हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य # 13 – बाल कविता-वरदायी चक्की और मेरी चाह ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  बाल कविता  “वरदायी चक्की और मेरी चाह।  आदरणीय डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय ‘ जी ने बड़ी ही सादगी से बाल अभिलाषा को वरदायी चक्की के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है । )

(अग्रज डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी की फेसबुक से साभार)

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 13 ☆

 

☆ बाल कविता – वरदायी चक्की और मेरी चाह ☆  

 

सोच रहा हूं अगर मुझे

मनचाही चीजे देने वाली

वह चक्की मिल जाती

तो जीवन में मेरे भी

ढेरों खुशियां आ जाती.

 

सबसे पहली मांग

मेरी होती कि

वह मम्मी के सारे काम करे

और हमारी मम्मी जी

पूरे दिनभर आराम करे…

 

मांग दूसरी

पापा जी की सारी

चिंताओं को पल में दूर करे

और हमारे मां-पापाजी

प्यार हमें भरपूर करे…

 

मांग तीसरी

भारी भरकम बस्ता

स्कूल का ये हल्का हो जाए

जो भी पढ़ें, याद हो जाए

और प्रथम श्रेणी पाएं…

 

चारों ओर रहे हरियाली

फल फूलों से लदे पेड़

फसलें लहराए

चौथी मांग

सभी मिल पर्यावरण बचाएं…

 

मांग पांचवी

देश से भ्रष्टाचार

और आतंकवाद का नाश हो

आगे बढ़ें निडरता से

सबके मन में उल्लास हो…

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ काव्य कुञ्ज – # 4 – तेरी बद्दुआएँ ☆ – श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

(श्री मच्छिंद्र बापू भिसे जी की अभिरुचिअध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ साहित्य वाचन, लेखन एवं समकालीन साहित्यकारों से सुसंवाद करना- कराना है। यह निश्चित ही एक उत्कृष्ट  एवं सर्वप्रिय व्याख्याता तथा एक विशिष्ट साहित्यकार की छवि है। आप विभिन्न विधाओं जैसे कविता, हाइकु, गीत, क्षणिकाएँ, आलेख, एकांकी, कहानी, समीक्षा आदि के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं एवं ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं।  आप महाराष्ट्र राज्य हिंदी शिक्षक महामंडल द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी अध्यापक मित्र’ त्रैमासिक पत्रिका के सहसंपादक हैं। अब आप प्रत्येक बुधवार उनका साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज पढ़ सकेंगे । आज प्रस्तुत है उनकी नवसृजित कविता “तेरी बद्दुआएँ”

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज – # 4☆

 

☆ तेरी बद्दुआएँ 

 

(विधा:कविता)

कवि: मच्छिंद्र भिसे,

 

अरे सुन प्यारे पगले,

देख तेरी बद्दुआएँ काम कर गईं,

पटकना था जमीं पर हमें,

यूँ आसमाँ पर बिठा गईं।

 

तेरी रंग बदलती सूरत ने,

परेशान बारंबार किया,

यही रंगीन सूरत मुझे,

हर बार सावधान कर गई।

 

आप एहसास चाहा जब भी,

नफरत ही नफरत मिली,

न जाने कैसे तेरी यह नफरत,

खुद को सँजोये प्रीत बन गई।

 

छल-कपट की सौ बातें,

इर्द-गिर्द घूमती रहीं,

तेरा बदनसीब ही समझूँ,

जो उभरने का गीत बन गई।

 

तेरी हर एक बद्दुआ,

मेरी ताकत बनती गई,

देनी चाही पीड़ा हमें,

वह तो दर्द की दवा बन गई।

 

सुन, अभिशाप से काम न चला,

आशीर्वचन का चल एक दीप जला,

आएगा जीवन में एक नया विहान,

दीप की ज्योति बार-बार कह गई।

 

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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆ महापूर ☆ – डॉ. रवींद्र वेदपाठक

डॉ. रवींद्र वेदपाठक

(प्रस्तुत है डॉ रवीन्द्र वेदपाठक जी की एक  सामयिक मराठी कविता  “महापूर”।) 

☆  महापूर ☆

 

संथ संत कृष्णामाई

झाली भलती अधीर

आली पाहुणा घेवून

नाव त्याचे महापूर……..!! १ !!

 

व्याकुळला ओला जीव

जणू गायीचा हंबर

सांज बुडता बुडता

कासावीस ते अंबर……..!! २ !!

 

दंश भिनला देहात

रानी पेटले काहूर

वाहणाऱ्या वेदनेची

हुळहुळे हूरहूर………!! ३ !!

 

मनस्विनी कृष्णामाई

छेडी दुःखाची लहर

संधिकाळी आक्रोशतो

ऊरी जीवांचा कहर……..!! ४ !!

 

मानवाच्या काळजात

जागविले देवघर

मनोमनी पालविले

चैतन्याचे औदुंबर………!! ५ !!

 

© डॉ. रवींद्र वेदपाठक

तळेगाव.

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (1)प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

षष्ठम अध्याय

( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण )

 

श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।

स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।।1।।

श्री भगवान ने कहा-

जे करता कर्तव्य निज,बिना कर्मफल ध्यान

सन्यासी योगी वही,वह ही सही महान।

जो नहि करता कर्म या कोई यज्ञ-विधान

उसे न संयासी कहें,उसे न योगी जान।।1।।

 

भावार्थ :  श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।।1।।

 

He who performs his bounden duty without depending on the fruits of his actions—he is a Sanyasi and a Yogi, not he who is without fire and without action. ।।1।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 7 ☆ हिस्सा ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा ☆

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “हिस्सा”। )

 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 7  

☆ हिस्सा  

 

तुमने

कर दिया है बंद मुझे

किसी सूने से लफ्ज़ की तरह

जो छुपा हुआ है

किसी ठहरी सी नज़्म में,

किसी किताब के मौन सफ्हे पर!

 

खामोश सी मैं

एक टक देख रही हूँ

तुम्हारी आँखों के चढ़ते-उड़ते रंगों को

और निहार रही हूँ

तुम्हारे होठों की रंगत को,

तुम्हारे माथे की चौड़ाई को

और तुम्हारे जुल्फों के घनेरेपन को!

 

सुनो,

मैं तुम्हारी मुहब्बत का

एक छोटा सा हिस्सा हूँ,

तुम ही हो मुझे बनाने वाले

और मेरी पहचान भी तभी तक है

जब तक तुम मुझे चाहो;

वरना मिटाने में तो

बस एक लम्हा लगता है!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – रोज़ रात ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

☆ रोज रात ☆

रोज रात
सो जाता हूँ
इस विश्वास से कि
सुबह उठ जाऊँगा,
दर्शन कहता है
साँसें बाकी हैं
सो उठ पाता हूँ,
मैं सोचता हूँ
विश्वास बाकी है
सो उठ जाता हूँ..।

विश्वास बना रहे।

(आगामी कविता संग्रह से।)

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

 

 

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ प्रो राजेन्द्र ऋषि के 75 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष ☆ – पंडित मनीष तिवारी

पंडित मनीष तिवारी

 

(प्रस्तुत है संस्कारधानी जबलपुर के राष्ट्रीय  सुविख्यात साहित्यकार -कवि  श्री मनीष तिवारी जी  का मूर्धन्य साहित्यकार एवं सुप्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो राजेंद्र ऋषि जी  के ७५वें जन्म दिवस पर यह विशेष आलेख.

ई-अभिव्यक्ति की और से प्रो राजेंद्र ऋषि जी को उनके समर्पित साहित्यिक एवं स्वस्थ जीवन के लिए  हार्दिक शुभकामनाएं. )

 

☆ प्रो राजेन्द्र ऋषि के 75 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष ☆

 

सरहद पर सैनिक चीन की फौज से जूझ रहे थे, विकट परिस्थियां सामने थीं देश के नागरिकों में भयंकर आक्रोश था, कैसे भी हो चीन को सबक सिखाना है अपने अपने ढंग से लोग सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे ऐसी विकट परिस्थिति में संस्कारधानी से राष्ट्रवादी स्वर फूटा जिसकी कविताएं सैनिकों में जोश भर रही थीं वह नित नए प्रतीकों से सैनिकों में साहस भरता और मातृभूमि के लिए सर्वस्व निछावर करने की प्रेरणा देता वही स्वर आगे चलकर कवि सम्मेलन और कवि गोष्ठियों का सिरमौर हुआ। सामाजिक और राजनैतिक विचारधारा का स्वर बनकर मंचों से रात रात भर कविताओं को उलीचता, राष्ट्रभक्ति के साथ रसिकों की प्यास बुझाता। 1962 से जिन युवा गीतकारों ने मंचों पर धूम मचाई उनमें मेरे पूज्य पिता गीतकार स्व ओंकार तिवारी चाचा जनकवि स्व सुरेंद्र तिवारी के साथ प्रो राजेन्द्र ऋषि का नाम तात्कालिक  कवि सम्मेलनों की अनिवार्यता बन गए थे। अपने फक्कड़पन और औदार्य के कारण कवि राजेन्द्र तिवारी, अब राजेंद्र ऋषि हो गए। उन दिनों हिंदी कवि सम्मेलन  के सशक्त हस्ताक्षर संस्कारधानी के ख्यातिलब्ध कवि व्यंग्य शिल्पी स्व श्रीबाल पांडेय जी का तीनों पर वरद हस्त था 1961 में कमानिया गेट पर आयोजित कवि सम्मेलन में श्रीबाल जी ने इन तीनों युवा कवियों का प्रथम बार बड़े मंच से काव्यपाठ करवाया ये कवि उनकी कसौटी पर खरे उतरे और वर्षों बरस मंचों पर प्रतिष्ठित रहे।

सरकारी नीतियां हों समाज सेवा हो शिक्षा का दान हो या मित्रों की आवश्यकता ऋषि जी सदैव तत्पर रहे और संकट के क्षणों में कंधे से कंधा मिलाकर अपना मित्र धर्म निभाया। उन दिनों के कवि सम्मेलन आज की तरह ग्लैमरस नहीं थे मंच पर शुद्ध कविताएं होती थीं उस्ताद कवि बराबर काव्यपाठ पर अपनी प्रतिक्रियाएं देते थे। कवि सम्मेलन रोजगार नहीं था साहित्य सेवा ही उसके मूल में थी अतः ऋषि जी ने जीवकोपार्जन हेतु हितकारिणी बीएड कालेज को कर्मभूमि बनाया। कविता का धर्म और शिक्षा का कर्म जीवन पर्यन्त चलता रहा शैक्षणिक जगत में ऐसी धाक बनी की जबलपुर विश्व विद्यालय ने उन्हें ससम्मान डीन की कुर्सी लगातार 3 बार सौंपी उल्लेखनीय है कि यह पहला अवसर था जब अशासकीय शिक्षा महाविद्यालयों से कोई प्रोफेसर विश्व विद्यालय का डीन हुआ। ऋषि जी ने डीन की आसन्दी पर बैठकर शिक्षा को नए आयाम दिए इसका जीत जागता प्रमाण विश्व विद्यालय में बीएड विभाग की स्थापना है। इस स्थापना पीछे उनका उद्देश्य यह भी था कि महाकौशल क्षेत्र और शहर की प्रतिभाएं विश्व विद्यालय में अपनी सेवा दे सकें किन्तु उनका यह सपना आज भी अधूरा है। तथापि उनका  कार्यकाल विश्व विद्यालय के लिए बहुत प्रेरक और मार्गदर्शक रहा। शनैः शनैः सेवानिवृत्ति के समय आया मित्रों ने बड़ा जलसा कर उन्हें कार्यमुक्त किया।

नौकरी के दौरान ही उनका प्रथम काव्य संग्रह आपा सहित्याकाश में बहुत तेज़ी से चर्चित हुआ संग्रह की अनेक रचनाओं में रुपयों का झाड़, अंधेरे की आज़ादी और सब कुछ बदल गया है मगर कुछ नहीं बदला ने लोकप्रियता के कीर्तिमान गढ़े। द्वतीय काव्य संग्रह “इक्कीसवी सदी को चलें” का विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने किया था। तेजी से बदलते राजनैतिक परिदृश्य में आम आदमी की व्यथा कथा और देश की किस्मत में लिखे राजनैतिक छलावे को उन्होंने अपनी रचनाओं में खूब लताड़ा। यथा-

“दिल्ली बनी हैं झांसी झांसे नहीं बदले।

नटवर बदल गए हैं तमाशे नहीं बदले”।

अमीरी और गरीबी, फ़र्ज़ी जनसेवा के छलावे को भी उन्होंने आड़े हाथों लेकर लिखा

प्रगति पंथ के निर्माता हैं कड़ी धूप में,

रथ पर चलने वालों को रिमझिम बरसातें,

देश देखनेवाली आंखें धूल भरी हैं

स्वार्थ भारी आंखों को सपनों की सौगातें।

जब जब भी देश  जाती धर्म की आग में झुलसा तब तब ऋषि जी ने जनता के बीच सकारात्मक  पैगाम पहुंचाया-

इंसानी रिश्तों से बढ़कर मज़हब नहीं बड़े रहते हैं।

बढ़ जाता इंसान राह पर मज़हब वहीं खड़े रहते हैं।

ऋषि जी जब कवि सम्मेलन में काव्य पाठ करते तो अपनी सशक्त प्रस्तुति और सम्प्रेषणीयता के कारण पूरे वातावरण को अपने पक्ष में कर लेते हैं लोग उनकी सम्मोहनी के कायल हो जाते हैं। उनकी कविताएं सहज सरल भाषा में बड़ा पैगाम देते हुए समाधान की यात्रा करती हैं।

चूंकि ऋषि जी जीवन भर अक्खड़ फक्कड़ निरदुंद रहे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समय के साक्षी रहकर काव्य लेखन में लगे रहे चुनौतियों को सदा स्वीकार किया सच को सच लिखा गलत को आड़े हाथों लिया इसलिए सरकारी सम्मानों से सदैव वंचित रहे, सरकार की जन विरोधी नीतियों पर हमेशा कटाक्ष करते रहे इसलिए सरकारी कार्यक्रम, वजनदार लिफाफा और सुविधाएं उनसे कोसो दूर रहीं। वे राज दरबारी न होकर जनपीड़ा के गायक हैं उनकी कविता आम आदमी और गांव चौपालों में जिंदा है और हमेशा रहेगी।

ऋषि जी अलमस्त फकीर और ठठ्ठा मारकर हंसने वाले जिंदादिल इंसान हैं उनके पास समय का पाबंद होकर नहीं बैठा जा सकता किसी भी विषय की तह तक जाने  की उनमें विलक्षण प्रतिभा है। किसी कार्य के दूरगामी परिणाम क्या होंगे वे पहले ही घोषणा कर देते हैं। साहित्य के गिरते स्तर और कवि सम्मेलन के दूषित माहौल से वे बहुत क्षुब्ध हैं और समय समय अपने शिष्यों को आगाह करते रहते हैं।

एक समय आया जब पारम्परिक कविता को साहित्य न मानकर उल जुलूल बेतुकी कविता और कवियों की विरुदावली गायी जाने लगी तब उन्होनें सजग रचनाकार की भूमिका का निर्वहन करते हुए आंचलिक साहित्यकार परिषद का गठन कर पूरे मध्यप्रदेश में कविता की प्रतिष्ठा हेतु वृहद  अभियान चलाकर अनेक रचनाकार खड़े करते हुए बहुत मजबूत सारगर्भित सारस्वत अभियान का श्रीगणेश किया।मुझे गर्व है में भी आंचलिक  साहित्यकार परिषद का सिपाही रहकर अभियान में शामिल हुआ।

यहां यह जिक्र करना बहुत आवश्यक है कि 90 के दशक में सरकारी मंच पूर्णतः वामपंथियो की गिरफ्त में आ चुके थे दूरदर्शन और आकाशवाणी से वही रचनाएँ प्रसारित होती जिनके सिर पैर, ओर छोर नहीं होता ऐसी विकट स्थिति में सरकार से लड़ाई लड़कर पारम्परिक यथार्थ कविताओं का आकशवाणी से प्रसारण करवाने का श्रेय सिर्फ राजेन्द्र ऋषि को जाता है। इस दौर में आंचलिक  साहित्यकार परिषद के नीचे प्रदेश के समर्थ और सच्चे रचनाकार स्वाभिमान से काव्यपाठ कर सके। यह लिखते हुए मुझे गर्व हो रहा है कि इस दौर में गुमनामी के अंधेरे में खोए रचनाकारों की सुषुप्त चेतना जागृत हुई और आंचलिक साहित्यकार परिषद के अधिवेशनों से उन्हें देश व्यापी पहिचान मिली।

ऋषि जी का व्यक्तित्व सर्वग्राही और सर्व स्वीकार है जिस तरह उनकी लेखनी को सार्वभौम सर्वस्वीकृति है उसी तरह उनका निश्छल व्यवहार मौलिक रचनाकारों के प्रति सदैव प्रेरक रहा। अध्यक्षीय और मुख्यातिथ्य की मंचीय लिप्सा से दूर कविता के प्रति प्रतिबध्दता प्रणम्य है। अनेको बार मैंने ऋषि जी को श्रोता समुदाय में बैठकर मौलिक रचनाकारों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते देखा है।

परमप्रभु परमात्मा श्रीकृष्ण जी और राधा रानी ने ऋषि जी पर अनुपम कृपा बरसायी उनकी कलम से प्रस्फुटित कृष्ण काव्य के छंदों को श्रखला बढ़ते बढ़ते 1000 हो गई अब वे कृष्ण काव्य के ऋषि हैं वे कृष्ण भक्ति में इस कदरलीन हैं कि उन्होंने कृष्ण के साथ खुद को एकाकार कर लिया है। प्रत्येक छंद में नए प्रतीक नए सम्बोधन नया भाव नया द्रष्टिकोण दृष्टिगोचर होता है। हिंदी साहित्य के लिए कृष्ण काव्य वरदान है। ऋषि जी जब डूबकर सुनाते हैं तो लगता है एक छंद और सुन लेते अद्भुत अद्वतीय कृति का शब्द शब्द अनमोल है। छंदों का लालित्य सहज भाषा मन में भक्ति का बीजारोपण करती है बानगी के 2 छंदों का आप आनन्द लीजिये-

प्रेम के मीठे दो बोल कहो, बढ़ के सत्कार करो न करो,

दधि गागर को कम भार करो, दूजो उपकार करो न करो,

ये जन्म में प्रीति प्रगाढ़ रखो ओ जन्म में प्यार करो ने करो

अब पार कराओ हमें जमुना भव सागर पार करो न करो।

और

नज़रों पे चढ़ी ज्यों नटखट की खटकी खटकी फिरती ललिता,

कछु जादूगरी श्यामल लट की लटकी लटकी फिरती ललिता,

भई कुंजन में झुमा झटकी ,झटकी झटकी फिरती ललिता,

सिर पे धर के दधि की मटकी मटकी मटकी फिरती ललिता।

आज ऋषि जी ने अपने यशस्वी जीवन के 75 वर्ष पूर्ण किये गत वर्ष राष्ट्रीय कवि सङ्गम, मप्र आंचलिक साहित्यकार परिषद, जानकीरमण महाविद्यालय ने ऋषिजी का अमृत महोत्सव बहुत धूमधाम से द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपनन्द जी सरस्वती महाराज के निज सचिव ब्रह्मचारी सुबुध्दानन्द जी के पावन सानिध्य में मनाया था जिसमें नगर के कवि पत्रकार, लेखक, नेता, समाजसेवी, शिक्षाविद, किसानों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर ऋषि जी को अपना शुभाशीष दिया । रसखान, अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध , जगन्नाथ दास रतनाकर की परंपरा के संवाहक ऋषि जी अपने ढंग से अपनी शैली अपनी भावाभिव्यक्ति से जनमानस तक पहुंचने का महनीय कार्य कर रहे हैं । ऋषि जी के सृजन में जिन तीन भाषाओं का समन्वय मिलता है उनमें बुंदेली भाषा, ब्रजभाषा और खड़ी बोली प्रमुख हैं।एक महाकवि, भक्त कवि और पथ प्रदर्शक के 75 वर्ष पूर्ण होने पर उनके स्वस्थ, दीर्घायु जीवन की कामना के साथ बहुत बहुत बधाई।

साहित्य के ऋषिराज को नमन।

 

©  पंडित मनीष तिवारी, जबलपुर ,मध्य प्रदेश 

प्रान्तीय महामंत्री, राष्ट्रीय कवि संगम – मध्य प्रदेश

मो न ९४२४६०८०४० / 9826188236

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 3 ☆ काव्य संग्रह – कंटीले कैक्टस में फूल ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।  अब आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  की पुस्तक चर्चा  “काव्य संग्रह – कंटीले कैक्टस में फूल।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 3☆ 

 

 ☆ काव्य संग्रह – कंटीले कैक्टस में फूल ☆

 

पुस्तक चर्चा

काव्य संग्रह .. कंटीले कैक्टस में फूल 

लेखक.. आनन्द बाला शर्मा

पृष्ठ ६०, मूल्य २५० रु

संस्करण.. हार्ड बाउन्ड मूल्य

आई एस बी एन..९७८ ८१ ९३४८२६ ९ ८

प्रकाशक.. विनीता पब्लिशिंग हाउस, ग्रेटर नोयडा

 

☆ काव्य संग्रह – कंटीले कैक्टस में फूल  – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

 

आनंद बाला शर्मा, कविता, गीत, संस्मरण, लेखो में अपने मनोभाव व्यक्त करती हैं. आकाशवाणी से उनके प्रसारण होते रहे हैं. इन दिनो वे जमशेदपुर में रहकर अपने रचना कर्म द्वारा समाज को दिशा प्रदान करने में निरत हैं. प्रस्तुत पुस्तक में उनकी समय समय पर लिखी गई ४८ छोटी बड़ी अतुकांत कवितायें संग्रहित हैं. स्वाभाविक रूप से कविताओ के विषयो में वैभिन्य है. वे लिखती हैं

 

सपने पूरे होते हैं

बस उन्हें चाहिये थोड़ी जगह हवा पानी धूप

और खुला आसमान

ओढ़ने के लिये समय की चादर और

एक चाहत उनको बिखरने से बचाने के लिये.

 

इसी तरह के बिम्ब और प्रतीको के माध्यम से नई कविता की उन्मुक्त शब्द विन्यास शैली में प्रौढ़ कवियत्री ने स्त्री विमर्श पर कन्यादान, रिस्ते, माँ तो बस मां होती है, आंख के दो आंसू बेटियां औरत जैसी रचनायें की हैं. कारगिल युद्ध के दौरान जब एक बच्ची अपना जन्मदिन मनाने से मना कर देती है तो इस अनुभव की साक्षी रचनाका को संवेदनाओ के जिंदा होने का प्रमाण मिल जाता है और वे आस्वस्ति के साथ कविता लिख डालती हैं. कवितायें जो लिखी ही नही गईं, उनकी संग्रह की अंतिम रचना है. आशा करनी चाहिये कि भविश्य में उनसे हिन्दी जगत को ओर परिपक्व, और भी प्रयोगात्मक, और भी नये बिम्ब के साथ उपजी प्रौढ़ कवितायें मिल सकेंगी.

चर्चाकार.. विवेक रंजन श्रीवास्तव, ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 15 – सच्ची मोहब्बत ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “सच्ची मोहब्बत”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी की कलम को इस बेहतरीन लघुकथा के माध्यम से  युवाओं को वैवाहिक निर्णय लेने के समय भावनाओं का सम्मान रखने का अभूतपूर्व संदेश देने के लिए  बधाई ।)

 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 15 ☆

 

☆ सच्ची मोहब्बत ☆

 

मोहब्बत कहते ही लगता है कि एक दूसरे के प्रति अटूट प्यार विश्वास और समर्पण की भावना। मोहब्बत किसी से कहीं भी हो सकती है, बस दिल पर गहरा असर हो। गांव के मोहल्ले में एक छोटा सा परिवार सभी के साथ रहता था। माँ-बाप मजदूरी करते और बिटिया नंदिनी  और हाथ पैर से अपंग भाई। नंदिनी  बहुत सुंदर पढ़ाई लिखाई में तेज और समझदार थी। कहते हैं मजबूरी सब सिखा देती है, ऐसे ही नंदिनी  समय से पहले समझदार और अपने कर्तव्य समझने लगी थी। भाई की कमजोरी और माँ-बाप की लाचारी से नंदिनी को सब सीखना पड़ा। स्कूल के साथ-साथ थोड़ा बहुत सबका काम करती थी। पैसे और खाने का सामान मिलने पर उनका खर्च चलने लगा था। शिक्षा पूरा होते ही नंदिनी  एक स्कूल की टीचर बन गई। अब थोड़ी राहत हुई। मां बाप भी खुश भाई के इलाज के लिए थोड़े पैसे भी बचा लेती थी। पर मन ही मन नंदिनी  भाई को लेकर बहुत परेशान रहती थी। पास पड़ोस में सभी नंदिनी  से कहते शादी कर लो नंदिनी  पर वह तो घर से बंधी हुई थी। कहती मेरी जिम्मेदारी को देखते हुए कौन मुझसे शादी करेगा। परंतु कहीं ना कहीं सब बातों से आहत होती थी। एक दिन अचानक पिताजी को लकवा यानि कि पैरालिसिस लग गया और बिस्तर पर आ लगे। माँ बेचारी बेटी को लेकर रो-रोकर दिन काटने लगी। एक दिन स्कूल से नंदिनी आई घर में कुछ मेहमान बैठे थे। पता चला नंदिनी की शादी की बात चल रही है। बिल्कुल सादे लिबास में भी नंदिनी का रूप चमक रहा था। मेहमानों के जाने के बाद पिताजी इशारे से बेटी को कहने लगे लड़का अच्छा है, शादी कर ले। नंदिनी ने गुस्से से कहा आप सब के कारण में शादी नहीं कर पाऊंगी। रात में सोचते सोचते नंदिनी के पिता जी सदा-सदा के लिए शांत हो गए। अब तो जैसे घर में बेचैनी का माहौल बनने लगा। भाई भी बहन की परिस्थिति को समझ सकता था। पर हाथ पैर से लाचार कुछ नहीं कर पा रहा था। बस रो लेता था। एक दिन नंदिनी स्कूल से लौटी। माँ  ने चाय के साथ उसको एक रजिस्टर्ड लिफाफा पकड़ा दिया। खोलकर नंदिनी ने पढ़ी। आँखों से आँसू गिरने लगे। स्टांप पेपर पर लिखा था –

“मैं अपने होशो हवास से लिख रहा हूं। मैं नंदिनी के माँ और भाई को आजीवन अपने साथ रखूंगा। और किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होने दूंगा। बस नंदिनी मेरी जीवन साथी बन जाओ।”

*तुम्हारा सुधांशु*

नंदिनी बार-बार पढ़ रही थी *तुम्हारा सुधांशु* जैसे उसकी सच्ची मोहब्बत हो। खुशी से आँसू गिर रहे थे। चेहरे पर बहुत प्यारी हँसी। माँ और भाई समझ नहीं पा रहे थे। नंदिनी ने आँसू पोंछ कर माँ से कहा शादी की तैयारी करो। माँ और भाई ने कोई सवाल नहीं किया। बस खुशी के मारे मोहल्ले में बताने दौड़ चली। भाई अपनी खुशी गाना गाकर कर रहा था। सुधांशु को *सच्ची मोहब्बत* मिल गई।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #15 – अमृताचा गोडवा * ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक सामयिक एवं सार्थक कविता “अमृताचा गोडवा”।)

 ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 15☆

 

? अमृताचा गोडवा ?

 

गोडकंठी सूर अन् शब्दातही शालीनता

मधुरताही शरण येते रसिकतेची मान्यता

 

पाहडी आवाज होता रागही तो पाहडी

सप्तसूरांचे कबीले अन् पहाटे सांगता

 

संतही रंगून जाती कीर्तनाच्या संगती

आळवीताना प्रभूला त्यात वाटे धन्यता

 

सात सूरांचे हजारो राग झाले या इथे

वर्ज होतो सूर कोणी ना तरीही खिन्नता

 

कान माझे पीत होते अमृताचा गोडवा

मैफिलीचे काय वर्णू केवढा हा राबता

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

ashokbhambure123@gmail.com

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