हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६३ ⇒ लाखों का सावन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लाखों का सावन।)

?अभी अभी # १०६३ ⇒ आलेख – लाखों का सावन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक वह भी ज़माना था, (आप समझ गए) हाँ, वह कांग्रेस का ज़माना था, जब सावन लाखों का होता था, और नौकरी दो टके की, यानी 90 – ढाई की ! मास्टर गाँव में पड़ा रहता था, और नई नवेली बहू शहर में सास-ससुर की सेवा करते हुए आनंद बक्षी का यह गीत सुनकर पति-परमेश्वर को कोसा करती थी।

उसे भी अपने मायके के सावन के झूले याद आया करते थे।

अब वह न घर की थी, न नाथ की।

समय बदलते देर नहीं लगती।

जो नौकरी कभी टके की थी, वह लाखों की हो गई, और लाखों का सावन टके का हो गया। सावन लगने पर किसी को आज उतनी खुशी नहीं होती, जितनी तनख्वाह में इन्क्रीमेंट लगने पर होती है।

तब भी सावन लगने से ज़्यादा खुशी हमें गुरुवार को शहर के थिएटर में नई फिल्म लगने पर होती थी। आज भी अच्छी तरह से याद है कि आया सावन झूम के जब रिलीज़ हुई थी, तो झूमकर बारिश हुई थी। जिनके पास छाते नहीं थे, वे सावन का मज़ा झूमकर ही नहीं भीगकर भी ले रहे थे। ।

कितनी फुरसत थी, जब सावन आता था ! श्रावण सोमवार को गाँधी-हॉल का बगीचा खचाखच महिलाओं और बच्चों से भर जाता था। पेड़ों पर झूले बाँध दिये जाते थे, जिन पर युवतियां जोड़े से झूला करती थी। ऊपर जाना, नीचे आना, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव को हँसते-हँसते झेलना, यही तो ज़िन्दगी का मेला होता था। बच्चों के लिए तो पुंगी और फुग्गे ही काफी थे। घास में लोटना और कोड़ा-बदाम छाई खेलना। घर की बनाई पूरी/पराँठे के साथ आलू/भिंडी की सब्जी, प्याज-अचार, और गाँधी-हॉल के गेट से दो रुपये का नमकीन मिक्सचर। बगीचे की घास पर मूँगफली के बचे हुए छिलके थे। बस, यही लाखों का सावन था।

समय ने करवट बदली ! सियासत ने अपना रंग बदला, ढंग बदला।

सावन की जगह बदले का मौसम आ गया। 60 साल से सोलह साल तक का पागल मन तलत का यह गीत गुनगुनाने लग गया !

बदली, बदली दुनिया है मेरी। वह बादल की बदली की नहीं, डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, वह सावन की बारिश में भीगकर बंद एटीएम तक नहीं जाना पसंद करता। paytm का आनंद लेता है, और रेडियो मिर्ची पर मन की बात सुना करता है।

आजकल की फिल्मों ने भी सावन का दामन छोड़ दिया है,

संगीत ने मधुरता खो दी हैतो गानों ने अर्थ खो दिया है।

व्यर्थ की फिल्में करोड़ों कमा रही है तो पद्मिनी पद्मावत बनी जा रही है। सावन कहीं प्यासा है तो

कहीं अभी से ही सावन-भादो की झड़ी लगी जा रही है। संगीत की स्वर-लहरियां मेरे कानों में गूँज रही हैं। नेपथ्य में फ़िल्म आया सावन झूम के का गाना बज रहा है। मन भी आज यही कह रहा है, सावन आज भी लाखों का है, सावन को आने दो। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८६ – देश-परदेश – दाग अच्छे हैं ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८६ ☆

☆ देश-परदेश – दाग अच्छे हैं ☆ श्री राकेश कुमार ☆

कुछ वर्षों पूर्व हिंदुस्तान लीवर लिमिट, ने अपने सबसे अधिक बिकने वाले सर्फ डिटर्जेंट पाउडर के लिए “दाग़ अच्छे हैं” को अपनी टैग लाइन बना कर अपने उत्पाद की बिक्री को एक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया था।

आज के समाचार पत्र की उपरोक्त खबर पढ़ कर तो सर्फ कंपनी के निर्माताओं की तो नींद उड़ गई होगी। जब रेलवे ए.आई. के उपयोग से दाग ढूंढ लेगा, तो सर्फ जैसे पाउडर की क्या आवश्यकता आन पड़ी है। खबर पढ़ कर हमारे घर में भी ये निर्णय लिया गया अब तो ए.आई. का उपयोग कर कपड़े धोये जाएंगे।

रेलवे जैसे बड़े संस्थानों में वर्षों पूर्व में स्टेशन के पास स्थित किसी बड़े तालाब में कपड़े धो कर, खुले में सुखाये जाते थे। इस प्रकार के स्थानों को धोबी घाट कहते हैं। अब ये तरीका बदल चुका है। इसलिए इन घाटों को भी “पुराना धोबी घाट” कहा जाता है। हमने तो पुरानी फिल्मों में गुंडो द्वारा अगवा किए हीरो/ हीरोइन को ऐसे स्थानों पर छुपा कर रखते हुए देखा था।

गधे के ऊपर लदे हुए कपड़े या धोबी के साथ किसी कुत्ते को भी नहीं देखा हैं। पता नहीं फिर कहावत “धोबी का कुत्ता घर का ना घाट” कैसे बन गई ?

इस ख़बर को पढ़ कर बर्तन साफ करने वाले पाउडर निर्माताओं और उन पाउडरों के ब्रांड एम्बेसडर हमारी फिल्मी दुनिया के हीरो भी बहुत परेशान हैं। उनको डर है, कि अब गन्दी कढ़ाई ( बर्तन) के जिद्दी दाग भी ए. आई. से दूर हो जाएंगे, तो उसके विज्ञापन से होने वाली आय समाप्त हो जाएगी। इन पाउडर निर्माताओं के विज्ञापन में नींबू के रस का प्रयोग भी किया जाता है, ऐसा क्लैम किया जाता है, यदि ये वास्तकविकता है, तो बाज़ार में नींबू भी सस्ते हो जायेंगें, क्योंकि ए. आई. के उपयोग में किसी भी पदार्थ का उपयोग जो नहीं होता हैं।

हमारे फिल्मी हीरो बहुत दूरगामी होते हैं, इसलिए उन्होंने अब खाने में उपयोग होने वाले मसालों और पशु आहार जैसे नए आइटम के विज्ञापनों से अपनी आय में बढ़ोतरी कर ली है।

आपकी जानकारी के लिए पता देवें, कि आज का ये आलेख भी ए. आई. ने ही लिखा है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६२ ⇒ स्वर्ग नरक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्वर्ग नरक।)

?अभी अभी # १०६२ ⇒ आलेख – स्वर्ग नरक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है, जिसके बारे में हम सपने में भी नहीं सोचते, उसके सपने में दर्शन हो जाते हैं। मेरे साथ भी कल कुछ ऐसा ही हुआ। मेरे सपने में चार्वाक प्रकट हो गए। जीवन भर अपने पैसों से च्यवनप्राश खाया, लेकिन कभी च्यवन ऋषि ने स्वप्न में आने का कष्ट नहीं किया और जिनके दर्शन और सिद्धांत में मेरी रुचि नहीं, वे स्वप्न में दर्शन दे रहे हैं।

जिनका जीवन दर्शन ही –

यदा जीवेत, सुखं जीवेत्

ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्

यानी जब तक जीयो, सुख से जीयो, कर्जा करो और घी पीयो, हो उनके लिए कैसा पाप और कैसा पुण्य और कैसा स्वर्ग और नरक। जरूर किंगफिशर माल्या चार्वाक के वंश के ही होंगे। न आसमां में कोई खुदा है और न ही किसी का पुनर्जन्म। जो भी है, बस यही मानस जनम। खाओ, पीयो, कर्जा करो, और मौज करो।।

जो ईश्वर को नहीं मानते, वे ईश्वर से नहीं डरते। उनका ईमान तक कहीं गिरवी रखा होता है। जब मरने के बाद सब मिट्टी में मिल जाना है, नेकी बदी सब, अगर स्वर्ग कहीं है, तो केवल इस धरती पर ही है। ऑनली डिफॉल्टर्स भोग्या वसुन्धरा। इस धरा का पूरी तरह दोहन वही पुरुष कर सकता है जो पाप और पुण्य में भेद नहीं करता हो। जो कथित ईश्वरीय शक्ति के कोप से भयभीत नहीं होता हो। शायद यही चार्वाक दर्शन हो।

जो नास्तिक होते हैं, वे ईश्वर और स्वर्ग नरक को नहीं मानते। लेकिन पाताल के बारे में सब मौन हैं। मरने के बाद कोई पाताल नहीं जाता। इंदौर से कुछ किलोमीटर दूर एक प्राकृतिक झरना है, जिसे पाताल पानी कहते हैं। कहते हैं, उसकी गहराई पाताल तक है। जो उसकी गहराई नापने गए, वे वापस ही नहीं आए। पाताल लोक को सर्प लोक भी कहते हैं।

हमारा नश्वर शरीर का भी धार्मिक मान्यता अनुसार ही अंतिम कर्म किया जाता है। कहीं उसे दाह कर्म के जरिए पंच तत्वों में विलीन किया जाता है तो कहीं उसे दफना दिया जाता है। जिसे ऊपर जाना है, उसे दो गज जमीन के नीचे कयामत तक इंतजार करना पड़ता है। खुदा करे कि कयामत हो और तू आए।।

जो प्रकृति को जाने बिना, केवल अपने स्वार्थवश प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग एवं शोषण करते हैं, वे आस्तिक हों या नास्तिक, मानवता के बहुत बड़े शत्रु होते हैं। लेन – देन, give and take, ही जीवन का नियम है। आप अगर समाज से कुछ ले रहे हैं, तो बदले में क्या लौटा रहे हैं। मानव सभ्यता barter system यानी वस्तु विनिमय प्रणाली से ही शुरू हुई थी। तब भी हम इतने खुदगर्ज नहीं थे, जितने आज हैं।

आज जितने भी दर्शन हैं, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गए हैं। पोथी पढ़ना और ज्ञान बांटना ! जीवन में जो आत्मसात होता है, अमल में लाया जाता है, वही दर्शन होता है। बाहर से मंदिर प्रदर्शन और मन में चार्वाक दर्शन, अगर इसी तरह चलता रहा, तो स्वर्ग नरक तक कोई पहुंच ही नहीं पाएगा, और कोई नये किंगफिशर और सहाराश्री देश को रसातल की ओर ले जाएंगे। हमारी संस्कृति ने सभी मान्यताओं और दर्शन को सम्मान दिया है। सबकी अच्छाई बुराई सामने है। नीर क्षीर विवेक ही कर्ज़ वाले घी से बेहतर है। दत्तात्रेय समर्थ थे, फिर भी उन्होंने २४ गुरु किये। जिस प्राणी में भी अच्छाई दिखी, उसे अपना गुरु माना। आपका आत्म गुरु आपके अंदर ही है। हम विश्व गुरु की बात नहीं कर रहे। चार्वाक ने हमारी आंखें खोल दी हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४७ – अग्निधर्मा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४७ अग्निधर्मा… ?

प्राय: हम सबके घर की ठाकुरबाड़ी में तड़के और सांझ, दीया प्रज्ज्वलित किया जाता है। सामान्यत:  दीये के मध्य भाग में घी में डूबी बाती रखकर उसका अग्रभाग ठाकुर जी की ओर करके उसे प्रदीप्त करते हैं।

आज देखता हूँ कि बाती का मुँह ठाकुर जी की ओर न होकर साधक की ओर हो चला है। इसके चलते ज्योति भी साधक की ओर आ रही है।

दृश्य से विचार उपजा, विचार का आलोक मस्तिष्क में प्रभासित हुआ। अपने देखे पर विचार किया, ज्योति की दिशा पर चिंतन किया तो फिर विचार पर,  चिंतन पर और स्वयं पर हँसी आने लगी।

लौ का अग्रभाग, उसका मुँह कौनसा है, यह कौन निर्धारित करेगा? अग्नि तो अग्नि है। उसका हर अंश दहकता है। हर दिशा में अग्रभाग है। पत्थरों की रगड़ से उद्भूत स्फुलिंग से लेकर अरण्य को चट कर जाने वाले दावानल तक और आकाश में लावा बिखेरती दामिनी से लेकर सागर के पेट में सुलगते बड़वानल तक, हर प्रकार की अग्नि का गुणधर्म है दाहकता।

भारतीय परंपरा का एक गुणधर्म, मानवीकरण भी है। अग्नि का मानवीकरण करते समय एक दूसरे की विपरीत दिशा में  दो चेहरे दिखाए जाते हैं। अग्नि के प्रवाह की कोडिंग हैं ये दो चेहरे। एक ओर ऊर्जा का, जीवन का प्रतीक है अग्नि। दूसरी ओर ऊर्जा के गमन के बाद देह का लपटों को समर्पण का प्रतीक है अग्नि।

वतायो फ़क़ीर सिंध के गहन दार्शनिक एवं विद्वान संत थे। उनके अनेक आख्यान प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि कंपकंपाने वाली शीत लहर की एक रात में वतायो और उनकी माँ, दोनों ठिठुर रहे थे। माँ ने बेटे से कहा, “वतायो, सुनते हैं, तू ईश्वर के निकट है। मैं भी यही महसूस करती हूँ। आज जाड़ा बहुत है। अपने ईश्वर से कह कि नर्क की थोड़ी-सी आग हम ग़रीबों के लिए दे दे।”

वतायो हँस पड़े। फिर बोले, “माँ, नर्क में कोई आग नहीं होती। सब अपनी-अपनी आग साथ लेकर आते हैं।”

अपनी अग्नि के साथ किस पथ पर और किस दिशा में यात्रा करनी है, इसका निर्णय निजी स्तर पर ही करना होता है। हाँ, अपनी अग्नि के आलोक में अग्निधर्मा हो सकने का स्वर्णिम अवसर प्रकृति हरेक को देती है। इति।

© संजय भारद्वाज 

संध्या 5:25 बजे, 01 अगस्त 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६१ ⇒ प्रेम पर्वत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रेम पर्वत।)

?अभी अभी # १०६१ ⇒ आलेख – प्रेम पर्वत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो शब्द हिंदी में ढाई आखर का है, वह अंग्रेजी का four letter word LOVE है। अक्सर प्रेम, प्यार अथवा इश्क में ऊंचाइयों की बात होती है, गहराइयों की बात होती है, प्यार के सागर में या तो हम डूब जाते हैं, या फिर इतने ऊंचे उठ जाते हैं, कि हमारा प्रेम ईश्वरीय प्रेम हो जाता है।

किसी के प्यार में डूबना तो बहुत आसान है लेकिन प्रेम की ऊंचाई को नापना इतना आसान भी नहीं। प्रेम परीक्षा लेता भी है और परीक्षा देता भी है। प्रेम में सफल होने पर प्रेमी प्रसन्न होता है, उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। लेकिन प्रेम में असफल होते ही उसका मन खिन्न हो जाता है। ये दुनिया और यह महफिल उसके काम की नहीं रह जाती।।

कहीं कहीं प्रेम शर्तिया होता है, प्रेम में कुछ शर्तें रख दी जाती हैं। प्यार नहीं हुआ, मानो सौदा हो गया हो। पहली नजर में प्यार अंधा प्रतीत होता है, लेकिन आंख खुलते ही सच सामने आ जाता है। प्रेम में अपेक्षा तो होती है, लेकिन प्रेम उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर पाता।

प्रेम का ही दूसरा नाम आसक्ति है। हमें जो प्रिय है, उससे हमें प्रेम हो ही जाता है। आप उसे लगाव, अथवा आकर्षण भी कह सकते हैं। हमारे प्रेम का दायरा कितना विस्तृत है, यह हम नहीं जानते। बच्चे से लेकर बूढ़े तक, मां से लेकर दादी मां तक, और बेटी से लेकर पोती तक इसकी जड़ें फैली होती हैं। हमारे प्रेमपाश में जर्रा जर्रा समाया है, लेकिन यह जीव कभी इसे समझ नहीं पाया है।।

ये वादियां ये फिजाएँ, बुला रही हैं तुम्हें, खामोशियों की अदाएं, बुला रही हैं तुम्हें।

हमें कभी फूलों से प्यार होता है तो कभी सावन की घटाओं से। कभी दिन सुहाना नजर आता है, तो कभी रात। खुशियों में मन झूमने लगता है, जब किसी का जन्म होता है, तो कहीं निकलने लगती है किसी अपने की बारात।

पसंद प्रेम का ही दूसरा स्वरूप है। जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे। तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे ! क्या यह प्रेम नहीं। अच्छा संगीत, अच्छी फिल्में, अच्छा साहित्य, अच्छे लोग, अच्छा खाना, एक अच्छी पत्नी और अच्छी अच्छी बातें, हमें बहुत पसंद है। इन सबसे हमें कितना प्रेम है। सोचिए क्या हम इनके बिना रह सकते हैं।।

अगर फिर भी हम दुखी हैं, तो इसका मतलब अभी भी हममें प्रेम की कमी है। हम मीठा मीठा तो गप कर जाते हैं, लेकिन कड़वा हजम नहीं कर पाते। जब प्रेम हमारी परीक्षा लेता है, तो हम वहां से भाग खड़े होते हैं।

प्रेम के पर्वत पर चढ़ना इतना आसान भी नहीं। कई कंकर, पत्थर, कांटे, विषैले और हिंसक जीव प्रेम की राह में हमारा रास्ता रोकने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग प्रेम का रास्ता छोड़ खुदगर्जी और स्वार्थ की पगडंडी पकड़ लेते हैं। ऐसे लोग कभी प्रेम पर्वत पर चढ़ नहीं पाते। बस रास्ता भटक जाते हैं, और कह उठते हैं ; कह दो, कोई ना करे यहां प्यार। इसमें खुशियां हैं कम, और आंसू हजार।।

प्रेम त्याग, समर्पण और निष्ठा मांगता है, प्रेम सहूलियत नहीं, जीवन की असलियत है। अक्सर लोगों का प्यार स्वामित्व वाला प्यार (posessive love) होता है, वे बस लेना ही लेना जानते हैं। प्यार संग्रहालय में रखने की वस्तु नहीं, बांटने की चीज है।

प्यार बांटते चलो। मेरी मोहब्बत पाक मोहब्बत, और जहां की ख़ाक मोहब्बत। आइए, झमाझम बारिश में, प्रेम रस में भीगें, प्रेम का ही छाता, प्रेम की ही बरसाती, प्रेम की ही छड़ी, प्रेम पर्वत पर कदम बढ़ाएं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ समाज के शुभचिंतक प्रेमचंद: सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

मुंशी प्रेमचंद

☆ आलेख – समाज के शुभचिंतक प्रेमचंद: सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

(प्रेमचंद जयंती – 31, जुलाई)

प्रेमचंद हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ युगप्रवर्तक एवं समाज के शुभचिंतक कथाकार थे। उन्होंने विपुल संख्या में कहानियाँ, उपन्यासों, निबंधों आदि का प्रणयन किया, पत्र-पत्रिकाओं का सफल सम्पादन किया। आपका लेखन पूर्ण सोद्देश्य था। समाज की विकृतियों एवं समस्याओं का चित्रण कर उसे विशिष्ट आदर्श की ओर ले जाने के हेतु अपने विचारों में वे कहा करते थे कि‐- ‘ मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल, प्रपंच और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है। ‘ इससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद साहित्य के माध्यम से कुशलता से, कलात्मक रीति से समाज के शुभचिंतक व सुधारक थे। शुभचिंतक वही होता है, जो आलोचना भी करे और रास्ता भी दिखाए। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से यही कार्य किया। उनकी आलोचना में सहानुभूति निहित थी। वे गरीब का मज़ाक नहीं उड़ाते थे। गोदान उपन्यास का होरी हारता है पर उसकी मेहनत और इज्जत को लेखक सलाम करता है। वे महाजन, पंडित की निंदा करते हैं, पर नफ़रत नहीं फैलाते।

प्रेमचंद समाज को राजा- महाराजाओं की दृष्टि से नहीं अपितु गाँव की चौपाल, किसान के खेत, विधवा की रसोई और महाजन के बहीखाते से देखा। गोदान का किसान होरी, कफ़न के माधव की गरीबी सिर्फ दया का विषय नहीं, शोषण की व्यवस्था का परिणाम है। बूढ़ी काकी, ठाकुर का कुआं आदि अनेक कहानियों में दहेज, पर्दाप्रथा, विधवा विवाह व घरेलू हिंसा को सवाल बनाया। वे किसी विशेष वर्ग के लेखक नहीं थे। उन्होंने किसान, मजदूर,स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग, बेरोजगार युवा, वृद्ध, अनाथ, वंचित आदि सभी को साहित्य का नायक बनाया। आपने उन लोगों को आवाज़ दी, जिनकी पीड़ा समाज सुनना नहीं चाहता था। वे भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव से व्यथित थे अत: उनकी कहानियाँ सामाजिक अन्याय का प्रतिरोध प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने बताया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसका चरित्र और कर्म है।

प्रेमचंद का अधिकांश जीवन गाँव में व्यतीत हुआ था, अत: उनको गँवई गाँव का चितेरा कहा जाता है। ग्राम्य जीवन के हर पहलू का उनको व्यक्तिगत अनुभव था लेकिन शहरी जीवन व वातावरण से भी वे अछूते नहीं थे। शहरी झलकियाँ आपके गोदान व गबन उपन्यास में देखी जा सकती हैं। गबन उपन्यास में शहरी निम्न मध्यवर्ग का चित्रण है तो गोदान में उच्च वर्ग के जमींदार, मिल-मालिक, शिक्षित प्रोफेसर पार्टियाँ देते-लेते रहते हैं, शराब- कबाब आम चलता है, खुला खर्चीला जीवन बिताते हैं, कारों में घूमते हैं। उन्मुक्त भोग और स्वच्छंद विहार शिक्षित नारियों और पुरुषों का जीवन-सिद्धांत बनता जा रहा है। शिक्षित नारी पाश्चात्य रंग में रँगी फैशन की पुतली बन रही है, जीवन में स्वार्थ अधिक मात्रा में घुसता जा रहा है। इस प्रकार वे शहरी जीवन की अनेक झाँकियाँ प्रस्तुत करके सामयिक समाज और वातावरण का सच्चा चित्रण करते हैं,जिससे इनके साहित्य में युगधर्म की पूरी रक्षा होती है।

सारत: प्रेमचंद ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने साहित्य का लक्ष्य मनुष्य को ही माना और उसके समस्त भावों-विचारों, उत्कर्षों व अपकर्षों को चित्रित किया। आपका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता पूर्व था। उनकी कहानियाँ पुरानी नहीं लगतीं क्योंकि मुद्दे वही हैं– कर्ज, बेरोजगारी, नारी, धर्म की राजनीति, अंतर सिर्फ इतना है कि स्वरूप बदल गया है। जमींदार के स्थान पर काॅर्पोरेट आ गया है। अत: प्रेमचंद का शुभचिंतक होना यही था कि वे समाज को कोसते नहीं थे, समझते थे और समझदार उसमें मनुष्यता बचाने का प्रयास किया करते थे।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६२ – आलेख – पाँच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६२ ☆

☆ आलेख ☆ ~ पाँच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज मेरे पांच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें है। इनमें श्री रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी, मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि’, जयशंकर प्रसाद का ‘कंकाल’, रामदेव धुरंधर का पथरीला सोना एवं विनोद कुमार शुक्ला की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी है।

एक पाठक के रूप में मैं जब मैंने इन चारों साहित्यकारों  की इन पुस्तकों के कुछ अंशों को पढ़कर उनकी लेखन शैली, भाव प्रवर्षण पर एक तुलनात्मक दृष्टि डालने की कोशिश किया तो  मेरे पाठक मन में जो चित्र अंकित हुए, वे कुछ निम्नवत थे ।

रामधारी सिंह दिनकर‘  की रश्मिरथी तृतीय सर्ग से

*

” हो गया पूरा अज्ञातवास, पाण्डव लौटे वन में सहास,

पावन में कनक सदृश्य तप कर, विरत्व  लिए कुछ और प्रखर,

 नस-नस में तेज प्रवाह लिए, कुछ और नया उत्साह लिए।”

*

” सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,

 सुरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,

 विघ्नों को गले लगाते हैं, काटों मे राह बनाते हैं।”

*

विशेष: राष्ट्रकवि की राष्ट्र भावना और भारतीय शौर्य उनकी लेखनी से, बारंबार उमड़ता है। विरत्व का प्रवाह काव्य की पंक्तियों  में, योद्धा यह शौर्य का वंदन करता है। विषम परिस्थितियों में भारतीय जन मानस कैसे मार्ग प्रशांत करता है राष्ट्रकवि की कविताएं बोल पड़ती हैं।

मुंशी प्रेमचंद  की कर्मभूमि से (भाग – ३ खंड- २)

“अमरकांत का पत्र लिए हुए नैना अंदर आई, तो सुखदा ने पूछा -किसका पत्र है?

नैना ने खत पाते ही पढ़ डाला था।बोली- भैया का।

सुखदा ने पूछा -अच्छा उनका खत है ? कहां हैं?

‘हरिद्वार के पास किसी गांव में है।’

आज पाँच महीना से दोनों में अमरकांत के कभी चर्चा नहीं हुई थी मानो वह कोई घाव था, जिसको छूते ही दोनों के ही दिल काँपते थे ।

विशेष – संवाद ऐसे मनमोहन, मानो आंखों के सामने सब कुछ चल रहा हूँ। शैली ऐसी की कोई भी समझ ले। यही तो मुंशी प्रेमचंद का कथा लिखने का शिल्प है ।

जयशंकर प्रसाद की कृति कंकाल -७ से

किशोरी और उसकी सहेलियां स्नान करके लौट आई अब यमुना अपनी धोती लेकर बजरे से उतरी और बालू की एक ऊंची टेकरी के कोने में चली गई।

यह कौन ए काम था यमुना गंगा के जाल में पर डालकर कुछ देर तक चुपचाप बैठी हुई विस्तृत जलधारा के ऊपर सूर्य की उज्जवल करने का प्रतिबिंब देखने लगी जैसे रात के तारों की फूल -अंजलि जाह्नवी के शीतल वृक्ष पर किसी ने बिखेर दी हो ।

विशेष: सब कुछ विशेष ही विशेष  संवाद मधुर । कथानक  प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता को लेखक की कलम से निकलकर अपने ऊपर  बिखरते हुए देखत है, शब्द पुष्प लगातार मुस्कुराते है। यह है श्री जयशंकर प्रसाद का लेखन शिल्प।

रामदेव धुरंधर की कृति पथरीला सोना से

भारतीय तीर तलवार के साथ ना जाकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ जाते थे और वहां रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे भारतीय धरती ने कैसे इस तरह से संस्कार स्वयं में पल्लवित उपस्थित किए हो और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो “मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ जहाँ इसे  ऐसे रोप दो कि उगे तो स्वयं भारत उगे”.

तब तो हिमालय ऐसे ही खेल-खेल में वयोवृद्ध नहीं हुआ। गंगा ऐसे ही जननियों की महाजननी मनहीं हुई। इसके पीछे स्वर्ण अक्षरों में अंकित विराट अतीत है। हिमालय ने अपनी अटलता से संदेश दिया जहां रहो अपनी पहचान से रहो और गंगा ने बह कर कहा,सतत गतिशील बने रहने की शर्त रखो।

विशेष: भारतीय संस्कृति को सात समुंदर पार की  धरती मॉरीशस से जोड़ता पथरीला सोना के कथानक का यह अंश देखिए न कैसे सब कुछ कह देता है। लेखक के दिल में भारत बसता है, यह मैं नहीं कह रहा उनकी कलम कहती है। यह है श्री रामदेव धुरंधर के लेखन शैली का शिल्प।

विनोद कुमार शुक्ल की कृति दीवार में एक खिड़की रहती थी से

खिड़की की चौखट पर एक साँवली लड़की खड़ी थी। वह दोनों हाथों में चौखट पकड़े हुए खड़ी थी। वह तैयार होकर आई थी। चौखट पर उसके दोनों हाथों की एक-एक छोटी उंगलियों में नेल पॉलिश लगी हुई थी। सोनसी उसके पास आई।

“अंदर आओगी?”

“नहीं।उसने शरमाकर कहा।

“अच्छा रुकना । सोनसी ने कहा।

विशेष: हिंदी लेखक विनोद कुमार शुक्ल के लिखे उपरोक्त पुस्तक के  कथानक के इस अंश में पात्रों का संवाद एवं लेखक द्वारा शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत दृश्य आपस में मिलकर  कथानक को जीवंत करते हुए प्रतीत होते हैं। लेखक के भाव और लेखन शैली दोनों में ही जीवंतता है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

३१ जुलाई २०२६

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६० ⇒ काली टोपी लाल रूमाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काली टोपी लाल रूमाल।)

?अभी अभी # १०६० ⇒ आलेख – काली टोपी लाल रूमाल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९५९ में एक फिल्म आई थी, काली टोपी लाल रूमाल, वैसे वह समय भी टोपी और रूमाल का ही था। महिलाएं तो ठीक, पुरुष भी खुले सिर नहीं घूमते थे। टोपी कहें या पगड़ी, असली इज्जत वही थी।

गांधीजी ने कभी टोपी नहीं पहनी, लेकिन गांधीवादी लोग सफेद टोपी पहनने लगे। नेहरू आधुनिक विचारों के होते हुए भी, टोपी पहनते थे। राजनीति में टोपी पहनी भी गई, जनता को पहनाई भी गई, और दूसरों की टोपी उछाली भी गई।।

वह समय था जब हर सज्जन और सभ्रांत पुरुष काली टोपी पहनता था। ग्रामीण अंचल में किसान पगड़ी बांधते थे, और पसीना पोंछने के लिए रूमाल नहीं, लाल गमछा रखते थे, कहीं कहीं यह अंगोछे की शक्ल का भी होता था।

हमारा विद्यालय तब एक तरह से सरस्वती का मंदिर ही था, बस उसका नाम गणेश विद्या मंदिर था। शहर की महाराष्ट्र साहित्य सभा उसका संचालन करती थी, और अधिकांश वरिष्ठ शिक्षकों का परिधान धोती, कुर्ता, कुर्ते पर खुले गले का कोट, काली टोपी और आंखों पर चश्मा ही होता था। वे तब के शिक्षा, संस्कार और नैतिकता के ब्रांड एम्बेसडर थे। उनका आचरण छात्रों के लिए अनुकरणीय होता था।।

वह समय था, जब घरों में, मोटी मोटी दीवारों में खूटियां हुआ करती थीं, जिन पर छाता, कुर्ता और टोपी टांगी जाती थी।

हम आज भले ही वाहन चलाते वक्त सुरक्षा हेतु हेलमेट ना पहनें, लोग घर से बाहर जाते समय सर पर टोपी लगाना और हाथ में छाता ले जाना नहीं भूलते थे।

जब परिवेश बदलता है तो परिधान भी बदलता है। सर की टोपी और पगड़ी आजकल गायब हो चुकी है, विदेशी परिवेश में धोती कुर्ते की जगह सूट बूट ने ले ली है और गले के रूमाल का स्थान टाई ने ले लिया है। पहले कैप आई और पश्चात् मंकी कैप।।

सर पर टोपी अथवा पगड़ी अनुशासन और अस्मिता का प्रतीक है। पुलिस, और फौज में आज भी वर्दी और कैप अनिवार्य है। पब्लिक स्कूलों में आज भी यूनिफॉर्म अनिवार्य है। बेचारा रूमाल तो आजकल शर्म के मारे छोटा होकर पर्स का नैपकिन हो गया है।

हमारे परिवार में पिताजी की आज एक ही तस्वीर उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने काली टोपी लगा रखी है।

क्या समय था, जब मांगलिक अवसरों पर की जाने वाली पुरुषों की कपड़ा रस्म में धोती कुर्ता, रूमाल अथवा अंगोछे के साथ टोपी भी रखी जाती थी।।

महिलाएं आज भी धार्मिक स्थलों में जाते वक्त सर पर पल्लू ले लेती हैं, कई पूजा स्थलों में पुरुष को भी सर ढंकना होता है, जेब का रूमाल तब बहुत काम आता है। लोग तो रूमाल रखकर, बस की सीट तक रोक लेते हैं। सर कहें अथवा मस्तक, यह अगर सदके में झुकता है तो गर्व से उठता भी है।

आज भले ही टोपी हमारे सर से गायब हो गई हो, रूमाल ने आज भी हमारा साथ नहीं छोड़ा। हमारी साख ही हमारी पगड़ी है। दूल्हा आज भी जीवन में एक बार ही सही, पगड़ी जरूर पहनता है। जो आज भी अपनी अस्मिता और गौरव को बनाए रख रहे हैं, उनके लिए टोपी और पगड़ी आभूषण है, सम्मान, सादगी और अभिमान का प्रतीक है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३२ ☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सहनशक्ति बनाम दण्ड। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३२ ☆

सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘युगों -युगों से पुरुष स्त्री को उसकी सहनशीलता के लिए ही दण्डित करता आ रहा है,’ महादेवी जी का यह कथन कोटिश: सत्य है,जिसका प्रमाण हमें गीता के इस संदेश से भी मिलता है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है’,क्योंकि उसकी सहनशीलता उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एक सीमा तक तो सहनशक्ति की महत्ता स्वीकार्य है,परंतु उसे आदत बना लेना कारग़र नहीं है। इसलिए मानव में विरोध व प्रतिकार करने का सामर्थ्य होना आवश्यक है। वास्तव में वह व्यक्ति मृत के समान है,जो ग़लत बात को ग़लत ठहरा कर विरोध नहीं जताता। इसके प्रमुखत: दो कारण हो सकते हैं– आत्मविश्वास की कमी और असीम सहनशीलता। यह दोनों स्थितियां ही भयावह और मानव के लिए घातक हैं। आत्मविश्वास से विहीन मानव का जीवन पशु-तुल्य है,क्योंकि जो आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता; वह परिवार,समाज व देश के लिए क्या करेगा? वह तो धरती पर बोझ है; न उसकी घर-परिवार में इज़्ज़त होती है,न ही समाज में उसे अहमियत प्राप्त होती है। अत्यधिक सहनशीलता के कारण वह शत्रु अर्थात् प्रतिपक्ष के हौसले बुलंद करता है। परिणामत: समाज में आलसी व कायर लोगों की संख्या में इज़ाफा होने लगता है। प्राय: ऐसे लोग संवेदनहीन होते हैं और उनमें साहस व पुरुषत्व का अभाव होता है।

नारी को सदैव दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है, क्योंकि उसमें अपना पक्ष रखने का साहस नहीं होता और वह शांत भाव से समझौता करने में विश्वास रखती है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहे हों; पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक या उसका समर्पण भाव– सभी नारी को उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देते हैं,जहां वह निरंतर ज़ुल्मों की शिकार होती रहती है। पुरुष दंभ के सम्मुख वह प्रतिकार व विरोध में अपनी आवाज़ नहीं उठा सकती। इस प्रकार पुरुष उस पर हावी होता जाता है और समझ बैठता है कि वह पराश्रिता है; उसमें साहस व आत्म-विश्वास की कमी है। सो! वह उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। इस प्रकार यह सिलसिला चल निकलता है। अवमानना,तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार अर्थात् विवशता बन जाते हैं और उसके जीने का मक़सद व उपादान बन जाते हैं,जिसे वह नियति स्वीकार अपना जीवन बसर करती रहती है।

यदि हम उक्त तथ्य पर दृष्टिपात करें, तो नियति व स्वीकार्यता-बोध मात्र हमारी कल्पना है,जिसे हम सहजता व स्वेच्छा से अपना लेते हैं। यदि व्यक्ति प्रारंभ से ही ग़लत बात का प्रतिरोध करता है और अपने कर्म को अंजाम देने से पहले सोच-विचार करता है,उसके हर पहलू पर दृष्टिपात करता है– शत्रु के बुलंद हौसलों पर ब्रेक लग जाती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, 2007 में प्रकाशित स्वरचित काव्य-संग्रह की अंतिम कविता की पंक्तियां– ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके/ अनगिनत बंधनों में बाँध चुके/ मुझ में साहस ‘औ’ आत्म- विश्वास है इतना/ छू सकती हूं मैं/ आकाश की बुलंदियां।’ जी हाँ! यह संदेश है नारी जाति के लिए कि वह सशक्त,सक्षम व समर्थ है। वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकती है। परंतु वह पिता,पुत्र व पति के बंधनों में जकड़ी,ज़ुल्मों को मौन रहकर सहन करती रही,क्योंकि उसने अंतर्मन में संचित शक्तियों को पहचाना नहीं था। परंतु अब वह स्वयं को पहचान चुकी है और आकाश की बुलंदियों को छूने में समर्थ है। आज की नारी ‘अगर देखना है मेरी उड़ान को/ थोड़ा और ऊंचा कर दो/ आसमान को’ में झलकता है उसका अदम्य साहस व अटूट विश्वास,जिसके सहारे वह हर कठिन कार्य को कर गुज़रती है और ऐलान करती है कि ‘असंभव शब्द का उसके शब्दकोश में स्थान है ही नहीं; यह शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।’

परंतु 21वीं सदी में भी महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय व दयनीय है। वे आज भी पिता,पति व पुत्र द्वारा प्रताड़ित होती है,क्योंकि तीनों का प्रारंभ ‘प’ से होता है। सो! वे उनके अंकुश से आजीवन मुक्त नहीं हो पाती। घरेलू हिंसा,अपनों द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार, फ़िरौती, दुष्कर्म, तेज़ाब कांड व हत्या के सुरसा की भांति बढ़ते हादसे उनकी सहनशक्ति के ही दुष्परिणाम हैं। यदि बुराई को प्रारंभ में ही दबाकर समूल नष्ट कर दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। महिलाएं पहले भी दलित थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। उनके अतीत,वर्तमान व भविष्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता; जब तक वे साहस जुटाकर ज़ुल्म करने वालों का सामना नहीं करेंगी।

वैसे यह नियम बच्चों,युवाओं व वृद्धों सब पर लागू होता है। उन्हें आगामी आपदाओं,विषम व असामान्य परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए,क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी टिक नहीं सकता। ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ सोहनलाल द्विवेदी जी इस कविता के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि यदि आप तूफ़ान से डर कर व लहरों के उफ़ान को देख कर अपनी नौका को बीच मंझधार नहीं ले जाओगे तो नौका कैसे पार उतर पाएगी? संघर्ष रूपी अग्नि में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। इसलिए कठिन परिस्थितियों के सम्मुख कभी भी घुटने नहीं टेकने चाहिएं तथा मैदान-ए-जंग में मन में इस भाव को प्रबल रखने की दरक़ार है कि ‘तुम कर सकते हो।’ यदि निश्चय दृढ़ हो, हौसले बुलंद हों,दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। नैपोलियन बोनापार्ट भी यही कहते थे कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। इस नकारात्मक भाव को अपने ज़हन में प्रविष्ट न होने दें –’जैसी दृष्टि,वैसी सृष्टि तथा नज़रें बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं और नज़रिया बदलते ज़िंदगी।’ यदि नारी यह संकल्प कर ले कि वह अकारण प्रताड़ना सहन नहीं करेगी और उसका साहसपूर्वक विरोध करेगी, ‘तो क्या’ और अब मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि ‘मैं क्या कर सकती हूं।’ उस स्थिति में पुरुष भयभीत हो जायेगा और अपने मिथ्या सम्मान की रक्षा हेतु मर्दांनगी नहीं दिखायेगा। धीरे-धीरे दु:ख भरे दिन बीत जायेंगे व खुशियों की भोर होगी,जहाँ समन्वय,सामंजस्य ही नहीं; समरसता भी होगी और ज़िंदगी रूपी गाड़ी के दोनों पहिए समान गति से दौड़ेंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५९ ⇒ गुरु बिन कौन करे भव पारा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुरु बिन कौन करे भव पारा।)

?अभी अभी # १०५९ ⇒ आलेख – गुरु बिन कौन करे भव पारा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम शिक्षक-दिवस मनाते हैं, मातृ-दिवस और पितृ-दिवस भी मनाते हैं। शिक्षक और माता-पिता को गुरु भी माना गया है, और ईश्वर-तुल्य भी ! त्वमेव माता…

वहीं दूसरी ओर गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही नहींसाक्षात ब्रह्म भी माना गया है। ऐसे सद्गुरु के दिवस को गुरु-पूर्णिमा के पर्व के रूप में श्रद्धा-पूर्वक मनाया जाता है।

माता-पिता और शिक्षा-गुरु के सत्संस्कार-स्वरूप व्यक्ति में बचपन से ही श्रद्धा, आदर और आस्था के बीज पल्लवित होने लगते हैं, जो उम्र के साथ विकसित हो, स्वभाव में विनम्रता और निष्ठा का रूप ले लेते हैं।

यह सब एक सत-शिष्य की पृष्ठभूमि ही है।।

जो चित्त में व्याप्त अंधकार को मिटाए, और ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वह सतगुरु। गुरु कोई शरीर नहीं, एक अवस्था है, जहाँ सिर्फ़ जगत के कल्याण के भाव का संकल्प ही निहित होता है।

जब शिष्य पर गुरु की अहैतुकी कृपा होती है, तब वह दीक्षा कहलाती है।

जहाँ स्वार्थ का अभाव है, सांसारिकता और भौतिक उपलब्धि की आकांक्षा नहींकेवल आत्म-कल्याण का भाव जीव में उत्पन्न होता है, तब सतगुरु का संकल्प कृपा के रूप में प्रकट होता है। एक नरेंद्र और एक रामकृष्ण-परमहंस का गुरु-शिष्य के रूप में मिलन होता है।।

गुरु अथवा ईश्वर में तब तक ही अंतर नहीं है, जब तक उन्हें व्यापक अर्थ में न लिया जाए।

ईश्वर कोई शरीर नहीं, गुरु कोई शरीर नहीं ! गुरु-तत्व और ईश्वर-तत्व एक है। गुरु के शरीर को ईश्वर मानने वाले, अध्यात्म मार्ग पर नहीं, आसक्ति-मार्ग पर अग्रसर होने लगते हैं। सतगुरु का मार्ग निष्काम कर्म, श्रद्धा, समर्पण और मोक्ष का मार्ग है। जो गुरु आपको संसार से भगाए, वह सतगुरु नहीं ! जो आपके मन के सांसारिक प्रपंच से मुक्ति दिलाए, वही सद्गुरु।

सबके चित्त में आसीन उस गुरु-तत्व को प्रणाम। गुरु-पूर्णिमा की बधाई।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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