हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०७ ☆ मुक्तक – ।। चार दिन की जिंदगानी बनाएं बेमिसाल कहानी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०७ ☆

☆ मुक्तक ।। चार दिन की जिंदगानी बनाएं बेमिसाल कहानी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

इस दुनिया के रैन -बसेरे में चार दिन रहना है।

जीत लो बस दिल सबका  ही यही कहना है।।

तेरे कर्म तेरे मीठे बोल बस यही साथ जाएंगे।

मिले सबका संग-साथ यही जीवन का गहना है।।

=2=

बहुत कम समय मिलता बस साथ बिताने को।

मत गवां देना   इसे बस  तुम रूठने मनाने को।।

शिकवा शिकायत में ही यह वक्त न निकल जाए।

बस तैयार रहना हमेशा  हर रिश्ता निभाने  को।।

=3=

नजर के फेर में तुम नजारों को मत गवां देना।

खो कर  यकीन तुम सहारों को मत गवां देना।।

उठो ऊपर कितना भी जुड़े रहना जमीन के साथ।

भगा कर तेज नाव  किनारों को मत गवां देना।।

=4=

जीवन प्रतिध्वनि सा लौटकरआती आवाज वही है।

अच्छा बुरा झूठ सच करना हमेशा अच्छी बात नहीं है।।

जैसा दोगे वैसा पाओगे   यही नियम है सृष्टि का।

सुखी सफल जीवन का   बस एक  जवाब यही है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७० ☆ कविता – स्वामी विवेकानंद… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – स्वामी विवेकानंद। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७०

☆ स्वामी विवेकानंद…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

युवा तापस जिसने ऊंची उठाई धर्म-ध्वजा शिकागो में जिसकी वाणी,

मुग्ध जग सुनता रहा विवेकी, अध्यात्म ज्ञानी तेज था

बंगाल का इसी भारत का समर्पित देश प्रेमी लाल था ।।।।

*

जगो, उठो, बढ़ो आगे बराबर बढ़ते रहो

लक्ष्य जब तक पा न जाओ सतत् संकल्पित रहो।

*

शक्ति संचय, साधना हो मनुज सेवा के लिए

सदा जागृत भावना हो देश सेवा के लिए ।।2।।

*

सिखाया जिसने हमें अपने प्रखर व्यक्तित्व से

विचारों से धर्म से सत्कर्म को अस्तित्व दे।

ज्योति जिसकी आज भी देती है हमको रोशनी

उन विवेकानन्द की तप त्यागमय थी जीवनी ।।3।।

*

देती है सबको सहज कर्तव्य की नित प्रेरणा

भरती है हरेक के मन को एक पावन चेतना

उस व्रती के चरणों मेंरख भाव के श्रद्धा सुमन

विश्व सेवा के लिए आओ करें हम आज प्रण ।।4।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९८ – गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवित हम जलते गाँधी

? रचना संसार # ९८ ☆

☆  गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

सत्य अहिंसा प्रेम खो गया,

जीवित हम जलते गाँधी।

छलनी बंदूकों से छाती,

बस आँसू बहते गाँधी।।

*

रोती फिरती भावुक विमला,

नोचे बन दानव सारे।

पुरबी हवा हुई बोझिल है,

आये पश्चिम के धारे।।

भूले वेद धर्म सनातनी,

सत्य बात कहते गाँधी।

*

घाव प्रदूषण देता गहरा,

जले धूप से है काया।

आहत मंदिर-मस्जिद दोनों

नेताओं की है माया।।

बजता डंका महँगाई का

दंश सभी सहते गाँधी।

*

वैचारिक मतभेद हुए हैं,

घुन लगती सुविधाओं में।

मधुमक्खी के छत्ते लगते,

संत रहें दुविधाओं में।।

मंगल गीतों का टोटा है,

हम दुख में पलते गाँधी।

*

अनुशासन का नाम नहीं अब,

आँधी हैं हड़तालों की।

कुहरा छाया है युद्धों का,

कूटनीति घडियालों की।।

ओढ़े चादर लाचारी की,

हाथ सभी मलते गाँधी।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१७) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१७) ? ?

क्या आजीवन

बनी रहेगी तुम्हारी चुप्पी?

प्रश्न की

संकीर्णता पर

मैं हँस पड़ा,

चुप्पी तो

मौत के बाद भी

मेरे साथ ही रहेगी!

 ?

© संजय भारद्वाज   

( 2.9.2018, प्रातः 9:01 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०७ ☆ संतोष के दोहे  – टूटा सबका धीर… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय संतोष के दोहे  – टूटा सबका धीर..  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०७ ☆

संतोष के दोहे  – टूटा सबका धीर☆ श्री संतोष नेमा ☆

दहल गया दिल देख कर,दिल्ली की तस्वीर |

वीभत्स अग्नि कांड से,टूटा सबका धीर ||

*

टूटा सबका धीर,संकट बड़ा गहराया |

बहे नयन से नीर,किसी को समझ न आया ||

*

कहते कवि “संतोष”,करें अब जांच की पहल |

बढ़े न जन आक्रोश,शहर फिर न जाए दहल ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २६ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मनवा बैरी।)

☆ शशि साहित्य # २६ ☆

? कविता – मनवा बैरी…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं,  तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का,,

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का,,,

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१५) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१५) ? ?

‘चुपचाप रहो’

दो शब्दों का मेल

कहने वाले-सुनने वाले

के भीतर

मचा देता है

विचारों का कोलाहल!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, 8:36 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ उसूल फ़िज़ूल हुए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – उसूल फ़िज़ूल हुए…!

☆ ॥ कविता॥ उसूल फ़िज़ूल हुए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

ग़ज़ब का  फ़लसफ़ा है, ग़ज़ब  की बयानी है,

हरेक का अपना फ़साना है,अपनी कहानी है।

*

हर कोई  भीतर से ज्वालामुखी-सा उबल रहा,

दिल में उठा तूफ़ाँ है, आँखों से टपके पानी है।

*

लोग परिंदों की तरह आसमां में उड़े जा रहे हैं,

होश खोकर पागलपन में अँधी हुई जवानी है।

*

माथा बुलंदियों को छू रहा, पैर ज़मीं में धँसे हैं,

बर्बरों ने जन्नत को दोज़ख़ बनाने की ठानी है।

*

ज़िंदगी में उसूल फ़िज़ूल हुए, शूल-से चुभते हैं,

भोग-विलास को दुनिया हुई जाती दीवानी हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९८ ☆ बाल सजल – फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९८ ☆ 

☆ बाल सजल – फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

दूध-जलेबी खाते मिट्ठू।

मीठा गीत सुनाते मिट्ठू।।

 *

रोज हमें विज्ञान पढ़ाते

खुशियाँ रोज लुटाते मिट्ठू।।

 *

पढ़ते रामायण , गीता हैं

सच में ज्ञान बढ़ाते मिट्ठू।।

 *

कभी न करते ऊधमबाजी

जीवन कला सिखाते मिट्ठू।।

 *

कितने प्यारे लगें दुलारे

बिस्किट ,चावल खाते मिट्ठू।।

 *

रोज भोर में जग जाते हैं

कभी न आलस लाते मिट्ठू।।

 *

संग – साथ में रहें सदा ही

फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆ धूप का किला☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “धूप का किला” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆

☆ धूप का किला ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पानी रे पानी रे

चोंच नहीं डूबी चिड़िया की

कितना उथला पानी रे।

 

बह गया पसीना

काया तो गीली तक

हुई नहीं

बादल ने धरती की

छाया भी अभी तलक

छुई नहीं

 

छानी रे छानी रे

खपरैलों से झरती,गढ़ती

धूप का क़िला छानी रे।

 

मारती है चाँटा

रेत नदिया के गालों पर

टँगते हैं कलश

भरें अब तक शिवालों पर

 

धानी रे धानी रे

चाहती है धरती की देह

चूनर उजली धानी रे

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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