हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९३ – नवगीत – मधु मिलन राग… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मधु मिलन राग

? रचना संसार # ९३ – गीत – मधु मिलन राग…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

क्यों कलंकित लोग करते,

हैं सदा अनुराग को।

गा न पाती कोकिला है,

मधु मिलन के राग को।।

*

काँपती है हर कली भी,

अब भ्रमर गुंजार से।

तोड़ बंधन प्रीत के सब,

झाँकते क्यों द्वार से।।

कौमुदी कब तक बचेगी,

दानवों के वार से।

दग्ध हिय प्रतिबिम्ब तेरा,

ताकता है बाग को।

*

सुप्त फेरे प्रीत के हैं,

हारती है दामिनी।

ठग गया है काम तन को,

है बिलखती कामिनी।।

राह प्रियतम नित निहारे,

प्रेम आकुल भामिनी,

पूछती है केश वेणी।

तन लगे इस दाग को

*

रो रहा है देख अम्बर,

टूटते विश्वास को।

छल गया है चाँद छलिया,

फिर मिलन की आस को।।

दे रहे आवाज आँसू,

जा रहे मधुमास को।

नित गरल के घूँट पी कर,

देखते बस झाग को।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२१ ☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

बरगी जल के बाँध में, गूँजी चीख हज़ार।

गोद मिली है नर्मदा, समा रहे जलधार।

*

अश्रु बहे कैसे? रुकें, देखा जब ये त्रास।

हृदय फटा मन रो पड़ा, बुझी जीवनी आस।।

*

करुण दृश्य यह देखकर, मौन रहा आकाश।

सोए नीर समाधि में, कैसे? हों विश्वास।।

*

माँ ने थामा लाल को, लहर बहाती साथ।

बढ़ा रही माँ नर्मदा, देती अपना हाथ।।

*

अन्तस आहत हो रहा, सुनकर करुण पुकार। 

असमय घटना देखकर, मचता हाहाकार।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०३ ☆ कविता – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०३ ☆

कविता – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं☆ श्री संतोष नेमा ☆

ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

देकर   लोभ  लुभा  जाते   हैं ||

आए   कभी  न  वर्षों  से  जो |

गले   लगाकर   सहलाते    हैं ||

*

जन  नेता  बन  जाते  भिक्षुक |

चरण चूमते छलिया झुक-झुक ||

एक  लक्ष्य   बस  सत्ता  पाना |

परिणामों की मन में धुक-पुक ||

जामा  पहने  जन  सेवक  का |

अपना  परचम    फहराते   हैं ||

ये   चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

*

जाति – धर्म   की  बातें  करते |

वादों    के    आडंबर    रचते ||

वोट   खींचने  करते  साजिश |

दाँव-पेंच   में   माहिर   लगते ||

ये   कानून    हाथ   में   लेकर |

प्रतिद्वंदी    को    धमकाते  हैं ||

ये   चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

*

रंग  –  बिरंगे      नारे       रटते |

अपने   स्वयं    कसीदे    गढ़ते ||

इनकी    मोटी   चमड़ी     यारो |

लज्जा-शर्म   ताक  पर  रखते ||

इनकी  तिकड़म  को  पहचानो |

जाल   वोट   का   फैलाते    हैं  ||

ये   चुनाव   जब  भी   आते  हैं |

*

खूब     बहाते      नेता     पैसा |

कोई   चतुर   न   उनके   जैसा ||

मत  की  कीमत  पहचानो  तुम |

करो     न    सौदा    ऐसा   वैसा ||

ध्यान    रखें    ‘संतोष’    हमेशा |

देश    भक्त   तब   कहलाते   हैं ||

 ये   चुनाव  जब   भी  आते   हैं |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ९ ☆ आलेख – केरलम का मुकुट रत्न ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  श्री राम ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ९ ☆

? आलेख – केरलम का मुकुट रत्न ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

भारत भिन्न भिन्न संस्कृतियों का देश है l और यही कारण है कि यहाँ का हर धर्म, हर जाति एक दूसरे की संस्कृति से परिचित है l

भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि चातुर्मास में भगवान सो जाते हैं जिसे हम देव शयनी ग्यारस कहते हैं और भगवान देव उठनी ग्यारस पर उठ जाते हैं l देव शयनी ग्यारस के पूर्व केरलम राज्य त्रिशूर पूरम नाम का उत्सव मनाता है l कहते हैं कोच्ची महाराज के समय से इस उत्सव को मनाने की परम्परा चली आ रही है l यह उत्सव केरलम की संस्कृति के भिन्न पहलुओं को दर्शाता है साथ ही यह वार्षिक उत्सव इस राज्य की संस्कृति में चार चांद भी लगा देता है l

जब चन्द्रमा और फाल्गुनी नक्षत्र एक रेखा में आते हैं उस दिन से इसकी शुरुवात होती है l यह सात दिन का उत्सव होता है l इसकी विशेषता हाथियों की परेड होती है l इसमें करीब 30-35 गजराज सम्मिलित होते हैं l सभी सोने के जाल से, आभूषणों से सजे होते हैं l

त्रिशूर के पश्चिमी क्षेत्र से भगवान श्रीकृष्ण और त्रिशूर के पूर्वी क्षेत्र से माँ भगवती ऐसे पूरे दस मंदिर इस उत्सव में आमंत्रित होते हैं l ये सभी अपने अपने देवदूतों अर्थात गजराजों पर बैठकर शोभायात्रा के साथ वड़क्कूनाथन मंदिर में विराजमान हो जाते हैं l

एक एसी संस्कृति जहाँ हम हाथी को गणेश के रूप में भी पूजते हैं, हर अच्छे कार्य की शुरुवात हम गणेश वंदन से करते हैंउसी तरह इस उत्सव की शुरुवात भी एक राजसी हाथी से होती है l यह हाथी अपनी पीठ पर भगवान अयप्पा का फोटो रख वड़क्कूनाथन मंदिर के दक्षिणी दरवाजे को हौले से अपने पैर से खोलता है और ये उत्सव शुरु हो जाता है l उसी समय आकाश में सुंदर आतिशबाजी की शुरुवात होती है जो सात दिन तक निशा को होने से रोकती है l वड़क्कूनाथन मंदिर भगवान शिवजी का है l यह उत्सव भगवान शिव को समर्पित होता है l पूरे सात दिन पंच पकवानों का नैवैद्य लगाया जाता है l

15-15 गजराज मंदिर के पूर्वी और पश्चिमी दरवाजे पर सजधज कर परेड के लिये खड़े होते हैं l इन पर बैठने वाले छत्रधारी अपने हाथों में सजे हुए खम्बे लिये होते हैं जो की सुपाडी के पेड़ से बने होते हैं l इन खम्बो पर सुंदर सुंदर चमकीले रंगों से सजे रेशम के कपड़ों के बने छाते होते हैं l साथ में मोरपंखो से बने पंखे होते हैं l  सभी गजराज  ड्रम, तुरही, पाइप, झाँज, कोम्बू इन पाँच वादयों की धुन पर एकएक कर आगे आते हैं और छत्रधारी इन रंगबिरंगी छातों की अदला बदली करते हैं l  साथ में लोगों की तालियों की गदगडाहट की आवाज भी शामिल हो जाती है l

इस उत्सव के सातवे दिन आतिश बाजी के साथ ही सभी देवता एक दूसरे से विदा लेते हैं l पुनः अपने वाहनों पर सवार होकर अपने अपने मंदिरों में प्रतिष्ठित हो जाते हैं l

इस उत्सव में हिन्दु ही नहीं अपितु सभी धर्म के लोग शामिल होते हैं जो एकता का प्रतीक दर्शाता है l

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २२ – कविता – मन… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मन।)

☆ शशि साहित्य # २३ ☆

? कविता – मन…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

मन पर कोई जोर चले ना,

मन का वेग अनंत,

कभी यहां तो कभी वहां,

विचरे लोक परलोक,

कठोर बने ,तो पत्थर भी शर्माए,

कोमल इतना , मोम सा पिघला जाए,

कभी सूरज से ऊष्मा ले ले,

कभी शीतलता को ले अपनाए,

कभी मुखरित हो जाता है,

कभी धारण कर लेता है मौन,

कभी विश्व पर शासन करता,

कभी दुबक ,सिमट ,अपने में जाए,,

मन की लीला मनमोहन जाने,

और जान सका ना कोई,

जिसने पाई मन की थाह…

सम ईश् तुल्य हो जाए…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९३ – श्री नृसिंह स्तवन…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९३ – विजय साहित्य ?

☆ श्री नृसिंह स्तवन

(स्वरचित स्तवन)

जळी, स्थळी, काष्ठी, सदा देव राही.

कुठे देव तुझा, विचारोनी पाही.

प्रल्हाद भक्तांसी, बहू गांजवीले

परी नारसिंहे, पहा वाचवीले. १

छळी लेकराला, अहंकारी तात

तिथे धाव घेई, करण्यासी मात

करी त्राही त्राही, स्तंभी लाथ मारी.

तिथे प्रगटला, हा उग्रावतारी. २

 *

सहाय्यासी आले, हरीरुप नामी

वनराज अर्धे, नरसिंह धामी.

असे पीत केशी, बलदंड काया

पीळदार‌ बाहू, खदिरांग छाया. ३

 *

विरंची प्रसादे, दैत्य मातलेला

तयाचेच पोटी, भक्त गांजलेला

अन्याय जुलूमी, साही सान थोर

हिरण्यकश्यपू, करी जाच घोर. ४

 *

अक्राळ विक्राळ, प्रकटे अरूपी

शार्दूल विक्राल, नरसिंह रुपी

दिवसाही नाही, न आलासे रात्री

पहा धावतो हा, नरसिंह गात्री. ५

 *

पशू नृप ऐसा, जणू काल भासे

मूर्त अग्नी ज्वाला, अकस्मात श्वासे

नखाग्रे जयाची, करी दिव्य शस्त्रे

आला सांज काली, परजीत अस्त्रे. ६

 *

तैलात रक्षेत, जलात‌ रक्षेत

रक्षेत हरी हा, पुरवीत हेत

मही मातलेला, पहाण्यासीआला

प्रल्हाद रक्षणी, अवतार झाला. ७

 *

तिन्ही लोकी गर्जे, गर्जना जयाची

कंपीत धरणी, धारणा भयाची

जया गांजवीले, तया तारण्याला

पहा सिंह आला, रिपू मारण्याला. ८

 *

पहा उंबऱ्याते, ‌हरी बैसलासे

गर्वांध रिपूला, नखे फाडलेसे

वरदान खासे, पूर्णत्वास नेले

अहंकारी दैत्या, झणी नष्ट केले. ९

 *

नमो नारसिंहा, नमो विष्णू रुपा,

अवतार घेशी, विशेषी स्वरुपा.

जसा पावलांसी, दयाळा अनंता

तसा पाव आता, समस्ता दिगंता. १०

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – २० ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – २० ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

दुर्जन निंदा – (२) ~पाखंडी लोक

मागील भागात तुकाराम महाराजांनी किती बीभत्स शब्दांत दुर्जनांची त्यांच्या अभंगातून निर्भत्सना केली आहे, हे आपण पाहिले. याही भागात आणखी काही अभंगांद्वारे तुकारामांचे अशा लोकांविषयीचे मत जाणून घेऊया, कारण दुर्जन निरनिराळ्या प्रकारचे असू शकतात. पाखंडी, म्हणजे वरवर दाखवायला सज्जन, भक्तीचे उपासक परंतु मनाने अत्यंत नीच अशा लोकांचा तुकाराम महाराजांना फार संताप आहे. त्यांच्याविषयी तुकाराम महाराज काय म्हणतात ते आपण आज त्यांच्या अभंगांतून पाहूया…

भक्तीचे सोंग करणाऱ्या ढोंगी माणसांविषयी या अभंगात महाराज म्हणतात,

 न ये नेत्रा जळ/ नाही अंतरी कळवळ/

 तो हे चावटीचे बोल/ जन रंजवणे फोल//

 न फळे उत्तर/ नाही स्वामी जो सादर/

 तुका म्हणे भेटी/ जंव नाही दृष्टादृष्टी//

ज्याच्या डोळ्यात भावभक्तीच्या पाण्याचा टिपूस नाही, आणि जोपर्यंत अंतरंगात हरी विषयी कळवळा नाही, तोपर्यंत त्याच्या भक्ती विषयी भारलेल्या सर्व गप्पा पोकळ आणि फक्त करमणूक करणाऱ्या असतील. स्वामींची कृपा असल्याशिवाय ते अभक्ताला कधीही भेटणार नाहीत. वरवरची प्रार्थना केवळ पोकळ आहे.

ढोंगी भक्तांविषयी या अभंगात महाराजांनी उदाहरणे देऊन स्पष्टीकरण केले आहे.

 टिळे माळा मैद मुद्रा लावी अंगी/

 देखो नेदी जगी फासे जैसे//

 धीवर या मत्स्या/ चारा घाली जैसा/

 भीतरील फासा /कळो नेदी //

 खाटीक हा स्नेह वादे पशु पाळी /

 कापावया नळी तयासाठी//

 तुका म्हणे तैसा भला मी लोकात/

 परी तू कृपावंत पांडुरंग//

जो बहुरूपी असतो तो त्याचे वरचे सोंग पालटतो आणि मासा पकडण्यासाठी बगळ्यासारखा ध्यानस्थ बसतो. त्याचप्रमाणे मैद म्हणजे ढोंगी लोक स्वतःला भक्त म्हणविणारे, कपाळावर सतरा टिळे लावतो, गळ्यात कसल्या कसल्या माळा घालतो, नामाच्या मुद्रा कोरून लावतो आणि जगाला लुटण्याचे त्याचे आतील बेत कळू देत नाही. या लोकांची जात जशी काही फासेपारध्यांसारखीच असते. गळाला काहीसे आमीष लावून मासे अडकविण्याचा हा प्रकार आहे. खाटीक बोकड पाळून त्याला धष्टपुष्ट करतो आणि नंतर त्यास कापतो. अभक्त मंडळी याहून वेगळी नसतात, असे तुकारामांचे स्पष्ट मत आहे.

पाखंडी लोकांना महाराज सतत सांगत आहेत की तुम्ही अनुभवावाचून बडबड करणे थांबवा. ही तुमची बडबड म्हणजे बाळंत न होता बाळंतीणीप्रमाणे स्वतःवर सर्व सोपस्कार करून घेणे आहे.

 व्याल्याविण करी शोभून तातडी/

 चार ते गधडी करीतसे//

अशा लोकांना ते गधडी म्हणतात. (बिनडोक)

 काही नित्यनेमाविण/ अन्न खाय तो श्वान/

 वाया मनुष्यपण/ भार वाहे तो वृषभ//

 त्याचा होय भूमी भार/ नेणे जातीचा आचार//*

 जाला दावेदार/ भोगवी अघोर पितरासी//

 अखंड अशुभवाणी / खरे नच बोले स्वप्नी//

 पापी तयाहुनी नाही/ आणिक दुसरा//

 पोट पोसी एकला/ भूती दया नाही ज्याला/

 पाठी लागे आल्या/ अतिताचे द्वारेशी//

 काही संतांचे पूजन/ न घडे तीर्थाचे भ्रमण//

 यमाचा आंदण/ सीण थोर पावेल//

 तुका म्हणे त्यांणी/ मनुष्यपणा केली हाणी//

 देवा विसरूनी/ गेली म्हणती मी माझे//

वरील अभंगात तुकाराम महाराजांनी अभक्त लोकांचे वर्णन केले आहे. भोजनाआधी देवपूजा करणे, गीता, विष्णुसहस्त्रनाम किंवा जप जाप्य करणे असा काही नियम जो पाळत नाही, तो मनुष्य कुत्र्यासमान आहे. मनुष्यपणाचा तो व्यर्थ भार वाहतो. खरंतर तो बैलच म्हणावा. अशा माणसाचा भूमीला केवळ भार आहे. आपल्या पितरांचा तो केवळ दावेदार आहे, कारण तो त्याच्या कुकर्माने त्यांना नरक भोगवितो. त्याची वाणी अशुभ आहे, स्वप्नातही त्याला खरे बोलता येत नाही. फक्त स्वतःपुरता विचार करून दारी आलेल्या अतिथीला तो हाकलून देतो. कधी संतांचे पूजन करीत नाही, की तीर्थाटन करीत नाही. असे लोक म्हणजे मनुष्यपणाची केवळ हानीच आहेत.

तुकाराम महाराजांना पाखंडी, (स्वतःला हरीचे दास म्हणणारे, ज्ञानी समजणारे) लोकांचा अनुभव फार जवळून मिळाला. अशा लोकांविषयी त्यांचे एक ठाम मत बनले, ते या अभंगातून आपण पाहूया.

 अतिवादी लावी/ एका बोट सोंग दावी/

 त्याचा बहुरूपी नट/ नव्हे वैष्णव तो चाट//

 प्रतिपादी वाळी/ एका पूजी एका छळी/

 तुका म्हणे नाही/ भूतदया ज्याचे ठायी //

एक मनुष्य कपाळाला काळी रेघ लावून आपण वैष्णव आहोत असे सांगत सुटतो. वादविवादही करतो, परंतु तो खरा वैष्णव नव्हे. तो वेशधारी बहुरूपी आणि खोटा आहे. तो एकाची स्तुती करतो तर दुसऱ्याचा धिक्कार करतो, आणि एकाला पूजनीय मानतो व दुसऱ्याला छळतो. खरे वैष्णव तर सर्वांशी समान वागतात. ते भूतदयेने परिपूर्ण असतात. या पाखंडी लोकांच्या ठायी भूतदया जराही नसते.

ढोंगी लोकांना तुकाराम महाराज रोखठोक बोलण्यास मागेपुढे पाहत नाहीत, त्याचे उदाहरण म्हणजे हा खालील अभंग…

 जाऊनिया तीर्थ/ काय तुवा केले/

 चर्म प्रक्षाळीले/ वरी वरी//

 अंतरीचे शुद्ध कासयाने झाले/

 भूषण ते केले आपणया//

 वृंदावन फळ घोळले साकरा/

 भीतरील थारा मोडेची ना//

 तुका म्हणे नाही शांती क्षमा दया/

 तोवरी कासया फुंदा तुम्ही //

ते म्हणतात, ” अरे ढोंगी माणसा, तू तीर्थास जाऊन केलेस काय? तर तुझ्या चामड्याचे प्रक्षा लन केलेस, तुझे कातडे फक्त पाण्यात भिजवलेस. तुझ्या अंतराचे काय? कडू वृंदावन फळ साखरेत किती घोळले तरी त्याचा उपजत कडूपणा जात नाही, तुझे तसेच आहे. तीर्थ स्नान करून तुझ्या मनाचे मालीन्य कसे जाणार? जोपर्यंत तुझ्या ठिकाणी दया, क्षमा, शांती या भावना नाहीत तोपर्यंत तुम्ही हरीचे दास म्हणून गर्वाने फुलून जाऊ नका. “

तुकाराम महाराजांना खऱ्या भक्तीचा अर्थ म्हणजे मानवता, भूतदया, अंतःकरणाची शुद्धता हेच सामान्यांना सांगायचे आहे असे मला वाटते. तो खरा हरीचा दास आहे, त्यालाच माऊली आपल्या चरणी आश्रय देते.

क्रमशः… २० 

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र क्र. ७९, ८०, ८१. ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र क्र. ७९, ८०, ८१. ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले 

।। श्री नारद उवाच ।। 

भक्ति सूत्रे ७९ – – 

सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैः भगवानेव भजनीयः ||७९||”

अर्थ : सर्वकाळी सर्व शक्तिनिशी प्रेमभावाने कोणतीही चिंता न करता एक भगवंत भक्ति करण्यास योग्य आहे असे समजून त्याची भक्ती करावी.

विवेचन : एखाद्याने साधकाने साधना करायला सुरवात केली. सकाळी अमुक अमुक वेळ अमुक उपासना आणि संध्याकाळी अमुक वेळ अमुक उपासना. बाकीचा वेळ माझा भगवंताशी संबंध नाही, असे म्हणून किंवा अशी कृती करून चालणार नाही. त्याचे अनुसंधान सतत टिकले पाहिजे, त्यासाठी त्याने सतत विविध मार्ग शोधून भगवतांच्या चिंतनात राहिले पाहिजे. त्यासाठी अनेक मार्ग सर्व संतांनी सांगितले आहेत. त्यातील एक मार्ग आपल्या हातून घडणारी प्रत्येक गोष्ट सद्गुरूंना सांगून करणे.

भक्ती ही केवळ काही वेळापुरती, उत्सवापुरती किंवा गरजेपुरती नसावी. ती सतत असावी. जेव्हा मन, वाणी आणि कृती या तिन्हींतून भगवंताचे स्मरण होते, तेव्हाच खरी भक्ती घडते.

भगवंताची भक्ती ही केवळ आनंद किंवा दुःखाच्या प्रसंगीच न करता, सर्व भावनांनी (जसे की प्रेम, भक्ती, करुणा, नम्रता, लोभ नसलेली तृष्णा, वियोग इ.) करावी. भक्त भगवंताशी प्रत्येक मनोभावाने जोडलेला असतो. समर्थ म्हणतात,

“नित्य नेम प्रातःकाळीं । माध्यानकाळीं सायंकाळीं । नामस्मरण सर्वकाळीं । करीत जावें ॥ ३॥ सुख दुःख उद्वेग चिंता । अथवा आनंदरूप असतां । नामस्मरणेंविण सर्वथा । राहोंच नये ॥ ४॥ हरुषकाळीं विषमकाळीं । पर्वकाळीं प्रस्तावकाळीं । विश्रांतिकाळीं निद्राकाळीं । नामस्मरण करावें ॥ ५॥ कोडें सांकडें संकट । नाना संसारखटपट ।

आवस्ता लागतां चटपट । नामस्मरण करावें ॥ ६॥ चालतां बोलतां धंदा करितां । खातां जेवितां सुखी होतां । नाना उपभोग भोगितां । नाम विसरों नये ॥ ७॥ संपत्ती अथवा विपत्ती । जैसी पडेल काळगती । नामस्मरणाची स्थिती । सांडूंच नये ॥ ८॥ वैभव सामर्थ्य आणी सत्ता । नाना पदार्थ चालतां । उत्कट भाग्यश्री भोगितां । नामस्मरण सांडूं नये ॥ ९॥”

(संदर्भ : दासबोध दशक ४ समास ३)

ज्याप्रमाणात भक्ति वाढत जाते त्याप्रमाणात साधक निश्चिंत होऊ लागतो. कारण त्याच्या पाठीशी उपासनेची शक्ति उभी असते. एकदा देवाला, सद्गुरूंना साधक शरण गेला की त्याची सर्वोतोपरी काळजी सद्गुरू घेत असतात. असा सर्व संतांचा अनुभव आहे.

संत तुकाराम महाराज आपल्या एका अभंगात म्हणतात,

“जेथें जातों तेथें तू माझा सांगाती । चालविसी हातीं धरूनियां ॥१॥ चालों वाटे आह्मी तुझा चि आधार । चालविसी भार सवें माझा ॥ध्रु. ॥ बोलों जातां बरळ करिसी तें नीट । नेली लाज धीट केलों देवा ॥२॥ अवघें जन मज जाले लोकपाळ । सोइरे सकळ प्राणसखे ॥३॥ तुका म्हणे आतां खेळतों कौतुकें । जालें तुझें सुख अंतर्बाहीं ॥४॥”

सर्व संतांमध्ये एक साम्य नक्की अनुभवायला मिळते, ते म्हणजे त्यांच्या अंतरी असलेले समाधान. त्यासाठी साधकाने आपल्या सद्गुरूंवर पूर्ण विश्वास ठेवून, आपली साधना अखंड करावी. सद्गुरू त्याला कायम सांभाळतात.

 – – – – – 

भक्ति सूत्रे ८० – – 

स कीर्त्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवत्यनुभावयति भक्तान् ||८०||”

अर्थ : भगवंताचे कीर्तन किंवा नामस्मरण केले जाते, तेव्हा तो भगवंत फार लवकर प्रकट होतो आणि आपल्या भक्तांना आपले अस्तित्व जाणवून देतो.

विवेचन: समारोपाला चाललेल्या या लेखमालेच्या या सूत्रांत आपण भक्तीची फलश्रुती पहात आहोत.

या सूत्रात नारद मुनी आपल्याला भक्तीची एक अमूल्य अनुभूती सांगत आहेत. भक्त जेव्हा भक्तिभावाने भगवंताचे नामस्मरण, कीर्तन करतात, त्याचे नानाविध प्रकारे गुणगान करतात, तेव्हा भगवंत दूर नसतो. तो तत्क्षणी, शीघ्रतेने, त्या भक्तांच्या रक्षणासाठी, त्याला दर्शन देण्यासाठी प्रगट होत असतो.

सर्व संतांची चरित्रे अभ्यासली तर आपल्या ही सहज लक्षात येईल. कोणत्याही भक्ताचे चरित्र अभ्यासा. त्या त्या भक्तासाठी भगवंत धावत आलेले आहेत. मग तो गजेंद्र असो की द्रौपदी असो, भक्त प्रल्हाद असो की ध्रुव बाळ असो. भगवंत भक्ताच्या आवश्यकतेनुसार तो सखुबाईचे दळण दळतो, कबिराचे शेले विणतो, कुंभाराच्या घरी मडकी भाजतो, पाणक्या बनतो… ! किती सांगावे…

माझ्या सारख्या सामान्य मनुष्यानं भगवंताचे यथार्थ वर्णन करणे निव्वळ अशक्य!!

भक्ताने भगवंताला बोलविले की तो येतो. हे सूत्र भगवंताच्या प्रेमळ आणि कृपामय स्वभावाचे वर्णन करते. तो आपल्या भक्तांना दूर ठेवत नाही, तर त्यांच्या प्रेमाच्या हाकेला तत्काळ प्रतिसाद देतो. या सूत्रातून हे शिकायला मिळते की, भगवंतापर्यंत पोहोचण्यासाठी जटिल साधने आवश्यक नाहीत. प्रेमाने, भक्तिभावाने, नामस्मरणाने त्याचं आवाहन केलं की तो तत्काळ हजेरी लावतो. त्यामुळे भक्ती ही सहज, सुलभ, आणि सर्वोच्च साधना आहे. “कीर्तनातून भगवंताचा अनुभव मिळतो – हा भक्तीचा परमोच्च प्रभाव आहे. “

 – – – – 

भक्ति सूत्रे ८१ – – – 

त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी भक्तिरेव गरीयसी||८१||”

अर्थ : सत्य वचन, सत्य आचरण आणि सत्य संकल्प ही तीन सत्य वचने आहेत, पण त्यापेक्षा परम सत्याची भक्ति श्रेष्ठ आहे. केवळ भक्ति श्रेष्ठ आहे.

विवेचन :कोणताही काळ ज्याप्रमाणे नीतिमत्ता श्रेष्ठ मानली जाते, त्याप्रमाणे सत्य श्रेष्ठ मानले जाते. प्रामुख्याने सत्याचे तीन प्रकार सांगता येतील.

  1. सत्य वचन (वाणीने सत्य बोलणे)
  2. सत्य आचरण (कर्माने सत्य आचरण करणे)
  3. सत्य संकल्प (मनाने सत्य व संकल्पशुद्ध असणे)

नारदमुनी या सूत्रात स्पष्ट सांगतात की, जरी एखादी व्यक्ती त्रिसत्य अर्थात वाणी, आचरण आणि संकल्प पूर्णपणे सत्यनिष्ठतेनी करणारी असली, तरीसुद्धा भक्तीच त्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे.

एखादा मनुष्य खरे बोलणारा आहे पण त्याचे आचरण शुद्ध नाही. एखाद्याचे आचरण अतिशय शुद्ध आहे, पण त्याचा संकल्प शुद्ध नाही असे अनेक दोष मनुष्यामध्ये असू शकतात. काही लोकं प्रकांड पंडित असतात, पण त्यांचा अभिमान पण तितकाच मोठा असतो, अशा लोकांना देवाची भेट दुष्करचं असते, उलट एखादा मनुष्य पंडित नसेल, त्याला लिहिता वाचताही येत नसेल, पण त्याचा भाव शुद्ध असेल, त्याच्या मनात भक्तीचा अंकुर उगवला असेल, तर अशा मनुष्यावर देव प्रसन्न होण्याची शक्यता जास्त असते.

“मनी नाही भाव आणि देवा मला पाव”

अशाने देव पावत नसतो. तर ज्याचा भाव शुद्ध झाला, त्याला देव खात्रीने दर्शन देत असतो, असा अनुभव सर्व संतांनी घेतलेला दिसून येतो. अनेक संत लौकिक अर्थाने निरक्षर होते, पण आज त्यांच्या अभंगावर लोकं विद्या वाचस्पती ची पदवी घेत आहेत, त्यांच्यावर शोध प्रबंध प्रकाशित करीत आहेत, त्यांचे अभंग पाठ्यपुस्तकात समाविष्ट केले जात आहेत.

आपल्याकडे नुसते सत्याचे महत्त्व नाही, तर सत्याचरण करणाऱ्याने त्याला भक्तीची जोड दिली, तीच साधना पूर्ण करणारी ठरते. केवळ नैतिकता, सत्यतेचे पालन हे अध्यात्मासाठी पुरेसे नाही, तर त्याला भावपूर्ण भक्तीची जोड आवश्यक आहे.

मनुष्य भक्ति करू लागला की त्याचे भाडोत्री असलेले अवगुण त्याला सोडून जाऊ लागतात. ही भक्तीची किमया आहे. जिथे भक्ती आहे, तिथे सर्व सद्गुण आपोआप येतात. म्हणूनच नारदांनी दोनदा “भक्तिरेव गरीयसी” असे म्हणत भक्तीच्या श्रेष्ठतेवर जोर दिला आहे.

सत्य, नैतिकता, शुद्ध आचरण हेसुद्धा तेव्हाच सर्वोच्च ठरतात, जेव्हा त्यामध्ये भगवंतावरची भक्ती मिसळलेली असते. म्हणून भक्ती ही साध्यही आहे आणि साधनही. श्रीगोंदवलेकर महाराजांच्या जीवनातील एक प्रसंग सांगतो. श्रीमहाराज एकदा नैमिष्यारण्यात जायला निघाले. त्यावेळी थोरल्या रामाच्या मंदिरातील रामाच्या मूर्तीतून अश्रुधारा वाहू लागल्या. श्रीमहाराज स्वतः आले आणि त्यांनी रामाचे डोळे पुसले, तेव्हा अश्रुपात थांबला. ही भक्तीची शक्ति आहे. अशी भक्ति असेल तर भगवंत खांबातूनही प्रगटतो. ही भक्तीच्या महानतेची काही उदाहरणे.

इथे श्रीगोंदवलेकर महाराजांच्या प्रवचनांमधील एक उतारा देत आहे – – 

– – “खरोखर परमार्थ अत्यंत सोपा आहे, विद्वान् लोक तो उगीचच अवघड करून सांगतात. चांगले काय आणि वाईट काय हे कळायला लागल्यापासून जो त्याप्रमाणे वागेल त्याला खात्रीने परमार्थ साधेल. परमार्थ तीनपैकी कोणत्याही एका गोष्टीने साधू शकेल : एक, देहाने साधूची संगत; दुसरी, संतांच्या वाङ्मयाची संगत आणि त्याचप्रमाणे पुढे आचरण; आणि तिसरी, भगवंताचे नामस्मरण. नाम घेतल्याने त्याची संगत आपल्याला अखंड लाभू शकेल. संतांनी सांगितले ते संशय न घेता विश्वासाने करणे ही पहिली पायरी, आणि ते पुढे निश्चयाने, श्रद्धेने, आणि प्रेमाने चालू ठेवणे ही शेवटची पायरी. हाच शाश्वत समाधानाचा मार्ग आहे. “

(संदर्भ : श्री गोंदवलेकर महाराज प्रवचने दिनांक २७ जून)

जय जय रघुवीर समर्थ

नारद महाराज की जय!!!

– क्रमशः भक्तीसूत्रे – ७९, ८०, ८१.

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४४ ☆ इंतज़ार ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४४ ☆ इंतज़ार ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

धूप के पीछे छुपकर

बैठा हुआ है सूरज

फेंक रहा है किरणों का जाल

फँसा रहा है हर छोटी बड़ी मछली को

मछलियाँ सिर पर बाँधे कफ़न

कर रहीं हैं अपना बचाव

ठंडे पानी के घड़े निकल पड़े हैं

बचाने प्यास के भूचाल से

चिड़ियों का झुलस रहा है आबोदाना

तिनके की ओट लिए बैठे

पंख फैलाकर चूज़ों को बचाने

घने पेड़ों की छाँव नहीं मिलती

जंगल अब हो गए हैं वीरान

सन्नाटों ने बना लिए हैं घर

चहल पहल वाली बस्तियों में

मज़दूरों की टोली लगी है काम में

पोंछ रही है माथे से रिसता पसीना

और हम बैठ कर सेंक रहे हैं

एसी कूलर में अपना वजूद

उधर पहाड़ों पर बर्फ़ गिरी है

नीचे फट गया है धरती का आँचल

उभर आए हैं नदिया के घाव

बादल तुम कब आओगे?

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४९ ☆ जीने में आसानी है क्या? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जीने में आसानी है क्या?“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४९ ☆

✍ जीने में आसानी है क्या? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मुझ पर ये मनमानी है क्या

अपने पर हैरानी है क्या

 *

मरना तो आसान बहुत है

जीने में आसानी है क्या

 *

पूछ रहे मासूम परिंदे

छत पर दाना पानी है क्या

 *

घर की सब मर्यादा टूटी

रही न दादी नानी है क्या

 *

सर पर शुहरत बोल रही है

कहना मेरा सानी है क्या

 *

बन जाता मैं तेरा आशिक़

उससा तू लासानी है क्या

 *

टकराने जाते पर्वत से

तुमको मुँह की खानी है क्या

 *

हाथ सफलता कब आ जाये

तुमने किस्मत जानी है क्या

 *

बच्चे किस्सा सुनते बोलें

इक राजा इक रानी है क्या

 *

उस नादाँ को क्या समझाएं

पूछ रहा सब फ़ानी है क्या

 *

सोच अरुण हालत पे अपनी

बात बड़ों की मानी है क्या

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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