हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१७ – विश्व प्रेम आराधना… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक कविता “विश्व प्रेम आराधना… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१७ – विश्व प्रेम आराधना…  ☆

(समसामयिक रचना)

जग डूबा अवसाद में, छेड़ा जबसे युद्ध।

दोनों को समझा सकें, कहाँ से लाऊँ बुद्ध।।

 *

विश्व प्रेम आराधना, सुख शांति प्रासाद।

हिल -मिलकर सब रह सकें, हटे दूर उन्माद।।

 *

गीता के प्रतिसाद में, कर्म भाव ही तत्व।

जिसने जीवन को जिया, उसका बढ़ा महत्व।।

 *

जीव जगत को है मिला, आशीर्वाद प्रसाद।

नेक राह पर चल पड़ो, कभी न हो उन्माद।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – आशीर्वाद के अक्षत ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा आशीर्वाद के अक्षत”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻 💐आशीर्वाद के अक्षत 💐

आजकल पैसों से गरीब कोई नहीं होता। जो गरीब दिखते हैं वास्तव में वह कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर एकदम बेसहारा लाचार प्राकृतिक आपदा दिव्यांगता।

इन चीजों को परे हट कर  देखा जाए तो आज वास्तव में पैसा संस्कार, श्रद्धा, अपनापन, रीतरिवाज, मर्यादा, सम्मान सब भूला देता है। भीषण युद्ध का समाचार पढ़ते- पढ़ते अचानक पेपर पर निगाह दौड़ रही थी।

एक पूंजीपति इंसान की दर्दनाक मौत। वजह अकेलापन, अपनों की याद, जकड़े हुए रिश्ते और बोझिल होती साँसे।

आसमान साफ परंतु हल्की सी बूंदाबांदी मानो कह रही हो राहत तो अपनों से ही मिलती है। पर अपने है कहाँ??

तभी दरवाजे पर दस्तक। चश्मे से निहारते नयन दरवाजे पर जाकर अटकी। सामने महीने बंदी सामान लेकर आने वाला किराना व्यापारी खड़ा था। मालती— सुनिए भैया इस बार का राशन का सामान आप इस पते पर पहुंचा दीजिएगा।

व्यापारी बोला – – क्या बात है मैडम कहीं जा रही है और यह किसको देना है।

मालती ने बड़े भोलेपन और खुशी जाहिर करते हुए बोली– वह हम अपने बेटे के यहाँ जा रहे हैं। यहाँ घर पर जो बनेगा वह सब वहाँ बन जाएगा।

व्यापारी – मैडम बेटे के यहाँ सामान लेकर जा रही है? मैं कुछ समझा नहीं। अपना ही बेटा है न?

हमारा ही बेटा है। खूब बड़ी कंपनी में नौकरी करता है। कल उसने फोन पर कहा है–अपना दो-चार दिन रहने का इंतजाम करके आना।

मुझे समय नहीं मिल रहा हैअब कुछ खाना है। तो ले जाना पड़ेगा और उसे उपहार में कुछ देना पड़ेगा। उपहार ही समझो। पर चिंता न करो हम कुछ दिन उसके घर पर ही रहेंगे।

जलती तवे पर पानी की बूँदे जैसे चटपटाती है, ठीक उसी तरह उसके हृदय के बोल निकल रहे थे। बाबूजी की आवाज – – अब छोड़ो भी बच्चों के पास जा रहे हैं क्या यह काम है।

जन्मदिन पर बुलाया है आशीर्वाद के अक्षत तो लेकर जाना ही है। व्यापारी को आशीर्वाद के अक्षत और उपहार का सामान समझते देर न लगी। वह बोला– ठीक है जल्दी आ जाईयेगा और अपना ध्यान रखिएगा

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७३ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७३ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घर का चूल्हा ना जले, तो कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ता हैं। आप लोग अभी ये अनुभव नहीं करें होंगे। पुरानी कहावत है, जिस तन लगे वो ही तन जाने”, जिनको समझ ना आया हो तो ” it is bearer who knows where shoe pinches”

कल एक पुराने साथी का फोन आया, उसने बताया कि दस वर्ष पूर्व वो जयपुर में अपना गैस का कनेक्शन जमा करवा कर अपने गृह नगर आ गया था। अब उसको गैस बुक नहीं करने दी जा रही है। जयपुर के कनेक्शन के समय उसका आधार कार्ड लिंक किया गया था। उसको एजेंसी ने डिएक्टिवेट नहीं किया है।

मित्र ने ये भी कह दिया, यदि मेरा काम नहीं हुआ तो, वो अपने गृह नगर से हमारे यहां आ जायेगा। उसकी इस धमकी से हम भी डर गए, और तुरंत गैस एजेंसी चल पड़े।

गैस एजेंसी की दुकान से पांच सो गज़ पूर्व वाहन प्रतिबंधित थे। जिस तरफ भीड़ जा रही थी, हम भी उसका हिस्सा बन गए, अधिकतर लोग खाली सिलेंडर साथ लिए हुए थे।

हमें भी कुंभ मेले की याद आ गई, वहां जैसा मोहाल था। ऐसा लग रहा था आगे त्रिवेणी संगम हैं। सब हमसे आगे जाते हुए प्रतीत हो रहे थे। हम तो भरपेट भोजन किए हुए थे, इसलिए धीरे चल पा रहे थे। भीड़ वाले चेहरे परेशान से नज़र आ रहे थे। मानो कई दिनों से बिना भोजन किए जल्दी में थे। कुछ लोग वापिस भी आ रहे थे। खाली पेट “करो या मरो” जैसी स्थिति होती हैं। हमारे यहां भी कहा गया है, “भूखे भजन ना होई गोपाला”

अब हमें भी भूख लग रही है, आगे की जानकारी के लिए भाग 2 का इंतजार करें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२३ ☆ ओठावरील मोती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२३ ?

☆ ओठावरील मोती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

संशय ऋतूस अपुला आला असेल का?

संयम समीप येता ढळला असेल का?

*

डोळ्यात भावनांचा संग्राम पेटला

भात्यात बाण होता सुटला असेल का?

*

तारा नभातुनी हा वेडा खुणावतो

त्याचा तिला इशारा कळला असेल का?

*

ओठावरील मोती नथनी मधील तो

स्पर्शात जीव त्याच्या जडला असेल का?

*

गालात लाजणारा तो चंद्र कालचा

प्रणयात आज पुरता रमला असेल का?

*

तू रंग फेकला मी डागाळले जरा

तो डाग काळजावर ठसला असेल का?

*

ओढून गंध नेतो झाडाकडे मला

मज पाहताच चाफा फुलला असेल का?

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७९ – अब तो जागो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास’ की एक भावप्रवण कविता – शब्द नहीं रहे शब्द।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७९ – अब तो जागो…२ ✍

(काव्य संग्रह‘उजास ही उजास’ से )

ऋतुओं का रहस्य भी उसने ही बताया था।

हमसे बार बार होती थी भूल

और वह

हमें समझाता था

मनुष्य

के मन का भूगोल।

और इतिहास ?

हाँ, उसने कहा था-

इतिहास की बेवकूफियों से बचो

अपना इतिहास खुद रचो।

उसकी याद करते-करते

मन दहने लगा

उसका कहा सुना

आँसुओं की नदी संग बहने लगा।

और तभी

एक शिशु स्पर्श ने चेताया

हाँ,

वह घुटनों के बल आया

और बैठ गया आगे।

हमने उसकी नि:शब्द वाणी सुनी-

वह कह रहा था

अभागो!

जागो।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७८ “कहने को आखिर क्या कहते…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत कहने को आखिर क्या कहते...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “कहने को आखिर क्या कहते...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जाते हुये नहीं कुछ बोले

जर्जर खिन्न पिता ।

कहने को आखिर क्या कहते

मरणासन्न पिता ॥

 

पड़े तख्त पर ताका करते

घर की चौखट को ।

कभी जोड़ते थे जो  दोनों

नदिया के तट को ।

 

घर की प्रथक बुनावट को जो

सहज समेटे थे –

उसे बिखरता देख रह गये

जैसे सन्न पिता ॥

 

आगे की दीवार और

छत की वे शहतीरें ।

जिस पर टँगी अनेकों

धुँधली सी कुछ तस्वीरें ।

 

एक एक कर सभी नजर

आ जाती थी उनको –

जिन्हें याद कर हो जाते थे

तनिक प्रसन्न पिता ॥

 

उन्हीं घरेलू तस्वीरों में

दिखती भी निश्छल ।

अम्मा की मुस्कान सहज ही

करती उन्हें विकल ।

 

सारी स्मृतियाँ उनको

करतीं असहज सी थीं,

जो थे कभी स्वस्थ –

सामाजिक, पड़े विपन्न पिता ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

05-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५९ ☆ # “बाप की व्यथा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बाप की व्यथा…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५९ ☆

☆ # “बाप की व्यथा…” # ☆

सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर

हमारे एक पुराने मित्र से मुलाकात हुई

हाय हेलो के बाद बैठकर बात हुई

हमने पूछा-

यह क्या हाल बनाया है ?

क्या कोई बीमारी का तुम पर साया है  ?

वह बोला यार

क्या बताऊं?

कैसे जी रहा हूं ?

रोज जी रहा हूं

और रोज मर रहा हूं ?

भाई पत्नी के बिना जीना

लोहे के चने चबाना है

रोज जीना है रोज मरना है

छोटे बेटे के परिवार के साथ रहने लगा,

उनको ही अपना कहने लगा

कहने को तो तीन बेटे है

पर वह दोनों अपने परिवार में मस्त है

अपने आप में ही व्यस्त है

 

कुछ दिनों बाद परिवार में अचानक कलह हो गई

घर और संपत्ति वजह हो गई

दोनों बेटे आकर अपना हक मांगने लगे

हम कशमकश में रात भर जागने लगे

समझाने पर भी वह दोनों नहीं माने

रोज बहू बेटे आकर मारने लगे ताने

थक हारकर

हमने घर और संपत्ति बेचकर

तीनों में बराबर बांट दिया

अपना हिस्सा नहीं लिया

मैंने पूछा-

मैं कहां रहूंगा ?

कैसे जिऊंगा ?

 

उन्होंने चार-चार महीने के लिए मुझे आपस में बांट दिया

मेरी सहमति या असहमति का कोई विचार नहीं किया

तब से हर एक के पास चार-चार महीने रहता हूं

बहू बेटे के अत्याचार चुपचाप सहता हूं

कोई प्यार या कोई लगाव नहीं है

रुखे सूखे खाने में कोई चाव नहीं है

सब लोग एक-एक दिन गिनते हैं

4 महीने से एक दिन भी ज्यादा रहने नहीं देते है

मैं आजकल कुत्ते की तरह जी रहा हूं

जीते जी यह जहर पी रहा हूं

साहब मैंने जो गलती की है

वह कोई ना करें

जीते जी अपना घर और संपत्ति

बच्चों के नाम ना करें

मैं आज पैसे पैसे के लिए मोहताज हूं

कल था संपन्न

पर फकीर आज हूं

मैंने कहा-

भाई निराश ना हो

धैर्य न छोड़

कानून की सहायता ले

आस ना छोड़

वृद्ध दंपति के भरण पोषण के लिए

संतान जिम्मेदार है

कानून का राज है

न्यायालय में जाना

हमारा अधिकार है

तुम आवेदन लगाओ

और अपना हक पाओ

रिश्तो के मोह में पड़कर

तुम भावनाओं में बह गए

अपना सब कुछ लुटा दिया

अब कहीं के नहीं रहें

 

तुम्हें मेरी दोस्ती का वास्ता है

कानून की शरण ही एक रास्ता है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०२ – विभीषिका युद्ध की… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता विभीषिका युद्ध की।)

☆ अभिव्यक्ति # १०२ ☆ विभीषिका युद्ध की☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

एक धमाका,

धुएं का गुबार,

गिरा हुआ मलबा,

जलते जिस्मों की गंध,

रिश्तों का अंत

युद्ध  का परिणाम,

क्या मिलता है,

युद्ध से,

सीमा का विस्तार,

संसाधनों पर कब्जा,

संबंधों का अंत,

अहम की तुष्टि,

चीखों में वृद्धि,

पर्यावरण की क्षति,

मानवता का रुदन,

मानवता पर घाव,

विनाश के बादल,

युद्ध विनाशक,

विभीषिका युद्ध की,

क्या यही है,

मानव का विकास,

सोचिए न…

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३० ☆ कथा कहानी – सूखी पत्ती ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘सूखी पत्ती‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३० ☆

☆ कथा-कहानी ☆ सूखी पत्ती

दफ्तर की इमारत वैसी ही है जैसी सरकारी इमारतें अमूमन होती हैं— बदरंग और बेरौनक। कई सालों से उसमें रंगाई-पुताई नहीं हुई। भीतर दीवारों पर बरसाती पानी के बड़े-बड़े धब्बे बारह महीने उपस्थित रहते हैं। बाहर की दीवारें काली हो रही हैं। टॉयलेट में थोड़ी देर खड़े रहने पर छत से पानी की बूँद चाँद पर टपककर मन को पवित्र कर देती है।
गेट और दफ्तर की इमारत के बीच जो खाली ज़मीन है उसमें कई तरह के पौधे बेतरतीब उग आये हैं। उनकी कटाई-छँटाई का कोई इन्तज़ाम नहीं है। इन्हीं के बीच से दफ्तर तक का घुमावदार रास्ता गुज़रता है।

इसी दफ्तर में पाँच छः बाबू बैठते हैं। बगल में छोटा सा कमरा बड़े बाबू का है, और उसके पार साहब का कमरा। साहब के आने-जाने का कोई निश्चित वक्त नहीं है। इससे बाबुओं को कोई दिक्कत भी नहीं होती। साहब के न रहने पर आज़ादी और मौज का वातावरण रहता है। बड़े बाबू को पटा कर कोई सुविधा ली जा सकती है।

दफ्तर में बैठने वाले बाबुओं में निरंजन बाबू, बेनी बाबू, गोस्वामी बाबू और सिंह बाबू हैं। इनके अलावा एक रजक बाबू भी हैं। रजक बाबू सीधे-सादे आदमी हैं। कोई उनका मज़ाक उड़ाये  तो बुरा नहीं मानते। हल्के से हँसकर उसे झेल लेते हैं। प्रतिवाद नहीं करते। रजक बाबू का रहन-सहन बहुत सादा है, जैसा साधारण परिवारों का होता है। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे अक्सर अपने सहकर्मियों के निशाने पर रहते हैं। उनकी सिधाई और कपड़ों-लत्तों को लेकर मज़ाक चलता रहता है, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

बड़े बाबू बड़े नफासत-पसन्द व्यक्ति हैं। अच्छे सिले, साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं और माथे पर लाल तिलक लगाते हैं। पान की डिबिया हमेशा बगल में रखते हैं और एक पान मुख में। दफ्तर पहुँचते हैं तो चपरासी पूरनलाल दौड़कर उनका स्कूटर थाम कर पार्किंग के लिए ले जाता है।

रजक बाबू अब भी दीक्षितपुरा के अपने पैतृक घर में रहते हैं। घर काफी पुराना है और मुहल्ला भी पुराना, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों वाला है। दिन में कई बार ट्रैफिक-जाम होता रहता है, लेकिन रजक बाबू का मन वहीं रमता है। मित्र और सहकर्मी उन्हें कई बार बिन-माँगी नसीहत दे चुके हैं कि अब वे एक इज़्ज़तदार नौकरी में आ गये हैं, अब उन्हें अपना बसेरा किसी ऊँची कॉलोनी में बना लेना चाहिए। लेकिन रजक जी ‘मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे’ वाले हैं। वह घर और वह मुहल्ला छोड़ने की बात उनके गले उतरती नहीं।

रजक बाबू के परिवार में पीढ़ियों से कपड़े धोने और प्रेस करने का काम होता रहा है। माता-पिता ने इसी काम से कमाई की और बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। मुहल्ले में उन्हें सब जानते हैं। रजक बाबू भी खाली समय में पिता-माता का हाथ बँटाते रहे। अब दफ्तर में नियुक्त होने पर भी उन्हें अपने घर के धंधे में कोई खोट नज़र नहीं आता।

पिता ज़िन्दगी भर खड़े-खड़े प्रेस करते रहे, इसलिए अब साठ पैंसठ की उम्र में उनकी टाँगें जवाब देने लगी हैं। माँ स्थूल हो गयी हैं, उनसे ज़्यादा काम नहीं होता, इसलिए रजक बाबू सुबह- शाम उनकी मदद करते रहते हैं। माँ कपड़ों की गठरी लेकर मुहल्ले में प्रेस के कपड़े दे आती है। मुहल्ले के बाहर के भी कुछ ग्राहक हैं, उनके कपड़े पहुँचाने के लिए साइकिल पर गठरी रखकर खुद रजक बाबू निकल जाते हैं क्योंकि पिता को अब साइकिल चलाने में घुटनों में तकलीफ होती है। रजक बाबू का छोटा भाई भी है, लेकिन वह कॉलेज में पढ़ता है और उसे कपड़े लेकर लोगों के घर जाने में अपनी बेइज़्ज़ती लगती है। साथ पढ़ने वाले लड़कों-लड़कियों से टकरा जाने का भय भी होता है।

दफ्तर में रजक बाबू के इस काम को लेकर तानाकशी और फिकरेबाज़ी होती रहती है। उनके सहकर्मियों का खयाल है कि रजक बाबू के कपड़ों की गठरी लेकर घूमने से दफ्तर की इज़्ज़त गिरती है। उनके खयाल से यह काम ‘बिलो स्टैंडर्ड’ है। जिस दिन कोई सहकर्मी उन्हें गठरी के साथ देख लेता है उस दिन आक्षेप तेज़ हो जाते हैं— ‘दे आये कपड़े?’  ‘ग्राहक खुश हैं? कोई नाराज तो नहीं हुआ?’ ‘बैठने के लिए कुर्सी मिली या पूरे टाइम खड़े ही रहे?’ ‘बड़े आज्ञाकारी हो भैया।’ ‘ऊँचा पद पाने से कुछ नहीं होता, उसे मेंटेन भी करना पड़ता है।’ बेनी बाबू इस फिकरेबाज़ी में शामिल नहीं होते क्योंकि हर महीने बीस तारीख के बाद उनकी तनख्वाह चुक जाती है और ऐसे में उन्हें रजक बाबू से हजार पाँच सौ की मदद मिल जाती है। अन्य सहकर्मी इस मामले में ज़्यादा उदार नहीं हैं।

रजक बाबू कई बार अपने साथियों को बता चुके हैं कि वे यह यह काम सिर्फ अपने माँ-बाप की मदद के लिए करते हैं, कमाई के लिए नहीं। उन्हें इस काम में कुछ गलत या कोई बेइज़्ज़ती की बात नज़र नहीं आती। उनके हिसाब से कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता। किसी काम से आदमी की इज़्ज़त नहीं घटती। वे महात्मा गाँधी का उदाहरण देते हैं जो अपने सारे काम खुद ही करते थे।

यह सुगबुगाहट बड़े बाबू के कानों तक भी पहुँच चुकी है और वे एक दिन रजक बाबू को बुलाकर उन्हें लेक्चर भी पिला चुके हैं। आवाज़ में मिश्री घोल कर उन्होंने रजत बाबू को समझाया था, ‘देखो भैया, हमें तो बहुत अच्छा लगता है कि आप अपनी इज्जत की कीमत पर अपने माँ-बाप की सेवा करते हो, लेकिन कुछ बातें हैं जो आप को समझना चाहिए। मेहनत मजदूरी के काम करने वालों को हम ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ कहते हैं और दफ्तर का बाबू ‘व्हाइट कॉलर वर्कर’ होता है। ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ की कैटेगरी से उठकर ‘व्हाइट कॉलर’ की कैटेगरी में आना बड़े भाग्य की बात है। आप इस मामले में भाग्यशाली हैं। तो आपको लौटकर ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ नहीं बनना चाहिए। इससे हमारे एस्टेब्लिशमेंट की प्रतिष्ठा घटती है।’

थोड़ा रुक कर वे बोले, ‘आप समझिए कि हमारे समाज में मेहनत-मजदूरी करने वाले की इज्जत नहीं है। किसी मजदूर को किसी घर में कुर्सी पर बैठे देखा है क्या? उसे बैठने के लिए जमीन ही मिलती है। आप आज इस लायक हो गये कि समाज में इज्जत पा सकें, इसलिए आपको निचली कैटेगरी के काम से बचना चाहिए, वर्ना बड़ी मुश्किल से कमायी इज्जत कभी भी हाथ से खिसक सकती है। मैं आपको वह काम करने से मना नहीं कर रहा हूँ, लेकिन आपको खुद इस मामले में सोच समझ कर काम करना चाहिए। आप खुद सोचिए कि जो लोग आपसे दफ्तर में मिलते हैं वे आपको बाहर कपड़ों की गठरी लेकर घूमते देखकर क्या सोचते होंगे? अपनी इज्जत का खयाल हम खुद नहीं रखेंगे जो दूसरे क्यों रखेंगे?’

लेकिन इस प्रबोधन के कुछ दिन बाद मामला फिर गर्मा गया। मामला तब उठा जब रजक बाबू ने निरंजन बाबू को अपने बच्चों के लिए दफ्तर की स्टेशनरी देने से मना कर दिया। रजक बाबू दफ्तर की स्टेशनरी के इंचार्ज हैं। निरंजन बाबू तब से बिफरे हैं और उन्होंने बड़े बाबू से कह दिया है कि रजक बाबू जो कपड़े पहुँचाने का काम करते हैं उससे पूरे दफ्तर की नाक कटती है और उस पर तुरन्त कार्यवाही होनी चाहिए, अन्यथा उन्हें अपनी बात साहब तक पहुँचानी पड़ेगी।

बड़े बाबू ने रजक बाबू को तलब किया। मुलायमियत से बोले, ‘आपके अपने घर का काम करने की शिकायत बार-बार आती है। इस समस्या पर मैं सोचता रहा हूँ। मेरी समझ में आपकी समस्या की सारी जड़ यह है कि आप उस पुराने मुहल्ले में फँसे हुए हैं। वहाँ तंग गलियों में रहने से आदमी की सोच भी वैसी ही हो जाती है। मेरी मानिए तो लोन लेकर एक दो बेडरूम वाला फ्लैट ले लीजिए। अभी सब तरफ अपार्टमेंट बन रहे हैं, आसानी से मिल जाएगा। कम आउट ऑफ दैट मुहल्ला। दूसरी जगह दूसरी तरह के लोगों के साथ रहेंगे तो आपकी सोच भी बदलेगी। थिंक ओवर इट।’

रजक बाबू सहमति में सिर हिलाते हैं, फिर अपनी सीट पर बैठकर सोचते हैं। लोन लेकर फ्लैट खरीदने का मतलब है अपना चैन हराम करना। ऊपरी मंज़िल पर बिना लिफ्ट का फ्लैट मिला तो माँ-बाप से अलग होना होगा। बुढ़ापे में उनकी देखभाल और मदद कैसे होगी? उन्हें भाई के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नयी जगह में पुराने मुहल्ले जैसा सुकून, इत्मीनान और अपनापन मिलेगा?

बड़े बाबू की नसीहत याद करके रजक बाबू के मुख पर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान आ जाती है। देखते हैं कि एक सूखी पत्ती उड़कर उनके कंधे से चिपक गयी है। उसे तर्जनी और अँगूठे से झाड़ कर वे सामने रखी फाइल में व्यस्त हो जाते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०१ – धरती एक ही… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– धरती एक ही…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०१ — धरती एक ही — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अकूत धनवान सोचता था एक दिन इतना कुछ छोड़ कर जाना है। इस सोच से उसे रोना आ जाता था। इसी तरह की सोच एक फटेहाल आदमी के जेहन में कौंधती थी। कितने कष्ट से अपनी छोटी सी झोंपड़ी बनायी थी। एक दिन छोड़ कर जाना है। इस सोच से उसे भी रोना आ जाता था। शायद दुनिया के लिए यह नई बात न हो गरीब अपने जन्म की धरती के सीने पर लिखता हो मूल्यवान तो मैं भी होता हूँ।

 © श्री रामदेव धुरंधर
02 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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