(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक एक लघु व्यंग्य रचना “– धर्म – वृक्ष…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ लघु व्यंग्य # ९९ — धर्म – वृक्ष —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
एक अजीब अनोखा सा वृक्ष उग आया था। उसमें चंदन की सुगंध थी। उसे धर्म – वृक्ष नाम दिया गया था। पर उस पेड़ के प्रति अपमान का एक पहलू भी हुआ। लोग उस वृक्ष की टहनियाँ तोड़ कर अपने – अपने घर ले जाने लगे थे, क्योंकि उनसे चूल्हे खूब जलते थे। जिस दिन अंतिम टहनी तोड़ी गई थी उसी दिन पूरा वृक्ष सूख गया था। अब तो युग बीते। पीढ़ी दर पीढ़ी वहाँ उस वृक्ष की बात अब भी होती है। दुहाई यहाँ तक दी जाती है एक हमारा ही देश हुआ जहाँ धर्म – वृक्ष हुआ करता था। तब तो इसे विडंबना ही मानें, धर्म का क्षय सब से अधिक उसी देश में हुआ है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२८ ☆ परिवर्तन का संवत्सर…
नूतन और पुरातन का अद्भुत संगम है प्रकृति। वह अगाध सम्मान देती है परिपक्वता को तो असीम प्रसन्नता से नवागत को आमंत्रित भी करती है। जो कुछ नया है स्वागत योग्य है। ओस की नयी बूँद हो, बच्चे का जन्म हो या हो नववर्ष, हर तरफ होता है उल्लास, हर तरफ होता है हर्ष।
भारतीय संदर्भ में चर्चा करें तो हिन्दू नववर्ष देश के अलग-अलग राज्यों में स्थानीय संस्कृति एवं लोकचार के अनुसार मनाया जाता है। महाराष्ट्र तथा अनेक राज्यों में यह पर्व गुढी पाडवा के नाम से प्रचलित है। पाडवा याने प्रतिपदा और गुढी अर्थात ध्वज या ध्वजा। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था। सतयुग का आरंभ भी यही दिन माना गया है।
स्वाभाविक है कि संवत्सर आरंभ करने के लिए इसी दिन को महत्व मिला। गुढीपाडवा के दिन महाराष्ट्र में ब्रह्मध्वज या गुढी सजाने की प्रथा है। लंबे बांस के एक छोर पर हरा या पीला ज़रीदार वस्त्र बांधा जाता है। इस पर नीम की पत्तियाँ, आम की डाली, चाशनी से बनी आकृतियाँ और लाल पुष्प बांधे जाते हैं। इस पर तांबे या चांदी का कलश रखा जाता है। सूर्योदय की बेला में इस ब्रह्मध्वज को घर के आगे विधिवत पूजन कर स्थापित किया जाता है।
माना जाता है कि इस शुभ दिन वातावरण में विद्यमान प्रजापति तरंगें गुढी के माध्यम से घर में प्रवेश करती हैं। ये तरंगें घर के वातावरण को पवित्र एवं सकारात्मक बनाती हैं। आधुनिक समय में अलग-अलग सिग्नल प्राप्त करने के लिए एंटीना का इस्तेमाल करने वाला समाज इस संकल्पना को बेहतर समझ सकता है। सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा तरंगों की सिद्ध वैज्ञानिकता इस परंपरा को सहज तार्किक स्वीकृति देती है। प्रार्थना की जाती है,” हे सृष्टि के रचयिता, हे सृष्टा आपको नमन। आपकी ध्वजा के माध्यम से वातावरण में प्रवाहित होती सृजनात्मक, सकारात्मक एवं सात्विक तरंगें हम सब तक पहुँचें। इनका शुभ परिणाम पूरी मानवता पर दिखे।” सूर्योदय के समय प्रतिष्ठित की गई ध्वजा सूर्यास्त होते- होते उतार ली जाती है।
प्राकृतिक कालगणना के अनुसार चलने के कारण ही भारतीय संस्कृति कालजयी हुई। इसी अमरता ने इसे सनातन संस्कृति का नाम दिया। ब्रह्मध्वज सजाने की प्रथा का भी सीधा संबंध प्रकृति से ही आता है। बांस में काँटे होते हैं, अतः इसे मेरुदंड या रीढ़ की हड्डी के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। ज़री के हरे-पीले वस्त्र याने साड़ी-चोली, नीम व आम की माला, चाशनी के पदार्थों के गहने, कलश याने मस्तक। निराकार अनंत प्रकृति का साकार स्वरूप में पूजन है गुढी पाडवा।
कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में भी नववर्ष चैत्र प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। इसे ‘उगादि’ कहा जाता है। केरल में नववर्ष ‘विशु उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। असम में भारतीय नववर्ष ‘बिहाग बिहू’ के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में भारतीय नववर्ष वैशाख की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इससे ‘पोहिला बैसाख’ यानी प्रथम वैशाख के नाम से जाना जाता है।
तमिलनाडु का ‘पुथांडू’ हो या नानकशाही पंचांग का ‘होला-मोहल्ला’ परोक्ष में भारतीय नववर्ष के उत्सव के समान ही मनाये जाते हैं। पंजाब की बैसाखी यानी नववर्ष के उत्साह का सोंधी माटी या खेतों में लहलहाती हरी फसल-सा अपार आनंद। सिंधी समाज में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘चेटीचंड’ के रूप में मनाने की प्रथा है। कश्मीर में भारतीय नववर्ष ‘नवरेह’ के रूप में मनाया जाता है। सिक्किम में भारतीय नववर्ष तिब्बती पंचांग के दसवें महीने के 18वें दिन मनाने की परंपरा है।
सृष्टि साक्षी है कि जब कभी, जो कुछ नया आया, पहले से अधिक विकसित एवं कालानुरूप आया। हम बनाये रखें परंपरा नवागत की, नववर्ष की, उत्सव के हर्ष की। साथ ही संकल्प लें अपने को बदलने का, खुद में बेहतर बदलाव का। इन पंक्तियों के लेखक की कविता है-
न राग बदला, न लोभ, न मत्सर,
बदला तो बदला केवल संवत्सर।
परिवर्तन का संवत्सर केवल काग़ज़ों तक सीमित न रहे। हम जीवन में केवल वर्ष ना जोड़ते रहें बल्कि वर्षों में जीवन फूँकना सीखें। मानव मात्र के प्रति प्रेम अभिव्यक्त हो, मानव स्वगत से समष्टिगत हो।
सभी पाठकों को शुभ गुढी पाडवा। नव संवत्सर आप सबके लिए शुभ हो।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Still Seeking…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
☆ आलेख ☆ “रानी झांसी जैसे नारी-वाद की सर्जक – डा. मुक्ता” ☆ श्री सिमर सदोष ☆
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डा. मुक्ता एक विदुषी लेखिका हैं। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी है। वह प्रतिभाशाली कवयित्री हैं। वह प्रसिद्ध कथा-लेखिका हैं। उनकी लघु-कथाओं में एक साथ, एक से अधिक संवेदनाओं की सरिताएं प्रवाहमान होते दिखाई देती हैं। इनकी कहानियों का सुर और स्वर भी अनेकानेक आयाम अपने साथ लिये चलते हैं। इनकी कहानियां सरपट नहीं चलतीं, खरामा-खरामा आगे बढ़ती हैं, और आगे बढ़ते जाने की इस यात्रा के दौरान पीछे से लाया गया कुछ यहां-वहां छोड़ती रहती हैं, और यहां का बहुत कुछ अपने अंग-संग लिये अगली मंज़िल की ओर सरक जाती हैं।
उन्होंने निबंध भी लिखे हैं। चिन्ता को चिन्तन का आवरण ओढ़ा कर डा. मुक्ता ने अपने इस निबंध संग्रह में मनुष्य को जीने का तरीका और सलीका तो सुझाया ही है, ज़िन्दगी सार्थकता को किस मुकाम पर हासिल किया जा सकता है, यह लब-ओ-लुबाब भी इस संग्रह का निष्कर्ष है।’ आधुनिक काव्य में प्रकृति’ डा. मुक्ता जी का आलोचना साहित्य है।
प्रकृति काव्य की प्रारम्भ से सहोदर रही है। कविता किसी भी काल-युग में लिखी गई हो, प्रकृति कदम-कदम और शाना-ब-शाना उसके साथ-साथ चली है। अपने दौर की कविता में प्रकृति के कदमों के निशानों और हाथों के स्पर्श को ढूंढने के प्रयत्नों का प्रतिरूप है यह संग्रह। डा. मुक्ता के आलोचनापरक स्वर और स्पर्श भी ऐसे हैं जैसे कोई यौवना किसी उपवन के फूलों को अपने मेहंदी-युक्त हाथों से हौले-हौले सहला रही हो।
डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक,हरियाणा साहित्य अकादमी
डा. मुक्ता ने अब तक नौ कविता संग्रह समाज की झोली में डाले हैं। इनमें एक ग़ज़ल संग्रह और एक मुक्तक संग्रह भी है। पांच लघुकथा संग्रह भी उनकी साहित्यिक निधि का हिस्सा हैं। एक कहानी संग्रह, एक निबन्ध संग्रह, एक आलोचना कृति भी उनके हिस्से में है। इनकी कविताओं में आस्था और भक्ति के साथ स्नेह के अनेक स्त्रोत बहते प्रतीत होते हैं। इनकी कविताओं का स्वर बूंद-बूंद श्रद्धा भाव के घट को भरते महसूस होता है। डा. मुक्ता का काव्य-स्वर मौन की समाधि के बाद उपजे ओम् के नाद जैसा है।
इसी प्रकार डा. मुक्ता की कहानियों और लघु कथाओं की सत्ता भी शब्द और स्वर की अनुभूतियों से परिपूर्ण है। इनकी लघुकथाओं से यथार्थ की उर्वरा भूमि पर कल्पना का बीज बोया गया है। इनकी लघुकथाएं पथिक की ज्ञान-क्षुधा को शांत करती हैं, तो आम जन की आकांक्षा की भूख भी मिटाती हैं। इनकी लघुकथाएं जितनी मैंने पढ़ी/जानी हैं- सतसैया के दोहरों जैसी हैं-आकार में छोटी किन्तु प्रहार में तीक्ष्ण। वे अपने होने का आभास तो देती हैं, परंतु अपनी सत्ता के मद का प्रदर्शन करने के लिए घाव नहीं देतीं। इनकी कथा-कहानी ज़िन्दगी में यथार्थ की उदात्त अभिव्यक्ति होती है। साधारण भाषा-शैली में लिखी गई इनकी कहानियां समर्पण भाव को अधिक तरजीह देती हैं।
बहुत भला लगता है, अक्सर… मध्य आकाश में जगे चांद की बीथियों में उस दादी नानी मां के अक्स की तलाश करना जो किसी एक कोने में बैठ सदियों से कात रही है चरखा। तब भी बहुत भला लगता है…. वसन्त से पहले प्रहर की उगती हुई स्वर्ण जैसी धूप के बालों में से, अपनी उंगलियों के पोरों से नर्म आभा की तलाश करना (‘अंजुरी भर धूप’ डा. मुक्ता का लघु कथा संग्रह है)।
गेहूं की हरितमा के बीच, सरसों के पत्तों पर से उतरती आती किसी बीर बहूटी के मखमली पांवों को अपनी हथेली पर रख, हल्की-हल्की गुदगुदी को महसूस करना किसे भला नहीं लगता। सच, एक ऐसा संगीत उभरता है तब जो रूह तक सुकून दे जाता है। दिसम्बर के पहले पक्ष की किसी अल-सुबह, किसी जंगल-बेले में आप-मुहारे उग आए किसी जंगली गुलाब की पत्ती पर फिसलते-फिसलते अटक गई ओस की किसी बूंद के भीतर सिमटे/दुबके आकाश के अस्तित्व को महसूस करने के लिए वैसी आंखें चाहिएं जैसी तूर के नूर को देखने के वक्त मूसा के पास थीं। संगीत के इस सुर को गीत के स्वर द्वारा छू लेने के बीच का सफ़र बेशक ख़ामोशियों के फूलों से सराबोर हो सकता है, लेकिन इन फूलों से सटी पत्तियों की सरसराहट की आवाज़ एक ऐसे वातावरण का सृजन करती है जिसमें ज़िन्दगी है, जिसमें सृष्टि है (‘ख़ामोशियों का सफ़र’ डा. मुक्ता का कहानी संग्रह है)।
शहरों की तारकोल से सनी स्याह सड़कों के कोलाहल की अपनी एक भिन्न भाषा होती है, एक भिन्न ज़िन्दगी होती है, जो बेशक आम जैसी होती है-वही शोर-गुल, वही चिल्ल-पों… चुप्पी और मौन भी एक-से होते हैं, परन्तु गांवों की पगडंडियों पर से सुबह की आगे बढ़ती बेला, और सायं को धुंधलके के बीच में उपजती गो-धूलि के समय, गाय-बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं की आवाज़ से जो संगीत उपजता है, वह स्वर्गिक होता है, नैसर्गिक भी। कहते हैं, शब्द की सत्ता/शक्ति बन्दूक की गोली और तोप के बारूद से भी अधिक होती है। तोप और बन्दूक से शरीर की ताकत तो खत्म हो सकती है, परन्तु इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई बारूद शब्द की सत्ता को कभी चुनौती नहीं दे सका। दुनिया की तवारीख मानती है कि बन्दूकों ने तानाशाह तो बेशक खत्म किये, परन्तु तानाशाही तो हर युग/दौर में रही है, आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद है। धर्म के नाम पर लड़ी गई जंगों ने धर्म-गुरुओं के बलिदान तो लिये, परन्तु धर्म की भौतिक/अलौकिक सत्ता पहले से भी अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई है। लफ्ज़ों की जुबां होती है, इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकतीं। लफ्ज़ जब जुबां खोलते हैं, तो अनेक वो सत्य भी रहस्योद्घाटित हो जाते हैं, जो सदियों से दबे / कुचले पड़े थे। ‘लफ्ज़ों ने जुबां खोली’ (ग़ज़ल संग्रह) की ग़ज़लें शब्द और उसके अर्थ की सत्ता का एक मुजस्समा होने जैसी हैं।
डा. मुक्ता का साहित्य नारीवादी न होकर नारी के भीतरी उजास का संवाहक है। इस साहित्य में नारी के उत्तेजक स्वभाव का प्रदर्शन नहीं तथापि इसमें नारी दोयम दर्जे की तो कदापि नहीं दिखी। डा. मुक्ता ने नारी को उसकी तमाम भीतरी/बाहरी योग्यताओं/क्षमताओं और उपलब्धियों के साथ चित्रित किया है, तथापि उन्होंने उसे बाज़ार की वस्तु के तौर पर दर्शाने से भी संकोच किया है। उनके साहित्य में नारी घर-परिवार और समाज की शोभा, उपयोगिता है, और नर-समाज की शक्ति है। डा. मुक्ता एक ओर नारी-चेतना का शंखनाद करती हैं, तो उसी स्वर में नारी की अस्मिता की रक्षा के लिए स्वयं नारी को काली, चंडी, दुर्गा का रूप धारण करने का आह्वान भी करती हैं। इनकी कविताएं नारी को जौहर का संदेश नहीं देतीं, अपितु झांसी की रानी बनने की प्रेरणा देती हैं।
डा. मुक्ता स्वयं भी बेहद सौम्या, सजग, उदार-मना एवं महामना नारी हैं। उच्च शिखर तक सम्मानित, अलंकृत और पुरस्कृत नारी डा. मुक्ता बहुत कम बोलती हैं, परन्तु जितना बोलती हैं, बड़ी मधुर वाणी से नपे-तुले शब्दों का उच्चारण करती हैं। वह नारी मन के भीतर उतर जाने का हुनर जानती हैं, यह उनकी कहानियों को पढ़ने से पता चल जाता है। वह नारी मन और प्रकृति-तत्व की कोमलता से भली प्रकार परिचित एवं अवगत हैं, यह उनकी कविताओं के मनन/ मन्थन से ज्ञात होता है। साहित्य के पानियों में बहुत गहरे उतरने की कला भी उन्हें आती है… तभी तो इतने सारे माणिक-मोतियों की माला उन्होंने मां सरस्वती/शारदे मां के लिए तैयार कर रखी है।
डा. मुक्ता का साहित्य बाज़ारवाद, उपभोक्तावादी संस्कृति और भौतिकतावाद की अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं बनता, तथापि वह मौजूदा दौर की ज़रूरतों को स्वीकार अवश्य करता है। डा. मुक्ता ने साहित्य के प्रत्येक पक्ष को बड़ी सुघढ़ता से छुआ है। इनकी कविताएं यदि किसी मैदानी नदी के पानी में उतरती-लांघती लहरों जैसी हैं, तो इनकी कहानी पहाड़ से उतरी किसी नदी की पहली जल-रेखा जैसी है जो उच्छृंखल भी नहीं, और आलस्य की जायी भी नहीं है। कुल मिला कर डा. मुक्ता द्वारा रचित सम्पूर्ण साहित्य अपने आप में एक सर्वांग, सम्पूर्ण और उपयोगी पक्ष जैसा है।
निःसंदेह, यह जो कुछ मैंने लिखा/कहा है, यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही सत्य है जैसे कि आकाश पर चांद का होना, जैसे कि किसी घने वन-प्रांतर में धूप का संवरना, और वह सत्य तथ्य यह है कि डा. मुक्ता साहित्यिक फलक का वह सितारा हैं जिसका प्रभा मंडल बहुत विशाल और व्यापक है। डा. मुक्ता कल्पना की धरा पर एक ऐसी धवल/स्वच्छ नदिया की भांति हैं जिसकी लहरों के आईने में से हर कोई अपनी भावनाओं की छवि देख सकता है।
डा. मुक्ता एक ऐसी लेखिका हैं, जो एक हाथ से समाज से कुछ ग्रहण करती हैं, तो दूसरे हाथ से समाज की विरासत पिटारी में ब्याज समेत लौटाना भी जानती हैं। डा. मुक्ता चिरजीवी हों, उनकी कलम सलामत रहे, उनकी विचार-ऊर्जा बनी रहे, उनकी कल्पना-शक्ति की उड़ान बुलंद रहे…. वह लिखती रहें, कहती रहें और सुनती भी रहें-उनके साहित्य से जुड़ा हर शख्स ऐसा अवश्य चाहेगा। आमीन !
☆ पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) – लेखक : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆
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पुस्तक : साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह)
लेखक : धर्मपाल महेन्द्र जैन
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर (म. प्र.)
मूल्य – ₹275
पृष्ठ – 154
वर्ष – 2025
☆ सरल, चुटीली और प्रभावशाली – साहित्य की गुमटी – सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆
व्यंग्य के क्षेत्र में धर्मपाल महेंद्र जैन जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वह हिन्दी व्यंग्य विधा के गिने-चुने बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक हैं। पिछले वर्ष शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके व्यंग्यों का एक रोचक संग्रह आया था ‘साहित्य की गुमटी’। जितना आकर्षक पुस्तक का शीर्षक है उतने ही लुभावने और सोचने को विवश करने वाले उनके व्यंग्य हैं। इस पुस्तक में धर्मपाल जी ने साहित्य जगत की विसंगतियों, दिखावा और परिवर्तित होती प्रवृत्तियों पर हास्यपूर्ण अंदाज में तीखा कटाक्ष किया है। यह पुस्तक पाठक को हँसी-हँसी में गंभीर मुद्दों पर सोचने को भी विवश करती है।
श्री धर्मपाल महेंद्र जैन
यहाँ गुमटी को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जिस प्रकार सड़क किनारे लगी गुमटी में भांति- भांति के लोग आते-जाते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार साहित्य रूपी गुमटी में भी भिन्न-भिन्न श्रेणी के यथा- लेखक, पाठक, आलोचक और प्रकाशकों की भीड़ दिखाई देती है। जो स्वयं को बहुत महान समझने का भ्रम पाले रखती है। उनकी कुंठा, उनके आग्रह, उनकी बेचारगी, यह सब इन पात्रों में, उनके संवाद और उनकी आदतों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।
संग्रह की पहली रचना ‘ज़हर के सौदागर’ लेखक की एक जबरदस्त व्यंग्य रचना है, जिसमें लेखक ने समाज में फैल रही नफरत, हिंसा, अफवाह और स्वार्थ जैसे जहर पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी में ज़हर बेचने वाली एक दुकान का उदाहरण देकर लेखक समाज की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। रचना में बताया गया है कि पहले ज़हर का उपयोग सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी माँग तेजी से बढ़ने लगी। यह बढ़ती माँग केवल वास्तविक ज़हर की नहीं, बल्कि समाज में फैल रहे झूठ, नफरत और दुर्भावना जैसे मानसिक ज़हर की ओर संकेत करती है। यहाँ लेखक बड़ी कुशलता से यह दिखाते हैं कि कैसे लोग बिना सोचे-समझे इन विषैले विचारों को फैलाते हैं और समाज को दूषित कर देते हैं।
‘ वाट्सऐप नहीं भाट्सएप’ में समकालीन सामाजिक व्यवहार, विशेषकर व्हाट्सएप समूहों में दिखने वाली प्रवृत्तियों पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है। आजकल व्हाट्सएप समूहों में होने वाली ‘अतिश्योक्तिपूर्ण’ प्रशंसा और चापलूसी दिखाई गई है। यहाँ हम देखते हैं कि कैसे कुछ सदस्य एक-दूसरे की रचनाओं की अतिश्योक्ति पूर्ण प्रशंसा करते हैं। यदि भूले से उनकी रचनाओं से असहमति जता दी जाए या आलोचना कर दें तो उसे व्यक्तिगत हमले की तरह लिया जाता है। ‘भाषा के हाइवे पर गड्ढे ही गड्ढे’ में समकालीन आलोचना पर गहरा कटाक्ष किया गया है। लेखक कहते हैं कि किसी कृति पर आलोचना देखकर ही पता चल जाता है कि वह मित्र द्वारा लिखी गई है अथवा अमित्र द्वारा। यदि मित्र की रचना है तो अपने ही किसी बंदे से लिखवाकर भेज देता है परन्तु यदि वह अमित्र की है (जो की होती है। क्योंकि लेखक आपस में प्रतिद्वंदिता के चलते अमित्र ही अधिक होते हैं) तो उसपर ऐसी आलोचना लिखी जाती है कि लेखक आत्महीनता का शिकार होकर लिखना ही भूल जाए।’ ‘लाइक बटोरो और कमाओ’ में अलग ही बानगी देखने को मिलती है। यहाँ फेसबुक की उस प्रवृत्ति का प्रदर्शन है जहाँ सारा फ़साना बस लाइक कमेंट का है। अगर जिन्दा हो, तो लाइक कमेंट करके अपने जीवित होने का प्रमाण दो। ‘ईडी है तो प्रजातंत्र स्थिर है’ आज की राजनीति का ज्वलंत उदाहरण है – हम राजनीतिज्ञ हैं दोमुँहे सांप जैसे। हमारे एक तरफ ईडी है तो दूसरी तरफ सीबीआई। हमको काहे का डर?
इसी प्रकार संग्रह में एक से बढ़कर व्यंग्य हैं जो हमारे समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, धार्मिक विचारधारा, लोगों के दोगलेपन पर सटीक प्रहार करते हैं। लिखने को तो इतना कुछ है कि अगर लिखने बैठूं तो एक पुस्तक ही बन जाएगी। धर्मपाल जी के व्यंग्य से मेरा साक्ष्य पहली बार हुआ है और मैं उनकी पैनी दृष्टि से चमत्कृत हुई हूँ, कायल हुई हूँ। एक व्यंग्यकार बनने के लिए आपमें तीखी दृष्टि, हास्यबोध, बेहतरीन वैचारिक क्षमता और जागरूकता होना बेहद आवश्यक है। धर्मपाल जी ऐसे ही जीनियस रचनाकार हैं जिनकी विचारशीलता का फलक बहुत विस्तृत है। संग्रह के कई व्यंग्य बेहद तीखे बन पड़े हैं- बम्पर घोषणाओं के जमाने में, रक्तबीज का क्या मतलब, होरी खेले व्यंग्य वीरा अवध में, विदेश में परसाई से दो टूक, साहब को जुकाम है पर…, संस्कृति एक संक्रामक बीमारी है, सरकार तुम ट्रिलियन हम पाई, अफवाह को अफवाह रहने दें, सांप अब सभ्य हो गए हैं, साहित्य अकादमी-सी पान गुमटी इत्यादि।
संग्रह की भाषा सरल, चुटीली और प्रभावशाली है। वे भारी-भरकम शब्दों का कहीं भी प्रयोग नहीं करते, बल्कि बहुत सहज भाव में गहरी बात कह देते हैं। कई स्थानों पर व्यंग्य इतना तीक्ष्ण है कि पाठक मुस्कुराते हुए भी समाज और साहित्य की वास्तविकता को महसूस करता है। संग्रह में साहित्यिक आयोजनों, पुरस्कारों की होड़, लेखकों की भंगिमा, उनके स्वार्थ और आलोचना की राजनीति जैसी स्थितियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष हैं। धर्मपाल जी अपने व्यंग्यों के माध्यम से यह बताने का प्रयास करते हैं कि साहित्य केवल प्रसिद्धि पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम होना चाहिए।
यह एक ऐसा संग्रह है जो मनोरंजन के साथ-साथ साहित्यिक दुनिया की वास्तविकता को भी जाहिर करता है। धर्मजी की पैनी दृष्टि और हास्यपूर्ण शैली इस पुस्तक को रोचक और प्रभावशाली बनाती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक बेहतरीन उपहार है जो व्यंग्य साहित्य में रुचि रखते हैं। यह एक रोचक व विचारोत्तेजक व्यंग्य-संग्रह है। इसमें लेखक ने साहित्यिक दुनिया की विभिन्न प्रवृत्तियों, दिखावे और विसंगतियों पर तीखे लेकिन हास्यपूर्ण व्यंग्य किए हैं। लेखक की पैनी दृष्टि और चुटीली भाषा इस संग्रह को तीखी धार देती है। मैं इस संग्रह के लिए धर्मपाल जी को बधाई देती हूँ और उनकी आगामी कृति के लिए शुभकामनायें, प्रतीक्षा की घड़ियाँ शुरू हो गई हैं।
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – लघुकथा – सार्थकता।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७२ ☆
☆ लघुकथा – सार्थकता☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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खेत में खड़े बिजूकों को देखकर हैलमेटों ने तंज कसा- “हम तो अपने मालिकों की जान बचाते हैं, तुम्हारा जीवन व्यर्थ है।”
एक बिजूका बोला- ‘तुम जरखरीद गुलाम सिर्फ अपने मालिक के काम आते हो। हम अपने और तुम्हारे मालिकों के साथ सबका पेट भरने के लिए दिन में धूप और रात में अँधेरे से जूझते हैं।’
निरुत्तर हैलमेट अगली सुबह खेतों में खड़े थे बिजूका बनकर।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आए गए का घर…“।)
अभी अभी # ९५० ⇒ आलेख – आए गए का घर श्री प्रदीप शर्मा
किसी भी घर की रौनक ही इसी में है, कि वहां मिलने जुलने वाले और रिश्तेदारों का आना जाना बना रहे। किसी घर की घंटी बजना, अथवा घर के सामने जूते चप्पलों का ढेर यह दर्शाता है कि इस घर में काफी चहल पहल है।
वैसे भी घर में खामोशी किसे पसंद है, दीवारें तक कान लगाए सुनती रहती हैं, जिस घर में हमेशा महफिल जमी रहती है।
ऐसे घर को हमारी मां, आए गए का घर कहती थी। जब तक हमारे घर में मां और पिताजी मौजूद रहे, ना तो घर कभी खाली अथवा खामोश रहा और ना ही घर में कभी ताला लगा।।
तब कहां घरों में फोन अथवा मोबाइल थे। कभी कभी तो चिट्ठी के आने के पहले ही मेहमान टपक पड़ते थे लेकिन अधिकतर अतिथि शब्द का मान रखते हुए समय और तारीख बताए बिना ही पधार जाते थे।
पिताजी रात को जब घर आते तो भोजन के वक्त, कोई ना कोई परिचित अवश्य उनके साथ होता। बहन स्कूल से घर आती, तो एक दो सहेलियों को साथ लेकर आती। तब ना तो इतनी मोहल्लों में दूरी थी और ना ही दिलों में। तब शायद सबको प्यास भी बहुत लगती थी, वॉटर बॉटल का तब शायद आविष्कार ही नहीं हुआ था।।
हर तरह की परिस्थिति से घर में तब मां को ही जूझना पड़ता था। अनाज, मसाले और दाल चावल का साल भर का संग्रह जरूरी होता था। मौसम के हिसाब से घरों में एक्सट्रा बिस्तर और रजाई गद्दों की भी व्यवस्था करनी पड़ती थी। टेंट हाउस की याद तो बस शादी ब्याह के वक्त ही आती थी। किराने और दूध का हिसाब महीने में एक बार करना पड़ता था।
इस तरह की सभी युद्ध स्तर की तैयारियों से सुसज्जित घर ही आए गए का घर कहलाता था। मेहमानों की पसंद का भी पूरा खयाल रखा जाता था। फूफा जी को चावल में घी और शक्कर प्रचुर मात्रा में लगता था और वे पूड़ी ही पसंद करते थे, रोटी नहीं।।
लेकिन यह सब कल की बात है। आज तो मेहमानों के लिए नाश्ता भी बाहर से ही आता है और भोजन भी
बाहर होटल में ही किया जाता है। फोन और मोबाइल की सुविधा के बावजूद ना किसी को आने की फुर्सत है और ना ही किसी को बुलाने की।
परिवार छोटे होते जा रहे हैं, घर बड़े होते जा रहे हैं।
छोटे घर में तब कितने सदस्य समा जाते थे, आज आश्चर्य होता है। तब कहां किसी का अटैच बेडरूम और बाथरूम था। घर की महिलाएं अपने कपड़े ताक में रखती थी। आज घरों में सोफ़ा, अलमारी, अपनी अपनी वॉर्डरोब और मॉड्यूलर किचन है, बस खाने वाला कोई नहीं है।।
हंसी आती है, जब धर्मपत्नी पुराने बर्तनों और एक्सट्रा बिस्तरों को आज भी सहेजकर रखती है। वह कहती है, आप नहीं समझते, आए गए के घर में घर घृहस्थी का सभी सामान जरूरी होता है।
बड़ी भोली और घरेलू टाइप की गृहिणी है वह।
अनायास कोई मेहमान आता है तो उसकी बांछें खिल जाती हैं। घर में दावत हो जाती है। लेकिन
ऐसे अवसर आजकल कम ही आते हैं। लगता है अपने परिचित कहीं बहुत दूर चले गए हैं, यह दूरी दिलों की है अथवा मजबूरी की, समझ नहीं पाते। कोई आए, जाए, कितना अच्छा लगता है।।
होते हैं कुछ ऐसे खामोश घर, जहां कोई ज्यादा आता जाता नहीं। किसी आहट पर उम्मीद सी बंधती है लेकिन फिर खयाल आता है ;
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 मार्च से 29 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जयश्री राम। मैं पंडित अनिल पांडे पहले की भांति आज भी आपको श्री हनुमान चालीसा की चार चौपाइयों के बारे में बताऊंगा जो की आपकी परेशानियों में मंत्र जैसा कार्य करेंगी। पहली दो चौपाइयां मैं अभी बताऊंगा तथा बाद की दो चौपाइयां इस वीडियो के अंत में बताई जाएंगी।
आज की श्री हनुमान चालीसा की पहले दो चौपाइयां ये है।
लाय सजीवन लखन जियाए,
श्री रघुबीर हरषि उर लाए।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई,
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
हनुमान चालीसा की इन चौपाइयों के संपुट पाठ करने से शारीरिक व्याधियों का निवारण होता है तथा अपने से बड़ों की कृपा प्राप्त होती है। अगर आपका बॉस आप से नाराज है या आप रोगों से ग्रस्त हो गए हैं तो आपको इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।
साप्ताहिक राशिफल में आज सबसे पहले मैं आपको 23 मार्च से 29 मार्च 2026 के सप्ताह के ग्रहों के परिवर्तन के बारे में बताऊंगा। उसके बाद राशिवार राशिफल की बारे में चर्चा की जाएगी।
इस सप्ताह सूर्य और शनि मीन राशि में मंगल, बुध और राहु कुंभ राशि में और गुरु मिथुन राशि में भ्रमण करेंगे। शुक्र प्रारंभ में मीन राशि में रहेंगे तथा 25 तारीख के 3:53 रात से मेष राशि में गोचर करेंगे।
आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह सतर्कता पूर्वक कार्य करके आप कचहरी के कार्यों में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि संभव है। व्यापारियों को लाभ होगा। भाई बहनों के साथ संबंध स्थिर रहेंगे। आपके संतान को लाभ होगा। संतान का आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको इस सप्ताह धन अर्जित करने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। व्यापारियों के लिए सप्ताह अच्छा है। कर्मचारी और अधिकारियों को सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख सफलता प्रदान करने वाले हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मिथुन राशि
कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर वे चाहेंगे और प्रयास करेंगे तो उनको सही पदस्थापना मिल सकती है। भाग्य से मामूली लाभ होगा। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा नहीं है। भाई बहनों के साथ संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको 25 और 26 तारीख का विशेष रूप से उपयोग करना चाहिए। इन दोनों तारीखों में आपके अधिकांश कार्य सफल होंगे। 23 और 24 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। भाग्य की मदद से आपके सभी कार्य संपन्न हो सकते हैं। मगर प्रयास तो करना ही पड़ेगा। आपके व्यय में वृद्धि होगी। कर्मचारियों अधिकारियों को सावधान रहना चाहिए। आपका, आपके जीवनसाथी का और माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों को भी इस सप्ताह में सावधानी के साथ व्यापार करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 27 के दोपहर से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को पूर्ण करने में मददगार है। 25 और 26 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। मामूली मात्रा में धन आने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर विश्वास करके कार्यों को करना चाहिए। माता जी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कर्मचारियों और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख लाभदायक है। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सावधानी पर जोर देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
व्यापारियों के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह प्रतिष्ठा दायक रहेगा। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। 25 और 26 तारीख को आपको अधिकांश कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर पर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। अविवाहित जातकों के नए-नए विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। संतान का सहयोग आपको कम मिलेगा। परीक्षाओं में सफलता के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकते हैं। भाग्य से थोड़ा बहुत लाभ प्राप्त होगा। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख उपयोगी हैं। 23 और 24 तारीख को आपको सावधान रहने की सलाह दी जाती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
वृश्चिक राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके संतान की उन्नति हो सकती है। संतान से आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को पढ़ाई में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको शत्रुओं से सावधान रहना चाहिए। अविवाहित जातकों के विवाह के प्रस्ताव में कुछ लोग बाधक बन सकते हैं। धन प्राप्त होने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार सामान्य रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक है, परंतु उनको अपने विचारों पर नियंत्रण रखना होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए सावधान रहने का समय है, अन्यथा उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख परिणाम मूलक हैं। 25 और 26 तारीख को आपको कोई भी कार्य बहुत सोच समझकर करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवारहै।
धनु राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपका इच्छित स्थान पर स्थानांतरण हो सकता है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अत्यंत उत्तम है। उनके प्रतिष्ठा में भरपूर वृद्धि हो सकती है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधानी से कार्य करना चाहिए। व्यापारियों का व्यापार सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन गुरुवार है।
मकर राशि
आपका, आपके जीवनसाथी का, आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ अच्छे संबंध बनेंगे। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर अधिक विश्वास करना चाहिए। भाग्य पर नहीं। छात्रों को पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। आपको अपने संतान का सहयोग बहुत कम मिलेगा। शत्रुओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख परिणाम दायक हैं। 25 और 26 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें साथ ही रुद्राष्टक का भी पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको धन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपको ब्लड प्रेशर, डायबिटीज आदि रोगों से सावधान रहना चाहिए। आपके माता-पिता जी का और जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपको अपनी संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक है। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सचेत रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आप अपने बहुत सारे कार्य अपने आत्मविश्वास के बल पर कर लेंगे। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। धन प्राप्त करने में सावधानी बरतें। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से भी थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख विभिन्न रूप से मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र की तीन माला का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
आईये अब हनुमान चालीसा के मंत्रवत चौपाइयों की चर्चा कर लें। आज की दो चौपाइयां हैं;-
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से यश, सम्मान, प्रसिद्धि और कीर्ति बढ़ती है। अगर आपको मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करना हो तो इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
कधी नव्हे तो निवांतपणा मिळाला होता. उकाडा फार जाणवायला लागला होता. बाल्कनीत जरा हवा येत असेल म्हणून तिथे खुर्ची टाकून बसले होते. मग नजर सहजच इकडेतिकडे भिरभिरायला लागली, आणि दररोजच समोर असणाऱ्या कित्येक गोष्टी नव्यानेच पहातेय असं वाटायला लागलं……
… त्यातलेच एक हे घरासमोरील मोठ्ठे पिंपळाचे झाड …’ आजूबाजूचं सगळंच इतकं बदललंय.. पण हे झाड मात्र गेली कित्येक वर्षं आहे तसंच आहे.. ते कसं काय ?‘…
… इतक्यात वाऱ्याची एक सुखद झुळूक आली.. अंग मोहरून उठलं.. समोरचं ते झाडही सळसळलं …. आणि.. आणि बघता बघता त्याची कितीतरी पानं अल्लाद झाडावरून खाली पडली.. मला कसंतरीच झालं.. एकदम जाणवलं की ही तर पानगळ सुरु झालीये.. म्हणजे आता शिशिर संपून वसंत ऋतू येणार तर … आणि मग त्या भिरभिरणाऱ्या पानांबरोबर मनही भिरभिरायला लागलं – – –
खरंच.. काय गंमत आहे ना.. कोणी न सांगताच या झाडांना कळतंय की वर्षभर ज्याची वाट पाहात होतो तो आपला प्रिय सखा वसंतराजा आता येणार म्हणून.. आणि झाडं आता त्याच्या स्वागताची जणू तयारी करताहेत.. मनात आलं.. ही झटकून टाकलेली पानं म्हणजे जणू इतके दिवस नावडत्या सोबत्याबरोबर राहावे लागल्याने मनाला आलेली मरगळच अशी क्षणार्धात झटकून टाकली असेल का ? पण मग ज्यांच्यामुळे झाडांना शोभा अशी ती पानं एकदम अशी निरुपयोगी समजून दूर फेकून देतांना काहीच दु:ख नसेल का झालं झाडाला ?……
…. असं नसेल पण.. इतकं कठोर नि कृतघ्न व्हायला झाडं म्हणजे माणसं थोडीच आहेत ? मग हे कदाचित फक्त स्थित्यंतर असेल …. एका पिढीकडून दुसऱ्या पिढीकडे.. किंवा झाडाचा पुनर्जन्म ??
आत्मा तोच आणि वरचा साज मात्र नवा.. कोवळ्या लुसलुशीत तजेलदार पानांचा !!.. असंच असावं….
.. म्हणूनच तर या खाली पडलेल्या पानांच्या चेहेऱ्यावर कुठे दु:ख दिसत नाहीये ! कशी आनंदाने भिरभिरताहेत ! त्यांची जागा घेऊन आता झाडावर अभिमानाने डोलणाऱ्या नव्या पानांकडेही किती कौतुकाने पहाताहेत ! केवढं मोठं मन हे.. आणि केवढा त्याग.. आपल्या जीवावर ज्याचा रुबाब, त्याला संजीवनी मिळावी म्हणून किती सहज स्वतःचाच त्याग करताहेत ही पानं ! ही पानगळ !…. का लोक खेदाने पहातात तिच्याकडे ? तिचा मोठेपणा का लक्षातच येत नाही कुणाच्या ?.. प्रत्येक गोष्टीत फक्त ‘उणं’ तेवढंच पाहणाऱ्या आम्हा माणसांना तिच्याकडून काहीच संदेश घ्यावासा वाटत नाही ते का ?….
…. निदान आयुष्याला मरगळ आणणाऱ्या नकारात्मक संवेदना झटकून टाकून सद्भावाची अन प्रेमाची नवी पालवी फुलवावी आणि भविष्य आनंददायी ‘वसंत’ व्हावं असा प्रयत्न करण्यासाठी या पिंपळवृक्षाप्रमाणे सज्ज व्हावं असं कधी वाटेल आम्हाला ?
नव्या रक्ताला.. नव्या विचारांना.. नव्या जाणिवांना संधी देण्यासाठी जुन्यांनी अट्टाहास सोडून समजूतदारपणा दाखवायलाच हवा हे या पानगळीकडून शिकेल का कधी आमचा समाज ? … या समाजवृक्षाला नवजीवन मिळावं म्हणून हातात हात घालून एकत्रपणे काही करू शकू का आम्ही.. या पानगळीसारखं ???
… सहजपणे ‘कचरा’ समजल्या जाणाऱ्या या दुर्लक्षित पानगळीतून कितीतरी शिकण्यासारखं आहे हाच एक विचार मग कितीतरी वेळ माझ्या मनात टपटपत राहिला … त्या पानगळीसारखाच … आणि नकळत तसेच भिरभिरत कागदावर शब्द उतरले…
☆ पानगळ… ☆
☆
दिवसामागून दिवस चालती.. ऋतूमागूनी ऋतू धावती
विसावा नसे मुळी कसा तो.. निसर्गचक्रा सततची गती – –
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वसंत प्रिय तो येईल आता.. कल्पनेत या वृक्ष थरारे
स्वागतास अति आतुर झाला.. आनंदे अन मनही भरारे – –
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येणार नक्की तो प्रियतम म्हणुनी.. सळसळ उठली पानोपानी
स्वतःस आता किती सजवावे.. रोमरोम हे जाई हरखुनि – –
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मरगळ मनीची झटकत असता.. विखरून पाने किती ओघळली
सालभरी त्यांनीच सजवले.. जुनी जणू ती आता झाली – –
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जुने जाऊ द्या मरणालागी.. म्हणतच येती नवी पाने ती
परी तयांना आज कळेना.. उद्याची त्यांची हीच स्थिती – –