ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 फरवरी से 1 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (16 मार्च से 22 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। 23 मार्च से काल पुरुष की कुंडली में कालसर्प योग लगने वाला है आपको भी इससे बचने का उपाय करना पड़ेगा मैं इस संबंध में एक अलग से वीडियो बनाया है जिसका लिंक इस साप्ताहिक राशिफल के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दिया गया है हम सभी जानते हैं की श्री हनुमान जी कलयुग के जीवंत देवता है। कलयुग में सभी प्रकार के कष्टों से से मुक्ति के लिए श्री हनुमान जी की उपासना अतिआवश्यक है। इसीलिए मैं पंडित अनिल पांडे आपको प्रति सप्ताह श्री हनुमान चालीसा की मंत्रवत चौपाइयों से होने वाले लाभ के बारे में बताता हूं। दो चौपाई के बारे में मैं आपको अभी बताऊंगा तथा दो चौपाइयों के बारे में मैं आपको इस वीडियो के अंत में बताऊंगा। आज की चौपाई है :-

बिद्यावान गुनी अति चातुर |

राम काज करिबे को आतुर ||

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |

राम लखन सीता मन बसिया ||

हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से ज्ञान, बुद्धि, रामकृपा और यश प्राप्त होता है।

आइये अब हम 16 मार्च से 22 मार्च 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल की राशिवार चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके व्यापार में वृद्धि होगी। आपको अपने संतान से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। धन की प्रति थोड़ी कम होगी। परंतु अगर आप सावधानी से कार्य करेंगे तो कचहरी के कार्यों में आपको सफलता मिलेगी। जनप्रतिनिधियों के प्रतिष्ठा में न तो वृद्धि होगी और ना ही नुकसान। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 16, 21 और 22 मार्च कार्यों को करने के लिए सफलता प्रदान करने वाले हैं। 19 और 20 मार्च को आपको सावधान रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास पर्याप्त मात्रा में धन आएगा। आप इस सप्ताह अपना पूरा ध्यान धन प्राप्ति में लगायें। जिससे की इस अवसर का आप अधिक से अधिक उपयोग कर सकें। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्सव जैसा रहेगा। कर्मचारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है परंतु आपको अपने अधिकारियों से इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी ठीक रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह सफलता प्राप्त करने के लिए आपको 17 और 18 मार्च का उपयोग करना चाहिए। 21 और 22 मार्च को कार्यों को पूर्ण सावधानी से करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि देव के मंदिर में जाकर उनका पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

यह सप्ताह आपके लिए शुभ फलदायक है। कर्मचारी व अधिकारियों के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। उनकी पदस्थापना उनके इच्छित स्थान पर हो सकता है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। राजनीतिज्ञों के लिए इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको भाग्य को छोड़कर अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए। कचहरी का कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयोगी है। 16 मार्च को आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्यों को करने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद मिल सकती है। भाग्य से रुके हुए कार्यों को करने का प्रयास करें। आपको सफलता प्राप्त होगी। दुर्घटनाओं से सावधान रहें। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। आपके व्यय में वृद्धि होगी। आमदनी पहले जैसी ही रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए 16, 21 और 22 मार्च विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। 17 और 18 मार्च को आपको पूर्ण सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य सामान्य रूप से कार्य करेगा। आमदनी सामान्य रहेगी। आपके या आपके जीवन साथी के स्वास्थ्य में थोड़ी खराबी आ सकती है। दुर्घटनाओं से आप साफ-साफ बचेंगे। अगर कोई दुर्घटना होती है तो भी आपको किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े कम ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 मार्च लाभदायक है। 16,19 और 20 मार्च को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। युवक और युवतियों के लिए सप्ताह अच्छा है। नए-नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। पुराने संबंधों में प्रगाढ़ता आ सकती है। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। उनको सावधानी पूर्वक कार्य करना चाहिए। अपने शत्रुओं को आप इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों हेतु शुभ है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्य करने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह थोड़े से प्रयासों से ही आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपका आपके माता-पिता का और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात पहले जैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में रिस्क लेने का कार्य न करें। भाग्य से आपको मामूली मदद मिल सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग कम मिलेगा। छात्रों का पढ़ाई में मन नहीं लगेगा। इस सप्ताह आपके लिए 16, 21 और 22 मार्च विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सुविधाजनक है अर्थात लाभदायक हैं। 19 और 20 मार्च को आपको कार्यों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गरीबों के बीच में चावल का दान दें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रों का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। आपको अपने संतान का बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को पढ़ाई में सफलता प्राप्त होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। उनकी प्रतिष्ठा में बाधा पड़ सकती है। आप सभी को अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। माता जी का स्वास्थ्य खराब हो सकता है। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। धन प्राप्त करने के मार्ग में कुछ बाधाएं आ सकती हैं। उनसे बचने का प्रयास करें। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 मार्च विभिन्न प्रकार के मामलों में लाभप्रद हैं। 21 और 22 मार्च को आपको बड़े सावधानी से कार्यों को संपन्न करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको अपने कार्यों में बार-बार सफलता प्राप्त होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए सप्ताह थोड़ा सावधानी भरा है। उनको इस पूरे सप्ताह सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिए। व्यापारियों के लिए इस सप्ताह सामान्य है। भाई बहनों के साथ आपके संबंधों में तनाव हो सकता है। भाग्य आपका साथ देगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 मार्च परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपका भाई बहनों के साथ संबंध उत्तम रहेगा। आपके भाई बहनों को भी विभिन्न कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। भाग्य से आपको थोड़ा कम मदद मिल पाएगी परंतु कामभर की मदद मिल सकती है। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी गिरावट संभव है। इस सप्ताह आपके लिए 16 तथा 21 और 22 तारीख परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको धन प्राप्ति के लिए पूर्ण प्रयास करना चाहिए। आप को इस सप्ताह अपने संतान से कम सहयोग मिलेगा। आपका और आपके जीवन साथी को थोड़ी स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो सकती है। पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं के प्रति आपको इस सप्ताह सचेत रहना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों को सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 17 और 18 तारीख विभिन्न प्रकार के मामलों में उपयुक्त है। 16 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उच्च स्तर पर होगा। आपके बहुत सारे कार्य आपके आत्मविश्वास के कारण ही पूर्ण हो जाएंगे। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको रिक्स नहीं लेना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपके जीवन साथी को थोड़ा कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 मार्च अनुकूल हैं। 17 और 18 मार्च को आपको सावधान रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

 श्री हनुमान चालीसा के मंत्रवत चौपाइयों का वर्णन इस प्रकार है।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा,

बिकट रूप धरि लंक जरावा।

भीम रूप धरि असुर संहारे,

रामचंद्र के काज संवारे॥

इन दोनों चौपाइयों के संपुट पाठ करने से श्री हनुमान जी आपके सभी कष्टों को हरते हैं तथा आपके सभी कार्य संपन्न हो सकते हैं।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१३ ☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१३ ☆

☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆

‘संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है। परंतु जब आप संवाद अर्थात् वार्तालाप करना बंद कर देते हैं, तो आप अपने अनमोल संबंध खो देते हैं।’ यह वाक्य गहन-गूढ़ अर्थ को परिलक्षित करता है। जैसे संवाद अथवा कथोपथन कहानी या नाटक को गति प्रदान करते हैं; वैसे ही संवाद हमारे जीवन को ऊर्जा व जीवंतता प्रदान करते हैं… हमारे अंतर्मन में जीने की उमंग जाग्रत करते हैं। जैसाकि सर्वविदित है– मानव एक सामाजिक प्राणी है और वह अकेला रहने में स्वयं को असमर्थ पाता है। इसलिए ही वह जन्म- जात संबंधों के रहते भी अन्य संबंध स्थापित करता है, क्योंकि वह अपने सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति किए बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। वह अपने हृदय के भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर सुक़ून पाता है तथा स्वयं को अकेला, असहाय व विवश अनुभव नहीं करता।

यदि आप वार्तालाप/ संवाद करना बंद कर देते हैं, तो अनमोल संबंधों को खो देते हैं। संवादहीनता मान-दशा तक तो  वाज़िब है, परंतु उसके बाद यह सज़ा बनकर रह जाती है और एक अंतराल के पश्चात् मानव स्वयं को  नितांत अकेला अनुभव करता है। प्रश्न उठता है– क्या संबंध बनाए रखने के लिए मानव को दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए अपने आत्म-सम्मान को दाँव पर लगा देना चाहिए? नहीं…यह तो चाटुकारिता कहलायेगी। यदि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहती है, तो मानव तनाव, चिंता व अवसाद से घिर जाता है और अंततः उस व्यूह को भेदना मानव के वश से बाहर हो जाता है। तनाव संबंधों की ताज़गी व पारस्परिक स्नेह-सौहार्द को लील जाता है और ऐसे व्यक्ति के साथ रहने से दूसरे पक्ष के लोग भी गुरेज़ करना प्रारंभ कर देते हैं। सो! उसे जीवन में अकेले विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

लंबे समय तक तनाव की यह स्थिति मानव को चिंता के अथाह सागर में धकेल देती है। चिंता चिता समान है, जो दीमक की भांति मानव के उत्साह, साहस, धैर्य आदि को लील कर, शरीर रूपी इमारत की चूलों को हिला कर खोखला कर देती है। चिंताग्रस्त मानव सदैव ख़ुद से बेखबर स्वनिर्मित लोक में विचरण करता रहता है। वह बेसिर-पैर की कल्पनाओं में खोया, अनगिनत शंकाओं में घिरा स्वयं को अपाहिज-सा अनुभव करता है। यदि ऐसा-वैसा हो गया, तो उसका क्या होगा? उसके परिवार की क्या दशा होगी? उन विषम परिस्थितियों से वे कैसे निज़ात पा सकेगे? चिंताग्रस्त मानव को चारों ओर अंधकार ही अंधकार नज़र आता है। जीवन में उसे आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ती और न ही कोई उम्मीद की झलक दिखाई पड़ती है…उसे जीवन मरु-सम भासता है। उसकी दशा रेगिस्तान के उस हिरण-सी हो जाती है, जो प्यास से आकुल-व्याकुल सूर्य की किरणों को जल समझ उनके पीछे दौड़ा चला जाता है और अंत में अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। यही होती है अवसाद-ग्रस्त मानव की मन:स्थिति… जिसके जीवन में न कोई उमंग रहती है; न ही कोई तरंग; न प्रसन्नता; न ही उल्लास…वह तो नितांत अकेला, तन्हा-सा अपना जीवन बसर करता है अर्थात् ढोता है।

संवादहीनता मानव को उस कग़ार पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां वह हरदम तन्हाई के दंश झेलता है; जो नासूर बन उसे आजीवन सालते हैं। संवादहीनता आजकल सभी रिश्ते-नातों में सेंध लगाकर जीवन के सुक़ून व सुखों पर डाका डाल रही है। सुक़ून मन की वह निर्विकार अवस्था है, जहां मानव राग-द्वेष व स्व-पर की निकृष्टतम वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है और अंतर्मन रूपी सागर के शांत जल में निरंतर अवगाहन करता रहता है और वहां पहुचने के पश्चात् सभी इच्छाओं का शमन हो जाता है। परंतु उस स्थिति तक पहुंचने में मानव को वर्षों तक साधना-तपस्या करनी पड़ती है।

आइए! हम संबंध-निर्वाह के विषय पर चर्चा कर लें। संबंध विश्वास के आधार पर स्थापित तो हो जाते हैं, परंतु उनका निबाह करने के लिए आवश्यकता होती है बर्दाश्त करने की…यदि हममें सहनशीलता का मादा है, तो संबंध स्थायी व स्थिर रह सकते हैं, अन्यथा वे पानी के बुलबुले की भांति पल-भर में विलीन हो जाते हैं। संबंध कभी भी दूसरों से जीतकर नहीं निभाए जा सकते; उन्हें बनाए रखने के लिए तो जीतकर भी हारना पड़ता है। उनकी भावनाओं को महत्व देते हुए, प्रियजनों की प्रसन्नता के लिए पराजय को स्वीकारना पड़ता है। इसके विपरीत यदि आप वार्तालाप बंद कर देते हैं, तो संबंध टूट जाते हैं;  समाप्त हो जाते हैं और उन विषम परिस्थितियों में आप अकेले रह जाते हैं और कोई पल-भर के लिए भी आपके साथ समय व्यतीत करना पसंद नहीं करता।

यदि हम संबंधों को चिरस्थाई व शाश्वत् रूप प्रदान करना चाहते हैं, तो हमारे लिए यथासमय झुकना व दूसरों को सहन करना कारग़र होगा। दूसरे शब्दों में हमें परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना होगा। झुकना, सहना व समझौता करने की एक ही मांग होती है…अहं का विसर्जन। यह ही एक ऐसा उपादान है; जिसके द्वारा आप दूसरों का हृदय परिवर्तित कर सकते हैं…अपने प्रति दूसरों के मन में विश्वास जाग्रत कर सकते हैं। वैसे भी जीवन केवल संघर्ष ही नहीं; समझौता है। संघर्ष की स्थिति हमारे अंतर्मन की आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करती है; प्रेरित करती है; हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचाती है। दूसरे शब्दों में समझौता हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन कर, संबंधों को शाश्वत रूप प्रदान कर हमें सुक़ून देता है; जीने की प्रेरणा देता है। सो! संबंधों को सार्थकता प्रदान करने हेतु जहां संवादों की दरक़ार है; वहीं समझौता भी वह संजीवनी है, जिसमें प्राणदायिनी शक्ति निहित है।

अंतत: हम कह सकते हैं कि जीवन में कभी संवादहीनता की स्थिति न पनपने दें, क्योंकि यह वह सुनामी है; जो संबंधों को लील जाता है और जीवन को शून्यता से भर देता है। यह स्थिति मानव के लिए अत्यंत घातक है, विस्फोटक है। सो! हम सबको अपने दायित्व का वहन करना चाहिए और समाज में स्नेह, सौहार्द, समन्वय, सामंजस्यता व समरसता की स्थिति बनाए रखने के लिए अपने अहम् का विसर्जन कर, संबंधों को सार्थक बनाने का भरसक प्रयास करना चाहिए …यही समय की मांग है और मानव-मात्र से अपेक्षित है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८५ – नवगीत – हार-जीत… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हार-जीत

? रचना संसार # ८५ – गीत – हार-जीत…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हम अपनों से हार रहे,

जग की कैसी अजब रीत रे।

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत रे।।

 

सुरभित उर की हैं साँसे,

मादक सावन का समीर है।

जलकण बन आँखे बरसे,

प्रतिपल पिया मिलन अधीर है।।

सेज सजी है सपनों की,

निशदिन गाते प्रेम गीत रे।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

खिली कली भँवरे हँसते,

यौवन इठला रहा आज है।

साँस- साँस है नाच रही,

बतला सजन ये क्या राज है।।

व्याकुल है आलिंगन को,

ऋतु में  कैसी बढ़ी शीत रे ।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

 तिल -तिल मैं तो नित्य जली,         

 अगन लगाती प्रेम ज्वाल भी।

 आँख मिचौली खेलें सब,

  पूछें नहीं कोई हाल भी ।।

  मिलन यामिनी आयी अब,

  घूँघट पट खोलते मीत रे ।।

 

 हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१३ ☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

यादों में बस झूलता, मेरा प्यारा गाँव ।

खूब मजा लेते सभी, ठंडी ठंडी छाँव।।

 *

मिलजुलकर रहते सभी, कच्चे ईट मकान।

साथ सुख – दुख बांट रहे, उनकी है पहचान।।

 *

चलो गाँव की ओर सभी, मिले वहाँ सुख चैन।

याद बहुत आती मुझे, ठंडी – ठंडी रैन।।

 *

आती गर्मी देख लो, तपन बढ़ेगी खूब।

संगी साथी गाँव में, नहीं लगेगी ऊब।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९५ ☆ गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९५ ☆

गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी☆ श्री संतोष नेमा ☆

लेकर हाथ कनक  पिचकारी |

होली   खेलें   कृष्ण   मुरारी ||

झूम-झूम   कर   नाचे   राधा,

निरखें  सखियाँ     बारी-बारी ||

लेकर हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

मिटी  सभी  आपस  की  दूरी।

हुई   कामना   सबकी  वी पूरी।

रँग    खुशी  के  बिखर  रहे  हैं, 

मिली   प्रेम   की   है   कस्तूरी।

 लगे न  युवती आज    कुँवारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

आज   शत्रु  भी  लगता  भाई।

होली    ने    दुश्मनी    मिटाई ।

पढ़ते  आज  सभी  मिल मानो,

सधे   प्रेम   के    अक्षर    ढाई।   

मन   भाए   हैं।  हृदय  बिहारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फूला     टेसू     भी    इतराये |

रंगों    का   मतलब  समझाये।

मन   भाती  फूलों   की  होली ,

रंग – रसायन     हमें  न   भाये।

गारी  आज  लगे  अति   प्यारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फागुन  बौरा  कर  ज्यों  आया |

रंग   प्यार   के  अद्भुत   लाया ||

ढोल – मृदंग  चंग   सब   बाजें,

सबका   हृदय    देख    हर्षाया।   

मिलता  है  “संतोष”  सभी  को,

आज    उड़ेलो    मस्ती    सारी ||

लेकर  हाथ  कनक   पिचकारी |

रँग    खेल   रहे   कृष्ण  मुरारी ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मनवा बैरी…’।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं, तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का..

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८५ – जास्वंद…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८५ – विजय साहित्य ?

☆ जास्वंद…!

(अक्षरछंद… पंधराक्षरी)

(शीर्षक – औषध खासे.)

ज्या सुमनाचे,‌ चित्र काढता

दिसतो देव

त्या मोरयाची,‌जास्वंद फुले,

पुजेत ठेव. १

*

पाच पाकळ्या, गर्भ रेशमी,

घेर अनोखा

तुरा शोभतो, फुलातुनी‌ ज्या,

झुलतो झोका. २

*

लाल,भगवा, छटा आगळ्या,

कातर पाने

रंगपंचमी, नाजूक कांती,

रंग दिवाणे.३

*

नको सुईने, हारात गुंफू,

वाहू‌ चरणी

जास्वंदीची, फुले अनोखी,

नाचे धरणी. ४

*

तेल औषधी,त्वचा निरोगी,

किती फायदे

केस त्वचेला, देई तजेला,

गोड वायदे.५

*

अर्क काढूनी, तेल करावे,

औषध भारी

चूर्ण करोनी, चहा करावा,

तो गुणकारी. ६

*

गजाननाच्या,शिरी शोभते,फुल जास्वंदी

निसर्गातले, औषध खासे,

करे आनंदी…७

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ११ … ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ११ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

अभंगांतून गीतेचे तत्वज्ञान

देह बुद्धी नष्ट होऊन भक्तिमार्गाने परब्रम्ह प्राप्त झाले, म्हणजे जन्म मरणाच्या चक्रातून माणसाची सुटका होते, हे तत्त्वज्ञान आहे. परंतु तुकाराम महाराजांना पांडुरंगाची अखंड भक्ती करून त्याची सेवाच करायची आहे. त्यांना मुक्तीची चाड नाही, म्हणून त्यांच्या एका अभंगात त्यांनी स्पष्ट म्हटले आहे,

आमुचे उचित/ हेचि उपकार/

आशपुलाची भार/ घालू तुज//

 आमच्या योगक्षेमाचा भार देवा तुझ्यावर घालून स्वस्थ बसणे हेच उचित आहे.

 मी भक्त व तू माझा हरी, अशी द्वैतभावना तुकाराम महाराजांच्या अभंगातून दिसत असली

 तरी अद्वैत झाल्याशिवाय, खरा भक्त असूच शकत नाही हे त्यांच्या अभंगातून दिसणारे गीतेचेच तत्त्व आहे. ते अभंगातून स्पष्ट सांगतात,

दुजेखंडे तरी/ उरला तो अवघा हरी/

आपण बाहेरी/ नलगे ठाव धुंडावा//

इतुले जाणावया जाणा/ कोड तरी मने मना/

पारधीच्या खुणा/ तेणेची जाणाव्या//

तुकाराम बुवा या अभंगात काय सांगतात? मनानेच मनाला जाणले पाहिजे. जो पारधी असतो तो शिकारीचा शोध कसा घेतो, हे दुसरा पारधीच जाणतो. आपला हरी हा आपल्या जवळच आहे, तो दुसऱ्या ठिकाणी शोधायची गरज नाही.

 देह आधी काय खरा/ देहसंबंध पसारा/

 बुजगावणे चोरा/ रक्षणसे भासते//

 तुका करी जागा/ नको वासपू वाऊगा/

 आहेस तू अंगा/ अंगी डोळे उघडी//

तुकाराम महाराज निजरूप विसरून एक प्रकारे झोपी गेलेल्यास जागे करतात, आणि सांगतात की तू भिऊ नकोस. अद्वैत रूप हरी तुला सापडेल, कारण तू स्वतःच परमात्मरूप आहेस. तुझी आत्मदृष्टी उघडी ठेवशील तर तुला हा बोध होईल.

थोडक्यात महाराजांना इथे असे सांगायचे आहे, की संपूर्ण विश्वात, चराचरात जो परमात्मा भरलेला आहे, तो तुला तू जर डोळे उघडे ठेवलेस तरच दिसू शकेल. आपल्याला एखादा माणूस सहज कुठेतरी भेटतो, आणि आपली मदत करून जातो. परमेश्वराच्या रूपानेच आपल्याला मदत करण्यासाठी तो आलेला होता याची मात्र आपल्या देहधारी माणसाना जाणीव नसते.

भगवंताने अर्जुनाला काय सांगितले?

“तुझे सर्व कर्म मला अर्पण कर.” तुकाराम महाराजही मुमुक्षुंना हेच सांगत आहेत.

आहे ते सकळ/ कृष्णासी अर्पण/

नकळता मन/ दुजे भावी//

म्हणून पाठे/ लागतील भुते/

येती गिवसित /पाच जणे/

(पंचमहाभूते, ज्यापासून माणसाचे शरीर बनले आहे)

 ज्याचे त्या वंचले/ आठव न होता/

दंड हा निमित्त कारणे/ तुका म्हणे//

अर्थात सर्व कर्मे हरीची असून त्याची त्याला अर्पण करायची आठवण न ठेवल्यामुळे, माणूस जन्म मरणाच्या चक्रात सापडतो, त्याला दंड मिळतो.

तुकाराम महाराज पुन्हा पुन्हा गीतेत आलेल्या धर्म रक्षणाचे महत्त्व जीवनात का आहे ते त्यांच्या अभंगातून सांगतात, त्याचप्रमाणे शांत मनोवृत्तीचे महत्व ते समजावून सांगतात.

शांती परते नाही सुख/ येर अवघेची दुःख/

म्हणवुनी  शांती धरा/ उतराल पैलतीरा//

अंगी भरती आधी व्याधी/ तुका म्हणे त्रिविध ताप/ मग जाती आपोआप//

 मन जेव्हा शांत असेल, त्याचवेळी सर्व दुःखांचा नाश होऊन पैलतीरास जाणे सोपे होईल.

साळंकृत कन्यादान/ पृथ्वीदानाच्या समान/

परिते न कळे या मुढा/ येईल कळो भोग पुढा//

आचरता कर्म/ भरे पोट राहे धर्म/

सत्या देव साहे/ ऐसे करूनिया पाहे//

अन्न मान धन/ हे तो प्रारब्ध आधीन/

तुका म्हणे सोसे दुःख/ आता पुढे नासे//

गीतेतील कर्मयोग महाराजांनी या अभंगात भक्तांना सांगितला आहे. या ठिकाणी त्यांनी तत्कालीन वर्णाश्रमधर्माचे महत्त्व लक्षात घेतले आहे. प्रत्येकाने आपल्या धर्माला अनुसरूनच कर्म केल्याने दुःख राहत नाही असा या अभंगातून त्यांनी उपदेश केला आहे.ज्याप्रमाणे

कृष्णाने पार्थास त्याच्या क्षात्र धर्माचे पालन करण्यास सांगितले.

क्रमशः… 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ती सूत्र क्र. ५० / ५१ / ५२ / ५३ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ती सूत्र क्र. ५० / ५१ / ५२ / ५३ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले 

।। श्री नारद उवाच ।। 

नारद भक्तिसूत्रे ५०

स तरति स तरति स लोकान्स्तारयति ॥ ५० ॥

अर्थ : जो या भवसागरातून(आपण माया नदी असेही म्हणू शकतो) तरून जातो, तो आपल्या सोबत इतरांना ही तारतो.

विवेचन : सेहेचाळिसाव्या सूत्रात आरंभी ‘कस्तरति माया’ मायेतून कोण तरून जातो असा प्रश्न उपस्थित करून एकोणपन्नासाव्या सूत्रापर्यंत माया तरून जाणार्‍या भक्ताची लक्षणे सांगितली आहेत. “जो संगत्याग करतो, महानुभवांची सेवा करतो, निर्मम होतो, एकांतवासाचा आश्रय करतो, लोकबंधाचे उन्मूलन करतो, निस्त्रैगुण्य होतो, योगक्षेमाचाही त्याग करतो, तसेच कर्मफलांचा त्याग करतो, कर्माचाही त्याग करतो, निर्द्वंद्व होतो, जास्त काय वेदांचाही त्याग करतो, तो या दैवी दुरत्यया गुणमयी मायेतून तरून जातो हे निश्चयपूर्वक द्विरुक्तीने या सूत्रात सांगतात. मायातारण म्हणजेच मोक्ष, उद्धार, कैवल्य इत्यादी होय हे मागील सूत्रात सांगितलेच आहे.

आसक्तीचा त्याग, सत्पुरुषांची सेवा, ममत्त्वाचा त्याग, एकांत सेवन, लौकिक गोष्टीचा त्याग, त्रिगुणातीत होणे, योगक्षेमाचा त्याग, कर्मफळाचा त्याग, कर्म संन्यास, द्वंद्वाच्या पलिकडे जाणे, तसेच वेदांचा साक्षेपाने अभ्यास 

करून ज्याला भगवंता विषयी निरतिशय प्रेम प्राप्त होते, तो साधक स्वतः या मायनदीतून तरून जातोच, तसेच स्वतः सोबत अनेकांचे कल्याण करतो, त्यांनाही तारुन नेतो असे नारद महर्षी आपल्याला सांगतात.

भक्त स्वतः भक्ती करतात व लोकाना भगवद्‌भक्तीचे, भगवन्नामाचे महात्म्य अट्टाहासाने पटवून अनेकांना या भक्तिमार्गाकडे प्रवृत्त करतात. श्री देवर्षी नारदाचे सर्व जीवन अनंत जीवांना मायानदीतून तारून नेण्यातच गेले नाही काय? ‘यारे यारे लहान थोर । याती भलते नारी नर । करावा विचार । न लगे चिंता कवणाची ॥’ हे तुकाराममहाराजांचे उद्‌गारही लोकतरणच दर्शवितात. ते लोकांना का तारून नेतात? याचे उत्तर भक्ताच्या अंतःकरणातील करुणावृत्ती त्यांना स्वस्थ बसू देत नाही. *”बुडता हे जन न देखवे डोळा । येतो कळवळा म्हणउनि॥’* हे उद्‍गार याचीच साक्ष देतात. त्याच्या अवतारकार्याचे प्रयोजनच हे सांगितले जाते. ‘अवतार तुम्हा धराया कारण । उद्धराया जन जडजीव ॥’ चंदन हा जसा समीपवर्ती वृक्षांना आपला सुगंध प्रदान करतो त्यामुळे त्या सर्व वृक्षांचेही महत्त्व वाढते, त्याचा उद्धार होतो त्याप्रमाणेच भक्तिमान पुरुष हा अनेक लोकांचा उद्धार करतो. गंगा आपल्या सामर्थ्याने ओहोळास पावन करते, परिस आपल्या सामर्थ्याने लोहास सुवर्ण बनवितो, कस्तुरी आपल्या गुणाने मातीस मुल्यवान बनविते त्याप्रमाणे हा भक्तिमान पुरुष आपल्या सामर्थ्याने अनेकाना या मायानदीतून तारून नेतो.

संत तुकाराम महाराज म्हणतात,

“अहर्निशी सदा परमार्थ करावा पाय न ठेवावा आडमार्गी ॥ १॥ आडमार्गी कोणी जन जे जातील । त्यांतून काढील तोचि ज्ञानी ॥ २॥तोचि ज्ञानी खरा दुजीयासी । वेळोवेळां त्यासी शरण जावे ॥ ३ ॥ आपण तरेल नव्हें ते नवल । कुळॆं उद्धरील सर्वांची ती ॥ ४ ॥ शरण गेलियानें काय होतें फळ । तुका म्हणें कुळ उद्धरिले ॥ ५ ॥”

जय जय रघुवीर समर्थ 

– – – – 

नारद भक्तिसूत्र ५१

अनिर्वचनीयम् प्रेमस्वरूपम्

अर्थ: प्रेमाच्या स्वरूपाचे शब्दांत वर्णन करणे अवघड आहे.

विवेचन: भक्तीची व्याख्या करताना ती परम प्रेम रुपा आहे असे आधी सांगितले आहे. त्यानंतर ती अमृत स्वरूपा आहे असे सांगितले आहे. रूप आणि स्वरूप यात फरक आहे. रूपात वस्तूचा आकार, रंग, बाजनझ आवरण आदी बाह्य गुणधर्माचा समावेश होतो. स्वरूप वस्तूच्या अंगभूत स्थायीभावाचे लक्षण सांगते. नट वेगवेगळ्या भूमिकांमध्ये वेगवेगळा दिसतो पण प्रत्यक्षात मात्र त्याचा विशिष्ट असलेला स्थायीभाव जे त्याचे स्वरूप असते ते मात्र वेगळे असते.

प्रेम हा शब्द प्री या धातूपासून तयार होतो. संतोष पावणे, तृप्त होणे. प्रेम हा मनाचा असा अनुभव अथवा अवस्था आहे की ज्यामुळे मनुष्य समाधानी होत असतो.

प्रेम फक्त अनुभवता येते. जशी हवा दाखवता येत नाही, आकाशाची उंची मोजता येत नाही तसे प्रेम मोजून दाखवता येत नाही. प्रेम असते तरी नसते. असे कोणी म्हणू शकत नाही की मी अमक्या वर पाच रुपयांचे प्रेम करतो. प्रेम व्यक्त करण्यासाठी एकदा मनुष्य नवनवीन क्लुप्त्या शोधून काढेल. चित्रपटामध्ये दाखवतात त्याप्रमाणे चंद्र सूर्य आणून देतो अशा थापा मारू शकेल. अर्थात हे सारे वर्णन असेल किंवा प्रेम व्यक्त करण्यासाठी केलेली कृति असू शकेल…! याला फारतर प्रेमाचा आविष्कार म्हणता येईल…

पण प्रेम म्हणता येईल का? तर नाही…

प्रेम हे अदृष्ट, अदृष्य असल्याने ते पाहता येत नाही. ज्याला अशा प्रेमाचा लाभ होतो, अनुभूति मिळते, तो एका विलक्षण आनंदात असतो. त्या आनंदाचा तो आस्वाद घेऊ शकतो, पण सर्वार्थाने त्याचे वर्णन करू शकत नाही..

संत तुकाराम महाराज प्रेमाबद्दल म्हणतात,

“प्रेम नये सांगता बोलता दाविता। अनुभव चित्ता चित्त जाणे ।।”

(अभंग क्रमांक २७२९, सार्थ तुकाराम गाथा, धार्मिक प्रकाशन संस्था)

महाराज म्हणतात, प्रेम ही काही प्रदर्शन करायची भावना नाही. प्रेम ही मनापासून ते मनापर्यंत पोहचणे आवश्यक असते. हल्लीच्या काळात खरे प्रेम मिळणे तसे खुप अवघड आहे. कारण प्रेम हा काय प्रकार आहे. ही भावना काय आहे. हे किती जनांना माहीत आहे. हाच खुप मोठा प्रश्न आहे असे मला वाटते. कारण सद्यपरिस्थितीत आकर्षणाला व वासनेलाच प्रेम म्हटले जाते.

आपण इथे भगवंतावर अकारण केल्या जाणाऱ्या प्रेमाबद्दल चर्चा करीत आहोत. पण समाजाची, समाजातील सद्यस्थिती लक्षात यावी म्हणून त्याचा वरती उल्लेख आला आहे.

प्रेम म्हणजे देव

प्रेम म्हणजे भक्ती,

प्रेम म्हणजे साधना

प्रेम म्हणजे शक्ति।।

प्रेम, त्यातून मिळणारा आनंद याचे अचूक वर्णन करणे अशक्य आहे, पण सर्व संतांना सामान्य मनुष्याबद्दल कळवळा असल्याने ते या प्रेमाचे वर्णन करतात, अर्थात ते सुद्धा चपखल वर्णन करू शकत नाहीत असे नारद महाराज आपल्याला सांगत आहेत.

जय जय रघुवीर समर्थ 

– – – – 

नारद भक्तिसूत्र ५२

मूकास्वादनवत्

अर्थ : प्रेमाचा अनुभव हा मुक्या माणसाने घेतलेल्या रसास्वादाप्रमाणे असतों. (… त्यामुळे त्याला तो शब्दाने सांगता येत नाही.)

विवेचन : मुका मनुष्य बोलू शकत नाही. त्याला झालेल्या, होत असलेल्या वेदना तो सांगू शकत नाही. इथे नारद मुनी आपल्याला मूक्याचे उदाहरण देऊन साधक अनुभूतीच्या विशिष्ट टप्प्यावर मौन होऊन जातो. बाह्यांगावरून तो मूक झाला, अबोल झाला असे आपण म्हणू शकतो. परंतु त्या पातळीवर पोचलेल्या साधकाला जगात घडणाऱ्या सर्व गोष्टी म्हणजे भगवतांची लिला आहे, याची अनुभूती आलेली असते. त्याच्या आयुष्यात तसेच त्याच्या आजूबाजूला घडणाऱ्या प्रत्येक गोष्टीत त्याला भगवंताचे अस्तित्व जाणवत असते. सर्व जाणल्यावर बोलायचे काही शिल्लक रहात नाही.

एक छान वाक्य आहे.

“वेदना जास्त बोलते आणि सुख कमी बोलते. “

भक्तिमार्गात या विशिष्ट टप्प्यावर आल्यावर साधक मौन न झाला तर नवल…! साखर दुधात पूर्णपणे मिसळून गेली की त्यातून स्वतः साखरेला तिचे वेगळेपण दाखवता येत नाही आणि आपण ते वेगळे करून पाहू शकत नाही.

समर्थ दासबोधात याचे वर्णन करतात…

“मुक्यानें गूळ खादला । गोडी न ये सांगायाला । याचा अभिप्रायो मजला । निरूपण कीजे ॥”

 (दास. ०६. १०. ०२)

जय जय रघुवीर समर्थ 

– – – – 

नारद भक्तिसूत्र ५३

प्रकाशते क्वापि पात्रे”

अर्थ: त्या परम प्रेमाचा प्रकाश क्वचितच, कधीतरी एखाद्या अधिकारी व्यक्तीत पाहायला मिळतो.

विवेचन : भगवंतावरील प्रेम हेच खरे प्रेम आहे, असे सर्व संत सांगतात. पण हे प्रेम वेगळे काढून दाखवता येत नाही, त्याची फक्त अनुभूती घेता येते. ज्याप्रमाणे नदी सागराला जाऊन मिळण्यासाठी धडपड करीत असते. ती सागराला जाऊन मिळाली की नदीचे अस्तित्व संपुष्टात येते. नदी पुन्हा बाहेर सांगू शकत नाही की मी नदी आहे. तसे खरा ज्ञानी मनुष्य कधीही सांगत फिरत नाही की मी ज्ञानी आहे. तर, त्याच्या चित्तात प्रकट झालेला ज्ञानाचा प्रकाश आपसूक सर्वदूर पसरतो. साखर सांडली की मुंग्यांना आमंत्रण द्यावे लागत नाही, त्या आपसूक येत असतात.

संतांचे अनेक वैशिष्ट्यांपैकी एक प्रमुख वैशिष्ट्य पुढील प्रमाणे सांगता येईल. ज्याच्याकडे अकारण शांतता लाभते, ज्याच्याकडे जाऊन भौतिक गोष्टी मिळत नाही, तरी त्याच्याकडे पुन्हा जावेसे वाटते, अगदी सोप्या शब्दांत सांगायचे झाल्यास ज्याच्याकडे गेल्यावर परत येऊ नये असे वाटते, (अर्थात माहेरी गेल्यासारखे वाटते) त्याला संत अर्थात ज्ञानी म्हणता येईल.

एक व्यवहारातील उदाहरण पाहू. अनेक उमेदवार स्पर्धा परीक्षा देत असतात, पण त्यातील फार कमी लोक त्या परीक्षेत उत्तीर्ण होतात.

खरंतर जीव हा मुळात ज्ञानी आहे, पण त्याच्यावर असलेला मायेचा पडदा ज्याला काढता येतो, तो ज्ञानी होतो. वाचायला /लिहायला एकदम सोपे आहे, पण ही माया जाणणे फार अवघड.

“लक्षावधीत एखादा मोक्षार्थ झटतो कधी|

झटणाऱ्यात एखादा तत्त्वतां जाणतो मज||”

(गीताई ०७. ०३)

एखादा मनुष्य जेव्हा दुसऱ्या व्यक्तीवर प्रेम करतो, अर्थात प्रेम व्यक्त करतो तेव्हा त्या व्यक्तीला जे आवडते ते करतो. त्या व्यक्तीच्या आवडत्या गोष्टी त्याला देण्याचा प्रयत्न करतो. त्या व्यक्तीने बनवलेल्या, आणलेल्या, भेट म्हणून दिलेल्या वस्तूंचा आदर करतो, त्यांना अत्यंतिक प्रेमाने सांभाळतो. याच अनुषंगाने जेव्हा साधक भगवंतावर प्रेम करू लागतो, त्याचवेळी त्याने भगवंताने निर्माण केलेल्या चराचर सृष्टीवर प्रेम करणे अपेक्षित आहे, नव्हे अनिवार्य आहे. असे प्रेम करणारा मनुष्य विरळाच असतो. पण त्याच्या या निःस्वार्थ प्रेमाचा प्रकाश पडल्या शिवाय रहात नाही.

साधकाने साधना करीत रहावी, दयासिंधु आसलेल्या सद्गुरूंना त्याची दया आल्याशिवाय राहणार नाही. अर्थात त्याचा प्रकाश पडल्याशिवाय राहणार नाही. पुढील सूत्रात आपण परमप्रेम कसे असते, ते शब्दाने सांगण्याचा प्रयत्न नारद महर्षींनी केला आहे त्याचा अभ्यास आपण करू.

जय जय रघुवीर समर्थ!! 

नारद महाराज की जय!!!

– भक्ती सूत्र क्र. ५० / ५१ / ५२ / ५३.

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक

भारतीय जीवन में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं हैं, वे मन की तैयारी और सांस्कृतिक चेतना की एक निरंतर यात्रा हैं। कोई भी पर्व अचानक नहीं उतरता; वह धीरे-धीरे ऋतुओं की चाल के साथ हमारे भीतर स्थान बनाता है।

फाल्गुन की चहल-पहल और रंगों की स्मृतियों के बाद जब चैत की आहट सुनाई देती है, तब कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन मानो जीवन की गति को थोड़ा थाम लेने का अवसर देते हैं। यह समय बाहरी उत्सवों की चकाचौंध से अधिक भीतर की सजगता का समय होता है—एक ऐसी साधना, जिसमें मन स्वयं को आगामी पर्वों के लिए तैयार करता है।

इन्हीं दिनों में आती है शीतला अष्टमी। लोकजीवन में यह बसोरा के रूप में भी जानी जाती है। इस दिन रसोई की अग्नि को विश्राम दिया जाता है और एक दिन पूर्व बनाया गया बासा भोजन श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण परंपरा प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर लोकबुद्धि का गहरा संतुलन छिपा है—स्वास्थ्य, स्वच्छता और संयम का संतुलन।

शीतला माता की पूजा करते हुए घरों में एक अलग प्रकार की शांति उतर आती है। चूल्हा भले ही न जले, पर श्रद्धा की एक उजली लौ पूरे घर में फैल जाती है। यह विराम हमें स्मरण कराता है कि जीवन में निरंतर गति जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है ठहरना भी।

यही ठहराव आगे आने वाले नवरात्रि की भूमिका भी रचता है। शक्ति की आराधना का यह महान पर्व केवल नौ दिनों की उपासना भर नहीं, बल्कि उससे पहले की यह मानसिक तैयारी भी उसका एक महत्वपूर्ण आधार है। कृष्ण पक्ष के ये दिन हमें संकेत देते हैं कि अब अपने भीतर की अनावश्यक व्यग्रताओं को धीरे-धीरे कम किया जाए, घर-आँगन को सहेजा जाए और मन में श्रद्धा के लिए एक निर्मल स्थान बनाया जाए।

भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि यहाँ हर बड़े उत्सव से पहले एक शांत प्रस्तावना होती है—जैसे संगीत से पहले की धुन, या भोर से पहले का वह सन्नाटा जिसमें प्रकाश जन्म लेता है।

इस दृष्टि से देखें तो शीतलाष्टमी केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक क्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें आने वाली नवरात्रि की ऊर्जा के लिए भीतर से तैयार करता है।

कृष्ण पक्ष के ये पंद्रह दिन इसलिए रिक्त नहीं हैं।

वे मन को संयत करने की एक साधना है

ताकि जब शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़े,

तो उसके साथ हमारी आस्था और बलवती हो सके।

शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति ने उत्सवों के बीच ऐसे शांत पड़ाव रचे हैं, जहाँ मन स्वयं से संवाद कर सके। शीतलाष्टमी का यह सहज विराम और नवरात्रि की आने वाली ऊर्जा—दोनों मिलकर हमें यह स्मरण कराते हैं कि शक्ति की उपासना केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता और संतुलन से पूर्ण होती है।

कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन हमें ठहरकर देखने का अवसर देते हैं—अपने भीतर, अपने परिवेश में और अपनी परंपराओं में। जब मन का आकाश निर्मल हो जाता है, तभी आस्था का चंद्रमा पूर्णता की ओर बढ़ता है,इसीलिए हमारे उत्सव केवल मनाए नहीं जाते—

वे पहले भीतर जागते हैं,

फिर जीवन में उजाला भर देते हैं।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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