(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – संस्कारों की छाँव।)
एक छोटे से गाँव में रामरतन दुबे नाम के एक सरल और कर्मनिष्ठ शिक्षक रहते थे। वे विद्यालय में पढ़ाने के बाद प्रतिदिन आश्रम जाकर गरीब बच्चों की सेवा और शिक्षा किया करते थे।
उनकी पत्नी मंजू संतान न होने के कारण चिड़चिड़ी और उदास रहने लगी थी। एक दिन गुरु माँ के कहने पर वह भी आश्रम गई। वहाँ बच्चों की मुस्कान, सेवा और शांत वातावरण ने उसके मन को बदल दिया। वह रोज आश्रम जाने लगी और बच्चों की सेवा में उसका मन रम गया।
धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल गया। अब वह सबसे प्रेम और आदर से बात करने लगी। आश्रम के संस्कारों ने उसके जीवन में नई रोशनी भर दी। कुछ समय बाद उसे माँ बनने का सुख भी प्राप्त हुआ।
अपने बच्चे को गोद में लेकर वह अक्सर कहती—
“जीवन में धन से बड़ी संपत्ति अच्छे संस्कार होते हैं।”
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २५ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
रविंद्रनाथ टागोर व संगीत
रविंद्रनाथांना जन्मजात लाभलेल्या रूपसौंदर्यासारखंच सूर सौंदर्य देखील लाभलं होतं. ब्राह्मो समाजाचे आद्य गायक विष्णुचंद्र चक्रवर्ती हे त्यांचे पहिले गायन गुरू. यदुभट्ट यांच्याकडेही त्यांचे संगीत शिक्षण झाले मात्र कोणत्याही विशिष्ट प्रणालीत त्यांनी स्वतःला बांधून घेतलं नाही. त्यांनी जवळ जवळ २२३० स्वरचित गाण्यांना चाली लावल्या.
रविंद्रनाथांच्या कविता; नाद, सूर, लय घेऊनच त्यांच्या लेखणीतून प्रकट होत. ते त्यांच्या कवितेला कधी कविता म्हणत नाहीत, गीत म्हणतात. इंग्रजी गीतांजलीतील कविता खरंतर prose poetry किंवा गद्य काव्य या प्रकारातील आहेत पण तरीही त्यांनी तिला ‘गीतांजली, song offering’ म्हटलंय. कदाचित मूळ बंगाली कविता, ह्या गेय असल्यामुळे असेल. कविता व गेयता यांचं नातं अनादि कालापासून भारतीयांनी अनुभवलेलं आहे. आपली वेद, उपनिषदे सुद्धा गेय काव्य रूपातच आहेत.
रविंद्रनाथांनी सुरांचे सामर्थ्य लहानपणीच ओळखलं होतं. त्यांच्या कवितेचा भाव; सुख-दु:ख, हर्ष- शोक, भक्ती- प्रीती कोणताही असो, त्यांचे शब्द, सुरांचा साज लेऊनच वहीच्या मंचावर नर्तन करीत प्रवेश करत. कवितेचं गाणं होताना सुरांतून इंद्रधनुष्य निर्माण होत असतं असं त्यांना वाटे.
“मला गायला कधी येत नव्हतं असं मला आठवतच नाही. ” असं ते म्हणायचे. गाणं रचताना ते गात गात रचावं व रचता रचता तद्रूप होऊन जावं अशी तन्मयता, उन्मादावस्था त्यांनी अनेकदा अनुभवली व एकदा एका खाजगी पत्रात वर्णिली पण आहे. ही अलौकिक अशी अध्यात्मिक परमावस्था नाही काय?
रविंद्रनाथांना भारतीय अभिजात संगीताची चांगली जाण होती. अनेक रागरागिण्यांचे संस्कार घेऊन त्यांची गीतं प्रकट होत. पण लोकसंगीताच्या देखील असंख्य चाली त्यांच्या गीतांमध्ये दिसतात. बंगाली लोकसंगीत मुळात अतिशय समृद्ध आहे. बाऊल, भटियाली, कीर्तन, काका, कविगान, श्यामा संगीत, फकिरांची गाणी, सूफी गाणी, वैष्णव भक्तांची गाणी, भादू सारखी कहाण्यांची गाणी, पाँचालि, जात्रापाला असे अनेक प्रकार त्यात आहेत. आपल्या संगीतासाठी ख्याल, ध्रुपद, ठुमरी, दादरा, टप्पा इथपासून लोकसंगीतापर्यंतच्या; इतकंच नव्हे तर पाश्चात्य संगीतावर आधारित चाली देखिल वापरण्याची रविंद्रनाथांची प्रतिभा पाहून अभ्यासक देखील चकित होतात.
रविंद्र संगीताचा बंगाली संगीतावरील प्रभाव आज देखील ठळकपणे जाणवतो किंबहुना खरंतर रविंद्र संगीतापासून बंगाली संगीत वेगळं करताच येणार नाही. त्यांच्या संगीताकडे चित्रपट क्षेत्रातील सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, नितीन बोस, तपन सिन्हा, कुमार साहनी यांच्यासारखे अतिरथी, महारथी आकर्षित झाले नसते तरच नवल! त्यांनी आपल्या चित्रपटात रविंद्रनाथांची गाणी वापरली. इतकेच नव्हे तर कांही ब्रिटिश, युरोपियन व ऑस्ट्रेलियन चित्रपटांत देखील त्यांची गाणी वापरली गेली आहेत. मात्र आपल्या गीतातील शब्दच काय पण सूर देखील बदलणं त्यांना मंजूर नव्हतं. आज सुध्दा त्यांची गाणी जशीच्या तशी गायली जातात.
(संदर्भ: रविंद्रनाथ तीन व्याख्याने, ले. पु ल देशपांडे)
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☆ गीत : ७३ ☆
DELIVERANCE is not for me in renunciation. I feel the embrace of freedom in a thousand bonds of delight.
Thou ever pourest for me the fresh draught of thy wine of various colours and fragrance, filling this earthen vessel to the brim.
My world will light its hundred different lamps with thy flame and place them before the altar of thy temple.
No, I will never shut the doors of my senses. The delights of sight and hearing and touch will bear thy delight.
Yes, all my illusions will burn into illumination of joy, and all my desires ripen into fruits of love.
THE day is no more, the shadow is upon the earth. It is time that I go to the stream to fill my pitcher.
The evening air is eager with the sad music of the water. Ah, it calls me out into the dusk. In the lonely lane there is no passer by, the wind is up, the ripples are rampant in the river.
I know not if I shall come back home. I know not whom I shall chance to meet. There at the fording in the little boat the unknown man plays upon his lute.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “जैसी करनी, जौन करत है“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४९ ☆
☆ बुन्देली कविता – “जैसी करनी, जौन करत है“☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन की बस यही अदा है…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२१ ☆
☆ जीवन की बस यही अदा है…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ इंद्रजीत सिंहजी द्वारा लिखित “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०४ ☆
☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ इंद्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति: ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’
लेखक : इंद्रजीत सिंह
प्रकाशक : प्रकाशन विभाग
मूल्य : 330 रु
आलेख: विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
☆ यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
“अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ लता…” ड्राइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गई, माध्यम बदल गए, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मर कर भी अमर हो जाती हैं। सुख हो या दुख, राष्ट्रीय पर्व हो या कोई पावन त्योहार, हमारी हर भावना को स्वर देने के लिए लता दीदी का कोई न कोई गीत हमारी चेतना में सहज ही तैर जाता है। अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, वे पहले लता जी की आवाज़ से फिल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।
ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ , राजू भारतन द्वारा लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तक जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेजी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखाई देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।
इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आई है, शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ₹330 मूल्य की यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।
लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।
लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह, को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।
लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम,
गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र,सम्मान और पुरस्कार अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।
डॉ. इन्द्रजीत सिंह के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नई आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है।
1942 में पिता दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की नन्हीं उम्र में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर अभिनय और गायन की दुनिया में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शुरुआती दौर में कुछ निर्माताओं द्वारा उनकी आवाज़ को “बेहद पतली” कहकर नकार दिया जाना और फिर उसी आवाज़ का पूरे विश्व पर राज करना, यह संघर्ष गाथा पाठकों के भीतर नई ऊर्जा भरती है।
लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।
पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।
पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गई है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना, और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोंसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।
कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण: डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किए गए अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।
संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।
इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है । उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है:”लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिए बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।
‘न भूतो न भविष्यति’
संगीत की लंबी और यशस्वी पारी को जीते हुए लता जी जब सराहना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थीं, तब उनका इस नश्वर संसार से जाना पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए एक मर्मांतक और स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। उस भावुक क्षण में हर संवेदनशील हृदय रो उठा था।
इसी मर्म को अभिव्यक्त करती मेरी तब प्रकाशित हुई , काव्य पंक्तियाँ इस विमर्श को पूर्णता देती हैं:
स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी, हम सब का है प्यार लता,
भारत रत्न, रत्न भारत का, गीतों का सुर, सार लता ।
रागों का जादू, जादू गज़ल का, सरगम की लय, तार लता,
तबले की धिन् पर, सितारों की धड़कन, नगमों की रस धार लता ।
बनारस घराना, जयपुर तराना, गीतों का इकरार लता,
बैजू सुना था सुर बावरा वो, तानसेन दीदार लता।
सरहद की रेखा से सुर ही बड़ा है, नूपुर की झंकार लता,
भारत-पाक लाख दुश्मन हों, जनता की सरकार लता ।
तुम्हारा ये जाना न माने ज़माना, रहेंगी सदा गुलज़ार लता
… विवेक रंजन श्रीवास्तव
आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नई प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति। यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नई लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी।
मशहूर शायर जावेद अख्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”
डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीके और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७८ ☆ देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆
कल पूरे विश्व में संग्रहालय दिवस मनाया गया था।हमें इसकी जानकारी थी, कि इस दिन सभी संग्रहालयों में प्रवेश निशुल्क रहता हैं।
मौक़े पर चौक्का लगाते हुए हम चार साथी प्रातः ही जयपुर के संग्रहालय देखने के लिए एक मित्र की कार से रवाना हो गए।संग्रहालय में कुछ इक्का दुक्का हमारे जैसे मुफ्त के मज़े लेने वाले लोग अवश्य मिले।
अधिकतर संग्रहालयों में पार्किंग बहुत दूर रहती हैं।सुबह दस बजे ही मौसम के तेवर तेज़ हो रहे थे।चारों तरफ जेठ की तपती गर्मी ने बेहाल कर दिया था।एक मित्र ने तो हथियार डाल दिए।हम सब भी खाली हाथ लौट आए।साथी बोले ये विश्व संग्रहालय दिवस मई में ही क्यों मनाया जाता हैं ?ताकि, लोग मुफ्त में आनंद ना ले पाए।
व्यथित मन से घर आकर, अपने सब से अज़ीज़ मोबाइल में घुस गए।मन में विचार आया ये मोबाइल भी तो हमारा संग्रहालय हैं।
दुनिया भर की फोटो, बीमारियों के फर्जी नुस्खे, राजनतिज्ञों के झूठे वीडियो, अनजान लोगों के फालतू वाले ज्ञान और वो सैंकड़ों मैसेज जिन पर ये लिखा होता है, “इसको अवश्य सेव कर लेवें” हमारे मोबाइल को संग्रहालय होने की मान्यता देते हैं।उसी संग्रहालय को देखते देखते पूरा दिन व्यतीत हो गया।
शाम के समय एक 15 वर्षीय बालक से हमने लिफ्ट में पूछा कि आज विश्व संग्रहालय दिवस है, आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?
बालक बहुत ही नटखट निकला और बोला अंकल, हमें तो आप भी किसी संग्रहालय से कम नहीं लगते, ये पुरातन बातें और अपने बचपन के किस्से सुना सुना कर पका डालते हो, मोहल्ले के सभी बच्चे इसी लिए आप से दूर रहते है।
बालक ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, आप लोग आज की बात क्यों नहीं करते हो ? जैसे आई पी एल का चैंपियन कौन बनेगा, चिप्स का कौन सा नया ब्रांड आया हैं, कौन से पिज्जा के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री है, पॉप सिंगर शकीरा ने कोर्ट कैसे जीत लिया है, आदि। गंतव्य पहुंचते ही बालक मिल्खा सिंह की स्पीड से दौड़ गया।
घर वापस आकर दैनिक भास्कर में अपना भविष्य पढ़ा,उसमें लिखा था, आज का दिन अच्छा नहीं है, यात्रा ना करें।दूसरों से बुराई मिलेगी।कितना सत्य बताते है, हमारे ये भविष्य वक्ता।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…१।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१
खेत,
खलिहान
नदी,
पर्वत
नगर, गाँव और आदमी
सब बेहाल हैं
सबके एक से हाल हैं
सबकी मुट्ठियों में
जलते हुए सवाल हैं।
सवालों का न तन होता है
न मन होता है
सवालों की उम्र नहीं
केवल वजन होता है।
और/ ये वजन
घन की तरह घिरता है
गिरता है
सपना बिखरता है
मैं/
‘तुम/ये/ वे
सब बैठे हैं- सूखी नदियों के किनारे
हमारे
प्यारे घर
बाढ़ में बह गये हैं
हमारे पाससिर्फ जहरीली रेत के घरौंदे रह गये है।
बाढ़/नदी की होती
तो सब सह लेते
किसी तरह रह लेते
लेकिन…
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “बाप कवितायें लिखता है...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “बाप कवितायें लिखता है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆