ज्यादा हो; तक़रार कम, प्यार ज़्यादा हो; आशा कम, विश्वास ज़्यादा हो’ की दरक़ार हर इंसान को है। वास्तव में जहां प्यार और विश्वास है; वही संबंध सार्थक है, शाश्वत है। समस्त प्राणी जगत् का आधार प्यार है, जो करुणा का जनक है और एक-दूसरे के प्रति स्नेह, सौहार्द, सहानुभूति व त्याग का भाव ‘सर्वे भवंतु सुखीन:’ का प्रेरक है। वास्तव में जहां भावनाओं का सम्मान है; वहां मौन भी शक्तिशाली होता है। इसलिए कहा जाता है कि ‘खामोशियां भी बोलती हैं और अधिक प्रभावशाली होती हैं।’

यदि भरोसा हो, तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के अनेक अर्थ निकलने लगते हैं। इस स्थिति में मानव अपना आपा खो बैठता है। वह सब सीमाओं को लांघ जाता है और मर्यादा के अतिक्रमण करने से अक्सर अर्थ का अनर्थ हो जाता है, जो हमारी नकारात्मक सोच को परिलक्षित करता है, क्योंकि ‘जैसी सोच, वैसा कार्य व्यवहार।’ शायद! इसलिए कहा जाता है कि कई बार हाथी निकल जाता है और  पूंछ रह जाती है।

संवाद जीवन-रेखा है और विवाद रिश्तों में अवरोध उत्पन्न करता है, जो वर्षों पुराने संबंधों को पलभर में मगर की भांति लील जाता है। इतना ही नहीं, वह दीमक की भांति संबंधों की मज़बूत चूलों को हिला देता है और वे लोग, जिनकी दोस्ती के चर्चे जहान में होते हैं; वे भी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। उनके अंतर्मन में वह विष-बेल पनप जाती है, जो सुरसा के मुख की मानिंद बढ़ती चली जाती है। इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न किया करें; उससे ज़िंदगी छोटी हो जाती है…बहुत सार्थक संदेश है। परंंतु यह तभी संभव है, जब मानव क्रोध के वक्त रुक जाए और ग़लती के वक्त झुक जाए। ऐसा करने पर ही मानव जीवन में सरलता व असीम आनंद को प्राप्त कर सकता है। सो! मानव को ‘पहले तोलो, फिर बोलो’  अर्थात् सोच-समझ कर बोलने का संदेश दिया गया है। दूसरे शब्दों में तुरंत प्रतिक्रिया देने से मानव मन में दूरियां इस क़दर बढ़ जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है और जीवन-साथी– जो दो जिस्म, एक जान होते हैं; नदी के दो किनारों की भांति हो जाते हैं, जिनका मिलन जीवन-भर संभव नहीं होता। इसलिए बेहतर है कि आप परखिए नहीं, समझिए अर्थात् एक-दूसरे की परीक्षा मत लीजिए और न ही संदेह की दृष्टि से देखिए, क्योंकि संशय, संदेह व शक़ मानव के अजात-शत्रु हैं। वे विश्वास को अपने आसपास भी मंडराने नहीं देते। सो! जहां विश्वास नहीं; सुख, शांति व आनंद कैसे रह सकते हैं? परमात्मा भाग्य नहीं लिखता; जीवन के हर कदम पर हमारी सोच, विचार व कर्म हमारा भाग्य लिखते हैं। इसलिए अपनी सोच सदैव सकारात्मक रखिए। संसार में जो भी अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लीजिए और शेष को नकार दीजिए। परंतु किसी की आलोचना मत कीजिए, आपका जीवन सार्थक हो जाएगा। वे सब आपको मित्र सामान लगेंगे और चहुंओर ‘सबका मंगल होय’ की ध्वनि सुनाई पड़ेगी। जब मानव में यह भावना घर कर लेती है, तो उसके हृदय में व्याप्त स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाएं मुंह छिपा लेती हैं; सदैव के लिए लुप्त हो जाती हैं और दसों दिशाओं में आनंद का साम्राज्य हो जाता है।

अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। वह हमें किसी के सम्मुख झुकने अर्थात् घुटने नहीं टेकने देता, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और दूसरों को नीचा दिखा कर ही सुक़ून पाता है। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है और दु:ख धैर्य की। इसलिए दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण व्यक्ति का जीवन ही सार्थक व सफल होता है। इसलिए मानव को सुख में अहं को निकट नहीं आने देना चाहिए और दु:ख में धैर्य नहीं खोना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में सम रहने वाला मानव ही जीवन में अलौकिक आनंद प्राप्त कर सकता है। सो! जीवन में सामंजस्य तभी पदार्पण कर सकेगा; जब कर्म करने से पहले हमें उसका ज्ञान होगा; तभी हमारी इच्छाएं पूर्ण हो सकेंगी। परंतु जब तक ज्ञान व कर्म का समन्वय नहीं होगा, हमारे जीवन की भटकन समाप्त नहीं होगी और हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। इच्छाएं अनंत है और साधन सीमित। इसलिए हमारे लिए यह निर्णय लेना आवश्यक है कि पहले किस इच्छा की पूर्ति, किस ढंग से की जानी कारग़र है? जब हम सोच-समझकर कार्य करते हैं, तो हमें निराशा का सामना नहीं करना पड़ता; जीवन में संतुलन व समन्वय बना रहता है।

संतोष सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम धन है। इसलिए हमें जो भी मिला है, उसमें संतोष करना आवश्यक है। दूसरों की थाली में तो सदा घी अधिक दिखाई देता है। उसे देखकर हमें अपने भाग्य को कोसना नहीं चाहिए, क्योंकि मानव को समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी, कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। संतोष अनमोल पूंजी है और मानव की धरोहर है। ‘जे आवहिं संतोष धन, सब धन धूरि समान,’ रहीम जी की यह पंक्ति इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि संतोष के जीवन में पदार्पण करते ही सभी इच्छाओं का शमन स्वतः हो जाता है। उसे सब धन धूलि के समान लगते हैं और मानव आत्मकेंद्रित हो जाता है। उस स्थिति में वह आत्मावलोकन करता है तथा दैवीय व अलौकिक आनंद में डूबा रहता है; उसके हृदय की भटकन व उद्वेलन शांत हो जाता है। वह माया-मोह के बंधनों में लिप्त नहीं होता तथा निंदा-स्तुति से बहुत ऊपर उठ जाता है। यह आत्मा-परमात्मा के तादात्म्य की स्थिति है, जिसमें मानव को सम्पूर्ण विश्व तथा प्रकृति के कण-कण में परमात्म-सत्ता का आभास होता है। वैसे आत्मा-परमात्मा का संबंध शाश्वत है। संसार में सब कुछ मिथ्या है, परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। इसलिए हमें तुच्छ स्वार्थों का त्याग कर अलौकिक आनन्द प्राप्त करने का अनवरत प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आवश्यकता है… उदार व विशाल दृष्टिकोण की, क्योंकि संकीर्णता हमारे अंतर्मन में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को पोषित करती है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजना बेहतर है और जो बुरा है, उसका त्याग करना बेहतर है। इस प्रकार आप बुराइयों से ऊपर उठ सकते हैं। इस स्थिति में संसार आपको सुखों का सागर प्रतीत होगा; प्रकृति आपको ऊर्जस्वित करेगी और चहुंओर अनहद नाद का स्वर सुनाई पड़ेगा।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जीवन में दूसरों की परीक्षा मत लीजिए, क्योंकि परखने से आपको दोष अधिक दिखाई पड़ेंगे। इसलिए केवल अच्छाई को देखिए; आपके चारों ओर आनंद की वर्षा होने लगेगी। सो! दूसरों की भावनाओं को समझने और उनकी बेरुखी का कारण जानने का प्रयास कीजिए। जितना आप उन्हें समझेंगे, आपकी दोष-दर्शन की प्रवृत्ति का अंत हो जाएगा। इंसान ग़लतियों का पुतला है और कोई भी इंसान पूर्ण नहीं है। फूल व कांटे सदैव साथ-साथ रहते हैं, उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। सृष्टि में जो भी घटित होता है मात्र किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं; सबके मंगल के लिए कारग़र व उपयोगी होता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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