हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०३ ☆ “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष ” – लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना जी द्वारा लिखित  “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०२ ☆

☆ “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष” – लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष 

लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ स्मृतियों का वोल्टेज: कर्मयोग और जीवंत अनुभवों की प्रेरक साहित्यिक यात्रा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति ‘स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन, मेरा संघर्ष’, सफल इंजीनियर अनिल अस्थाना जी के करियर का लेखा-जोखा,  सिद्धांतों की आंच पर तपे कर्मयोगी के अनुभवों का सार है।

 यह आत्मकथा पाठक को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव फुलेस की धूल भरी पगडंडियों से विद्युत मंडल के शीर्ष नीति-निर्धारक पदों तक की शब्द यात्रा पर ले जाती है। पूरी पुस्तक में लेखक ने अपनी स्मृतियों को एक ऐसे प्रवाह में पिरोया है कि पाठक स्वयं को उस कालखंड और उन परिस्थितियों का हिस्सा महसूस करने लगता है।

लेखक ने अपनी जड़ों और पारिवारिक पृष्ठभूमि का चित्रण बहुत ही आत्मीयता और यथार्थ भाव से किया है। उनके पिता द्वारा संघर्षों के बीच गढ़े गए स्वाभिमान और श्रम की गरिमा ने लेखक के व्यक्तित्व की आधारशिला रखी। पंतनगर विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान ‘श्रम की गरिमा’ के जो पाठ उन्होंने सीखे, चाहे वह घास काटना हो या खेल के मैदान की चुनौतियां, वे उनके आगामी पेशेवर जीवन में मार्गदर्शक सिद्धांत बने।

 बीएचयू से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदिशा में उनकी पहली पोस्टिंग ने उन्हें यह अहसास कराया कि वास्तविक इंजीनियरिंग फाइलों के बजाय ग्रामीण भारत के उन अंधेरे कोनों में है, जहाँ बिजली की एक किरण जीवन बदल देती है।

लेखक के पेशेवर सफर में रायसेन के घने जंगलों की चुनौतियाँ हों या ग्वालियर की वर्कशॉप में किए गए नवाचार, हर अध्याय उनके ‘लीक से हटकर’ सोचने की क्षमता को दर्शाता है। विशेष रूप से रीवा में उनके कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और बिजली चोरों के खिलाफ की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ उनके निर्भीक और स्पष्टवादी चरित्र को रेखांकित करती है।

यह पुस्तक व्यवस्था के भीतर रहकर मेहनत, समर्पण और ईमानदारी के साथ काम करने की जटिलताओं और उनसे उबरने की कला को  सादगी से साझा करती है।

लेखक का दक्षिण कोरिया यात्रा का अनुभव और वहां से सीखे गए प्रबंधन के सूत्र भारतीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने की उनकी दूरदृष्टि का परिचय देते हैं।

व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के संतुलन को लेखक ने अपनी पत्नी डॉ. नीलम अस्थाना के सहयोग और समर्पण के माध्यम से सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वे स्वीकार करते हैं कि एक सफल जीवन के पीछे पारिवारिक संबल और विश्वास की कितनी बड़ी भूमिका होती है। सेवानिवृत्ति के बाद की उनकी ‘दूसरी पारी’ का विवरण, जिसमें ब्लॉगिंग, अध्यात्म और देश-विदेश की यात्राएं शामिल हैं, यह संदेश देता है कि सक्रियता और रचनात्मकता किसी उम्र की मोहताज नहीं होती।

अंततः, ‘स्मृतियों का वोल्टेज’ एक ऐसी रचना है जो प्रवाही भाषा और रोचक संस्मरणों के माध्यम से पाठकों को प्रेरित करती है। यह केवल एक व्यक्ति की विजय गाथा मात्र नहीं, बल्कि उन सभी ईमानदार अधिकारियों के संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने सार्वजनिक सेवा में नैतिकता के उच्चतम मानक स्थापित किए। यह कृति युवा पीढ़ी, विशेषकर, उभरते हुए युवा इंजीनियरों के लिए एक ‘प्रकाश-स्तंभ’ की तरह है, जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर अडिग रहने का हौसला प्रदान करती है।

इस लेखन के लिए मै व्यक्ति गत रूप से मेरे वरिष्ठ आदरणीय अस्थाना जी का अभिनंदन करता हूं। उनसे अब अन्य विभिन्न विधाओं में और भी किताबों की प्रतीक्षा रहेगी, क्योंकि उन्हें सोशल मीडिया पर नियमित पढ़ने मिल रहा है।

मंगल कामनाएं

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२० – कर्तव्य भाव का बोध ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कर्तव्य भाव का बोध। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२० ☆

☆  कर्तव्य भाव का बोध श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

सेना करे कमाल देखिए।

दुश्मन की हर चाल देखिए।।

*

सीमा पर चौकस रहते हैं।

राष्ट्र भक्ति की ढाल देखिए।।

*

जो भी कदम मिला कर बढ़ते।

उनका ऊँचा भाल देखिए।।

*

अनुशासन में पगे हुए सब।

दुश्मन है बेहाल देखिए।।

*

करें सुरक्षा हम सबकी वे।

रखें हमारा ख्याल देखिए।।

*

कर्तव्य भाव का बोध सदा।

इस पर नहीं सवाल देखिए।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

7/2/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ – मापनी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मापनी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ ☆

🌻लघु कथा🌻 मापनी 🌻

वैशाली एक साहित्य साधना में लीन महिला है। गृहणी के साथ ही साथ सभी की सेवा श्रद्धा भावना से करती है।

सृजन करते समय सभी तुकांत पदांत मापनी और विधा का ध्यान रखती है।

सदैव की भांति आज वह फिर अपनी ही खास सखी से छली गई क्योंकि उसे चाटुकारिता, चापलूसी की मापनी, विधा नही आती।

कब दीर्घ लघु बन जाता है और कब दो लघु दीर्घ बन जाते हैं। ये मापनी उसने दोस्ती, संबंधों में शायद नही सीख पाई थी।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७७ – देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७७ ☆ देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वैसे तो अपने हर शहर की लस्सी प्रसिद्ध होती हैं। लेकिन गुलाबी शहर का ये लस्सीवाला तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पूर्व काल (1944) का है। ये भी कह सकते हैं, अंग्रेजों के जमाने का है।

दही की लस्सी को पंजाब वाले अपना आविष्कार मानते हैं। हरियाणा वाले भी हिसार की भैंसों के दूध की दही की लस्सी को विश्व की सर्वोत्तम लस्सी का खिताब देते हैं। आप इसको चंडीगढ़ जैसा मसला मान सकते हैं, या फिर रसगुल्ला के जन्म स्थान बंगाल और उड़ीसा के बीच के विवाद जैसा समझ सकते हैं।

पुराने जयपुर (walled city) और नए शहर के मध्य में मिर्जा इस्माइल रोड पर ये दुकान स्थित है। आस पास में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी लस्सीवाला के नाम से मिलते जुलते नाम रख कर लस्सी बेचकर चांदी काटे जा रहे हैं।                            

लस्सी का सेवन मिट्टी के छोटे और बड़े सिकोरे (ग्लास) में उपलब्ध रहता है। सुबह सात बजे से तीन बजे दोपहर तक या स्टॉक रहने पर ही इसकी सप्लाई चालू रहती है। लस्सी अपेक्षाकृत गाढ़ी रहती है और लकड़ी की चम्मच से खाई भी जाती है। हमारे जैसे तो एक बार मुंह में ग्लास लगाने के बाद पेंदा देखकर ही रुकते हैं। बचपन से ही परिवार में इसका चलन था। दादाजी का एक कांसे का ग्लास जिसकी क्षमता तीन पाव करीब सात सौ मिलीलीटर थी। हमारा भी प्रिय बर्तन हुआ करता था।

युवावस्था में हमारे बैंक की जबलपुर सिटी शाखा से जुड़ी हुई लस्सी की प्रसिद्ध दुकान हुआ करती थी। सन ’75 के आस पास सवा रुपे का एक ग्लास मिलता था। उन दिनों में रेजगारी की किल्लत हुआ करती थी, इसलिए अकेले ही अनेकों बार चार ग्लास गटक जाया करते थे, ताकि रेजगारी की झंझट ही ना हो।

वर्तमान समय में नींबू के भाव कम करने में लस्सी सबसे अचूक हो रहीं हैं। मन में विचार आया, इसकी चर्चा कर लेते हैं, क्योंकि मीठा का सेवन तो अब प्रतिबंधित हो चुका है। कम से कम चर्चा तो कर ही सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२७ ☆ घरात वादळ… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२७ ?

☆ घरात वादळ… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

नाही अंगण नाही कर्दळ

हद्दपार ही झाली बाभळ

*

जुन्या घराचे झाले टॉवर

कॉलनीतही नाही वर्दळ

*

वारा इथला शांत भासतो

प्रत्येकाच्या घरात वादळ

*

शहरासाठी गाव सोडले

प्रदूषणाने येते भोवळ

*

डोळ्यांमधले हट्टी अश्रू

पुसले त्याने सारे काजळ

*

पक्षी सारे उडून गेले

पहा ओस ही झाली ढाबळ

*

डोंगर माथी वर्षा होता

दऱ्या दऱ्यातुन निघती ओघळ

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८४ – मत समझ हमको पराया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८४ – मत समझ हमको पराया…२ ✍

दोस्त! तू भोला भाला था

क्या नहीं तुझको पता था

यह जमाने का पुराना सिलसिला है

चाहने पर क्या मिला है?

मन जिसे चाहे जहाँ

वह वहाँ

मिलता नहीं है,

सड़क

में कीचड़ बहुत होता

पर कमल खिलता नहीं है।

भुला दे दुख दर्द अपना

छोड़ दे रोना कल्पना

एक शायर ने कहा है-

मोहब्बत के अलावा भी और गम है।

एक तेरी ही नहीं

दूसरी भी आँख नम हैं।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८३ “मकड़जाल में…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत मकड़जाल में...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “मकड़जाल में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

सुनो चतुर्भुज !

जो मशाल थी –

सुबह जलायी

वही गई बुझ ॥

 

जो भी रण था

जीत गये तुम ।

फिर भी क्यों     

टेढ़ी तेरी दुम ।

 

साज सँवार

और सामग्री –

राजकोट से जा

पहुँची भुज ॥

 

दिन का तार –

तम्य है ढीला ।

समझ चुका है

समय हठीला ।

 

कितने दस्तों*

में बाँधोगे ?

खुल न जायें सब

उनके जुज **॥

 

कहीं कहीं अस –

हज प्रवृत्ति सा ।

खड़ा हुआअव –

रोध भित्ति सा ।

 

फिर पहाड़ से

नीचे आकर ।

मकड़जाल में –

उलझा तन्तुज ॥

 

* एक निश्चित संख्या में इकट्ठे कागज

** पुस्तकाकार छापे जाने के लिये छोटे छोटे समूह में कागज

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

14-05–2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६२ ☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ।)

☆ शेष कुशल # ६२ ☆

☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन – शांतिलाल जैन 

सूरज आज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा. लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में मुल्क का भ्रष्टाचारियों, अपराधियों से मुक्त हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

आज हुआ ये श्रीमान् कि इसके पहले कि आला कचहरी में वकील सा. अपने मुवक्किल के निर्दोष होने की अपील-दलील पेश कर पाते, जिरह होती, गवाहों सबूतों की बिला पर अपने मुवक्किल को दोषमुक्त करा पाते – प्रॉसिक्यूशन ने केस ही वापस ले लिया!!! अभियुक्त पिछली रात नौ बजे तक अपोजिशन में था, अगली सुबह नौ बजे हाकिम के दल में शामिल हो गया. सुबह का भूला था श्रीमान्, अगले दिन सुबह घर आ गया था, सो आप उसे भूला नहीं कह सकते. कभी मिला करती थी क्लीन चिटें अदालतों से, अब हाकिम ने मुकदमा वापिस लेकर उसकी जरूरत ही ख़तम कर दी है. रख लें अदालतें अपनी चिटें अपने पास.

हाकिम ने पार्टी का बड़ा और भव्य दफ्तर बनवाया है मगर बाहर डोर-बेल नहीं लगवाई. दरवज्जे पे न्याय का घंटा जो लटकवा लिया है. बजाईए. अंदर जाईए. क्लीन चिट पाईए और पाईए एक मलाईदार ओहदा भी. स्मार्ट लीडर्स करप्शन करके कारागार का रुख नहीं करते, उनके गेट पर लटका न्याय का घंटा बजा लेते हैं और सेफ झोन में प्रवेश कर जाते हैं. ‘सत्तापक्ष में कोई भ्रष्टाचारी नहीं होता और विपक्ष में कोई ईमानदार नहीं होता.’ न्यायशास्त्र का ये नया सिद्धांत है, जो इस अवधारणा को स्थापित करता है कि एक विपक्षमुक्त मुल्क ही भ्रष्टाचार मुक्त मुल्क का पर्याय होता है. देखते देखते न विपक्ष में न कोई नेता बचा है न मुल्क में भ्रष्टाचार का कोई आरोपी. इस तरह आज का मुकदमा दीवानी अदालतों में आख़िरी मुकदमा साबित हुआ.

क्रिमिनल केसेस पहले ही अदालतों में पेश होना बंद हो चुके थे. इसे आप कल्लू मिर्ची के केस से समझिए. उसकी बदमाशी का मुआमला सामने आया और हाकिम के नुमाईंदे जेसीबी पर सवार होकर निकल पड़े. देखते देखते उसका मकान ध्वस्त कर दिया गया. लो साहब, हो गया न्याय. धरा रह गया सत्र न्यायालय और बैठे रह गये ‘युवर ऑनर’. पड़ीं रह गईं एफआईआर, तफ़्तीश, साक्ष्य, विवेचना, केसडायरी, रिमांड, जमानत, चार्जशीट, भारतीय न्याय संहिता, वकील, मुवक्किल. कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अब ना हाकिम पड़ता है न उसके नुमाईंदे. उनकी मर्ज़ी ही ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ है. मुल्क के आईन में अब अदालतों की जरूरत ही नहीं बची. पूरी न्यायपालिका एक झटके में बेरोज़गार हो गई है. वकीलों, न्यायाधीशों, कचहरी के कारकूनों का रोज़गार छिन गया हैं. जस्टिस सर की बेंच पर नया कोई केस लिस्ट हो नहीं रहा. कारकून खाली बैठे हैं. वकील मुवक्किलों की तलाश में भटक रहे हैं. ‘हाजिर हो’ की आवाजें गुम हैं, निस्तब्ध निरापद सन्नाटा पसरा पड़ा है. आज का दिन न्यायपालिका की सम्मानजनक विदाई का दिन है.

लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में ही न्यायपालिका की जरूरत का ख़त्म हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६४ ☆ # “सीने मे आग है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता सीने मे आग है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६४ ☆

☆ # “सीने मे आग है…” # ☆

सीने में आग है

आंखों में शोले है

कलम ने बगावत की

शब्द बारूद के गोले है

 

शब्द चुभो रहे हैं खंजर

जो बन गए हैं बंजर

उन मुर्दा इंसानों के

दिल के दरवाजे खोले हैं

 

जो गूंगे बहरे थे

जिस्म के जख्म गहरे थे

वह तड़प के जाग उठे

वह चिल्ला के धावा बोले है

 

जब हाथों में हाथ मिले

संघर्षों में साथ मिले

उनके हुंकारों को सुनकर

सिंहासन डोले है

 

वनों को काट दिया

सरमायेदारों में बांट दिया

निहत्थों ने कुल्हाड़ी उठाई तो

बोले यह कहां अब भोले हैं

 

शरीर पर लंगोटी है

कैसी किस्मत खोटी है

भूख के फाके हैं

अस्मत बाजार में तोले हैं

 

हर गरीब की यही कहानी है

आंखों से बहता पानी है

सैलाब ना आ जाए कहीं

टूट रहे बांधों के ताले हैं

 

झूठ की कश्ती पर

पाखंड की थामे पतवार

गंगा में डुबकी लगाकर

कहते हैं पाप धोले हैं/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०७ – तेरा बलिदान सरहद पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘तेरा बलिदान सरहद पर।)

☆ अभिव्यक्ति # १०७ ☆ तेरा बलिदान सरहद पर☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

सजा दो गांव की गलियां, वो मेरा लाल आया है,

लिपट कर वो तिरंगे से, तिरंगा साथ लाया है।

बता दो सबकी आंखों को, कोई नम आंख न होए,

रखी है लाज बेटे ने, मां का सर उठाया है।

*

चिता को अग्नि देने को, हजारों बेटे आए हैं,

गया था जब, अकेला था, हजारों साथ लाया है।

सजाई है चिता उसकी, बिखेरे पुष्प देवों ने,

किया स्वागत, है अभिनंदन, यही सौगात लाया है।

*

सदा कहता था, है कर्जा, मुझ पर मातृ भूमि का,

नहीं रखा, कोई कर्जा, चुका कर ही वो आया है।

सुनाता था, कई किस्से, वो जब भी गांव आता था,

सभी किस्से अधूरे हैं, अधूरापन वो लाया है।

*

सहारा था मुझे तेरा, सहारा ना रहा अब तू,

सितारों से भरे नभ ने, सितारा नव सजाया है।

तेरा बलिदान सरहद पर, ना भूलेंगी कई सदियां,

हमेशा याद सब करना, यही सपना सजाया है।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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