हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अनब्याही लड़कियाँ ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  की एक भावप्रवण कविता   “गांधी और जीवन मूल्य “। डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  के आज के सन्दर्भ में इस सार्थक एवं  विचारणीय विमर्श के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  ) 

 ☆ कविता  –अनब्याही लड़कियाँ  

चार-चार जवान बेटियाँ

लदी हैं छाती पर सताना के

पर कौन बाँचे सताना

और उनकी अनब्याही लड़कियों की व्यथा

सताना को सताना नहीं इज़्ज़त से

छोटी की माँ के नाम से पुकारते हैं लोग

फिर भी इनकी कथा में

कोई रुचि ही नहीं लेता

तभी तो रह गई है अनकही की अनकही

छोटी की माँ और इन सबकी भी यह

अकथ कहानी कि

हँस नहीं सकतीं ये ठठाकर

बड़े बाप की बेटियों की तरह

मेले-ठेले नहीं जा सकतीं

मेहनत-मजूरी वाली मज़बूत कलाइयों के बावज़ूद

डरी-डरी रहती हैं मर्दों के सामने

कहानी में कथा रस चाहिए

पर यहाँ भरे भादों में भी सूखी पड़ी है

इनकी कथारस की कुइयाँ

जब पास में कुछ नहीं तो कोई क्यों

ले जाए इन गरीब अभागिन गउओं को

क्यों बाँधे अपने खूँटे

खूँटे तो बहुत हैं पर उनमें

मढ़वाने के लिए चाहिए

दस-दस तोले सोने का पत्तुर

और इनके यहाँ

किसी के मरने पर भी

मुँह में सोने का पानी डालने तक के लिए

मासा भर की कील भी नहीं निकलती

इनमें से किसी की नाक में तो

कहाँ से लाएँ सोने का इतना चौड़ा पत्तुर

जिनसे मढ़ी जा सके

थूहड़ की मेखों(वरों) की गोबरैली देह

इसीलिए तो सताना राज़ी हैं

किसी दोहाजू पर भी बड़ी वाली के लिए

इन अनब्याही लड़कियों की

राँड़-बेवा माँ के घर में भी

सोने का न निकलना

बहुत बुरा लगता है लड़के वालों को

थूकने लगते हैं आँखें बचा-बचाकर

छोटी भी अब छोटी नहीं रही बड़ी हो गई है

रोज़ किसी न किसी शीशे के टुकड़े में

अपना चेहरा निहारती है

उसे डर है कि कहीं

उसके चेहरे की भी चमक न चली जाए

एड़ियाँ भी फट न जाएँ

उसकी अपनी ही बड़ी बहनों की तरह

इसीलिए नहाती रहती है घंटों

झाँवे से घिस-घिस कर इतनी लाल कर लेती है एड़ियाँ

कि जैसे अभी-अभी लगा लिया हो आलता

किसी के यहाँ भी संतरे के छिलके पाती है तो

सबकी आँख बचाकर  उठा लाती है

रगड़ती है गालों पर कि झाईं न पड़े

टकसाल से निकली चवन्नी की तरह

अब भी चमकना चाहती है छोटी

वह भी जानती है कि

रीतिकाल के कवियों की नायिका की लुनाई

यानी चमड़ी की चमक ही होगी

उसे वरने वाले की पहली व आखिरी पसन्द

अब तो किसी के पास

खड़ी भी नहीं हो सकती

अपनी बड़ी बहिनों की तरह ही छोटी भी

काँटा चुभने पर भी ठिठके तो

लोगों के कान सनसनाने लगते हैं

आँखें नाच उठती हैं

दवा लेने भी

अपने भाई की साइकिल तक पर

नहीं जा  सकतीं छोटी और उसकी बहनेंं हँड़हिया बाज़ार

कभी- कभी तो

पैदल ही जाती हैं माँ (असमय बूढ़ी हुई माँ) को

संग-संग घसीटते हुए

डॉक्टर के पास

कोई मील भर की भी दूरी नहीं

इसी में दस जगह बैठती हैं सताना

कभी सूखा कभी बाढ़

यह नहीं कि छोटी की माँ उर्फ सताना नहीं जानतीं कि

उनके साथ-साथ खेती भी

हो गई है राँड़

फिर भी आस लगाए रहती हैं

हर फ़सल पर कि जीने भर को अन्न

(कुछ न कुछ)तो मिल ही जाएगा

आज नहीं तो कल मिल ही जाएँगे वर भी

जैसे मिल गए थे उसकी बहनों को

ऐसे अनब्याही ही नहीं बैठी रहेंगी

उसकी लड़कियाँ भी।

 

©  डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 69 ☆ प्रलय के विरुद्ध ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 69 – प्रलय के विरुद्ध 

लोकश्रुति है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है। पाप की अधिकता होने पर धरती को टिकाए रखना एक दिन शेषनाग के लिए संभव नहीं होगा और प्रलय आ जाएगा। कई लोगों के मन में प्राय: यह प्रश्न उठता है कि विसंगतियों की पराकाष्ठा के इस समय में अब तक प्रलय क्यों नहीं हुआ?

इस प्रश्न का एक प्रतिनिधि उत्तर है, ‘धनाजी जगदाले जैसे संतों के कारण।’ तुरंत प्रतिप्रश्न उठेगा कि कौन है धनाजी जगदाले जिनके बारे में कभी सुना ही नहीं?

धनाजी जगदाले, उन असंख्य भारतीयों में से एक हैं जो येन केन प्रकारेण अपना उदरनिर्वाह करते हैं। 54 वर्षीय धनाजी महाराष्ट्र के सातारा ज़िला की माण तहसील के पिंगली गाँव के निवासी हैं।

‘यह सब तो ठीक है पर धनाजी संत कैसे हुआ?’ …’धैर्य रखिए और अगला घटनाक्रम भी जानिए।’

अक्टूबर 2019 में महापर्व दीपावली के दिनों में धनाजी को धन प्राप्ति का एक दैवीय अवसर प्राप्त हुआ।

हुआ यूँ कि शहर के बस अड्डे पर खड़े धनाजी के सामने संकट था अपने गाँव लौटने का। गाँव का टिकट था रु.10/- और धनाजी की जेब में बचे थे केवल 3 रुपये। एकाएक धनाजी ने जो देखा, उससे उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। बस अड्डे पर किसी के गलती से  छूट गए थैले में नोटों के बंडल थे। कुल चालीस हज़ार रुपये।

चालीस हज़ार की राशि धनाजी के लिए एक तरह से कुबेर का ख़जाना था पर कुबेर का एक अकिंचन के आगे लज्जित होना अभी बाकी था।

अकिंचन धनाजी ने सतर्क होकर आसपास के लोगों से थैले के मालिक की जानकारी टटोलने का प्रयास किया। उन्हें अधिक श्रम नहीं करना पड़ा। थोड़ी ही देर में एक व्यक्ति बदहवास-सा अपना थैला ढूँढ़ते हुए आया। मालूम पड़ा कि पत्नी के ऑपरेशन के लिए मुश्किल से जुटाए चालीस हज़ार रुपये जिस थैले में रखे थे, वह यहीं-कहीं छूट गया था। पर्याप्त जानकारी लेने के बाद धनाजी ने वह थैला उसके मूल मालिक को लौटा दिया।

आनंदाश्रु के साथ मालिक ने उसमें से एक हज़ार रुपये धनाजी को देने चाहे। विनम्रता से इनाम ठुकराते हुए धनाजी ने अनुरोध किया कि यदि वह देना ही चाहता है तो केवल सात रुपये दे ताकि दस रुपये का टिकट खरीदकर धनाजी अपने गाँव लौट सके।

प्राचीनकाल में सच्चे संत हुआ करते थे। देवताओं द्वारा इन संतों की तपस्या भंग करने के असफल प्रयासों की अनेक कथाएँ भी हैं।  इनमें एक कथा धनाजी जगदाले की अखंडित तपस्या की भी जोड़ लीजिए।…और हाँ, अब यह प्रश्न मत कीजिएगा कि अब तक प्रलय क्यों नहीं हुआ?

 

© संजय भारद्वाज

(प्रात: 4 :14 बजे, 7.11.2019)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 28 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 28 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 28) ☆ 

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 28☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

ज़रूरी नहीं तोड़ने के लिए,          

हमेशा पत्थर ही  मारा जाए,                           

लहज़ा  बदलने  से  भी,             

बहुत  कुछ  टूट  जाता है…

 

It’s not always necessary to

stone  something  to  break

Even by  changing the  tone,

Lots  of  things  get broken…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

लोगों ने एक ज़र्रे  को

आफ़ताब बनते  देखा

और हम तो बस आपके

नूर को ही देखते रह गए…

 

Everyone kept watching a

granule  turning into  Sun

And I  just kept looking

at  your  resplendence…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

आइना देख कर कुछ

खुद को तसल्ली हुई,

खुदगर्जी के ज़माने में

कोई तो जानता है हमें..

 

Looking into the mirror,

Felt  somewhat  relieved,

In  the  era  of selfishness,

At least someone knows me

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

कुछ  रहम  कर, ऐ जिंदगी

थोड़ा  संवर  तो  जाने  दे…

तेरा अगला जख्म भी सह लेंगे,

पर पहले वाला तो भर जाने दे

 

Have some mercy, O’ life!

Let me get recovered a bit,

Shall bear your next wound too

Let the first one be filled…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य #80 ☆ व्यंग्य – उल्लू जिंदाबाद! ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की एक समसामयिक एवं सार्थक व्यंग्य  उल्लू जिंदाबाद !  इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 80 ☆

☆ व्यंग्य उल्लू जिंदाबाद ! ☆

अमेरिका में गधे और हाथी की रेस में गधे जीत गए बाईडेंन का चुनाव चिन्ह गधा था, और ट्रम्प का हाथी।

चुनावो के समय अपने देश मे भी अचानक २००० रुपयो की गड्डियां बाजार से गायब होने की खबर आती है,  मैं अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा होता हूं कि २००० के गुलाबी नोट धीरे धीरे  काले हो रहे हैं.

अखबार में पढ़ा था, गुजरात के माननीय १० ढ़ोकलों  में बिके.  सुनते हैं महाराष्ट्र में पेटी और खोको में बिकते हैं.  राजस्थान में ऊंटों में सौदे होते हैं।

सोती हुई अंतर आत्मायें एक साथ जाग जाती हैं  और चिल्ला चिल्लाकर माननीयो को सोने नही देती.  माननीयो ने दिलों का चैनल बदल लिया ,  किसी स्टेशन से खरखराहट भरी आवाजें आ रही हैं तो  किसी एफ एम  से दिल को सुकून देने वाला मधुर संगीत बज रहा है,  सारे जन प्रतिनिधियो ने दल बल सहित वही मधुर स्टेशन ट्यून कर लिया.  लगता है कि क्षेत्रीय दल,  राष्ट्रीय दल से बड़े होते हैं,  सरकारो के लोकतांत्रिक तख्ता पलट,  नित नये दल बदल,  इस्तीफे, के किस्से अखबारो की सुर्खियां बन रहे हैं.  हार्स ट्रेडिंग सुर्खियों में है। यानी घोड़ो के सौदे भी राजनीतिक हैं।

रेस कोर्स के पास अस्तबल में घोड़ों की बड़े गुस्से,  रोष और तैश में बातें हो रहीं थी.  चर्चा का मुद्दा था हार्स ट्रेडिंग ! घोड़ो का कहना था कि कथित माननीयो की क्रय विक्रय प्रक्रिया को  हार्स ट्रेडिंग  कहना घोड़ो का  सरासर अपमान है.  घोड़ो का अपना एक गौरव शाली इतिहास है.  चेतक ने महाराणा प्रताप के लिये अपनी जान दे दी, टीपू सुल्तान,  महारानी लक्ष्मीबाई  की घोड़े के साथ  प्रतिमाये हमेशा प्रेरणा देती है.  अर्जुन के रथ पर सारथी बने कृष्ण के इशारो पर हवा से बातें करते घोड़े,   बादल,  राजा, पवन,  सारंगी,  जाने कितने ही घोड़े इतिहास में अपने स्वर्णिम पृष्ठ संजोये हुये हैं.  धर्मवीर भारती ने तो अपनी किताब का नाम ही सूरज का सातवां घोड़ा रखा.  अश्व शक्ति ही आज भी मशीनी मोटरो की ताकत नापने की इकाई है. राष्ट्रपति भवन हो या गणतंत्र दिवस की परेड तरह तरह की गाड़ियो के इस युग में भी,  जब राष्ट्रीय आयोजनो में अश्वारोही दल शान से निकलता है तो दर्शको की तालियां थमती नही हैं. बारात में सही पर जीवन में कम से कम एक बार हर व्यक्ति घोड़े की सवारी जरूर करता है.  यही नही आज भी हर रेस कोर्स में करोड़ो की बाजियां घोड़ो की ही दौड़ पर लगी होती हैं.  फिल्मो में तो अंतिम दृश्यो में घोड़ो की दौड़ जैसे विलेन की हार के लिये जरूरी ही होती है,  फिर चाहे वह हालीवुड की फिल्म हो या बालीवुड की.  शोले की धन्नो और बसंती के संवाद तो जैसे अमर ही हो गये हैं.  एक स्वर में सभी घोड़े हिनहिनाते हुये बोले  ये माननीय जो भी हों घोड़े तो बिल्कुल नहीं हैं.  घोड़े अपने मालिक के प्रति  सदैव पूरे वफादार होते हैं जबकि प्रायः नेता जी की वफादारी उस आम आदमी के लिये तक नही दिखती जो उसे चुनकर नेता बना देता है.

वाक्जाल से,  उसूलो से उल्लू बनाने की तकनीक नेता जी बखूबी जानते हैं.  अंतर्आत्मा की आवाज  वगैरह वे घिसे पिटे जुमले होते हैं जिनके समय समय पर अपने तरीके से इस्तेमाल करते हुये वे स्वयं के हित में जन प्रतिनिधित्व करते हैं और अपने किये गलत को सही साबित करने के लिये इस्तेमाल करते हैं.   नेताजी बिदा होते हैं तो उनकी धर्म पत्नी या पुत्र कुर्सी पर काबिज हो जाते हैं.  पार्टी अदलते बदलते रहते हैं  पर नेताजी टिके रहते हैं.  गठबंधन तो उसे कहते हैं जो सात फेरो के समय पत्नी के साथ मेरा,  आपका हुआ था.  कोई ट्रेडिंग इस गठबंधन को नही  तोड़ पाती.   यही कामना है कि हमारे माननीय भी हार्स ट्रेडिंग के शिकार न हों आखिर घोड़े कहां वो तो “वो” ही  हैं !

वो उल्लू होते हैं,  और उल्लू लक्ष्मी प्रिय हैं,  वे रात रात जागते हैं,  और सोती हुईं गाय सी जनता के काम पर लगे रहते हैं । इसलिए अपना नारा है,  उल्लू जिंदाबाद!

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 28 ☆ नवगीत: बाँस – बाँसलिया ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आचार्य जी  की एक  नवगीत  नवगीत: बाँस – बाँसलिया । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 28 ☆ 

☆ नवगीत: बाँस – बाँसलिया ☆ 

भोर भई दूँ बुहार देहरी अँगना

बाँस बहरी टेर रही रुक जा सजना

 

बाँसगुला केश सजा हेरूँ  ऐना

बाँसपिया देख-देख फैले नैना

बाँसपूर लुगरी ना पहिरब बाबा

लज्जा से मर जाउब, कर मत सैना

 

बाँस पुटु खूब रुचे, जीमे ललना

 

बाँस बजें तैं न जा मोरी सौगंध

बाँस बराबर लबार बरठा बरबंड

बाँस चढ़े मूँड़ झुके बाँसा कट जाए

बाँसी ले, बाँसलिया बजा देख चंद

 

बाँस-गीत गुनगुना, भोले भजना

 

बगदई मैया पूजूँ,  बगियाना  भूल

बतिया बड़का लइका, चल बखरी झूल

झिन बद्दी दे मोको, बटर-बटर हेर

कर ले बमरी-दतौन, डलने दे धूल

 

बेंस खोल, बासी खा, झल दे बिजना

***

शब्दार्थ : बाँस बहरी = बाँस की झाड़ू, बाँस पुटु = बाँस का मशरूम, जीमना = खाना,  बाँसपान = धान के बाल का सिरा जिसके पकने से धान के पकाने का अनुमान किया जाता है, बाँसगुला = गहरे गुलाबी रंग का फूल,  ऐना = आईना, बाँसपिया = सुनहरे कँसरइया पुष्प की काँटेदार झाड़ी, बाँसपूर = बारीक कपड़ा, लुगरी = छोटी धोती,  सैना = संकेत,  बाँस बजें = मारपीट होना, लट्ठ चलना,  बाँस बराबर = बहुत लंबा, लबार = झूठा, बरठा = दुश्मन, बरबंड – उपद्रवी, बाँस चढ़े = बदनाम हुए, बाँसा = नाक की उभरी हुई अस्थि, बाँसी = बारीक-सुगन्धित चावल, बाँसलिया = बाँसुरी, बाँस-गीत = बाँस निर्मित वाद्य के साथ अहीरों द्वारा गाये जानेवाले लोकगीत, बगदई = एक लोक देवी, बगियाना = आग बबूला होना, बतिया = बात कर, बड़का लइका = बड़ा लड़का, बखरी = चौकोर परछी युक्त आवास, झिन = मत, बद्दी = दोष, मोको = मुझे, बटर-बटर हेर = एकटक देख, बमरी-दतौन = बबूल की डंडी जिससे दन्त साफ़ किये जाते हैं, धूल डालना = दबाना, भुलाना,  बेंस = दरवाजे का पल्ला, कपाट, बासी = रात को पकाकर पानी डालकर रखा गया भात,  बिजना = बाँस का पंखा. 

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पु. ल. देशपांडे जन्मदिवस विशेष – पु.ल………एक शब्दगुंफण ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पु. ल. देशपांडे जन्मदिवस विशेष – पु.ल………एक शब्दगुंफण ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆ 

स्व पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे (पु. ल. देशपांडे)

जन्म – 8 नोवेम्बर 1919, मुंबई

सुसह्य व्हावे जगणे म्हणूनी विनोद केला तुम्ही

विनोद म्हणजे टवाळ खोरी,अर्थ काढला आम्ही.

 

विदुषी आणि विद्वानांनी इथे नसे  कमतरता

उपदेशाच्या नित्य वाहती  अमृतमय सरिता.

 

थकली काया,थकला मेंदू,कोण तया खुलवेल

नित्य ‘उद्या’ चे स्वागत करण्या कोण मना फुलवेल.

 

यंत्रामध्ये, शास्त्रामध्ये  पिचून  जाता  जीव

कुणा न आली दया आमुची,कुणा न आली कीव.

 

अशाप्रसंगी हास्यदूत तुम्ही बनून आला जगती

विनोद अस्त्रा सहज उचलले लढण्या अवतीभवती.

 

खिल्ली उडवून, उपरोधाने,कधी काढले चिमटे

तव शब्दांच्या दर्पणी बघता,खूण मनाला पटे.

 

प्रवासातले अनुभव केले  कथन विनोदातून

जीवन यात्रा पार होतसे  सहज तया ऐकून.

 

जगत्पटावर बहुरूप्याचे  पात्र तुम्ही हो झाला

विनोद आणिक मार्मिकतेचा संगम तुम्ही केला.

 

सप्तसुरांचा साज चढवूनी कधी गाईली कवने

मुक्त कराने मुक्तांगणी तुम्ही पेरीत गेला दाणे.

 

कधी न चुकला जागा कोठे जे जे होते तुजपाशी

माझे माझे कधी न म्हटले,उधळीत गेला सर्वांपाशी.

 

हास्यरसाच्या वर्षावाने अक्षर अक्षर झाले ताजे

पैलू बघता व्यक्तित्वाचे जो तो म्हणतो ‘पुलं माझे.’

 

‘पु.ल.’म्हणता पुलकित होती अजून अमुची मने

पुन्हा न होणे, तुम्हासारखे,  सरस्वतीचे लेणे.

 

©  श्री सुहास रघुनाथ पंडित

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पापण्यातील आसवांना ☆ सुश्री नीलाम्बरी शिर्के 

सुश्री नीलाम्बरी शिर्के 

प्रकाशित पुस्तके –स्पंदन ,आत्मधून

आवड – वाचन, लिखाण, प्रवास, मैत्र जपणे, काव्यवाचन, व्याख्याने देणे

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ पापण्यातील आसवांना ☆ सुश्री नीलाम्बरी शिर्के ☆ 

पापण्यातील आसवांना

बांध पक्का बांधला

वाहतो जलौघ वेगे

तोल सावरून आतला

 

काळजातील यातना

अंतरातच कोंडल्या

तडकल्या भिंती जिथे

धीर धरूनी सांधल्या

 

थेंबही आता न येतो

पापणी काठावरी

हुंदक्यांना धाडले

काळजाच्या अंतरी

 

ओठांवरती विराजे

धीरगंभीर हास्यरेषा

जीवनाला कळाली

जिंदगीची गूढ भाषा

©  सुश्री नीलांबरी शिर्के

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ निवृत्त ☆ श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे ☆

श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे

☆ कवितेचा उत्सव ☆ निवृत्त ☆ श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे 

निवृत्त झालो कालच.……..

अन वेळ झाली तरी राहिलो घरीच .

 

ती लगबग..

काही राहिले का…आठवणे

उगाच पॅन्टचे खिसे चाचपडणे

पाकीट,चाव्या,रुमाल आत असूनही

उगाच त्यावरून हात फिरवणे.

पुन्हा पुन्हा भिंतीवरील घड्याळात पाहणे.

 

“अहो……. मोबाईल घेतला ना”.

ऐकताना चार्जिंग  तपासायचे

पुसलेल्या गाडीकडे उगीचच पहायचे.

कालचे महत्वाचे कागद मीच ठेवले,दिसत नाहीत म्हणून

पोरांवर ओरडायचे

अन कुणाचाही फोन कां नाही…..

मन बेचैन  व्हायचे

वाढलेले  अन्न,पेपर वाचत आत ढकलायचे.

 

आज काहीच नाही………

निवांत…..रिक्ततेची  जाणीव.

 

एक आवाज अंतर्मनाचा

जग………स्वतःच्या आनंदासाठी

निर्भयांच्या ,असह।य्यांच्या मदतीसाठी

जग ……लढण्यासाठी,दमनाच्या विरोधाशी,

जग…….वसुधेच्या अन मानवतेच्या रक्षणासाठी

अन् वेळ झाली….

 

उठलो मी नव्या उमेदीने

जीवन पूर्ततेसाठी.

 

© श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे

चंद्रपूर

मो. 9822363911

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ससा आणि कासव — उत्तरार्ध ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ जीवनरंग ☆ ससा आणि कासव — उत्तरार्ध ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ 

मग त्याने अगदी लगेच आपला नवा दिनक्रम सुरू केला. पण जेमतेम एका महिन्यातच हे असं कशाला तरी बांधून घेण्याचा, ध्येय गाठण्यासाठी नेमाने प्रयत्न करण्याचा त्याला कंटाळा आला. आणि त्याने ठरवलं ….. ‘आता हे सगळं पुरे. झालोय मी आता पुरेसा सक्षम‘ ……आणि बाकी कसलाही विचार न करता तो बाहेर पडला.

‘आता शर्यतीसाठी एकच एक शिखर नाही, तर प्रत्येक प्राण्याबरोबर वेगळ्या वेगळ्या शिखरासाठी स्पर्धा लावायची ….. निश्चित ठरलं. मग त्याने पटापट प्राण्यांचा क्रम ठरवला. ….. आधी हरीण … ते काय… आधी जोरात पळेल, मग लगेच दमून थांबेल…. मग… जिराफ. .. स्वतःची इतकी उंच मान सांभाळत कितीसा लांब जाऊ शकणार आहे तो ?….. मग …हत्ती… त्याचं एक पाऊल म्हणजे माझी बारा- पंधरा पावलं…. तो कसला जिंकणार? … आता त्याचा आत्मविश्वास फारच वाढला होता…. आधी या तिघांना जिंकूया…मग वाघ- सिंह- चित्ता शंभरदा विचार करतील मी त्यांना स्पर्धा लावायची का असं विचारल्यावर….. या आत्मप्रौढीनेच तो इतका फुगला होता…पण त्याला मात्र आपण खूप सशक्त झाल्यासारखं वाटत होतं.

…… मग झाली एकदाची स्पर्धा सुरू … हरणाने त्याला बघता बघता सहज हरवलं….. जिराफ कधी पुढे गेला हे तर त्याला कळलंच नाही…. आणि मिजाशीने हत्तीकडे पहाता पहाता, त्याच्याच पायाखाली तुडवला जाण्यापासून तो थोडक्यात वाचला, आणि नाईलाजानेच थांबला. आणि तेव्हा त्याच्याकडे पाहून कुचेष्टेने हसणारे इतर कितीतरी ससे आणि काही प्राणी त्याला दिसले. त्याच्याही नकळत त्याचा माज उतरायला लागला होता. तिथून कसातरी पळ काढून, धापा टाकतच तो एका जलाशयापाशी पोचला. तहानेने, भुकेने तो अगदी व्याकूळ झाला होता, पण आता त्याला एक पाऊलही उचलवत नव्हते. अगदी म्लान झालेला तो तिथेच काठावर धपकन बसला. इतक्यात अचानक तो वृद्ध ससा तिथे आला. या सशाला पाहून त्याला खूप वाईट वाटले. आता याला सावरायला हवे या विचाराने तो त्याच्याजवळ गेला …… “बाळा दमलास ना पळून पळून? पण जिंकलास का?”

“नाही ना?”

“जाऊ दे. आता पाणी पिऊन घे. इथलं गवत खा. आणि डोकं शांत झालं की विचार कर. सतत नुसता पळत राहिलास. पण इतक्या दिवसात स्वतः साठी किती जगलास? या जलाशयाइतकं शांत, स्थिर मन कधी अनुभवलं आहेस का ? यातले मासे बघ, राजहंस बघ … कसे आनंदात आहेत. त्यांनाही असं जगण्यासाठी खूप धडपडावं लागतं, खूप धावपळ करावी लागते, पळापळ करावी लागते …. पण इतरांना हरवण्यासाठी ते कधीच काही करत नाहीत….

मान्य आहे हे जग आता स्पर्धेचे झाले आहे. पण ती स्पर्धा आता आधी स्वतःशीच करायला हवी. कालच्यापेक्षा आज मी कसा पळलो, आणखी पुढे जाण्यासाठी मी स्वतःच स्वतःत काय सुधारणा करायला पाहिजेत, काय बदलायला पाहिजे, काय सोडायला पाहिजे, याचा पूर्ण विचार कर. आयुष्यात कितीही ध्येये गाठायची असली तरी एकावेळी एकाच ध्येयाचा ध्यास घेणे श्रेयस्कर असते असं जाणती माणसं म्हणतात म्हणे. तेही नीट लक्षात ठेव……आणि मग निर्धास्तपणे उतर स्पर्धेत.

बघ मग एक दिवस तुझ्याही नकळत तू नक्की जिंकशील”……………………

………पुढे काही वर्षातच ससा खरंच जिंकतो आणि या गोष्टीची इतिश्री होते…….

© सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

९८२२८४६७६२.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सत्यवानाची सावित्री ☆ सौ ज्योती विलास जोशी

सौ ज्योती विलास जोशी

☆ विविधा ☆ सत्यवानाची सावित्री  ☆ सौ ज्योती विलास जोशी ☆ 

जवळपास गेली चाळीस वर्षे इंदू माझ्या घरी काम करते ती माझ्याकडे आली तेव्हा आम्हा दोघींची मुले पहिलीत होती आज आम्हा दोघींच्या घरी गोकुळ आहे.

इतक्या वर्षांचा ऋणानुबंध आमचा! आता ती आमच्या कुटुंबातीलच एक झाली आहे. स्वतःचं एवढं मोठं कुटुंब असूनही ती माझ्या घरात रमलेली असते. आणि माझ्यात गुंतलेली!

तिचा सगळा जीवनप्रवास तसा खडतरच! अशिक्षिततेची झालर असलेलं जिणं तिच!! ठेंगणी ठुसकी अशी इंदू कष्ट करून नीटनेटका संसार करणारी अशी.. ‘तुमच्या वानी तुमच्या वानी’असं म्हणून जमेल तेवढं माझं अनुकरण करणारी . अशी ही इंदू……

माझ्याच घरात तिने स्वयंपाकाचे धडे घेतले. जेवढ्या म्हणून माझ्या गोष्टी तिने डोळ्याने पाहिल्या हाताने शिकल्या त्याचं तिला अप्रूप आहे. वेळोवेळी केलेल्या मदतीचे भान ती ठेवते पण तिच्या नशीबाची गाडी मी पळवू शकत नाही हे तिला चांगलेच ठाऊक आहे.

तिचा नवरा पहिल्यापासूनच व्यसनी…रोजची भांडण रोज वाद, कधीकधी होणारा नशेचा अतिरेक हे मी इतकी वर्ष पाहात आले आहे जीवनाचा समतोल राखत ती बिचारी जन्मभर राबते आहे.

सततच्या व्यसनासाठीच्या पैशाची मागणी आणि पुरवले नाहीत की होणारी मारहाण यांनी कातावून गेलेली इंदू माझ्याकडे आल्यावर सगळं दुःख विसरते आताशा तर रोजचेच रडगाणे गायचे ही तिने सोडून दिलेआहे.

कधीतरी तिचा चेहरा पडलेला दिसला की मी खोदून तिला विचारत असते पण दुःखाचं प्रदर्शन मांडायचं आणि नवऱ्याला नावं ठेवायची हे तिच्या स्वभावात नाही पण अती झाले की कधीतरी ती माझ्यापुढे मोकळी होते.

करोनाचे अस्मानी संकट आले तशी तिच्या जीवनाची घडीच विस्कटली यंत्रमाग बंद पडले. दोन्ही मुलांचं काम गेलं. पैशाची चणचण भासू लागली. माझ्याकडून होता होईल तेवढी मदत करत होतेपण ती खिन्न आहे.

त्यात आणखी तिच्या नवऱ्याची रोजची दारूसाठी पैशाची मागणी

चार दिवस सलग ती आलीच नाही तिच्या मुलाचाही फोन लागेना.एखादा दिवस वाट बघावी आणि मग पाठवावं कुणालातरी तिच्याकडे असा मी विचार करत होते तोवरच दारात उभी !मान खाली घालून काहीशी अस्वस्थच दिसली .घरात आली आणि मटकन खाली बसली. आणि ओक्साबोक्शी रडायला लागली माझ्या मनात शंकेची पाल चुकचुकली ती दुसऱ्याच कारणासाठी….कुणा मुलाला कोवीड झाला की काय असे वाटले. बऱ्याच वेळानंतर बोलती झाली…

“मालक गेलं वहिनी “…..

“अगोबाई कशानं गं? मला एकदम धक्का बसला.”

“वहिनी जनमभर मी त्याला दारूला कधीबी कमी केलं न्हाई.त्यांच्या व्यसनासाठनं राबलो.तुम्हाला ठाव आहे. घरात दुध नसलं तर चालल पर त्याच्यासाठनं मी कायम पैका दिला. परवा दिवशी त्यांच्या हातात पैसे हुतं पर दारू मिळना म्हनूनशान लै चिडचिड चिडचिड करत हुतं आणि कुठं जाऊन ते हाताला लावत्यात ते काय म्हणतात शनि टायझर पिऊन आलं बघा आनी दवाखान्याला न्यूस तो पतुर डोळ्या देखता गेलं.” असं म्हणून तिने अक्षरशः हंबरडा फोडला.

“म्या त्यांची दारू कवा बंद केली न्हाई. मी त्यांच्या दारू साठनच राबलो का न्हाई वहिनी? मला ठाव असतं दारू कुठं मिळतीया ते तर कुठून बी दारू आनून पाजली असती. त्यांच्यासाठनं काय बी केलं असतं म्या”….. आणि पदर डोळ्याला लावून ती हमसाहमशी रडू लागली

मी आ वासून पाहत बसले त्या सत्यवानाच्या सावीत्रीकडे !!……

© सौ ज्योती विलास जोशी

इचलकरंजी

मो 9822553857

jvilasjoshi@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

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