(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – अब तो जागो…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७८ – अब तो जागो…१
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “न जाने क्या क्या संज्ञा दें – ...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “न जाने क्या क्या संज्ञा दें – ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
आज हमारा देश आजाद है।सवर्णों के जोर-जुल्म आज भी देखने को मिलते हैं।आज भी हिन्दू-धर्म में वर्ण व्यवस्था के कारण उपजी जाति व्यवस्था का कीचड़ समाज की समानता को विकृत कर रहा है।अभी हाल ही में प्रकाशित श्री जयपाल जी का काव्य संग्रह बंद दरवाजे दलित चिंतन की मुखर आवाज़ है। उन्होनें समाज का सामाजिक ऑपरेशन,आर्थिक परीक्षण,तथा नैतिक मूल्यांकन किया है।अवलोकन के दौरान दलित वर्ग के लिये दरवाजे बंद पाये गये,उनके जीवन को निम्न समझा गया,मनुस्मृति के अग्निकुंड में डाला गया। इस पुस्तक में श्री जयपाल जी अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को जागृत करते हैं तथा समाज में दलितों के प्रति घृणित स्थिति के सब दरवाजे तोड़ते हैं,वे तर्क-वितर्क के साथ जबरदस्त विचार प्रस्तुत करते हैं।वह सवर्णों के जुल्म और अत्याचारों को आज भी पहले की तरह देख रहे हैं।उनकी कवितायेँ जिन संघर्षों से निकलकर आई हैं समाज की सच्ची तस्वीर नजर आती है और वह अपनी बात तर्क-वितर्क के साथ ललकारता है।
श्री जयपाल
आज के दौर में भी दलितों के लिये उनके दिमाग के दरवाजे बंद हैं
मैं क्या कहूँ उस गाँव को
जो सबका है पर उसका नहीं
उन गाँव के कुत्तों को
जो मुझे देखकर ही भौंकते हैं।
जनकवि श्री जयपाल जी की कविताओं में दलित महिलाओं की आवाज़ भी मुखर होकर बोलती है और यह पुस्तक सदियों से चली आ रही महिलाओं के प्रति सडांध युक्त मानसिकता को मिटाना चाहती है।वह ठाकुर के कुएं से बिना झिझक पानी भरना चाहती है। यह पुस्तक ब्रह्म हत्या और दलित हत्या के अन्तर को पाटना चाहती है। सवर्ण-समाज को दलित लडके द्वारा सवर्ण जाति की लड़की से शादी करना अखरता है,दलित व्यक्ति के सरपंच बन जाने से सवर्णों को दस्त लग जाते हैं । लेकिन अपने लिये उन्हे वोट चाहिए फिर तो वे पाँव तक पकडते हैं ,उन्हे भूख बहुत लगती है,वे झूठे बेर भी खा जाते हैं,चुनाव के समय वे दलितों के घर की गाय का गोबर और मूत तक पी सकते हैं। जूठी पत्तल के माध्यम से दलित महिला के तन-मन पर क्या गुजरती है, जूठी-पत्तल कविता में बड़ी ही मार्मिक स्थिति का वर्णन है।
कुछ पँक्तियाँ देखिये-
गालियां खाकर,फटकार पाकर
बड़ी मुश्किल से जंग जीतकर
आती थी माँ बच-बचाकर
छिप-छिपाकर कुत्तों बिल्लों से
माँ आती थी घंटों इंतजार करवाकर।
वह मुखर होकर खड़ी हो जाती है और ‘मैं चाहती हूँ’, कविता के माध्यम से स्पस्ट कर देती है-
छोड़ देना चाहती हूँ वे रास्ते
जो सिर्फ मेरे लिये ही बनाये गये हैं
मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं
जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती है।
ये पँक्तियाँ हर महिला के लिये महत्वपूर्ण हैं।इस कविता संग्रह में जाति के दंश को झेलती हुई बस्तियां , सवर्णों की घिनौनी हरकतों और अत्याचारों को तो सहती हैं, मौसम की मार भी सहती है।हम उनके लिये कितना भी नाच लें या गा लें लेकिन फिर भी जाति उनके दिलों में उतर गई है– जाति है कि जाति नहीं।इन बस्तियों में रहने वाले लोगों को वे गंदी नाली के कीड़े और न जाने क्या-क्या कहते हैं।मुखिया के नाम शोक-पत्र कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए –
ना रस्सा टूटा,ना खूँटा ही
हम ही टूट गये बँधे-बँधाए
और सवर्णों की पगड़ी सदा कलफदार रही।’यह हमारा समय है’ कविता में कवि ने शूद्रों और सवर्णों दोनों के एक होने की कल्पना की है । वक्त की मार सब पर पड़ती है
वह तुम्हारा समय था
केवल तुम्हारा
उसमें हम कहीं नहीं थे
थे भी तो तुम्हारी जूती के नीचे
यह हमारा समय है तुम्हारा भी है
यहीं रहना है हमें भी और तुम्हें भी
अपने समय के सवालों का जवाब देते हुए।
सिरफिरे कविता में फिर से शंबूक का सिर,एकलव्य का अंगूठा नजर आने लगा है। हमारा मारा जाना उनका विकास-क्रम है। प्राकृतिक रूप से शरीर की एक समान संरचना जाति के कारण कुछ लोग पवित्र बने हुए हैं और कुछ अपवित्र। तथाकथित लोगों को घुड़चढ़ी का सवाल,घुड़चढ़ी से खतरा,घोड़ी और घुड़चढ़ी जैसी कविताएँ अप्रत्याशित जंग नजर आती हैं।उन्हें घोड़ी पर चढ़ना देश के शासन पर चढ़ने जैसा लगता है।एक बार फिर कठिनाइयों का वक्त आने लगा है,एक बार फिर कवि अपने काव्य-संग्रह के माध्यम से ये सब भेदभाव बिना लाग-लपेट के उठाता है।दलितों को संविधान से जीवन में संपूर्ण बदलाव की स्वतंत्रता भी मिली लेकिन कवि मानता है कि कुछ नहीं बदला।कवि जोर देकर कहता है-
मै एक हजार साल पहले की नहीं
आज के भारत की बात कर रहा हूँ।
हजारों साल से दलित बस्तियाँ देवी-देवता,धर्म-ग्रंथ,धर्म-स्थल आदि के उत्पीड़न का शिकार रहे हैं।इस उत्पीड़न के बाद भी कवि मानवीयता के गुण को नहीं छोड़ता।स्वर्ग-नरक की बिडंबना मनु के समर्थन के गीत गाती है लेकिन कवि समाज को सजग करने का काम करता है ,वह सतगुरु रविदास जी के बेगमपुरा और संविधान की प्रस्तावना पर काम करता हुआ नजर आता है।धर्म का आडम्बरपना और जाति का डायनासोर इक्कीसवीं सदी में भी निगलने को तैयार है। इस काव्य- संग्रह की प्रत्येक रचना दिमाग के बंद दरवाजों को धक्के मार-मारकर खोलती है।श्री जयपाल श्री ओम प्रकाश वाल्मीकि व श्री मोहन दास नैमिशराय आदि दलित चिंतन के कवियों के समान स्वतंत्रता,समानता,बन्धुत्व का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
श्री जयपाल जी की कविताओं में सरलता,स्पष्टता और आँदोलन-धर्मिता नजर आती है।उनकी मुहावरे में कविता है और कविता में मुहावरा है।भाषा की दृष्टि से कविताएँ भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण हैं।कहीं-कहीं अलंकार भी स्वतः समा गये हैं।उनकी कवितायेँ साहित्यिक दृष्टि से ऐतिहासिक हैं।कवि महोदय को बंद दरवाजे काव्य संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद !!
समीक्षा– श्री दयाल चंद जास्ट
मो – 9466220146
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.
As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.
Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.
Some precious moments of life
Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.
Today we present his Story – The Secret of the Blue Notebook.
☆ Witful Warmth# 68 ☆
☆ Story ☆ The Secret of the Blue Notebook… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆
The halls of St. Jude’s Academy were buzzing. For Aryan, a bright but easily distracted 14-year-old, the world had recently narrowed down to one person: Zoya.
Zoya was new, brilliant at math, and had a laugh that made Aryan forget his own name—and more importantly, his upcoming mid-term exams. He spent his history lessons sketching her profile in the margins of his notebook instead of taking notes on the French Revolution. He was convinced this was “the one,” a deep and eternal love that adults just didn’t understand.
One Tuesday, Aryan found a folded slip of paper in his locker. It smelled faintly of jasmine—the same scent as Zoya’s stationery. It read:
“I see how you look at me. I feel the same. But we have a mission first. Meet me at the old banyan tree behind the library at 5:00 PM on Friday. Bring your Physics notes. Don’t tell a soul.”
Aryan’s heart did a somersault. A secret meeting! A mission! For the next three days, he was in a trance. He barely ate, and he definitely didn’t study. He spent hours imagining their future together, convinced that this “love” was the most important thing in the universe. He felt like a hero in a romantic movie.
Friday arrived. Aryan reached the banyan tree, his heart thumping like a drum. The sun was setting, casting long, eerie shadows. Zoya was already there, but she looked serious—almost cold.
“Did you bring the notes?” she whispered, her eyes darting around.
“Yes,” Aryan stammered. “Zoya, I’ve wanted to tell you—”
“Quiet,” she interrupted, looking around. “The ‘Council’ is watching. If we don’t pass the Physics Finals with 90% or above, we fail the mission. Our connection will be severed forever. We must work. Now.”
For the next two hours, they didn’t talk about feelings. They solved circuits, calculated velocity, and memorized Newton’s laws. It was the most intense studying Aryan had ever done. Every time he tried to say something romantic or hold her hand, Zoya would point to a complex formula and say, “Focus, Aryan. The future depends on it.”
The exams came and went. Aryan, fueled by the desire to “save his love” and impress Zoya, performed better than he ever had. He stayed up late, not dreaming of her, but solving the problems she had challenged him with. On the last day of school, he waited for Zoya by the tree, ready to finally confess his feelings now that the “mission” was over.
Zoya arrived, but she wasn’t alone. She was walking with the School Principal, Mr. Khanna.
Aryan froze. Was he in trouble? Had someone found out about their secret meetings?
“Ah, Aryan,” Mr. Khanna smiled, looking quite pleased. “Zoya tells me your Physics paper was the best in the grade. Excellent improvement. I’m impressed.”
Zoya looked at Aryan and handed him a final note. “Read this when you get home,” she said with a mysterious wink, before walking away toward the faculty office with the Principal.
Aryan ran home and tore open the envelope. He expected a love poem or a date invitation. Instead, he found a printed certificate and a short letter:
“Dear Aryan,
I’m not actually a student. My name is Zoya Malhotra, and I am a 22-year-old Child Psychology intern working on a thesis called ‘The Power of Academic Redirection.’
The Principal noticed your grades were dropping because of a ‘crush’ on the new girl (me). He asked me to help you use that ‘attraction’ as a fuel for your studies. That ‘spark’ you felt? It was just biology, a bit of mystery, and a lot of your own imagination. It felt like love, but it was just a distraction. However, the 95% you got in Physics? That’s real, and that’s yours forever.
P.S. Stay focused. Your brain is much more interesting than your heart at fourteen!”
Aryan sat on his bed, mouth agape. He had been “played” by a psychologist! He felt a bit embarrassed, but then he looked at his marksheet. For the first time, he realized that while the crush had faded the moment he knew the truth, the pride of his success felt much, much better.
(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रति – निदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अंतरात्मा.)
🌱 लघुकथा – अंतरात्मा🌷
“बिटिया ख़ूब मन लगाकर पढ़ना. मेडिकल का आखरी वष॔ है. अरे हाँ! हमारे सारे परिवार में तुम पहली लड़की होंगी,जो हमारे किसान परिवार में डॉक्टर बनेंगी. “अपने बाबा की यह बातें सुनकर सुमति गवि॔त हो उठती थी.
आज सुबह से ही वह कुछ बेचैन सी थी. उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था. रह रहकर उसे रमेश की बातें याद आ रही थी. कुछ दिन पहले वह मोबाईल पर कह रहा था कि हम दोनों का परिवार हमारे विवाह के सख्त खिलाफ है. हम दोनों ही वयस्क है. मौका मिला तो भागकर कोट॔ मॅरेज कर लेंगे. आज सुबह भी उसने उसी बात को दोहराते हुए कहा कि “आज संध्या सात बजे मैं पुराने बस स्टैंड के पास, तुम्हारा इंतेजार करूंगा”. और आगे समझाते हुए यह भी कहा कि “आते समय जितना भी रूपया व ज़ेवरात समेट सकती हो. समेट लेना. सफर में काम आएंगे. सुमति रमेश के बारे में सोचने लगी कि उसे रमेश से बचपन से लगाव रहा है. वह सुंदर व्यक्तित्व का होते हुए, एक संपन्न परिवार का इकलौता बेटा है उनमें केवल जाति का अंतर था. वह अच्छी नौकरी की तलाश में लगा हुआ है. देखते देखते निर्णय की घड़ी पास आ गयी थी शाम के पांच बजने को आ गये थे. उतने में पिताजी ने आवाज लगायी और कहने लगे- “बेटा ,मैं तुम्हारी माँ के साथ दोस्त के घर काय॔क्रम में जा रहा हूँ. जल्दी ही लौटेंगे. छोटी सो रही है. ध्यान रखना” कहकर वे दोनों बाहर चले गये. सुमति ने मौके फ़ायदा उठाते हुए. अलमारी से नगदी व ज़ेवरात समेटकर कर अपने कपडों के सूटकेस में रख लिया. निकलने से पहले मंदिर वाले कमरे में जाकर अपने कुल देवता बाप्पा मोरया के सामने प्राथ॔ना करते हुए आंखें बंद कर के बैठ़ गयी. तभी उसे ऐसे लगा कि बंद आँखों में कुछ अदृश्य सा प्रतित हो रहा है. जैसे उसे उसकी अंतरात्मा कह रही हो ,” तुम क्या करने जा रही हो?अपने माता पिता से विश्वासघात कर रही हो. जिन्होंने तुम्हे पढ़ा लिखा कर समाज मे जीना सिखाया है. सिफ॔ क्षणिक सुख के लिए अपने परिवार के माथे पर कलंक लगा रही हो”. इतना सुनते ही उसका मन उद्वेलित हो उठा. जैसे ही उसने आंखें खोली ,तो ऐसा लगा कि कोई उसके आसपास था. वह वहां से तुरंत उठी और अपना सूटकेस खोल कर नगदी व ज़ेवरात निकालकर उन्हें अलमारी में जैसे थे वैसे रख दिये. तभी मोबाईल की आवाज़ सुनाई दी. उठाकर देखा तो रमेश के दस मिस काॅल दिखे.
इतने में बाहर के दरवाजे पर थप थप की आवाज सुनाई थी. सुमति ने घड़ी की ओर देखा. आठ बज रहे थे. उसने मोबाईल बंद कर दिया और दौड़ते हुए गयी और दरवाजा खोला. दरवाज़े पर माता पिता को देखा तो अपने बाबा से लिपटकर फूट फूट कर रोने लगी.
“अरे बेटा क्या हुआ. क्यों रो रही हो?”
“कुछ नहीं , बाबा, मैं ख़ूब मन लगाकर पढूंगी. हमारे परिवार की पहली डॉक्टर बनूंगी. आपका नाम रोशन करूंगी”. कहते हुए कुलदेवता की मूर्ति के सामने जाकर बैठ़ गयी और मन ही मन कहने लगी “बाप्पा मोरया आपने आज हमारे परिवार की लाज बचा ली. “
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगीत चिकित्सा…“।)
अभी अभी # ९५७ ⇒ आलेख – संगीत चिकित्सा श्री प्रदीप शर्मा
लिपटन माने अच्छी चाय!
संगीत चिकित्सा माने
म्यूज़िक थेरेपी।
जहाँ चाह, वहाँ राह! चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत चिकित्सा की कई प्रणालियों का समावेश होता है। जिनमें देसी, विदेशी और यूनानी पद्धति प्रमुख हैं। हमारे देश में प्रमुखतः एलोपैथी, होमियोपैथी और नेचुरोपैथी का प्रचलन अधिक है। महर्षि धन्वन्तरी की आयुर्वेदिक चिकित्सा आज भी अपना महत्व रखती है।
मर्ज़ बढ़ता गया, ज्यूं ज्यूं दवा की! जब रोग असाध्य हो जाता है, तो इंसान सभी पेथियों को लात मार थेरैपी पर उतर आता है। चिकित्सा भी स्थूल से सूक्ष्म पर उतर आती है। कहीं यौगिक क्रिया, कहीं रेकी तो कहीं एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर का सहारा लिया जाता है। जोड़ों और नसों के दर्द के लिए अगर फिजियोथेरेपी है तो पेट की समस्याओं के लिए हायड्रोथेरैपी।।
जो योग आत्मा से परमात्मा को जोड़ता था, वह इंसान को रोगमुक्त करने के काम आने लग गया। सही भी है! पहले रोग-मुक्त तो हो जाएं, मुक्ति और मिलन बाद की बात है। कुंडलिनी को जब जागना होगी, जाग लेगी! पहले रात को चैन की नींद और सुबह खुलकर शौच तो हो ले। कहा भी है, पहला सुख निरोगी काया।
स्वच्छता और स्वास्थ्य ही हमारी मूलभूत आवश्यकता है। देश से बीमारी और गंदगी दूर करने का बीड़ा केवल राजयोगी और योगी मिलकर ही उठा सकते हैं। बाबा रामदेव और मोदी हैं, तो यह मुमकिन है। दोनों की अपनी अपनी आलीशान दुकान है।।
संगीत और आध्यात्म तन की नहीं, मन की साधना है। कौन जानता था कि जो कभी सङ्गीत महाविद्यालय था, वह आगे चलकर संगीत चिकित्सालय का रूप धारण कर लेगा। जिस तरह आसन और प्राणायाम का उपयोग बीमारियां ठीक करने के लिए किया जाने लगा है, संगीत से भी आजकल रोगोपचार किया जा रहा है।
मुझे रात को नींद नहीं आती आचार्य जी! ऐसा कीजिए, आप रोज रात को आधा घंटा, राग यमन सुना कीजिये, आपको तुरंत नींद आ जाएगी। शास्त्रीय संगीत की सभा में इसका मुझे कई बार अनुभव हुआ है। म्यूजिकथेरेपी का दावा है कि इसका असर कोमा के मरीज पर भी संभव है। मन की सूक्ष्म तरंगें अवचेतन में संगीत की स्वर-लहरियों से आंदोलित होने लगती हैं। स्वर की साधना परमेश्वर की साधना तो है ही, असाध्य रोगों पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।
इसमें कोई शक नहीं कि संगीत संजीवनी का काम करता है। जिन्हें शास्त्रीय संगीत से एलर्जी है, उनके लिए शास्त्रीय रागों पर आधारित फिल्मी गाने हैं न।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “दूरियां…”`।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘तुम्हारे एहसास ने…‘।)