हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ जन्मदिवस विशेष – मेरे गांव की कहानी, एक नई सी, एक पुरानी ☆ श्री अजीत सिंह

श्री अजीत सिंह

( हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी ने अपने जीवन का एक संस्मरण  हमारे पाठकों के लिए साझा किया है। यह संस्मरण ही नहीं अपितु हमारी विरासत है। उनके ही शब्दों में  –  “इन मौखिक कहानियों को रिकॉर्ड करने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की ज़रूरत है। वर्ना ये खूबसूरत कहानियां यूं ही खो जाएंगी। ये हमारी जड़ों की कहानियां हैं। ये जुड़ाव और संघर्ष की कहानियां हैं जो हमें और हमारी संतानों को सम्बल देती रहेंगी। इन कहानियों में गुज़रे वक़्त का समाज शास्त्र है। यह हमारा विरसा है, लोक इतिहास है। कहानियां आपस में उलझी सी हैं पर एक दूसरे को तार्किक बल देती हैं। इन में कुछ आंखों देखी हैं और कुछ सुनी सुनाई पर आपस में जुड़ी हुई। लोक इतिहास ऐसा ही होता है।” – श्री अजीत सिंह जी,  पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन

ई -अभिव्यक्ति के पाठकों के साथ इस अविस्मरणीय संस्मरण को साझा करने के लिए हम आदरणीय श्री अजीत सिंह जी के हृदय से आभारी हैं। )

? श्री अजीत सिंह जी को ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से उनके 75 वें जन्मदिवस पर अशेष हार्दिक शुभकामनाएं  ? 

☆ संस्मरण ☆ जन्मदिवस विशेष – मेरे गांव की कहानी, एक नई सी, एक पुरानी ☆ श्री अजीत सिंह ☆

उसका नाम शेरा था। वह पाकिस्तान से आया था अपने, और मेरे, पैतृक गांव हरसिंहपुरा में जो हरियाणा के करनाल ज़िले में स्थित है। वह करीबन 20 साल की उम्र में पाकिस्तान चला गया था सन् 1947 में मारकाट के दौरान। जी हां, जिसे किताबों में स्वतंत्रता काल कहा जाता है, हरसिंहपुरा के लोग उसे आज भी मारकाट के नाम से पुकारते हैं।

वह अनपढ़ आदमी था पर उसे वीज़ा देवबंद में हो रही किसी इस्लामिक कॉन्फ्रेंस के डेलीगेट के तौर पर मिला था। वह वहां के थाने में हाज़री देकर पैतृक गांव में अपने बचपन के संगी साथियों से मिलने पहुंचा था कोई तीस साल बाद। सिर के बाल भी सफेद होने लगे थे उसके और चेहरा मोहरा भी बदल गया था। गांव पहुंचा तो सबसे पहले उसे बारू नाई ने बातचीत के बाद पहचाना। आखिरकार दोनों हम उम्र जो थे और एक दूसरे के खिलाफ कबड्डी खेलते रहे थे।

शेरा ने गांव की पहचान तालाब पर खड़े बड़ और पीपल के पेड़ों से की थी। गांव के घर उसे बदले बदले नज़र आ रहे थे। बारु नाई उसे पूरे गांव में घुमा के लाया। शेरा कहने लगा, गलियां तो वही हैं पर घर सारे ही बदल गए हैं।

बात चली तो तो शेरा ने बताया कि असल में वह मारकाट से पहले की अपनी ज़मीन की जमाबंदी की नकल लेने आया था ताकि उसके सहारे वह पाकिस्तान में उसे अलॉट हुई ज़मीन पर उठे झगड़े को निपटा सके।

फिर शेरा ने एक रोचक बात बताई कि सन् 47 तक  हरसिंहपुरा और साथ लगते चार गांवों में खेती की जमीन का आधा हिस्सा त्यागी बिरादरी के पास था, चौथाई मुसलमानों के पास और चौथाई रोड़-मराठा बिरादरी के किसानों के पास था। अन्य जातियों के पास खेती की ज़मीनें नहीं थी।

पर केवल तीन जातियों में ऐसा बटवारा किस आधार पर हुआ?

इसका जवाब मेरे पूछने मेरे पिता ने दिया। जवाब क्या था, एक और रोचक कहानी थी, लगभग दो सौ साल पुरानी।

करनाल ज़िले में, जी टी रोड और यमुना नदी के बीच खादर कहे जाने वाले इलाक़े में आज भी दो गांव हैं पूंडरी और बरसत।

इन गांवों की सरहद पर एक कुआं हुआ करता था जिसमें एक दिन किसी व्यक्ति की लाश पाई गई। थानेदार ने दोनों गांवों के नम्बरदारों  को बुला लिया और कहा कि वे क़ातिल का पता कर उसे  सिपाहियों के हवाले करें। बरसत के नंबरदार ने कहा कि वह कुआं उनके गांव की सीमा में नहीं है। अब ज़िम्मेदारी पूंडरी के त्यागी नंबरदार पर आ गई। कातिल का पता नहीं चला तो सिपाही नंबरदार को ही मुजरिम मानकर ले गए। उसे सज़ा हुई और साथ में उसे मुसलमान बना दिया गया। ऐसी ही सज़ाएं होती थीं उस वक्त। नंबरदार का एक छोटा भाई भी था पर उसकी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई। भाइयों में प्यार था पर भतीजे ताऊ को पसंद नहीं करते थे। चिढ़ाते भी थे।

एक बार ताऊ ने एक छप्पर तैयार किया और उसे उठा कर लकड़ी की बल्लियों पर रखने के लिए भतीजों से मदद मांगी। वे यह कहते हुए इनकार कर गए की अल्लाह मियां रखवाएंगे! वे ताऊ का मज़ाक उड़ा रहे थे। ताऊ और उसका इकलौता बेटा बिना मदद के छप्पर नहीं उठा सकते थे।

मुसलमान बुज़ुर्ग नंबरदार ताऊ इसी दुविधा में दुखी मन से बैठा था कि तीन बैलगाड़ियों में सवार कुछ लोग वहां आए । पिताजी ने बताया कि वे सन् 1761 में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई में हार के बाद लुकते छिपते घूम रहे मराठा सैनिक या उनकी अगली पीढ़ी के वंशज थे जो हमारे पूर्वज थे। बुज़ुर्ग के अनुरोध पर उन्होंने उसका छप्पर रखवा दिया। बुज़ुर्ग के भतीजे दूर से घूरते रहे पर पास नहीं आए।

पानी पीकर आराम करने लगे तो मुसलमान बुज़ुर्ग ने पूछा कहां जाओगे। मराठा सरदार ने कहा कि बस कहीं ठिकाना जमाने की कोशिश में हैं। भतीजों की बढ़ती जा रही छेड़छाड़ से तंग बुज़ुर्ग ने कहा कि तुम यहीं ठहर जाओ , मेरे पास। बेटे की तरह रखूंगा। मेरी आधी ज़मीन मेरे बेटे की और आधी तुम्हारी होगी। उसके साथ भाइयों की तरह रहना। बुज़ुर्ग मुसलमान ने अपना वायदा निभाया । पूंडरी गांव की आबादी बढ़ी तो एक के पांच गांव बन गए पर सभी में आम तौर पर  ज़मीन की मलकीयत उसी अनुपात में रही, आधी त्यागी बिरादरी के पास , चौथाई मुसलमानों के पास और चौथाई रोड़- मराठा जाति के लोगों के पास।

सन् 1947 तक भी मुसलमानों और मराठों का भाईचारा कायम रहा। हमारे गांव में मारकाट भी नहीं हुई जबकि दूसरे गांवों में बहुत खून खराबा हुआ।  यहां  तक कि मेरे पिता ने अपने करीबी दोस्त मजीद चाचा को पाकिस्तान जाने नहीं दिया। करीब दस साल बाद वे पाकिस्तान गए क्योंकि उनके भाई कमालुद्दीन ने उनके नाम भी ज़मीन अलॉट करा ली थी।

शेरा गांव में दस दिन रहा। पटवारी और तहसील के चक्कर काटता रहा। पुराना रिकॉर्ड करनाल की तहसील में मिला। पटवारी ने बिना रिश्वत के ही काम कर दिया। शेरा का खाना गांव में अलग अलग घरों में हुआ। जाते वक़्त लोगों ने उसे खर्च के लिए 400 रुपए इकठ्ठा कर के दिए। मेरी मां ने चाचा मजीद की  पोती के लिए एक सूट दिया।

मित्रो 5 नवंबर को मेरा जन्म दिन होता है। पिछली बार 74वें जन्मदिन पर मेरे गांव की यह कहानी अनायास ही याद आ गई थी। मेरे बच्चों और उनके बच्चों को यह कहानी बड़ी रोचक लगी। इस शर्त पर कि वे आगे अपने बच्चों और उनके बच्चों तक इस कहानी को पहुंचाएंगे, मैंने इस कहानी को शब्द रूप दे दिया।

आशीर्वाद दें मित्रो, आज मेरा 75 वाँ जन्मदिन है।

©  श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन

संपर्क: 9466647037

≈ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ प्रभाव ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ प्रभाव ☆

कौन कहता है

निर्जीव वस्तुएँ

अजर होती हैं,

घर की कलह से

घर की दीवारें

जर्जर होती हैं !

 

©  संजय भारद्वाज 

( कविता संग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता।’)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

≈ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 21 ☆ आम हिन्दी पाठकों को हिंग्लिश परोसते कुछ अखबार ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “आम हिन्दी पाठकों को हिंग्लिश परोसते कुछ अखबार“. )

☆ किसलय की कलम से # 21 ☆

☆ आम हिन्दी पाठकों को हिंग्लिश परोसते कुछ अखबार ☆

भूमंडलीकरण या सार्वभौमिकता की बात कोई नई नहीं है। हमारे प्राचीन ग्रंथ ‘वसुधैव कुटुंबकम्” की बात लिख कर इसकी आवश्यकता पहले ही प्रतिपादित कर चुके हैं, लेकिन इसका आशय यह कदापि नहीं है कि आवश्यकता न होते हुए भी हम अपनी संस्कृति ,रीति-रिवाज, परंपराओं, धर्म एवं भाषा तक को दरकिनार कर दूसरों की गोद में बैठ जाएँ। बेहतर तो यह है कि हम स्वयं को ही इतना सक्षम बनाने का प्रयास करें कि हमें छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरों का मुँह न ताकना पड़े। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हम केवल और केवल नकलची बनकर नकल न उतारते फिरें।  परिस्थितियों एवं परिवेश की आवश्यकतानुरूप स्वयं को ढालना अच्छी बात है, परंतु बिना सोचे-समझे अंधानुकरण को बेवकूफी भी कहा जाता है। एक छोटा सा उदाहरण है ‘नेक टाई’ का। इसे गले में बाँधने का सिर्फ और सिर्फ यही उद्देश्य है कि ठंडे देशों में गले और गले के आसपास ठंड से बचा जा सके परंतु हमारे यहाँ मई-जून की गर्मी में भी मोटे कोट-पेंट के साथ नेक टाई पहन कर लोग अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा बताने से नहीं चूकते। आंग्ल भाषा की उपयोगिता अथवा आवश्यकता हो या न हो कुछ पढ़ेलिखे नासमझ अंग्रेजी झाड़े बिना नहीं रह पाते। हम केवल परस्पर वार्तालाप की बात करें तब क्या दो विभिन्न भाषी एक दूसरे की बात समझ पाएँगे? कदापि नहीं। बस, मैं यही कहना चाहता हूँ कि आजकल हमारे कुछ हिंदी अखबार वालों का मानना है कि वे देवनागरी में इंग्लिश लिखकर अपनी ज्यादा लोकप्रियता अथवा पहुँच बना लेंगे। ऐसा करना क्या, सोचना भी गलत होगा। एक हिंदी के आम पाठक को उसकी अपनी भाषा के अतिरिक्त चीनी, रूसी, जापानी या अंग्रेजी के शब्दों को देवनागरी में लिखकर पढ़ाओगे तो क्या वह आपके द्वारा लिखी बात पूर्णरूपेण समझ सकेगा? नहीं समझेगा न। आप सोचते हैं जो लोग अंग्रेजी समझते हैं उनके लिए आसानी है, तो जिसे अंग्रेजी आती है फिर आपके हिन्दी अखबार क्यों पढ़ेगा। दूसरी बात जिसे हिंदी कम आती है अथवा अहिंदी भाषी है, तब तो ऐसे लोग हिंदी के बजाय अपनी भाषा को ज्यादा पसंद करेंगे, अथवा अंग्रेजी को रोमन में न पढ़कर पूरा अंग्रेजी अखबार ही न खरीदेंगे।

मेरे मत से इन तथाकथित अखबार वालों की भाषा से यदि हिंग्लिश तबका जुड़ता है, जिसे ये हिंग्लिश पाठकों की अतिरिक्त वृद्धि मानते हैं तो उन्हें स्वीकारना पड़ेगा कि उससे कहीं ज्यादा इनके हिन्दी पाठकों में कमी हो रही है। उनके पास अन्य पसंदीदा  अखबारों के विकल्प भी होते हैं। आज के अंतरजालीय युग में जब हर सूचना हमारे पास आप से पहले पहुँच रही है, तब इन तथाकथित अखबारों की प्राथमिकताएँ बची कहाँ हैं। आज के तकनीकी युग एवं खोजी पत्रकारिता के चलते छोटे से छोटा अखबार भी पिछड़ा नहीं है। अब तो ग्रामीण अंचल तक अद्यतन रहते हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी की मर्यादा, सम्मान एवं संवर्धन हमारा कर्तव्य है। हिन्दी के पावन आँचल में किसी गैर भाषा के इस तरह थिगड़े लगाने का प्रयास राष्ट्रभाषा का अपमान और मेरे अनुसार राष्ट्रद्रोह जैसा है। विश्व की किसी भी भाषा, संस्कृति अथवा परंपराओं से घृणा अथवा अनादर हमारी संस्कृति में नहीं है। हमारे नीति शास्त्रों में ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ भी लिखा है। आज हिन्दी की विकृति पर तुले हुए लोग हठधर्मिता की पराकाष्ठा पार करते नजर आ रहे हैं। इनकी अपने देश, अपनी संस्कृति एवं अपनी राष्ट्रभाषा संबंधी प्रतिबद्धता भी संशय के कटघरे में खड़ी प्रतीत होने लगी है। आज आप किसी भी पाठक से पूछ लीजिए, वह आज लिखी जा रही विकृत भाषा एवं अव्यवहारिक संस्कृति से स्वयं को क्षुब्ध बतलायेगा। अब तो सुबह-सुबह अखबार पढ़ कर मन में कड़वाहट सी भर जाती है। अप्रिय भाषा एवं अवांछित समाचारों की बाढ़ सी दिखाई देती है, वहीं अखबारों की यह भी मनमानी चलती है कि हम अपने घर, अपने समूह या विज्ञापन का चाहे जितना बड़ा भाग प्रकाशित करें, मेरी मर्जी। पाठक के दर्द की किसी को चिंता नहीं रहती। सरकार भी इनकी नकेल नहीं कस पाती। सरकारी, बड़े व्यवसायियों एवं नेताओं के विज्ञापनों की बड़ी कमाई से अखबार बड़े उद्योगों में तब्दील हो गए हैं। हम चाहे जब अखबार के मुख्य अथवा नगर पृष्ठ तक में एक अदद पूरी खबर के लिए तरस जाते हैं, फिर नगर, देश-प्रदेश एवं समाज की बात तो बहुत दूर है। समाचार पत्रों से स्थानीय साहित्य भी जैसे लुप्त होता जा रहा है। आज दरकार है आदर्श भाषा की, आदर्श सोच की और आदर्श अखबारों की। साथ ही देश तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व की। मैं मानता हूँ कि समाज सुधार का ठेका अखबारों ने नहीं ले रखा है,  किंतु यह भी सत्य है कि, ये तथाकथित अखबार क्या मानक गरिमा का ध्यान रख पाते हैं।

अंत में पुनः मेरा मानना है कि आज जब हर छोटे-बड़े शहरों में पहले जैसे एक-दो नहीं पचासों अखबार निकलते हैं, तब ऐसे में अपनी व्यावसायिक तथा निजी सोच पर नियंत्रण कर ये विशिष्ट अखबार हम असंगठित पाठकों को मनमाना परोसने से परहेज करें। राष्ट्रभाषा हिंदी को हिंग्लिश बनने से बचाने के प्रयास करना हम सभी का नैतिक कर्त्तव्य है, इसे अमल में लाने का विनम्र अनुरोध है।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 67 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना के दोहे ”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 67 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

बढ़ता जब अँधियार है,

दीपक होता दीप्त।

समरसता सँग प्रेम का,

करता भाव प्रदीप्त।।

 

द्वार-द्वार पर सज रहे,

दीवाली के दीप।

चौक पुरतीं बेटियाँ

आँगन गोबर लीप।।

 

दीवाली का अर्थ है,

मन में भरो उजास।

करिए शुभ की कामना,

रखिए शुभ की आस।।

 

मन में हो सौहार्द यदि,

लेंगे हिरदय जीत।

प्रेम भाव से भेंटिए,

शत्रु बनेंगे मीत।।

 

जगमग होती हर गली,

फैल रहा आलोक।

करिए ऐसी कामना,

मिटें हृदय के शोक।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 58 ☆ मानवता की पीर लिखूँगा ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं एक भावप्रवण रचना  “मानवता की पीर लिखूँगा”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 58☆

☆ मानवता की पीर लिखूँगा ☆

खुद अपनी तकदीर लिखूँगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

रंजो-गम जो कह ना पाए

अपनों से कभी लड़ न पाए

हलातों से उलझी हुई मैं

मन की टूटी धीर लिखूंगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

कैसे सिसकीं मेरी आँखें

अरमानों की उठी बरातें

मन के कोने में बैठा वह

कहता अब जागीर लिखूँगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

कोरोना से डर कर बैठे

सच्चाई से जबरन ऐंठे

समझ सके न झूठ की फितरत

कैसे मैं रणवीर लिखूँगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

बे-कामी अरु बेरुजगारी

युवकों की बढ़ती लाचारी

भ्रमित हो रही नई पीढ़ी

क्या उनकी तदवीर लिखूँगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

खतरे में नारी की अश्मिता

दुस्साशन की बढ़ी दुष्टता

कृष्णा कौन बचाने आये

कैसे हरते चीर लिखूँगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

भ्रष्टाचार गले तक पहुँचा

जिसने चाहा उसने नोंचा

“संतोष” कब तक चुप रहेगा

साहस से शमशीर लिखूँगा

मानवता की पीर लिखूँगा

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेखर साहित्य # 13 – ग़ज़ल ☆ श्री शेखर किसनराव पालखे

श्री शेखर किसनराव पालखे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेखर साहित्य # 13 ☆

☆ ग़ज़ल ☆

शेवटी शेवटाचा खेळ सुरू जाहला

खरेपणाने मांडलेला डाव झुरु लागला

रमावे तरी किती जुन्याआठवांमधे

कि ‘त्या’ची चाहूल लागली आहे मला?

समाधानी जीव हा व्हायचा परंतु

न कळे असा हा कसा घात झाला?

रात्र ही काळी संपली नाही अजुनी

वर्षाव तारकांचा का मधेच थांबला?

पाहता मागे वळूनी हे नेत्र वाहिलेले

लगेच भावनांचा का बांध फुटू लागला?

खेळ शेवटाचा मग पुन्हा सुरू जाहला

सावराया आता वेळ नुरू लागला

तारून न्यावी कशी ही नौका पैलतीराला

रात्रंदिन लागे ही काळजी जीवाला.

 

© शेखर किसनराव पालखे 

सतारा

17/05/20

(टीप:  गजल की प्रत्येक पंक्तियों के पहले अक्षर से रचनाकार का नाम शेखर किसनराव पालखे सतारा बनता है। )

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य #79 ☆ व्यंग्य – आश्वासन के सम्मान में वोट ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की एक समसामयिक एवं सार्थक व्यंग्य  आश्वासन के सम्मान में वोट ।  इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 79 ☆

☆ व्यंग्य – आश्वासन के सम्मान में वोट ☆

हम भारत के लोग सदा से आश्वासन का सम्मान करते आये हैं. प्रत्येक चुनाव में हर पार्टी के घोषणा पत्र निखालिस आश्वाशन ही तो होते हैं, जिनके सम्मान में नेता जी सादर चुन लिये जाते हैं.  सरकारें बन जाती हैं फिर आश्वाशन पूरे हों न हों यह जनता के भाग्य पर निर्भर करता है. हम स्वयं अपने वोट से उत्साह पूर्वक अपने ही उपर राज करने के लिये चार किंबहुना समान चेहरो मे से किसी न किसी को चुन ही लेते हैं वह भी केवल उसके आश्वाशन का सम्मान करते हुये.

डाक्टर मरीज को आश्वासन देता है और बीमार महंगी दवाइयों पर भरोसा कर लेता है. बच्चे को माता पिता ईनाम का आश्वासन देते हैं और वह उसके सम्मान में मन लगाकर पढ़ने बैठ जाता है. पति पत्नी एक दूसरे को रोज दिये जाते  आश्वासनो की पूर्ति में दाम्पत्य की इबारत लिखते रहते हैं. मालिक नौकर को वेतन बढ़ाने का आश्वासन देते हैं और वह उसके सम्मान में एक आशा के साथ महीनों निकाल देता है. मतलब हम सदा से आश्वासन का सम्मान करते आये हैं.

सामान्यतः सम्मान पोस्टपेड एक्टिविटी होती है. पहले लोग अपना सर्वस्व दांव पर लगा देते हैं, एक जुनून के पीछे. तब कहीं व्यक्ति के कार्य फलीभूत होते हैं और जब धरातल  पर प्रयास कार्य में परिणित हो जाते हैं तब जब समाज उनका मूल्यांकन करता है तब बारी आती है सम्मान की. पर संयुक्तराष्ट्र संघ ने चैम्पियन्स आफ अर्थ का प्रतिष्ठापूर्ण सम्मान हमारे प्रधान मंत्री जी को प्रदान किया है.  वास्तव में यह हर भारत वासी के लिये गर्व की बात है. मैं  भी बहुत प्रसन्न हुआ. न केवल इसलिये कि प्रधानमंत्री जी के सम्मान से दुनियां में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है बल्कि इसलिये भी कि संयुक्त राष्ट्र संघ  आश्वासन पर यह सम्मान देता है.  यह सम्मान कार्य होने से पहले ही कार्य के आश्वासन का है. हमारे प्रधानमंत्री जी ने एक संकल्प, एक ढ़ृड़ता एक कमिटमेंट प्रदर्शित किया है कि २०२२ तक एकल उपयोग वाली सभी तरह की प्लास्टिक को भारत से हटा दिया जावेगा.इसी तरह उन्होने सोलर पावर के उपयोग के प्रति भी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है  यह असाधारण नेतृत्व क्षमता सचमुच सम्मान योग्य है. संयुक्त राष्ट् संघ ने प्रधानमंत्री जी के इस महत्वपूर्ण कमिटमेंट को चेंपियन्स आफ अर्थ पुरस्कार से रिकगनाईज किया है.

ऐसे पुरस्कारो से सम्मान करने वाली संस्थाओ को प्रेरणा लेनी चाहिये.मतलब यह कि न केवल परिणामो का सम्मान हो बल्कि परिणामो के लिये प्रतिबद्धता का भी सम्मान किया जाना चाहिये. सम्मान केवल काम करने पर ही नही अब काम करने की योजनाओ पर भी दिये जाने शुरू कर दिये जाने चाहिये जिससे समाज में और रचनात्मक व सकारात्मक वातावरण बने.

यानी मैं उन अकादिमियो की ओर आशा भरी निगाहो से देख रहा हूं जो सम्मान के लिये प्रविष्टियां बुलाती हैं. नामांकन में आवेदन के प्रारूप में प्रकाशित पुस्तको की प्रतियां मांगती हैं. अब इसमें संशोधन की गुंजाइश है. किताब लिखने के संकल्प पर, लेखन के कमिटमेंट पर भी संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुकरण करते हुये पुरस्कार दिया जा सकता है.

खैर लेखन के आश्वासन पर जब पुरस्कार मिलेंगे तब की तब देखेंगे, फिलहाल फ्री वेक्सीन, फ्री लैपटाप, लाखों नौकरियो  के आश्वासनो के सम्मान में न सही अवार्ड कम से कम वोट तो दे ही रहे हैं हम.

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 70 – अपेक्षा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक लघुकथा  “अपेक्षा”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 70 ☆

☆ अपेक्षा ☆

उसने धीरे से कहा, ” आप सभी को कुछ ना कुछ उपहार देती रहती हैं|”

“हाँ,” दीदी ने जवाब दिया, ” कहते हैं कि देने से प्यार बढ़ता है|”

“तब तो आपकी बहू को भी आपको कुछ देना चाहिए| वह आपको क्यों नहीं देती है?” उसने धीरे से अगला सवाल छोड़ दिया|

“क्योंकि वह जानती है,” कहते हुए दीदी रुकी तो उसने पूछा,” क्या?”

“यही कि वह जो भी प्यार से देगी, वह प्यारी चीज मेरे पास तो रहेगी नहीं| मैं उसे दूसरे को दे दूंगी| इसलिए वह अपनी पसंद की कोई चीज मुझे नहीं देती है|”

“तभी आपकी बहु आपसे खुश है,” कहते हुए उसे अपनी बहु की घूरती हुई आंखें नजर आ गई |जिसमें घृणा की जगह प्रसन्नता के भाव फैलते जा रहे थे |

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

14-09-20

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 40 ☆ बदलू और बदलागिरी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “बदलू और बदलागिरी”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 40 – बदलू और बदलागिरी☆

वक्त बदलता है ये तो सही है, पर पूरा कार्य करवाने के बाद न पहचानना,ये खूबी कुछ लोगों में ही पायी जाती है। ऐसी ही कहानी है बदलू की, जो दलबदल करने वाले लोगों से भी एक हाथ आगे जाकर अपनी रणनीति बनाता है। नीति कोई भी हो, शोध की हद पार करते ही सबको समझ में आने लगती है। कुछ लोग मौनव्रत धारी होते हैं। ठीक समय पर हाजिर होकर हाजिरी लगवाई और चलते बनें।

हाजिरी लेने वाले भी ऐसे लोगों से ही दोस्ती रखते हैं। आखिर शो बाजी का जमाना जो ठहरा। थोड़ा बहुत दिखावा किया और शो मैन बनकर चलते बनें। काम करने वाला करता रहे, उससे किसी को कोई लेना देना नहीं होता। बदलू जी के पास वैसे भी कोई ज्यादा देर टिकता ही नहीं है।

दूध से मक्खी की तरह निकाल कर फेंकने में इन्हें महारथ हासिल है। पर मक्खी तो स्वभाव से ही मीठे पर मंडराने वाली होती है। सो भिन- भिन करती हुई उड़ती रहती है। कुछ लोग जो  बैठे हारे मक्खी मारते रहते हैं, वे तो हमेशा ऐसा ही करेंगे पर बदलू अपनी बात पर अड़िग ही नहीं रह सकता सो कोई न कोई नया आयोजन करता रहता है। सच तो ये है जब कोई कार्य अच्छा हो तो उसे अपना बनाकर आधिपत्य हासिल करने में जो मजा है वो और कहीं नहीं हो सकता। ऐसे ही ये क्रम चलता चला आ रहा है क्योंकि लोग बदलागिरी से दूर रहकर शांति प्रिय जीवन जीना चाहते हैं।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 47 ☆ गीत – सकल सृष्टि में जीवन भरते ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक गीत “सकल सृष्टि में जीवन भरते ”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 47 ☆

☆ गीत – सकल सृष्टि में जीवन भरते ☆ 

पश्चिम में सूरज जी छिपते

पूरब में चंदा जी उगते।।

दोनों का वंदन – अभिनंदन

सकल सृष्टि में जीवन भरते।।

 

निशा बढ़ी ज्यों धीरे- धीरे

चंदा का बिखरा उजियारा

तारों की झालर वे लेकर

दिखा रहे छवियों को प्यारा।।

 

शरद पूर्णिमा वंदित- नंदित

हर्षित मन में पुष्प बरसते।।

सकल सृष्टि में  जीवन भरते।।

 

शीतल रात हुई नभ शोभित

दमक रहा हर झिलमिल कोना

प्रियतम बंशी ले मुस्काएँ

रास रचाएँ सोना- सोना।।

 

हर गोरी की प्यास बुझ रही

कामदेव के अहमा मरते।

सकल सृष्टि में जीवन भरते।।

 

खूब नहाए हम जी भरकर

अनुपम छटा गीत है गाती

मौन हो गईं सभी दिशाएँ

शशि की सोलह कला सुहातीं।।

 

पूरी धरती धवल हो गई

चंदा के नए रूप उभरते।

सकल सृष्टि में जीवन भरते।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares