(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – कश्मीर यात्रा – जन्नत की सैर – भाग-१७ ☆ श्री सुरेश पटवा
जम्मू-कश्मीर अपने अंदर अद्भुत खूबसूरती समेटे हुए है। यहां की अनोखी खूबसूरती के कारण ही कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। कश्मीर की प्राकृतिक वादियां, झरने, नदियां, बर्फ से ढके पहाड़ और घने जंगल यहां की खूबसूरती को इस कदर बढ़ाते हैं कि हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक जम्मू कश्मीर की ओर खिंचे चले आते हैं।
06 जुलाई 2022 को सुबह चार बजे उठकर छै बजकर पचपन मिनट की फ़्लाइट पकड़ने पाँच बजे लेह की होटल से रवाना हुए। होटल ने नाश्ते के लिए सैंडविच और फ़्रूट जूस पैकेज रख दिए हैं। लेह हवाईअड्डा पर बहुत अफ़रातफ़री का माहौल था। पहले तो अंदर घुसने की लम्बी क़तार, फिर चेक-इन काउंटर पर भारी भीड़ और काउंटर बदलने की क़वायद ने सब का मूड पूरी तरह ख़राब कर दिया। उस पर चिड़चिड़ाते यात्रियों के झगड़ों ने बचीखुची कसर निकाल दी। तीन काउंटर बदलने के बाद चेक-इन हुआ तो काउंटर पर कार्यरत कर्मचारी बोर्डिंग पास दिए बग़ैर काउंटर बंद करके चलती बनी। हम गो-फ़र्स्ट एयरलाईन कम्पनी के स्टाफ़ के पीछे बोर्डिंग पास के लिए भटकते रहे। यह तो अच्छा था कि सौम्या ने ई-वेब चेक-इन करके बोर्डिंग पास डाउनलोड कर रखे थे। उसमें भी एक नई समस्या आ खड़ी हुई। सौम्या का बोर्डिंग पास मोबाईल में नहीं खुल रहा था। गेट पर, फिर विमान में चढ़ने पर अनेक दिक़्क़त का सामना किया। अंत समय में चेकिंग कर्मचारी से हॉटस्पॉट लेकर बोर्डिंग पास दिखा कर विमान में सवार हुए। विमान में भी अव्यवस्था ने पीछा नहीं छोड़ा। वह विमान लेह से श्रीनगर होकर मुंबई जा रहा था। हमारी कुर्सियाँ अंत में 28-F, 29-F और 30-F थीं। ऊपर के सामान रखने की जगह बिल्कुल भी ख़ाली नहीं थी। यात्रियों की बहस से माहौल गर्माया हुआ था। आख़िर में यात्रियों ने घुटनों पर हैंडबैग रखकर बैठना ठीक समझा। विमान ने उड़ान भरी।
नीचे सिंधु नदी की घाटी में धीर-गम्भीर सिंधु नदी का नजारा दिखने लगा। हल्के बादलों से विमान ऊपर उठकर श्रीनगर की तरफ़ उड़ चला। हम थोड़ी सी देर में ही हिमशिखरों के ऊपर उड़ान भर रहे हैं। जँसकार घाटी से निकलती छोटी नदियों का बहाव सिंधु तरफ़ जा रहा हैं। कारगिल के नज़दीक द्रास दर्रा जैसे ही निकला सूखे पहाड़ हरेभरे पर्वतों में बदलने लगे। कल लद्दाख़ के ड्राइवर ने पूछा था कि साहब कल कहाँ जा रहे हैं। जब हमने उसे कश्मीर बताया तो वह बोला-कश्मीर में हरियाली के अलावा कुछ नहीं है। कश्मीरी टैक्सी चालक ने पूछा कि साहब कहाँ से आ रहे हैं। हमने लद्दाख़ बताया तो वह बोला- वहाँ सूखे पहाड़ों के अलावा कुछ नहीं है। सबको अपना स्थान प्यारा होता है। होटल में पोहा-चाय का नाश्ता किया। ग्यारह बजे श्रीनगर घूमने निकले।
श्रीनगर (Srinagar) भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य का सबसे बड़ा शहर और ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यह कश्मीर घाटी में झेलम नदी के किनारे बसा हुआ है, जो सिन्धु नदी की प्रमुख उपनदी है। प्रसिद्ध डल झील और आंचार झील भी श्रीनगर का महत्वपूर्ण भाग हैं। कश्मीर घाटी के मध्य में बसा दस लाख से अधिक जनसंख्या वाला यह नगर भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। श्रीनगर अपने उद्यानों व प्राकृतिक वातावरण के लिए जाना जाता है और यहाँ के कश्मीर शॉल, सेव व मेवा देशभर में प्रसिद्ध है।
श्रीनगर विभिन्न मंदिरों व मस्जिदों के लिए भी प्रसिद्ध है। समुद्रतल से 1700 मीटर ऊंचाई पर बसा श्रीनगर विशेष रूप से झीलों और हाऊसबोट के लिए जाना जाता है। इसके अलावा श्रीनगर परम्परागत कश्मीरी हस्तशिल्प और सूखे मेवों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। श्रीनगर का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि सम्राट अशोक मौर्य ने इस नगर को बसाया था। इस जिले के चारों ओर पांच अन्य जिले स्थित है। श्रीनगर जिला कारगिल के दक्षिण में, बुदग़म के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। ये शहर और उसके आस-पार के क्षेत्र एक ज़माने में दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल माने जाते थे — जैसे डल झील, शालीमार और निशात बाग़, गुलमर्ग, पहलगाम, चश्माशाही, आदि। यहाँ हिन्दी सिनेमा की कई फ़िल्मों की शूटिंग हुआ करती थी। माना जाता है कि श्रीनगर की हज़रतबल मस्जिद में हजरत मुहम्मद की दाढ़ी का एक बाल रखा है। डल झील और झेलम नदी (संस्कृत : वितस्ता, कश्मीरी : व्यथ) में आवागमन, घूमने और बाज़ार और ख़रीददारी का ज़रिया ख़ास तौर पर शिकारा नाम की नावें हैं। कमल के फूलों से सजी रहने वाली डल झील पर कई ख़ूबसूरत नावों पर तैरते घर भी हैं जिनको हाउसबोट कहा जाता है।
पांच मील लम्बी और ढाई मील चौड़ी डल झील श्रीनगर की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सबसे खूबसूरत झीलों में से है। दुनिया भर में यह झील विशेष रूप से शिकारों या हाऊस बोट के लिए जानी जाती है। जिसके चारों तरफ़ बीस किलोमीटर सड़क का घेरा है। डल झील के आस-पास की प्राकृतिक सुंदरता लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। डल झील चार भागों गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल और नागिन में बंटी हुई है। इसके अलावा यहां स्थित दो द्वीप सोना लेंक और रूपा लेंक झील की खूबसूरती को ओर अधिक बढ़ाते हैं।
श्रीनगर का सबसे बडा आकर्षण यहां की डल झील है। जहां सुबह से शाम तक रौनक नजर आती है। सैलानी घंटों इसके किनारे घूमते रहते हैं या शिकारे में बैठ नौका विहार का लुत्फ उठाते हैं। दिन के हर प्रहर में इस झील की खूबसूरती का अलग रंग दिखाई देता है। देखा जाए तो डल झील अपने आपमें एक तैरते नगर के समान है। तैरते आवास यानी हाउसबोट, तैरते बाजार और तैरते वेजीटेबल गार्डन इसकी खासियत हैं। कई लोग तो डल झील के तैरते घरों यानी हाउसबोट में रहने का लुत्फ लेने के लिए ही यहां आते हैं। झील के मध्य एक छोटे से टापू पर नेहरू पार्क है। वहां से भी झील का रूप कुछ अलग नजर आता है। दूर सडक के पास लगे सरपत के ऊंचे झाडों की कतार, उनके आगे चलता ऊंचा फव्वारा बडा मनोहारी मंजर पेश करता है। झील के आसपास पैदल घूमना भी सुखद लगता है। शाम होने पर भी यह झील जीवंत नजर आती है। सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी रंग झील को अपने रंग में रंग लेता है, तो सूर्यास्त के बाद हाउसबोट की जगमगाती रोशनियों का प्रतिबिंब झील के सौंदर्य को दुगना कर देता है। शाम के समय यहां खासी भीड नजर आती है।
मुगल बादशाहों को वादी-ए-कश्मीर ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। यहां के मुगल गार्डन इस बात के प्रमाण हैं। ये उद्यान इतने बेहतरीन और नियोजित ढंग से बने हैं कि मुगलों का उद्यान-प्रेम इनकी खूबसूरती के रूप में यहां आज भी झलकता है। मुगल उद्यानों को देखे बिना श्रीनगर की यात्रा अधूरी-सी लगती है। अलग-अलग खासियत लिए ये उद्यान किसी शाही प्रणय स्थल जैसे नजर आते हैं। शाहजहां द्वारा बनवाया गया चश्म-ए-शाही इनमें सबसे छोटा है। यहां एक चश्मे के आसपास हरा-भरा बगीचा है। इससे कुछ ही दूर दारा शिकोह द्वारा बनवाया गया परी महल भी दर्शनीय है। निशात बाग 1633 में नूरजहां के भाई द्वारा बनवाया गया था। ऊंचाई की ओर बढते इस उद्यान में 12 सोपान हैं। टिकट लेकर प्रवेश किया। चश्मे के किनारे से आगे बढ़ते गए। साथ में सैलानियों की भी भीड़ बढ़ती जा रही थी। फ़ोटो खींचने की जुगत में लोग पसीना-पसीना होकर उलझ रहे थे। हमें पता नहीं था कि एक महिला सैलानी अपने खाबिंद की तस्वीर खींच रही थी। हम बीच में आ गए। वह मोहतरमा बोलीं- कैसा पागल है? हमने कहा मेडम, हमें नहीं पता था कि आप तस्वीर खींच रहीं हैं। फिर आपने अपनी पागलपन की पदवी हमें क्यों दे दी। यह सार्वजनिक स्थल है आपके घर की बैठक नहीं जो आप मुफ़्त में अपनी ख़ानदानी पदवी हमें अता करें। वह महिला ग़ुस्से में लाल हो गई। उनके साथियों ने हमसे माफ़ी माँगते हुए कहा- माफ़ करें साहब, थोड़ी पागल है।
उसके बाद शालीमार बाग पहुँचे, जिसे जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के लिए बनवाया था। वे गर्मियाँ श्रीनगर के इसी बाग में बिताते थे। इस बाग में कुछ कक्ष बने हैं। अंतिम कक्ष शाही परिवार की स्त्रियों के लिए था। इसके सामने दोनों ओर सुंदर झरने बने हैं। मुगल उद्यानों के पीछे की ओर जावरान पहाडियां हैं, तो सामने डल झील का विस्तार नजर आता है। इन उद्यानों में चिनार के पेडों के अलावा और भी छायादार वृक्ष हैं। इनमें रंग-बिरंगे फूलों की भरमार है। इन उद्यानों के मध्य बनाए गए झरनों से बहता पानी भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है। ये सभी बाग वास्तव में शाही आरामगाह के उत्कृष्ट नमूने हैं। वहाँ झरनों और सरोवरों में बच्चे कूद कर नहा रहे थे, और भी अनुशासनहीनता देखने को मिलीं। एक माली सा दिखता आदमी एक गुलाब का फूल देकर कहने लगा कि कुछ ईनाम मिल जाये। पैसे नहीं देने पर बदतमीज़ी करने लगा। उसे डाँटकर भगाया। श्रीनगर में कहीं भी भिखारी परेशान करने लगते हैं।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – अचानक मिल जाती जब कभी मन की खुशी…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५१ ☆
☆ अचानक मिल जाती जब कभी मन की खुशी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख फ्रेम में सजी तस्वीर। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०२ ☆
☆ फ्रेम में सजी तस्वीर… ☆
सुगंधा तीन विषयों में एम•ए• थी तथा हर कला में पारंगत थी।वह स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी।उसका विवाह एक बैंक कर्मचारी के साथ हुआ था।भरा-पूरा परिवार पाकर वह बहुत प्रसन्न थी।वह दिन भर घर के कामों में व्यस्त रहती तथा सबको खुश रखने की चेष्टा करती। वह सब की आशाओं पर ख़रा उतरने का भरसक प्रयास करती।
एक माह पश्चात् उसने स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया। इसी बीच उसके पति ने एक योजना बनाई और उसे कार्यान्वित करने का अवसर तलाशने लगा। एक दिन उसने सुगंधा से कहा कि उसका मित्र मेडिकल अस्पताल में दाखिल है, उसे देखने चलेंगे।सो! उस दिन वह स्कूल से जल्दी लौट आई और तैयार होकर पति के साथ जल दी।
वह बहुत खुश थी कि आज उसकी पिकनिक हो जाएगी और पति के साथ अकेले समय गुज़ारने का अवसर भी प्राप्त होगा। वे सीधे उसके मित्र के पास गये और उसका पति सुगंधा को अपने मित्र के पास छोड़कर उसकी दवाइयां लेने के बहाने, वहां से चला गया। इसी बीच वह सुगन्धा की पर्ची बनवा कर व उसका ट्रीटमेंट लिखवा कर लौट आया।
सुगन्धा पति की प्रतीक्षा करते-करते थक गई थी। उसने आते ही पति से शिकायत की और उस ने क्षमा-याचना करते हुए उसे वापस घर चलने को कहा। रास्ते में उन्होंने होटल में खाना खाया और उससे कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा। रास्ते में उसने उसे बताया कि वह उसके नाम कुछ पैसा जमा कर पा रहा है… यह कागज़ उसी पॉलिसी के हैं।
वह मन ही मन फूली नहीं समा रही थी कि उसका भाग्य कितना अच्छा है… कितना अच्छा जीवन साथी मिला है उसे, जो उसका आवश्यकता से अधिक ख्याल करता है। वे दोनों हंसी-खुशी से देर रात घर लौट आए।
एक सप्ताह के पश्चात् सुगन्धा के श्वसुर ने उसके माता-पिता को बुलवाया तथा उसे घर ले जाने का फरमॉन सुनाया, जिसे सुनकर वे सकते में आ गये। उन्होंने उन पर इल्ज़ाम लगाया कि ‘उनके साथ धोखा हुआ है…उन्होंने अपनी पागल बेटी को उनके माथे मढ़ दिया है। इसलिए वे उसे अपने घर में नहीं रख सकते। इसके साथ ही उन्होंने उस पर यह भी आरोप लगाया कि उनकी बेटी चरित्रहीन है तथा वह स्वयं उनके बेटे से तलाक़ लेना चाहती है, जिसका प्रमाण वे अपनी आंखों से देख सकते हैं।
सुगन्धा के माता-पिता की बातें सुनकर उनके पांव तले से ज़मीन खिसक गयी। वे ग़ुहार लगा रहे थे कि उनकी बेटी सुशील है, पढ़ी-लिखी है, नौकरी भी करती है। सो! वे उस पर ऐसे घिनौने इल्ज़ाम लगा कर उन्हें शर्मिंदा न करें।
सुगंधा के आते ही उन्होंने उसे घर से निकल जाने को कहा। उसे काटो, तो खून नहीं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था– कि आखिर माज़रा क्या है? उसके नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। सुगंधा उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयास कर रही थी कि वह तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती। वह तो यहां पर बहुत खुश है।
इसलिए सुगन्धा ने अपने माता-पिता से लौट जाने का कहा कि वह स्वयं ही सब ठीक कर लेगी।उसने अपने पति के आने पर उससे सब कुछ कह डाला, परंतु ढाक के वही तीन पात। यह सब तो उनकी चाल थी। उसका पति किसी अन्य लड़की से विवाह करना चाहता था। इसलिए उसने माता-पिता की आज्ञा पालन हेतु उससे विवाह तो कर लिया, परंतु वह अपनी प्रेयसी को धोखा नहीं देना चाहता था। सो! उससे मुक्ति पाने के लिए उसने सुगन्धा को पागल करार कर दिया तथा कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी लगा दी। रात के घने अंधकार में सुगन्धा को घर से बाहर निकाल दिया।
सुगन्धा के माता-पिता भारी मन से लौट गये, परंतु वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ यह सब क्यों और कैसे हो गया? उनका अनुमान था कि उसने पैसा देकर उसके पागल होने का प्रमाण-पत्र बनवाया होगा तथा पालिसी के बहाने तलाक़ के कागज़ों पर दस्तख़्त करवा लिए होंगे और सुगंधा ने पति पर विश्वास कर, आँखें मूंद कर उन कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे, जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा है। एक पत्नी अपने पति से ऐसे विश्वासघात की कल्पना भी कैसे कर सकती है कि उसका जीवन-साथी उसके साथ ऐसा व्यवहार- विश्वासघात कर सकता है… जो सर्वथा ग़लत है, अशोभनीय है, अविश्वसनीय है, असंभव है। परंतु कलयुग में सब चलता है… ख़रा-खोटा, अच्छा-बुरा, मीठा-कड़वा।
गहन कालिमामयी अमावस्या की रात, आकाश में बादलों का गर्जन, सांय-सांय करती तेज़ हवाएं सुगन्धा को भयभीत कर रही थीं। वह दरवाज़े की चौख़ट पर सिर टिकाए रात भर बैठी अपनी नियति के बारे में सोच रही थी और वह समझ नहीं पा रही थी कि विधाता ने उसे किस जन्म के कर्मों की सज़ा दी है? इस जन्म में तो उसने कभी कोई ग़लत काम किया नहीं, उसने तो कभी किसी के सामने अपनी ज़ुबान भी नहीं खोली… किसी को अप-शब्द तक नहीं कहे…घर से बाहर कदम भी नहीं रखा और न ही किसी के बारे में गलत सोचा है।
सुगन्धा पति के क़ारनामे को देख बहुत परेशान थी। अचानक एक कार वहां आकर रुकी, उसमें से एक व्यक्ति उतरा और उसने उसके श्वसुर का नाम लेकर घर का पता पूछा। सुगन्धा को काटो, तो खून नहीं।
वह असमंजस में थी कि वह उस अजनबी को वांछित पता बताए या चुप रहे। कार के मालिक ने पुन: प्रश्न दोहराया, परंतु उसने अनजान होने का नाटक किया।उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? मूसलाधार वर्षा में वह कहां जाए? वह अजनबी लौटकर वहीं आएगा और उसे घर के बाहर बैठा देख, प्रश्नों की झड़ी लगा देगा। सो! उसने निर्णय लिया कि वह वहां से चली जाएगी। पड़ोस के घर में जाकर दस्तक देगी और उनसे वहां रात गुज़ारने का अनुरोध करेगी। बहुत देर तक वह दरवाज़ा खटखटाती रही, परंतु कोई बाहर नहीं निकला। इसका कारण शायद तेज़ गति से होने वाली वर्षा रही होगी।
रात सुरसा के मुख की भांति लंबी होती जा रही थी। सुगन्धा सूर्य देवता के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रही थी। विवाह के बाद का एक-एक दृश्य सिनेमा के रील की भांति उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। वह उस चक्रव्यूह से बाहर आने की कोशिश कर रही थी, परंतु उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी।
वह रात भर सर्दी से कांपती रही। यह कंपन केवल ठंड की नहीं थी, भय व आतंक की थी। वह जानती थी कि रईसज़ादे, गुंडे, मवाली सब रात को अपने- अपने शिकार की तलाश में निकलते हैं। वह भगवान से ग़ुहार लगा रही थी कि जिस प्रकार उसने द्रौपदी की लाज बचाई थी; गज को मगर के पाश से मुक्त कराया था; होलिका की गोद में बैठे प्रह्लाद को अग्नि की लपटों से बचाया था… उसी प्रकार वे स्याह काली रात में, विचरण करने वाले निशाचरों से उसकी रक्षा कर अभयदान प्रदान करें।
सूर्य की प्रथम रश्मि ने भोर होने का संदेश दिया और उसके मन में विश्वास ने करवट ली। उसने पति के घर पर पुन: दस्तक दी। दरवाज़ा खुला और उसे सामने देख बंद कर लिया गया। उसने साहस बटोर कर दोबारा द्वार खटखटाया तो उसके पति ने उसे फटकारते हुए कहा कि ‘कितनी निर्लज्ज हो तुम… फिर लौट आई…लगता है अब तुम्हें धक्के मार कर इस गली से बाहर करना पड़ेगा।’ उसने रोते हुए क्षमा -याचना की तथा घर के भीतर प्रवेश पाने की ग़ुहार लगाई।
परंतु उस घर के लोग तो थे संवेदनशून्य ‘औ’ हृदयहीन… शायद उनके दिल पत्थर के हो चुके थे, किसी को उस पर तरस नहीं आया। पैदल चलते- चलते स्टेशन पहुंच कर उसने किसी यात्री से अनुनय-विनय की…वह उसे कोलकाता जाने का टिकट दिलवा दे। पहले तो उसने आश्चर्य से उसे देखा। परंतु उसके भीगे वस्त्र तथा अश्रुसिक्त नेत्रों को देख वह समझ गया कि वह मुसीबत की मारी हुई है। उसने उसे लोकल ट्रेन का टिकट दिलवा दिया।
वह हैरान-परेशान सी अपने माता-पिता के घर पहुंची, जहां से चंद दिन पहले ही वह रुख़्सत हुई थी। माता-पिता भाई-बहन सब ने उसे बड़े अरमानों से विदा किया था। उसने अपनी व्यथा-कथा उन्हें सुनाई और वहां से लौटने की हक़ीक़त से अवगत कराया।
घर में मातम-सा पसर गया। पिता सकते में आ गये और अपने भाग्य को कोसने लगे कि कितनी मुश्किल से उन्होंने पहली बेटी का विवाह किया था, जो ससुराल से लौटा दी गई। ‘लोग क्या कहेंगे… कैसी-कैसी बातें बनाएंगे और उसकी अन्य तीन बेटियों का क्या होगा?
एक महीने पश्चात् उसके पिता ने पंचायत में अर्ज़ी लगाई, परंतु कोई समाधान नहीं निकला। कोर्ट में दर्ज मुकदमे के फैसले का वे तीन वर्ष से इंतज़ार कर रहे हैं… शायद उसे दोबारा उसी नरक में धकेलने के लिए, क्योंकि बेटियां माता-पिता के घर आंगन में अच्छी नहीं लगतीं।
सब कुछ जानते हुए भी माता-पिता ऐसे विश्वासघाती लोगों के यहां पुन: भेजने में तनिक भी संकोच नहीं करते। भले ही वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि उनके चंगुल से बच कर उनकी बेटी कभी ज़िंदा नहीं लौटेगी। परंतु वे अपनी झूठी आन-बान-शान व मान-मर्यादा के लिए उसे नरक में धकेल देते हैं, क्योंकि वे समाज के खोखले नियमों व दकियानूसी मान्यताओं के आतंक से डरते हैं।
सुगन्धा स्वयं को असहाय व फ़ालतू वस्तु-मात्र अनुभव कर रही थी, जो निरुद्देश्य व निष्प्रयोजन होती है और उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि ‘जैसे वह एक तस्वीर है, जिसे सुविधानुसार दो-चार दिन बाद, घर की सफाई करते हुए कभी एक कमरे के कोने में और कभी दूसरे कमरे के कोने में टांग दिया जाएगा।’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जाग सखी री…।
रचना संसार # ७४ – गीत – जाग सखी री… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रीत।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी…। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८४ ☆
☆ कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कल्याण…“।)
अभी अभी # ८६२ ⇒ आलेख – कल्याण श्री प्रदीप शर्मा
ईश्वर का एकमात्र उद्देश्य इस सृष्टि का कल्याण है। सिरजनहार, पालनहार और संहारक ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही तो हैं। कल्याण
एक सर्वविदित, सार्वभौमिक, सकारात्मक शब्द है, जिसमें सबका हित, मंगल और शुभ-लाभ निहित है। गीता प्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका कल्याण एक समय घर-घर आती थी। बिना किसी विज्ञापन का, कम कीमत, अधिक ज्ञानवर्धक, धार्मिक सामग्री अपने आप में समेटे हुए। परिवार के लोग बड़ी आस्था और श्रद्धा से इसे उलट-पुलटकर देख लेते थे। यही वह समय था जब सरिता-मुक्ता के साथ बच्चों का चंदामामा घर में प्रवेश पा जाता था।
जब सामंती युग था, तब राजा का जन्म प्रजा के कल्याण के लिए होता था। समय के साथ राजा बदलते गए, सामंती युग का स्थान लोकतंत्र ने ले लिया। आज भी सरकार का प्रथम एवं एकमात्र कर्तव्य आम आदमी का कल्याण है। अंग्रेज़ लोग इसे वेलफेयर ऑफ स्टेट कहते थे।।
पहले मुझे हर शब्द के डिक्शनरी मीनिंग जानने की आदत थी ! आजकल मैं भी गूगल सर्च कर लिया करता हूँ। मन हुआ, kalyaan को गूगल सर्च करूँ ! गूगल सर्च मुझे कल्याण मटके की ओर ले गया। कल्याण का यह अर्थ मेरे लिए नया था। सिर्फ रतन खत्री का मैंने नाम भर सुन रखा था। अंग्रेज़ी में भी कल्याण का एकमात्र अर्थ welfare निकला।
मैंने हिंदी दिवस के उपलक्ष में कल्याण को हिंदी में सर्च किया, तब जाकर उसका अर्थ कल्याण पत्रिका निकला। कल्याण पत्रिका ने कितनों का कल्याण किया, इस पर गूगल सर्च मौन है, लेकिन शायद इस पर, कहीं ना कहीं, कोई ना कोई, रिसर्च अवश्य चल रही होगी।।
पंडितों, महात्माओं और बुजुर्गों का तकिया कलाम है यह शब्द कल्याण ! समाज में देखो तो हर कोई एक दूसरे का कल्याण करने में लगा है। नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर कितने वर्षों से अपाहिजों का कल्याण करता चला आ रहा है। कलयुग में केवल एक ही कैलाश ने मानव के रूप में जन्म लिया है, और उनका नाम है अपाहिजों के मसीहा, 1008 संतश्री कैलाश मानव। लेकिन अपाहिज, जो अब दिव्यांग हो गए हैं, कम होने का नाम ही नहीं ले रहे।
एक ओर विदिशा के हमारे कैलाश सत्यार्थी जिन्हें जब तक बाल मजदूरी के लिए, उनके द्वारा किये गए उनके अनथक प्रयासों पर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल गया, उन्हें कोई प्रसिद्धि नहीं मिली, और दूसरी ओर अपनी अच्छाई का और समाज कल्याण का सोशल मीडिया पर प्रचार करते व्यक्ति और संस्थाएं, कभी भ्रमित कर देती हैं, तो कभी आश्चर्यचकित, कि इतने लोगों के प्रयत्नों के बावजूद ऐसा क्या है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है। इतना कल्याण, फिर भी यही शिकायत, लो हो गया कल्याण।।
इतने संत, बाबा, समाज सुधारक, एनजीओ, मंदिर, मस्ज़िद, चर्च, गुरुद्वारे किसके लिए ! मानव मात्र की भलाई के लिए। पिछले 70 वर्षों का इतिहास हम टटोलें, उसके पहले ही हमारा ध्यान एक ऐसे शख्स पर चला जाता है, जिसे देश की जनता ने पाँच वर्ष की अवधि के लिए, अपने हित और कल्याण के लिए एक आम- मुख्तयारनामा लिखकर दिया है। और वह इंसान अकेला 135 करोड़ के कल्याण के लिए जी जान एक कर रहा है। आज उसका एक पाँव यहाँ है तो कल चीन में। उसकी आँखों के आँसू थम नहीं रहे, आँखों से नींद गायब है। बस एक झोला लेकर आया है यह मसीहा, हम सबके कल्याण के लिए।
यह देश सदा से धर्म, नैतिकता और सदाचार को सर आंखों पर बिठाता रहा है। जन जन में धर्म के प्रति आस्था का सम्मान करते हुए पहले गीता प्रेस गोरखपुर जैसे संस्थान को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा और फिर राम की भद्रता का ध्यान धरते हुए प्रज्ञाचक्षु रामभद्राचार्य के चरणों में भी ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्पित कर दिया।।
हम अपना कल्याण खुद क्यों नहीं कर पाते ! क्यों हमें बाबा, महात्मा, राजनेता और स्वयंभू मसीहाओं की आवश्यकता पड़ती है, इसका उत्तर जब हमें मिल जाएगा, विश्व का ही या न हो, हमारा कल्याण अवश्य हो जाएगा।।
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘कुछ पता नहीं…‘।)