(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – कविता – सावन।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक बुंदेली पूर्णिका – जा दुनिया ने सगी कोऊ की… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१५ ☆
☆ बुंदेली पूर्णिका – जा दुनिया ने सगी कोऊ की… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय बोधकथा ‘लकीर‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६३ ☆
☆ बोधकथा – लकीर☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
स्वाभिमान और अहंकार की गाड़ी ट्रैफिक में अटक गई। अहंकार ड्राइविंग सीट पर बैठा था। एफ.एम. पर गाने चल रहे थे – ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई- –‘ गाने को सुनकर बातों ने नया मोड़ ले लिया। स्वाभिमान बोला– “तरह-तरह के लोग होते हैं दुनिया में। तू अपने को ही देख, कितना बढ़-चढ़कर बोलता है।”
अहंकार बोला – “अरे! दुनिया गाल बजानेवालों की है, मुँह सिले बैठे रहो, कौन पूछेगा तुम्हें?”
“मैं तेरी तरह डींगे नहीं हाँकता। तेरी बातों से दूसरों का दिल दुखता है। मैं जो करता हूँ, अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए” — स्वाभिमान जरा तनकर बोला।
“मैं भी यही करता हूँ। किसी का दिल दुखे, बुरा लगे तो इसमें मेरा क्या दोष? मैं कुएँ के मेंढ़क की तरह नहीं रह सकता।”
पास खड़ा स्कूटर सवार अभिमान इनकी बातचीत सुन बोला- “ड्राइविंग सीट पर बैठा अहंकार तो सबको दिखता है पर पिछली सीट पर बैठा स्वाभिमान कब अहंकार में बदल जाता है, इसका भान उसे भी नहीं होता—-!!”
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९७ ☆
☆धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
धानी चूनर ओढ़े धरती,
मंद-मंद मुस्काती।
हरित धरा की अनुपम छवि पर,
मेघ सुधा बरसाती।।
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का संदेश भी देता है। हरियाली अमावस्या ऐसा ही एक पर्व है, जो हमें प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदना और उत्तरदायित्व का बोध कराता है। श्रावण मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह उत्सव वर्षा ऋतु के मध्य धरती के नवजीवन का अभिनंदन है।
मान्यता है कि इस दिन वृक्षारोपण और पौधों की सेवा का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। किंतु इसका वास्तविक महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वृक्ष ही जीवन के आधार हैं। वे हमें शुद्ध वायु, जल संरक्षण, जैव विविधता और संतुलित पर्यावरण प्रदान करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक वृक्ष लगाकर उसका संरक्षण करे, तो यह पर्व अपनी सार्थकता स्वयं सिद्ध कर देगा।
आज जब बढ़ते शहरीकरण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब हरियाली अमावस्या का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यह केवल पौधे लगाने का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का अवसर है। वृक्षों की छाया में केवल धरती ही नहीं, मानव का भविष्य भी सुरक्षित रहता है।
आइए, इस हरियाली अमावस्या पर हम केवल पौधारोपण का संकल्प न लें, बल्कि लगाए गए प्रत्येक पौधे को वृक्ष बनने तक स्नेह और संरक्षण देने का दायित्व भी निभाएँ। यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे मूल्यवान उपहार भी।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक संस्मरणात्मक आलेख – “स्मृति संस्मरण – नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर” ।)
लंदन से –
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२५ ☆
स्मृति संस्मरण – नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मंडला का नाम लेते ही मेरे मन में सबसे पहले मां नर्मदा की स्मृति आती है। इस शहर को नर्मदा ने जैसे अपनी बांहों में ले रखा है। नदी यहां तीन ओर से अंग्रेजी के ‘यू’ अक्षर की तरह मंडला को घेरती हुई बहती है। इसलिए मंडला को केवल एक शहर कहना शायद उसके भूगोल और उसके स्वभाव, दोनों के साथ न्याय नहीं होगा। यहां नर्मदा जीवन का हिस्सा नहीं, जीवन की धड़कन है। जीवन रेखा है। हमारा पुश्तैनी घर “महलात” यही नर्मदा जी वार्ड में था।
इन दिनों जब नर्मदा फिर उफान पर है और वहां से सुदूर लंदन में बैठे , मैंने बाढ़ के दृश्य तो टी वी पर देखे तो , बचपन चित्रवत याद हो आया ।
मंडला की सड़कों तथा निचले इलाकों में नर्मदा का पानी पहुंच गया है, मेरी स्मृतियां लगभग एक सदी पीछे की घटनाओं में लौट जाती हैं, सन 1926 में ।
मंडला में हमारा पुश्तैनी घर ‘महलात’ कहलाता है। वह आसपास के सामान्य घरों से लगभग एक मंजिल ऊंचे मिट्टी के टीले पर बना है। आज उस ऊंचाई को देखकर लगता है कि हमारे पूर्वजों ने शायद नर्मदा के स्वभाव को हमसे बेहतर समझा था।
नदी के किनारे रहने वाले लोग नदी को केवल देखते नहीं थे, उसके मिजाज को पढ़ते भी हैं।
सन 1926 में मंडला में नर्मदा की भयंकर बाढ़ आई थी। उसी वर्ष मेरे पिताजी का जन्म हुआ था। मेरे बचपन में मेरी दादी (स्व श्रीमती सरस्वती देवी) उस बाढ़ की कहानी सुनाया करती थीं। उनके लिए 1926 कोई पुरानी तारीख मात्र नहीं थी, बल्कि परिवार की स्मृति में जीवित एक घटना थी।
वह बाढ़ इतनी विकराल थी कि चारों ओर पानी फैल गया था। बहुत से लोग अपने घरों में फंस गए थे। तब महलात का ऊंचा टीला उनके लिए आश्रय बन गया। दादी बताया करती थीं कि आसपास के घरों की दीवारें तोड़कर (खासकर असगर वकील साहब का घर, जिसमें उनके पार्टिशन के दौरान पाकिस्तान चले जाने के बाद अब जसवानी परिवार रहता है) रास्ते बनाए गए, ताकि पानी से घिरे लोगों को हमारे महलात तक सुरक्षित लाया जा सके। जहां कोई हाथ मदद के लिए उठा, उसे थाम लिया गया।
मैं कल्पना करता हूं कि उस समय हमारा घर केवल हमारा घर नहीं रहा । वह संकट में घिरे लोगों का उनका घर बन गया था।
दादी बताती थीं कि हजारों लोगों ने वहां शरण ली थी। पानी कब उतरेगा, इसका किसी को पता नहीं था। हमारे पूर्वजों ने उनके भोजन और रहने की व्यवस्था की। नर्मदा का पानी धीरे-धीरे उतरता रहा और महलात का टीला उन दिनों न जाने कितने परिवारों के लिए जीवन का सहारा बना रहा।
हमारे पास उस समय के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर द्वारा दी गई सनद भी सुरक्षित है। वह पुराना कागज मेरे लिए किसी सरकारी दस्तावेज से अधिक है। उसमें एक बीते समय की छाया है और उस छाया में उन लोगों की कहानी भी, जिन्होंने विपत्ति के समय अपने घर की सीमाएं दूसरों के लिए खोल दी थीं।
आज जब हम बाढ़ को जलस्तर, खतरे के निशान और सरकारी चेतावनियों के आंकड़ों में समझते हैं, तब उस समय की कल्पना करना कठिन लगता है। न मोबाइल था, न मौसम की तत्काल सूचना, न आधुनिक बचाव दल। फिर भी लोगों के पास एक ऐसी व्यवस्था थी जिसे किसी सरकारी पुस्तिका में दर्ज नहीं किया जा सकता , एक-दूसरे के लिए खुला हुआ मन और घर।
इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि 1926 नर्मदा की बड़ी ऐतिहासिक बाढ़ों में थी। मंडला के उपलब्ध आधिकारिक जलस्तर अभिलेखों में उसके बाद 1974 का बाढ़ स्तर सर्वाधिक दर्ज है।मेरे लिए 1926 का महत्व किसी आंकड़े से तय नहीं होता। वह मेरे परिवार की स्मृति में उस बाढ़ का वर्ष है, जब महलात ने अपने दरवाजे हजारों लोगों के लिए खोल दिए थे। मेरे स्व पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जो वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में विख्यात हुए,का जन्म उसी दौरान हुआ था।
यही स्मृति आज की बाढ़ को देखते हुए और गहरी हो जाती है।
लगभग सौ वर्ष बाद नर्मदा फिर उसी शहर में अपने रौद्र रूप में है। घाटों और निचले इलाकों में पानी पहुंच रहा है। कुछ परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। प्रशासन और बचाव दल सतर्क हैं। नदी फिर अपने पुराने अधिकार का स्मरण करा रही है।
समय बदल गया है। घर बदल गए हैं। बचाव के साधन बदल गए हैं। नदी को मापने के हमारे तरीके बदल गए हैं। लेकिन नदी का स्वभाव नहीं बदला।
और शायद मनुष्य की असली परीक्षा भी नहीं बदली।
बाढ़ जब आती है तो वह यह नहीं पूछती कि किसका घर कितना बड़ा है। कौन हिंदू है और कौन मुसलमान है, पानी सब दीवारों को एक ही भाषा में पढ़ता है। ऐसे समय में किसी ऊंचे घर की उपयोगिता उसकी ऊंचाई में नहीं, उसके खुले दरवाजे में होती है।
महलात का वह टीला आज भी है। उसके आसपास बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन उसकी मिट्टी में जैसे 1926 की स्मृति अब भी बसी हुई है। मुझे लगता है, उस मिट्टी ने केवल पानी नहीं देखा होगा , उसने भय देखा होगा, प्रतीक्षा देखी होगी, लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनते देखा होगा।
इतिहास हमें बताता है कि बाढ़ कितनी ऊंची थी। स्मृति बताती है कि उस बाढ़ में कितने हाथ एक-दूसरे को थामे हुए थे।
इसीलिए आज जब नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे तक आई है, मेरी आंखों के सामने महलात का वही ऊंचा टीला उभर आता है। दादी की आवाज जैसे फिर सुनाई देती है , पानी बढ़ रहा था, लोग आते जा रहे थे, दीवारें तोड़ी जा रही थीं और महलात सबके लिए खुला था।
नर्मदा जीवनरेखा है। कभी वह जीवन देती है, कभी जीवन की नश्वरता का बोध कराती है। मंडला ने उसके दोनों रूप देखे हैं।
और महलात ने भी।
शायद किसी घर की सबसे बड़ी विरासत उसकी दीवारें नहीं होतीं। उसकी असली विरासत वह स्मृति होती है कि किसी कठिन समय में उसके दरवाजे कितने लोगों के लिए खुले थे।
मुझे लगता है, महलात आज भी उसी ऊंचाई पर खड़ा होकर नदी को देख रहा है, जैसे एक बूढ़ा घर अपनी पुरानी नदी से कह रहा हो, तुम्हें अपना स्वभाव याद है, मुझे अपना।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपके “कुछ दोहे” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जिधर भी जाती है …“)