हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१२ ☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख “क्या प्रॉब्लम है…?”। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१२ ☆

☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆

‘क्या प्रॉब्लम है’… जी हां! यह वह शाश्वत् प्रश्न है,जो अक्सर पूछा जाता है छोटों से; बराबर वालों से– परंतु आजकल तो ज़माना बदल गया है। अक्सर हर उम्र के लोग इन प्रश्नों के दायरे में आते हैं और हमारे बुज़ुर्ग माता-पिता तथा अन्य परिवारजन– सभी को स्पष्टीकरण देना पड़ता है। सोचिए! यदि रिश्ते में आपसे बहुत छोटी महिला यह प्रश्न पूछे,तो क्या आप सकते में नहीं आ जाएंगे? क्या होगी आपकी मन:स्थिति… जिसकी अपेक्षा आप उससे कर ही नहीं सकते। वह अनकही दास्तान आपकी तब समझ में तुरंत आ जाती है,जब चंद लम्हों बाद आपका अहं/ अस्तित्व पलभर में कांच के आईने की भांति चकनाचूर हो जाता है और उसके असंख्य टुकड़े आपको मुंह चिढ़ाते-से नज़र आते हैं। दूसरे शब्दों में आपको हक़ीक़त समझ में आ जाती है और आप तत्क्षण अचंभित रह जाते हैं यह जानकर कि कितनी कड़वाहट भरी हुई है सोमा के मन में– जब आपको मुजरिम की भांति कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और इल्ज़ामों की एक लंबी फेहरिस्त आपके हाथों में थमा दी जाती है। वह सोमा,जो आपको मान-सम्मान देती थी; सदैव आपकी तारीफ़ करती थी; जिसने इतने वर्ष एक छत के नीचे गुज़ारने के पश्चात् भी पलट कर कभी जवाब नहीं दिया था। वह तो सदैव परमात्मा का शुक्र अदा करती थी कि उसने उन्हें पुत्रवधु नहीं,बड़ी शालीन बेटी दी थी। परंतु जब विश्वास टूटता है; रिश्ते सहसा दरक़ते हैं तो बहुत तकलीफ़ होती है। हृदय कुलबुला उठता है,जैसे अनगिनत कीड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हों और वह प्रश्नों के भंवर से चाह कर भी ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाती।

‘आपको क्या प्रॉब्लम है?’ यदि बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ एकांत में समय गुज़ारना चाहते हैं; खाने के लिए नीचे नहीं आते तो…परंतु हम सबके लिए यह बंधन क्यों? वह वर्षों से अपने कौन-से दायित्व का वहन नहीं कर रही? आपके मेहमानों के आने पर क्या वह उनकी आवभगत में वह कमी रखती है,जबकि वे कितने-कितने दिन तक यहाँ डेरा डाले रहते हैं? क्या उसने कभी आपका तिरस्कार किया है? आखिर आप लोग चाहते क्या हैं? क्या वह इस घर से चली जाए अपने बच्चों को लेकर और आपका बेटा वह सब अनचाहा करता रहे? हैरान हूं यह देखकर कि उसे दूध का धुला समझ उसके बारे में अब भी अनेक कसीदे गढ़े जाते हैं।

वह अपराधिनी-सम करबद्ध प्रार्थना करती रही थी कि उसने ग़लती की है और वह मुजरिम है,क्योंकि उसने बच्चों को खाने के लिए नीचे आने को कहा है। वह सौगंध लेती है कि  भविष्य में वह उसके बच्चों से न कोई संबंध रखेगी; न ही किसी से कोई अपेक्षा रखेगी। तुम मस्त रहो अपनी दुनिया में… तुम्हारा घर है। हमारा क्या है,चंद दिन के मेहमान हैं। वह क्षमा-याचना कर रही थी और सोमा एक पुलिस अफसर की भांति उस पर प्रश्नों की बौछार कर रही थी।

जब जिह्वा साथ नहीं देती,वाणी मूक हो जाती है तो अजस्र आंसुओं का सैलाब बह निकलता है और इंसान किंकर्त्तव्य- विमूढ़ स्थिति में कोई भी निर्णय नहीं ले पाता। उस स्थिति में उसके मन में केवल एक ही इच्छा होती है कि ‘आ! बसा लें अपना अलग आशियां… जहां स्वतंत्रता हो; मानसिक प्रदूषण न हो; ‘क्या और क्यों’ के प्रश्न उन पर न दाग़े जाएं और वे उन्मुक्त भाव से सुक़ून से अपनी ज़िंदगी बसर कर सकें। इन परिस्थितियों में इंसान सीधा आकाश से अर्श से फ़र्श पर आन पड़ता है; जब उसे मालूम होता है कि इस करिश्में की सूत्रधार हैं कामवाली बाईएं–जो बहुत चतुर, चालाक व चालबाज़ होती हैं। वे मालिक-मालकिन को बख़ूबी रिझाना जानती हैं और बच्चों को वे मीठी-मीठी बातों से खूब बहलाती हैं। परंतु घर के बुज़ुर्गों व अन्य लोगों से लट्ठमार अंदाज़ से बात करती हैं,जैसे वे मुजरिम हों। इस संदर्भ में दो प्रश्न उठते हैं मन में कि वे उन्हें घर से निकालना चाहती हैं या घर की मालकिन उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहती है? छुरी हमेशा खरबूज़े पर ही पड़ती है,चाहे किसी ओर से पड़े और बलि का बकरा भी सदैव घर के बुज़ुर्गों को ही बनना पड़ता है।

वैसे आजकल तो बाईएं ऐसे घरों में काम करने को तैयार भी नहीं होती,जहां परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य लोग भी रहते हों। परिवार की परिभाषा वे अच्छी तरह से जानती हैं… हम दो और हमारे दो,क्योंकि आजकल पति-पत्नी दोनों अक्सर नौकरी करते हैं। उनके घर से जाने के पश्चात् वे दिनभर अलग-अलग पोशाकों में सज-संवर कर स्वयं को आईने में निहारती हैं। यदि बच्चे छोटे हों, तो सोने पर सुहागा… उन्हें डाँट-डपट कर या नशीली दवा देकर सुला दिया जाता है और वे स्वतंत्र होती हैं मनचाहा करने के लिए। फिर वे क्यों चाहेंगी कि कोई कबाब में हड्डी बन कर वहां रहे और उनकी दिनचर्या में हस्तक्षेप करे? इस प्रकार उनकी आज़ादी में खलल पड़ता है। इसलिए भी वे बड़े बुज़ुर्गों से खफ़ा रहती हैं। इतना ही नहीं,वे उनसे दुर्व्यवहार भी करती हैं,जैसे मालिक नौकर के साथ करता है। जब उन्हें इससे भी उन्हें संतोष नहीं होता; वे अकारण इल्ज़ाम लगाकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर देती है और घर की मालकिन को तो हर कीमत पर उनकी दरक़ार रहती है,क्योंकि बाई के न रहने पर घर में मातम-सा पसर जाता है। उस दारुण स्थिति में घर की मालकिन भूखी शेरनी की भांति घर के बुज़ुर्गों पर झपट पड़ती है,जो अपनी अस्मत को ताक़ पर रख कर वहां रहते हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबीपन का एहसास उन्हें नासूर-सम हर पल सालता रहता है। उस घर का हर प्राणी नदी के द्वीप की भांति अपना-अपना जीवन ढोता है। वे अपने आत्मजों के साथ नदी के दो किनारों की भांति कभी मिल नहीं सकते। वे उनकी जली-कटी सहन करने को बाध्य होते हैं और सब कुछ देखकर आंखें मूँदना उनकी नियति बन जाती है। वे हर पल व्यंग्य-बाणों के प्रहार सहते हुए अपने दिन काटने को विवश होते हैं। उनकी यातना अंतहीन होती है,क्योंकि वहाँ पसरा सन्नाटा उनके अंतर्मन को झिंझोड़ता व कचोटता है। दिनभर उनसे बतियाने वाला कोई नहीं होता। वे बंद दरवाज़े व शून्य छतों को निहारते रहते हैं। बच्चे भी उन अभागों की ओर रुख नहीं करते और वे अपने माता-पिता से अधिक स्नेह नैनी व कामवाली बाई से करते हैं।

‘हाँ! प्रॉब्लम क्या है’ ये शब्द बार-बार उनके मनोमस्तिष्क पर हथौड़े की भांति का प्रहार करते हैं और वे हर पल स्वयं को अपराधी की भांति दयनीय दशा में पाते हैं। परंतु वे आजीवन इस तथ्य से अवगत नहीं हो पाते कि उन्हें किस जुर्म की सज़ा दी जा रही है? उनकी दशा तो उस नारी की भांति होती है,जिसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है; जो उसने किया ही नहीं। उन्हें तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान ही नहीं किया जाता। कई बार ‘क्यों का मतलब’ शब्द उन्हें हांट करते हैं अर्थात् बाई का ऐसा उत्तर देना…क्या कहेंगे आप? सो! उनकी मन:स्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। सो! चिंतन-मनन कीजिए कि आगामी पीढ़ी का भविष्य क्या होगा?

वैसे इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है,क्योंकि जैसा वह करता है,वही लौटकर उसके पास आता है। लोग चिंतित रहते हैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में और यह सोचकर वे हैरान-परेशान रहते हैं। आइए! यह समझने का प्रयास करें कि प्रॉब्लम क्या है और क्यों है? शायद! प्रॉब्लम आप स्वयं हैं और आपके लिए उस स्थान को त्याग देना ही उस भीषण समस्या का समाधान है। सो! मोह-ममता को त्याग कर अपनी राह पर चल दीजिए और उनके सुक़ून में ख़लल मत डालिए। ‘जीओ और जीने दो’, की अवधारणा पर विश्वास रखते हुए दूसरों को भी अमनोचैन की ज़िंदगी बसर करने का अवसर प्रदान कीजिए। उस स्थिति में आप निश्चिंत होकर जी सकेंगे और ‘क्या-क्यों’ की चिंता स्वत: समाप्त हो जाएगी। फलत: इस दिशा में न चिंता होगी; न ही चिंतन की आवश्यकता होगी।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८४ – नवगीत – नेह-डोर… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीतनेह-डोर

? रचना संसार # ८४ – गीत – नेह-डोर…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मत जाना तुम कभी छोड़ कर,

रात-दिवस मैं जगता हूँ।

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

*

प्रिये सामने जब तुम रहती,

मन पुलकित हो जाता है।

लेता है यौवन अँगडाई,

माधव फिर प्रिय आता है।।

प्रेम सुमन पल-पल खिल जाते,

भौरों-सा मैं ठगता हूँ।

*

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

**

नेह  डोर तुमसे बाँधी है,

जन्म- जन्म का बंधन है ।

साथ न छूटे अब प्रियवर भी,

प्रेम ईश का वंदन है ।।

मेरे उर में तुम बसती हो,

नाम सदा ही जपता हूँ ।

*

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

**

रूप -अनूप बड़ा मनमोहन,

तन में आग लगाता है ।

आलिंगन को तरस रहा मन,

हमें बहुत तडपाता है।।

चंचल चितवन नैन देख कर,

ठंडी आहें भरता हूँ।

*

तुम ही तुम हो इस जीवन में,

याद तुम्हें बस करता हूँ।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विभाजन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विभाजन ? ?

यथा-तथा

किंतु-परंतु

अगर-मगर

ओह-पर

फ़सादी ़ज़बान

उन्मादी माहौल

सर्वदा जन्म देते हैं

विभाजन को..,

 

रेल ढोती है लाशें

छतों पर होती हैं जच्चा

सीमाओं की जंग में

जनती हैं बच्चा..,

मुझे लगता है,

विभाजन के दंश

सबसे ज्यादा

भोगती-सोखती है औरत,

घर,परिवार, बच्चों और

बारबार अपनी देह पर..,

 

इस ओर का बीज उस ओर,

उस ओर का बीज इस ओर,

लाशों से भरी रेलों में

प्राण का संवाहक होती है औरत..!

 

औरत की कोख में दबा

यहाँ का बीज पनपता है वहाँ,

वहाँ का बीज पनपता है यहाँ..,

 

भविष्य में यही बीज

उठ खड़े होते हैं

एक-दूसरे के विरुद्ध

और अपने नये खेमे से

फूँकते हैं शंख

अपनी ही धरोहर के विरुद्ध..,

 

धरती पर खड़े कर

कँटीले तार

शासक बाँट लेता है सीमाएँ

पर माँ बच्चों को बाँट नहीं पाती..,

 

सुनो विभाजन के पक्षधरो!

गुरुत्वाकर्षण केवल

धरती में होता है

इसके अभाव में

अंतरिक्ष में पैर धरातल पर

टिक नहीं पाते,

औरत धरती होती है,

धरतीवासियो! सोचो

अगर धरती नहीं होती तो..?

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ The Rock… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ The Rock ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ The Rock… ??

I stand

a weathered rock

midstream

She flows

a fervent river

around me

They praise her grace

her shining movement

and call me impassive

unyielding, even frigid

They do not know

How once

she emptied into me

her storms

her anger

her unrest

Held to my chest

she wept uncontrollably

until her melancholy dissolved

She grew light

and flowed again

While I wilfully

absorbed her every surge

and stood silent…

In keeping her moving

something within me

kept drying…

She became

more river

I became

more stone

Now she sparkles

in full current

And still they say

Every river

needs

a rock…!

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१२ ☆ भावना के दोहे – फागुन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – फागुन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – फागुन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

आया फागुन मास अब, सुन्दर चले बयार।

हर आँगन में गूँजती, ढोलक की झंकार।।

धरा सजी है आज तो, करे लाल शृंगार।

मन में सबके उठ रहे, सुखकर प्रीति विचार।।

 *

बैर मिटेगा आज तो, रंग भरा त्यौहार।

रंग बरसता प्यार का, नेह  भरी बौछार।।

 *

गुझिया मीठी रसभरी, स्वाद लगे हर बार।

घर-घर बनती है यही, होली  प्रिय त्योहार।।

 *

श्याम संग राधा सजी, बरस रहा है प्यार।

प्रेम सुधा की धार है, आओ सब नर-नार।।

 *

भाई बहन के प्यार का, भाई दूज त्यौहार।

हर रूप में अमर रहे, भाई बहन का प्यार।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९४ ☆ मीरा पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – मीरा पर कुछ दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९४ ☆

☆ मीरा पर कुछ दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

मीरा मानक प्रेम की, जिनका पावन प्यार

लड़ती रहीं समाज से, मानी कभी न हार

*

कृष्ण प्रेम में डूब कर, लोक लाज दी छोड़

संतों के सत्संग से, आया नूतन मोड़

*

मीरा सी दीवानगी, मधुर प्रेम का राग

इस जग में दूजा नहीं, मीरा-सा अनुराग

*

स्वामी समझें कृष्ण को, मन में प्रेम अपार

मीरा सुध-बुध भूलकर, करतीं जय जयकार

*

रसिक बिहारी में रमी, करतीं नृत्य कमाल

मन मथुरा तन द्वारिका, मीरा के ये हाल

*

वृंदावन-सा है हृदय, बहे प्रेमरस धार

मनमोहन मन में बसे, यही एक शृंगार

*

मीरा ने जग की कभी, करी नहीं परवाह

साधक मोहन की बनूँ, यही एक थी चाह

*

कृष्णमयी लगता रहा, मीरा को संसार

जित देखें उत कृष्ण ही, दिखते थे हर बार

*

हे मनमोहन हमें भी, शरण लीजिए आप

मन में हो ‘संतोष’ धन, करूँ सदा ही जाप

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३५ ⇒ उधार प्रेम की कैंची है ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उधार प्रेम की कैंची है !।)

?अभी अभी # ९३५ ⇒ आलेख – उधार प्रेम की कैंची है ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

आज नक़द, कल उधार और उधार प्रेम की कैंची है, लिखने वाले दुकानदार, कितना नकद से प्रेम करते हैं, और कितना भगवान समान ग्राहक से, यह छुपा नहीं है ! मैंने हमेशा नक़द ही सौदा लिया है, लेकिन किसी दुकानदार ने प्रेम के वशीभूत हो, मुझे गले नहीं लगाया। ऐसा कई बार हुआ है कि मैं नकद पैसे लिए, सौदे के लिए खड़ा रहा, और एक बहनजी उधारी का सामान और अपने सुंदर से बच्चे के लिए मुफ़्त में एक्लेयर्स ले, रवाना हो गई और दुकानदार मेरी उपेक्षा करते हुए उधारी के सामान को डायरी में नोट करता रहा। बाबूजी ! उधारी का मामला है, बाद में भूल जाता हूँ। यानी उधार की कैंची मुझ पर, और प्रेम बहनजी के लाड़ले पर।

यूँ तो नकद का मतलब रोकड़ा ही होता है, लेकिन जब से नोटबन्दी के पश्चात कैशलेस का चक्कर चला है, सरकारी भीम और paytm, कैश काउंटर पर विराजमान हो गए हैं। न सड़े गले, फटे-टूटे नकली नोटों की चिंता, न चोर-डाकुओं का डर ! रात को कैश घर ले जाते समय का खतरा, और घर पर भी भारी भरकम नकदी रखने के खतरे से तो बचे ही, ग्राहक को भी डिस्काउंट का फ़ायदा। हुआ न एक पंथ दस काज।।

लेकिन जब कोई दोस्त या रिश्तेदार उधार माँगता है तो वह यह नहीं कहता कि भैया मेरे खाते में हज़ार-पांच सौ जमा कर देना। बाकायदा भाव-ताव होता है। पाँच हज़ार की माँग नीचे आते आते पाँच सौ तक आ जाती है और वह आप पर एक तरह से अहसान जताता हुआ, उक्त राशि स्वीकार कर ही लेता है। मुझे मालूम था, आप इससे ज़्यादा नहीं दे पाओगे। अब किसी और के आगे हाथ पसारने पड़ेंगे।

मैंने किसी बैंक में उधार प्रेम की कैंची है, जैसी तख्ती लगी नहीं देखी ! आकर्षक दरों पर ऋण लीजिये के अंतर्गत, अगर बीवी को छोड़ दिया जाए, तो घर की हर चल, अचल सम्पत्ति पर प्रेम से उधार मिल सकता है। घर से लगाकर फ्रिज, टीवी, गीज़र, फर्नीचर और मोबाइल से ऑटो-मोबाइल तक ! पत्नी चल सम्पत्ति है या अचल, यह तो अटलजी भी नहीं जान पाए।।

कैंची से कपड़े कटते हैं, पार्लर में बाल कटते हैं, जिनकी ज़बान कैंची जैसी चलती है, वे सामने वाले की बात तक काट देते हैं, लेकिन उधार एक ऐसी कैंची है जो प्रेम के रिश्ते को काटती है।

पैसा रिश्ते को जोड़ता है, फिर चाहे वह नकद का हो, या उधारी का। कहने वालों का क्या, वे तो दहेज को भी प्रेम की कैंची कहने लग गए। अंगूर खट्टे हों, तो आदर्शवाद बुरा नहीं।

मैं न उधार देता हूँ, न लेता हूँ। फिर भी माथे पर इतना कर्ज़ है कि कितने ही जन्म ले लूँ, उतार नहीं पाऊँगा। माटी का कर्ज़, माता पिता, गुरुजन, समाज, परिजन, हितैषी और सद्गुरु के ऋण से कौन उऋण हो पाया है। यह ऋण उधार नहीं, प्रेम की कैंची नहीं, प्रेम का सागर है। लेकिन हमारी मज़बूरी यही कि हमारे पास सिर्फ़ एक गागर है।

प्रेम की यह गागर कभी खाली न हो। प्रेम के रिश्तों को भुनाया नहीं जाता, और अधिक मजबूत किया जाता है। किसी पर अहसान जताया नहीं जाता, अहसान चुकाया जाता है। उस ऊपर वाले के ही इतने कर्ज़ हैं, इतने अहसान हैं, लेकिन वह कोई साहूकार नहीं, सिर्फ मेहरबान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(ई-अभिव्यक्ति में बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी का स्वागत.  गद्य एवं छंद विधा में अभिरुचि के साथ ही महिला उद्यमी। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लेख सपने बड़े देखें।)

? आलेख – सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

हम हमारे जीवन की जो अवधारणा रखते हैं, उसका हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव होता है l यदि जीवन की अवधारणा बड़ी है, तो हमारे सपने बड़े होंगे l

सोलह वर्ष की उम्र में व्यक्ति जिंदगी जीने के लिये जो सपने देखता है उन्हें पूरा करने की लिये वो जी जान लगा देता है l इसीलिये कहते भी हैं कि युवा पीढ़ी का रहन सहन, उनकी भाषा, उनके अधरों पर गाने सुनकर उस राष्ट्र का भविष्य बताया जा सकता है l जीने के लिये यदि विशाल और सृजनशील सपने देखें तो हम स्वयं का, समाज का और राष्ट्र का नक्शा बदल सकते हैं l

बाबा आमटे के अनुसार ऐसे सृजनशील व साहसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो जो अच्छी योजनाएं बनाये और उस पर काम भी करे l

चादर देखकर पैर पसारो इस कहावत को भूल कर पैर कितने पसारने हैं उसके हिसाब से चादर का निर्माण करना जरूरी है l

आज की दौर में नई राहें, नये सपने पूरे करने हेतु संघर्ष करना पड़े तो करो l बिपदाओं का सामना कर आगे बढ़ो l

अपयश अपराध नहीं बल्कि आगे जाने की सीढ़ी है l हमारा लक्ष्य बड़े सपने देखना होना चाहिए l उन सपनों को पूरा करने की जिद होनी चाहिए l उन सपनों को कैसे साकार करें इसका चिंतन होना चाहिए l

जीजा माता की प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिर्फ सोलह वर्ष की आयु में हिन्दवी स्वराजय का सपना देखा था और उसे साकार भी किया l स्वातंत्र वीर विनायक दामोदर सावरकर जी ने सोलह वर्ष की उम्र में अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करने का इतिहास लिख दिया l

कहने का तातपर्य है कि ऐसे बड़े सपने जीवन की हर क्षेत्र में देखे जाते हैं और उन्हें पूरा करने हेतु अथक प्रयास भी करने होते हैं l एक समय कि बात हैं कि एक पेट्रोल पम्प पर एक लड़का पेट्रोल भरने का काम करता था l एक दिन किसी ने उससे कहा कि पूरी जिंदगी ऐसे पेट्रोल भरता रहेगा कि कोई सपने भी देखें हैं तूने जिंदगी में?

उसने कहा पेट्रोल केमिकल क्षेत्र में मेरी मालिकी की एक बड़ी कम्पनी खोलूंगा ऐसा मेरा सपना है l वहाँ खड़े लोग उसपर हसे l इतना बड़ा सपना?

लोगों ने मजाक उड़ाया कि पहले पेट्रोल तो भर ले….

और वह सपने देखने वाला लड़का और कोई नहीं बल्कि धीरुभाई अम्बानी था जिन्होंने सिद्ध किया कि सपने बड़े देखना चाहिए और उन्हें पूरा करने शिद्द्त से जोर लगा देना चाहिए l

हम सभी अपने कार्य क्षेत्र में ऐसे बड़े सपने देख, उन्हें पूरा कर अपने जीवन को एक नया रूप नया आकार दे सकते हैं l इस बात का मुझे भी स्वानुभव है और पूरा विश्वास भी है कि बड़े सपने देखना जरूरी है और वो पूरे भी होते हैंl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – गोपी संग रास रंग… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता गोपी संग रास रंग।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – गोपी संग रास रंग…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

ओ रे कान्हा, तू कितना सयाना,

जाने कब गगरी में मेरी,

तूने केसर रंग मिलाया,

मैं तो हूं निपट अनाड़ी,

भोली भाली, सीधी सादी,

जान सकी ना, तेरी शरारत,,

तुझे अपनी और देख निहारत,

मैं शरमाई, मैं सकुचाई,

धड़कते दिल, लरजते हाथों से,

मटकी उठा, कमर से लगा, फिर सर पर चढ़ाई,,

मैं चल दी पनघट से घर की राह,

ना पा सकी, तेरे मुस्काते नैनन की थाह,,

होले से फिर कुछ तूने फेंका,,

हाये, , महकते फूल या कोई प्रेम निशानी ???

लेकिन, अरे रे रे रे,,

कंकड़ी मोहे मारी,

गागरिया फोड़ डाली,,

केसर के रंग में रंग गई,

मेरी चोली चुनर सारी…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ नाते असावे असे… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

प्राची अभय जोशी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ नाते असावे असे… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

माती आणि दगडाचे

असे आगळे वेगळे नाते

सृष्टी मात्र दोघांनाही

स्वतः सारखेच जपते.

 

पहिल्या पावसाची माती

ओला सुगंध पसरवते

दगड भिजतो तेंव्हा मात्र

त्याला लकाकी येते

 

पावसातील माती ही

अवखळपणे वाहते अन्

दगडाचे दिसून येते

एकाच जागी स्थिरावणे.

 

माती आणि दगडाचे हे

प्रतिक आहे भावनांचे

प्रत्येक वेळी विरघळताना

असे स्थिरतेने पाहणे

 

दोघांकडेही पाहताना वाटे असे सारखे,

दगडाचे फक्त पाण्यात भिजणे…

अन्

मातीचे अगदी निरागसतेने विरघळणे…

 

भिजणे आणि विरघळणे जणू

हे असे निसर्गाचे सांगणे

या मानवाचे,

एकमेकांचे असे होऊ शकते का

स्वच्छ आणि नितळ नाते ?

©  प्राची अभय जोशी

मो 9822065666 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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