हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९५ – नवगीत – नव चिंतन है नवल चेतना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतनव चिंतन है नवल चेतना

? रचना संसार # ९५ – गीत – नव चिंतन है नवल चेतना…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मन तुरंग उड़ता ही जाता

डालो भले नकेल।

*

कभी पढ़े कबीर की साखी,

कभी पढ़े वह छंद।

तृषित हृदय की प्यास बुझाता,

पीकर मधु मकरंद।।

अंग-अंग में बजती सरगम,

चलती प्रीति गुलेल।

*

संकल्पों की सीढ़ी चढ़ता,

हों कितने अवरोध।

हर चौखट पे अमिय ढूँढ़ता,

करता है अनुरोध।।

चढ़कर अनुपम शुचिता डोली,

नवल खेलता खेल।

*

नव चिंतन है नवल चेतना,

शब्द-शक्तियाँ साथ।

शब्दकोश करता समृद्ध भी,

सजे गीत हैं माथ।।

मधुरिम नवरस अलंकरण की,

चलती जैसे रेल।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२३ ☆ भावना के दोहे – प्रेम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रेम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रेम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

प्रेम बिना कुछ भी नहीं, प्रेम मधुरतम राग।

प्रेम अनोखी साधना, यही प्रेम अनुराग।।

 *

प्रेम अगर सच्चा मिले, हो जीवन गुलज़ार।

समझा जिसने प्रेम को, छाई मधुर बहार।।

 *

प्रेम नदी की धार है, बहता शीतल नीर।

इसमें जो भी डूबता, हर जाती है पीर।।

 *

प्रेम सुधा का भाव है, मन का मिटता क्लेश।

जिसके उर में प्रेम हो, बनता वही विशेष।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०५ ☆ कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – सर चढ़कर अब गर्मी बोले  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०५ ☆

कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले ☆ श्री संतोष नेमा ☆

सर चढ़कर अब गर्मी बोले |

सबकी सहनशीलता तोले ||

आँख तरेर दिवाकर कहता |

अब झेलिए आग के गोले ||

*

युद्ध छिड़ा खाड़ी में भीषण|

संकट में है जन साधारण||

जिसकी लम्बी नाक यहाँ पर |

बढ़ चढ़कर कर रहा आक्रमण ||

बढ़ती खूब युद्ध की गर्मी |

बरस  रहे  बारूदी शोले |

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

व्याकुल सब इंसान यहाँ हैं |

पशु पक्षी हैरान जहाँ हैं ||

किसे खबर है यहाँ जीव की |

शांति दूत अब बुद्ध कहाँ है |

कोई करता बात शांति की |

कोई बातों से विष घोले||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

लगते सभी खून के प्यासे |

सर्वनाश के  घिरे  कुहासे ||

धधक रही बदले की ज्वाला |

नेता  देते  झूठ  दिलासे ||

रंग  बदलते जैसे गिरगिट |

चंचल मन  जैसे है डोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

आँखों में अब नीर कहाँ है |

सबके मन अब धीर कहाँ है ||

टूट रहा विश्वास सभी का |

अब पहले से वीर कहाँ हैं ||

लादी  जैसे  अब  बेशर्मी |

कहता समय बनो मत भोले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

*

युद्ध तेल को ताप रहा है |

असंतोष अब व्याप रहा है ||

मानव घातक शस्त्र बन रहा |

विकट तबाही  नाप रहा है ||

युद्धों  में  संतोष  खोजता |

दृश्य देख लगता है रो ले ||

सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆ मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है  मंजिरी की कुण्डलियाँ ।)

 

☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆

? कविता – मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

-1-

द्वारे मेरे प्रभु चलो,  क्यों करते अवलम्ब l

राह आपकी मैं तकूँ,  कर में लिये प्रलम्ब ll

कर में लिये प्रलम्ब,  भरत आये अब मिलने l

राज पाट सब छोड़,  मना कर लाऊं धर में ll

ले कर ये सन्देश, कहें चल संग हमारे l

सभी तके हैं राह,  चलो प्रभु अब तो द्वारे ll

-2-

गाते गाथा वह चला,  माधव का संदेश l

आया जब उद्धव लिये,  बृज में किया प्रवेश ll

बृज में किया प्रवेश,  देख ही झपटे सारे l

क्या कहता है कृष्ण,  बात करते हैं न्यारे ll

समझा उद्धव आज,  प्रेम की सारी बातें l

नमन हुआ हैं माथ,  चला वह गाथा गाते ll

-3-

आता जन को तब समझ,  करता पल जब चूर l

तूफानों में सब बड़े,  हो जाते हैं दूर ll

हो जाते हैं दूर,  सभी ने हैं यह माना l

समय दिया संदेश,  भूल मत मुझको जाना ll

बोले पैसा आज,  दम्भ सर पर चढ़ जाता l

हो जाता कंगाल,  समझ तब जन को आता ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २४ – कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता एक सफर बीज का…।)

☆ शशि साहित्य # २४ ☆

? कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर बीज का नसीब नहीं होता वृक्ष हो जाना,

जाने कितनी अग्नि परीक्षा से गुजर कर अंकुरित हो पाना…

कहीं नर्म मुलायम मिट्टी की गोद नहीं मिलती,

कहीं जल भरे मेघों की बूंदे नहीं गिरती…

कभी जलाती तपन, बन जाती है कफन,

कभी बाढ़ में ठहरने को जमीं नहीं मिलती…

जीवन शुरू होने से पहले, सपने हो जाते हैं दफन,

बड़े वृक्षों से पनपने की इज़ाजत नहीं मिलती,

पैरों तले कुचल जाते हैं, कुछ नन्हे अंकुरण,

बेपरवाह परिस्थिति से, चंद सांसे नहीं मिलती…

फिर भी !!!! जो दम रखते हैं, हर मुश्किल का करने सामना…

वो खिल उठते हैं चीरकर, पत्थरों का भी सीना…

अथाह समर्पण और शक्ति का है यह मामला,

आसान नहीं है विपरीत परिस्थितियों को सहयोगी बना लेना…

ईश्वर की कृपा से ही पर्वत पर हरियाने की किस्मत है मिलती,

ना हो यह तो हरियाली में भी एक पत्ती नहीं खिलती…

तय करना पड़ती है तमाम मुश्किलें राहों की,

वरना हर बीज को, पुनः बीज बनाने की क्षमता नहीं मिलती…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९५ – सृजन संगत…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९५ – विजय साहित्य ?

☆ सृजन संगत…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

हळवे अंतर

जपता जपता

जाणीव असावी

घडता घडता…! १

गिरवा अक्षर

धूळपाटीवर

स्वरादि व्यंजन

मना मनावर…! २

 *

जीवन संचित

संस्कार वारसा 

जपू मनांतरी

मौलिक आरसा…! ३

 *

गरजे पुरती

नसावीत नाती

मनांगणातील

उजळीत वाती…! ४

 *

जीव जीवावर

जगतो जडतो

संकट समयी

जगास नडतो…! ५

 *

प्रेमळ हृदयी

जाणीव असावी

स्वभाव कस्पटे

मुळीच नसावी…!  ६

 *

नसावी उणीव

नजरेचा धाक

ऐकू यावी सदा

हृदयाची हाक…! ७

 *

असायला हवी

नाराजी शब्दांत

प्रेमाचेच ‌बंध

गुंफलेले त्यात…! ८

 *

काका, मामा,नाती

आधाराचे हात

अक्षर धन हे

हवे दिनरात…! ९

 *

कमावले किती

जाणीव असावी

प्रेमळ जीवांची

उणीव नसावी …! १०

 *

गमावले किती

जाणीव असावी

सृजन संगत

उणीव नसावी…! ११

 *

काळाच्याही पुढे

धावणारे मन

उणीव नसावी

आठवांचे क्षण…! १२

 *

हिशोबात नको

व्यवहारी माया

झिजवावी प्रेमे

अविरत काया…!१३

 *

जाणीव असावी

आपल्या जनांची

उणीव नसावी

प्रेमळ मनांची….! १४

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆ कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆

☆  कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

फिर समय ने हाँक दी

गाड़ी उमर की

और कितना शेष है चलना।

 

बोझ दिन का उठाए

हम रात भर जागे

स्वप्न आँखों में लिए

बुनते रहे धागे

भोर ने फिर खोल दी

खिड़की ख़बर की

साँझ तक बस स्वयं को छलना।

 

यादें सब ठहर गईं

आइनों के दर पर

प्रतिबिंबित होता है

चेहरों वाला घर

छतों के झरोखे से

झाँकते शहर की

खुली हुई हर किताब पढ़ना।

 

रोशनी के पृष्ठ पर

अंधकार व्याप्त

सुलगते हैं हाशिए

संभावना समाप्त

बाँच रही हैं रातें

इबारत सफर की

सूरज का भी तय है ढलना।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५२ ☆ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५२ ☆

✍ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ज़ुबाँ से अपनी जो भी तुम कहा नहीं  करते

तुम्हारे चश्म बयाँ सब वो क्या नहीं करते

 *

कभी वो अपनी न मंज़िल को पा सके यारो

जो अपने पैरों पै इंसाँ चला नहीं करते

 *

नज़र से सिर्फ हिक़ारत की देखते हो सभी

वहाँ बुलावा हो लेकिन  रुका नहीं करते

 *

है जिनका अज़्म मुक़म्मल पहुँचते मंज़िल पर

सफ़र तबील हो फिर भी थका नहीं करते

 *

अना में उसकी व मेरी रहेगा क्या अंतर

भले किया वो दगा पर दगा नहीं करते

 *

यक़ीन आप परख देख कर किया कीजे

घुने जो बीज है बो लो उगा नहीं करते

 *

है बेवफा वो तो तुहमत न आम कर दीजे

सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते

 *

बुझाने आग को तकलीफ जो उठा  न सको

अरुण है काफी जो उस पर हवा नहीं करते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५६ – इन दिनों.… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – इन दिनों.।)

☆ हेमंत साहित्य # ५६ ☆

✍ इन दिनों.… ☆ श्री हेमंत तारे  

बड़ी तपिश है यार

इन दिनों.

साफ़ आसमाँ,

चिलके मारती धूप

और मानो,

क़फ़स में कैद हो हवा,

इन दिनों.

आज,

वो, सूखे कण्ठ लगा रही थी गुहार,

मांग रही थी पानी

क्योंकि

रिता रह गया था,

गलियारे में रखा सकोरा

जो भर देता था लबालब

मैं, हर रोज

इन दिनों.

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६५ ☆श्री कृष्ण भजन … ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम  – “श्री कृष्ण भजन “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६५ ☆

✍ श्री कृष्ण भजन .. ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राधे राधे बोल, मनवा राधे राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल।

*

श्याम तेरी बंसी की मीठी ये तान है,

सुनके इसे झूमे सारा जहान है।

राधा के मनमोहन, मुरलीधर घनश्याम,

तेरे चरणों में ही मेरा सम्मान है॥

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

यमुना किनारे तूने रास रचाया,

गोपियों के संग प्रेम दीप जलाया।

माखन चुराकर हर लिया सबका मन,

भक्तों के जीवन को दिया खुशियों से भर ।।

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

गीता का ज्ञान दिया अर्जुन को रण में,

सत्य की राह दिखाई जीवन के क्षण में।

दीनों के सहारे, दुखियों के रखवाले,

तेरे बिना सूने सब मंदिर और शिवाले॥

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

मेरे भी जीवन में आओ नंदलाला,

भक्ति से भर दो ये मन की मधुशाला।

तेरी कृपा से ही हर काम बनेगा,

नाम तेरा लेते ही जीवन सँवरेगा॥

*

जय-जय श्री राधे, जय-जय श्री श्याम,

भक्तों के हृदय में बसते आठों याम॥

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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