(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।
पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।
स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।
हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।
हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆
🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️
आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।
यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।
इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।
मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।
जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।
पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।
यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।
चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।
यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक, गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।
मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है। गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।
रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।
यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।
दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।
जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।
जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।
विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।
जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।
वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।
जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।
सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।
जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।
भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।
नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।
यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।
हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।
और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।
दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।
यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।
यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।
आपल्या समुहातील ज्येष्ठ गझलकार श्री राजकुमार कवठेकर यांचा ‘क्लेशवृक्षाच्या छायेत‘ हा दुसरा कवितासंग्रह आज १०मार्च २०२६ रोजी प्रकाशित होत आहे. हा संग्रह कोल्हापूरच्या ‘अक्षरदीप प्रकाशन‘ ने प्रकाशित केला आहे.
ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे श्री. कवठेकर यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐
☆ उगवतीचे रंग – विळखा ऑनलाइन गेम्सचा… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
परवा एका मित्राच्या घरी गेलो. तो एकटाच होता. वहिनी दिसत नव्हत्या. त्याला म्हटलं, ” काय रे, वहिनी गावाला गेल्या आहेत का? ” तो म्हणाला, ” हो अरे, ती मयुरीकडे गेली आहे. आता तीन महिने तिकडेच राहणार. ” मयुरी म्हणजे माझ्या मित्राची मुलगी पुण्यात असते. आता तिचा मुलगा दहावीला आहे. मार्चमध्ये त्याची परीक्षा आहे. परंतु तो मुलगा अभ्यास करण्यापेक्षा मोबाईल जास्त पाहतो, सतत ऑनलाईन गेम्स खेळत असतो. मित्राच्या मुलीला आणि जावयाला असे वाटते की या सगळ्याचा परिणाम त्याच्या परीक्षेतील गुणवत्तेवर होऊ नये म्हणून त्यांनी त्याच्या आजीला दोन-तीन महिने बोलावून घेतले आहे. कारण ते दोघे नोकरी निमित्ताने बाहेर असतात. मग घरी त्याच्यावर लक्ष कोण ठेवणार? ते ऐकून मला खूप आश्चर्य वाटले. मुलांचे ऑनलाईन गेम्सच्या आहारी जाणे खरोखरच काळजी वाटावी इतके वाढले आहे.
अगदी लहान मुलांपासून तरुणांपर्यंत आणि काही मोठी माणसे सुद्धा या व्हिडिओ गेम्स आणि ऑनलाईन गेम्सच्या आहारी गेली आहेत. कुठेही गेले तरी प्रत्येकाच्या हातात मोबाईल दिसतो आणि कोणीतरी काहीतरी ऑनलाईन गेम किंवा व्हिडिओ गेम खेळताना दिसतो. सुरुवातीला करमणूक म्हणून काही वेळ त्यात घालवल्यानंतर त्याचे सवयीत कधी रुपांतर होते ते आपल्याला कळत नाही आणि मग त्याशिवाय जर राहवत नसले तर त्या सवयीचे रूपांतर व्यसनात झाले असे समजायला हरकत नाही.
हल्ली आई वडील आपल्या कामात खूप व्यस्त असतात. त्यामुळे मुलांसाठी त्याला वेळ देता येत नाही. अशावेळी विरंगुळा म्हणून किंवा करमणूक म्हणून ते त्याच्या हातात मोबाईल देतात आणि मग त्याला हळूहळू व्हिडिओ गेम्स किंवा ऑनलाईन गेम्सचे व्यसन लागते. २०२३ च्या आकडेवारीनुसार भारतात जवळपास सहा कोटी लोक ऑनलाईन गेम्स खेळतात. त्यातही लहान मुलांचे आणि तरुणांचे प्रमाण मोठे आहे.
हे आभासी जग एवढे आकर्षक आहे की त्यामुळे प्रत्यक्षातील आपल्यासमोर असलेल्या चांगल्या गोष्टींकडे आपले लक्ष जात नाही. या गेम्समधील ग्राफिक्स एवढे आकर्षक असतात की लहान मुलांबरोबरच मोठ्यांना देखील त्याचा मोह पडतो. एकदा खेळायला सुरुवात केली की पॉईंट्स वाढत जातात आणि त्याचे वेडच लागते. मग पुढील पायरी, त्याच्या पुढील पायरी असे करत करत मुले या अजगराच्या विळख्यात अडकत जातात. हा विळखा त्यांना इतका करकचून आवळतो की त्यातून बाहेर पडणे अशक्य होते. अशावेळी जर पालकांनी मुलांच्या हातातील मोबाईल काढून घेण्याचा प्रयत्न केला तर मुलं चिडचिड करतात, प्रसंगी हिंसक बनतात आणि कधी कधी तर त्याच्या पुढची म्हणजे आत्महत्येची पायरी गाठण्यापर्यंत त्यांची मजल जाते. या खेळांचे व्यसन लागल्यामुळे मुले एकलकोंडी बनतात. घरात असलेल्या आई-वडिलांशी देखील बोलण्याची त्यांची इच्छा होत नाही. ते आपल्याच आभासी जगात रमलेले असतात. ही एक प्रकारची नशाच असते. यालाच डिजिटल ड्रग्स असेही म्हटले जाते. हेडफोन लावून जगाच्या कानाकोपऱ्यातील लोकांशी बोलण्याची सोय पालकांशी बोलण्यापेक्षा त्यांना अधिक मजेशीर वाटते. कुटुंबातील सदस्यांपासून मुले अशा रीतीने लांब जातात.
काही ऑनलाईन गेम्स हे पेड असतात. अशावेळी मुले पालकांच्या ऑनलाइन कार्डाचे डिटेल्स वापरून हे गेम्स डाउनलोड करून घेतात. तसेच त्यात वेळोवेळी होणारी पैशाची मागणी देखील पुरवतात. हे गेम्स खेळत असताना बऱ्याच वेळा अनेक जाहिराती किंवा व्हिडिओ क्लिप्स पॉप अप होतात. अशा व्हिडिओ क्लिप मध्ये बऱ्याच वेळा संवेदनशील किंवा मुलांनी पाहू नये अशा प्रकारचा अडल्ट कंटेंट असतो. त्यामुळे मुलांच्या भावना नको त्या वयात उद्दीपित होतात, मुले भरकटतात आणि अभ्यासापासून दूर जातात.
या खेळामुळे मुलांचे आर्थिक आणि शारीरिक असे दोन्ही प्रकारचे नुकसान होत असते. मोबाईलकडे सतत टक लावून बघत राहिल्यामुळे डोळ्यांचे विकार होतात, सतत एकाच जागी बसून राहिल्यामुळे आणि शारीरिक हालचालीचा अभाव असल्यामुळे लठ्ठपणामध्ये वाढ होते आणि त्यामुळे आजारांचे प्रमाण वाढते. या ऑनलाईन गेम्स चा अतिवापर मानसिक आरोग्य बिघडवणारा सुद्धा ठरतो. चिडचिडेपणा, एकाग्रतेचा अभाव, अभ्यासातील रुची कमी होणे आणि हिंसक प्रवृत्ती वाढणे यासारखे दुष्परिणाम होतात. ऑनलाइन गेमिंगच्या माध्यमातून होणारी आर्थिक फसवणूक होण्याची दाट शक्यता असते तसेच संवेदनशील किंवा गोपनीय माहिती फसवणूक करणाऱ्यांच्या हाती लागल्यास ते त्याचा गैरवापर करण्याची शक्यता असते.
एक काळ असा होता की मुले ग्राउंडवर खेळण्यात रमून जात. निरनिराळे मैदानी खेळ खेळत. बऱ्याच वेळा पालकांना त्यांना ओढून आणावे लागत असे. पण आता मात्र ते व्हिडिओ गेम्स किंवा ऑनलाइन गेम्समध्ये एवढे अडकले आहेत की त्यातून त्यांना बाहेर काढणे आणि पुन्हा मैदानी खेळांकडे वळवणे कठीण झाले आहे.
याचा अर्थ मुलांनी ऑनलाईन गेम्स खेळूच नयेत असा नाही. पण त्यांना स्क्रीन टाईम ठरवून द्यावा. अनेक देशांमध्ये मुलांच्या मोबाईल वापरावर आणि इंटरनेटच्या वापरावर कठोर बंधने आहेत. अमेरिकेसारख्या देशात सहा ते बारा वयोगटातील मुलांना फक्त एक तास मोबाईलवरील गेम्स खेळण्याची तर सहा वर्षाखालील मुलांना फक्त अर्धा तास गेम्स खेळण्यासाठी परवानगी आहे.
या सगळ्यात पालकांची भूमिका अतिशय महत्त्वाची आहे. पालकांनी मुलांसाठी वेळ तर द्यायलाच हवा परंतु त्यांच्याशी मनमोकळा संवाद साधायला हवा. ऑनलाइन फसवणूक कशी होऊ शकते आणि त्यातील धोके कोणकोणते आहेत याची माहिती त्यांना द्यायला हवी. आणि यदाकदाचित त्यांच्याकडून एखादी चूक झाली तरी त्यांना न रागावता त्यातून बाहेर कसे काढता येईल यासाठी डोके शांत ठेवून मार्गदर्शन करायला हवे.
शक्य झाल्यास त्यांना स्वतः मैदानावर घेऊन जावे. मुलांच्या गर्दीने जर मैदानी गजबजली तर रुग्णालयातील गर्दी कमी होईल हे लक्षात ठेवावे आणि त्यांना पटवून द्यावे. मैदानावरील खेळामुळे मुलांची शारीरिक आणि मानसिक निकोप वाढ होते, त्यांची शक्ती वाढते, एकाग्रता वाढते, नेतृत्व गुणांचा विकास होतो हे त्यांच्या मनावर बिंबवले पाहिजे. एकदा मुलांना त्याची आवड लागली की मग मुले स्वतःहूनच मैदानावर खेळायला पसंती देतील.
मुलांचा मोबाईल एकदम काढून घेण्यापेक्षा टप्प्याटप्प्याने त्यांना त्याच्याशिवाय राहण्याची सवय लावा. त्याने तुमचे ऐकल्यानंतर त्याला छोटेसे बक्षीस द्या किंवा त्याचे कौतुक करा. जेवणाच्या टेबलावर किंवा अभ्यासाच्या खोलीत मोबाईल घेऊन जाऊ देऊ नका. त्याचप्रमाणे मुलांना गाणी म्हणणे, चित्रे काढणे, वाचन करणे, बागकाम करणे यासारख्या गोष्टींची आवड लावता येईल. पण त्यासाठी पालकांना देखील स्वतःचे काम किंवा मोबाईल बाजूला ठेवून मुलांसाठी वेळ द्यावा लागेल. तरच भावी पिढीचे भविष्य उज्ज्वल होईल.
पावसाळ्याचे दिवस. ६३-६५ चा औंधमधला काळ. त्याकाळी पाऊस पावसाळ्यातच पडे. त्यामुळे बाहेर धुवांधार पाऊस. दरदिवशी न चुकता येणारा रस्ता झाडण्याचा खराट्याचा खर्र-खर्र आवाज त्या मुसळधार पावसातही येतो. मग मात्र माझ्या बाबांचे कुतूहल चाळवते. या गावात येऊन काही काळ उलटून गेलेला असतो. गावाच्या लयीची, गतिची, नादाची हळूहळू सवय होवू लागलेली असते. त्यातलाच हाही एक आवाज. आईबाबांचा सकाळचा दुसरा चहा आणि हा आवाज यांची न चुकता एकत्र येणारी वेळ. एरवी याबद्दल कधीकाही वाटलेले नसते. आज मात्र या पावसात ते गरमागरम चहा पिताहेत आणि बाहेर कोणीतरी रस्ता झाडण्याचे काम इमानेइतबारे करते आहे याने थोडे अपराधी वाटते.
*ते उठतात. दुमजली घराच्या खिडकीतून वाकून खाली पाहातात. ६५-७० ची एक म्हातारी. भिजू नये म्हणून डोक्यावर नावापुरतेच घेतलेले कांबळे. ठिगळं लावून पण नीटनेटकी नेसलेली नऊवारी. हातात लांब दांड्याचा खराटा. पावसाचे वरुन ओतणारे पाणी. रस्त्याच्या कडेला जमलेला ओला पाचोळा. जमेल तसा गोळा करत उचलून पोत्यात गोळा करत पुढे निघालेली असते. *
*बाबांना राहावत नाही. ते वरुनच शुकशुक करून हाक मारतात. कधी कुणी बोलण्याची सवय नसलेली त्या म्हातारीला कुणी आपल्याला बोलावते आहे हेच समजत नाही. बाबा परत एकदा आवाज देतात. आता मात्र चमकून ती आजूबाजूला पाहाते. मग तिचे लक्ष वर जाते. बाबा तिला वर या म्हणून सांगतात. तिच्या चेहर्यावर भीती, उत्सुकता याचे मिश्रण पसरते. *
*जिना चढून ती वर येते. बाबा तिला आत बोलावतात. ती अतिशय अवघडून अंग चोरून भिंतीला टेकून उकीडवी बसते. बाबा आईला चहा आण म्हणून सांगतात. आई एक जादाची कपबशी घेऊन तिच्या समोर सारते. ती काहीच बोलत नाही. तिच्या गालावरून येणारे पाणी तिच्या डोळ्यातले की पावसाचे याचा पत्ता न लागू देता ती म्हणते, “ही कपबशी चालत नाय मला. म्हाराची आहे मी मास्तरा. “*
*बाबा हसून म्हणतात, “आम्हाला चालते, घ्या चहा” ती यावेळी मात्र थोडी जिद्दिने म्हणते, “तुमाला चालंल. पण म्यास्नी नाय चालत तुमची. पिचकी, कानतुटकी काडा एकादी. त्यातनंच मी घेतो बगा च्या. तुज्याबद्दल आयकून हाय मी मास्तर गावात. भला मानूस तू. तुला ईटाळ केला मी तर गावात नाव नाय र्हायचं बग” आता मात्र आई हसून म्हणते, “बाई, आजपासून ही तुमची कपबशी. आम्ही नाही वापरणार. हवं असेल तर कान मोडून ठेवते उद्याला. पण रोज आमच्या घरापाशी आलात की वर चहा घ्यायला येत जा, आणि मग पुढे जा. “*
*म्हातारीच्या सुरकुतलेल्या चेहर्यावर अडकून राहिलेले उरलेले पाणी ओघळते. अंगावरच्या जीर्ण कपड्यासारखंच फिकं हसून ती मान डोलावते. *
*त्यादिवसापासून बायजाबाई आमच्या घरी नवाच्या सुमारास चहा घ्यायला येवू लागते. तिच्या खराट्याचा आवाज लांबरून येवू लागे. तो आला की आई चहाचे आधण टाके. ती घरापर्यंत पोचे तोवर चहा उकळलेला असे आणि ती जिना वर चढून येईपर्यंत तो कपात असे. आई, बाबा आणि बायजाबाई तिघेजण कधी मूकपणे तर कधी काहीबाही गप्पा मारत चहा संपवत. *
*बाबा शाळेला जात, बायजाबाई पुढचा रस्ता झाडायला आणि आई तिच्या पुढच्या घरकामाला. आई कधी तिला चहाबरोबर भाकरी – पोळीचा तुकडा नाहीतर इतर काहीबाही देई. ती तो आनंदाने खात असे. सणासुदीला तिच्यासाठी जेवणही बाजूल काढून ठेवले जावू लागले. या बायजाबाईचं गावाच्या बाहेर एक झोपडं. नावापुरतं रात्रीच्यावेळी झोपायला आसरा देणारं. तिच्या मागच्यापुढच्या कुणाचाच पत्ता तिला माहीत नाही. या जगात दिवसभर गावचे रस्ते झाडायला जन्मल्याप्रमाणे ती सारा दिवस गावात घालवी. कोणी शिळे-पाके कधी आंबलेले खायला देई. बस हेच ते काय आयुष्य बायजाबाईचे. कामाला मात्र चोख. गावातल्या रस्त्यावर कधीच कचरा दिसत नसे आणि त्याचे श्रेय बायजाबाईचेच. *
*अशीच ती एकदिवस नेहमीप्रमाणे चहा प्यायला वर आली. आईने चहा केला एकीकडे आणि दुसरीकडे दाण्याचं कूट करायचं म्हणून दाणे भाजायला घेतले. त्याचा खमंग वास घरभर पसरला. चहा पिऊन झाला, बाबा शाळेत गेले. तरी बायजाबाई आज थोडी घुटमळलीच. आईने शेवटी विचारलं, “काय गं बायजा, काही हवंय का? ” ती म्हणाली, “बाये, दाने लय आवडतात बग मला. वासानं जीब चाळवली, देतिस काय वायचं खायाला”. *
*आईनं “अगं त्यात काय एवढं” असं म्हणत भाजलेले, अजून गरम असलेले थोडे दाणे तिच्या समोर वाटीत ठेवले. तसं बायजा मान हलवत म्हणाली, “बाये, हे असले नगं. भाजतान काळे पडल्याले दे”. “अगं, असूदे हे चांगले खा की मी देते तर” असं म्हणत आई तिला आग्रह करू लागली. तसं बायजाबाई म्हणाली “अगं माय, तू देशील गं. आनि मंग माजी जिब सरावली ते खायाला की ते काळे जळलेल नाय की गं जानार. बाकीचे सगले ते तस्लेच देतात बग. तूही आपले तेच दे”*
*यावर काय उत्तर द्यावं, हे न सुचलेल्या आईनं मग जमतील तेवढे काळे दाणे बाजूला केले आणि तिला दिले. त्यादिवसापासून मग आई थोडे जास्तच दाणे काळे करायला शिकली. जेंव्हा आई दाणे भा़जे त्यावेळी बायजाबाईसाठी काळे दाणे बाजूला काढून ठेवू लागली. *
*शेवटी आयुष्याचा आखून दिलेला मार्ग पुढे जात असतो. मी आणि माझी बहीण यांच्या जन्मानंतर, लहान गावात शाळा नसल्याची तीव्र जाणीव बाबांना होवू लागते. आणि शेवटी औंध सोडून सांगलीला त्यांच्या मूळ गावी जायचे ठरवतात. बातमी गावात पसरायल वेळ लागत नाही. एव्हानाच्या ७-८ वर्षांच्या काळात आई-बाबांनी माणुसकीची बरीच पुण्याई गोळा केलेली असते. बातमी पसरल्यापासून गाववाल्यांच्या घरी चकरा सुरू होतात. मास्तरांनी गाव सोडून जाऊ नये म्हणून आर्जवे, नवस, अगदी प्रेमाच्या धमक्याही देऊन होतात. परंतू मास्तर बधत नाही हे पाहून राजासकट गावावर दु:खाचे सावट पसरते. *
*जायचा दिवस हळूहळू जवळ येवू लागतो. नेहमीप्रमाणे सकाळच्या चहाला बायजाबाई येतच राहाते. बातमी तिच्यापर्यंतही पोचलेली असते पण ती आईबाबांना “जाऊ नका” असे कधीच म्हणत नाही. “मास्तर, रस्ता जिकडं नेतो तिकडं जायलाच पायजेल की. खुश्शाल जा. सगळं भलंच होईल”, एवढंच म्हणत राहाते. *
*आईबाबांचा निघायचा दिवस उजाडतो. सकाळचा शेवटचा चहा प्यायला बायजाबाई नवाला हजर होते. मूकपणे समोर येवून बसते. आईनं चहाचा पुढं केलेला कप घेते, आणि एका चुरगळलेल्या वर्तमानपत्राच्या कागदाची पुडी बाबांसमोर सरकवते. “हे काय गं बायजा”, म्हणत बाबा ती हातात घेऊन उघडतात. आणि त्यांच्या चेहर्यावर आश्चर्य मावत नाही. ते न बोलता पुडी आईच्या हातात देतात. आई पाहाते तर चांदीचं उदबत्तीचं घर. *
*बाबा कसेबसे शब्द गोळा करत बायजाला विचारतात, “बायजाबाई, हे काय हो? कशासाठी? “*
*बायजा उत्तरते, ” माय आणि तू कायम मला देत आले. म्या कदीबी काय नाय दिलं तुमास्नी. म्हून. ते आप्ला राजा येडंच हाय. दिवाळीच्या वक्ताला मला चांदीचं नाणं दिल्तं बग कदी. आता म्या ते काय खाउ? प्वाट भरंल का माजं त्यानं, त्याचं हे करून आणलं गावात जाऊन. तुमि दोगंबी करताय की द्येवाचं मंग मलाबी आसिर्वाद मिळंल न्व्हं”? *
*बायजाच्या डोळ्यातला तो पहिल्या दिवशीचा पाऊस आज आईबाबांच्या डोळ्यात उतरतो. हे आम्हाला न देता विकलं तर त्याचे पैसे मिळतील, असे तिला सांगणे म्हणजे तिच्या प्रेमाचा आत्यंतिक अपमान हे बाबांना उमगते. ते न बोलता ती मोलाची भेट स्वीकारतात. बायजाबाई गडबडीनं निघते आणि म्हणते “आज रस्ते लवकर स्व्च करायचं हायती. माझ्या मास्तरचा टरक जानार नव्हं का त्यावरून”. *
*शेवटी दुपारचा ट्रक निघतो. बाबा ट्रकवाल्याला हळू चालवायला सांगताता. कारण गावातली शंभर एक माणसं ट्रकमागे चालत वेशीपर्यंत पोचवायल येत असतात. शेवटी ट्रक गती पकडतो, हात उंचावतात. त्यात टरकाला ओवाळून कानशिलावर बोटे मोडणार्या बायजाचेही हात असतात. *
*सांगलीला आल्यावर कित्येक दिवस आई भाजल्यावर काळे दाणे बाजूला काढत राहाते. त्याने एक बरणी भरून जाते. ते खाणारे मात्र नसते कोणी. शेवटी मात्र तिला लक्षपूर्वक दाणे कमी काळे करण्याची सवय लावून घ्यावी लागते. चांदीचे उदबत्तिचे घर देवघरात विराजमान होते. त्यात लावल्या जाणार्या उदबत्तीच्या धुरांच्या वलयाप्रमाणं काळाची वलयं उठत राहातात. त्या अस्पष्ट होत जाणार्या धुराप्रमाणं बायजाबाईही विस्मृतीच्या पड्द्याआड अस्पष्ट होत जाते. मधेच कधीतरी तिची गोष्ट बाबा कुणाला तरी सांगत राहातात. त्यावेळी तिच्या आठवणींचा सुवास उदबत्तीसारखाच सारे आसमंत सुगंधीत करत असतो. *
*२००८ मधे आईबाब इथे अमेरिकेत येतात. भडंग, भाजणी, गोडामसाला, मेतकूट असे सर्व काढून झाल्यावर बाबा एक मखमली डबी काढतात. म्हणतात काहीतरी आणलंय तुझ्यासाठी. माझ्या बाबांना सोन्या-चांदीच्या वस्तू घडवून घेण्याची दांडगी हौस. तसेच काहीतरी असणार असे मनाशी म्हणत मी ती उघडते तर आत लक्ष्मीची चांदीची देखणी मूर्ति. *
*मी बाबांना म्हणते, “बाबा किती सुरेख घडवलेली आहे ही. पण कशासाठी हे इतकं महागाचं. शिवाय तुम्हाला माहीत आहे, मी पूजा वगैरे काय करत नाही”. *
*बाबा म्हणतात, “अगं लक्ष्मीची कुठाय ही? ही आहे बायजाबाईची. तिचं उदबत्तीचं घर आणि काही थोडी चांदी माझ्याकडची घालून बनवली मी ही. कष्ट करून मिळवलेले धन सढळपणे दुसर्याला देता यायला हवे हे शिकलो त्या लक्ष्मीकडून. म्हणुन तिची मूर्ति करुन घेतली. आता तुझ्याकडे सांभाळ”*
*मी निशब्द होते.. मी खरे तर बायजाबाईला कधी पाहिलेले नसते, त्यावेळी माझा जन्मही झालेला नसतो. त्या डबीत कापसात गूंडाळून ठेवलेल्या मूर्तिला मी हलकेच स्पर्श करते. त्या मखमलीत मला तिच्या खरखरीत हातांचा स्पर्श जाणवतो. ती डबी मी ठेवून देते. *
*तेंव्हापासुन दिवाळीत लक्ष्मीपू़जनाला आवर्जून पूजा करते ती बायजाबाईची. आणि या लक्ष्मीकडे मागणे मागते की “माये, तुझ्यासारखे नितळ मनाचे धन मलाही लाभू दे”. *
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लेखक : अज्ञात
प्रस्तुती : शुभदा भा. कुलकर्णी
कोथरूड-पुणे
मो.९५९५५५७९०८
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
गेल्या आठवड्यात प्रभात रोडला बायकोच्या दातांचं दाखवायला डेंटिस्टकडे जात होतो. सकाळचे ९ – ९. ३० वाजले असतील. थंडीचा महिना असल्यामुळे, चांगलीच थंडी होती. स्कुटरवर जायचं, म्हणून आम्ही स्कार्फ – स्वेटर अशा तयारीनीच निघालो होतो. संध्या रस्त्यावर ट्रॅफिक इतका फास्ट असतो, की, बाजूनी कोण जातोय, समोर कोण जातोय, हे बघताच येत नाही. आणि बायको मागे बसलेली असेल, तर, काही बघण्यासारखं असलं, तरी ते बघता येत नाही, किंवा मी काहीच बघत नाही, असंच दाखवावं लागतं. लॉ कॉलेज रोड ला लाल सिग्नल लागल्यामुळे ट्रॅफिक स्लो झाला.
माझ्या समोर एक मोटर सायकल होती. मागच्या सीटवर दोन्हीकडे पाय टाकून, साधारण ४ – ५ वर्षाची छोटी मुलगी बसली होती, आणि थंडीमुळे ती चक्क कुडकुडत होती. गाडी चालवणारी व्यक्ती बहुदा तिचे वडील असावेत. त्यांनी व्यवस्थित कोट घातला होता. कारण बाईक आणि थंडी, म्हणजे कोट पाहिजेच. कोटाची उब घेण्याकरता मागे बसलेली छोटी मुलगी त्यांना बिलगून बसायचा प्रयन्त करत होती. पण वडीलांच्या पोटाचा घेर बऱ्यापैकी मोठा असल्यामुळे, तिला ते जमत नव्हते आणि त्यामुळे तिला उब घेता येत नव्हती. आपोआपच माझं लक्ष तिच्या कपड्यांकडे गेलं. बघितलं, तर तिच्या अंगात फॅशनेबल असा अगदी पातळ कापडाचा फ्रॉक होता. मध्यंतरी स्लीव्ह लेस ची फॅशन होती, आणि आता त्याच्या पुढची पायरी म्हणजे शोल्डरलेस ची फॅशन आहे. तसाच काहीसा शोल्डरलेस आणि नो बॅक चा तिचा फ्रॉक होता. थंडी असूनही पायात सलवार किंवा फुलपॅन्ट नव्हती, पाय उघडेच होते. पायात मात्र फ्रॉक ला मॅचिंग बूट आणि मोजे होते. साहजिकच नवल वाटलं, की, एवढ्या थंडीत असे कपडे का घातले असावेत! बिचारीला थंडीमुळे हुडहुडी भरली होती. एक उत्सुकता म्हणून, मी ही शंका मागे बसलेल्या बायकोला विचारली.
बायकोकडून स्टॅंडर्ड उत्तर आलं, “तिचे वडील आहेत ना बरोबर! तुम्ही समोर बघून आपली गाडी चालवा”.
कालचं आपण पेपरमध्ये वाचलं, अपघात टाळायचे असतील तर, “एका वेळेस एकच काम करा / गाडी चालवत असाल, तर इकडे तिकडे स्वैर पाहू नका / गाडी चालवत असाल, तर मोबाईल वर बोलू नका, आणि मोबाईलवर बोलत असाल, तर त्यावेळेस गाडी चालवू नका”.
आणि याउपर तुम्हाला बघायचच् असेल, तर इथे कोपऱ्या कोपऱ्या वर छोटी छोटी मंदिरे आहेत, ती बघा.
मी सवयीप्रमाणे “थँक यु” म्हणालो.
सिग्नल जवळ समोरची बाईक थांबली. मी पण बाजूलाच थांबलो. बाईकवर माणसाच्या समोर त्यांचा मुलगा बसला होता. तो मात्र कपड्यांमध्ये पूर्ण पॅक होता. फुल पॅन्ट, अंगात स्वेटर, डोक्यावर कॅप वगैरे. त्या माणसाला उपदेश करण्यात काहीच पॉईंट नव्हता. आणि, तसही म्हणतातच, की, सिनियर सिटीझन झाल्यानंतर कुणालाही उपदेश करू नये. एकतर उपदेश ऐकायला कुणाला वेळ नसतो, उपदेश ऐकण्याच्या कुणी मनस्थितीत नसतो, आणि तिसरं म्हणजे, देणाऱ्याचा उपदेश आऊटडेटेड पण असू शकतो. अगदीच राहवत नसेल, तर फक्त स्वतः ला उपदेश करावा, किंवा तो डायरीमध्ये लिहावा.
थियरी कितीही छान असली, तरी, “दिल है के मानता नही”, असे प्रत्येकाचेच होते. विचार केला, की, सेफ्टीबद्दल तरी त्यांना सांगायलाच पाहिजे. अनायसे त्यांची गाडी शेजारीच होती.
मी : दादा, मागे मुलीला नीट धरता येत नाही आहे, मधून मधून मागे लक्ष ठेवा.
त्यांनी हो – हो म्हणत मान माझ्याकडे वळवली. आणि लक्षात आलं, की, हा तर मित्राचा मुलगा! त्यानी पण मला ओळखलं आणि नमस्कार केला. माझ्यामधलं उपदेशाचं मशीन आपोआपच सुरु झालं.
मी : अरे, ती थंडीनी कुडकुडतेय. स्वेटर विसरला का आणायला? आणि पायात पण काही नाही.
मुलीचे वडील : काका, स्वेटर कसा विसरेन? बाबा पण मागे लागले होते, तिला स्वेटर घाल म्हणून. पण बायकांना पटलं पाहिजे ना! त्यांच्या फॅशन मध्ये स्वेटर बसत नाही. एका लग्नाला चाललोय. बायको पाहुण्यांबरोबर रिक्षानी येते आहे. लग्नात सगळे मुलीच्या ड्रेस चे कौतुक करतील, म्हणजेच बायकोच्या सिलेक्शन चं कौतुक होईल. ड्रेस कुठे घेतला? कधी घेतला? केवढ्याचा आहे? हीला खूपच गोड दिसतोय! तुझ्या साडीला अगदी मॅच होतोय, वगैरे, वगैरे.
खास लग्नाकरता कालच हा ड्रेस आणलाय. आणि तिथे बदलायला असेच अजून दोन ड्रेस बरोबर घेतले आहेत.
तेवढ्यात आसपासच्या गाड्या सुटायला लागल्या, त्यावरून समजले, की, लाल दिव्याची वेळ संपत आली आहे. ५ -६ सेकंद शिल्लक असले, तरी, लोक आजूबाजूचा अंदाज घेत, सुटतातच. आमचे अच्छा – बाय झाले. हिरवा दिवा लागला आणि आम्ही पण सुटलो. तो यंगस्टर च्या स्पीडनी निघाला आणि मी सिनियर सिटीझन च्या स्पीडनी निघालो.
बायकोनी दिलेल्या सल्ल्याप्रमाणे, मी रस्त्याच्या कोपऱ्यावर कुठे देऊळ दिसते कां? ते बघायला लागलो. आणि सिग्नल क्रॉस केल्यावर, लगेचच डावीकडे छोटे मंदीर दिसले.
मी स्कुटर साईडला थांबवून, दोन मिनिटात येतो, असे बायकोला सांगून, मंदिराजवळ गेलो.
देवासमोर हात जोडून, “धन्यवाद, थँक्यू” असं म्हणालो.
देवाचे डोळे थोडे किलकिले झाल्यासारखे वाटले, आणि ऐकू आलं, “कशाबद्दल”?
मी : वर्षाच्या १२ महिन्यांमध्ये, तू ४ महिने उन्हाळा तयार केला, त्याबद्दल. आयांच्या फॅशन पायी छोट्या मुलींना वर्षांमधले तेवढे ४ महिने तरी थंडीची हुडहुडी भरत नाही.
देवानी डोळे पुन्हा किलकिले केले आणि ऐकू आले, “वेलकम”.
देवासमोर मी पुन्हा हात जोडले, आणि निघालो.
पेपरमध्ये वाचल्याप्रमाणे, ‘एका वेळेस एकच काम / गाडी चालवत असाल तर, इकडे तिकडे स्वैर पाहू नका / गाडी चालवत असाल, तर मोबाईल वर बोलू नका, आणि मोबाईलवर बोलत असाल, तर त्यावेळेस गाडी चालवू नका’, या मंत्रांची मी मनामधे उजळणी केली, आणि आता हे तंतोतंत पळायचेच, असे मनात ठरवून, मी गाडी सुरु केली.
तसं म्हटलं, तर स्त्रियांमध्ये फॅशन ची क्रेझ आपल्याकडे फार पूर्वीपासून आहे. पण तेव्हा रंगसंगती, कलाकुसर यावर भर असायचा. नंतर पाश्चिमात्यांची फॅशन सिनेमावाल्यांनी नट – नट्यांमध्ये आणली. पण ती बऱ्यापैकी सिनेमागृहात सीमित असायची. टीव्ही चा जमाना आला, घराघरात टीव्ही पोहोचला. जाहिराती वाढल्या, शोज वाढले, आणि फॅशन मधे अंग प्रदर्शनाचं विषारी बी, बेमालूमपणे, कसं आणि कुणी पेरलं, हे समजलंच नाही. टीव्ही मधली अंगप्रदर्शनाची फॅशन आता घराघरात अवतरली. आता अंगप्रदर्शन म्हणजेच फॅशन, हेच समीकरण झाले आहे. सध्या स्त्री सुरक्षिततेचा मोठा प्रश्न निर्माण झाला आहे, त्यामध्ये या आधुनिक फॅशन चा पण मोठा वाटा असणारच!
ग्लॅमर च्या दुनियेत अंगप्रदर्शन किती पुढे न्यायचं, हे प्रोड्युसर ठरवणार / ग्लॅमर आणि पैसा दिसत असला, तरी आपण अंगप्रदर्शन कुठे थांबवायचं, हे मॉडेल्स ठरवणार / आपण अनुकरणाची “री” कुठपर्यंत ओढायची, आपण कुठे डोळे बंद करायचे, हे मात्र आपल्याला ठरवायचे आहे, म्हणजेच, हा ज्याचा – त्याचा प्रश्न आहे.
पण एक मात्र नक्की – फॅशन मुळे हुडहुडी ही भरतेच – भरते!!
आयांची फॅशन – छोट्या मुलींना हुडहुडी, युवतींची फॅशन – पुरुष जातीला हुडहुडी (साधू – संतांना पण हुडहुडी भरल्याचं आपण वाचतोच), आणि स्त्रियांची फॅशन – नवऱ्यांना हुडहुडी, असंच म्हणावं लागेल!
आमच्या राष्ट्र सेविका समितिच्या शाखेत खेळल्या जाणाऱ्या एका खेळाचे नाव आहे… ” विमानतळ”
वेगळं वाटलं ना? सांगते कसा खेळला जातो ते..
सर्वांनी गोल करून उभ राहायचं. चारी कोपऱ्यात मातीतच गोल आखायचा. त्यांना चेन्नई, दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता अशी नावं द्यायची. सर्वांनी घोषणा देत पळायचं.
“संघटन मे शक्ती है
शक्ती को बढाना है
हिंदुस्तान हमारा है “
जी खेळ घेणार असेल तिनी पाठ करून उभ रहायचं. काही वेळाने तिने शिट्टी वाजवली की ज्या विमान तळाजवळ तुम्ही उभ्या असाल… तिथे जाऊन उभ राहायचं. त्या उभ्या राहिल्या की नंतर खेळ घेणारीनी एका विमान तळाचं नाव घ्यायचं.
तिथे उभ्या असलेल्या सगळ्या जणी खेळातून बाद… कितीही नाही म्हटलं तरी पहिल्या फेरीत बाद झाल्यावर वाईट वाटतं..
परत दुसरा राउंड… सर्वजणी आऊट होईपर्यंत असा खेळ चालु ठेवायचा.
खेळाचे मर्म लक्षात आलं का?
– – सगळ्याजणी पळत होत्या. पण नेमकं ज्या विमानतळाचं नाव उच्चारलं त्या खेळातून बाद झाल्या.
आयुष्यात असंच अनपेक्षित पणे काहीही होऊ शकतं… त्याचा स्वीकार करायचा. सारखं गुडी गुडी, चांगलंच होईल का? तर नाही.. जगत असतानाही असे अचानक धक्के बसत असतात. त्यावेळी नाऊमेद व्हायचं नाही. असही घडतं.. ते पचवायची, त्याच्याशी सामना करायची… तुमची मानसिक तयारी असायला हवी..
हेच या खेळातून शिकवलं गेलं आहे. खेळातून बाद झालो हे सहजपणे घेत… बाहेर उभं राहून खेळणाऱ्यांना घोषणा देत प्रोत्साहन द्यायचे.
हा खेळ झाला की परत पुढचा खेळ खेळायला सुरुवात करायची…
दुसरा खेळ आहे अग्निकुंड..
यात गोल करून.. एकमेकींचे हात घट्ट धरून उभं राहायचं. मध्यभागी प्रतिकात्मक अग्निकुंड आहे. जोर लाऊन शेजारचीला त्यात ढकलायच. जिचा पाय उचलला जाईल.. जी गोलाच्या आत ढकलली जाईल.. ती या खेळातून बाहेर.. शेवटी दोघी राहिल्या की त्यांनी एकमेकींना ओढायचे… शेवटी त्यातली एक जण जिंकणार…
समोर संकट दिसतंय… कुणीतरी तुम्हाला त्यात ढकलतय.. त्या क्षणी तुम्ही सर्व शक्तीनिशी त्याला प्रतिकार करायचा. पाय घट्ट रोवून उभं राहायचं. अगदी ठामपणे…
एखादा मुद्दाम तुम्हाला त्रास देत असेल तर प्रतिकार हा केलाच पाहिजे.
अर्थात हे कोणीतरी शिकवलं तर हे जमेल. यष्टि प्रशिक्षणातून हेच तर समितित शिकवलं जातं. निरनिराळे व्यायाम प्रकार, खो खो, कबड्डी या सारखे खेळ घेतले जातात. शरीराला एक प्रकारची शिस्त लावली गेल्यामुळे शरीर कणखर बनते.
सध्या सोफ्यावर बसून मोबाईलवर तासन्तास खेळ खेळले जातात. त्यात जिंकलो, पॉईंट मिळाले तर ते कृत्रिम, आभासी असतात. प्रत्यक्ष व्यवहारात त्याचा उपयोग शून्य आहे.
शाखेत मैदानावरच्या मातीत खेळत असताना जोम, उत्साह, तरतरी, आत्मबल हे मिळत असते. त्यासाठीच तुम्ही राष्ट्र सेविका समितिच्या शाखेत या…
त्यासाठी कुठलीही फी नाही.. परीक्षा नाही.. इथे प्रत्येकाच्या मनात राष्ट्रप्रेम जागवले जाते.
नवीन ओळखी होतात. एकमेकांमध्ये आत्मीय भाव, स्नेह निर्माण होतो. इतर कुठेही शिकवले जात नाही… ते इथे शिकायला मिळते. देशभक्तीपर गीतं शिकवली जातात.
ती सर्वांबरोबर जोरकसपणे म्हणताना मनात उत्साह व चैतन्य येते.
” पुण्य भू: मातृभू हिंदू भूमी आपुली
स्वर्गतुल्य भासते आम्हास माय माऊली”
अशा आपल्या मायभूमीचे रक्षण करण्याची जबाबदारी आपल्यावर आहे. त्यासाठी एक होऊया..
☆ “‘बीज’ पेरून गेलेले तुकोबाराय!!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆
जगदगुरू श्री संत तुकाराम महाराज
जगदगुरू श्री संत तुकाराम महाराजांनी या जगास ‘आमुचा राम राम घ्यावा’ म्हणत दिलेल्या निरोपाच्या दिवसाचे स्मरण म्हणजे ‘श्री तुकाराम महाराज बीज’!
तुकोबारायांच्या संदर्भात ‘बीज’ म्हणजे द्वितीया तिथी. यावर्षी हा दिवस ५ मार्च, २०२६ आहे. महाराष्ट्र वाड्मय हे अभंग आहे. कारण ते केवळ शाब्दिक रचनेपुरते जुळवलेले शब्द नसून प्रत्यक्ष जीवनाच्या अनुभवातून उमटलेले उदगार आहेत. कैवल्यसाम्राज्य चक्रवर्ती महावैष्णव श्री माऊली ज्ञानेश्वर महाराजांची ज्ञानेश्वरी, जगदगुरू श्री संत तुकोबारायांचा गाथा, समर्थ श्री रामदास स्वामी महाराजांचा दासबोध, भक्त शिरोमणी श्री नामदेव रायांचा गाथा, किंवा संत श्री एकनाथ महाराजांचे भागवत… किंवा अगदी अलीकडचे श्री गजानन विजय यांसारखे ग्रंथ शोधू पाहता असे कळते की… प्रत्येक वाचनाच्या वेळी वाचकांस काही तरी नवीन गवसत जाते… म्हणूनच पारायणाचे महत्त्व आहे! वर्तमानपत्रासारखे एकदा वाचले आणि झाले असे नाही… हे तर आपले भविष्यपत्रच आहे. जीवनातील प्रत्येक क्षणासाठी या वाड्मयात काही न काही आहे… अगदी जन्मापासून मृत्यूपर्यंत!
श्री तुकोबारायांनी रचलेल्या हजारो रचनांपैकी आता केवळ ४४०० उपलब्ध आहेत, असे दिसते. यातही काही क्षेपक (म्हणजे इतरांनी आपल्या रचना श्री तुकोबारायांच्या म्हणून प्रचारात आणलेल्या) आहेत, असे अभ्यासक सांगतात. जवळपास प्रत्येक अभंगात आपणांस एखादा तरी नवा शब्द, नवा विचार आढळून येईल!
सहज गंमत म्हणून सांगतो, एका व्यक्तीला एका व्यक्तीने श्री ज्ञानेश्वरी वाचावयास दिली. ती व्यक्ती त्या दिवसाचे वाचन संपले की पुढील वेळेस कुठून सुरुवात करावी हे लक्षात येण्यासाठी ग्रंथात बुक मार्क (दोरा) ठेवत. परंतु त्यांचा नातू ते घरात नसताना तो बुक मार्क अनावधानाने आधीच्या पानांत ठेवी. हे गृहस्थ तिथून वाचनास सुरुवात करीत. असे सलग काही दिवस झाले! ते एकेदिवशी म्हणाले… ओव्या छान आहेत… पण ज्ञानेश्वर महाराजांनी तेच तेच पुन्हा पुन्हा लिहिले आहे! असो.
हे वाड्मय चिंतन करण्यासाठी असल्याने सतत नजरेखालून घालणे श्रेयस्कर असते. कुणी कितीही विद्वान असले तरी त्यांना वक्तृत्वात या संतांनी लिहून ठेवलेल्या ओव्यांचा, अभंगांचा, पदांचा, समासांचा संदर्भ, दाखला द्यावाच लागतो. ‘तुका म्हणे’ हे शब्द तर जणू एखाद्या विचाराला दिलेला भक्कम पुरावाच जणू. माउलींच्या ओव्या, समर्थांचे समास ज्याला अर्थासह तोंडपाठ असतील, त्याच्या मुखातून प्रत्यक्ष सरस्वतीच प्रवाहित होत राहते! महाराष्ट्रात होऊन गेलेले सर्व वक्ते याच अमोघ भांडवलाच्या आधारे श्रीमंत होऊ शकले. आचार्य प्र. के. अत्रे यांचा श्री तुकोबारायांच्या अभंगांचा गाढा व्यासंग होता. प्राचार्य राम शेवाळकर यांच्या वाणीत माऊली विराजमान असत. भारतरत्न लतादीदी, भारतरत्न भीमसेनजी जोशी, वाड्मय- ‘पुरुषोत्तम’ पु. ल. देशपांडे यांनी संतांचे शब्द मनापासून जनापर्यंत पोहोचवले… ते केवळ या शब्दांत सामर्थ्य होते म्हणूनच.
ज्ञानोबारायांनी आईसारखे कोमल शब्द लिहावेत आणि तुकोबारायांनी वरपांगी कडक बापासारखे शब्दांचे प्रहार करावेत… पण या मायबापांची माया एकाच जातीची! तुकोबाराय हाती वाग्बाण अर्थात शब्दांचे बाण घेऊनच फिरत तर कधी काठी पण ते केवळ ज्ञानदीप लावू जगी या विचाराने! स्वत: घेत असलेला आनंद इतरांनीही घ्यावा यासाठी तुकोबाराय… तुका म्हणे खातो आनंदाचे लाडू… नका चरफडू घ्या रे तुम्ही! असे ज्यावेळी म्हणतात त्यावेळी हा आनंद इतरांनी घ्यावा असे त्यांना किती प्रकर्षाने वाटते, हे दिसून येते.
ज्ञानदेव पाया आणि तुकोबाराय कळस असं संत बहिणाबाईंनी प्रतिकात्मक म्हणून ठेवलेलं असलं तरी पाया दुय्यम आणि कळस सर्वोत्तम असा त्याचा अर्थ नाही. एखाद्या नदीचा उगम आणि तिचा प्रत्यक्ष विस्तार हे एकमेकांपासून वेगवेगळे करता येत नाहीत, किंवा त्यांची क्रमवारी लावता येत नाही.
श्रीमद भगवद्गीता नावाची सोन्याची जाडजूड वीट, तिच्यापासून घडवलेले देखणे अलंकार म्हणजे ज्ञानेश्वरी… गीता अलंकार नाम ज्ञानेश्वरी! तसं श्री संत तुकोबारायांचा गाथा म्हणजे श्रीमद भगवद्गीता आणि श्री ज्ञानेश्वरी यांतील अर्थांचा परिपाक. आणि तुकोबाराय याचे सारे श्रेय माऊलींना देतात! तुका म्हणे नेणो युक्तीचिया खोली… म्हणोनि ठेविली पायी डोई! तुकोबाराय स्वत:ला ‘पामर’ म्हणवून घेतात ते माऊलींच्या तुलनेमध्ये… इतरांच्या नव्हे. इतरांसाठी ते तुकोबाराय… तुकाराम महाराजच होते आणि आहेत. तुकोबा आणि भगवान विष्णू हे एकच आहेत, असे रामेश्वर भट यांनी म्हणले आहे… आणि हे रामेश्वर भटांसारख्या अधिकारी पुरुषाने म्हणले आहे, हे ध्यानात घेण्यासारखे आहे!
इंद्रायणी देहूतून पुढे येते आणि माऊलींचे चरण स्पर्शून पुढे जाते. तुकोबाराय देहूतून पुढे वहात आले… ज्ञानोबारायांच्या चरणाशी नतमस्तक झाले आणि पुढे स्वत: प्रवाह बनून पुढे जात राहिले. जसं आपण पत्रावळीचा गठ्ठा उचलताना एक हात खालच्या पत्रावळीला आणि दुसरा हात वरच्या पत्रावळीला लावतो, तसंच ज्ञानेश्वरी आणि गाथा या अक्षर वाड्मयाबाबत म्हणता येईल. याचा अर्थ या गठ्ठ्यातील कोणतीही पत्रावळ दुय्यम आहे, असे मात्र अजिबात नाही. या गठ्ठ्यात असलेली प्रत्येक पत्रावळ ही ज्ञानाच्या, भक्तीच्या पदार्थांना योग्य ती जागा देत अभ्यासक, भाविकांस तृप्त करण्याचे सामर्थ्य अंगी बाळगते.
संत देहाने जगातून गेले आहेत… पण जाताना विचारांचा वारसा देऊन गेले आहेत! जगद्गुरू संत श्री तुकाराम महाराज यांना त्यांच्या ३७७व्या बीजोस्त्वानिमित्त वंदन. त्यांनी पेरलेल्या बीजातून भक्तीचा, सदसदविवेकबुद्धीचा मळा फुलला आहे… आणि हीच महाराष्ट्राची खरी दौलत आहे! राम कृष्ण हरी!
स्त्री म्हणजे शस्त्र आणि शास्त्र या दोन्हीचे Perfect combination आहे.
“26 th August” महिला समानता दिवस. ” अमेरिकेत ‘1893 ‘ साली सुरू झालेला हा दिवस तेथील महिलांना voting rights मिळावे, याकरिता सुरू झाला होता 1920 साली 26 th August. ला हा अधिकार त्यांना मिळाला. ••••
हा दिवस खूप महत्वाचा दिवस आहे. या आधी स्त्री ला, पुरुषांच्या बरोबरीने समान आदर, हक्क मिळावे. ही स्त्रियांची मागणी होती. या विचाराला चालना मिळाली. जनजागृती ची सुरुवात झाली होती. कोणत्याही चळवळीची सुरुवात होणे, हा नेहमीच एक महत्वाचा Turning Point असतो. ••••
आजची स्त्री याच चळवळीचा परिणाम आहे. •••
महिला आणि पुरुषांची तुलना करणे ही गोष्ट मला खूप आवडतं नाही. पटतही नाही. सृष्टी ने स्त्री व पुरुष दोघांची शारिरीक व मानसिक रचना खूप विचारपूर्वक केली आहे. ते एकमेकांचे पूरक आहेत. ••• दोघे एकमेकांशिवाय अपूर्ण आहेत. ••• दोघे एकमेकांचे आधार आहेत. •••दोघांचे जन्मजात गुण मिळुनच प्रकृतीची /सृष्टीची काळजी घेण्यात ते समर्थ आहेत. •• त्यांच्यात स्पर्धा नसावी. ती एक टीम आहे. अशा अर्थाने घ्यावे. ••••
स्त्री प्रकृतीची ची अलौकिक अदभुत सर्वोत्तम कलाकृती आहे. ती जगाची ओळख आहे. ती नसेल तर संपूर्ण जगात काळोख आहे. •••
स्त्री पुर्वीपासून अशीच आहे. आपण इतिहासातील तिच्या पराक्रमाच्या, सहनशीलतेच्या, त्यागाच्या, गाथा ऐकलेल्या आहेत. आज जेव्हा तिला अधिकार मिळाले. स्वतंत्रता मिळाली. तेव्हा सामान्य स्त्री सुध्दा चौखटीतुन बाहेर पडली. ती मोकळी झाली. व्यक्त होऊ लागली. काळा बरोबर धावणे तिला जमू लागले. तिची उपस्थिती समाजात जाणवू लागली. तिच्या गुणांचा प्रभाव समाजात दिसू लागला. व समाजात त्यामुळे झालेला बदलही दिसू लागला. •••
स्त्री म्हणजे ‘शस्त्र ‘आणि ‘शास्त्र ‘ दोन्ही च perfect combination आहे. शौर्य आणि संस्कृती जपणारी, दोन्हीत प्रविण. आपल्या परिवाराची काळजी घेणारी. जीव ओवाळून टाकणारी स्त्री. जेंव्हा प्रतिष्ठेचा प्रश्न येतो, मग ती प्रतिष्ठा नवऱ्याची असो, नाही तर देशाची असो, ती आपले शौर्य दाखविण्यात मागे पूढे बघत नाही. •••
आजच्या स्त्रीने प्रगतीची तलवार कंबरेला खोचली आहे. आज ती गल्ली पासून दिल्ली पर्यंत पोहोचली आहे. एक पाउल घरात तर एक अंतराळात ठेवले आहे. •• ••••मंत्री बनून देश चालवते •••. टीचर बनून अंधार घालवते. •••आज ती पूढे येणाऱ्या प्रत्येक आव्हानाला सज्ज आहे. •••
** अनवाणी ते कॅटवॉक **
प्रत्येक क्षेत्रात तिने आपली योग्यता वेळोवेळी दाखवून, ती समानतेची अधिकारी आहे. हे सिद्ध केले आहे. आता समानतेचा प्रश्न उरतच नाही. •••
स्त्री व पुरुष जेव्हा एकमेकांना आधार देतात. एकमेकांबरोबर खंबीर पणे उभे राहतात, तेंव्हा दोघांची शक्ती द्विगुणित होते. ••••
– – ही आजच्या स्त्रीची एक सशक्त बाजू झाली. पण दुर्दैवाने तिची दुसरी बाजूही आहे. ती तेवढी सशक्त नाही खरं तर नाजूक च आहे. ••••
आजही आपण
“बेटी बचाव बेटी पढाव “.
“स्त्री भ्रूण हत्या ” “acid attack'” “बलात्कार ” सारख्या बातम्या वर्तमानपत्रात वाचतो. शंभर दीडशे वर्षांपूर्वी चालू झालेली चळवळ आज ही चालू ठेवायला हवी आहे. अजून ही उद्देश्य पूर्ण झालेला नाही. •••
आजही ‘स्त्री स्वतंत्रता ‘व ‘स्त्री सुरक्षा ‘ हे दोन मुद्दे महत्त्वाचे आहेतच. •••••
ही विकृती, असे मनोरुग्ण आजही स्त्रीचा आदर मान ठेवण्यात असमर्थ आहेत.
” महिला समानता ” आता ही चळवळ घरोघरी चालू ठेवायला हवी आहे. पण आजही मुलगा झाला तर कणभर का होईना, जास्त आनंद होतोच. ही विचारधारा बदलायला हवी. स्त्रियांच्या संबंधित नियम, कानून, शिक्षा जास्त कडक व्हायला हवी.. •••
प्रत्त्येक वर्षी या दिवसांचे celebration म्हणजे आजच्या परिस्थितीची चाचणी करणे व त्यात सुधारणा करणे होय. ••••