ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (10 अगस्त से 16 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (10 अगस्त से 16 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी के पास राम नाम का रसायन है। इसका अर्थ हुआ हनुमान जी के पास राम नाम रूपी दवा है। श्री हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के सेवक हैं इसलिए उनके पास राम नामरूपी दवा है। इस दवा का उपयोग हर प्रकार के रोग में किया जा सकता है। दुनिया में सिर्फ श्रीराम नाम ही एक ऐसी दवा है जिसे सभी रोग ठीक हो जाते हैं। श्री हनुमान जी को याद करने के अद्भुत ग्रंथ श्री हनुमान चालीसा में लिखा है कि :-

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से सभी रहस्यों की प्राप्ति होती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपको 10 से 16 अगस्त तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा परंतु सबसे पहले इस सप्ताह के ग्रहों के विचलन के बारे में बता रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य, बुध और गुरु कर्क राशि में, मंगल मिथुन राशि में, शुक्र कन्या राशि में शनि मीन राशि और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशि वार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपको अपनी प्रतिष्ठा में वृद्धि प्राप्त होगी। अगर आप ध्यान देंगे तो प्रतिष्ठा में अधिक वृद्धि हो सकती है। आपका और आपके जीवन साथी को स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपको अपने संतान से थोड़ा सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। आपके शत्रु शांत रहेंगे। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में मामूली तनाव रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख कार्यों करने के लिए सफलता दायक है। 15 तारीख के दोपहर के बाद से और 16 अगस्त को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए उत्तम है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। उनके धन में वृद्धि होगी। आपके साथ उनका संबंध अच्छा रहेगा और आपको उनका अच्छा सहयोग भी प्राप्त हो सकता है। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। जैसे पहले चल रहा था वैसे ही चलेगा। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख सफलता प्राप्त करने में मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन पहले जैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का सुंदर योग है। थोड़े से परिश्रम से ज्यादा धन की प्राप्ति होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगी। भाग्य के भरोसे बिल्कुल ही ना बैठे। अपने परिश्रम पर विश्वास करें। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इसके अलावा माता जी के स्वास्थ्य के प्रति भी आपको सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए अत्यंत अच्छा हो सकता है। आपको बस परिश्रम और सही सोच के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई बहनों के स्वास्थ्य में थोड़ी कमजोरी हो सकती है। भाई बहनों से आपके प्रयासों के कारण संबंध सुधार सकते हैं। भाग्य से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आप अपने दुश्मनों को साधारण से प्रयास से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार के दिन दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

सही ढंग से कार्य करने पर कचहरी के कार्यों में सफलता की उम्मीद है। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से मामूली मदद मिलेगी। आपके संतान को सुख प्राप्त होगा। संतान का आपको सहयोग मिलेगा। शत्रुओं को आप आसानी से हरा सकते हैं। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाग्य के स्थान पर अपने परिश्रम पर आपको यकीन करना चाहिए। भाग्य से आपको मामूली मदद ही मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख फलदायक है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सावधानी के साथ सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि भी संभव है। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। धन आने का अच्छा योग है। व्यापार में आपको लाभ होगा। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह बहुत ध्यानपूर्वक कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। आपके माता जी का और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15 तारीख के दोपहर के बाद का समय तथा 16 तारीख अनुकूल है। 13, 14 और 15 के दोपहर तक का समय सचेत रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने अधिकारियों की प्रशंसा प्राप्त होगी। कार्यालय में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। उनको अच्छे प्रोजेक्ट मिल सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु परास्त नहीं होंगे। भाग्य से आपको इस सप्ताह मदद मिलने की उम्मीद नहीं है। आपको अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख परिणाम दायक है। 15 और 16 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद प्राप्त होगी। भाग्य से आपके कई कार्य हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य पर अपने परिश्रम के साथ भरोसा करना चाहिए। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। धन प्राप्ति हेतु बहुत ज्यादा प्रयास करना इस सप्ताह आपके लिए हानिप्रद हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से डरने की विशेष आवश्यकता नहीं है। दुर्घटनाओं में आपको कोई नुकसान नहीं होगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभप्रद है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सतर्क रहकर अपने कार्यों को मुस्तैदी से करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए अत्यंत सुंदर रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त होगा। उनकी मानसिक स्थिति भी अत्यंत अच्छी रहेगी। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से परास्त कर सकते हैं। भाग्य आपको कुछ विशेष ढंग से मदद करेगा। भाग्य की मदद आपको सीधे-सीधे प्राप्त नहीं होगी। परंतु आपके कई कार्य अच्छे भाग्य के कारण हो जाएंगे। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख विशेष रूप से परिणाम मूलक है। 13, 14 और 15 तारीख को आपको सजगता के साथ अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। उनको समाप्त करने के लिए आपको प्रयास करने चाहिए। आपके प्रयासों को सफलता प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में आपको थोड़ी बहुत सफलता प्राप्त हो सकती है। परंतु सावधानी आवश्यक है। धन आने का योग है। दुर्घटनाओं से आप इस सप्ताह बाल बाल बचेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख के दोपहर तक का समय उत्तम है। सप्ताह के बाकी दोनों में आपको सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

 यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर वह नौकरी में है तो वहां उनको अच्छा प्रोजेक्ट या अच्छी सीट मिल सकती है। विवाह के प्रस्ताव के बारे में इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 15 की दोपहर के बाद से लेकर और 16 तारीख प्रभावशाली है। 13, 14 और 15 की दोपहर तक आपको सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८९ आणि ९० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८९ आणि ९० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८९ – – 

जनीं भोजनीं नाम वाचे वदावे ।

अती आदरे गद्य घोषें म्हणावे ।

हरीचिंतने अन्न जेवीत जावे ।

तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे ।।८९।।

अर्थ : लोकांमध्ये असताना आणि जेवण करताना भगवंताचे नाम घ्यावे. हे नाम घेताना ते आदरपूर्वक आणि मोठ्याने गजर करून स्पष्टपणे म्हणावे. जेवण करताना भगवंताचे चिंतन करावे. असे केल्याने नैसर्गिकपणे भगवंताची प्राप्ती होते.

(घोषें – मोठ्याने गजर करून, हरीचिंतने – भगवंताच्या स्मरणात राहून, स्वभावे – सहजपणे)

विवेचन : अन्नाला आपण पूर्णब्रह्म म्हणतो. दुसऱ्या शब्दात सांगायचे तर आपली भारतीय संस्कृती अन्नाला परमेशराचाच दर्जा देते. अन्नाला इतका मोठा आणि पवित्र दर्जा आपण देतो हेच आपल्या संस्कृतीचे मोठे वैशिष्ट्य आहे. मग असे पवित्र अन्न सेवन करताना आपला भावही पवित्र असावा. भाव किंवा भावना या गोष्टीला प्रत्येक ठिकाणी महत्व. आपल्या मानण्यावरच सर्व काही अवलंबून असते. परमेश्वराच्या मंदिरात जाणारा भाविक मनोभावे त्या मूर्तीची पूजा करतो. त्याच्यासाठी ती केवळ मूर्ती नसून प्रत्यक्ष भगवंताला तो त्या ठिकाणी पाहतो. परंतु त्याच ठिकाणी एखादा नास्तिक माणूस गेला तर त्याच्यासाठी ती फक्त एक पाषाणाची मूर्ती असते. म्हणूनच जेवताना पवित्र भाव असावा. हा पवित्र भाव कसा येईल? तर अन्नाचा घास घेण्यापूर्वी जेव्हा आपण पवित्र असे भगवंताचे नाम उच्चारू तेव्हा.

आजकाल हॉटेलमध्ये जाण्याची, बाहेरचे खाण्याची आवड सगळ्यांमध्ये निर्माण झाली आहे. कसे जेवतो आपण हॉटेलमध्ये? जरा आठवून पहा. आजूबाजूला लोकांच्या बोलण्याची कलकल असते. त्यातच आपण वेटर केव्हा आपले जेवण आणतो त्याकडे लक्ष ठेवून असतो. जेवताना बरेच जण मोबाईल पाहतात. जेवणाला आपल्या संस्कृतीत ‘ उदरभरण नोहे जाणिजे यज्ञकर्म ‘ असे म्हणतो. पण तिथे केवळ उदरभरणच होते. त्याला परमेश्वराच्या नामाचे अधिष्ठान आपण देत नाही.

जेवण म्हणजे एक यज्ञकर्म आहे. एखादा यज्ञ करताना आपण त्या त्या देवतेचे नाव घेऊन अग्निमध्ये आहुती टाकत असतो. अशा प्रकारे दिलेली आहुती अग्निमार्फत त्या त्या देवतेपर्यंत पोचते असे आपण मानतो. आपल्या पोटात देखील जठराग्नी असतो. तो प्रदीप्त झाल्यानंतरच त्याला आहुती द्यायची असते. आपल्या जठरातील अग्नीला ‘वैश्वानर’ असे नाव आहे. हा शब्द विश्वात सर्वत्र व्यापून राहिलेल्या अग्निदेवतेचे प्रतिनिधित्व करतो. अर्थात ही अग्निदेवता म्हणजे दुसरे तिसरे कोणी नसून साक्षात भगवंताचे स्वरूप आहे. भगवद्गीतेत श्रीकृष्ण म्हणतात, ” अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।” अर्थात सर्व प्राणिमात्रांच्या शरीरात असलेला वैश्वानर अग्नी म्हणजे मी आहे.

म्हणून समर्थ म्हणतात की समूहामध्ये जेवण करताना आदरपूर्वक परमेश्वराचे नाम घ्यावे. सर्वांना कळेल, स्पष्टपणे ऐकू येईल अशा पद्धतीने ते म्हणावे. पूर्वी आपल्याकडे जेवणाच्या पंक्तीत बसताना श्लोक म्हणण्याची प्रथा होती. आजही ती काही ठिकाणी पाळली जाते. त्यामुळे अन्नाबद्दल पवित्र भाव बाळगणे, जेवणाला लगेच सुरुवात करण्याऐवजी थोडा संयम पाळणे, भगवंताचे नाम आदरपूर्वक घेणे या गोष्टींचे संस्कार सहजपणे बालमनावर होत होते. आता मात्र पंक्तीत श्लोक म्हणणे फार कमी झाले आहे. कोणी तो म्हणत असेल तर त्याच्याकडे फारसे लक्ष दिले जात नाही. घरी आपण एकटे असू तेव्हा देखील जेवणापूर्वी भगवंताचे नामस्मरण करूनच जेवणाला सुरुवात करावी.

आपण जसे अन्न खाऊ तसे विचार निर्माण होतात. सात्विक अन्न असेल तर विचार देखील चांगले निर्माण होतात. राजस किंवा तामसीअन्न विकारांना जन्म देते. आपली आई, पत्नी किंवा बहीण जेव्हा स्वयंपाक करते, त्यावेळी तिच्या मनात आपण आपल्या माणसांसाठी हे भोजन बनवतो आहोत असा भाव असतो. ते भोजन तयार करताना मनात प्रेम असते. साहजिकच ते विचार तिने तयार केलेल्या अन्नात उतरतात. आपले पूर्वज आणि ऋषीमुनी म्हणूनच वाटेल त्या ठिकाणी जेवत नव्हते. महाभारतात श्रीकृष्ण जेव्हा शिष्टाई करण्यासाठी कौरवांकडे जातो, तेव्हा दुर्योधनाने बराच आग्रह करूनही तो त्या ठिकाणी जात नाही. त्याऐवजी विदुराकडील साधेच परंतु सात्विक अन्न जेवणे तो पसंत करतो.

अनेक लोकांना नोकरी व्यवसायानिमित्त काही वेळा नाईलाजाने बाहेर जेवण घ्यावे लागते. असे जेवण घेताना त्याभोवती पाणी फिरवून आपण भगवंताचा प्रसाद ग्रहण करतो आहे अशी भावना मनात असू द्यावी. मग त्या अन्नाचे प्रसादात रूपांतर झाल्याशिवाय राहणार नाही. जेवताना भगवंताचे स्मरण असू द्यावे. असे केले म्हणजे ती आहुती खरोखरच भगवंतापर्यंत पोहोचेल. ज्याला अध्यात्मार्गावर चालायचे आहे त्याला तर अन्न सेवन करताना अशी दक्षता घ्यायलाच हवी. अन्नाचा स्थूल भाग आपल्या शरीराचे भरण पोषण करतो तर त्याचा सूक्ष्म अंश आपल्या मनाचे आणि बुद्धीचे पोषण होते. म्हणून अन्न ताजे, सात्विक, साधे असावे.

जेवताना आपले लक्ष चवीकडे जास्त असते. एखादी गोष्ट आवडली की आपण खाण्यावर नियंत्रण ठेवत नाही. रसना म्हणजे आपली जीभ यात महत्वाची भूमिका पार पाडते. जिभेची दोन कार्ये आपल्या सगळ्यांना परिचित आहेत. पहिली गोष्ट म्हणजे स्वाद किंवा चवीचे ज्ञान आपल्याला तिच्यामुळे होते. दुसरे म्हणजे जीभ हे बोलण्याचे साधन आहे. ज्याला जिभेवर नियंत्रण ठेवता आले, त्याला परमार्थ लवकर साधता येतो. खाताना आणि बोलताना अशा दोन्ही अर्थाने. ज्याला भगवंत प्राप्तीची इच्छा आहे त्याने त्याच्या स्मरणाशिवाय एक क्षणही वाया जाऊ देता कामा नये. स्वामी समर्थांच्या वाङ्मयात सांगितल्याप्रमाणे “अहो येता जाता, कार्य करीता, सदा घेता देता, उठत बसता वदनी वदता ग्रास गिळता… ” या पंक्तीप्रमाणे सदोदित त्याचे नामस्मरण करत जावे. मग भगवंत दूर नाही.

स्वसंवाद :: 

१. मी जेवण करताना केवळ जिभेच्या ‘स्वादाचा’ आणि आवडीचा विचार करतो, की ते शरीराला ऊर्जा देणारे एक ‘यज्ञकर्म’ म्हणून शांत चित्ताने स्वीकारतो?

२. आजकाल जेवताना मोबाईल पाहण्याची किंवा टीव्ही बघण्याची लागलेली सवय सोडून, मी किमान २ मिनिटे देवाचे नाव घेऊन भोजनाला सुरुवात करतो का?

३. “अन्नाचा सूक्ष्म अंश माझ्या मनाचे आणि बुद्धीचे पोषण करतो, ” हे लक्षात ठेवून मी सात्त्विक आहार घेण्याबाबत आणि अन्न शिजवताना मनात चांगले विचार ठेवण्याबाबत जागरूक आहे का?

४. “येता जाता, उठत बसता, ग्रास गिळता” माझ्या मनात आणि वाचेवर त्या जगनियंत्याचे नाव अखंड राहते का?

——- 

श्लोक क्र. ९० – – 

न ये राम वाणी तया थोर हाणी ।

जनीं वेर्थ प्राणी तया नाम काणी ।

हरीनाम हे वेदशास्त्री पुराणी ।

बहू आगळे बोलिली व्यासवाणी ।।९०।।

अर्थ : ज्याच्या मुखात रामाचे नाव येत नाही असा माणूस आपल्या जीवनाचे मोठे नुकसानच करून घेत असतो. अशा व्यक्तीचे जगणे व्यर्थ आहे. अशी व्यक्ती अत्यंत हीन समजावी. वेदशास्त्रे, पुराणे यात महर्षी व्यासांनी हरिनामाची महती विविध प्रकारे सांगितली आहे.

(हाणी – हानी/नुकसान, काणी – क्षुद्र/हीन)

विवेचन :  रामनामाचे महत्व अपरंपार आहे. आतापर्यंतच्या विविध श्लोकातून त्याचे महत्व विविध प्रकारे आपल्याला सांगितले आहे. या श्लोकात ते ज्याच्या मुखी रामनाम येत नाही अशा मनुष्याची अवस्था वर्णन करतात. मुळात मनुष्य जन्म दुर्लभ. ८४ लक्ष योनी अनेकवार फिरून हा जन्म मिळतो असे सांगितले जाते. अशा या दुर्लभ मनुष्य जन्माचे सार्थक करून घ्यायचे असेल तर मुखामध्ये हरिनाम येणे आवश्यक आहे. रामनाम म्हणजे अमृत आहे. जे रामनामाचा आश्रय घेतात अशांचा मुखातून जणू अमृत बाहेर पडते. ते मुख खरोखरच धन्य होय. अन्यथा आयुष्य व्यर्थ बडबडण्यात गेले असे समजावे. अशा व्यक्ती जगल्या काय आणि मेल्या काय सारखेच? त्यांचे जीवन व्यर्थ गेले. अशा व्यक्तींचे जगणे म्हणजे अत्यंत हीन दीन अशा प्रकारचे आहे असे समर्थ म्हणतात. समर्थानी अशा व्यक्तीसाठी ‘काणी ‘ शब्द वापरला आहे. अशा व्यक्तींचे जिणे कवडीमोलाचे. स्वा. सावरकरांचे शब्द हरिनामाबद्दल वापरायचे तर असे म्हणता येईल, ” तुजसाठी मरण ते जनन, तुजवीण जनन ते मरण, तुज सकल चराचर शरण… “

हरीनाम मुखात न येता जगणे म्हणजे मरणच आहे. ‘ हरी उच्चारणी अनंत पापराशी, जातील लयाशी क्षणमात्रें ‘ असे ज्ञानदेव म्हणतात. हरिनामाचे सामर्थ्य अगाध आहे. त्याचे नाम मुखात आले की जन्मोजन्मीचे पाप नष्ट होते. त्यासाठी ज्ञानदेव गवत आणि अग्नीची उपमा वापरतात. वाळलेले गवत अग्नीच्या संपर्कात आले की क्षणार्धात जळून नष्ट होते, अग्नीशी समरस होते. तसेच परमेश्वराचे नाम घेणारी व्यक्ती त्याच्याशी एकरूप होते. ती परमेश्वरच होऊन जाते.

असे हरिनामाचे महत्व साधुसंतांनी निरनिराळ्या प्रकारे वर्णन केले आहे. मनुष्याला त्याद्वारे सावध करण्याचा प्रयत्न केला आहे. व्यासांनी वेद, शास्त्रे, पुराणे यांची रचना केली. त्यांनी देखील विविध प्रकारे त्यात हरिनामाचे महत्व स्पष्ट केले आहे. महाभारतात एकदा दुर्योधन श्रीकृष्णाला विचारतो की धर्म म्हणजे काय हे मला कळते पण तसे वागण्याची बुद्धीच मला होत नाही. अधर्म म्हणजे काय हेही मला समजते, पण त्यातून मला बाहेर पडता येत नाही. तेव्हा श्रीकृष्ण म्हणतात, ” तुझ्या हृदयात तू मला स्थान दे म्हणजे तुला चांगले वागण्याची बुद्धी होईल. ” प्रत्येक व्यक्तीच्या हृदयात परमेश्वराचे वास्तव्य असतेच. परंतु अज्ञानामुळे त्यावर पडदा पडलेला असतो. हा पडदा ज्ञानाच्या प्रकाशाने दूर होतो. पण दुर्योधनासारख्या व्यक्ती प्रत्यक्ष भगवंताने सांगूनही त्याप्रमाणे आचरण करीत नाहीत. अशा माणसांचे जगणे खरोखरच व्यर्थ होय. संत मीराबाई म्हणतात, ” रामनाम रस पीजे मनवा, रामनाम रस पीजे, तजि कुसंग संतसंग बैठी नित, हरी -चर्चा सुणी लीजें. ” रामनामाच्या रसातील गोडी चाखल्याशिवाय कळणार नाही. तेव्हा आपणही रामनामाचा आश्रय घ्यावा. आपल्या मुखात अखंड रामनाम येईल असा सत्संग, असे वागणे असावे. मनुष्य जन्माचे सार्थक करून घ्यावे. संत एकनाथ म्हणतात, “रामनाम ज्याचे मुखी, तो नर धन्य तिन्ही लोकी. “

स्वसंवाद :: 

१. ८४ लक्ष योनी फिरून मिळालेल्या या ‘दुर्लभ मनुष्य जन्माचा’ वापर मी केवळ व्यर्थ गोष्टींमध्ये करत आहे, की रामनामाने त्याचे सार्थक करत आहे?

२. दुर्योधनाप्रमाणे मलाही बऱ्याचदा ‘चांगले काय आणि वाईट काय’ हे समजत असूनही, माझ्या मनातील अज्ञानाचा पडदा दूर करण्यासाठी मी देवाकडे ‘सद्बुद्धी’ मागतो का?

३. संत एकनाथांच्या वचनानुसार, तिन्ही लोकांत ‘धन्य’ होण्यासाठी आणि मन शांत ठेवण्यासाठी मी रोजच्या जगण्यात नामस्मरणाचा आश्रय घेतो का?

– क्रमशः श्लोक ८९ आणि ९०

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सुनो।

-कौन?

-मैं।

-मैं कौन?

– अच्छा। अब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते?

– तुम ही तो थे जो काॅलेज तक एक सिक्युरिटी गार्ड की तरह चुपचाप मुझे छोड़ जाते थे। बहाने से मेरे काॅलेज के आसपास मंडराया करते थे। सहेलियां मुझे छेड़ती थीं। मैं कहती कि नहीं जानती।

– मैं? ऐसा करता था?

– और कौन? बहाने से मेरे छोटे भाई से दोस्ती भी गांठ ली थी और घर तक भी पहुंच गये। मेरी एक झलक पाने के लिए बड़ी देर बातचीत करते रहते थे। फिर चाय की चुस्कियों के बीच मेरी हंसी तुम्हारे कानों में गूंजती थी।

– अरे ऐसे?

– हां। बिल्कुल। याद नहीं कुछ तुम्हें?

– फिर तुम्हारे लिए लड़की की तलाश शुरू हुई और तुम गुमसुम रहने लगे पर उससे पहले मेरी ही शादी हो गयी।

-एक कहानी कहीं चुपचाप खो गयी।

– कितने वर्ष बीत गये। कहां से बोल रही हो?

– तुम्हारी आत्मा से। जब जब तुम बहुत उदास और अकेले महसूस करते हो तब तब मैं तुम्हारे पास होती हूं। बाॅय। खुश रहा करो। जो बीत गयी सो गयी।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६३ – आलेख – वाकई लेखक होना गौरव की बात है ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६३ ☆

☆ आलेख ☆ ~ वाकई लेखक होना गौरव की बात है ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज बड़ी तेज बरसात हो रही थी। ऑफिस पहुंचने में विलंब तो हो ही रहा था, लेकिन  किया ही क्या जा सकता था। बेटे ने कार स्टार्ट  की और यह कहते हुए  कि –  “पापा, बरसात तेज हो रही है मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आता हूँ। आप कार चला कर जा सकते हो लेकिन उम्र के लिहाज से और जब इतनी बरसात हो रही हो, सड़कें पानी से लबालब भरी हों, तो आपको कार से जाना उचित नहीं है।”

मेट्रो रेल ही सिर्फ ऐसा साधन है जिससे आप, भीषण बारिश, भारी जाम के बावजूद भी निश्चित समय में लखनऊ के एक छोर एयरपोर्ट से इंदिरानगर के मुंशी पुलिया तक आप जा सकते हैं।

“पापा, यदि बिलम्ब हो रहा तो आप मेट्रो से ही चले जाइये, समय से पहुंचने की गारंटी मेट्रो के सिवाय कोई दूसरा नहीं देगा। आप बिना किसी तनाव के अपने ऑफिस समय से पहुंच सकेंगे।”

मुझे उसका सुझाव बिल्कुल अच्छा लगा। अपने आगामी उपन्यास के कुछ पंक्तियों को मन में संजोये मै कार में बैठा और टीपी नगर मेट्रो स्टेशन पहुँच गया।  लेखक अपने मन के अंदर आए भाव को एक झटके में कलम से कागज़ पर उतार देना चाहता है, ऐसा एक लेखक की फितरत होती है। मन में आयी पंक्तियां कहीं विस्मृति न हो जाए, मैं मेट्रो में बैठने के साथ ही फोन के स्क्रीन की ओर मुँह करके बकबकाना शुरू कर दिया। मैं धारा प्रवाह बोल रहा था, मोबाइल के नोटपैड पर मेरे अगले भोजपुरी उपन्यास का कथानक बड़ी ही मस्ती के साथ अपना स्थान बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे। मैं अपनी धुन में इतना मगन था कि मैं बायें -दाएँ कुछ भी नही देख रहा था कि लोग क्या सोचते होंगे या मेरा उपहास कर रहे होंगे।

इस आलेख के बीच में लेखन और उसके लेखन के विषय में एक बात कहता चलूँ, नहीं तो यह बात भूल जाएगी – 

“कभी-कभी तो लेखकों को यह कहते सुनता हूँ। भाई मैं नही लिखता हूँ, वह जो ऊपर वाला है वह लिखवाता है। यह ऊपर से ही उतरता है। मुझे इस विषय में बहुत ज्यादा नहीं कहना क्योंकि  सच में होता तो वही है जो ऊपर वाला चाहता है। लेकिन यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति सी लगती है।  दरअसल जब लेखक की दृष्टि किसी एक चीज पर म एकाग्र भाव के साथ पड़ती है, और उस विषय में दिल और दिमाग़ दोनों  एक साथ समन्वय स्थापित करते हैं, तब मन  के भीतर उस विषय पर एक कहानी, कविता और उपन्यास रचने के लिए भाव प्रकट हो उठते हैं। शब्दों की तेज बौछार शुरू हो जाती है जो वाणी और कलम के माध्यम से, वर्षो पहले सिर्फ कागज़ पर और अब कागज  या कंप्यूटर मोबाइल के स्क्रीन पर छपने लगते है। यानि ये शब्द भाव ऊपर से न  उतरकर, मन के अंदर से निकलतें है। लेखक समय, परिस्थिति अपने इर्द-गिर्द के वातावरण- जैसे दिल तक पहुंची गहरी चोट, खुशी से उछल कर बाहर निकल आने वाले दिल, क्या दिन थे वे, होगा क्या आगे, कहीं गम -कहीं खुशी, ब्रह्मांड में चमकते तारे, पहाड़ों से निकलती नदियां, झुरमुट में छुप कर बैठे हुए जीव, गांव की मिट्टी की भीनी भीनी सुगंध, शहर की चमक दमक,  ब्रह्म एक है, चौरासी कोटि देव हैं, हमहुँ लिखिबे, हमहुँ लिखव, हमउ लिखेंगे, हमाऊँ भी लिखियै, आम्ही सुद्धा लिहू”, अमारो लिखबो, हर चीज से कथानक ढूढ़ निकालता है। फिर तैयार होती है,  एक लघु कथा, एक नाटक, एक उपन्यास, एक संस्मरण, एक यात्रा वृतांत, एक पत्र, कुछ व्यंग, कुछ हास्य एक गद्य एक पद्य की क्षणिका, कुछ छंद, कुछ दोहे, कुछ सवैईया, कुछ मुक्तक, कुछ गजल कुछ सजल, कुछ छंद मुक्त कुछ छंद बद्ध, कुछ अगेय, कुछ गेय, कविताएं।”

बात कहां से शुरू हुई कहां चली गयी, मैं तो इस धारा प्रवाह लेखन में भूल ही गया। आइये पुनः वही से शुरु करें, जहाँ छोड़ा था – अब आगे क्या घटित हुआ।

दरअसल मेरे मोबाइल में देसी हिंदी गूगल टाइपिंग का एक ऐप है, जो मेरी आवाज को पहचान कर हिंदी टाइप करता है। उसके साथ मेरी दोस्ती का आलम यह है, मुझे टाइपिंग में लिखने में त्रुटि हो जाएगी लेकिन मेरे बोलने और उसके लिखने में बिल्कुल ही त्रुटि नहीं होती है। लेखन का नशा ऐसा कि शर्म भी बेशर्म हो जाती है।

अब भीड़ भरी मेट्रो में कौन इस संवाद को सुन रहा था, यह कौन नहीं सुन रहा था, इससे मुझको कुछ भी लेना देना नहीं था। हालांकि मैं इतना भी तेज नहीं बोल रहा था कि किसी को दिक्कत हो,  मुझे तो लगता है कि शायद मेरे बगल के व्यक्ति को छोड़कर कोई सुन ही नहीं पा रहा था। बस सुन रहा था मेरे होठों से सटा हुआ मेरा प्यारा मोबाइल। अपना तो हर हाल में दिल में आए भाव को मोबाइल पर उतारने का नशा रहता है। मैं वही काम कर रहा था। अचानक एक बुजुर्ग से दिखने वाले लेकिन दिव्य व्यक्तित्व और आभामंडल वाले शालीन, शिष्ट- भद्र  व्यक्ति मेट्रो में हमारे सीट के सामने आए हैं। स्थानाभाव के कारण वे आगे बढ़ जाना चाहते थे। मेट्रो में आस-पास कोई जगह नहीं थी। अचानक मुझे और मेरे बगल में बैठी हुई एक बिटिया दोनों के मन में एक साथ यह भाव आया कि अभी तो इतनी जगह रिक्त ही है कि यदि हम लोग थोड़ा-थोड़ा खिसक जाए तो एक व्यक्ति के बैठने के लिए पर्याप्त जगह हो जाएगी। सच में हम दोनों ने ऐसा ही किया।

वे भद्र व्यक्ति जो मुझसे करीब 4-5 साल उम्र में बड़े ही थे, आगे निकलने ही वाले थे कि हमने टोका –

“भाई साहब!  ठहरिये, आइये आप भी बैठ लीजिए।” इतना कुछ सोचने और अपनी बात को कहने के बीच ट्रेन खुली। इसी बीच भाई साहब का संतुलन बिगड़ा लेकिन मैंने उन्हें अपने हाथों से पकड़ा और वे हमारे बगल में बैठ गए। यह बताना उचित होगा कि यह सब काम मैंने अपने लेखन को विराम देकर किया था।

खैर फिर मैं भूल गया कि मुझे कौन देख रहा है मैं धीरे-धीरे बोलकर लिखना शुरू किया। मुझे शायद मेरे पड़ोसी से अधिक कोई नहीं सुन समझ रहा था कि मैं उपन्यास लिख रहा हूँ या किसी से बात कर रहा हूँ।

मैंने लिखना बंद किया तब तक बगल वाले उसे भद्र व्यक्ति ने मुझसे कहा-

“सर ! आप राइटर है क्या?” उन्होंने मुझसे यह कह कर कहा मेरा सिर गर्व से ऊपर उठा दिया। वाह, मुझे राइटर बोल रहे हैं। आप बताएंगे कि आप कैसे इसे लिखते हैं?  कौन सा ऐप यूज करते हैं?

मैंने उन्हें विधिवत सब कुछ समझा दिया, इतना ही नहीं उनके मोबाइल में इस ऐप को डाउनलोड और एक्टिव भी कर दिया।

जीवन के चौथे पड़ाव पर लेखन शक्ति, स्मरण शक्ति, चलने फिरने में सब कुछ में दिक्कत आती है। ऐसे में यह ऐप काफी कारगर है। ईश्वर से कामना करता हूं कि सब शक्ति कमजोर हो जाए लेखन शक्ति और स्मरण शक्ति बनी रहे।

हम दोनों के बीच आपसी परिचय हुआ, बातचीत हुई, मुझे पता चला कि मेरे बगल में बैठे हुए अग्रज पुलिस डिपार्टमेंट के बड़े सीनियर अफसर रह चुके थे और अभी हाल में दो-तीन साल पूर्व सेवानिवृत हुए थे। लेखक के रूप में उनके मन में मेरे प्रति  बहुत सारा सम्मान का भरा प्रतीत हो रहा था। बात की बात में उन्होंने कहा कि मेरे एक सीनियर डीआईजी साहब थे, उन्होंने भी कई किताबें लिखी है। मैं भी मन ही मन कहा, चलो मैंने भी लगभग एक दर्जन पूरे कर लिए।

खैर तब तक अगला मेट्रो स्टेशन हजरतगंज आ गया हम दोनों ने एक दूसरे का   हाथ जोड़कर  अभिवादन किया और वे हजरतगंज मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुझे भी अगले मेट्रो स्टेशन केडी सिंह बाबू स्टेडियम  पर उतरना था। लेकिन मेरे बगल में बैठे दूसरे सज्जन की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी उन्होंने बड़े ही आदर से कहा, भाई साहब आप लेखक है ?

 मैं भी शरमाते और सकुचाते हुए कहा –

“जी.. हाँ थोड़ा बहुत जरूर लिख लेता हुँ। नहीं भाई साहब आप जिस तरह से बोलकर लिख रहे थे वाकई कहानी मेरे दिल तक पहुँच रही थी।” मैं तो बिल्कुल भाव विभोर हो गया था। आप अच्छा लिखते हैं। मुझे अपने उपन्यास लेखन के बीच ही श्रोता और पाठक दोनों मिल चुका था। मै बहुत ख़ुश था।

भाई साहब आप रहते कहाँ हैं?.. मैने उन्हें बताया, तो वे भी बोल पड़े,

“जी, मैं भी इधर रायबरेली रोड पर ही रहता हूँ।” वे सज्जन किसी  गवर्नमेंट जॉब में तो नहीं थे, लेकिन किसी कारपोरेट सेक्टर के  पदाधिकारी थे,  जैसा उन्होंने मुझे अपना परिचय दिया।

अब मेरा मेट्रो स्टेशन आ चुका था। मैंने अपना पिट्ठू बैग अपने पीठ पर लादा और  मन में यह सोचता हुआ बाहर निकला कि वाकई लेखक होना गौरव की बात है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

गरारू घाट से समनापुर 12 नवम्बर 2019

आज कार्तिक मास  की चौदहवीं के चाँद की रात है, आज तक चौदहवीं के चाँद के रूप में रूपहले परदे पर वहिदा रहमान का चेहरा शकील बदायुनी के गीत

और रवि के संगीत की धुन पर मुहम्मद रफ़ी  के दिलकश गायन के साथ गुरुदत्त की अदायगी को जानते थे। सोचा आज नर्मदा के लावण्यमय सलिल प्रवाहित धुन पर चाँदनी को लहरों पर लास्य करते देखेंगे। रात दो बजे कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में सुवासित वसुन्धरा का अवलोकन किया तो मैथिलीशरण गुप्त लिखित पंचवटी काव्य सहज ही फूट पड़ा।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती धरती, हरित तृणों की नोकों से,

मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

सोचा यहाँ टेंट में लेटे हुए इतना सुंदर दृश्य है तो नर्मदा के कल-कल जल में चाँदनी का नृत्य लास्य कैसा होगा, हमसे रहा नहीं गया। नर्मदा किनारे पहुँचे तो अलौकिक सौदर्य से स्तब्ध रह गए, ऐसा लगा जीवन को सम्पूर्णता प्राप्त हुई, यदि अभी यमराज आकर चलने को कहें तो चाँदनी के डोले में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी यमलोक चल देंगे। फिर तंद्रा टूटी तो क्या देखा…!

क्या ही स्वच्छ चाँदनी यह, क्या ही निस्तब्ध निशा;

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?

बंद नहीं अब भी चलते हैं, नियति के कार्य-कलाप,

कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप।।

क़रीब एक घंटा शांत और चुपचाप चार चीजें हमसे बतियाती रहीं, नर्मदा, चाँदनी, कलकल ध्वनि और शीतल पवन, ब्रह्म मुहूर्त होने को था,  एक झपकी लेने इन शब्दों को गुनगुनाते वापस लौट पड़े…!

है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।

और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,

शून्य श्याम-तनु जिससे नया रूप झलकाता है।

सौंदर्य रसपान के बाद की निद्रा चार बजे नर्मदा उसपार से आती मुर्ग़े की बाँग से टूटी और हम पंचवटी के किरदारों की तर्ज़ पर लोटा भरकर प्रकृतिजन्य निस्तार को निकल गए।

गरारू घाट पर नर्मदा के अद्भुत सौंदर्य के दर्शन होते हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय गरूड़ देव ने तपस्या की थी, दो आमने-सामने पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर हैं जिन्हें गौड़ राजा बलवंत सिंह ने सत्रहवीं सदी में इंडो-पर्शियन शैली में बनवाया था। गुंबद व आर्च पर्शियन शैली और तोरण व गर्भगृह भारतीय शैली में बने हैं। असल में जिसे पर्शियन कला कहा जाता है वह पूरी तरह पर्शियन नहीं है, सिकंदर द्वारा पर्शिया याने ईरान को जीतने के बाद ग्रीक मूर्तिकला और भवन निर्माण ईरानी तरीक़ों में घुल मिल गए हैं। गुंबद और आर्च में वही मिलाजुला रूप दिखता है।

सोलहवीं सदी में मुग़ल सेनापति आसफ़ख़ान द्वारा रानी दुर्गावती के पराभव के बाद अकबर ने गोंडवाना को अधीनस्थ करके कराधीन राज्य के रूप में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया जिसकी राजधानी मदनमहल रही आई लेकिन राज्य व्यवस्था गोंडवाना राजाओं के हाथ में रही। मुग़लों को सालाना एकमुश्त रक़म बतौर नज़राना मिल जाती थी। गोंडवाना राजा छोटी रियासतों और जागीरों के माध्यम से राज्य का प्रबंधन और लगान वसूली करता था। फ़तहपुर, मकड़ाई, शोभापुर, देवगढ़, छिन्दवाड़ा और छत्तीसगढ़ी  रियासतें तथा जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों में हर्रई जागीर जैसी सैकड़ों जागीरें थीं। राजा बलवंत सिंह मुग़ल दरबार में जाते रहते थे। वे शाहजहाँ के समकालीन थे जो कि मुग़ल स्थापत्य कला का स्वर्णकाल माना जाता है। राजा बलवंत सिंह ने मुग़ल स्थापत्य कला से प्रभावित होकर इन मंदिरों का निर्माण और मरम्मत कार्य करवाया था। इन मंदिरों का रख रखाव अच्छा नहीं है। पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर से नर्मदा का पूर्व की तरफ़ दस किलोमीटर से पश्चिम में दस किलोमीटर तक प्रवाह का विहंगम दृश्य दिखता है। संभवतः नर्मदा के पूरे प्रवाह में ऐसा नज़ारा सिर्फ़ वहीं से नज़र आता होगा। उत्तरी तट पर बिखरी हरियाली और पेड़ों के प्रतिबिम्ब नर्मदा में झिलमिल करते लुभावने लग रहे थे। पहाड़ियों के दक्षिण में दलहन के पीले खेतों के साथ गन्ने के खेतों के हरियाली बिखेरते नज़ारे थे।

जब हम गरारू घाट से सात बजे चले तब केरपानी घाट पर बना नर्मदा पुल और उसके बारह पाए स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन वह पाँच किलोमीटर दूर था। नर्मदा किनारे बखेरे खेतों से पगडंडी पकड़ी कहीं-कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई से मिट्टी गीली होने से रेतीले रास्ते पर चलना पड़ा। तीन नालों की गहराई बड़ी मुश्किल से पार कर पाए। बारह बजे के आसपास केरपानी पुल के नीचे डेरा जमाया वहाँ से दो किसान विधिविधान से अखंड परिक्रमा उठा रहे थे। उन्होंने भंडारा का आयोजन किया था, उसी में भरपेट प्रसादी ग्रहण की। उन दोनों ने कर्मकांड पूरा करके भोजन किया फिर विदाई देने आए साथियों के साथ गाँजे की संगत जमाई।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१ – सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१  ?

? सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

आग लिए तुम बदन में अपने,मुझे जलाने आ जाओ

अपनी रेशम सी ज़ुल्फ़ों में,मुझे सुलाने आ जाओ

=2=

हरियाली चहुँ ओर  छा गई,आया देखो सावन

अधरों से रस छलक न जाए, मुझे पिलाने आ जाओ

=3=

लता वृक्ष उपवन मदमाए, झूम उठी अमराई

अपनी बाहों के झूले में, मुझे झुलाने आ जाओ

=4=

पक्षी लगे मारने ताने,दर्द पपीहा बढ़ा रहा

अपनी कोकिल बोली से,मुझे बुलाने आ जाओ

=5=

आ भी जाओ सजनी अब,ये विरह सताये

चंद ख़ुशी की चाह में ‘राजेश’, ग़म को भुलाने आ जाओ ll

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५।)

☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆

? कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

26 जनवरी 2001 जब सम्पूर्ण भारत अपना राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस मना रहा था तभी सुबह के 8.46 मिनट पर कच्छ की भूमी में कंपन हुआl कंपन भी सामान्य नहीं अपितु अति भयंकरl जिसे देश ने सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा का नाम दे दियाl देखते ही देखते यहाँ के घर मलबों में परिवर्तित हो गयेl मलबों में लाखों लोग दब गयेl जहाँ कुछ बच्चों ने अपने माता -पिता को खो दिया वहीं कुछ पालकों ने अपनी आखों के सामने अपने लाड़लो को काल के मुँह में समाते देखाl देखते ही देखते लोग बेघर हो गयेl इतनी संख्या में मृत जन थे कि जलाने के लिये लकड़ियाँ भी कम पड़ गई थींl

जैसे ही ये समाचार सामने आया तब भारत की सरकारी, प्राइवेट, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जैसे संगठन एकजुट होकर मदद करने हेतु सामने आये l इन सभी ने निशुल्क स्वास्थ्य शिविर, भोजन, कपड़े और रहने हेतु टेंट देने शुरु कियेl

आश्चर्य ये था कि यहां के भुंगे मकानों को कुछ भी नहीं हुआl क्यूंकि ये भुंगे गोलाकार होते हैं जिससे भूकंप का इसके किसी एक कोने की दीवार पर दबाव नहीं पड़ताl हवा का दबाव इन्हें क्षति नहीं पहुँचाताl इनमे लगी ईटे मिट्टी, गोबर और घास फूस से बनी होती हैं l छत शंकु आकार की लकड़ी के खम्भों से बनी होती है तो हल्की हो जाती है जिससे भीतों पर वजन नहीं पड़ताl

इस भूकंप ने कच्छ को झिंझोड़कर कर रख दियाl पर ये अद्भुत शक्ति के लोग कहाँ हार मानने वाले थेl इन सभी ने पुनः मिलकर कच्छ के नवीनीकरण की शपथ ग्रहण लीl आज खावड़ा में सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा हाइब्रिड रीयूजेबल एनर्जी पार्क बनाया जा रहा हैl

इसी समय भारत सरकार ने तुरंत ही मुंद्रा पोर्ट को भारतीय रेल से जोड़ना शुरु कर दिया l सरकार ने यहां उद्योगों में करों में भारी छूट दे दीl इस पोर्ट को कार्गो हेतु पुरी तरह ऑटोमेटीक किया जिससे कम समय में ज्यादा सामान उतरने और चढ़ने लगा l देश की बड़ी कंपनियों ने यहां थर्मल पॉवर प्लांट लगाये जिससे विद्युत उत्पत्ति बढ़ गईl देखते ही देखते यह पोर्ट देश के कंटेंनर का करीब करीब 60% व्यापार देखने लगाl पोर्ट के विकास होने से लेबर से लेकर इंजीनियर को हर तरह का रोजगार मिलाl

वहीं कंडला पोर्ट जिसे हम दीनदयाल नाम से भी जानते है, ये पोर्ट हमारे देश के साथ एशिया का सबसे बड़ा सरकारी पोर्ट बन गयाl यह पोर्ट भी देश के सभी राज्यों से जुडा हुआ हैl ये पोर्ट मुख्य रूप से देश की बड़ी रिफाइनरी को कच्चा तेल सप्लाई करता हैl यह लिक्विड कार्गो पोर्ट की तरह काम करता हैl

आज ये दोनों पोर्ट फोर ट्रैक सड़क से जुड़ गये हैं l

दुनिया का कोई एसा देश नहीं जहाँ कच्छीयों ने अपना अधिपत्य न जमाया हो l ये कच्छी अति परिश्रमी, कभी ना हार मानने वाले, किसी भी परिस्थिति में कामयाबी पाने वाले होते हैंl

 हैं ना अद्भुत भूमि अद्भुत लोग?

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆ मुक्तक – ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆

☆ मुक्तक ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

जीवन में इतना भी नहीं   होना   सामान चाहिए।

क्यों भर रहे इतना कि कुछ लेना आराम चाहिए।।

जीवन के अंत समय बस दुआएं ही हैं साथ जाती।

जीवन में कुछ  अच्छा कमाया हुआ नाम चाहिए।।

=2=

क्रोध में वह सब मत गवाओं कि जो पास आया है।

शांत रह कर के जिन रिश्तों को    आपने कमाया है।।

संघर्ष को  बनाएं अपना दोस्त येआगे ले जाएगा।

बुद्धिविवेक धैर्य परिश्रम सेआदमी ने सब पाया है।।

=3=

संसार में जो भी समस्या उसका बना निदान भी है।

मत गवाओं अपना जीवन जो अनमोल महान भी है।।

एक दिन हम सब   कहानी  बन कर ही रह जाएंगे।

लोग कहें बाद में कि यह  एक अच्छा इंसान भी है।।

=4=

जिसने मुश्किलों का    सामना किया वो आगे बढ़ा है।

जिसने भाग्य को ही   कोसा वह आज वहीं खड़ा है।।

यह जीवन प्रभु  वरदान जैसा कि एक बार है मिलता।

वही बनता विजेता जाकर कि जो हालातों से लड़ा है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १४ – सैनिक भारत माता के!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता सैनिक भारत माता के!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १४ ☆

☆ सैनिक भारत माता के!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

मार भगाते सीमा से ही,

आता जो भी दुश्मन पास ।   

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

रक्षा करते हैं सरहद की,

छोड़ चले अपना घर बार ।

मारे देखो अरि को ऐसे,‌

शोणित बहता सीमा पार ‌‌।।

केवल हित भारत का चाहे,

नहीं हृदय में दूजी आस ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

राह निहारे बूढ़ी मैया,

खड़े हुए हैं बाबा द्वार ।

घर कब आओगे प्रियतम जी,

सजनी पूछे है हर बार ।।

कर्तव्यों को पूरा करके,

 आऊंगा रखना विश्वास ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

तन मन सब न्योछावर करके,

मातृभूमि की रखते आन ।

बनता है कर्तव्य हमारा,

शीश झुका कर दे सम्मान ।।

बांँध कफन वह सर पर रखते,

नहीं कराते हैं आभास ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८७ आणि ८८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८७ आणि ८८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८७ – – 

मुखी राम त्या काम बाधू शकेना ।

गुणे इष्ट धारिष्ट त्याचे चुकेना ।

हरिभक्त तो शक्त कामास मारी ।

जगी धन्य तो मारुती ब्रह्मचारी ।।८७।।

अर्थ : ज्या व्यक्तीच्या मुखी रामनाम आहे, त्याला कामवासना त्रास देऊ शकत नाही. नामाच्या शक्तीमुळे कामवासनेवर ताबा मिळवण्यासाठी लागणारे धैर्य त्याला आपोआप प्राप्त होते. नामामुळे सामर्थ्य प्राप्त झालेला भगवंताचा भक्त कामवासनेला सहज नष्ट करू शकतो. या गोष्टीचे मूर्तिमंत उदाहरण असलेला आणि ब्रह्मचर्याचे पालन करणारा मारुती जगामध्ये खरोखरच धन्य झाला आहे.

(काम – कामवासना, गुणे – त्या योगाने, शक्त – सामर्थ्य)

विवेचन :  काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर हे माणसाचे मोठे शत्रू आहेत. ठरवले तर क्रोध, मद, मोह आदी विकारांवर नियंत्रण मिळवणे सोपे असते. परंतु काम हा माणसाचा सर्वात मोठा शत्रू. त्यावर नियंत्रण प्राप्त करणे भल्याभल्यांनाही अवघड. विश्वामित्रांसारख्या तपस्वी ऋषींची तपश्चर्या मेनकेने भंग केली. पराक्रमी आणि विद्वान असलेला रावण आपल्या कामवासनेवर नियंत्रण मिळवू शकला नाही. त्यामुळे कामवासना जिंकणे अत्यंत अवघड. संसारी माणसाला कामवासनेचा मर्यादित उपभोग घेण्यास शास्त्रांची ना नाही. परंतु साधना करायची असेल तर संसारी व्यक्तीने देखील कामवासनेवर नियंत्रण ठेवणे क्रमप्राप्त असते. आपण ‘ काम ‘ आणि ‘ राम ‘ दोन्ही एकाच वेळी साध्य करू शकत नाही. ‘ राम ‘ हवा असेल तर ‘ काम ‘ सोडावा लागेल.

परंतु ज्याच्या मुखी रामनाम येते आहे, अशी व्यक्ती कामवासनेवर विजय मिळवू शकते. त्याला कामवासना बाधित करू शकत नाही. रामभक्त हनुमान हे याचे सर्वोत्तम उदाहरण आहे. त्याच्या हृदयात रामनामाचा अखंड जप सुरु आहे. त्यामुळे ‘ काम ‘ भावनेला तेथे थारा नाही. हनुमंत म्हणजे अखंड ब्रह्मचर्य पालन करणारा. मुखात रामनाम आणि ब्रह्मचर्य पालन यामुळे त्याच्या अंगी धैर्य, शक्ती यासारखे इष्ट गुण निर्माण झाले आहेत. त्याला ‘ काम ‘ विचलित करू शकत नाही. जेव्हा सीतेचा शोध घेण्यासाठी तो लंकेत गेला तेव्हा रावणाच्या अंतःपुरात अनेक सुंदर स्त्रिया नको त्या अवस्थेत त्याच्या नजरेस पडल्या. परंतु सदैव जो रामनामातच रंगला आहे, अशा महाबली हनुमंताला ते दृश्य विचलित करू शकले नाही. सीतेच्या समोरही तो आपल्या स्वतःचा तिचा पुत्र म्हणून उल्लेख करतो. म्हणूनच ब्रह्मचारी असलेला हनुमान जगात धन्य आहे.

म्हणून समर्थ म्हणतात, ” हरिभक्त तो शक्त कामास मारी ” जो कायम हरीची भक्ती करतो, असा सामर्थ्यशाली माणूस कामवासनेला मारून टाकण्यासाठी समर्थ असतो. अशा व्यक्तीचे नाम परा वाणीपर्यंत पोहोचलेले असते. परा वाणीचे केंद्र हे नाभीजवळ आहे असे म्हटले जाते. कामवासनेचे केंद्र देखील त्याच ठिकाणी आहे. एकदा का नाम नाभीपर्यंत परा वाणीच्या माध्यमातून पोहोचले की तेथे कामवासना राहूच शकत नाही. संत कबीर म्हणतात, ” जहाँ काम तहाँ राम कहाँ । जहाँ राम तहाँ काम कहाँ।”

स्वतः समर्थच या श्लोकाचे उत्तम उदाहरण आहेत. मुखी अखंड रामनाम आणि ब्रह्मचर्य पालन. त्यामुळे शक्ती, धैर्य हे गुण आपोआपच त्यांच्या ठायी वास करीत होते. त्यामुळे रामसेवेचे मोठे कार्य त्यांच्या हातून घडले. म्हणूनच तेही जगात धन्य आहेत.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या दैनंदिन व्यवहारात माझे मन बाह्य आकर्षणे किंवा विकारांमुळे विचलित होते का? अशा वेळी मी हनुमंताप्रमाणे रामानामाचा आश्रय घेतो का?

२. “जिथे काम तिथे राम नाही, आणि जिथे राम तिथे काम नाही, ” हे कबीरांचे वचन लक्षात ठेवून मी माझ्या मनात प्रभू श्रीरामांना अढळ स्थान दिले आहे का?

३. माझ्या हातून होणारे नामस्मरण केवळ ओठांवर (वैखरी) आहे, की ते नाभीपर्यंत (परा वाणी) पोहोचून माझ्या विकारांचे शुद्धीकरण करत आहे?

४. समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे, स्वतःमध्ये ‘धैर्य आणि शक्ती’ हे उत्तम गुण निर्माण करण्यासाठी मी रोजच्या धावपळीत जाणीवपूर्वक भगवंताचे नाम घेतो का?

===== 

श्लोक क्र. ८८ – – 

बहू चांगले नाम या राघवाचे ।

अती साजिरे स्वल्प सोपे फुकाचे ।

करी मूळ निर्मूळ घेता भवाचे ।

जिवा मानवा हे चि कैवल्य साचे ।।८८।।

अर्थ :  या रामाचे नाव अतिशय चांगले आहे. ते सुंदर, छोटेसे, म्हणायला सोपे आणि बिनखर्चाचे आहे. हे नाम भवाचे म्हणजे संसाराचे मूळ कारणच नाहीसे करते. हे नाम मोक्ष किंवा परमात्म्याचे दर्शन घडवणारे आहे.

(साजिरे – सुंदर /शोभून दिसणारे, स्वल्प – छोटेसे, फुकाचे – बिनखर्चाचे, मूळ – मूळ कारण, निर्मूळ – समूळ उच्चाटन करणे, कैवल्य – मोक्ष/चिरंतन सुख, साचे – नक्कीच/खरोखर)

विवेचन :  या श्लोकात समर्थ नामाचे महत्व पुन्हा एकदा स्पष्ट करतात. ‘ राम ‘ हे नावच किती चांगले आहे! सुंदर आहे, अल्पं आहे. ते घेण्यास कोणताही खर्च करावा लागत नाही. बरं, हे नाव घ्यायचे तरी कशासाठी? तर समर्थ सांगतात की हे नाम ज्या संसारात येऊन माणूस सुखदुःखे भोगतो, जन्ममरणाच्या फेऱ्यात अडकतो, त्याचे मूळ कारणच नाहीसे करणारे आहे. हे मूळ कारण नाहीसे करते म्हणजे तरी काय करते? तर हे नाम कैवल्यप्राप्ती करून देणारे आहे. कैवल्य म्हणजे मोक्ष. मोक्ष म्हणजे चिरंतन सुख! तेच प्राप्त करून देणारे हे रामनाम.

एखादी छोटीशी परिणामकारक गोळी असावी आणि ती घेतल्याने आजार समूळ नाहीसा व्हावा तशी ही गुटिका आहे. दिसायला छोटी पण अत्यंत परिणामकारक. ज्याने ज्याने ती घेतली, त्याचा भवंताप नाहीसा झाला. पण खरे कारण असे की आमचा विश्वासच यावर बसत नाही. एक छोटेसे दोन अक्षरांचे नाम. त्याच्यात एवढे सामर्थ्य कसे असेल? पण त्याच्यातील सामर्थ्याचा प्रत्यय तेव्हाच येईल, जेव्हा ते मनापासून घेतले जाईल. वाल्या कोळ्याने रामनाम घेतले आणि अखिल विश्वाला वंदनीय अशा वाल्मिक ऋषींमध्ये त्याचे रूपांतर झाले. त्यांच्या हातून ‘ रामायण ‘ हा अजरामर ग्रंथ लिहिला गेला. रामाचे नाव काय करू शकत नाही. समुद्रात सेतू बांधणाऱ्या वानर सेनेने दगडावर फक्त ‘ राम ‘ असे लिहिले आणि काय आश्चर्य! ज्या दगडांचा मूळ गुणधर्म पाण्यात बुडण्याचा, ते चक्क पाण्यावर तरले. एवढेच नाही तर त्यावरून रामाची सेना लंकेला पोचली.

या भवसागरात आपल्यालाही तरून जायचे असेल तर हृदयामध्ये ‘ रामनामाला ‘ स्थान देणे जरूर आहे. अन्यथा पाषाणात आणि आपल्यात काही फरक राहणार नाही. बुडणे हे ठरलेले. रामनाम ही या भवसागरातून तारून नेणारी नौका आहे. बरं, हे नाम तरी किती सोपं, सुंदर आणि बिनखर्चाचे. बसल्या बसल्या, काम करताना तुम्ही केव्हाही ते घेऊ शकता. त्यातली गोडी ही अनुभवावी लागते. ती सांगून कळत नाही. अनुप जलोटा यांनी गायिलेले भजन ‘ जगमें सुंदर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम.’ आपल्याला माहिती असेल. ‘ राम ‘ या दोन अक्षरी शब्दात ‘ र ‘ हे अक्षर अग्निवर्णाचे निदर्शक आहे तर ‘ म ‘ हे अक्षर चंद्राची शीतलता दाखवणारे आहे. थोडक्यात म्हणजे ‘राम ‘ या शब्दात सूर्यशक्ती आणि चंद्रबल यांचा मिलाफ आहे. ते संतुलित आहे. म्हणूनच ज्याने ते घेतले, त्याच्या आयुष्यात संतुलन साधले जाते. ‘ जय जय राम, जय श्रीराम, दो अक्षर का प्यारा नाम, रामनाम के जपनेसेही बन जाते सब बिगडे काम. ‘

रामनाम घेण्याची मनाला सवय लावली तरच आयुष्याच्या अखेरीस मुखात रामनाम येईल. हे घडले तर कैवल्यप्राप्ती आहेच. मन विषयविकारात अडकले तर अखेरीस ओठावर रामनाम न येता अन्य कशात तरी मन अडकेल आणि मग पुन्हा जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यात आपण अडकू. रामनामाचा जप केल्याने साधक रामरूप होतो. तुकाराम महाराज म्हणतात, “राम म्हणता रामच होईजे, पदी बैसोनि पदवी घेईजे. “

स्वसंवाद :: 

१. जे नाम अतिशय सुंदर, सोपे आणि ‘फुकाचे’ (बिनखर्चाचे) आहे, ते घेण्यासाठी मी आळस करतो की अत्यंत आदराने त्याचा स्वीकार करतो?

२. संसारातील सुखांमध्ये रमून मी केवळ ‘बुडणाऱ्या पाषाणासारखे’ आयुष्य जगत आहे, की रामनामाची नौका धरून या भवसागरातून ‘तरून’ जाण्याचा प्रयत्न करत आहे?

३. माझ्या आयुष्यात सुख-दुःखाचे प्रसंग येताना मानसिक संतुलन राखण्यासाठी, मी रामनामातील सूर्यशक्ती आणि चंद्रबलाचा अनुभव घेतो का?

४. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे, “राम म्हणता रामच होईजे” या अवस्थेपर्यंत पोहोचण्यासाठी मी माझ्या मनाला नामस्मरणाची अखंड सवय लावत आहे का?

क्रमशः श्लोक ८७ आणि ८८

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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