मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचे ☆ जन्म-1 ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

☆ क्षण सृजनाचे : जन्म – 1 ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर 

या गोष्टीला खूप म्हणजे खूपच वर्षं झाली. पण काही वेळा स्मृतीच्या तळातून ती अचानक वर उसळून येते. १९६७ सालची गोष्ट. त्या वर्षी मी बी.एड. करत होते.फेबु्रवारी महिना. आमचा फायनल लेसन प्लॅन लागला होता. परीक्षेच्या वेळी पहिल्या दिवशी पहिलाच माझा मराठीचा लेसन होता. युनीट कोणत घ्यावं, कसा लेसन घ्यावा इ. विचार स्वाभाविकपणेच मनात घोळत होते. लेसनसाठी पाठ्य पुस्तकातील कविता निवडावी, की बाहेरची? असं सगळं विचार मंथन चालू होतं. त्यातच माझी मासिक पाळी सुरू झाली. यावेळी चार-पाच दिवस उशीर झाला होता. तरी पाठपरीक्षेपूर्वी ३-४ दिवस सहज सगळं निपटलं असतं. पण यावेळी नेहमीप्रमाणे चार-पाच दिवसानंतरही ब्लिडींग थांबेना. मग मात्र धाब दणाणलं. पाठ परीक्षा हातची गेलीच बहुतेक, असं म्हणत डॉक्टरांकडे गेले.

डॉ. श्रीनिवास वाटवे हे त्या वेळचे नावाजलेले गायनॅकॉलॉजीस्ट. त्यांना दाखवले. त्यांच्याशी बोलणे झाले. त्यांनी `क्युरेटिन’चा सल्ला दिला. संध्याकाळी अ‍ॅडमिट झाले. रात्री सात-साडे सातला क्युरेटीन होणार होते. त्याप्रमाणे मला प्रिपेअर करून टेबलवर घेतले. तिथे भिंतीला लागून असलेल्या शो-केसमध्ये सर्जरीची साधने होती. वेगवेगळ्या आकाराच्या सुर्‍या, कात्र्या, चाकू , सुया, पकडी आणखी किती तरी. लखलखित. चकचकित.

अ‍ॅनॅस्थेशिया देणारे डाक्टर अद्याप यायचे होते. त्यामुळे डॉक्टर, सहाय्यक, नर्सेस सगळी मंडळी डॉक्टरांची वाट बाहेर उभे होते. रूममध्ये टेबलावर फक्त मी आणि भोवतीनं शो-केसमधली लखलखित साधने. हत्यारे.

मी मनाशी पाठाबद्दलचा विचार करायचे ठरवत होते. कशी सुरुवात करायची्… कोणते प्रश्न विचारायचे? वगैरे… वगैरे… पण त्यातलं काही डोक्यात येतच नव्हतं. भरकटलेल्या विचारांना शब्द मिळत गेले-

 

घटका भरत आलेली

जीवघेणी कळ

मस्तक भेदून गेलेली

ललाटीची रेषा,

वाट हरवून बसलेली

घड्याळाची टिक टिक

जिण्याचा तोल साधत

सांडत असलेली

 

इतक्यात डॉक्टर आले. मला भूल दिली गेली. डॉक्टरांनी आपलं काम पूर्ण केलं.

काही वेळाने माझी भूल उतरली. भूल उतरता उतरताही मगाच्याच ओळी मनावर उमटत राहिल्या. त्या पुसून मी पुन्हा पाठाचा विचार करू लागले. पण तो विचार मनातून हद्दपारच झाला. त्याच्याच पुढच्या ओळी प्रगटत राहिल्या.

 

इथरची बाधा

नसानसातून शरीरभर भिनलेली…

लाल… हिरवी… पिवळी… निळी वर्तुळं

काळवंडत गेलेली…

पांढर्‍या शुभ्र ठिपक्यांच्या

लयबद्ध हालचाली.

पाजळत्या रक्तपिपासू हत्यारांची

लांबच लांब पसरलेली

अशुभ सावली.

संज्ञा बधीर होताना

सारं सारं दूर सरतय.

रक्तात उमलणार्‍या

गुलबकावलीचं हसू,

लाटालाटांनी मनभर उसळतय.

अणूरेणू व्यापून उरतय.

 

इथे माझ्या नेणिवेने क्युरेटिनचं `सिझेरियन केलं होतं आणि कल्पनेनं गुलबकावलीचं फूल माझ्या ओंजळीत ठेवलं होतं. माझ्या `जन्म’ या कवितेचा जन्म अशा रीतीने तिथे ऑपरेशन टेबलवर झाला.

©  श्रीमती उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – सप्तदशोऽध्याय: अध्याय (19) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद)

 

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।

परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌ ।।19।।

 

किसी मोह के भाव से, जनहित को नुकसान

पहुँचाने होता जो तप, तामस की पहचान।।19।।

 

भावार्थ :   जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है ।।19।।

The austerity which is practised out of a foolish notion, with self-torture, or for the purpose of destroying another, is declared to be Tamasic. ।।19।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 44 ☆ लघुकथा – मैडम ! कुछ करो ना ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी स्त्री  विमर्श  पर आधारित लघुकथा मैडम ! कुछ करो ना।  भ्रूण /कन्या हत्या और  स्त्री जीवन के  कटु सत्य को बेहद भावुकता से डॉ ऋचा जी ने शब्दों में उतार दिया है। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी  को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 44 ☆

☆  लघुकथा – मैडम ! कुछ करो ना  

अस्पताल में विक्षिप्त अवस्था में पड़ी वह बार-बार चिल्ला उठती थी- मत फेंकों, मत फेंकों मेरी बच्चियों को नदी में। मैं….. मैं पाल लूँगी किसी तरह उन्हें। मजूरी करुँगी, भीख माँगूगी पर तुमसे पैसे नहीं माँगूगी। कहीं चली जाउँगी इन्हें लेकर, तुन्हें अपनी शक्ल भी नहीं दिखाउँगी| छोड़ दो इन्हें, तुम्हारे पैर पड़ती हूँ। इन बेचारी बच्चियों का क्या दोष? ………. और फिर मानों उसकी आवाज दूर होती चली गयी।

बेहोशी की हालत में वह बीच-बीच में कभी चिल्लाती, कभी गिड़गिड़ाती और कभी फूट-फूटकर रोने लगती। नर्स ने आकर नींद का इंजेक्शन दिया और वह औरत निढ़ाल होकर बिस्तर पर गिर गयी। दर्द उसके चेहरे पर अब भी पसरा था।

नर्स ने पास खड़ी समाज सेविका को बताया कि पिछले एक महीने से इस औरत का यही हाल है। नदी के पुल पर बेहोश पड़ी मिली थी| कोई अनजान आदमी अस्पताल में भर्ती करा गया था। पता चला है कि इसके पति ने इसकी पाँच, तीन और एक वर्ष की तीनों बच्चियों को इसके सामने पुल से नदी में फेंक दिया। जब इसने देखा कि पति ने दो बेटियों को नदी में फेंक दिया तो एक वर्ष की बच्ची जो इसकी गोद में थी उसे लेकर यह भागने लगी। उस हैवान ने उसे भी इसके हाथों से छीनकर नदी में फेंक दिया। तब से ही इसका यह हाल है। बहुत गहरा सदमा लगा है इसे।

मैडम ! क्यों करते हैं लोग ऐसा? फूल-सी बच्चियों को मौत की नींद सुलाते इनका दिल नहीं काँपता? नर्स गिड़गिड़ाती हुई बोली- मैडम ! कुछ करिए ना। आप तो समाज सेविका हैं, बहुत कुछ कर सकती हैं। समाज सेविका पथरायी आँखों से बिस्तर पर बेसुध पड़ी औरत को एकटक देख रही थी। पत्थर दिल समाज से टकरा-टकराकर उसके आँसू भी सूख गए थे।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सार्थक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ सार्थक ☆

कुछ हथेलियाँ

उलीचती रहीं

दलदल से पानी,

सूखी धरती तक

पहुँचाती रहीं

बूँद-बूँद पानी,

जग हँसता रहा

उनकी नादानी पर..

कालांतर में

मरुस्थल तो

तर हुआ नहीं पर

दलदल की जगह

उग आया

लबालब अरण्य..

साधन की जो

बाट नहीं जोहते,

उनके संकल्प और श्रम

कभी व्यर्थ नहीं होते!

 

©  संजय भारद्वाज 

14.9.20, रात्रि 12.07 बजे।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन# 63 – हाइबन – बादल महल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक हाइबन   “बादल महल। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन  # 63 ☆

☆ बादल महल ☆

बादल महल कुंभलगढ़ किले के शीर्ष पर स्थित एक खूबसूरत महल है । यह संपूर्ण महल दो खंडों में विभाजित हैं । किन्तु आपस में जुड़ा हुआ है। इस महल के एक और मर्दाना महल है।  दूसरी ओर जनाना महल निर्मित है। इसी माहौल में वातानुकूलित लाल पत्थर की जालिया लगी है। लाल पत्थर की जालियों की विशिष्ट बनावट के कारण गर्म हवा ठंडी होकर अंदर की ओर बहती है।

बादल महल बहुत ही ऊँचाई पर बना हुआ महल है । इस महल से जमीन बहुत गहराई में नजर आती है । ऐसा दिखता है मानो आप बादलों के बीच उड़ते हुए उड़न खटोले से जमीन को देख रहे हैं । इसी ऊंचाई और दृश्यता की वजह से इसका नाम बादल महल पड़ा है।

लाल झरोखा~

फर्श पर देखते

सूर्य के बिंब।

~~~~~~~~

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 71 ☆ व्यंग्य – चरित्र प्रमाण ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक विचारणीय  व्यंग्य  चरित्र प्रमाण।  अब तो चरित्र प्रमाण की भी जांच के लिए बाजार में बैकग्राउंड वेरिफाइंग एजेंसीस आ गईं हैं। ऐसे विषय पर बेबाक  राय रखने के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 71 ☆

☆ व्यंग्य – चरित्र प्रमाण ☆

चरित्र प्रमाण पत्र का अपना महत्व होता है, स्कूल से निकलते समय हमारे  मास्टर साहब ने हमसे केवल 10 रुपये स्कूल के विकास के लिए लेकर हमारी सद्चरित्रता का प्रमाण पत्र दिया था. फिर हमारी नौकरी लगी गोपनीय तरीके से हमारे चरित्र की जांच हुई.  मुंशी जी हमारे घर आकर हमारे चरित्र की जांच कर गए. वे पिताजी से इकलौते बेटे के गजटेड पोस्ट पर पोस्टिंग का नजराना लेना नहीं भूले. इस तरह हम प्रमाणित चरित्रवान हैं. बिना चरित्र के मनुष्य कुछ नहीं होता, हमें एक सूत्र वाक्य याद आता है “यदि धन गया तो कुछ नहीं गया यदि स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और यदि चरित्र गया तो सब कुछ गया”. गणित के विलोम साध्य के अनुसार सहज ही प्रमाणित होता है कि यदि किसी के पास चरित्र है तो सब कुछ है.अर्थात मेरे पास और देश के हर नागरिक के पास जिसके पास चरित्र प्रमाण पत्र है सब कुछ है. हमारे स्कूलों और कॉलेजों से निकले हर विद्यार्थी के पास सब कुछ है, इसीलिये सरकारो को उनकी नौकरी की ज्यादा फिकर नही.

पिछले दिनों मैने कॉलेज के चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने वाले रजिस्टर की सूची देखी, मैंने पाया कि  जब से कॉलेज चल रहा है ऐसा कोई भी छात्र नहीं है जिसे अच्छे चरित्र प्रमाण पत्र नही दिया गया. मतलब चरित्र प्रमाण पत्र खोया पाया वाला अखबारी कालम हो गया. जिसमें आज तक मैंने सिर्फ और सिर्फ खोया वाली  सूचनाएं ही पढ़ी है,  पाया कि नहीं. यदि आपको कहीं कोई सूचना पाया कि  मिले तो मुझे जरूर सूचित करें जिससे मुझे अपने देश के चरित्रवान लोगों के चरित्र का एक और प्रमाण पत्र मिल सके. टीवी पर गुमशुदा लोगों के चेहरे आपने जरूर देखें होंगे. मैं अपने बच्चों के साथ यह कार्यक्रम जरूर देखता हूं और चित्र दिखाए जाने के बाद उद्घोषक के गुमशुदा की आयु बताने से पहले खोए हुए व्यक्ति की अनुमानित आयु चित्र में चेहरा देखकर बता देता हूं. धीरे-धीरे बच्चों को भी अनुमान लगाने वाले इस खेल में मजा आने लगा है और हमें महारत हासिल होती जा रही है. यहां यह सब बताने का मेरा उद्देश्य यही है कि इन चित्रों के प्रसारण से अब तक कितने लोग ढूंढ निकाले गए हैं यह शोध का विषय  है.

चरित्र का महत्व निर्विवाद है. रामचरित्र पर गोस्वामी जी की पूरी रामायण ही लिख गये हैं.  महापुरुषों के जीवन चरित्र बाल भारती के पाठ में कैद कर दिए गए हैं. जिस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देकर बच्चे बहुत अच्छे नंबरों से पास होते रहते हैं. यह बात और है कि उन पाठों को पढ़ने के लिए मास्टर ट्यूशन के लिए प्रेरित करते हैं और ट्यूशन वाले छात्रों को विशेष गेसिंग भी उपलब्ध करवाते हैं, खैर यह मास्टर साहब का चरित्र है. बच्चे उन पाठो को जीवन में कितना उतार पाते हैं यह बच्चों का चरित्र है.

जैसा राजा वैसी प्रजा बहुत पुरानी कहावत है. इसलिए राजाओं का चरित्रवान होना मेरे जैसे आम नागरिक के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है. मुझे संतोष है कि हमारे नेता लगातार चरित्रवान सिद्ध हो रहे हैं पिछले कई घोटालों में अनेक विदेशी ताकतों या विपक्ष ने हमारे नेताओं के चरित्र पर कीचड़ उछालने के प्रयत्न किए पर गर्व का विषय है कि हमारी अदालतों से हमारे नेता बेदाग बरी होकर, फिर से चुनाव लड़कर नये चरित्र प्रमाण पत्र अर्जित कर चुके हैं. यह बात काबिले गौर नहीं है कि अदालत संदेह के आधार पर किसी को सजा देने के पक्ष में नहीं होती, और साक्ष्य के बिना सजा नही देती. और होशियार घोटालेबाज  कभी साक्ष्य नही छोड़ते, या गलती से छूट भी जायें तो केस चलने से पहले नष्ट कर देते हैं, भले ही इसके लिये उन्हें हत्या ही क्यो न करनी पड़ी. चरित्र की रक्षा के लिये हर खतरा उठाना ही पड़ता है.  नेता ही नहीं अभिनेता भी चरित्र प्रमाण पत्र एकत्रित करने में पीछे नहीं हैं.

एक बार एक ग्वाला भैंस खरीदने गया विक्रेता ने उसे 3 भैंसें दिखलाईं पहली भैंस 15 लीटर दूध देती थी और उसका मूल्य 15000 रुपये था, दूसरी भैंस 10 लीटर दूध देती थी और उसका मूल्य 10000 रुपये था, तीसरी भैंस बिल्कुल दूध नहीं देती थी उसका मूल्य 30000 रुपये बताया गया. जब इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा कि आखिर चरित्र की भी तो कोई कीमत होती है. तो भैंस के चरित्र के 30,000 होते हैं. क्रिकेट में खिलाड़ी नीलामी में बिकते हैं, उनका अपना अपना मोल है. एक बड़े वकील साहब ने सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना की, उन्हें एक रुपये की सजा हुई, मैं नही समझ पाया कि  यह मूल्य न्यायालय की अवमानना का था या वकील साहब का. दल बदल कानून की नाक के नीचे, आम आदमी की फिकर करते विधायको सांसदो की हार्स ट्रेडिंग प्रायः अखबारों की सुर्खी बनती है, पर हर बार जब भी सरकार नही गिरती मुझे अपने चुने हुये नेताओ के चरित्र पर बड़ा गर्व होता है, कैसे निकालते होंगे वे बेचारे रिसार्ट्स में वे प्रलोभन भरे दिन सोचना चाहिये.   नेताओं के चरित्र का मूल्य सिर्फ एक मंत्री पद तो नहीं है. तो हमारे, आपके चरित्र का मूल्य हमें स्वयं निर्धारित करना है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 33 ☆ ख़ास चर्चा ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “ ख़ास चर्चा ”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 33 – ख़ास चर्चा ☆

पत्र सदैव से ही आकर्षण का विषय बने रहे हैं। कोई भी इनकी उपयोगिता को, नकार नहीं सकता है। प्रमाण पत्र, परिपत्र, प्रशस्ति पत्र, सम्मान पत्र, अभिनंदन पत्र, परिचय पत्र, प्रेमपत्र, अधिपत्र, इन सबमें प्रशस्ति पत्र, वो भी डिजिटल ; बाजी मारता हुआ नजर आ रहा है। किसी भी कार्य के लिए, जब तक दो तीन सम्मान पत्र न मिल जाएँ, चैन ही नहीं आता। इसके लिए हर डिजिटल ग्रुप में दौड़ -भाग करते हुए, लोग इसे एकत्र करने के लिए जुनून की हद से गुजर रहे हैं। विजेता बनने की भूख सुरसा के मुख की तरह बढ़ती ही जा रही है।

लगभग रोज ही कोई न कोई उत्सव और एक दूसरे को सम्मानित करने की होड़ में, कोरोना काल सहायक सिद्ध हो रहा है। आजकल अधिकांश लोग घर,परिवार व मोबाइल इनमें ही अपनी दुनिया देख रहे हैं। कर्मयोगी लोग बुद्धियोग का प्रयोग कर धड़ाधड़ कोई न कोई कविता,कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, आलेख या कुछ नहीं तो संस्मरण ही लिखे जा रहे हैं।  वो कहते हैं न, कि एक कदम पूरी ताकत से बढ़ाओ तो सही,  बहुत से मददगार हाजिर हो जायेंगे। वैसा ही इस समय देखने को मिल रहा है। गूगल मीट, वेब मीट, जूम और ऐसे ही न जाने कितने एप हैं, जो मीटिंग को सहज व सरल बना कर; वैचारिक दूरी को कम कर रहे हैं।

अरे भई चर्चा तो सम्मान पत्र को लेकर चल रही है, तो ये मीटिंग कहा से आ धमकी। खैर कोई बात नहीं, इस सबके बाद भी तो  सम्मान पत्र मिलता ही है। वैसे समय पास करने का अच्छा साधन है, ये मीडिया और डिजिटल दोनों का मिला जुला रूप।

जब भी मन इस सब से विरक्त होने लगता है, फेसबुक  प्रायोजित पोस्ट पुनः जुड़ने के लिए बाध्य कर देती है। और व्यक्ति फिर से इसे लाइक कर चल पड़ता है, इसी राह पर। यहाँ पर सबसे अधिक रास्ता, मोटिवेशनल वीडियो रोकते हैं। इन्हें देखते ही खोया हुआ आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है। और पुनः और सम्मान पत्र पाने की चाहत बलवती हो जाती है। अपने चित्त को एकाग्र कर, गूगल बाबा की मदद से, सीखते-सिखाते हुए हम लोग पुनः अभिनंदन करने व कराने की जुगत, बैठाने लगते हैं।

खैर कुछ न करने से, तो बेहतर है, कुछ करना, जिससे अच्छे कार्यों में मन लगा रहता है। इस पत्र की लालसा में ही सही, हम सम्मान करना और करवाना दोनों ही नहीं भूलते हैं। जिससे वातावरण व पारस्परिक आचार- व्यवहार में सौहार्दयता बनी रहती है।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 40 ☆ राजभाषा विशेष – मैं हिंदी हूँ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक नवगीत  “मैं हिंदी हूँ.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 40 ☆

☆ राजभाषा विशेष – मैं हिंदी हूँ  ☆ 

 

मैं भारत की प्यारी हिंदी।

जन-जन की उजियारी हिंदी।।

 

मैं तुलसी की सृष्टि बनी।

मैं सूरदास की दृष्टि बनी।।

 

मैं हूँ मीरा की  पथगामी।

मैं हूँ कबीर की सतगामी।।

 

मैं रत्नाकर के छंद बनी।

मैं खुसरो की हूँ बन्द बनी।।

 

मैं घनानंद की प्रवाहिका।

मैं निराला की अनामिका।।

 

मैं बसंत का गीत बनी।

फिल्मों का संगीत बनी।।

 

मैं मोक्षदायिनी गंग बनी।

मैं सप्तरंग का रंग बनी।।

 

मैं ही जीवन का सत्य अटल।

मैं ही भारत का भाग्य पटल।।

 

मैं हूँ तुलसी का रामचरित।

सुरसरिता-सी महिमामंडित।।

 

मैं जयशंकर की कामायनी।

मैं शस्य धरा की प्राणदायिनी।।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाऊस होता होता ☆ श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी

श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी

शिक्षक व साहित्यिक

शिक्षण:  DTM (Diploma in Textile Manufacturing), M.A. (English), M. Ed. (English), DSM (Diploma in School Management),

गुण नैपुण्य : काव्य लेखन, ललित लेखन, वक्तृत्व, चित्रकला, गायन, वादन.

विशेष : 1) विविध साहित्य संमेलनांत निमंत्रित कवी. 2) साहित्य संमेलनाचे आयोजन.

सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक घडामोडींवर सातत्याने ललित व काव्य लेखन. जिल्हास्तरावर शैक्षणिक प्रशिक्षणांमध्ये तज्ज्ञ मार्गदर्शकाची भूमिका.

मिळालेले पुरस्कार : (शिक्षण क्षेत्र) – 1) राज्यस्तरीय आदर्श शिक्षक पुरस्कार – साई समर्थ फौंडेशन, जयसिंगपूर 2) जिल्हा आदर्श शिक्षक पुरस्कार – सहाय्यक आयुक्त, समाज कल्याण विभाग, सांगली 3) शिक्षकांची नवोपक्रम स्पर्धा (महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक संशोधन व प्रशिक्षण परिषद, पुणे) – राज्यस्तरावर निवड

नेशनल बिल्डर अॅवार्ड – इनरव्हील क्लब, सांगली गुणवंत शिक्षक पुरस्कार – केंद्र, बेडग कलाश्री पुरस्कार – चाणक्य नॉलेज अवर्स, कुरूंदवाड  कलाभूषण पुरस्कार – स्वामी विवेकानंद आर्ट पावर

साहित्य क्षेत्र पुरस्कार :

  • महाराष्ट्र भूषणपुरस्कार : जी. एस. प्रतिष्ठान (महाराष्ट्र – कर्नाटक)
  • राज्यस्तरीय नवसाहित्य रत्न प्रतिष्ठा गौरव पुरस्कार : प्रतिष्ठा फौंडेशन
  • राज्यस्तरीय साहित्य रत्न पुरस्कार : कोल्हापूर
  • राज्यस्तरीय उत्कृष्ट बालसाहित्य पुरस्कार : (पुस्तक : संस्कारांची सापशिडी) – ध्यास साहित्य संमेलन, पलूस
  • राज्यस्तरीय शब्दांगण साहित्य गौरव पुरस्कार :  (काव्यसंग्रह : ओळंबा) – शब्दांगण साहित्य संमेलन, मिरज
  • दक्षिण महाराष्ट्र साहित्य सभा (दमसा) विशेष ग्रंथ पुरस्कार – काव्यसंग्रह ”ओळंबा”
  • अग्रणी विशेष काव्यसंग्रह पुरस्कार : (काव्यसंग्रह-ओळंबा) अग्रणी प्रतिष्ठान, देशिंग.
  • उत्कृष्ट काव्यलेखन पुरस्कार : (काव्यसंग्रह-ओळंबा) ग्रामीण मराठी साहित्य संमेलन, पलूस.

सन्मानपत्र : (बालसाहित्य-चौदाखडीची गाणी) अखिल भारतीय शिक्षक साहित्य, कला, क्रीडा मंच, सांगली.

प्रकाशित साहित्य ग्रंथ : 1) चला बनूया चित्रकार – बालसाहित्य 2) पहिला पाऊस – ललित संग्रह 3) संस्कारांची सापशिडी – बालसाहित्य 4) बाराखडीची गाणी – बालसाहित्य 5) ओळंबा – काव्यसंग्रह 6) चौदाखडीची गाणी – बालसाहित्य

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ पाऊस होता होता ☆ श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी ☆ 

थेंबात पावसाच्या होते आग वेडी

जाळूनिया स्वतःला ती होते पाऊस थोडी

 

पाऊस होताच मग ती फिरते माळ रानी

कानात डोंगराच्या घुमतात गुज गाणी

 

दुःख शुष्क तृणाचे सरते उजाड रजनी

पाकळ्यांच्या दर्प ओठी ती होऊन जाते लाली

 

तालात या पिकांच्या ती पेरते नृत्य बोली

ओंजळीत आयुष्याच्या सजतात फुल वेली

 

पाऊल वाट तिच्याने होते अबोल थोडी

गंधाळल्या चराची ती वाट नागमोडी

 

चोचीत पाखरांच्या ती गाते गीत अंगाई

पिलास छत्र देई ती होऊन जाते आई

 

खिन्न त्रासल्या जीवाची काढते ओढून ढलपी

ती जाते देऊन देहा नितळ नवेली कांती

 

पाऊस होता होता ती बोलते पाऊस वाणी

का आग तिला म्हणावे सांगेल मज कोणी?

 

©  श्री महेशकुमार गुंडाप्पा कोष्टी

मिरज, जि. सांगली

मोबाईल : 9922048846

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मनोगत ☆ श्री आदित्य

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ मनोगत ☆ श्री आदित्य ☆ 

 

भेटणं नाही, बघणं नाही, फक्त बोलता तरी यावं,

मैफिलीतलं गाणं, दूरून ऐकता तरी यावं.

 

आठवणींची किती पानं परत परत उलटली,

तूझ्याविना आयुष्य शून्य, याची ओळख पटली.

 

काय हवयं तूला? देवानं एकदा तरी पुसावं,

तूझ्या सोबतीचं दान माझ्या नशिबी लिहावं.

 

©️  श्री आदित्य

१०.०५.२०२०

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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