सुश्री समीक्षा तैलंग

(अबू धाबी से सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री समीक्षा तैलंग जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। आप हिन्दी एवं मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं में पारंगत हैं और इसके साथ ही व्यंग्य की सशक्त हस्ताक्षर हैं। सुश्री समीक्षा जी के साहित्य की समीक्षा सुधि पाठक ही कर सकते हैं। अतः यह जिम्मेवारी आप पर। प्रस्तुत है सुश्री समीक्षा जी का तीक्ष्ण व्यंग्य “उन्हें सिर्फ भीख मांगने का अधिकार है, वोट का नहीं”।)
☆ उन्हें सिर्फ भीख मांगने का अधिकार है, वोट का नहीं ☆
उस दिन राह से गुजरते हुए एक तरफ विशाल और सिद्ध कहा जाने वाला शिव मंदिर सरेराह आ ही गया। सरेराह दुकानें भी थीं, भिखारी भी, नेता भी, फूलवाले, प्रसाद बेचने वाले और हमारे जैसे आम लोग भी। चलते फिरते सब एक दूसरे से भिड़ रहे थे। मतलब, राह में कोई भी किसी से भिड़ सकता है, मिल सकता है और खरीद भी सकता है। खरीदफरोख्त का बाजार ऐसे ही थोड़े बुना है। बुनने के बाद भुनाना यही परिपाटी है इस बाजार की। भिड़ने की जुगलबंदी में मिलना कम होता जा रहा है। कोई किसी से भी भिड़ जाने को तैयार है। स्वार्थ या निस्वार्थ दोनों ही भावों में…। भाव गिरने गिराने में भी भिडंत तो होती ही है। भिडंत न हो तो भाव वहीं का वहीं ठहर जाता है। ठहरा हुआ भाव भी किसी काम का नहीं। उसे भी न पूछेगा कोई…। उसका भाव वही है जो पुरानी चप्पल का है। पहन तो सकते हैं पार्टी के लायक नहीं। मतलब भाव बढ़ने में भिड़ंत का अमूल्य योगदान है। अमूल्य होना हर किसी के बस की बात नहीं। जैसे सोने का भाव पीतल तो कतई नहीं ले सकता। सोने के गहनों में पीतल मिलाने के बाद भी गहने सोने के ही कहे जाते हैं।
वे अमूल्य नहीं थे। उनके जन्म का भी कोई मूल्य नहीं था। लोगों के हिसाब से वे धरती पर भार हैं। या भार बना दिये गये हैं। लेकिन धरती का गुरुत्वाकर्षण उतना ही लग रहा था। फिर वो भार हो या आभार। लगने वाले बल का वस्तु की दिशा और दशा से कोई फर्क नहीं पडता। वो बल भेदभाव नहीं करता। उसकी मंदिर के सामने कटोरा लेकर बैठा भिखारी मंदिर में अभिषेक करता उस नेता की भांति दिख रहा था। उसकी झोली पसरी हुई थी। मेरी आंखें हर उस भीख मांगने वाले को भिखारी ही समझती है। मंदिर के सामने एक लाईन में बैठे भिखारी भी दान करने वाले को देवता ही समझता है। उसके रोटी और कपड़े की व्यवस्था का जिम्मा उसी दानदाता पर है। सरकार पर नहीं। मंदिर की घंटियां बजाने वाला नेता खुद भिखारी होते हुए लाईन से बैठे भिखारियों को नजरंदाज करता है। क्योंकि वह दुआओं का नहीं बल्कि वोट का भूखा है। उसे पता है कि लाईन में बैठे भिखारी उसकी वोटर लिस्ट में नहीं। इसीलिए उसके लिए किसी तरह के वादे या दावे की भी जरूरत नहीं। उसके लिए मकान की व्यवस्था करना बेमानी है। समय और पैसा नष्ट करने वाली स्कीम है। इसीलिए वह उनके लिए कोई स्कीम तैयार नहीं करता। क्योंकि उसमें आवक नहीं है। मकान न होते हुए भी उन भिखारियों का वंश बढ़ता चलता है। बेहाल सी फटे कपड़ों में लिपटी वह स्त्री देह किसके वंश की वृद्धि कर रही है उसे पता भी नहीं। हर चलता फिरता राहगीर उस देह पर अधिकार समझता है। लेकिन बढ़े हुए वंश पर कोई दावा नहीं ठोकता। उन पागल, मंदबुद्धि देह पर बिन पैसों का व्यापार इसी तरह चलता रहता है। उनकी नजरों में सड़कों पर रतजगा करने वाले किसी शख्स को न्यौते की दरकार नहीं।
© समीक्षा तैलंग
अबु धाबी (यू.ए.ई.)






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