☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २९ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
नोबेल पुरस्कार समितीने दिलेल्या मानपत्रात टागोरांविषयी लिहिले आहे की, “रविंद्रनाथ टागोर यांच्या अत्यंत संवेदनशील, मनोवेधक, वेगळ्या धाटणीच्या व परिपूर्ण अशा काव्यरचनांनी त्यांनी इंग्रजी साहित्य विश्वाला त्यांच्या अनोख्या काव्यात्म विचारांनी समृद्ध केले आहे. ” तर इकडे टागोरांना असं वाटलं की, “या पुरस्कारामुळे एकमेकांना अपरिचित असलेल्या संस्कृती, विश्वबंधुत्वाच्या भावनेने जवळ आल्या. “
रविंद्रनाथ १९१२ च्या सुरवातीला बरेच आजारी होते त्यामुळे त्यांची आधीच ठरलेली लंडन ट्रिप त्यांना पुढे ढकलावी लागली. त्याऐवजी ते हवाबदलासाठी त्यांच्या पद्मा नदीच्या किनाऱ्यावरील शिलादोह येथील वडिलोपार्जित घरी राहायला गेले. तिथं त्यांनी त्यांच्या काही बंगाली कवितांचा इंग्रजीत अनुवाद केला. त्यांनी एका खाजगी पत्रात आपण हा अनुवाद, का व कसा केला याविषयी लिहिलं आहे. ते म्हणतात, ” हा शब्दश: अनुवाद नाही तर या कवितांचा हा पुनर्जन्म आहे. मी यातून पुनश्च एकदा नवनिर्मितीचा अनुभव घेतला. ” इंग्रजी रचनेसाठी सोईस्कर असा गद्य काव्य प्रकार त्यानी यासाठी निवडला व त्यांना हा काव्यसंग्रह व्हायला नको होता तर ती एक काव्य मालिका व्हायला हवी होती.
नंतर कांही महिन्यांनी डॉक्टरांच्या सल्ल्याने, इंग्लंडला बोटीने जाण्यासाठी ते निघाले या प्रवासात त्यांनी आणखी काही कवितांचे इंग्रजी भाषांतर केलं. लंडनला गेल्यावर ते त्यांचे चित्रकार मित्र रोथेन्स्टाइन यांना भेटले व रोथेन्स्टाइन यांनी त्यांची व त्यांच्या काव्याची ओळख लंडनच्या आपल्या नामांकित मित्र परिवाराला करून दिली. यात डब्ल्यू. बी. यीट्स होते तसेच थॉमस मूर, इजा पाऊंड, ब्रुक इत्यादि अनेक सुप्रसिद्ध व्यक्ती होत्या. त्या सर्वांना टागोरांच्या गूढ, अप्रतिम व नाविन्यपूर्ण काव्याने प्रभावित केले.
यीट्स् यांनी या भाषांतरीत कवितांमधून निवडक १०३ कवितांचे पुस्तक काढण्याचा आग्रह धरला. रोथेन्स्टाइन यांच्यामुळे ‘इंडिया सोसायटी ऑफ लंडन’ यांनी या कवितांचे पुस्तक छापले. या पुस्तकाचे इंग्रजी वाचकांनी खूपच उत्साहाने स्वागत केले व या पुस्तकाची दुसरी आवृत्ती छापण्यासाठी मॅकमिलन प्रेस ऑफ लंडन पुढे आली. अवघ्या नऊ महिन्याच्या कालावधीत या पुस्तकाच्या दहा आवृत्त्या निघाल्या. केवळ रोथेन्स्टाइन यांच्यामुळे हे सर्व शक्य झाले म्हणूनच टागोरांनी हे पुस्तक रोथेन्स्टाइन यांनाच अर्पण केले आहे. यीट्स् यांना तर या कवितांनी इतकं भारून टाकलं होतं की त्यांनी आपण होऊन या पुस्तकाला प्रदीर्घ प्रस्तावना लिहिली.
या पुस्तकातल्या सहा कविता ‘पोएट्री’ या अमेरिकन मासिकात प्रसिद्ध झाल्या व त्यांचे तिथे अनेक नियतकालिकांमधून खूप कौतुकही झाले.
यानंतर रॉयल सोसायटी ऑफ लिटरेचर चे सदस्य असलेले ब्रिटिश साहित्यिक थॉमस मूर यांनी नोबेल पुरस्कारासाठी रवींद्रनाथांचे नाव पुरस्कृत केलं व हॉल स्टाॅर्म व इतर महानुभावांनी त्याला अनुमोदन दिले. एकूण २८ नामांकनांमधून टागोरांचं नाव सर्व संमत झालं. तारेने ही बातमी टागोरांना कळविण्यात आली, जी टागोरांना २२ नोव्हेंबर १९१३ रोजी मिळाली. संपूर्ण शांती निकेतन या बातमीने हर्षभरीत झालं व २३ नोव्हेंबरला तिथे टागोरांचा भव्य सत्कार करण्यात आला. या कार्यक्रमाला जगदीशचंद्र बोस प्रमुख पाहुणे होते. सुमारे पाचशे उत्साहित प्रशंसकांना घेऊन एक खास रेल्वे गाडी कलकत्त्याहून बोलपूरला म्हणजे शांतीनिकेतनला या कार्यक्रमासाठी आली.
नोबेल पुरस्कार सोहळ्याला स्वीडन येथे वेळेत पोहोचू शकत नसल्यामुळे, समारंभाला टागोर उपस्थित राहू शकले नाहीत. मात्र त्यांनी पाठविलेले लिखित भाषण समारंभात वाचून दाखविण्यात आले.
नंतर तो पुरस्कार व मानपत्र २७ जानेवारी १९१४ रोजी बंगालचे गव्हर्नर लॉर्ड कारमिशेल यांच्या मार्फत राजभवनात टागोरांना समारंभ पूर्वक दिले गेले.
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☆ गीत : ८५ ☆
WHEN the warriors came out first from their master’s hall, where had they hid their power? Where were their armour and their arms?
They looked poor and helpless, and the arrows were showered upon them on the day
they came out from their master’s hall.
When the warriors marched back again to their master’s hall where did they hide their power?
They had dropped the sword and dropped the bow and the arrow; peace was on their
foreheads, and they had left the fruits of their life behind them on the day they marched back again to their master’s hall.
IN desperate hope I go and search for her in all the corners of my room; I find her not.
My house is small and what once has gone from it can never be regained. But infinite is
thy mansion, my lord, and seeking her I have come to thy door. I stand under the golden canopy of thine evening sky and I lift my eager eyes to thy face.
I have come to the brink of eternity from which nothing can vanish ⎯ no hope, no
happiness, no vision of a face seen through tears.
Oh, dip my emptied life into that ocean, plunge it into the deepest fullness.
Let me for once feel that lost sweet touch in the allness of the universe.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “तनक रुको घमधैयाँ लै लो“।)
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ।)
☆ शेष कुशल # ६३ ☆
☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?”– शांतिलाल जैन ☆
आईपीएल खत्म हो गया है सो ठिया आबाद करके शाम का खालीपन भरने की कोशिश में यार-दोस्त यहाँ जुटने लगते हैं. ठिए का ओटला अपन की तशरीफ़ का रोज़ाना इंतज़ार करता है. मैं जाता हूँ. मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान फील करता हूँ. कल तक अपन की मेधा रनों के चेज़, विकेटों के पतन, ओरेंज, पर्पल केपों, टूटते-बनते रिकार्डों जैसी जानकारियों पर सक्रिय नज़र आती थी. घर की बैठक से लेकर यार-दोस्तों के ठियों तक क्रिकेट ही टाकिंग पॉइंट हुआ करे था. आज नीट एग्जाम के पेपर लीक का मुद्दा सोच को बार-बार अपनी ओर खींच रहा है. दो महीने से चौकों-छक्कों की आतिशबाजी और विकेटों के गिरने के रोमांच में डूबी शाम का मजा सीबीएसई स्टूडेंट्स के साथ घट रही त्रासदियों के कड़वे घूँट ने किरकिरा कर रखा है. दोस्त चाहते हैं मैं इन गैर जरूरी मुद्दों को झटककर फिर से क्रिकेट के कार्निवाल में रम जाऊँ मगर नहीं हो पा रहा. बार-बार अपने नातियों का मासूम उदास चेहरा अपन के जेहन में घूम जाता है.
मैं यारों के बीच इन पर बहस उकेरना चाहता था मगर उस रोज़ ठिए पर दादू के अलावा कोई आया ही नहीं. बोले – “तुम्हारी सोच नकारात्मक हो गई है, सांतिभिया. दुश्वारियाँ आईपीएल से पहले कम थीं क्या?”
“नहीं दादू, दुश्वारियाँ तो आईपीएल के दरम्यान भी रहीं मगर निज़ाम ने हर शाम मस्ती में बिताने का फुल बंदोबस्त कर रखा था. उसने सस्ता डाटा भी मुहैया करा रखा था. नहीं करा पाया निज़ाम तो बस! आटा सस्ता नहीं करा पाया.”
दादू बोला – “हर समय महंगे आटे का रोना लेकर बैठ जाते हो तुम, सांतिभिया. आईपीएल ख़त्म हुआ तो क्या! रील एन्जॉय कीजिए. हर समय रोते मत रहिए. सीबीएसई की परीक्षा के आगे जहाँ और भी हैं. क्या हो जाएगा एक पीढी पूरी अनपढ़ भी रह ली तो!! जो पढ़े लिखे हैं वे कौनसे नैतिक काम कर रहे हैं? पढ़ा-लिखा बिका हुआ जज, बिका हुआ अफसर, बिका हुआ चुनाव अधिकारी, बिके हुए हाकिम, मुलाज़िम, उतने ही बिके बिके से सम्पादक और पत्रकार पढ़े लिखे नहीं हैं क्या? बिके हुए पढ़े लिखे समाज से बेहतर है एक पूरी पीढ़ी का अनपढ़ अनबिका रह जाना. करियर और रोज़गार के गम मत पालिए सांतिभिया क्रिकेट का अफगानिस्तान दौरा एन्जॉय कीजिए. महंगे पेट्रोल के गम को वैभव सूर्यवंशी के छक्कों, जोफ्रा आर्चर की यॉर्करों में भूल जाईए.”
मैंने कहा – “ऐसे कैसे हो सकता है दादू ? नाती ट्वेल्थ में नाईंटी एट परसेंट पर कॉंफिडेंट था. उसके रोल नंबर पर किसी और की कॉपी स्कैन हो गई है. दूसरावाला दो साल से नीट की तैयारी कर रहा था. कोचिंग क्लास की फीस ने पहले ही बजट घाटे में ला दिया है. आईपीएल में रन रेट के ऊपर-नीचे होने से जिंदगी हलाकान नहीं होती, घर के बजट का रन रेट गिरने से होती है. अपन के बजट का विकेट तो महीने के पहले ओवर में ही गिर जा रहा है. न पॉवर बचा है न प्ले. दो महीने तक टीवी का रिमोट जिस तरह का ‘स्ट्राइक रेट’ दिखाता था, अब वह थम गया है. उसकी जगह डॉलर के रेट ने ले ली है. सिक्स के काउंटर पर इन्क्रिजिंग नंबर देखने की लत लग गई थी, अब पेट्रोल डिस्पेंसर के घटते काउंटर ने टेंशन बढ़ा दी है. एक बात बताओ दादू मुद्दों के ये ‘बक’ कभी तो कहीं तो ‘स्टॉप’ करते होंगे?”
“ये नया निज़ाम है सांतिभिया, वज़ीर-ए-तालीम से लेकर वज़ीर-ए-आज़म तक, स्टॉप करने तो दूर बक अब किसी की टेबुल के आस पास फटकने भी नहीं पाते. झेड-प्लस सिक्युरिटी लगी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार पाता, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? वैसे निज़ाम के कंसिडरेशन में है कि आईपीएल के टाईम स्लॉट में क्या नया लाए जाए कि जेन-जी जंतर मंतर पहुँचने की बनिस्बत स्टेडियम की दीर्घाओं में नज़र आए. वो चियर-लीडर्स के ठुमकों में गिरते सेंसेक्स को भूल जाए. अवाम को जीवन की आपाधापी से निजात दिलापाना शायद उसके वश में नहीं रहा तो क्यों न उसे रील के समंदर में स्कूबा डाइविंग का मज़ा लेने के लिए छोड़ दिया जाए. कोशिश में है निज़ाम कि साल में दो-चार आईपीएल आयोजित करवाए. जब तक स्क्रीन पर गेंद घूमती रहेगी, तब तक आप जैसे सिरफिरों का भेजा घूमेगा नहीं. वरना ये पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, स्कैम के बाउंसर आप को ज्यादा दिन सकारात्मक रहने नहीं देगे. जस्ट चिल माई डियर सांति, उबलने की जिम्मेदारी चाय पर छोड़ दीजिए. कड़क मीठी का कट एन्जॉय कीजिए और निकलिए.”
उस रोज़ ठिए पर बहस लम्बी नहीं चली.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक विचारणीय बाल कथा – “समझ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१७ ☆
बाल कथा – समझ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(सच्ची घटना , राम मंदिर के वर्तमान घटना क्रम के परिदृश्य पर )
सूरज की सुनहरी किरणें मंदिर के शिखर को चूम रही थीं। वातावरण में शंख की ध्वनि और धूप-बत्ती की मंद सुगंध घुली हुई थी।
मैं अपने सात वर्षीय बेटे अमित के साथ मंदिर गया था, जो अपनी मासूम आंखों से दुनिया समझने की कोशिश कर रहा था । मेरे हाथ का स्पर्श थामे हुए , मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैने देखा कि वह पीछे मुड़कर कोने में भीख के लिए बैठी बूढ़ी अम्मा को देख रहा था।
दर्शन कर मैने उसके छोटे से हाथों में सौ का नोट देकर उसे दान पेटी में डालने के लिए कहा। वह धीमे कदमों से आगे दान पेटी के सामने झुका भी ।
फिर हम बाहर आ गए ।
बाहर निकल वह उसी बूढ़ी अम्मा के पास जा रुका । उसने अपनी जेब टटोली और वह सौ का नोट निकाल कर उस बूढ़ी अम्मा की हथेली पर रख दिया।
अम्मा की आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए और उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया।
मैं स्तब्ध खड़ा यह सब देख रहा था। और उसकी बाल बुद्धि पर मन ही मन प्रसन्न भी था ।
(अब, जब भी समाचारों में बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों के चंदे में हेराफेरी, भ्रष्टाचार या उन पेटियों के पैसों चोरी होने अथवा गलत हाथों में जाने की खबरें सुनता हूं, तो मुझे उस दिन सीढ़ियों पर बैठी उस बूढ़ी अम्मा के झुर्रीदार चेहरे और अमित की समझ की बरबस याद आ जाती है। दान किसी बड़े ताले वाली पेटी के भीतर कैद नहीं, बल्कि उस साक्षात ईश्वर के हाथों में सौंपना अधिक उचित है जो दीन बंधु है।)
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – नैन उनके झुके तो नमन हो गया…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२५ ☆
☆ सजल – नैन उनके झुके तो नमन हो गया…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता “पर्यावरण संरक्षण”।)
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८२ ☆ देश-परदेश – विश्व शरणार्थी दिवस : 20 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆
करीब आठ दशक पूर्व, अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर लकीर खींच कर देश को विभाजित कर दिया था। पारिवारिक बंटवारे होने पर घर और दुकान के बीच एक दीवार खड़े होते हुए तो बहुत बार देखा हैं। धर्म के नाम से बंटवारा होना एक अलग बात होती है।
“जिस तन लागे, सो तन जाने, कोई ना जाने पीर पराई” हमारे परिवार के बड़ों ने उस वेदना को झेला था, इसलिए आज तक गाजे बाजे उसकी चर्चा होती रहती है।
विभाजन का दर्द सबसे अधिक बंगाल, पंजाब और सिंध के लोगों ने झेला था। शरणार्थी बनकर आए अधिकतर लोग पुरुषार्थी बन गए, अल्प समय में अपनी मेहनत और लगन से समाज में ना अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस ली, वरन देश के विभिन्न भागों में बस कर आज दूसरों को भी रोज़गार दे रहें हैं।
अस्सी के दशक के बाद हमारे कश्मीरी भाइयों ने तो बिना विभाजन के अपना घर बार छोड़कर देश के दूसरे भागों में जा कर आपकी जान बचाई थी।
सत्तर के दशक में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को हमारे देश में पनाह लेनी पड़ी थी हम सब ने उनके नाम से अतिरिक्त टैक्स भरा और कई स्थानों पर तो ये बांग्लादेशी आज भी बसे हुए हैं। हमारे साधनों के उपयोग से फल फूल रहें हैं।
हमारे जैसे शरणार्थी परिवारों से लोग आज भी जब पूछते है, कि आपका गांव कौन सा है ? तब हमारी जुबां वेदना के दर्द का कड़वा घूंट पी कर रह जाती हैं। कुछ लोग तो ये भी पूछ लेते है, गाँव में खेती की कितनी जमीन है ? “सब भूमि गोपाल की” कहकर बात को टाल दिया जाता है।
हमारी आयु के लोग तो सिर्फ बातें सुनकर ही बड़े हुए हैं। धन्य थे हमारे पूर्वज जिन्होंने निजी तौर से उस दर्द से उबर कर हमारा पालन पोषण कर हमें बड़ा किया था।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…१ ।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८८ ☆
☆ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
गुड़ियों से खेल रही है
‘भावना‘,
मिट्टी खा रही है
‘कामना‘
और
धनुष साध रहा है ‘हर्ष’–
इन्हें क्या मालूम
कि आज
कम हो गये हैं
मेरे जीवन के कितने वर्ष।
हाय! जिन्दगी कट रही है
किराये की छत में,
क्या दे पाऊँगा विरासत में?
अखबारों की कतरनें
बासी चिट्ठियाँ
और लाटरी की निर्जीव टिकिटें
भला
किस काम आयेंगीं?
‘संभावना की फसल‘ की
पुरानी प्रतियाँ
इन्हें क्या दे पायेंगी?
सच तो ये है-
दुहरी जिन्दगी जीने वाले
मास्टर का
जीना मरना बराबर है,
ये मँहगाई
जीवित शव पर लगा हुआ ‘कर‘ है।
क्रमशः अगले अंक में
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈