संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नारी तेरी अजब कहानी”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना अपना सच…“।)
अभी अभी # ९२६ ⇒ आलेख – अपना अपना सच श्री प्रदीप शर्मा
हम सब सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं, हमें यह किसी को बताने की, अथवा सिद्ध करने की जरूरत नहीं। वैसे हम स्वयं भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हम कितने सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं। आपकी आप जानो, हम तो सिर्फ अपनी बात कह रहे हैं।
सच तो खैर हम बचपन से ही बोलते आ रहे हैं। क्या आपने सुना नहीं, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला ! हम तो बस, सुबह उठकर आईने में अपना मुंह देख लेते हैं और तसल्ली कर लेते हैं कि कहीं हमारा मुंह काला तो नहीं। हमें और हमारे सच को कहीं नज़र ना लगे, इसलिए सावधानी के लिए, एक काला टीका और लगा लेते हैं। सांच को आंच नहीं, फिर भी क्या भरोसा कहीं हमारे सच को किसी की नज़र लग गई तो।।
अब सच कोई ओढ़ने बिछाने की चीज तो है नहीं, न तो इसे घर में सजाया जा सकता है और न ही इसे अकेले घर में छोड़ा जा सकता है। जहां जाते हैं, इसे साथ में ले जाते हैं, कहते हैं अगर सच का साथ हो, तो कभी झूठ पास नहीं फटकता। कभी कभी जब गलती से सच का साथ अगर छूट जाता है तो झूठ उसका फायदा उठाकर हमारे साथ हो लेता है। वैसे अगर हम सच्चे हैं तो झूठ भी हमारा क्या बिगाड़ लेगा।
बचपन में हम ज्यादा सच झूठ नहीं समझते थे। हम सबको सच ही समझ लेते थे। फिर हमें समझाया गया, झूठ से बचकर रहो।
अब अगर झूठ कोई दोस्त हो तो समझ जाएं, कि इससे दूर रहा करो। जहां दोस्ती दुश्मनी जैसी ही कोई चीज ना हो, वहां क्या सच और क्या झूठ। सभी अपने लगते थे। सभी सच्चे लगते थे।।
बचपन में जब हम सही गलत ही नहीं समझ पाते थे, तो सच झूठ क्या समझेंगे। अब किसी नादान बच्चे ने मुंह में मिट्टी भर ली और मुंह नहीं खोल रहा तो उससे पूछा जाता है, नन्हे मुन्ने बच्चे तेरे मुंह में क्या है, और वह सर हिला कर कह देता है, कुछ नहीं।
मां को भरोसा नहीं होता, मुंह खोलकर मिट्टी निकालकर कहती, झूठ बोलता है, मिट्टी खाता है और कहता है, मुंह में कुछ नहीं। कुछ भी कहो, मिट्टी के साथ, झूठ का स्वाद भी मुंह को लग ही जाता है। वह बार बार झूठ बोलता है, मार खाता है।
सच यूं ही नहीं उगला जाता। पहले मां की मार, फिर मास्टरजी की मार, थाने में पुलिस की मार भले ही कितना भी सच उगलवा ले, परिस्थिति की मार एक ऐसा कड़वा सच है जो न तो निगलते बनता है और न ही उगलते।।
सत्य की सदा विजय होती है, यह हम अदालतों में देख ही रहे हैं, अतः इस पर ज्यादा प्रकाश डालने की जरूरत नहीं। आपसे सच बुलवाने के लिए शपथ पत्र लिया जाता है, जिसे हलफनामा अथवा एफिडेविट कहा जाता है।
शपथ ही कसम है, एक तरह की सौगंध। कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं, बातों का क्या, यह हम नहीं, फिल्म उपकार के प्राण ऊर्फ लंगड़ कह गए हैं।
कसम भी क्या चीज है कसम से ! पत्नी स्वादिष्ट भोजन परोस रही है। स्वाद में अधिक खाने में आ ही जाता है। एक फुल्का और ले लीजिए, अरे नहीं भाई, पेट भर गया है। लगता है खाना अच्छा नहीं बना, वर्ना एक तो और ले ही लेते। अच्छा, चलो नहीं मानती तो एक रख दो। पत्नी उत्साह में थोड़े चावल और ले आती है, आप परेशान हो जाते हैं। सच में अब बिल्कुल जगह नहीं है। आपको मेरी सौगंध, इतना सा तो ले ही लो। बेचारा सच, इस सौगंध से परेशान हो जाता है।।
सच भले ही परेशान हो, पराजित नहीं होता। आज कौन परेशान है और कौन विजयी, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सच का धंधा मंदा है, झूठ का कारोबार खूब फल फूल रहा है। सब अपने अपने सच और ईमान को सभाले हुए हैं। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा।
कलि के बाद कलयुग आया, जिसे हमने मशीनी युग नाम दिया। अटल युग के बाद अब डिजिटल युग आ गया है, इंसान की चतुराई धरे रह गई है, झूठ को पकड़ने के लिए सच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का रूप धारण कर आया है। शायद अब सच के नहीं, झूठ के परेशान होने के दिन आ गए हैं।।
मौसम की तरह सच झूठ का चोला पहनने वालों की अब खैर नहीं। जब झूठ के कपड़े उतारे जाते हैं, तब ही नंगा सच नजर आता है। अगर आपने सच में, सच का दामन थामा है, तो आपको झूठ और पाखंड से डरने की जरूरत नहीं।
सच के सौदागरों और ठेकेदारों की कमी नहीं आजकल। उनके बहकावे में आकर कोई झूठा सच्चा सौदा ना कर बैठें। आपके सच को संभालें, क्योंकि आज के डिजिटल सच को भी साइबर क्राइम का खतरा है।।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆
🌻लघुकथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻
शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।
कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।
वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।
अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।
जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।
सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।
वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।
गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –
ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६७ ☆ देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆
डोकरी की चाय हो या डोकरे की चाय, इस को बेचने वाले फुटकर दुकानों ने भी नए से नए नाम रख लिए हैं। गुलाबी नगर जयपुर में एक चाय की दुकान “आर ए एस चाय वाला” लिखा हुआ था, हमने उसके मालिक से पूछा इस का क्या तात्पर्य होता है ?
वो तुनक कर बोला “आई ए एस” चाय वाले से जाकर पूछो ? उसकी दुकान पर अपनी मित्र मंडली के साथ चाय पीने का कार्यक्रम था। दुकानदार ने एक और बाण छोड़ दिया। कि ये “एम बी ए” चाय वाला ब्रांड अपनी फ्रेंचाइजी पूरे देश में खोल रहा हैं, हमारे नाम पर प्रश्न क्यों ?
चाय की छोटी छोटी दुकानों को भी अब नाम की क्यों आन पड़ी ? समय ही ऐसा चल पड़ा है, खाद्य वस्तुएं जैसे आटा, बेसन, चावल, सत्तू इत्यादि भी अब ब्रांड के टैग से विक्रय किए जा रहें हैं।
दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग पर एक दशक पूर्व तक अनेक चाय की गुमटियां हुआ करती थी, अब सब बंद हो चुकी हैं। एक कप चाय के लिए भी किसी बड़े ढाबे जो अब विशाल रूप लेकर बड़े बड़े होटलों को मात दे रहें है, से ही आपकी च्यास (चाय की तलब) पूरी हो सकती हैं।
स्पष्ट है, साधारण खाद्य वस्तुएं भी बड़े और कॉरपोरेट सेक्टर की झोली में जा चुकी हैं। इसी चक्कर में हमारी दो रुपए की चाय दस रुपए से पंद्रह की हो जाएगी।
☆ शंभर रुपये आणि चांदीची वाटी… ☆ सौ. जयश्री पाटील ☆
जगामध्ये काही चांगली माणसं आहेत म्हणून हे जग चाललेलं आहे. हे वाक्य आपण नेहमी ऐकतो. किंवा खरोखर अनुभवतो सुद्धा. डॉ. सुजित भरत पाटील यांचा “ते शंभर रुपये “हा लेख वाचला आणि अगदी तसाच काहीसा प्रसंग मी अनुभवला तो मला आता लिहावासा वाटतो. प्रसंग अगदी असाच माणसा माणसातला फरक जाणून देणारा. 27 आणि 28 जानेवारी 2026 या दोन दिवशी आमच्या गावाकडची देवीची यात्रा होती. 28 जानेवारीला देवीचा प्रसाद घेऊन आम्ही बाहेर पडलो. जेवण झाल्यामुळे घरी जायची गडबड नव्हती. समोर लहान मुलांच्या खेळण्यांचे स्टॉल लागलेले होते. मी सुद्धा नातीसाठी काहीतरी घ्याव म्हणून खेळण्यांच्या स्टॉल कडे गेले. खूपच लहान मुलांची खेळणी होती. त्यामुळे दुसरी मध्ये शिकणाऱ्या माझ्या नातीसाठी मी एक मोठा बॉल घेतला. माझी पहिलीच भवानी असल्यामुळे त्याच्याकडे मला परत द्यायला सुट्टे पैसे नव्हते. माझ्याकडे त्यावेळी दोनशे रुपये होते. त्यातली शंभर रुपयाची नोट मी त्याला दिली आणि पन्नास रुपये परत मिळण्याची वाट बघत होते. त्यावेळी मी उरलेले शंभर रुपये रुमालाच्या अगदी वरच्या कोपऱ्यात ठेवले होते.
“थोडं थांबा मॅडम पैसे देतो “असे म्हटल्यामुळे मी आणखीन खेळणी बघू लागले. खाली वाकून खेळणं घ्यायचं. बघायचं कसं आहे आणि परत जागेवर ठेवून दुसर खेळण घ्यायच. असं मी बऱ्याच वेळा केले. त्यानंतर त्याने माझे पन्नास रुपये दिले आणि मी आमच्या घरच्या स्त्रियांबरोबर घरी आले. कुलूप उघडेपर्यंत मी कट्ट्यावर बसले आणि सगळे पैसे एकत्र ठेवायचे म्हणून रुमाल उघडला. तर त्यात शंभर रुपये नव्हते. माझ्या लक्षात आले की बहुतेक खेळण्यांच्या तिथे पडले असावेत. मी आमच्या घरी आलेल्या एका पाहुणीला घेऊन पुन्हा खेळण्यांच्या स्टॉलकडे मोर्चा वळवला. पैसे मी नीट ठेवले नाहीत. माझ्या निष्काळजी पणामुळे ते पडले याचा दुःख माझ्या चेहऱ्यावर दिसत होता. तिथे जाऊन मी खेळणी उलटी पालटी करून बघू लागले. तो खेळणी वाला म्हणाला, “मॅडम काय पाहिजे “मी म्हणाले “मघाशी माझे शंभर रुपये बहुतेक इथे पडले आहेत. “स्टॉल वाला 30 -32 वर्षाचा तरुण मुलगा होता. तो हसऱ्या चेहऱ्याने मला म्हणाला, “हो हो आहेत माझ्याकडे पैसे. मला सापडले ते. ” हे ऐकल्यानंतर मला खूप हायस वाटलं. आणि माझ्या लक्षात आलं की तो माझी ही रिएक्शन टिपण्यासाठी माझ्याकडे एक टक बघत होता आणि अतिशय गोड हसत होता. “थँक गॉड “मी म्हणाले. थँक्स असे मी त्याला दोन-तीन वेळा म्हणाले. तो म्हणाला, “मॅडम असू दे हो. दिवसभर कष्ट करून जे पैसे मिळतात त्यात आम्ही समाधानी आहे. आम्हाला दुसऱ्यांचे पैसे कशाला हवेत. घरी गेल्यानंतर शांत झोप येते हे महत्त्वाच आहे. पण मॅडम पैसे नीट सांभाळून ठेवत जावा बरं का. ” मी त्याला हो हो म्हटले आणि तिथून निघाले. मला राहून राहून वाटत होते की जगात काही चांगली माणसं आहेत म्हणून जग चालते. असा प्रामाणिकपणा खूप दुर्मिळ असतो. त्याचबरोबर मलाही पैसे नीट जपून ठेवायला हवेत याची जाणीव झाली. एक मोठा अनुभव येऊनही माझ्याकडून पुन्हा पुन्हा चुका होतात याचे कधीकधी मला आश्चर्य वाटते. या प्रसंगा बरोबरच सहा महिन्यापूर्वी श्रावणामध्ये घडलेला प्रसंग माझ्या डोळ्यासमोर तरळला. माझ्याकडे भिशी होती. श्रावण महिना आहे म्हणून मी माझ्या मैत्रिणींना जेवणाचे आमंत्रण दिले. आणायसे श्रावण महिना आहे तर सवाष्णी घालूयात असा विचार केला होता. मैत्रिणी बरोबर सव्वा बारा वाजता घरी आल्या. पण हे सगळं करायच्या नादात माझी पूजा राहिली होती. पण आता एवढ्या सगळ्या गोंधळात शांतपणे पूजा होणार नाही म्हणून मी या सगळ्या गेल्या की पूजा करू आणि नंतर जेवण करू असा विचार केला. मी पूजेची चांदीची भांडी धुतलेली तिथेच किचनमध्ये ठेवली होती. माझ्या सुनबाई सर्विसला गेल्यामुळे दोघी चौघीं मैत्रिणींचा मदतीसाठी म्हणून वावर किचन मध्ये होता. त्यांच्या नजरेला ती भांडी पडलेली होती. सगळ्या सवाष्णींना जेवण दिले. एक छोटासा गेम ही घेतला आणि नंतर त्या सगळ्या घरी गेल्या. मी पूजा करण्यासाठी ताम्हण हातात घेतले तेव्हा माझ्या लक्षात आले की त्यातली चांदीची वाटी गायब झाली आहे. वाटी बऱ्यापैकी मध्यम आकाराची होती. मला प्रचंड धक्का बसला. मी सगळीकडे शोधाशोध केली. पण वाटी काही सापडली नाही. मी देवाची पूजा नीट करू शकले नाही. तसेच मी जेवनही नीट करू शकले नाही. माझा मैत्रिणींवरचा विश्वासच उडून गेला. मी खूप अस्वस्थ झाले. आमच्या यांना काही सांगण्याची सोय नव्हती. काय करावे काही सुचत नव्हते. कोणी बरं घेतली असेल याचा विचार करून करून डोके भनभानून गेले. प्रत्येक मैत्रिणीचा चेहरा डोळ्यासमोर येत होता. आणि त्यांना वाचायचा मी प्रयत्न करत होते. तरीही मला काही अंदाज येत नव्हता. मी आल्यानंतर माझ्या सुनबाईंना सांगितले. तिने सगळी भांडी व वाट्या चेक केल्या. तरीही वाटी सापडली नाही. कोणाला कसे विचारावे काही समजेना. शेवटी मुलाला मी ही गोष्ट सांगितली आणि दोघांनाही सांगितलं की मला आत्ता जाऊन सगळ्यांना जाब विचारता येईल पण वाटी तर एकीनेच घेतली आहे. मी घेतली आहे म्हणून कोणीही सांगणार नाही. आणि इतर सगळ्यांना वाटणार की मी त्यांच्यावर संशय घेतला. मैत्रीमध्ये एवढ्या वर्षांच्या संबंधांमध्ये दुरावा निर्माण होणार म्हणून मी ही गोष्ट आमच्या तिघांमध्ये ठेवली. अजूनही राहून राहून वाटते की एवढ्या चांगल्या घरातल्या स्त्रिया सुद्धा अशा असू शकतात अशा वागू शकतात. आमची कामवाली सुद्धा खूप प्रामाणिक आहे. तिने कधी कशाला हात लावलेला नव्हता. उलट कधी पॅन्टच्या खिशात पैसे सापडले तर तिने आणून दिले होते. पण एखादी मैत्रीण अशी वागते याचा अजूनही भरोसा वाटत नाही. उलट मैत्रिणींनी सांगायला हवे होते की तू ही सगळी भांडी देवघरात नेऊन ठेव. यांना अस करून झोप कशी काय लागत असेल. एका व्यक्तीबरोबर या विषयी बोलताना त्यांनी सांगितले की त्यांना याचे काही वाटत नाही. उलट मी कशी चालाखी केली आणि मला फायदा झाला याची फुशारकी ते घरात मारत असतील. आज चांदीचे भाव गगनाला भिडलेले आहेत. केव्हाही आता चांदीचा विषय आला की मला ती डोळ्यासमोर चांदीची वाटी दिसते. आणि मैत्रिणी दिसतात. आणि तो खेळण्यांचा स्टॉल वाला दिसतो.
“चल कल्पना, जरा शेवयाची खीर करून घेतेस का? मी समोरची खोली झाडून घेते… खरंतर आमची अंगतपंगत नेहमी गच्चीवर लिंबाच्या सावलीत असते पण आज नेमकं आभाळ आहे ना त्यामुळे आपल्याकडे ठरलंय, तू आटपून घे लवकर, कारण बायकांचा घोळका आला ना की गप्पांमुळे काही सुचणार नाही. “
कल्पनाने शेवया परतायला घेतल्या, एकिकडे दूध तापवायला ठेवलं. तिला वहिनींमधला सकाळचा नवरा बायकोचा संवाद आठवला, “अहो जरा दूध जास्त आणायचं आहे, आज आमची अंगतपंगत आहे. काहितरी गोडधोड म्हणून खीर करते. जोशी काकु येतील आज. नवरा वारल्यानंतर त्यांना बोलवायचं राहिलं. पलीकडच्या अविच्या बायकोची गोड बातमी आहे, सुमती आजीची नात मोठी झालीए, तिचंही कौतुक करायचं आहे, माणकेबाईंचा पोरगा मेरीटमध्ये आला त्या माऊलीचं कौतुक गोडधोडाने होईल… “
त्यावर त्यांचे नवरोबा म्हणाले, “अहो राणीसरकार तुमचा निर्णय आम्ही नाही थोडीच म्हणणार आहे, हे घ्या शंभर रुपये आणि हवं ते आणा म्हणजे तुमच्या सगळ्या मैत्रिणींसाठी गजरे ही आणा हवे तर, आणि तुम्ही लावा एखादा, तुम्हालाही गोड खीर हवी ना, आपलं सगळं आहे, त्यात धकवून नेहमी आनंदी राहता तुम्ही… “
वहिनी लगेच म्हणाली होती, “अहो हे आनंदी राहणं ना तुमच्या चाळीतल्या बायकांनी शिकवलं आहे मला… ह्या अंगतपंगत मधून. सहा एक महिन्यात कधीतरी आम्ही भेटतो, रोजच्यापेक्षा वेगळं, एकमेकींचे लाड पुरवायला वेगवेगळ्या पदार्थांची मेजवानी भरते, कुणाचं तिखट तर कुणाचं अंबट, कुणाचं गोड तर कुणाचं साधं जेवण, आणि त्या सोबत संवादाची असणारी देवाणघेवाण ह्या पदार्थांसारखीच सुरू असते. कुणीतरी आयुष्यातला गोड अनुभव सांगते. तेवढ्यात कुणाचं तरी जखमेवर मीठ चोळल्या जावं असा आयुष्याचा अनुभव असतो, कुणीतरी साधं सरळ काहितरी नात्यातलं मांडतं तर कोणी अध्यात्माचं सारं गप्पांतून मांडून जातं… चला, बोलत बसायला विषय तसा आवडीचा आहे, द्या ते पैसे, तुम्हालाही मिळेल हो आज गोड खीर” असं म्हणत उत्साहाने वहिनींनी सगळी तयारी केली होती.
विनयच्या ऑफिसच्या कामामुळे आपण दोन दिवस पाहुण्या असलो तरी आपली अडचण न वाटून त्यांनी अंगतपंगत करायचं ठरवलंच होतं, कल्पनाला मनात वाटलं खरंच हाय सोसायटीत असला आनंद नाहीच घेता येत, प्रत्येक जण आपल्या मोठेपणाची प्रौढी मिरवतो. आता अंगतपंगत तर आपल्या सोसायटीत होतच नाही, पण भिशी पार्टी अशीच काहीशी पण पदार्थांपासून इतर सगळ्याच गोष्टींचं प्रदर्शन करणारी. खरंच हि अशी अंगतपंगत व्हायलाच हवी असं कल्पनालाही वाटून गेलं.
वहिनी आत आल्या तेंव्हा कल्पनाने हे बोलून देखिल दाखवलं.. त्यावर वहिनी म्हणाल्या, “खरंतर मी आले त्या वातावरणात असलं काही नव्हतंच, शिष्टाचाराने दार लावून जेवणं, कोणी आलं तरी हॉलमधून ताट घेऊन आत पळत जाणाऱ्या संस्कृतीतून मी आले. मला नवीन नवीन रुळायला वेळ लागला पण आवडायला लागलं हे असं अंगतपंगत मधुन होणारं वेगवेगळ्या आयुष्याची देवाणघेवाण करणं, आपण जगत असतो आपलीच सुखदुःख कुरवाळत, फारसं कोणाशी विचारांची देवाणघेवाण न करत अगदी आपल्या रोजच्या जेवणासारखं आपलं आपलं जेवून घ्यायचं, पण त्यात हि संकल्पना आवडली. जुनीच असली तरी हल्ली बऱ्यापैकी बंद पडलेली, पण ह्या सोसायटीत अखंड चालू असलेली अंगतपंगत देवाणघेवाण.
आपल्यापेक्षाही संघर्ष करत जगणारे आयुष्य असतात त्यांना बघून शिकता येतं. ह्या विचारांच्या अंगतपंगत मधुन भावना आणि पदार्थ दोन्ही खुप काही शिकवून जातात. एक वेगळाच उत्साह, एक वेगळी किनार आयुष्याला मिळते. तू बघच आज” म्हणत वहिनींनी मघाशी आणलेले गजरे दोन दोन तुकड्यात केले, “अग सगळ्यांना पुरवायला हवे”.
दाराशी सुंदर रांगोळी सजली, देवासमोर सुंदर सुवासिक उदबत्ती लावली आणि छोट्याशा वाटीत खिरीचा नैवेद्य देवासमोर ठेवत वहिनी म्हणाल्या, “आमच्या अंगतपंगत मधला तू मुख्य पाहुणा, प्रत्येकाच्या चैतन्यातून डोकावणारा, मग पहिले आजची स्पेशल डिश तू घे आणि अशीच सगळ्यांच्या विचारांनी आयुष्याची अंगतपंगत आंनदी होऊ दे, “
छान आवरून चाळीतल्या एकएक जणी येत होत्या, आपले डबे मध्यभागी मांडून पटापट पान मांडत होत्या. काही ज्येष्ठ बायका ‘हे सगळं परंपरेने चालू आहे आपल्या सोसायटीत’ ह्याचं कौतुक करत होत्या… पदार्थांची ताटात रेलचेल झाली होती.. खिरीच्या वाट्या सजल्या.. ‘वदनी कवल घेता’ म्हणत हसत खेळत जेवणं सुरू झाली.. गप्पांना वेग आला, अगदी मनमोकळेपणाने पदार्थांसारखीच भावनांची देवाणघेवाण सुरू होती, कुणाचं एखादं दुखणं त्यावर दहा तरी उपाय सापडत होते, कुणाच्या आर्थिक अडचणींसाठी घरगुती तोडगे सांगितले जात होते, कुणी फार दिवसात कुणाशी बोलणं झालं नाही म्हणत मनसोक्त गप्पा मारत होत्या, कुणी कुठे काय छान मिळतं याची यादी देत होत्या, एकंदर सगळं हलकंफुलकं वातावरण होतं,.. तेवढ्यात जोशी काकूंना ठसका लागला, डोळ्यातून खळखळ पाणी आलं. ठसक्याचं पाणी काकांच्या आठवणीने वहायला लागलं हे सगळ्यानी ओळखलं. सगळ्यांचेच डोळे पाणावले, कारण हि अंगतपंगत चाळीत काकांनीच सुरू करायला लावली होती बायकांना… काका म्हणायचे.. “तुम्ही बायका एकट्या असल्या की विचार तुमच्यावर राज्य करतात, जरा महिनाभरात एकमेकींना भेटत जा, एकमेकींचे लाड करत जा, ह्या अंगतपंगत मध्ये सगळ्याच तुम्ही सासुरवाशिणी आपलं माहेरचं अंगण सोडून आलेल्या इथे एकत्र येऊन एकमेकींना आई, मावशी, ताई बनवा आणि चालू द्या विचरांची अंगतपंगत म्हणजे मोकळ्या राहताल, साचत गेल्या तर मानसिक उपचार करायची वेळ येईल. मी बघतो, आमच्या दवाखान्यात येतात अश्या बायका, तेंव्हा वाईट वाटतं, ह्यांना कोणीच कसं जमवता आलं नाही आयुष्यात, मग वाटतं, आपल्याच भोवताली असतात ही माणसं, म्हणून ही अंगतपंगतची कल्पना सुचली… आपल्याच शेजारी पाजारी बनणारे वेगवेगळ्या चवीचे पदार्थ घेऊ या आपल्या ताटात, तेंव्हाच समोरच्यांच्या आयुष्याचीही चव लक्षात येईल, संवादातून मग कळेल ‘अरे संघर्षात जगणारे फक्त आपणच नाही, तो प्रत्येकाला आहे, फक्त प्रत्येकाच्या संघर्षाचा रंग वेगवेगळा आहे, कुणाला लेकरू नसल्याचा, कुणाला नोकरी नसल्याचा, कुणाला पैश्याने, कुणाला आजाराने संघर्ष करावाच लागतोय.. मग ह्यात काय, जशी दुसऱ्याची भाजी अंगतपंगतला ताटात घेतल्यावर बरं वाटतंय तस दुसऱ्याला पण संघर्ष आहे, आपण काही एकटे नाही, ही भावना बळावून जगण्याला आणखी उत्साह येणार आहे. जसा दुसऱ्याच्या घरचा पदार्थ खाऊन जेवणाला चव येते तसंच आहे हे. ह्यातून जगण्याचा सोहळा करायला शिका. एखादा गोड पदार्थ निमित्त म्हणून खाऊ घाला सगळ्यांना. मनाला आनंद मिळतो पण तो मिळवण्याची तयारी पाहिजे.. इतकं साधं अंगतपंगतच गणित मांडून काका आज हि परंपरा चालू ठेवून निघून गेले होते.. सगळ्यांनी डोळे पुसले. परत विषयांतर झालं… हसत खेळत अनेक विषय हाताळले. मनं मोकळी झाली. संवादाची देवाणघेवाण होऊन गजऱ्याच्या सुगंधी निरोपाने अंगतपंगत संपली.. घरभर मोगऱ्याची दरवळ झाली….
☆ माझी जडणघडण… भाग – – ७८ – जोहार मायबाप जोहार ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆
(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)
“माझी जडणघडण” ही मालिका मी जवळजवळ गेली दीड वर्षे लिहीत आहे. सुरुवातीला हे एक आव्हान म्हणून स्वीकारताना मी खूप साशंक होते. मूळातच मी, ” हे का लिहावं? ” हा प्रश्न माझ्या मनात होता. कारण स्वतःविषयी काही लिहावं आणि ते वाचकांकडून वाचलं जावं इतकी मी कुणी प्रसिद्ध अथवा वलयांकित व्यक्ती नाही. चार चौघींसारखंच माझं जीवन. पण आयुष्यातील अनुभवांविषयी, जीवन जगताना जे जे जाणवले ते लिहावं असं वाटलं आणि मी तसा प्रयत्न करायचं ठरवलं.. ”
मग अक्षरशः मी माझा भूतकाळ, वर्तमान काळ आणि भविष्यकाळही जवळ घेऊन बसले. अदृश्यपणे माझ्याच आयुष्याचं गाठोड सोडवलं आणि मग त्या प्रवाहात लिहिता लिहिता स्वतःला खरोखरच झोकून दिलं.
– – वास्तविक “माझी जडणघडण” ही ७७ भागांची मालिका म्हणजे माझे आत्मवृत्त आहे असे मी मुळीच म्हणणार नाही. आयुष्याच्या निरनिराळ्या टप्प्यांवर आलेल्या कडू, गोड, आंबट, तुरट अनुभवांचं भेटलेल्या अनेक व्यक्तींचं माझ्या जडणघडणीत काय योगदान ठरलं याचं मी बारकाईने निरीक्षण केलं, काहीसं चिंतनही केलं आणि माझ्या दृष्टीने मला जे वाटलं ते तुम्हा वाचकांसमोर अगदी प्रांजळपणे ठेवलं.
ही मालिका लिहिताना आणि विशेषतः भूतकाळात शिरताना मला सुद्धा नक्कीच खूप आनंद मिळाला. तेव्हा न जाणवलेलं लिहिताना जाणवलं. हरवलेलं कितीतरी, दडून बसलेलं काहीतरी गवसत गेलं आणि जीवन पुन्हा नव्याने कळत गेलं. प्रत्येक लेख लिहिताना मला हे वाटायचं की, ” यात तसं विशेष काय आहे? ” पण ज्या ज्या वेळेला वाचकांचे उत्स्फूर्त प्रतिसाद मिळायचे त्यावेळी मी मनोमन हरखून जायचे. वाचकांचा या मालिकेला खरोखरच उदंड प्रतिसाद मिळाला. कुठेतरी वाचकही माझ्या या लेखनाशी रिलेट व्हायचे. त्यांच्या जीवनातलेही संदर्भ ते या लेखनात पडताळून बघायचे. अभिप्रायासोबत तेही त्यांच्या आयुष्यात आलेले अशाच प्रकारचे अनुभव मला सांगायचे. कित्येकांचे फोनही यायचे. काहीजण वैयक्तिक मेसेजेसमधून त्यांच्या भावना व्यक्त करायचे आणि हे सगळंच माझ्यासारख्या सामान्य लेखिकेसाठी खूपच भारी होतं. माझ्या अनुभवात त्यांचेही अनुभव मिसळत माझ्या जडणघडणीचा आणखी एक नवाच प्रवास त्यामुळे सुरू व्हायचा.
“पुढील भागाची प्रतिक्षा करत आहोत. ”हे वाचकांचं वाक्य माझ्यासाठी खूप प्रेरणादायी असायचं.
या लेखनानिमित्ताने अनोळखी ओळखींमधून त्यांच्या हृदयीचे खरेखुरे बोल वाचून, ऐकून मीही प्रत्येक वेळी खरं म्हणजे अधिक समृद्ध होत गेले. अनेक नवी दालनेत जणू काही माझ्यासाठी उघडली गेली. त्यामुळे माझ्या या वाचक वर्गाची मी खूप ऋणी आहे. माझ्या लेखनातून मी त्यांना काय दिलं यापेक्षा त्यांच्या प्रांजळ मनापासून लिहिलेल्या प्रतिक्रियेतून मला मात्र खूप आनंद मिळाला. सुरुवातीला जे वाटत होतं की “मी हे का लिहावं? ” ही भावनाच गळून गेली. या लेखनाच्या माध्यमातून मला खूप मोठा मित्रपरिवार लाभला आणि मी अक्षरशः त्यांच्याशी मनमोकळ्या गप्पा केल्या. माझ्या मनातल्या अनेक प्रश्नचिन्हांनाही मी वाट मोकळी करून दिली. हा साराच आनंद खरोखरच अवर्णनीय होता.
खरं सांगू का? तसा हा जडणघडणीचा प्रवास न संपणाराच आहे. याचं शेवटचं स्थानक म्हणजे आपला शेवटचा श्वास. आज मागे वळून पाहताना ज्यांनी माझं बोट धरून जीवनरूपी आकाशातले तारे मला पाहायला शिकवलं ते हात लुप्त झालेले जाणवत असले तरी आयुष्याची उरलेली वाट नव्या पिढीच्या हाताला धरून चालतानाही पुन्हा एकदा जडणघडणीचाच प्रवास सुरू असल्याची भावना मनात प्रबळ होते. जगत असताना संस्कार म्हणून सहजपणे ज्यांना मी माझ्यातलं दिलं त्यांच्याच सोबतीने पुन्हा माझ्यावरच संस्कार होत असल्याचं अनुभवते तेव्हाही हेच वाटतं की हे संस्काराचं पात्र केवढं मोठं आहे! अनंत आहे, न संपणारं आहे म्हणूनच म्हणते ही जडणघडणीची मालिका न संपणारी आहे. सांगायचं असं काहीतरी खूप बाकी आहे आणि पुढेही ते बाकीच राहणार आहे. काल घडलं, आजही काही घडणार आहेच आणि पुढेही घडेल.. म्हणून आता इथेच थांबायचं मी ठरवलंय. तुमचा प्रेमळ निरोप घेत आहे. या संपूर्ण मालिकेच्या प्रवासात वाचकहो! तुम्ही दिलेली साथ माझ्यासाठी केवळ अनमोल आहे. धन्यवाद तरी कसे देऊ? तुमच्या कायम ऋणातच मी राहीन. हेच नम्रपणे म्हणावसं वाटतं..
।।जोहार मायबाप जोहार
तुमच्या महाराचा मी महार
बहु भुकेला झालो
तुमच्या उष्ट्यासाठी आलो।।
तेव्हा मित्रहो! आता निरोप घेते. चूक भूल द्यावी घ्यावी. सदैव एकमेकांच्या स्मरणात मात्र नक्कीच राहू.