English Literature – Poetry (भावानुवाद) ☆ हथेलियाँ/My Palms – सुश्री निर्देश निधि ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.)

We present an English Version of Ms. Nirdesh Nidhi’s  Classical Poem हथेलियाँ  with title  “My Palms” .  We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages) for this beautiful translation.)

आपसे अनुरोध है कि आप इस रचना को हिंदी और अंग्रेज़ी में  आत्मसात करें। इस कविता को अपने प्रबुद्ध मित्र पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से  इस कविता की मूल लेखिका सुश्री निर्देश निधि जी एवं अनुवादक कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को अवश्य अवगत कराएँ.

सुश्री निर्देश निधि

 ☆ हथेलियाँ ☆ 

मेरी हथेलियाँ थीं रीति

जैसे होता है रीता कोई कच्चा कोरा कुम्भ

 

कसते ही तुम्हारी हथेली मेरी उन रीती हथेलियों में

खो गयी थीं सब रिक्तियाँ यूँ

जैसे सुरमई बादलों में खो जाती हैं बिजलियाँ

 

भर गई थीं हथेलियों की सब रिक्तियाँ 

जैसे भर जाते हैं प्यासी धरती के सारे गड्ढे बरसात के अमृत से

 

मेरी हथेलियाँ थीं कोरी

जैसे होता है सफ़ेद कोरा मारकीन

 

कसते ही तुम्हारी हथेली मेरी हथेलियों में 

मेरी रंगरहित हथेलियों पर चढ़ गया था गुलाबी रंग

जैसे चढ़ा दे रंगरेज कोई

प्रेयसी के रंगरहित कोरे दुपट्टे पर अपनी चाहतों के बूटे 

 

बड़ा फबा था बरसों – बरस वह गुलाबी रंग

मेरी रंगरहित, रिक्त हथेलियों पर

 

आज भी मेरी हथेलियों से

कपोलों तक का सफ़र करता है निर्बाध 

तुम्हारी क्षणिक छुअन का छोड़ा वह नरम गुलाबी रंग

 

मेरी हथेलियाँ थीं गंध रहित

जैसे होता है निर्गंध फूल केसुडे का

तुम्हारी हथेली की गंध का इत्र

आज भी महकाता है मेरी निर्गंध हथेलियाँ

 

उदास थीं बहुत मेरी हथेलियाँ

जैसे उदास रहती है रात्रि भर प्रियतम के बिना चकवी

मचल उठी थी एक विरल मुस्कान उन पर

तुम्हारी हथेली आते ही मेरी हथेलियों में

 

सुनो

तबसे अब तक नदियों के बीच बह गया है अगाध जल

सुबह दोपहर साँझ को लाद – लाद अपनी पीठ पर

सूरज लगा चुका है अनगिन चक्कर

अब रिसने लगा है अमृत पल – पल

रीतने लगी हैं हथेलियाँ फिर

कुछ – कुछ हल्का पड़ने लगा है

मेरी हथेलियों पर छपा गुलाबी रंग

 

अब कुछ कम महकता है तुम्हारा इत्र मेरी हथेलियों में

और उनकी मुस्कान चाहती है पुनर्जीवन

 

© निर्देश निधि

संपर्क – निर्देश निधि , द्वारा – डॉ प्रमोद निधि , विद्या भवन , कचहरी रोड , बुलंदशहर , (उप्र) पिन – 203001

ईमेल – nirdesh.nidhi@gmail.com

 

☆ My Palms☆

My palms were empty like

a raw hollow earthen pot…

As soon as your palms clasped my palms

All the emptiness vanished

Just as the lightning gets lost in the dark clouds…

 

All the gaps of the palms

were filled like all the pits-n-ponds of the

thirsty earth get

filled with the nectarly

water of the rain…

 

My palms were blank

As blank as a

spotless white paper

But, my colourless palms

tightly clasped in your

palms turned pink

like someone dyed

the choicest dupatta

of his beloved

with the rainbow

hues of the wishes…

 

It was a perfectly matched

pink colour after ages,

on my spotless, empty palms…

 

Even now, my palms

Sneak past my cheeks

repeatedly, ceaselessly

making them blush with the

soft pink colour left

by your momentary but brief touch…

 

My palms were odourless

like Kesuda flower

Even today fragrance of

your palms makes my palms

enchantingly fragrant…

 

My palms were so

full of gloom

like a Chakva,*

the bird of solitude,

remained sad

without the company

of her beloved…

But, they got

enlivened with the

ever joyful smile

Soon as your palms came into my palms…

 

Listen!

Since then,

a lot of water has flowed

under the bridge

Sun has done  countless

rounds around the earth,

carrying the morning-noon -evening  on its back…

The elixir is draining

out  drip  by  drip

moment by moment

Palms have started

getting empty again

Even, your pink colour

imprint etched on palms

has started to fade…

Now, your fragrance has

subdued  in my palms

As, they are losing their

smile and ebullience

They desperately need

a refill to revive again as

they long for your heavenly

touch with all its warmth..!

 

*Kesuda flower

Butea monosperma, the jungle fire flower, which brightly red but bereft of any fragrance…

*Chakva bird

A waterfowl famous for being separated from its pair at night…

*Dupatta

A long piece of cloth worn around the head, neck, and shoulders by women

 

© Captain (IN) Pravin Raghuanshi, NM (Retd),

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ अमरकंटक का भिक्षुक -3 ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

 श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है। आज से हम एक नई  संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं।  इस श्रृंखला में श्री अरुण कुमार डनायक जी ने अपनी सामाजिक सेवा यात्रा को संस्मरणात्मक आलेख के रूप में लिपिबद्ध किया है। हम  आपके इस संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला को अपने पाठकों से साझा करने हेतु श्री डनायक जी के ह्रदय  से आभारी  हैं।  इस कड़ी में प्रस्तुत है  – “अमरकंटक का भिक्षुक – भाग 3”। )

☆ संस्मरण ☆ अमरकंटक का भिक्षुक -3 ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆ 

जब हम इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय से वापस आये तो पता चला कि बिलासपुर से अरुण कुमार चटर्जी, प्रोफ़ेसर डा. अमित कुमार पांडे अपनी टीम के साथ आये हुए हैं। आपस में परिचय की औपचारिकता के बाद हम सभी डाक्टर सरकार को घेर कर बैठ गए और सबने एक सुर में आदिवासियों के भगवान्  ‘बाबूजी’ से उनकी दास्तान  सुनने की इच्छा व्यक्त की। ‘बाबूजी’ भी आसानी से तैयार नहीं होते हैं, अपनी वाहवाही करवाने में उन्हें कोई आनन्द नहीं मिलता। ‘बाबूजी’ कुछ बताएं इस उद्देश्य से अरुण कुमार चटर्जी ने विवेकानंद युवा समूह के अनुभव सुनाना शुरू किया। वे बिलासपुर में रेलवे में कार्यरत हैं और वहाँ से पुराने कम्बल व साड़ियाँ एकत्रित कर ‘बाबूजी’ के साथ गर्जनबीजा गाँव वितरण करने के लिए गए। काफी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब महिलाएं वितरण स्थल पर नहीं पहुँची तो दुःख व क्रोध से चटर्जी बाबू झल्ला उठे। एक आदिवासी बुजुर्ग  ने डरते-डरते वस्तुस्थिति बताई कि महिलाएं ऐसे अवसरों पर सजधज कर आती है, इसीलिए वे पास में बहने वाले नाले में स्नान करने गई हैं और जबतक उनकी एकमात्र साड़ी सूख नहीं  जाएगी तबतक  वे उसे पहन नहीं पाएंगी। चटर्जी बाबू ने आश्चर्यचकित होकर आदिवासी की ओर निहारा ! उन्हें उसकी बात पर विश्वास ही न हुआ।  विवश हो आदिवासी भाई, उन्हें इस शर्त पर कि फोटो वगैरह नहीं लेना, उस नाले की ओर ले गए जहाँ नग्नावस्था महिलाएं उकडू बैठी अपनी अपनी साड़ी के सूखने का इंतज़ार कर रही थी। इस घटना ने  रामकृष्ण परमहंस के भक्त चटर्जी बाबू को द्रवित कर दिया था, अब वे हर साल आश्रम में सेवा कार्य करते हैं और कोरोना संक्रमण के दौरान तो उन्होंने लगभग सौ किवंटल चावल व दाल बिलासपुर से संग्रहित कर वितरित करवाई। ‘लेकिन दाल-चावल वितरण करने के पहले ‘बाबूजी’ ने उसे चखा और जब गुणवत्ता सही पाई तभी वितरण का आदेश दिया’ ऐसा कहते हुए चटर्जी बाबू ने डाक्टर सरकार की तरफ मुस्कुराते हुए तिरछी निगाहों से  देखा और स्त्रियों की विपन्नता की चर्चा से उत्पन्न दैन्य भाव से वे मुक्त हुए। यह दारिद्रय और विपन्नता का दुःख तो महात्मा गांधी ने भी चम्पारण में अनुभव किया था और उसके बाद अपनी काठियावाड़ी पगड़ी त्याग दी थी। आज चटर्जी दादा भी गांधीजी जैसा त्यागी जीवन जी रहे हैं।

अब तक ‘बाबूजी’ का  भी मन अपनी कहानी सुनाने का हो चला था और वे लगभग पच्चीस वर्ष पीछे की दुनिया में खो गए थे। जैसी की उनकी आदत है अपनी बात उन्होंने स्वामी विवेकानंद के इस प्रेरणादायक  उपदेश से शुरू की ‘समग्र जगत यदि तलवार लेकर आपके विरुद्ध खडा हो, समस्त आत्मीय सज्जन, मित्र व रिश्तेदार आपका साथ छोड़ दें, तब भी आप अपने आदर्श के प्रति अटल रहें, तभी आप समाज के लिए कुछ कर सकते हैं।’

डाक्टर सरकार ने बताया कि  होम्योपैथी में डिग्री हासिल करने के बाद उनका मन घर गृहस्ती की अपेक्षा  साधु संतो के बीच अधिक बीतता था और वे बैलूर मठ जाते रहते थे। इसी दौरान वे एक बार  भारत भ्रमण पर भी निकल गए। कभी भूखे रहे और कभी बिना टिकिट यात्रा भी की,उसकी तो अलग कहानी है।  और जब आम भारतीय पिता की भाँति उनके पिताजी ने भी प्रबीर को सही राह पर लाने के लिए उसके विवाह का निर्णय लिया तो माँ ने अपने पुत्र के स्वभाव को जानते हुए पिताजी को समझाया कि ‘इसका विवाह कर क्यों किसी लडकी का जीवन बरबाद करते हो। इसे अपने रास्ते पर चलने दो, यह समाज की सेवा करने ही पैदा हुआ है। किसी साधू  ने उन्हें नर्मदा के उद्गम और उसकी महिमा का ज्ञान दिया और वे 1995 में वे अमरकंटक आ गए। शुरू में तो लोगो के बड़े विरोध का सामना करना पडा। कोई कहता बंगाली बाबा है काला जादू कर देगा, तो कोई कहता कि आदिवासियों की लडकियाँ कलकत्ता में ले जाकर बेच देगा। यदा-कदा तो शारीरिक हमले की नौबत भी बनती पर गुलाब सिंह आदिवासी और उसके दो तीन मित्रों ने बहुत सहयोग किया और धीरे-धीरे लोगों का विश्वास बढ़ता चला गया।

गुलाब सिंह आदिवासी ने 1997 में  दो एकड़ जमीन दान में दे तो दी परन्तु आदिवासी की जमीन होने से आश्रम के नाम स्थानांतरण असंभव था। इसीलिये उसी वर्ष जमीन को शासन के नाम दान पत्र बनवाकर आश्रम को लीज पर देने का तरीका सुझाया गया। तदनुसार कार्यवाही तो शुरू हो गई पर लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के चलते फ़ाइल भोपाल में आगे खिसकती ही न थी। इस सम्बन्ध में डाक्टर सरकार के अनेक सहृदयी आईएएस अधिकारियों से प्रगाड़ परिचय तो हुआ पर लाल फीता काटे नहीं कटता था। मातहत अधिकारी अपने बड़े साहब की बात सुनते और करते कुछ नहीं। फिर सरकारी विभागों में काम न करने पर कोई दंड भी तो नहीं दिया जा सकता था। इधर डाक्टर सरकार भी अजीब जिद्द पाले बैठे थे कि ‘ काम करवाने घूंस तो देंगें नहीं चाहे कितनी एडियाँ घिसनी पड़े, अमरकंटक से भोपाल के कितने भी चक्कर लगाने पड़े।’ अंततः श्री पंकज  अग्रवाल और सुश्री दीपाली रस्तोगी सरीखे सहृदयी वरिष्ठ  आईएएस अधिकारियों की बल्लभ भवन में पदस्थापना ने कार्य को आसान किया और 03.03.2020 को शासन ने गजट सूचना द्वारा इस भूमि को आश्रम को लीज पर देना मंजूर कर दिया। लेकिन अभी भी दिल्ली दूर थी, स्थानीय प्रशासन के कर्मी काम के बदले घूंस मांगते अन्यथा  लम्बी चौड़ी पेनाल्टी की धमकी देते। डाक्टर सरकार, कलेक्टर साहब से मिले, अपनी व्यथा सुनाई  और फिर क्या था कलेक्टर चन्द्र मोहन ठाकुर साहब की एक फटकार ने उन कर्मियों को नियमानुसार फ़ाइल पर टीप लिखने विवश कर दिया।  इस प्रकार 30.06.2020 को दो एकड़ जमीन का टुकड़ा आश्रम को शासन ने 30 वर्षों की लीज पर दे दिया। इसका लाभ यह होगा कि कार्पोरेट सामाजिक दायित्व के अंतर्गत अब आश्रम को आसानी से अधोसंरचना विकसित करने हेतु धन मिलता रहेगा। डाक्टर सरकार के प्रति और आश्रम की बालिकाओं के प्रति श्री चन्द्र मोहन ठाकुर साहब का प्रेम इतना अधिक है कि वे अक्सर इन छात्राओं के साथ समय बिताने पौंडकी आ जाते हैं और फुटबाल खेलते हैं।

डाक्टर सरकार का तो मुसीबतों से रिश्ता-नाता है। 2003 तक आश्रम को शासन से अनुदान मिलता था। एक दिन अचानक उसे बंद करने का फरमान मिला।’ बैगा पुत्रियों के ‘बाबूजी’ परेशान कि इन्हें खिलाएंगे कैसे !  लिखा पढी शुरू हुई, अंग्रेजी में पिलर टू पोस्ट दौड-भाग हुई, पर नतीजा सिफर। चपरासी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से भी की गई गुहार बेनतीजा हुई, हर बार घिसापिटा  जवाब मिलता कि ‘आपकी शिकायत सम्बंधित विभाग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज दी गई है।’ दुखी होकर  डाक्टर सरकार ने  ठाकुर (राम कृष्ण परमहंस) और माँ (सारदा देवी ) से गुहार लगाईं। माँ ने उनकी आर्त पुकार सुनी और  उपाय भी  सुझाया। सुबह चार बजे ‘बाबूजी’ ने अपनी बेटियों को बुलाकर माँ का आदेश सुनाया। छात्राओं ने अपनी दर्द भरी दास्तान राष्ट्रपति को लिखकर  भेजी।  भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ए पी जे अबुल कलाम ने मामले की गंभीरता को समझा और उनकी सहृदयता लालफीताशाही पर भारी पडी। राष्ट्रपति भवन ने  पत्राचार शुरू किया और अनुस्मारक  भी भेजे। अचानक एक दिन जिला मुख्यालय से पूरा सरकारी अमला आश्रम आ पहुंचा, जांच पड़ताल हुई, छात्राओं ने बेहिचक और बेधडक होकर अपनी आपबीती सुनाई, आत्मदाह करने की धमकी देने की बात भी स्वीकारी। और तत्कालीन जिलाधीश ने उसी पल लंबित अनुदान को जारी करने का फरमान जारी किया। अनुदान मिला और आश्रम में भोजन व्यवस्था सुचारू रूप से पुन: चलने लगी।

इस साल भी कोरोना संक्रमण के चलते शासन से मिलने वाला अनुदान लंबित है। और ऐसे में स्थानीय व्यापारी गौरेल्ला के राजा ट्रेडर्स, ने राशन व राकेश ठाकुर ने सब्जी उधार देना शुरू कर दिया। राजा ट्रेडर्स तो डाक्टर सरकार की सेवा भावना के इतने कायल हैं कि वे कहते हैं ‘बाबूजी रुपया आ जाए तो दे देना, नहीं तो मैं समझुंगा बैगाओं का कर्ज मुझपर था जो मैंने आपके माध्यम से इन बच्चियों को खिलाकर उतार दिया।’ श्री विनोद केडिया किराना व्यापारी हैं 70% राशन मुफ्त में दे रहें हैं तो श्री धर्म प्रकाश अग्रवाल सब्जियां हर सप्ताह पेंड्रा से यहाँ भिजवाते हैं। ऐसे असंख्य मददगार हैं जो ‘बाबूजी’ की सेवा वृति से प्रभावित हैं और मदद करने को आगे आते हैं।

‘बाबूजी’  ने आयकर की धारा 80 जी में छूट लेने हेतु आयकर कार्यालय, जबलपुर में अर्जी लगाईं ताकि दानदाताओं को दान की गई राशि पर आयकर छूट का लाभ मिल सके। भ्रष्टाचार कहाँ नहीं है! आयकर निरीक्षक बिना मुद्रा दर्शन के फ़ाइल आगे नहीं बढ़ने दे रहा था। डाक्टर सरकार फिर ठाकुर की शरण में पहुँच गए। ठाकुर की कृपा ऐसी हुई कि स्वामी विवेकानंद के भक्त  एक बंगाली सज्जन से मुलाक़ात हो गई। उन्होंने आवेदन व कागजात  को आयकर आयुक्त श्रीमती हर्षवर्धनी बुटी के समक्ष प्रस्तुत करवाया और फिर उसी दिन आदेश जारी करवाकर डाक्टर सरकार को होटल जाकर खुशखबरी दी।

हमारे ‘अमरकंटक के भिक्षुक’ इतने सरल भी नहीं है। वे अमरकंटक के किसी भी अधिकारी के पास, चाहे वह उपजिलाधीश हो या  थानेदार,  पहुँच जाते है और अपनी फरमाइश सुना देते हैं, आज दस किलो नमक दे दें, या आश्रम में दाल खतम हो रही है एक किवंटल भिजवा दें, हल्दी और मसाला भी नहीं है, चावल अच्छी क्वालिटी का भिजवाना, लड़कियों को नहाने के लिए शैम्पू और साबुन चाहिए आदि। उनकी ऐसी मांगों से परेशान अधिकारियों ने कलेक्टर साहब को शिकायत कर दी। कलेक्टर साहब भी मुस्कुराए और बोले ‘अरे भाई डाक्टर बाबू की बात मैं भी नहीं टाल सकता, वे जो चाहते हैं वैसा कर दो और पुण्य कमाओं।’

इस बाबू मोशाय के किस्से तो अनगिनत हैं, ‘हरी अनंत हरी कथा अनंता’। इस सरल हृदय, करुणानिधान से जब मैं दूसरी बार मिला और तीन दिन उनके सानिध्य में बिताए तो मुझे वही खुशी मिली जो असंख्य स्वाधीनता सेनानियों को गांधीजी से मिलकर हुई थी या नरेन्द्र को रामकृष्ण परमहंस से मिलकर हुई थी। ‘बाबूजी’ मुझे इंसान बनाने के लिए आपको दंडवत प्रणाम।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दीपावली विशेष – व्यंग्य कविता – एक दीये ही हैं ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

श्री घनश्याम अग्रवाल

(श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है उनकी  दीपावली पर्व पर  विशेष व्यंग्य कविता एक दीये ही हैं )

दीपावली विशेष – व्यंग्य कविता – एक दीये ही हैं

 एक दीये ही हैं

जो

रात में जलते हैं,

वरना

जलने वाले तो

दिन – रात जलते हैं । ”

 

आप पहली किस्म के हैं

आपको

सलाम करता हूँ,

दीवाली की अपनी शाम

आपके नाम करता हूँ ।

 

मेरा क्या  ?

मुझे जब भी

रोशनी को जरूरत होती

आपको याद कर

रोशन हो जाता हूँ,

जब मूड आये

दीवाली मनाता हूँ ।

(इससे इम्युनिटी बढ़ती सो अलग ! )

 

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

094228 60199

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दीपावली विशेष – दीपावली ☆ सुश्री हरप्रीत कौर

सुश्री हरप्रीत कौर

(आज प्रस्तुत है  सुश्री हरप्रीत कौर जी  की एक समसामयिक भावप्रवण कविता  “दीपावली”।)   

☆ दीपावली विशेष – दीपावली  

जगमग दीपों से करते

अमावस्या की काली रात्रि

में उजियारा.

हो सबके जीवन में प्रकाश

है ईश्वर से यही प्रार्थना.

हर लो मेरे मन का तम भी

भगवन्,

दूर करो अज्ञान रूपी अंधेरे को,

परोपकार और करुणा के

दीप से प्रज्ज्वलित करो उर को.

श्रेष्ठ अपना जग को दे जाए

आओ,

इस दीपावली को

अहंकार को तिलांजलि दे

नवजीवन की ज्योति जलाए.

 

©  सुश्री हरप्रीत कौर

ई मेल preetisukh78@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature ☆ Stories ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 15 – Varunai ☆ Mr. Ashish Kumar

Mr Ashish Kumar

(It is difficult to comment about young author Mr Ashish Kumar and his mythological/spiritual writing.  He has well researched Hindu Philosophy, Science and quest of success beyond the material realms. I am really mesmerized.  I am sure you will be also amazed.  We are pleased to begin a series on excerpts from his well acclaimed book  “Samudramanthanam” .  According to Mr Ashish  “Samudramanthanam is less explained and explored till date. I have tried to give broad way of this one of the most important chapter of Hindu mythology. I have read many scriptures and take references from many temples and folk stories, to present the all possible aspects of portrait of Samudramanthanam.”  Now our distinguished readers will be able to read this series on every Saturday.)    

Amazon Link – Samudramanthanam 

☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 15 – Varunai ☆ 

It is bright morning of Kartik month Kirshna paksha fourth Tithi means day of Karva Chautha. Gentle breeze was blowing over ‘Kshirasāgara’ and churning was going on. Asuras were again doing it with hope that gems which will now emerge surely deserve them because till now they have got nothing.

Slowly smell of that place started to tuning passionate than charming. With each passing time Suras and Asuras started vacillating here and there. Then started dancing. They have lost their grip over Naga Vasuki body, from which his body fell over ocean liquid with sound of Chappak, splash. All Suras and Asuras got wet from this sudden splash of ‘Kshirasāgara’ liquid.

They all were dancing when saw a beautiful damsel emerge from ‘Kshirasāgara’. She was looking so pretty. Her body color was dark transparent brown. She has smiling face. Her ornaments were of white and light color. She has light green color hairs long enough and having yellowish eyes. Intoxication was flowing from her eyes. All Devtas and Danvas means Sura and Asura were losing their senses after seeing this beauty.

King of Asura ‘Bali’ ask from that beautiful lady, “O! divine beauty who are you? Are you incarnation of Goddess Gauri or Kali? or essence of this ‘Kshirasāgara’. We all Sura and Asura losing our sense after seeing your beauty. Please give us your identity”

That beautiful lady start saying, “King of Asura and all of you I am the goddess of toxin. My name is ‘Sura’ because I am the essence of Sura or demigods to whom you are doing this churning of ‘Kshirasāgara’. Actually, I am root of Suras desires and their ego which make them arrogant. Due to which they started thinking that all the affairs are run by them and not by Lord Vishnu. I am goddess of all the liquids who makes people lose their senses. I am in wine and all types of alcohol. Do you know the meaning of name of ‘Indira’? it means one whose Indriyas, senses are always engaging outer world towards different subjects. I am responsible to make Soma, the favorite drink of ‘Indira’ toxify which makes loose of control of ‘Indira’ over his senses. From many years you all are doing this churning of ‘Kshirasāgara’ because of it all your desires which is actually most toxin in this world come into liquid of ocean and I was born out of it. I have basic incarnation of Goddess Kali. Because I was born from the properties of Sura so got name ‘Sura’ means opposite of Asura”

King of Asura Bali said, “O! goddess you are born from the toxins of Suras or Devtas so you must be need to come at our side”

Goddess Sura said, “Great Bali, Asuras are all having dominating tamas Guna or property of nature. And toxin is also of tamas quality so if I’ll come your side then it will increase your negativity and restlessness”

Lord Brahma said, “I think best companion for Goddess ‘Sura’ is Devta of salty water Varuna. What you all have to say?”

Before Indira the custody of whole water of universe including sweet and rain water was in the hand of ‘Varuna’ and also at that time the king of heaven was ‘Varuna’, but Indira has done some trick to make Lord Brahma believe that Indira will be better king of Devtas than ‘Varuna’ so the kingdom of heaven as well as rights of Rain and sweet water was given to ‘Indira’. from that day ‘Varuna’ like to enjoy company of Asura more than Sura.

So, Bali said to Brahma, “you are right. I think Varuna will be good husband for goddess ‘Sura’”

Then ‘Varuna’ accepted goddess of toxins, wine and all types of alcohols ‘Sura’ as his wife.

Brahma said, “from today’s onward Goddess Sura will be called ‘Varunai’.

Asura are still sad and little angry because till date they haven’t got anything out of churning of ocean ‘Kshirasāgara’.

© Ashish Kumar

New Delhi

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पणती…☆ प्रा. सौ. सुमती पवार

प्रा. सौ. सुमती पवार

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पणती…☆ प्रा. सौ. सुमती पवार ☆ 

घ्या , घ्या हो ,घ्या

पणत्या माझ्या घ्या ना

जरा वय ही माझे पहा ना …

 

घर माझे हो

आहे झोपडी साधी

झोपण्यास नाही गादी ….

वय झाले हो

तरी नशिबी काम

ठेविल जसा तो राम..

 

तुम्ही घ्या पणत्या

नातू घरी हो माझा

पाहतो वाट तो राजा..

 

मिळता पैसे

नेईन ज्वारी थोडी

भाकरीत आहे गोडी..

 

मी कष्टाची

पहा भाकरी खाते

कष्टांशी माझे नाते ..

 

या पैशांनी

थोडे आणिन तेल

अंगणी दिवा लाविन…

 

पसरत नाही

हात कुणा ही पुढती

ही आहे माझी नीति …

 

तुमच्याच मुळे

दोन घास पोटात

लेकरांच्याही ओठात..

 

आम्ही गरिबांची

तुम्हा मुळे हो दिवाळी

गरिबी ही लिहिली भाळी..

 

नका जाऊ पुढे

टाकून म्हातारीला

ही सारी प्रभुची लीला…

 

नाही दोष

पहा नशिबाला देत

कष्टण्या दिले हो हात…

 

जो वरी श्वास

देईल तोच हो काम

बोला राम राम नि राम …

 

© प्रा.सौ.सुमती पवार ,नाशिक

दि: ८/११/२०२० वेळ : रात्री १२:२६

(९७६३६०५६४२)

svpawar6249@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 59 – सण…! ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #50 ☆ 

☆ सण…! ☆ 

सण प्रेमाचा सोहळा

सण प्रेमाचा ओलावा

सण सुखांची आरास

सण मांगल्याचं गाणं…!

 

सण विचारांचे कोंदण

सण परंपरेचे आंदण

सण साखरेचा गोडवा

सण आप्तांचा सोहळा….!

 

सण प्रकाशाची वाट

सण आनंदी पहाट

सण सुगंधी उधळण

सण सर्वांची आठवण….!

 

© सुजित कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ बोध कथा – क्रोधाचा परिणाम ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी

☆ जीवनरंग ☆ बोध कथा – गर्वहरण ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी ☆ 

||कथासरिता||

(मूळ –‘कथाशतकम्’  संस्कृत कथासंग्रह)

? बोध कथा?

कथा ६. क्रोधाचा परिणाम

कोण्या एका गावात ‘नरेश’ नावाचा एक माणूस रहात होता. त्याने एक माकड व एक बोकड यांचे प्रयत्नपूर्वक पालन केले होते.एकदा त्याला महत्त्वाच्या कामासाठी दुसऱ्या गावी जायचे होते. माकडाला व बोकडाला कुठे ठेवावे हा त्याला मोठा प्रश्नच पडला. शेवटी नरेशने त्या दोघांना आपल्या बरोबर न्यायचे ठरवले.

नरेशने शिदोरी म्हणून बरोबर दहीभात घेतला. तिघेजण मार्गक्रमण करू लागले. चालता चालता थकल्याने नरेशने एका वृक्षाखाली विश्रांती घेण्याचे ठरवले. माकडाला व बोकडाला त्याच वृक्षाखाली बांधून व त्यांच्याजवळच शिदोरी ठेवून तो पाणी आणायला निघाला.

नरेश गेल्यावर माकडाने सगळा दहीभात खाऊन टाकला. हाताला लागलेले दही बोकडाच्या तोंडाला फासले व आपण त्या गावचेच नाही असे भासवीत दुसरीकडे जाऊन बसले. इकडे नरेश जेव्हा पाणी घेऊन परतला, तेव्हा तो भुकेने व्याकूळ झाला होता. त्याने खाण्यासाठी शिदोरी उघडली आणि पाहतो तर काय! शिदोरीत अन्नाचा कणही उरलेला नव्हता. फक्त बोकडाच्या तोंडाला चिकटलेले दही त्याला दिसले.

‘मी माझ्यासाठी आणलेले सर्व अन्न ह्याने खाल्ले’ ह्या विचाराने नरेशच्या रागाचा पारा चढला, व रागाच्या भरात त्याने निष्पाप बोकडाला मारले.

तात्पर्य – खरोखरच क्रोध माणसाला अविवेकी बनवतो. न्याय-अन्यायाचे भान त्याला रहात नाही.

अनुवाद – © अरुंधती अजित कुळकर्णी

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ नरकचतुर्दशी ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

☆ विविधा ☆ धनत्रयोदिशी ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे  ☆ 

? दिन दिन दिवाळी—३ ?

!! नरकचतुर्दशी !!

आज ‘नरक चतुर्दशी’.  आजची पहाट रांगोळ्यांनी सजलेली, दिव्यांनी उजळलेली मंगल-प्रसन्न पहाट असते. आज पहाटेचे अभंगस्नान, यमाचे तर्पण, नरकभय निवारणासाठी दिवा लावणे, देवदर्शन, फराळाचा आस्वाद, रात्री दिव्यांची आरास असा दिवसाचा दिनक्रम असतो.

स्वर्ग आणि नरक या संकल्पना बहुतेक सगळीकडेच रूढ आहेत. आयुष्यात चांगली कृत्ये केल्यास मृत्युनंतर स्वर्ग मिळतो आणि वाईट कृत्यांमुळे नरकात जावे लागते अशी समजूत आहे. या नरकाचे सर्वांनाच भय असते. तेव्हा या नरकभयापासून मुक्त होण्यासाठी आजच्या दिवशी एक दिवा लावावा आणि संध्याकाळी घर, मंदिर, मठ या ठिकाणी दिव्यांची आरास करावी असे सांगितले आहे.

आजच्या दिवशी श्रीकृष्णाने नरकासूराचा वध केला. नरकासूर प्रागज्योतिष्पूर नगरीचा राजा होता. आपल्या असूरी शक्तीने तो देव आणि मानव सर्वांना त्रास देत असे. त्याने सोळासहस्र राजकन्यांना पळवून आणून आपल्या कैदेत ठेवले.  त्यांच्या सुटकेसाठी भगवान श्रीकृष्णाने युद्ध करून त्याला ठार मारले.  त्या आनंदाप्रीत्यर्थ लोकांनी उत्सव साजरा केला. दिवे लावून अंधाराला, संकटाला, भीतीला दूर पळवले.

मरताना नरकासुराने श्रीकृष्णाकडे वर मागितला. आजच्या तिथीला जो मंगलस्नान करेल त्याला नरकाची पीडा होऊ नये. श्रीकृष्णाने तसा वर दिला. म्हणूनच आज पहाटेच्यावेळी अभ्यंगस्नान करतात. आसूरी शक्तींचा, आसूरी महत्त्वाकांक्षेचा शेवटी नाशच होतो असा संदेश ही कथा देते. म्हणून प्रत्येकाने या दिवशी चांगले वागणे, चांगल्याची साथ देणे असा संकल्प केला पाहिजे.

स्त्री उध्दाराच्या या कामासाठी सत्यभामेने पुढाकार घेतलेला होता. नरकासूराच्या बंदीवासात राहिल्याने या राजकन्यांना कलंकित मानले जाऊ नये, त्यांचे सामाजिक स्थान हीन होऊ नये म्हणून श्रीकृष्णाने त्या सर्व राजकन्यांशी विवाह केला अशीही कथा आहे.

स्त्रियांवरील अत्याचाराच्या बातम्या सतत ऐकायला मिळतात. त्यांना आळा कसा घालायचा हा खरा प्रश्न आहे.  यासाठी कोणी श्रीकृष्ण धावून येईल असा चमत्कार होणार नाही. त्यासाठी सर्वांनीच आपल्या मनात श्रीकृष्णाचे विचार जागृत करून स्त्री शक्तीचे रक्षण केले पाहिजे. यामधे स्त्रियांनी सुद्धा सहभागी व्हायला हवे. आपले रक्षण आपणच करण्यासाठी आवश्यक गोष्टी लहानपणापासून शिकायला हव्यात. मन कणखर बनून अंगी धिटाई येईल.  मुली स्वयंपूर्ण बनतील.  त्याचबरोबर मुलांना लहानपणापासून स्त्रीचा आदर करायचा, स्त्री-पुरुष दोघेही समान आहेत, कोणत्याही प्रसंगात त्रास द्यायचा नाही असेच संस्कार द्यायला हवेत. त्यामुळे मुला-मुलींची मानसिकता विवेकी, सुदृढ व निकोप बनून ते मोठेपणी सुजाण, जबाबदार नागरिक बनतील.

प्रत्येकाने आपल्या मनातल्या परमेश्वराचे स्मरण ठेवले ; तर हातून वाईट कृत्य घडणारच नाहीत. जीवनाला नरक बनवणाऱ्या अस्वच्छता, आळस, प्रमाद, वासनांधता, व्यसनाधीनता या गोष्टी नरकासूरच आहेत. त्यांना आज नष्ट करायचे. वाईटातून चांगल्याची, अंधारातून उजेडाची वाट धरायची. तेव्हा चांगल्याचे रक्षण व्हावे,  नाती जास्त जवळ यावीत यासाठी एकत्रितपणे पण नियम पाळत,  सामाजिक भान राखत श्रध्देने,  आनंदाने हा सण साजरा करू या.

शुभ दीपावली.  ?

© सौ. ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ बदलती दिवाळी ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ विविधा ☆ बदलती दिवाळी ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆      

दिवाळीची चाहूल तर  लागली! मनात असंख्य दिव्यांची आरास तयार झाली! आठवणींच्या पणत्या  तेल,वात  घालून प्रज्वलित होऊ लागल्या!या पणत्यांच्या ज्योतींनी मन उजळून निघाले. त्याचा प्रकाश मनभर पसरला!  पुन्हा पुन्हा आठवू लागल्या त्या सोनसळी दिवाळ्या!

आमच्या लहानपणी आत्ता सारखा लखलखाट नसला तरी मांगल्याने, पवित्र्याने भारलेली दिवाळी असे. पहाटेच्या वेळी मंदिरात काकड आरतीचे प्रसन्न वातावरण अनुभवता येई! कोजागिरी पौर्णिमा  आली की दिवाळी जवळ आल्याची जाणीव होत असे. पहाटेचा गारवा सुखद वाटत असे. घराघरातून स्वच्छता होऊन नवरात्र पार पडले की बायका दिवाळीच्या तयारीला लागायच्या!

डबे घासणे, अनारसा पीठ तयार करणे, चकली कडबोळी ची भाजणी भाजणे ही कामे सुरू होत असत! दिवाळीची खरेदी फार मोठी नसे. तरीही खिशाच्या परवानगीनुसार प्रत्येकी एखादा तरी नवीन कपडा आणि थोडे फटाके आणले जात. कधीकधी घरासाठी म्हणून काही खरेदी असे! दिवाळीची वाट पाहिली जायची ती मुख्यतः फराळासाठी! लाडू, चिवडा, शंकरपाळी, चकली,  करंजी सगळे कसे आतुरतेने वाट पाहत असायचे!

दिवाळी अगदी उद्यावर आली की पहिला फटाका कोण, किती वाजता वाजवणार याची चुरस असे. फटाके अंगणात उन्हात टाकलेले असत. कारण जेवढे सुके असतील तितके ते जोरात वाजत! दरवर्षी वेगवेगळ्या प्रकारचे आकाश कंदील बहुदा घरीच बनवले जात. अंगणाच्या कोपर्‍यात मुलांची दगड, माती गोळा करून किल्ला करायची गडबड असे.त्यावर शिवाजी महाराज आणि मावळे कसे लावायचे यावर जोरदार चर्चा होत असे. सगळं वातावरण कसं चैतन्याने भारलेले असे. नवलाईने आणलेले सुगंधी तेल, उटणे, साबण यांचे वास दरवळत असायचे. अशी ही दिवाळी आम्ही आमच्या लहानपणी अनुभवली!

आमच्या मुलांनाही अशीच दिवाळी अनुभवायला मिळाली!

पण गेल्या पंधरा वीस वर्षात दिवाळीचे स्वरूप थोडे बदलले आहे असे म्हणायला हरकत नाही. घरी फराळाचे पदार्थ करणे कमी झाले. त्यामुळे फराळाची ताटं शेजारी देण्याची पद्धत कमी झाली. त्याच बरोबर काही चांगले बदल आता झाले आहेत. दिवाळी निमित्ताने काही सेवाभावी संस्था सुवासिक तेल, साबण, फराळाचे पदार्थ ,मुलांसाठी खाऊ, फटाके अशा गोष्टींचे वाटप करतात. अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम अशा ठिकाणी फराळ देणे, कपडे देणे यासारख्या गोष्टी केल्या जातात. दिवाळी पहाट गाण्यांचे कार्यक्रम आयोजित केले जातात. तसेच घरी दिवाळी न करता ट्रीपला जाणाऱ्यांचे प्रमाण वाढले आहे. दिवाळी अंकांची मेजवानी या सुट्टीत अनुभवयाला मिळत असते. एकूण काय तर दिवाळीचे स्वरूप बदलले असले तरी दिवाळी आनंदमय  आहे! रूटीन मध्ये बदल म्हणून आपण दिवाळीचा आनंद घेतो. दिव्यांच्या माळा आणि लायटिंग यामुळे  पणत्यांची शोभा कमी झाली असली तरी अजूनही तुळशी वृंदावना पुढे पणती लावणारी एक पिढी शिल्लक आहे, ती या बाहेरच्या झगमगाटापासून लांब शांतपणे तेवत असते.

बदलत्या दिवाळीचे अनुभव आठवता आठवता या सगळ्या दिवाळींपेक्षा वेगळी दिवाळी यंदा येत आहे. गेले सात-आठ महिने कोरोनामुळे वातावरणात एक प्रकारची मरगळ आली. अजूनही कोरोनाची भीती माणसाच्या मनात आहेच पण कोरोनाबद्दल बऱ्याच गोष्टी आता कळल्यामुळे सावधगिरी बाळगून का होईना माणूस उत्साह दाखवत वावरत आहे! मास्क, सॅनिटायझर  आणि सोशल डिस्टंसिंग ही त्रिसूत्री वापरून लोक बाजारात गर्दी करत आहेत. बाजारात नव्या साड्या बरोबर नवीन नवीन मॅचिंग मास्क ही मिळू लागले आहेत. माणूस हा समूह प्रिय प्राणी आहे त्यामुळे कोणत्या तरी कारणाने एकत्र जमणे हे माणसाला आवडते! तरी अलीकडच्या काळात प्रत्येकाच्या कार्यबाहुल्यामुळे एकमेकांकडे असलेले येणे जाणे कमी झाले आणि कोरोनामुळे तर आणखीनच कमी झाले आहे. व्यवसाय, नोकरीतील मंदीमुळे लोकांच्या हातात पैसाही कमी झाला आहे. या सर्वांचा बाजारपेठेवर थोडा परिणाम होणारच असला तरी आहे त्या परिस्थितीत माणसं दिवाळीचा सण साजरा करणारच! दिवाळी सारखा वर्षातून एकदा येणारा मोठा सण सुना जावा असं वाटत नाही ना!

लोक आहे त्या परिस्थितीत जमेल तेवढा आनंद साजरा करतील. लवकरच कोरोना वर लस येईल आणि आपण कोरोनामुक्त होऊ! तोच दिवस आपल्यासाठी खरतर दिवाळीचा असणार आहे एवढे मात्र नक्की!

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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