हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२७ ☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अभिमानी–स्वाभिमानी। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ  / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२७ ☆

☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘अभिमानी और स्वाभिमानी में केवल इतना-सा  फ़र्क़ है कि स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी से कुछ मांगता नहीं और अभिमानी व्यक्ति किसी को कुछ देता नहीं।’ अहंकार में डूबे व्यक्ति को न तो ख़ुद की ग़लतियाँ दिखाई देती है, न ही दूसरों की अच्छी बातें उसके अंतर्मन को प्रभावित करती हैं। उसे विश्व मेंं स्वयं से अधिक बुद्धिमान कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। वैसे भी छिद्रान्वेषण अर्थात् दूसरों में दोष-दर्शन की प्रवृत्ति मानव में स्वाभाविक रूप से होती है। उसे सभी लोग दोषों व बुराइयों का आग़ार भासते हैं और वह स्वयं को दूध का धुला समझता है। दूसरी ओर जहाँ तक स्वाभिमानी का संबंध है, उसमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा होता है और वह स्व अर्थात् मैं में विश्वास रखता है और उसका अहं उसे दूसरों के सम्मुख नत-मस्तक नहीं होने देता। उसे प्रभु में आस्था होती है और वह ‘तुम कर सकते हो’ के विश्वास के सहारे बड़े से बड़ा कार्य कर गुज़रता है, क्योंकि उसके शब्दकोश में असंभव शब्द होता ही नहीं है।

‘सफलता हासिल करने के लिए मानव का विश्वास भय से बड़ा होना चाहिए, क्योंकि असफलता का भय ही सपनों के साकार करने में बाधा बनता है। यदि आप भय पर विजय पा लेते हैं, तो आपकी विजय निश्चित् है’ प्लेटो का यह संदेश अत्यंत कारग़र है। यदि हमारा लक्ष्य निश्चित् और हृदय में आत्मविश्वास है, तो कोई भी बाधा आपका पथ नहीं रोक सकती। इसलिए कहा जाता है,’मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ हमारा मन ही जय-विजय का कारक है। सो! ‘विजयी भव’ एक सर्वश्रेष्ठ भाव है, जिसके साथी हैं– विद्या, विनय व विवेक। इन मानवीय गुणों के आधार पर हम आपदाओं से मुकाबला कर सकते हैं। विनम्रता सर्वोत्तम गुण है, जो अहंनिष्ठ व्यक्ति के हृदय से कोसों दूर रहता है। इसके लिए वस्तुस्थिति का ज्ञान होने के साथ- साथ यथा-समय लिया गया निर्णय भी हमें सफलता की सीढ़ियों पर पहुंचाता है। दु:ख में धैर्य का बना रहना अत्यंत आवश्यक व सार्थक है।

‘कोई भी चीज़ आपके लिए फायदेमंद नहीं हो सकती, जिसे पाने के लिए आपको आत्म- सम्मान से समझौता करना पड़े।’ मार्क्स ऑरेलियस का यह तथ्य आत्म-सम्मान को सर्वश्रेष्ठ समझ समझौता न करने का सुझाव देता है। सो! समझौता परिस्थितियों से करना चाहिए, आत्म-सम्मान से नहीं, क्योंकि जब उस पर आँच आ जाती है; तो व्यक्ति सिर उठा कर नहीं जी सकता। ऐसी स्थिति में प्रभु शरणागति कारग़र उपाय है। मुझे स्मरण हो रही हैं दुष्यंत की यह पंक्तियाँ ‘कौन कहता है आकाश में सुराख हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ से हमें यह संदेश मिलता है कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, सिर्फ़ आप में जज़्बा होना चाहिए उस कार्य को अंजाम देने का। ‘राह  को मंज़िल बनाओ, तो कोई बात बने’ में भी यही सोच व भाव निहित है। जब हम दृढ़-संकल्प कर उन राहों पर  निकल पड़ते हैं, तो हमारा मंज़िल पर पहुंचना निश्चित हो जाता है। लाख आँधी, तूफ़ान व सुनामी भी आपके पथ के अवरोधक नहीं बन सकते।

स्वाभिमान व आत्मविश्वास पर्यायवाची हैं तथा एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनकी महत्ता को नकारना असंभव है। सो! हमारे हृदय में शंका भाव नहीं आना चाहिए, क्योंकि यह तनाव की स्थिति का द्योतक है, जो हमें पथ-विचलित करता है। भगवद्गीता में भी यही संदेश दिया गया है कि सुख का लालच व दु:ख का भय मानव के अजात शत्रु हैं। यदि मानव भविष्य के प्रति आशंकित रहता है, तो वह वर्तमान के अपरिमित सुखों से वंचित हो जाता है, क्योंकि यही है दु:खों का मूल। व्यक्ति जीवन में अधिकाधिक धन-सम्पदा व पद-प्रतिष्ठा पाना चाहता है, परंतु उसको एवज़ में छोड़ना कुछ भी नहीं चाहता; जबकि संसार का नियम है ‘एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले’ अर्थात् जो भी आप इस संसार में देते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। वैसे भी आप एक साँस छोड़े बिना बिना दूसरी साँस नहीं ले सकते। यह संसार का नियम है कि इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ लौट जाना है। केवल सत्कर्म ही उसके साथ जाते हैं। इसलिए मानव हरपल प्रभु का सिमरन तथा समय का सदुपयोग करना चाहिए।

अहंनिष्ठ प्राणी आजीवन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में उलझा रहता है। वे उसे अपना गुलाम बनाए रहती हैं। उसके कदम धरा पर नहीं टिकते। वह केवल दूसरों की भावनाओं को आहत नहीं करता, बल्कि अपना जीवन भी नरक बना लेता है तथा आजीवन इसी उधेड़बुन में खोया रहता है। डॉ वसुधा छवि का यह कथन भी इस तथ्य की सार्थकता सिद्ध करता है कि ‘जब व्यक्ति के पास पैसा होता है, तो वह भूल जाता है कि वह कौन है और जब पैसा नहीं होता, तो लोग भूल जाते हैं कि वह कौन है,’ यही जीवन का कटु यथार्थ है। धन-लिप्सा उसे अपने शिकंजे साथ बाहर नहीं निकलने देती और वह इस भ्रम में अपने जीवन के प्रयोजन को भुला बैठता है। मानव स्वार्थी है और संसार व संबंध मिथ्या। मानव केवल स्वार्थ साधने हेतू संबंध साधता है और उसके पश्चात् उसे भुला देता है। इतना ही नहीं, वह माया महा-ठगिनी के मायाजाल में आजीवन उलझा रहता है और लख चौरासी से मुक्त नहीं हो सकता।

सहारे मानव को खोखला कर देते हैं और उम्मीदें कमज़ोर। मानव को अपने बल पर जीना प्रारंभ करना चाहिए क्योंकि उसका आपसे अच्छा साथी व हमदर्द कोई दूसरा नहीं हो सकता। वैसे भी ‘मंज़िलें बड़ी जिद्दी होती हैं/ हासिल कहाँ नसीब से होती हैं/ मगर तूफ़ान भी वहां हार जाते हैं/ जहां कश्तियां ज़िद पर होती हैं।’ जी हां! यदि मानव का हृदय साहस व धैर्य से लबालब है, तो तूफ़ान भी रुक जाते हैं और व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ सिद्ध होता है। जब मन रूपी कश्ती ज़िद पर होती है, तो तूफ़ानों को अपने रास्ते से हट जाना पड़ता है, क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी नहीं ठहर नहीं सकता। मानव को न तो किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उम्मीद रखनी चाहिए, क्योंकि दोनों स्थितियां उसके मनोबल को तोड़ती हैं। मानव स्वयं अपना साथी व हमदर्द है। इसलिए जीवन में अपेक्षा व उपेक्षा को त्याग कर जीवन पथ पर बढ़ते जाना चाहिए, अन्यथा यह मानव को अवसाद की स्थिति में ले जाती है। मानव को अहं को शत्रु समझ अपने आसपास नहीं आने देना चाहिए और आत्मविश्वास को धरोहर सम संजोए रखना चाहिए, क्योंकि आत्मविश्वास के बल पर आप असंभव कार्य को भी कर गुज़रते हैं। इसलिए आत्मसम्मान से कभी भी समझौता न करें, क्योंकि जिसमें आत्मविश्वास है, वह सिर उठाकर जीता है; किसी के सम्मुख घुटने नहीं टेकता और न ही नतमस्तक होता है। सो! अभिमानी नहीं;  स्वाभिमानी बनें और अपने मान-सम्मान व प्रतिष्ठा को क़ायम रखें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध … ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – युद्ध के विरुद्ध 

? रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध …  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े।

दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।।

*

 है चकित, यह धरा, शांत आकाश है।

 रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।।

 वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके।

 मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।।

 स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े।

*

नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं।

ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।।

लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते।

उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।।

आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े।

*

है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते।

भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।।

धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है।

कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।।

मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े।

*

शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया।

नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।।

रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो।

हो विजय, सत्य की, झूठ की हार हो।।

गिर गये, हैं मुकुट, भ्रात मोती जड़े।

*

युद्ध की, त्रासदी, भोगते लोग सब।

धैर्य सब, खो दिया, मौत का योग अब।।

संधि की, दूर सब, देख संभावना।

चैन की, लोग बस, कर रहे याचना।।

ये कदम, क्यों भला, युद्ध के हैं पड़े।

*

यह धरा, तो बनी, देख श्मशान है।

धूल में, है मिला, राष्ट् का मान है।।

युद्ध है, हल नहीं, शांति की बात हो‌।

विश्व को, शांति की, कृष्ण सौगात हो।।

रो रही, है प्रजा, प्रण लिए क्यों कड़े।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२७ ☆ भावना के दोहे – प्रिय ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रिय)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रिय ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रहा भटकता रात दिन, खोकर सारे होश।

ख्वाब तुम्हारे देखता, मिलने का है जोश।।

मिले सहारा आपका, बस इतनी-सी आस।

तुम्हें खोजने में लगे, यही-कहीं हो पास।।

 *

कहना तुमसे बहुत कुछ, देना स्वयं जबाव।

प्यार किया है आपसे, करना यही हिसाब।।

 *

रात घनेरी हो रही, मिल जाओ तुम आज।

अंतर्मन में प्रिय बहुत, सजा रखे हैं साज।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०९ ☆ कविता – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०९ ☆

कविता – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! ☆ श्री संतोष नेमा ☆

बढ़ती  गर्मी   अरु   महंगाई |

तेल   भी  ले  रहा  अंगड़ाई ||

नहीं  नियंत्रण  राज तंत्र का |

कौन   लगाम  लगाए  भाई ||

*

यू एस ए   ईरान  न   झुकते |

कहाँ  युद्ध  से   दोनों  रुकते |

सबकी ऊंची नाक  यहाँ  पर |

यहाँ आम जन ही सब भुगते ||

हार्मोज  पर  नजर  सभी की |

समझो  सब  इनकी  चतुराई |

बढ़ती    गर्मी    अरु  महंगाई ||

*

महंगाई   की   मार  बहुत  है |

आंसुओं  में   धार   बहुत   है ||

गर्मी   में   जब  बहे   पसीना |

लगता  है  तब  खार  बहुत है ||

बैठे   नेता   सब   ए   सी   में |

मेहनतकश  की क्या सुनवाई ||

बढ़ती    गर्मी    अरु  महंगाई ||

*

आम   आदमी    की   लाचारी |

महंगाई   जिस   पर   है  भारी ||

कैसे   चलता   घर  गरीब  का |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १४ ☆ गीत – जीवन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  गीत – जीवन।)

☆ मंजिरी साहित्य # १४ ☆

? गीत – जीवन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

जीवन को अनमोल बनाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

बधाओं से पार निकलना l

सतत वेग से आगे चलना ll

हसते और हँसाते जाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

सुख दुःख पथ के अविरल राहीl

कर्म बनेंगे मंजिल चाही ll

नित सोपान चढ़ते जाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

असत्य राह त्याग कर जाएं l

मन को सुख की राह दिखाएंll

जीवन बगिया तुम महकाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २८ – कविता – प्रेरणा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रेरणा।)

☆ शशि साहित्य # २८ ☆

? कविता – प्रेरणा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

कोई हमको याद करे,

क्यों बने मोहताज…

यादों में बस जाएं,

ऐसे रखें जज्बात…

कदमों के निशां ढूंढ़ें,

बनें सहज सुजान…

कर्मों से रौशन करें,

बन जाएं वो मशाल…

मेहनत की जयकार हो,

रचना है यह इतिहास…

प्रयास ये, कि संग सबका हो विकास…

नहीं थमना, नहीं रुकना अब,

समय मिलता है अल्प…

बने सबकी मुस्कान का कारण,

लेना है यह संकल्प…

स्वार्थ त्याग से ही होता है,

वंदित, जग में नाम,

यादों में बस जाएं,

बस… करना है ऐसे काम…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९९ – मेघ बरसले…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९९ – विजय साहित्य ?

☆ मेघ बरसले…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(वृत्त – अनलज्वाला)

(मात्रा विभाग : ८-८-८ = २४  ( | प | प | प | )

मेघ निघाले,रजा घेउनी,

धरतीवरती

सोसाट्याचा वादळ वारा

अवती भवती .

 

सरी बरसल्या, उन्हात न्हाल्या,

हलके हलके

श्रावण धारा, तना बिलगल्या,

लटके लटके.

 

गंध शिवारी, ‌पेरत वारा,

वर्षा आली

तहानलेली, चिमण पाखरे,  तृप्त जाहली.

 

बहुरुपी जणू ,मेघ जाहले,  प्रकार नाना

येता येता,प्रत्येकाच्या, झुकल्या माना.

 

सर मायेची ,रमवी रिझवी, चरा चराला,‌

कृष्ण घनांची,तहान लागे,  घरा घराला.

 

रवि किरणांची, लपाछपी ही,

बघतो कोणी

रिता खजिना, त्या वरुणाचा,

भरल्या गोणी.

 

हिरव्या पानी, वाजत गाजत,

मेघ उतरले

सर सर झप झप, पावसात या,

मेघ बरसले.

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – २६ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – २६ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

व्यावहारिक ज्ञान

ठरल्याप्रमाणे लेखमालेच्या या २६व्या भागात आपण तुकाराम महाराजांच्या काही व्यावहारिक ज्ञानाविषयीच्या अभंगांचा विचार करू.

दान, धर्म, पुण्य कर्म करणे हे प्रत्येक माणसाचे कर्तव्य आहे, परंतु पुण्य कर्म करताना ते योग्य ठिकाणी, योग्य प्रकारे करणे हे अत्यंत महत्त्वाचे आहे.

या अभंगात महाराज काय सांगतात पहा…

सर्वांभूती द्यावे अन्न/ द्रव्य पात्र विचारोन//

उपतिष्ठे कारण/ तेथे बीज पेरीजे//

सर्व भूतमात्रांना अन्नदान करावे, पण द्रव्य मात्र योग्यता पाहूनच द्यावे. जेथे बी उगवेल असे वाटते तेथेच ते पेरावे. थोडक्यात दान हे सत्पात्री असावे.

पुण्य करिता होय पाप/ दुग्ध पाजोनी पोशीला साप//

करोनी अघोर जप/ दुःख विकत घेतले//

भूमी पाहता नाही वेगळी/ माळ बरड एक काळी//

उत्तम निराळी/ मध्यम आणि कनिष्ठ //

म्हणोनी विवेके /काही करणे ते निके//

तुका म्हणे फिके/ रुची नेदी मिष्ठान्न//

सापाला दूध पाजले तर पुण्य कर्म न होता पाप होते, कारण दूध पिऊनही साप गरळच ओकणार. एखादा जारण मारण मंत्र म्हणून दुसऱ्याचे वाईट करता करता, आपले स्वतःचेच वाईट करून घेतो. पृथ्वी सगळी सारखी असली तरी त्यातही माळ जमीन, खडकाळ जमीन, काळी जमीन, कमी जास्त कसाची जमीन असे भेद असतात, म्हणून कोणतीही गोष्ट करताना विचारपूर्वक करणे, नीट पारखून करणे फार महत्त्वाचे आहे. मिष्ठान्न केले आणि त्यात साखरच घातली नाही, तर ते चविष्ट लागेल का? याचसाठी आयुष्यात कोणतीही गोष्ट मोठ्या विवेकाने केली पाहिजे.

माणूस कसा ओळखावा याविषयी तुकाराम महाराज सांगतात.

नाही सर्व येत जोडील्या वचनी/

कवित्वाची वाणी कुशलता//

सत्याचा अनुभव वेधी सत्यपणे/

अनुभवाच्या गुणे रुचो येते//

काय आगी पाशी शृंगारिले चाले/

पोटीचे उकले कसा पाशी//

तुका म्हणे येथे करावा उकल/

लागेचिना बोल वाढवूनी//

मनात ईश्वराची भक्ती नसताना जर कोणी शब्दाला शब्द जोडून काव्य करील तर ते देवाला कसे मान्य होईल? ज्याच्या ठिकाणी खरा अनुभव आहे, त्याच्या बोलण्याने दुसऱ्याला वेधक वाटते कारण ते सत्य असते. अनुभवामुळे त्यातील तथ्य कळते. तुकाराम महाराज अधिक स्पष्टतेसाठी उदाहरणे देतात. हिणकस धातूला सोन्याचा मुलामा केला तर तो शृंगार अग्निपुढे उघडा पडतो. आणि कसोटी पुढे त्याच्या आतील हिणकस धातू ओळखू येतो. ज्या ठिकाणी हृदयात खरा अनुभव असेल तेथे स्पष्टीकरण देण्याची जरुरी पडत नाही, खरी योग्यता लगेच कळते. ते पुढे म्हणतात…

लचाळाच्या (अजागळ) कामा नाही ताळा वाळा/

न कळे ओंगळा उपदेश//

वचनचर्येची नकळे चाचणी/

ऐसी संघस्टनी अमंगळ//

समय न कळे वेडगळ बुद्धी/

विजाती ते शुद्धीचाच चाट//

तुका म्हणे याचा धिक्कारची बरा/

बहुमती खराहुनी हीन//

याचाच अर्थ असा की, जो कोणी अजागळ मनुष्य आहे, त्याच्या कामात काहीच ताळमेळ नसतो आणि त्या मुर्खाला (महाराज त्याला घामट म्हणतात) कितीही समजावून सांगितले तरी त्याची समजण्याची क्षमताच नसते. त्याला शास्त्र, त्यातील मर्म, काही कळत नाही. तेव्हा अशा लोकांपासून चार हात दूरच राहावे. या मतिमंद लोकांना काळ, वेळ समजत नाही. त्यांची बुद्धी विसंगत असते. अशा लोकांपासून दूर राहणे उत्तम! अशी कितीतरी माणसे आपल्या आयुष्यात येतात. ” बरे बाबा तुझेच खरे. ” असे बोलून जास्त वाद न घालता त्याच्यापासून लांब जावे असे महाराज सांगतात. अशा माणसांच्या बुद्धीला अनेक फाटे फुटतात. ते लोक गाढवाहुनही नीच समजावे. त्यांचा धिकार करावा.

स्वभावोदुरतिक्रमः– भिन्न भिन्न स्वभावाची माणसे रोजच्या रोज आपल्या जीवनात येत असतात. महाराज म्हणतात की ज्यांचा स्वभावच चोरी करण्याचा असतो, त्यांच्या ध्यानीमनी तोच ध्यास असतो.

चोराचिया धुडका मनी / वसे ध्यानी लांछन//

त्याचप्रमाणे पाऊस पडावा तसे आम्ही बोलत असतो. परंतु ज्यांच्या अंगी दोषच आहेत त्याला आमचे बोलणे झोंबते. आम्ही हिताचे बोललो तरी त्याची तडफड होते. आपल्यालाही हा अनुभव वारंवार येतो कारण आपले सरळ बोलणे समोरचा वाकडेच धरतो. अशा माणसांच्या वाऱ्याला उभे राहू नये.

एक एका सहाय्य करू/ अवघे धरू सुपंथ//

कोण जाणे कैसे परी/ पुढे उरी ठेविता//

अवघे धन्य होऊ आता/ स्मरविता स्मरण//

तुका म्हणे अवघी जोडी/ ते आवडी चरणांची//

यासाठी तुकाराम महाराज सर्व लोकांना सांगतात की, तुम्ही आम्ही मिळून एकमेकांच्या सहाय्याने चांगल्या वाटेवरून चालू या, चांगले जगूया, नाहीतर म्हातारपणी परमार्थ करू अशी चालढकल केली तर पुढे काय वाढून ठेवले आहे ते कोणास ठावे? म्हणून उद्या वर काही ढकलू नका. जे काही करायचे ते आज करा, आत्ता करा. नामस्मरण करणारा व करून घेणारा असे आपण सर्वजण धन्य होऊ. विठोबाच्या चरणांची आवड धरली म्हणजे सर्व काही जोडले जाते व महान पुण्य प्राप्त होते.

चित्त शुद्ध तरी शत्रु मित्र होती/

व्याघ्रही न खाती सर्प तया//

विष ते अमृत आघात ते हित/

अकर्तव्य नीत होत त्यासी//

दुःख ते देईल सर्व सुख फळ/

होतील शितळ अग्नी ज्वाळा//

आवडेल जीवा जीवाचिये परी/

सकळा अंतरी एक भाव//

तुका म्हणे कृपा केली नारायणे/

जाणिजे ते येणे अनुभवे//

तुकाराम महाराज सांगतात, आपले चित्त शुद्ध असेल तर शत्रूही मित्र होतात. वाघासारखे हिंस्र आणि सापासारखे विषारी प्राणी आपल्याला काही त्रास देत नाहीत. (भगवान शंकराच्या गळ्यातील नागाप्रमाणे) विषाचे अमृत होते.

मीराबाईच्या सच्य्या भक्तीमुळेच तिने राणाजीने दिलेला विषाचा प्याला रिचविला.

शरीरावर आघात झाले तरी ते हितकर ठरतात. आपल्या हातून चुकून एखादे अनुचित कर्म घडले पण ते नीतीला धरून असले तर शुभंकरच ठरेल. दुःखातही सुख प्राप्त होईल आणि आगीचा जाळ शांत होईल. शुद्ध चित्ताचा माणूस लोकांना प्राणप्रिय असेल. त्याच्याविषयी सर्वांच्या मनात आदरभावच राहील. असा अनुभव स्वतःबद्दल ज्याला येतो त्याला भगवंत कृपावंत झाला आहे असे समजावे.

कंथा प्रावर्ण/ नव्हे भिक्षेचे ते अन्न//

करी यापरि स्वहित/ विचारूनी धर्मनित//

देऊळ नव्हे घर/ प्रपंच परउपकारक//

विधीसेवन काम/ नव्हे शब्द राम राम//

हत्या शास्त्र धर्म/ नव्हे निष्काम ते कर्म//

तुका म्हणे संती/ करुनी ठेविली आईती//

वरील अभंगात तुकाराम महाराज काय सांगतात?

व्यावहारिक आणि अध्यात्मिक दृष्टीने काही वस्तूंमध्ये कसा फरक असतो याविषयी महाराज बोलतात.

संन्याशाची कंथा(झोळी) आणि सामान्य जनांची वस्त्रे सारखी समजू नयेत. त्याचप्रमाणे पवित्र भिक्षान्न इतर अन्नाप्रमाणे समजू नये. धर्म व नीती विचारात घेऊन स्वहित साधावे. देवालय हे इतर घरांप्रमाणे सामान्य घर नव्हे. परोपकार करताना तो संसारी माणूस इतरांप्रमाणे नव्हे. शास्त्राने सांगितलेल्या नियमांनुसार विषय सेवन केले असता तो माणूस विषयलोलूप नव्हे. राम हा शब्द इतर शब्दांप्रमाणे साधा नाही. क्षत्रियाने युद्धात शत्रूचा वध केल्यास ती हत्या न होता क्षात्रधर्मपालन होते. आणि निष्काम बुद्धीने केलेले कोणतेही कर्म हे इतर कर्माप्रमाणे बंधक नाही. हे नीतिशास्त्र आहे, याप्रमाणे सर्वांनी वागावे.

याचाच अर्थ असा रोजच्या जीवनात इतरांसमवेत वावरत असताना व्यावहारिक ज्ञान वापरून आणि नैतिक धर्माचे पालन करून माणसाने आपले आचरण ठेवावे.

क्रमशः… २६ 

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ॥ गंगालहरी॥ ☆ भाग – ३ – कवी : श्री जगन्नाथ पंडित ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ॥ गंगालहरी॥ ☆ भाग – ३ – कवी : श्री जगन्नाथ पंडित ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

श्लोक २१ ते ३० 

श्लोक

समुत्पत्तिः पद्मारमणपदपद्मामलनखा-

न्निवासः कन्दर्पप्रतिभटजटाजूटभवने ।

अथाऽयं व्यासङ्गो हतपतितनिस्तारणविधौ

न कस्मादुत्कर्षस्तव जननि जागर्तु जगति ॥ २१॥

*

नगेभ्यो यान्तीनां कथय तटिनीनां कतमया

पुराणां संहर्तुः सुरधुनि कपर्दोऽधिरुरुहे ।

कया वा श्रीभर्तुः पदकमलमक्षालि सलिलै-

स्तुलालेशो यस्यां तव जननि दीयेत कविभिः ॥ २२॥

*

विधत्तां निःशङ्कं निरवधि समाधिं विधिरहो

सुखं शेषे शेतां हरिरविरतं नृत्यतु हरः ।

कृतं प्रायश्चित्तैरलमथ तपोदानयजनैः

सवित्री कामानां यदि जगति जागर्ति जननी ॥ २३॥

*

अनाथः स्नेहार्द्रां विगलितगतिः पुण्यगतिदां

पतन् विश्वोद्धर्त्रीं गदविगलितः सिद्धभिषजम् ।

सुधासिन्धुं तृष्णाकुलितहृदयो मातरमयं

शिशुः सम्प्राप्तस्त्वामहमिह विदध्याः समुचितम् ॥ २४॥

*

विलीनो वै वैवस्वतनगरकोलाहलभरो

गता दूता दूरं क्वचिदपि परेतान् मृगयितुम् ।

विमानानां व्रातो विदलयति वीथिर्दिविषदां

कथा ते कल्याणी यदवधि महीमण्डलमगात् ॥ २५॥

*

स्फुरत्कामक्रोधप्रबलतरसञ्जातजटिल-

ज्वरज्वालाजालज्वलितवपुषां नः प्रतिदिनम् ।

हरन्तां सन्तापं कमपि मरुदुल्लासलहरि-

च्छटाचञ्चत्पाथःकणसरणयो दिव्यसरितः ॥ २६॥

*

इदं हि ब्रह्माण्डं सकलभुवनाभोगभवनं

तरङ्गैर्यस्यान्तर्लुठति परितस्तिन्दुकमिव ।

स एष श्रीकण्ठप्रविततजटाजूटजटिलो

जलानां सङ्घातस्तव जननि तापं हरतु नः ॥ २७॥

*

त्रपन्ते तीर्थानि त्वरितमिह यस्योद्धृतिविधौ

करं कर्णे कुर्वन्त्यपि किल कपालिप्रभृतयः ।

इमं त्वं मामम्ब त्वमियमनुकम्पार्द्रहृदये

पुनाना सर्वेषामघमथनदर्पं दलयसि ॥ २८॥

*

श्वपाकानां व्रातैरमितविचिकित्साविचलितै-

र्विमुक्तानामेकं किल सदनमेनःपरिषदाम् ।

अहो मामुद्धर्तुं जननि घटयन्त्याः परिकरं

तव श्लाघां कर्तुं कथमिव समर्थो नरपशुः ॥ २९॥

*

न कोऽप्येतावन्तं खलु समयमारभ्य मिलितो

यदुद्धारादाराद्भवति जगतो विस्मयभरः ।

इतीमामीहां ते मनसि चिरकालं स्थितवती-

मयं सम्प्राप्तोऽहं सफलयितुमम्ब प्रणय नः ॥ ३०॥

☆ ☆ ☆ ☆

मराठी भावानुवाद – – 

पद्मासम सुंदर विष्णूपद नखापासुनी जन्म

अनंगारिच्या जटाजुटात तुझे निवास स्थान

उद्धारास्तव पतितांच्या त्या जीवनात तू मग्न

उत्कर्ष श्रेष्ठतम आहे तव या समस्त विश्वातून ॥२१॥

*

दुजी नगनदी नाही केली शिवशंभू धारण

कोण्या नदीने नाही केले केशवपद क्षालन

अशी न सरिता ठायि जिच्या तव उपमेचा लेश

सर्वश्रेष्ठ हे भागीरथी तू दिव्यत्वाचा अंश ॥२२॥

*

विरंचि लावो समाधि त्याची निरंतर वा अनंत

शेषशयन हरि करो वा हर तांडव ते नृत्य

यज्ञ दान तप कशास प्रायश्चित्ताचे कांड ते

जगात जोवर तुझी जननी गे जागृती जागते ॥२३॥

*

अनाथ गतिहिन व्याधीग्रस्त मी पातकी जरी

तृषार्त स्नेहासी होउनिया आर्त मनी मी उरी

सुधासिंधु वैद्यसिद्ध ते समस्त जग उद्धरी

शिशू पातला शरण तयासी भले तेच तू करी ॥२४॥

*

अवतरली अवनीवरती तव गाथा मंगलदायी

यमनगरीतिल पापिजनांचा आक्रोशहि कमी होई

अस्तित्व तुझे नाही तेथे दूत यमाचे जाती

पतीत पापी कुठे मिळति का याचा शोध घेती ॥२५॥

*

क्रोधे उद्भवलेल्या जटिल तेज ज्वरांच्या ज्वाला

संतापाने जाळित अमुच्या जर्जर देहाला

पवन प्रवाहे चंचल तुझिया जलकण लहरींनी

ताप हरो हा सदैव अमुचा माते तू प्रतिदिनी ॥२६॥

*

ब्रह्माण्डाचा आश्रय सकल भुवनासी सर्वत्र

ज्याच्या लहरींनी आहे स्थित जणू तेंदूपत्र

शिवजटेतुनी जटिल जाहला जलप्रवाह जेथे

नाश करो तापांचा अमुच्या शांती असो येथे ॥२७॥

*

उद्धारास्तव समस्त तीर्थे माझ्या संकोचती

भस्मविभूषित शिवशंकरही कानी कर ठेविती

अंतर्यामी अनुकंपा तव पावन मज करिशी

तीर्थांचा अन् महादेवाचा गर्व सर्व हरिशी ॥२८॥

*

पापाचरण करू ना करु संदेही पापी मी

ऐसा सागर घोर नीच कृत्यांचा आहे मी

उद्धरण्यास्तव मम पतिताला कसे आळवू मी

स्तवन तुझे गे कसे करावे नरपशू आहे मी ॥२९॥

*

आजवरी ना कधी गवसला पतीत येथ जगात

उद्धाराने ज्याच्या होईल आश्चर्यावर मात

माझ्यारूपे आज पातला ऐसा पापी प्राप्त

कृपा करुनी मजसि उद्धरी पुरवी मनोरथ ॥३०॥

– क्रमशः भाग तिसरा 

कवी : श्री जगन्नाथ पंडित 

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१८ ☆ आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१८ ☆

☆ इन दिनों लन्दन से ☆

?  आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की राजनीति इन दिनों एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ प्रधानमंत्री निवास एक रैन-बसेरा सा बन गया है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और जनता की अपेक्षाओं का दबाव किस हद तक बढ़ चुका है। बोरिस जॉनसन का जाना हो या फिर हाल ही में कीर स्टार्मर का पद छोड़ना, ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री अब प्रेस और जनता के निरंतर डर के साये में काम करने को मजबूर हैं।

ब्रिटिश राजनीति में जवाबदेही के मानक अत्यंत कड़े हैं। वहां का लोकतान्त्रिक संस्कार किसी भी छोटे से छोटे नैतिक स्खलन को भी स्वीकार नहीं करता। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्रियों के इस्तीफों की सूची को देखें तो कारण अक्सर बड़े नीतिगत संकटों के बजाय व्यक्तिगत नैतिकता और आचरण से जुड़े रहे हैं। कभी कोविड नियमों के उल्लंघन का छोटा सा विवाद (पार्टीगेट), कभी पारिवारिक सदस्य की फीस या निजी खर्चों से जुड़ी पारदर्शिता का अभाव, तो कभी मामूली से प्रतीत होने वाले राजनीतिक फैसलों पर मीडिया का आक्रामक रुख, इन छोटी-छोटी बातों ने सरकार की नींव हिला दी। प्रधानमंत्री बदल गए । यह अस्थिरता दर्शाती है कि वहां का नेतृत्व अब एक ऐसी सूक्ष्म परीक्षा से गुजर रहा है जहाँ कोई भी मानवीय त्रुटि उसके राजनीतिक करियर का अंत कर सकती है।

आज के सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में, जहाँ हर छोटी घटना पल भर में सुर्खियों में आ जाती है, वहां के राजनेताओं की निजता और राजनीतिक आज़ादी लगातार सिमट रही है। प्रेस की भूमिका वहां एक सजग प्रहरी से बढ़कर सीधे तौर पर एक निर्णायक की हो गई है। जब मीडिया किसी व्यक्तिगत आचरण या पारदर्शिता के मुद्दे को राष्ट्रहित का नाम देकर उछालता है, तो वहां के प्रधानमंत्री के लिए अपनी कुर्सी बचाए रखना एक कठिन चुनौती बन जाता है। प्रधानमंत्री की आज़ादी का अर्थ वहां निरंकुशता से नहीं, बल्कि स्थिरता से है, जो अक्सर मीडिया के निरंतर दबाव में बिखरती दिखती है।

भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटिश डेमोक्रेसी की ही जड़ से निकली है, लेकिन इनके काम करने के तरीकों में बड़ा अंतर है। ब्रिटेन में नैतिक आधार पर इस्तीफा देना एक स्थापित राजनीतिक परंपरा है और वहां का जनमत त्वरित परिणामों की मांग करता है, जिससे नेतृत्व पर दबाव बहुत जल्दी बढ़ जाता है। इसके विपरीत, भारत में जवाबदेही की परिभाषा थोड़ा अलग है। यहां की सरकारें अक्सर एक बड़े और व्यापक जनादेश के साथ काम करती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, फिर भी वे स्वयं को सारी आबादी के प्रतिनिधि के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं। भारतीय राजनीति में मीडिया का दबाव और विमर्श तो चलता है, लेकिन हमारा तंत्र अधिक लचीला है। यहां सत्ता को केवल मीडिया के शोर से हिला पाना कठिन है, क्योंकि भारतीय राजनीति का ढांचा नैतिक शुद्धता के साथ-साथ शासन की निरंतरता और स्थायित्व को भी प्राथमिकता देता है।

लोकतंत्र के इस रंगमंच पर एक संतुलन की आवश्यकता है। एक स्वस्थ समाज के लिए प्रेस का स्वतंत्र होना अनिवार्य है, लेकिन उसे जज की भूमिका से निकलकर एक सुझावकर्ता की भूमिका को भी समझना होगा। उसे यह अहसास होना चाहिए कि अत्यधिक अस्थिरता अंततः राष्ट्र के विकास की गति को बाधित करती है। दूसरी ओर, सत्ता में बैठे नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में पारदर्शिता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

अंततः, लोकतंत्र की सार्थकता इसमें नहीं है कि कौन कितनी जल्दी इस्तीफा देता है, बल्कि इसमें है कि व्यवस्था चुनौतियों के बीच भी कैसे निरंतरता बनाए रखती है। ब्रिटेन का उदाहरण हमें सीख देता है कि यदि हम अति-संवेदनशीलता और निरंतर दबाव की संस्कृति को बढ़ावा देंगे, तो प्रशासन केवल अगली हेडलाइन को मैनेज करने में ही उलझा रहेगा। भारत के लिए भी यह एक दिशा-दर्शन है कि उत्तरदायी शासन और स्वतंत्र प्रेस के बीच एक ऐसा सेतु बने, जहां सवाल तो बेबाकी से पूछे जाएं, लेकिन सरकार की स्थिरता और राष्ट्र की कार्ययोजना को दांव पर न लगाया जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में छिपी है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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