हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५५ ☆ रूह परिंदा तन में तड़पे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रूह परिंदा तन में तड़पे“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५५ ☆

✍ रूह परिंदा तन में तड़पे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जब जब मुझको याद करोगे

तन्हाई में शाद करोगे

 *

 जंगल जैसे काट रहे हो

बंजर भी आबाद करोगे

 *

अपनी सरपंची की खातिर

दुनिया क्या बर्बाद करोगे

 *

मौत बरसती है अंबर से

क्या क्या तुम ईज़ाद करोगे

 *

जोर बिना कब हक़ मिलता अब

नाहक ही फ़रियाद करोगे

 *

रूह परिंदा तन में तड़पे

कब तक रब आज़ाद करोगे

 *

इश्क़ न कर जब अच्छी सेहत

क्या तबियत नाशाद करोगे

 *

दुनिया से बातें दुनिया की

खुद से कब संवाद करोगे

 *

मक़्ता दोस्त ग़ज़ल का आया

आखिर कब इरशाद करोगे

 *

रब्त अरुण शक़ करते बिगड़े

क्या तुम इसके बाद करोगे

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५९ – वजूद… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – वजूद।)

☆ हेमंत साहित्य # ५९ ☆

✍ वजूद… ☆ श्री हेमंत तारे  

हीना की मानिंद,  अपना वजूद खो जाने के बाद

तमाम उम्र सूरज की तपिश बर्दाश्त करने के बाद

ख़ला की जानिब चल पडती है  नामालूम शै कोई

वो रूह है, फौत होती नही दफन हो जाने के बाद

 *

बेमानी है अब रहम की बेइंतिहा बरसात जनाब

गो कि फ़रमाई है इनायत आपने पर मांगने के बाद

 *

उसका दिल टूटा,  ये हरगिज कोई गजब ही न था

खोला था दर आपने पर उसके चले जाने के बाद

 *

वो नाशुक्रा भी है  “हेमंत ” और तंग दिल इंसान भी

बहाता है अश्क बेशुमार पर जश्न ऐ बर्बादी के बाद

 

हीना = मेहंदी, शै = वस्तु, मानिंद = जैसा, रूह = आत्मा, वजूद = अस्तित्व, फौत = मृत्यू, ख़ला की जानिब = शून्य की तरफ, इनायत = कृपा

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆ कविता – मन की शुद्धि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मन की शुद्धि“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆

✍ कविता – मन की शुद्धि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मन की शुद्धि  चाहो तो, अपने भीतर झाँको तुम,

दोष न खोजो औरों के, अपना ही मन आंकों तुम।

*

क्रोध, कपट, अभिमान, ईर्ष्या, मन के ही रोग हैं,

प्रेम, दया, संतोष, क्षमा ही मन के सच्चे योग हैं।

*

सत्संग की पियो सुधा, सत्य प्रेम का दीप जलाओ,

हरि-नाम की मधुर तान से अंतर्मन को महकाओ।

*

सेवा रत रह जो जीवन बीते, तो निर्मल होता  मन,

परहित में जो सुख को ढूंढ़े, पाता वही है सच्चा धन।

*

लोभ-मोह का जाल छोड़कर सत्य मार्ग अपनाना है,

हर प्राणी में प्रभु को देखो, मन को यही समझाना है।

*

प्रति दिन थोड़ी देर बैठकर, अपने कर्म निहारो तुम,

क्या खोया, क्या पाया जग में, इसको भी विचारो तुम।

*

जब मन निर्मल, भाव पवित्र, तब ईश्वर का वास मिले,

अंतर के इस पावन मंदिर में आनंद का  प्रकाश मिले।

*

मन की शुद्धि कोई कठिन नहीं, बस इतना उपाय करो,

प्रेम, दया और हरि सुमिरन से जीवन को साकार करो।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)

☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।

भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।

शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,

“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”

बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।

शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,

“और भूख लगेगी क्या?”

बालक की आँखें झुक गईं—

“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”

बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।

शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—

“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”

“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१८ ☆ घर… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१८ ?

☆ घर ☆  प्रभा सोनवणे ☆

घरातली सगळीच घड्याळे

बंद पडली,

त्यांची टिकटिक ऐकू येत नाही!

 

बाहेर वाहनांची वर्दळ!

सवयीचे आवाज, हाॅर्नस्…

रिक्षा,बस, अँब्युलन्स…!!

सणावारी डी.जे.चं ध्वनिप्रदूषण!

 

आतल्या जगापेक्षा खूप वेगळं

बाहेरचं जग !

बाहेरच्या कोलाहलाने

काहीच बिघडत नाही,

आतल्या शांततेचं!

किती मूकं झालंय घर…

तुझ्या नसण्याने!

तू असताना—-

घड्याळे कधीच बंद

पडायची नाहीत,

इतका वेळ!

सदा टिकटिकत राहायची!

जिवंत असल्यासारखी!!!

 

कालचक्र थाबलंय जणू,

माझ्यापुरतं!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २८ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २८ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

रवींद्रनाथ टागोर व महात्मा गांधी

महात्मा गांधी हे टागोरांपेक्षा बरेच लहान. पण दोघे अगदी सख्खे मित्र होते. गंमत म्हणजे ही मैत्री ते समविचारी आहेत म्हणून होती कां, तसेही नाही. आपण म्हणतो नं, ‘तुझं माझं पटेना आणि तुझ्याशिवाय गमेना’ तसा प्रकार आहे हा! कित्येक बाबतीत त्यांच्यात मतभेद होते, कधी कधी टोकाचे, पण त्यामुळे मैत्रीत बाधा आली नाही.

त्यांच्यातल्या मतभेदाला सुरवात, गांधींजींनी शांतिनिकेतनला दिलेल्या पहिल्या भेटीपासूनच झाली. गांधीजी दक्षिण आफ्रिकेतून परत आले आणि लगेंच ६ मार्च १९१५ ला त्यांनी शांतीनिकेतन ला पहिली भेट दिली. तोपर्यंत टागोर जगप्रसिद्ध झाले होते, कारण १९१३ मध्ये त्यांना नोबेल पुरस्कार मिळाला होता.

शिक्षणाबद्दलच्या विचारात दोघांमध्ये मूलभूत मतभेद होते. गांधीजींच्या मते शिक्षण हे व्यावहारिक व सर्वांगीण विकासावर केंद्रित हवे. जागतिक प्रवाहाशी जुळवून घेण्याची त्यांना गरज वाटत नव्हती. शिक्षणक्षेत्रात तंत्रज्ञानाचा पुरस्कार त्यांना गरजेचा वाटत नव्हता. याउलट टागोरांचा शिक्षण विषयीचा दृष्टिकोन वैश्विक होता. तरीही भारतीय परंपरांचा पण शिक्षणात अंतर्भाव व्हायला हवा म्हणून त्यांनी विश्वभारती विद्यापीठाची स्थापना केली, जिथे भारतीय परंपरा व आंतरराष्ट्रीय मूल्ये यांचा मेळ घालणारे शिक्षण देणारी व्यवस्था होती. यामुळे गांधीजी शांतिनिकेतनच्या शिक्षण पद्धतीवर संतुष्ट नव्हते.

गांधींच्या मते अभ्यासाबरोबर विद्यार्थ्यांनी स्वतःची कामे स्वतः करावी. नोकर, स्वयंपाकी, झाडूवाले, पाणीवाले यांची गरज नसावी. त्यांनी हे मत टागोरांकडे व्यक्त केलं व टागोरांनीही कोणताही किंतु न बाळगता ही पद्धत अंमलात आणली. तो दिवस (१० मार्च) ‘गांधी दिवस’ म्हणून रविंद्रनाथांनी घोषित केला. आजही तेथे या दिवशी सर्व कामगारांना सुट्टी दिली जाते व विद्यार्थी सर्व कामे करतात.

स्वातंत्र्य, समता व मनुष्य धर्म यांची दोघांनाही ओढ आहे पण गांधीनी लोकलढ्याचा मार्ग अवलंबिला. मात्र टागोरांना अहिंसात्मक लढा प्रसंगी हिंसक होतो याचे भय वाटे. हा लढा सामान्य माणसातील सुप्त सामर्थ्य जागे करतो यावर दोघांचा विश्वास होता. पण विराट समुदायाच्या भावनांना गांधी ऐनवेळी कसा आवर घालणार ही चिंता टागोरांना होती. उपोषणात टागोरांना अतिरेक दिसे तर गांधीजींना त्यात आत्मशुद्धी दिसे. उपोषण हा एक अहिंसक जुलूम आहे ही टागोरांची भूमिका तर तो नैतिक बळाचा वापर आहे ही गांधीजींची भूमिका होती.

दोघेही वसाहतवाद व भांडवलशाहीच्या विरोधात होते. पण गांधीजींनी राजकारणाचा मार्ग स्विकारला आणि टागोरांनी शैक्षणिक व साहित्यिक क्षेत्राचा! असहकार चळवळ, शाळा महाविद्यालयांवर बहिष्कार, परदेशी कपडे जाळणे याला टागोरांचा प्रचंड आक्षेप होता.

रोज अर्धा तास प्रत्येकाने चरखा चालवावा असे आवाहन गांधीजींनी केले, तेव्हा टागोर उपहासाने म्हणाले, “जर यामुळे देशाला स्वातंत्र्य मिळण्यास मदत होणार असेल तर मग अर्धा तास का, साडे आठ तास का नाही?” एकूणच गांधींच्या चरखा प्रकरणावर ते टीका करत, व यामुळे भारत पुन्हा मध्ययुगात जाईल, अशी शंका व्यक्त करत.

स्वातंत्र्य चळवळीत उपेक्षित घटकांसह समाजातील सर्व घटकांच्या समावेशाचा आग्रह गांधीजींनी धरला. हिंदू मुस्लिम ऐक्य, दलितांची उन्नती यावर त्यांनी भर दिला. ते अनेकदा पाश्चात्त्य संस्कृतीवर टीका करत. याउलट टागोरांचा राष्ट्रवाद विश्व व्यापी व मानवतावादी होता.

बिहारच्या भूकंपानंतर गांधीजी म्हणाले होते, “हरिजनांना अस्पृश्य म्हणून वाळीत टाकल्याबद्दलची ही शिक्षा देवानेच दिली आहे. “

यावर टागोरांनी कडाडून टीका केली. कारण ते अंधश्रद्धेला प्रोत्साहन देण्याच्या विरोधात होते. त्यांच्या मते लोकांच्यात वैज्ञानिक दृष्टिकोन रुजला पाहिजे. वैज्ञानिक प्रगतीनेच राष्ट्र समृद्ध होईल यावर त्यांचा दृढ विश्वास होता.

दोघेही अहिंसा, सहिष्णुतेवर आधारित मानवतावाद व निसर्ग प्रेम जागृत करण्याचा प्रयत्न करत होते. दोघेही आत्मनिर्भरतेच्या बाजूने होते. दोघेही गरिबी व दयनीय अवस्थेत जगणाऱ्यांच्या बद्दल प्रेम व सहानुभूती बाळगून होते. दोघेही भारताच्या प्राचीन संस्कृतीचा व आध्यात्मिक इतिहासाचा अभिमान बाळगणारे होते.

गांधीजींच्या मते, माणसे सगुण ईश्वराची पूजा करत असतील तर ती मानसिक गरज म्हणून पहावी. जनसामान्यांना दिलासा देणारा परमेश्वर त्यांना मान्य होता. टागोरांचं उपनिषदीय अध्यात्म सामान्यांच्या पचनी पडणारं नाही म्हणून त्यांना पसंत नव्हतं.

गांधीजींना ईश्वर सत्यामधे दिसत होता तर टागोरांना ईश्वर प्रेमात दिसत होता व दोघांचे मार्गही वेगळे होते. गांधीजींनी अहिंसेच्या मार्गाने सत्य मिळविण्याचा प्रयत्न केला. तर टागोरांनी सहकार्य, परस्पर आदर व सहिष्णुतेच्या मार्गाने प्रेम म्हणजेच ईश्वर मिळविण्याचा प्रयत्न केला.

दोघांना एकमेकाबद्दल प्रचंड आदर होता. दोघे एकमेकाचे प्रचंड चाहते होते. मूल्ये सारखीच पण तपशिलात मतभेद होते. त्यांच्यात सतत पत्र व्यवहार होत होता. त्यात मतभेदांची मोकळी चर्चा व्हायची कारण दोघांनाही परस्परांची थोरवी मान्य होती. आणि त्यामुळेच गांधीजींनी टागोरांचा उल्लेख ‘गुरुदेव’ असा केला तर टागोरांनी गांधीजींना ‘महात्मा’ ही पदवी बहाल केली 

दोघांनीही मैत्रीचे नाते कसे निभावले याचीही उदाहरणे आहेत.

अनुसूचित जातींना स्वतंत्र मतदार संघ देण्याच्या ब्रिटिश प्रस्तावाच्या विरोधात गांधीजींनी येरवडा तुरुंगात उपोषण सुरू केले होते. त्यांच्या प्रकृतीची चिंता वाटल्याने टागोर स्वतः त्यांना भेटायला गेले. त्यावेळी सुदैवाने इंग्रज सरकारने त्यांची मागणी मान्य केली होती आणि या नेत्याने उपोषण सोडले. त्यावेळी महात्माजींनी टागोरांना स्वतः रचलेले गाणे गाण्याची विनंती केली आणि खरोखरच टागोरांनी ‘जीवन जाखन शुकै ए जय करुणाधारे’ हे गाणे म्हटलं.

विश्वभारतीला आर्थिक संकटातून बाहेर काढण्यासाठी निधी गोळा करणे या उद्देशाने नृत्य नाट्य पथक घेऊन टागोर दिल्ली दौरा करत होते. ही बातमी गांधीजींपर्यंत पोहोचली. इतक्या उतार वयात निधी गोळा करण्यासाठी त्यांना फिरताना पाहून गांधीजींना अतीव दुःख झाले. गांधीजी त्यांना भेटले व त्यांच्या पैशाची व्यवस्था ही केली.

टागोरांच्या मृत्यूच्या आधी एक वर्ष म्हणजे १९४० मध्ये गांधीजी कस्तुरबांसह या आजारी कवीला भेटायला गेले होते. टागोरांनी त्यांना विनंती केली की आपल्या नंतर गांधींनी विश्वभारतीचा कार्यभार स्वीकारावा. स्वातंत्र्य प्राप्तीनंतर १९५१ मध्ये विश्वभारती ला भारत सरकारने केंद्रीय विद्यापीठ म्हणून मान्यता दिली.

एकाच वेळी एकमेकांचे विरोधक व प्रशंसक असणाऱ्या या दोन महान विभूतीं सारखी शुद्ध, स्पष्ट व आदरयुक्त मैत्री पुन्हा होणे नाही.

—–

☆ गीत : ८२ ☆

TIME is endless in thy hands, my lord. There is none to count thy minutes.

Days and nights pass and ages bloom and fade like flowers. Thou knowest how to wait.

Thy centuries follow each other perfecting a small wild flower.

We have no time to lose, and having no time we must scramble for our chances. We 

are too poor to be late.

 

And thus it is that time goes by while I give it to every querulous1

 man who claims it, and thine altar is empty of all offerings to the last.

 

At the end of the day I hasten in fear lest thy gate be shut; but I find that yet there is time.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८२ ☆

मोजतसे क्षण।

कोण तुझे पण।

काळाचे बंधन।

तुला नाही॥

 

दिस राती जाती।

ऋतु सरताती।

युगे युगे भक्ती।

वाट पाही॥

 

काळ तुझ्या हाता।

फुले उमलता।

आणिक सुकता।

काय राही॥

 

सृष्टी आवडीने।

निर्मि सवडीने।

काळ कावडीने।

पाणी भरी॥

 

आम्ही तो पामर।

काळाचे चाकर।

मिळता भाकर।

सारे साहू॥

 

असे ज्याचा त्याचा ।

आपल्या वाट्याचा।

त्याच्या प्रसादाचा।

कालखंड॥

 

माझ्या वेळे साठी।

सगेच भांडती।

कसा तुझ्या साठी।

वेळ काढू॥

 

साधे ना सकळ।

न काढी जो वेळ।

तो तुझ्या जवळ।

जाता न ये॥

 

दिसाच्या शेवटी।

येतो तुझ्या कुटी।

दार जगजेठी।

लावू नको॥

 

भावानुवाद ©️ मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—– 

☆ गीत : ८३ ☆

MOTHER, I shall weave a chain of pearls for thy neck with my tears of sorrow.

The stars have wrought their anklets of light to deck thy feet, but mine will hang upon thy 

breast.

Wealth and fame come from thee and it is for thee to give or to withhold them. But this my sorrow is absolutely mine own, and when I bring it to thee as my offering thou rewardest me with thy grace.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८३ ☆

जरी चंद्रतारका घेऊन येती

पैंजण रुणझुण तुझ्या पदाला॥

*

ओवीन म्हणतो तुझियासाठी

माझ्या दुःखाश्रुंची माला

जी रुळेल तव वक्षावरती

हृदयाशी करी हितगूजाला॥

*

मानमरातब आणिक मत्ता

तूच देतसी, तूच घेतसी

दुःखावर परी माझी सत्ता

अर्पित तुजला, घे हृदयासी॥

*

भावानुवाद ©️ मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—– 

☆ गीत : ८४ ☆

IT is the pang of separation that spreads throughout the world and gives birth to shapes innumerable in the infinite sky.

It is this sorrow of separation that gazes in silence all night from star to star and becomes lyric among rustling leaves in rainy darkness of July.

It is this overspreading pain that deepens into loves and desires, into sufferings and joys 

in human homes; and this it is that ever melts and flows in songs through my poet’s 

heart.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८४ ☆ 

☆ 

विरह वेदना भुवना व्यापिते

अंबरी अगणित रचना निर्मिते॥

*

नीरवतेतुन ती अंधारी फिरते

सहसंवेदना ताऱ्यांत शोधिते॥

*

तीच आणखी बनुनी गीते 

पाऊसओल्या पानी सळसळते॥

*

ही अनुभूती वैश्विक असते

प्रेम, अपेक्षा यातही रुजते॥

*

आनंद, यातना घरोघरी पाहते

तीव्रता तयांची हृदयी सांडते॥

*

माझे कवीमन त्यात अडकते

काव्य त्यातुनी जन्मा येते॥

☆ 

– क्रमशः भाग २८

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५२ – बुन्देली कविता – ”कविता बचपन, ज्वानी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – कविता बचपन, ज्वानी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५२ ☆

☆  बुन्देली कविता – कविता बचपन, ज्वानी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

कविता बचपन, ज्वानी है

जाई कथा-कहानी है

*

लोक राग में गूँज रई

ई की कहन पुरानी है

 *

भौत पुरानी टिमकी रइ

जाने कितै हिरानी है

 *

हास लाइ की सुन्न भई

गई भैंस अब पानी – है

 *

कविता बच्चों की ठनगन

रूठन, आनाकानी है

 *

झोपड़ियों में नइँ फटकत

खुशी महल की रानी है

 *

भगवतखम्भा नोंच रई

बा बिल्ली खिसयानी है.

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२४ – खो गया वह समय ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “खो गया वह समय। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२४ ☆

☆  खो गया वह समय  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

चोट लगती रही, मुस्कराते रहे।

जिंदगी इस तरह, हम बिताते रहे।।

*

घर हमारा रहा, पर अतिथिगण बहुत।

देव कहकर अतिथि मन रिझाते रहे।।

*

दर्द  से  ही  बनें  मित्र रिश्ते सदा।

दूर से बस हमें सुख लुभाते रहे।।

*

घर अभावों का था पर्वत सा खड़ा।

प्रभु जी फिर भी कृपा बरसाते रहे।।

*

एक जुट रखना था बस परिवार को।

दीप-त्यौहार मिल-जुल मनाते रहे।।

*

नेह के उन पलों को न भूले कभी।

याद आकर हमें वे रुलाते रहे।।

*

खो गया वह समय क्यों दिखता नहीं।

प्रेम की गंग में सब नहाते रहे।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

12/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०७ ☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है किरण लता वैद्य ‘कठिन’ जी द्वारा लिखित  खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०७ ☆

☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक .. खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)

लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’

प्रकाशक: माय बुक्स 

मूल्य : २५० रु

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

खिड़की से झाँकता चेहरा समकालीन हिंदी कहानी की उस परंपरा का  संग्रह है , जिसमें कथा का उद्देश्य मनोरंजन मात्र नहीं, मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विडंबनाओं और जीवन मूल्यों को पाठक तक पहुँचाना  है। इस संग्रह की कहानियाँ किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि जीवन के साधारण से दिखने वाले प्रसंगों के भीतर छिपे असाधारण मानवीय अनुभवों को उजागर करती हैं।

लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जटिल सामाजिक प्रश्नों को सहज और संप्रेषणीय भाषा में प्रस्तुत करती हैं।

संग्रह की चौदह कहानियाँ रिश्तों, संघर्षों, स्त्री जीवन, सामाजिक असमानताओं और मानवीय करुणा के विविध रंगों को समेटती हैं।

संग्रह की पहली कहानी वीरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह कहानी अपराध, दंड और पुनर्वास जैसे गंभीर विषय को नवाचारी मानवीय दृष्टि से देखती है। एक किशोर की भूल उसके पूरे जीवन को अंधकार में धकेल सकती थी, किंतु कहानी स्थापित करती है कि मनुष्य को उसके एक अपराध से नहीं, बल्कि उसके परिवर्तन की स्वीकार्यता क्षमता से भी पहचाना जाना चाहिए। वीरा का तबला वादक के रूप में स्थापित होना केवल व्यक्तिगत सफलता की कथा नहीं, बल्कि समाज द्वारा दिए गए दूसरे अवसर की सार्थकता का प्रमाण है। कहानी में करुणा, आत्मग्लानि, संघर्ष और पुनर्जन्म की भावनाएँ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में लेखिका सफल हैं। 

शीर्षक कहानी , खिड़की से झाँकता चेहरा संग्रह की प्रभावी मार्मिक रचनाओं में है। खिड़की यहाँ केवल वास्तु का हिस्सा नहीं, बल्कि स्त्री जीवन की सीमाओं और उसकी आकांक्षाओं का प्रतीक बन जाती है। कंचन का चरित्र उस भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जो घर की चारदीवारी में कैद होकर भी बाहर की दुनिया को लालसा के साथ देखती है।

लेखिका बिना आक्रोश की भाषा के इस्तेमाल किए , स्त्री की मौन यातना को पाठक के मन तक पहुँचा देती हैं।  

कृतज्ञ , कहानी मानवीय संबंधों में स्मृति और ऋण स्वीकार की दुर्लभ भावना को रेखांकित करती है। आज के स्वार्थ प्रधान समय में जब सफलता अक्सर व्यक्ति को उसकी जड़ों से दूर कर देती है, यह कहानी बताती है कि जीवन में आगे बढ़ने के बाद भी उन हाथों को याद रखना कितना आवश्यक है जिन्होंने कठिन समय में सहारा दिया था। कहानी का भावपक्ष अत्यंत सशक्त है और पाठक के भीतर मानवीय विश्वास को पुनर्जीवित करता है।

कथनी और करनी ,  वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कहानी है। थर्ड जेंडर के प्रश्न को केंद्र में रखकर लेखिका समाज की उस दोहरी मानसिकता को उजागर करती हैं जहाँ समानता की बातें तो बहुत की जाती हैं, किंतु व्यवहार में स्वीकार्यता का अभाव दिखाई देता है। कहानी अपने शीर्षक को पूर्णतः सार्थक करती है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है।

संग्रह की शक्ति इसकी संवेदनात्मक प्रामाणिकता है। लेखिका ने जीवन को दूर खड़े होकर नहीं देखा, बल्कि उसके बीच उतरकर अनुभव किया है। इसलिए पात्र कृत्रिम नहीं लगते और घटनाएँ बनावटी प्रतीत नहीं होतीं।

भाषा सरल है, किंतु उसमें भावों की ऊष्मा बनी है। कहीं-कहीं कथानक आदर्शवादी मोड़ लेते हैं, फिर भी वे पाठक को अस्वाभाविक नहीं लगते क्योंकि उनके पीछे लेखिका का मानवीय विश्वास सक्रिय रहता है।

खिड़की से झाँकता चेहरा उन कहानी संग्रहों में है जिन्हें पढ़कर केवल कथाएँ याद नहीं रहतीं, बल्कि उनके पात्र मन में बस जाते हैं। यह संग्रह पाठक को निराशा के अंधेरे में भी आशा की  किरण दिखाता है और यही इसकी साहित्यिक उपलब्धि है।

मानवीय मूल्यों, रिश्तों की गरिमा और सामाजिक संवेदना को केंद्र में रखने वाला यह संग्रह समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति है। मेरी शुभेच्छा लेखिका के साथ हैं।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक,  समालोचक)

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ – बाल मजदूर (कलूवा) ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆

🌻लघु कथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔

मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।

ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”

“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”

“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”

कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।

आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस  गई थी।”

“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”

ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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