हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # २ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # २ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ दो ≡

आशी ने कई-एक समस्याएं, मेरे बिना कहे ही सुलझा ली हैं। मुझ से भी पहले, उसने अपनी छुट्टी स्वीकृत करा ली है।

ट्रेन की सीटें भी बुक हैं और भी सब कुछ…

उसने अभी अभी पूछा हैं, ”वहां पर देने के बारे में क्या सोचा है?”

मेरा उत्तर न पाकर, वही बोलती है, ”या खाली हाथ ही जा खड़े होंगे लड़की की शादी में?”

मैं हाथ ऊपर उठा कर उसकी बात का उत्तर दे ही देता हूं, ”भई, यह काम तो तुम्हारा है।”

“जी हां, सभी काम मेरे हैं! आप तो सिर्फ़ तमाशा देखने वाले हैं!”

“देखो, मुझे इन चीज़ों के बारे में, कुछ भी नहीं पता… कोई साड़ी वाड़ी ले लो न।”

“बस, सिर्फ़ साड़ी?”

“और… जो तुम ठीक समझो।”

वह ज़रा सा सोच कर कहती, ”चलो ठीक है, जो लेना होगा, वहीं चल कर ख़रीद लेंगे। आजकल हर शहर में, सभी कुछ मिल जाता है। जेब में पैसे होने चाहियें।”

“तुम बिल्कुल ठीक कहती हो!” मैं कह कर पीछा छुड़ाता हूं।”

समय पर तैयार होकर घर से चले, रेलवे स्टेशन पहुंचे और गाड़ी में सवार हुए। शाम हुई, तो थरमस से चाय निकाल कर पी ली। थोड़ी देर आपस में बातचीत की। फिर टिफिन कैरियर खोल कर खाना खाने लगे। एक घंटा फिर बतियाये और…

आशी को ऊंघ आने लगी है। बिस्तर तो खोल ही रखे हैं।

“चाहो, तो सो जाओ।” उसे राय देता हूं।

“आप?”

“मुझे अभी नींद नहीं आई।”

“और शायद आयेगी भी नहीं इस खटखट में!”

आशी सो गई है। मैं गाड़ी की निरंतर खटखट सुनता चला जा रहा हूं।

उन दिनों, फैक्टरी में, दिन भर इसी तरह मशीनों का शोर हुआ करता था। हर शाम, छुट्टी हो जाने के बाद, फैक्टरी के मेनगेट के बाहर, अच्छा ख़ासा हंगामा हो जाया करता था।

पहले इस तरह के जलसे-जलूस, फैैक्टरी की चार दीवारी से थोड़ी दूरी पर, बड़े मैदान में पेड़ों तले, आयोजित हो जाया करते थे। किंतु इधर कई नई इमारतें निर्मित हो जाने के बाद, कोई स्थान, इन कार्यों के लिये ख़ाली न रहा, जहां मज़दूर अपनी मांगों के लिये, सभाएं वगैरा आयोजित कर पाते।

अब वे लोग, अपनी बातें, प्रशासन को ठीक से समझाने के लिये, मेनगेट के ठीक सामने ही, अपने कार्यक्रम आयोजित करने लगे। छुट्टी का हुटर होते ही, कुछ कार्यकर्ता अपनी साइकिलें, इस प्रकार अड़ा कर पूरा मार्ग रोक देते, कि कोई भी व्यक्ति, उनके बुलंद होते नारे और पुरज़ोर तक़रीरों को सुने बिना, वहां से नहीं निकल सकता था।

कोई एक मज़दूर-नेता, फुदक कर, पुलिया की मुंडेर पर चढ़ जाता और ऊंची आवाज़ में नारे लगवाने लगता… मज़दूर एकता, ज़िंदाबाद… इंक्लाब, ज़िंदाबाद… गुंडागर्दी, नहीं चलेगी… हिटलर शाही, नहीं चलेगी… नहीं चलेगी… नहीं चलेगी।

पर्याप्त भीड़ एकत्रित हो जाने पर, नेता अपना भाषण आरम्भ कर देता… साथियो आप को मालूम होना चाहिये, कि हमारा यह मैनेजमेंट, जो पहले सिर्फ़ बेहरा था अब पूरी तरह अंधा भी हो चला है…।

यह शायद कम लोग जानते होंगे, कि मैनेजमेंट कभी काना, अंधा या बेहरा नहीं होता। वह तो घुन्ना होता है, जो चादर ताने, या आंखें बंद किये, चुपचाप लेटा रहता है और अवसर पाते ही, उठ खड़ा होता है और अपनी शिकंजे नुमां बाहें, व्यक्तिविशेष की ओर बढ़ा कर, उसे दबोच लेता है।

महीनों तक लगाये जा रहे नारों और जलसे जलूसों के बाद भी, जब प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, तो यूनियन न, े अपनी एक सौ पांच मांगों को मनवाने के लिये, ‘हड़ताल’ का नोटिस दे दिया। मांगों की इतनी लम्बी सूची देख, अपने पराये, सभी को हंसी आ जाती। मगर धमकी तो आखिर धमकी है। एक चैलेंज है, जो यूनियन वालों को देना है और प्रशासन को स्वीकार करना है।

लक्ष्ण कुछ ऐसे ही थे। यह भी स्पष्ट दीखने लगा, कि यह कोरी धमकी नहीं, बल्कि इस बार हड़ताल होगी। यह बहुत दिन से टलती चली आ रही थी। अभी तक फैक्टरी में दो अलग-अलग यूनियन थीं, जो आपस में ही लड़झगड़ कर, प्रशासन को, समस्याओं का अपने ही तरीके से समाधान खोजने के लिये सुविधा प्रदान कर देती थीं। मगर अब न जाने कैसे, दोनों यूनियन, आपस में सुलह करके, एक हो गई थीं। पता चला, राजधानी से आये किसी नेता ने प्रयास कर, इसे सम्भव बनाया है।

किंतु अनिल ने मुझे एक और बात बताई थी, जिस पर विश्वास कर पाना, सहज मालूम नहीं पड़ रहा था। उसका कहना था, कि मैनेजर नरेन्द्र मोहन ने ही, गुप्त रूप से, दोनों यूनियन को एक हो जाने के लिये सहयोग दिया है। किंतु इस प्रयास में, उसका अपना कौन सा स्वार्थ सिद्ध हो रहा था, यह अनिल नहीं स्पष्ट कर पाया।

मुझे बड़े साहब, अर्थात जेनरल मैनेजर ने अपने दफ़तर में बुलाया है, सुनकर मेरा चैंक जाना स्वाभाविक था। छोटी पोस्ट के आदमी से, वे कम ही बात करते थे। सोचा, कोई बहुत ही खास बात होगी जो उन्होंने मुझे बुला भेजा है।

अनुमति लेकर मैं भीतर गया। वे हाथ में पेन लिये और ढेर से काग़ज़ात, सामने मेज़ पर फैलाये बैठे थे। मुझे संकेत से उन्होंने कुर्सी पर बैठ जाने के लिये कहा।

मैं बैठ गया। उन्होंने ऐनक उतार कर एक ओर रखी।

“यू आर मिस्टर…?”

मैंने नाम बताया।

“ओह येस!… सुना है, हड़ताल होने वाली है?” वे इस तरह पूछ रहे थे, जैसे उन्हें यह बात, स्वयं न मालूम हो। उत्तर में तब भी मुझे कुछ कहना ही था। कहा, ”जी, सुना तो मैंने भी है।”

“आप ने भी सुना है? किससे?”

“कुछ वर्कर आपस में बातें कर रहे थे।”

“आप वर्कर लोगों से, मिलते जुलते रहते होंगे?”

“ऐसी बात तो नहीं है सर।”

“ऐसी इनफ़रमेशन है, कि आप वर्कर काॅलोनी की तरफ़ अकसर जाते रहते हैं और … हड़ताल के भी फ़ेवर में हैं।”

“किसी ने ग़लत रिपोर्ट की है सर।”

“मेरा भी यही खयाल है!”

“विश्वास कीजिये सर, मैं यह हड़ताल वाले दिन, हर हालत में ड्यूटी पर पहंुच़ंूगा।”

“यही अच्छा होगा… मगर रिकाॅर्ड से पता चलता है, कि काफी पहले जब हड़ताल हुई, तब आपने बहुत जोशीले भाषण देकर, लोगों को भड़काने की कोशिश की थी।”

“तब की बात और थी सर… तब मैं वर्कर था।”

“ओह येस! अब आप एक रिस्पोंसिंबल स्टाफ़ मेम्बर हैं। यू आर ए पार्ट आॅफ़ मैनेजमेंट। आप को किसी भी ग़लत काम में हिस्सा नहीं लेना चाहिये।”“सर, मैं आप को फिर विश्वास दिलाता हूं।”.

“ओ0 के0 रिपोर्ट मिली थी, मैंने बुला कर पूछ लिया। डोंट टेक इट अदरवाइज़।”

मैं हाथ जोड़, उठ खड़ा हुआ।

दोनों यूनियन के एक हो जाने के कारण, लगता यही था, कि इस बार हड़ताल सफल होगी, प्रशासन को घुटने टेकने पड़ेंगे और झख मार कर, मज़दूरों की कुछ मांगें भी स्वीकार करनी होंगी।

किंतु हो कुछ और ही गया। दोनों ओर से तैयारियां जारी थीं। प्रत्येक दो घंटे बाद, संघर्ष समिति की गुप्त बैठकों में, प्रस्ताव पारित करके, रणनीति निर्धारित की जा रही थी… व्यवस्था इस प्रकार रहे, कि हड़ताल वाले दिन, कुत्ते का बच्चा भी, फैक्टरी में न घुस सके। जेनरल मैनेजर की कार के आगे स्वयं सेवकों को लिटा दिया जाये तथा अफ़सरों और अन्य स्टाफ़ को रोकने के लिये, महिला ब्रिगेड को तैनात कर दिया जाये और अपने ही आदमी, जो ग़द्दारी पर आमादा हों, उनकी जमकर पिटाई कर दी जाये। मगर मार ऐसी पड़े, कि उन्हें एम्बूलेंस में डाल कर बड़े अस्पताल ले जाना ज़रूरी हो जाये…

उधर प्रशासन भी, गुपचुप तैयारियों में जुटा था। उपद्रवी कर्मचारियों की सूचियां टाइप की जा रही थीं। सुरक्षा विभाग का स्टाफ़, दिन भर इधर उधर संूघता फिरता। अनौद्योगिक स्टाफ़ को अप्रत्यक्ष रूप् से चेतावनी दे दी गई थी। ऐसा न हो, वे लोग हड़ताली वर्करों के साथ मिल कर, अपना कैरियर हमेशा के लिये तबाह कर लेें। सुरक्षा विभाग के अतिरिक्त, स्थानीय पुलिस का भी समुचित प्रबंध था। पुलिस अधीक्षक स्वयं दो बार आकर, फैक्टरीएस्टेट का राउंड लगा गये थे।

जिस दिन हड़ताल होनी थी, उससे एक दिन पहले ही, कुछ कर्मचारी, पैंट कमीज़ के बजाये, कुरते-पाजामे में नज़र आने लगे थे। हड़ताल वाले दिन भी, वे इसी लिबास में, पैरों में अंगूठे वाली चप्पल और आंखों पर काला चश्मा चढ़ाये, मुंह अंधेरे में ही क्वार्टरों से निकल खड़े हुए। मार्ग में जो भी मिलता, वे उसे होशियार करते, ”देखो, एक भी आदमी, फैैक्टरी के अन्दर न पहंुचने पाये।”

ये लोग, प्रत्येक मोड़ या चैक पर तैनात स्वयं सेवकों के पास रूक कर दरियाफ़्त करते, “सब ठीक है न?”

अपनी तसल्ली कर लेने के बाद, वे लोग उससे आगे वाले मोर्चे का हाल जानने के लिये, बढ़ जाते।

कु्रछ काले चश्मे वाले नेता, विभिन्न मोर्चों की कुशलता का जायज़ा लेते हुए, फैक्टरी के मेन-गेट तक जा पहुंचे। वहां कुछ कार्यकर्ता पहले से ही मौजूद थे। उनमें से एक, काले चश्मे वाले से कहने लगा, ”लगता है, चंद ग़द्दार पीछे वाले छोटे गेट से अन्दर जा पहंुचे है।”

“ऐसा कैसे हो गया?… लेकिन वे अन्दर घुसे कब होंगे?”

“आधी रात में ही जा बैठे होंगे।”

“यह तो बहुत ग़लत हुआ!”

“ग़लत तो हुआ ही… मैं जाकर देखता हूं, कौन कौन से हरामी अन्दर छिपे बैठे हैं।”

इतना कहकर वह कार्यकर्ता, मेनगेट पार करके, फैक्टरी के अन्दर चला गया। वह काफी देर तक वापिस न लौटा, तब ‘अपने साथी के साथ कोई अनहोनी न घट गई हो’, पता करने के लिये, पहले वाले की तरह ही वह फैक्टरी के अन्दर चला गया। वह भी न वापिस लौटा, तो उन दोनों की कैफ़ियत मालूम करने, चार पांच अन्य कर्मचारी या कार्यकर्ता भी भीतर प्रवेश कर गये और इसी क्रम में कुछ अन्य भी…

इसी प्रकार, पचास साठ आदमी फैैक्टरी के भीतर जा पहुंचे। उनमें से कुछ भीतर अपनी हाज़िरी दर्ज करा कर वापिस आ गये और ‘गद्दारों’ को गालियां देने लगे। देखा देखी में और यह कहते, कि ये लोग क्यों अन्दर गये, ऐसी आपति उठाकर, सौ-सवा सौ लोग फैक्टरी में प्रवेश कर गये।

फ़िलहाल हड़ताल की सफलता या विफलता का कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। पुलिस अपने हाथों मंे, सूचियां और डंडे लिये, जगह जगह गश्त लगा रही थी। कुछ नामी नेताओं को उन्होंने उनके क्वार्टरों पर ही धर दबोचा था। कुछ ऐसे भी नेता थे, जो स्वेच्छा से काम पर आना चाहते थे, मगर वे हमेशा प्रशासन की आंख की किरकिरी बने रहते थे। वे घर से निकल, फैैक्टरी की ओर बढ़े। थोड़ा चलकर वे चैराहे तक ही पहंुचे थे, कि पुलिस वालों ने उन पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं और फिर उन्हंे यह कह कर गिरफ़्तार कर लिया गया कि वे सड़क पर दंगाइयों के साथ मिल कर, शांतिभंग करने का प्रयास कर रहे थे।

मतलब, अधिकांश लोगों को तो यही पता नहीं चल रहा था, कि यह हो क्या रहा है!

किंतु शीघ्र ही, स्थिति स्पष्ट होने लगी। एन0 मोहन मैनेजर क आदमियों ने, अपने विरोधियों को अच्छी तरह पिटवा कर, गिरफ़्तार भी करा दिया था।

मैं बाल-बाल बचा था। क्योंकि अनिल ने, ठीक समय पर और सही ढंग से, मुझे सावधान कर दिया था। मगर अफ़सोस, इन हालात में, अनिल स्वयं को सुरक्षित न रख पाया।

लोग चकित थे। यह कैसी हड़ताल है? कौन हड़ताल कराने वाला था और कौन तोड़ने वाला? कौन किस के पक्ष में था और कौन विपक्ष में। कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। बस, एक हंगामा बरपा था, जो उलझा-उलझा सा था।

जिन्हें गिरफ़्तार किया गया था, उन्हेें ट्रकों में भरकर, दूर जंगलों में ले जाया गया और छोड़ दिया गया। वे भूखे प्यासे रोते झीखते, आधी रात में घर लौटे।

हड़ताल की असफलता का प्रमाण, अगले दिन ही मिल गया। लगभग पांच सौ कर्मचारियों की सर्विस-बे्रक कर दी गई थी और सत्तर को नौकरी से, बिल्कुल ही बरख़ास्त कर देने का सरकारी पत्र थमा दिया गया।

हड़ताल से पूर्व, मज़दूरों की अनेक मांगे हुआ करती है। मगर हड़ताल के बाद, साधारणतया एक ही मांग प्रमुख होती है… जिन कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया है, उन्हें फिर से काम पर बहाल किया जाये…

अनिल कहीं नज़र नहीं आ रहा था। चुपके चुपके उसके दो एक पड़ोसियों से पूछताछ की, किंतु किसी से भी संतोषजनक उत्तर न मिला।

उसका नाम, नौकरी से निकाल दिये जाने वाले कर्मचारियों की सूची में नहीं था। सर्विस बे्रक वालों में उसका नाम अवश्य दिखाई पड़ा। मगर अनुपस्थित होने के कारण, उसे नोटिस नहीं थमाया जा सका था।

प्रश्न यही था, कि अनिल है कहां? मैं दिन भर उसके बारे में चिंतित रहा। निर्णय लिया, छुट्टी के बाद और थोड़ा अंधेरा हो जाने के बाद, उधर का चक्कर लगाऊंगा। बेचारा दुबला पतला सा है। भाग दौड़ में कहीं फिर चारपाई से न लग गया हो। उसे तो ठीक ठाक ही रहना चाहिये। विधवा मां का एक ही बेटा और दो कुंवारी बहनों का इकलोता भाई!

अजीब हालत है! जून जुलाई इस बार खुश्क निकल गये और अब सितम्बर आधे से ऊपर गुज़र जाने के बावजूद, बंूदाबादी बदस्तूर जारी है।

हाथ मंुह धोया। तौलिये से मुंह पोंछ ही रहा था, कि किसी ने दरवाज़े पर थपथपाहट की।

“कौन?”

कोई उत्तर न मिला।

मैंने हीटर आॅन कर, चाय के लिये पानी रख दिया।

इस बार, स्पष्ट रूप से थपथपाहट सुनाई पड़ी। जाकर दरवाज़ा खोला।

अकस्मात, मैं उसे पहचान नहीं पाया था। उसके पास छाता नहीं था। वर्षा की लगातार पड़ती बूंदों ने, उसे काफी भिगो ड़ाला था।

“मैं आप ही की तरफ आ रहा था।” मैंने अर्चना को बताया। उत्तर में उसने कुछ भी नहीं कहा।

“अरे, अन्दर आइये न।”

वह अन्दर आ गई और मेरे कहने से पूर्व ही, कुर्सी पर बैठ गई।

“अनिल फिर बीमार पड़ गया?” मैंने खड़े खड़े ही पूछा।

वह चुप रही। ध्यान से देखा, जैसे चेहरे पर ज़र्दी सी पुती हो!

“क्या अनिल की तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब है?” मैंने पूछा, तो उसकी आंखों मे ंजलकण झिलमिलाने लगे। फिर चंद क़तरे आंखों से टपक कर, उसकी भीगी साड़ी की नमी मेें जज़्ब हो गये।

किचिन में जाकर देखा, पानी खौल रहा है। एक कप पानी और डालने के बजाय, चायपत्ती के साथ, दूध की पर्याप्त मात्रा उसमें उंडेल दी, इतनी, कि चाय के दो कप तैयार हो जायें।

“लीजिये, पहले चाय पीजिये, फिर चलकर डाक्टर से बात कर लेते हैं।”

चाय का कप, उसके हाथ से छूटने लगा था, क्योंकि वह एकाएक ही फफक कर रो पड़ी थी। कप की -आधी चाय, छलक कर उसके कपड़ों और फ़र्श पर जा पड़ी।

“अर्चना! क्या बात है?” मैं काफी हैरान था।

“भइया का कुछ पता नहीं, कहां है!”

“क्या…? कब से पता नहीं?”

“कल सुबह तीन बजे उठकर, अंधेरे में ही चल दिये थे। जाते हुए सिर्फ़ इतना कहा था, कि एक मीटिंग में जा रहा हूं, दो तीन घंटे लग जायेंगे।”

“कोई साथ था?”

“बाहर तीन चार आदमी खड़े थे। मगर अंधेरे में पहचाना तो कोई भी नहीं गया।”

“तब से एक बार भी घर नहीं लौटा?”

“ना… कल आधी रात तक हम इंतज़ार करते रहे। एक एक करके पड़ौस के सभी लोग वापिस आ गये। मगर भइया का कुछ पता नहीं, कहां रह गये!”

“आप थोड़ा धैर्य रखिये, मैं पुलिस चैकी जाकर पता करता हूं।”

“कैसे रखें धैर्य! हम तो… वह फिर रोने लगी।

बहुत ज़ोर देनेे पर, वह आधा कप चाय पी सकी। किंतु मैं स्वयं, एक घंूट भी, गले में न उतार सका। ‘ठंडी हो गई’ कह कर, मैं बाहर गया और पूरी चाय, नाली में उंडेल दी।

पुलिस चैंकी से भी अनिल का कुछ पता न चला। सब इंस्पेक्टर ने सभी सूचियां सामने रख दीं और कहने लगा, ”जिन्हंे पकड़ा गया, या छोड़ा गया, इसमें सभी नाम दर्ज हैं।”

फिर हंसते हुए बोला, ”अजी, यह तो महज़ एक नाटक था। हमें कौन से मंूग दलवाने थे, किसी को यहां रख कर! मुफ़्त की रोटियां खिलाओ और यूनियन वालों से झगड़ा भी मोल लो! कोई मंत्री-वंत्री बीच में आ टपका, तो हमें ऐसी जगह ले जा पटकेंगे, जहां पानी भी न मिले!”

“मगर अनिल होगा कहां?” मैंने पूछा।

“अब यह हम क्या बतायें? रिपोर्ट लिखा दें, आदमी मिल जायेगा, तो सूचना भिजवा देंगे।”

आसपास के तीन चार आदमी साथ लिये, मैं इधर उधर पूछताछ करता फिर रहा था। मगर कहीं भी कोई सुराग़ नहीं मिल पा रहा था। किसी एक ने भी न बताया, उसने अनिल को कहीं देखा है।

हम लोग, बड़े साहब की कोठी जा पहुुंचे। भीतर सूचना भिजवाई। उत्तर मिला, कि कल सुबह बड़े साहब को बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक में भाग लेने के लिये, दिल्ली रवाना होना है। इस समय वे उसी की तैयारी में लगे हैं। साथ यह भी आदेश मिला, कि हम लोग अपने इस कार्य के संबंध में, मैनेजर एन0 मोहन से सम्पर्क करें।

अनिल के लिये, अब मुझे उसी आदमी की कोठी पर फ़रियादी बन कर जाना था, जिस की शक्ल और नाम से ही मुझे घृणा थी और जिससे, मैं हमेशा दूर रहने की ही कोशिश करता था।

रात के पौने दस बज चुके थे। बहुत समझाने के बावजूद अर्चना घर लौट जाने को तैयार न थी और मेरे साथ साथ चल रही थी। जब कि अन्य सभी, एक एक करके वहां से चलते बने थे।

फाटक खोल कर, मैंने कोठी की सीमा में प्रवेश किया। लम्बे चैड़े बगीचे के बीचो बीच होती पक्की सड़क, मोटर-गैराज तक गई थी। उससे थोड़ा इधर, बरामदे तक पहंुचने के लिये शार्टकट था, जिस पर महीन बजरी बिछी थी।

बरामदे में तेज, पाॅवर का बड़ा सा बल्ब जगमगा रहा था। सात आठ गार्डन चेयर्स, बिल्कुल एक सीध में पड़ी थीं। दोनों ओर गमले भी, बड़े क़रीने से रखे गये थे। किंतु सुगन्ध, उन गमलों में उगे, रंग बिरंगे फूलों की नहीं, अपितु कहीं आसपास से ही, रात की रानी की आ रही थी।

घंटी का बटन दबाते ही, सामने के चार दरवाज़ों में से, एक ज़रा सा खुला।

“येस…?” एक बारीक और धीमी सी आवाज़ थी।

“साहब से मिलना है।” मैंने कहा।

“साहब तो इस वक्त, क्लब में होंगे।”

“कब तक लौटेंगे?”

“आई डोंट नो… वैसे तो लौट आना चाहिये था अब तक।”

दरवाज़ा अब पूरा खुल गया था। गहरे सुखऱ् लिबास में, अठारह-उन्नीस वर्षीय स्वस्थ-सी लड़की, जैसे अनींदी सी उठ कर आ खड़ी हुई हो।

“कोई अर्जेंट काम हो, तो क्लब फ़ोन कर लें।” उसने कहा।

बात करते हुए, वह हम दोनों का, जैसे जायज़ा सा लेती जा रही थी। तभी, भीतर से किसी महिला की आवाज़ सुनाई पड़ी।

“मीता… कौन है?”

लड़की ने पीछे गरदन घुमा कर कहा, ”समवन वांट्स अंकल।”

भीतर वाले कमरे का पर्दा सरका कर, एक महिला नमंूदार हुईं। खूब गोरा रंग, कशमीरियों जैसा। आयु पैंतीस और चालीस के बीच। हो सकता है, कुछ अधिक ही हो। सफ़ेद साड़ी ब्लाउज़ की तरह उसके सिर का एक मामूली सा भाग भी सफेदी लिये था।

सामने आते ही, उसने कड़वी-सी नज़र अर्चना पर डाली।

“क्या चाहिये?”

उत्तर मैंने दिया, “कल से इसके भाई का कुछ पता नहीं चल रहा।”

“यहां तो नहीं है इसका भाई!” स्वर काफी रूखा था।

“बड़े साहब ने, मैनेजर साहब से मिलने के लिये कहा है।”

उसी समय, कार की दो रोशनियों की चमक दिखाई पड़ी। कार, मुख्य मार्ग से कोठी के फाटक में से होकर गैराज की ओर बढ़ रही थी।

गैराज से, वह चाबी घुमाता हुआ, हमारी ओर आया। हम दोनों ने हाथ जोड़े।

वह चकित सा, हमारी ओर देख रहा था।

“आप लोग बाहर क्यों खड़े हैं? अन्दर चल कर बैठिये।”

इस बीच, महिला और लड़की भीतर जा चुकी थीं।

एन0 मोहन के पीछे पीछे, हम दोनों उसके ड्राइंगरूम में जा पहुंचे। हमें सोफे पर बैठ जाने का संकेत देकर, वह स्वयं दीवान पर बैठ गया।

“कहिये?”

मैंने पूरी बात कह सुनाई। वह कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला, “आप को, मुझ से कैसी सहायता चाहिये?”

मेरे पास इस बात का कोई उत्तर न था।

वही बोला, ”पुलिस चौकी वालों से बात की?”

मैंने वहां की बात भी बता दी।

“उम्र क्या है उस लड़के की?”

“इक्कीस।” अर्चना ने, जैसे कठिनाई से कहा।

एन0 मोहन मेरी ओर देख कर बोला, ”इस बेचारी लड़की को रात के वक़्त क्यों परेशान किया? आप अकेले नहीं आ सकते थे, या मैं आप को पहचानता नहीं था?”

मैं सकपका गया। वह आज कुछ अधिक ही शराफ़त से पेश आ रहा था। हो सकता है, फैक्टरी के अन्दर उसका व्यवहार सख़्त रहता हो और बाहर, वह वास्तव में एक नेक और नरम दिल इन्सान हो।

“ऐसा कीजिये… आप तो निश्ंिचंत होकर घर जाइये। मैं एस0 एस0 पी से फ़ोन पर बात करता हूं। कल तक कुछ न कुछ पता चल ही जायेगा।”

हम दोनों उठने लगे। तभी भीतर से, नौकर ट्रे में तीन चाय के कप लिये आ पहुंचा।

मैं सचमुच चकित था। बंगले में निवास करने वाले अफ़सरों के बारे में मेरी अब तक की सभी धारणाएं, ग़लत सिद्ध हुई जा रही थीं।

“बैठिये बैठिये, चाय पीकर जाइये।”

“चाय तो…“ मैं कप उठाते हुए झिझक रहा था।

“अरे भाई, यह आप ही के लिये तैयार हुई है।”

मैं सहमा-सा हुआ, अर्चना के दायें हाथ की ओर देख रहा था। कहीं चाय छलक कर, नीचे क़ालीन पर न जा पड़े। किंतु न जाने कैसे, वह पूरा कप, मुझ से भी पहले ख़ाली कर चुकी थी!

 

ऐसा मैंने तो क्या, किसी ने भी न सोचा होगा। अचानक ही जैसे किसी ने छाती पर प्रहार कर दिया हो। आंखों में बारबार अंधेरा-सा तैरने लगता और कभी ऐसा महसूस होता जैसे कलेजे में ंिचंगारी छूट गई हो!

कितनी ही बार मैं, अर्चना, अरूणा और उनकी मां को, झूठी सांत्वना देने का असफल प्रयास कर चुका था और कितनी ही बार, मैंने स्वयं को ही, फ़रेब देना चाहा था। मगर…

कई दिन की भागदौड़ के बाद भी, अनिल का कुछ पता न चल सका था। पुलिस की खोज जारी थी। सभी ओर वायरलेस संदेश भेजे जा चुके थे। फैक्टरी के लोग, कितनी ही बार, झाड़ झंकार तक को हिला हिलाकर देख चुके थे। मगर कहीं भी कुछ पता न चला।

अनिल कहीं नहीं मिला। मगर सातवें दिन, एक अजीब सी घटना घटी। गांव की सीमा के साथ साथ बह कर आगे बढ़ जाने वाली नहर में, लगभग ढाई किलोमीटर के फ़ासले पर, एक लाश मिली। लाश, एक अटकाव के पास झाड़झंकार में उलझ कर रह गई थी और बहुत बुरी दशा में थी। शिनाख़त किसी भी तरह सम्भव न थी। केवल अनुमान के आधार पर ही कहा जा सकता था कि शायद वह अनिल की ही हो…

किंतु यह बात, सभी की समझ से बाहर थी। कि इतनी कम चैड़ी और कम गहरी नहर में, आदमी कैसे डूब कर मरा?

हो सकता है, किसी ने मार कर पानी में बहा दिया हो। मगर क्यों?

कौन, किसे समझाये, या सांत्वना दे? जबकि सांत्वना देने वाला, स्वयं ही नियंत्रण खोये बैठा हो!

अर्चना और अरूणा की दयनीय दशा देख, कलेजा मुंह को आता था। उनके पिता का तो काफी पहले ही साया सिर से उठ चुका था। अब भाई भी न जाने कहां जा पहुंचा! मां तो जैसे पत्थर ही बन कर रह गई थी।

किसी के मौजूद रहते, हमें व्यक्ति विशेष की विशेषताओं के बारे में जानने की साधारणतया फ़ुर्सत नहीं होती। मगर उसी के मौजूद न रह जाने पर, वहीं विशेषताएं, असाधारण रूप में, बारबार याद आकर कचोटने लगती हैं।

अनिल की बातें भी, बारबार याद आ रहीे थीं।

सबसे बड़ी समस्या थी, उसके जीवित होने या न होने के संश्य की… इतनी भागदौड़ के बावजूद, न तो उसके जीवित होने की उम्मीद नज़र आ रही थी और न उसकी मृत्यु ही प्रमाणित हो पा रही थी। नहर के आसपास या किसी झाड़ी में, कपड़े का कोई टुकड़ा ही फंसा मिल गया होता। कोई भी तो चिन्ह ऐसा नहीं मिला, जिससे किसी परिणाम पर पहंुचने में सुविधा मिल पाती। कुछ निश्चित हो पाता कि वह…

कुछ दिन के लिये हाहाकार मचा और शान्त हो गया। अनिल के परिवार के प्रति छोटे बड़े, सभी के मन में दया और सहानुभूति उमढी़ और धीरे धीरे बात आई गई हो गई। किंतु उनके अपने घर में मचा हाहाकार, तो एक दो दिन का नहीं था।

मृत्यु प्रमाणित हो जाने की स्थिति में, समस्या इतनी टेढ़ी न रहती। डेढ़-दो हज़ार रूपये सहायतार्थ के घर वालों को मिल गये थे, जो ऐसी हालत में, फैक्टरी कर्मचारी के किसी भी परिवार को मिल जाया करता था। मगर फ़ैमिली पैंशन, फण्ड, ग्रेच्युटी और बीमा वग़ैरा की रक़म, तो पक्के प्रमाण के अभाव में, सात वर्ष तक नहीं मिल सकती थी। अनिल तो अभी सिर्फ़ ‘गुमशुदा’ घोषित हुआ था।

सभी कुछ बदस्तूर जारी था। आठ से पांच तक साधारण ड्यूटी, जिसमें एक से दो बजे तक लंचब्रेक और शाम, पांच से सात तक ओवरटाइम। वही मशीनों की कीं कीं और चीं चीं, लगातार खटखट, वही वर्कर लोगाों का आपसी गालीगलौज, मुक्कम-मुक्का, अश्लील मज़ाक और सुबह से शाम तक ‘ऊपरवालों’ के साथ नाज़ायज़ रिश्तेदारियां क़ायम करना। वही अधिकारी वर्ग के उल्टे-सीधे और मूर्खतापूर्ण आदेश और निदेश, वही लम्बी लम्बी बहसें और तकरार… अरे मेरा काम तो सबसे अधिक हुआ था, फिर पीस वर्क प्राॅफिट, दूसरों को कैसे अधिक मिला?… लो, मेरा टूल फिर चोरी हो गया। मैंने अभी अभी ग्राइंड करके, यहां फ़ेस-प्लेट पर रखा था… उसका मिलिंग कटर ब्लंट हुआ पड़ा है और वह भद्र पुरूष बिना देखे ही कट देता चला जा रहा है… मुझे इस बार साबुन की टिकिया क्यों नहीं मिली? हाथ कैसे धोऊंगा?… उसकी मशीन का पानी बदला था। मगर यहां तो… मेरा काम इतना बढ़िया बना, तब भी इंस्पेक्शन वालों ने पास नहीं किया। उन्हें चाय की ट्रे और समोसे जो नहीं पहुंचाये गये… मेरा ट्रेडटेस्ट, मालूम नहीं कब होगा! छह महीने से ये लोग झांसा दिये जा रहे हैं! … भई वाह! उसका दो बार प्रमोशन हो गया! यह होता है रिश्तेदार होने का फ़ायदा!… आप कुछ करते क्यों नहीं? क्यों नहीं कुछ करते?

गरदन उठा कर देखा, लोकराम खड़ा है।

“बुलाया है?” मैंने जानते हुए भी पूछा।

“फौरन पहुुुंचने को कहा है।”

“और कौन-कौन हैं वहां?”

“अकेले हैं इस वक़्त तो।”

“चलो, मैं आ रहा हूं।”

 

वह हर रोज़ की तरह, कुर्सी पर तना बैठा था। काग़जों पर टिप्पणियां लिखने और हस्ताक्षर करने के बीच ही, वह मुझ से बोला, ”क्या पोज़ीशन है आप के ग्रुप की इस महीने?”

“पोज़ीशन ठीक है सर।”

“ठीक का मतलब? टारगेट पूरे हो जायेंगे या नहीं?”

“ख़याल तो यही है, कि हो जायेंगे।”

“ख़याल? वह क्या होता है? मुझे पक्की बात बताओ।”

“एक घंटे तक, चेक करकेे मैं आप को पूरी लिस्ट दे दूंगा।”

“स्पेयर आर्डर्स में भी ढील नहीं होनी चाहिये।”

“इस बारे में आप निश्चिंत रहें।”

“ठीक है, चेक करने के बाद, लिस्ट बना कर दीजिये।”

एक घंटे से भी कम समय में, मैं सूची तैयार करके पुनः मैनेजर के कार्यालय में उपस्थित हो गया।

उसने सूची पर सरसरी नज़र दौड़ाई। महसूस हुआ, वह संतुष्ट नहीं हुआ। वैसे कोई अप्रसन्नता भी उसने व्यक्त नहीं की।

“अच्छा, ठीक है। ऐसा करना… मैं जहां जहां पेंसिल से लाल निशान लगा रहा हूं, ये काम सबसे पहले निकलवा देना।”

“राइट सर।”

मैं वापिस दरवाज़े तक ही पहंुचा था, आदेश मिला, ”ज़रा रूकिये।”

मैं पहले की तरह, फिर मेज के समीप जा खड़ा हुआ।

“मुझे एक बात याद आ गई, बैठिये।”

मैं ‘थैंक्स’ कह कर बैठ गया।

वह कुछ सोचने लगा। फिर बोला, ”उस लड़के का क्या रहा?”

“जी?”

“अरे भई, वह खू़बसूरत और तेज़ तर्रार-सा लड़का, क्या नाम उसका?”

“अनिल?”

“वही… कुछ पता चला उसका?”

“कुछ पता नहीं चला सर।”

“सो सैड! उसके घर वाले तो बहुत परेशान होंगे?”

“बहुत ही बुरी हालत है उनके घर में!”

“कौन कौन हैं घर में?”

“बूढ़ी मां और दो बहनें हैं।”

“एक तो वही, जो उस दिन मेरी कोठी पर आई थी?”

“जी। दूसरी उससे छोटी है।”

“हूं…“ कह कर वह पेपर व्हेट से खेलने लगा। फिर बोला, “तो उनके घर में कैसे चल पा रहा है?… हम लोगों को उन बेचारों की कुछ मदद करनी चाहिये। डिपार्टमेंट की तरफ़ से तो उन्हें अभी कुछ भी नहीं मिल सकता।”

“वही तो परेशानी है सर। थोड़े से पैसे सेक्शन वालों ने इकट्ठे करके ज़रूर भिजवा दिये थे।”

“उससे भला कितने दिन चलेगा? आपने क्या सोचा इस बारे में?”

“इस बारे में, मेरा तो कुछ दिमाग़ काम नहीं कर रहा।”

“तो… अच्छा, मैं बड़े साहब से बात करूंगा। लड़कियां कुछ पढ़ी लिखी हैं?”

“बड़ी इन्टर पास है और छोटी इन्टर कर रही है।”

“अच्छा… देखो, क्या होता है। बड़े साहब से बात करके ही कुछ बताउंगा।”

मैं वहां से उठ कर बाहर आया। विश्वास नहीं हो पा रहा था, यह वही एन0 मोहन है!

इस बात पर भी विश्वास करना कठिन हो रहा था, कि यह वही क्वार्टर है, जहां इससे पहले भी, मैं कई बार आ चुका था, अथवा सामने खड़ी लड़की वही अर्चना है, जो…

पहले कितना साफ़-सुथरा रहा करता था उनका यह क्वार्टर! अनिल की बीमारी के दिनों में भी, क्या मजाल जो कोई चीज़, बिना सलीके़ के रखी गई हो और क्या मजाल, जो घर में किसी ने ज़रा भी मैला कपड़ा, किसी ने पहना हो या उस कपड़े पर कहीं दाग़ का निशान दिखाई दे जाये। वर्कर काॅलोनी में, उनका यह क्वार्टर, दूसरे सभी क्वार्टरों से, बिल्कुल अलग दिखाई पड़ता था। किसी साल दो अक्तूबर के अवसर पर, इसे स्वच्छता पुरस्कार, फैक्टरी प्रशासन की ओर से प्रदान किया गया था।

झटका-सा लगा। यह क्वार्टर भी तो इन लोगों को खाली करना पड़ेगा। दो महीेने पूरे होते ही, नोटिस सर्च हो जायेगा। तब, कहां जायेंगे ये लोग?

“बाहर ही खड़े रहेंगे?”

अर्चना चैखट में खड़ी थी।

भीतर आंगन में पड़ी प्रत्येक वस्तु, अव्यवस्थित, मैली मैली और उदास सी लग रही थी। रस्सी पर, धोकर सूखने के लिये फैलाये कपड़े भी पीले-पीले से लग रहे थे, जैसे बिना साबुन के धोये हों। या धोकर उन्हें नील या टिनोपाल न दिया गया हो। रसोईघर में बरतन, उल्टे सीधे पड़े थे। कोई चीज़ उबल कर, अंगीठी की बाहरी सतह पर चिपकी थी। वहीं कोने में, मां घुटों पर सिर टिकाये बैठी थी। उसने सिर उठाया। प्रत्येक बार, वह मुझे देख, इसी तरह चैंक उठती थी। इस उम्मीद में, शायद कोई समाचार हो। कोई आकर अचानक कह दे कि उसका बेटा कहीं देखा गया है।

किंतु मेरा बुझा-सा चेहरा देख और निराश हो, वह पुनः धरती की ओर देखने लगी। फिर मरी सी आवाज़ में बोली, ”अर्चना, इन्हें अन्दर ले जाओ।”

बरामदे में से निकलते हुए, मेरा पैर किसी चीज़ से टकरा गया और मैं गिरते गिरते बचा। भीतर जाकर, किसी के बिना कहे, मैं कुर्सी पर बैठ गया। अर्चना, चारपाई के पायंते पर बैठ गई।

दोनों चुप थे। कहने के लिये किसी के पास कुछ न था। वातावरण पर्याप्त बोझल महसूस हुआ। फिर इधर उधर देख कर पूछा, ”अरूणा नज़र नहीं आ रही?”

“नल पर पानी लेने गई होगी।”

एकाएक, एक अजीब और बहुत हल्की सी मुस्कान, अर्चना के चेहरे पर आई, जिसे देखकर चकित होने के बजाय, मैं सहम सा गया। किंतु यह बेमालूम सी मुस्कान, एक लहर की तरह आकर वि़लीन हो चुकी थी। वह पुनः पहले की तरह गम्भीर नज़र आने लगी थी।

गम्भीर, बुरी तरह गम्भीर!

मैंने तब, शायद ठंडी साँस ली थी।

वह बोली, ”आप इतना क्यों सोचते हैं? जो भी होगा, सह लेंगे।”

“सहने की भी तो कोई हद होती है!”

“ज़रूर होती होगी। मगर हमारे दुर्भाग्य की तो कहीं कोई हद दिखाई नहीं पड़ती। किसे पता था, अपना घर बार छोड़ कर, इस तरह प्रदेश में भटकना पड़ेगा और यहां आकर भी…

वह आगे नहीं बोल पाई।

मैंने सांत्वना देना चाही। कहा, “अर्चना, धैर्य तो रखना ही होगा। घर में, अब तो आप ही पर सभी कुछ निर्भर है। आप ही जब निराश और बेबस होकर बैठ जायेंगी, तो कैसे चल पायेगा!”

बाहर नज़र गई। अरूणा दोनों हाथों में पानी से भरी बाल्टियां लिये, आंगन में आ पहुंची थी। उसकी कमीज़ का कुछ भाग और शलवार के पांयचे, पानी छलकने से भीग गये थे। दोनों बाल्टियां, रसोई घर के बाहर रख उसने सिर पर दोपट्टा ठीक किया और भीतर आकर हाथ जोड़े और चारपाई पर, अर्चना से ज़रा सा हट कर बैठ गई।

बाहर, पड़ौस की दो स्त्रियां, किसी बात को लेकर झगड़ पड़ी थीं। कुछ ही देर में, नौबत गाली गलौज से बढ़ कर हाथापाई तक आ पहुंची थी।

भीतर बैठे हुए, अब उनके रोने चिल्लाने और घंूसे थप्पड़ मारने की आवाजें़, स्पष्ट सुनाई पड़ रही थीं। मैंने अर्चना की ओर देख पूछा, मामला क्या है? क्यों लड़ाई हो रही है इस तरह?

“साथ वाले हैं। रोज़ का ही काम है इनका। किसी न किसी बात पर आपस में भिड़ते ही रहते हैं।”

“मगर ये लड़ते क्यांे हैं?”

“स्वभाव ही लड़ने का है।”

“आप को तो ये लोग परेशान नहीं करते?”

“हमारी तो दोनों से ही बोलचाल बंद है, बहुत दिन से।”

ये क्वार्टर भी कुछ अजीब ढंग के बने थे। दोनों साथ वाले क्वार्टरों की सांझी दीवारों और छत के बीच, न जाने क्यों, रिक्त स्थान छोड़ रखा था। इसी कारण, प्रत्येक क्वार्टर का निवासी, पड़ौस वाले क्वार्टर की पूरी बात, बिना किसी कठिनाई के, साफ़ साफ़ सुन सकता था। शायद इसी लिये अरूणा बहुत धीमी आवाज़ में बात कर रही थी।

साथ वाले क्वार्टर में, आदमी अपनी पत्नी को बाहर से घसीट कर भीतर लेे आया था और अब लातों-घूसों से उसकी मरम्मत कर रहा था।

“साली हरामज़ादी, हर रोज़ किसी न किसी से झगड़ा मोल लेती है।”

“तू साला हरामज़ादा। तू अपनी जिस अम्मा के लिये मेरे ऊपर हाथ चला रहा है, मैं उसकी टांगें चीर कर रख दूंगी।”

उत्तर में, एक ज़ोरदार तमाचे की आवाज़ सुनाई पड़ी। कई मिनट तक हाथापाई होती रही। फिर आदमी गालियां देता हुआ बाहर चला गया। स्त्री सिसकियां लेती रही और पति के कमीने वंश को लगातार कोसती रही।

अरूणा उठ कर बाहर चली गई। मालूम था, कहां गई है। अर्चना से कहा, ”मैं चाय नहींे पियूंगा।”

उसकी आंखों में प्रश्न चिन्ह सा उभरा। फिर वही गहरी उदासी! सोचा, मना नहीं करना चाहिये था। चाय तैयार हो जाने पर, ये भी दो घूंट भर लेंगे। वरना मालूम ही है, कि इन दिनों, इनके खाने पीने का कुछ भी ठीक ठाक नहीं। दो कोर कभी निगल लिये, नही ंतो यों ही ठंडी साँसे लेते सो रहे।

किंतु देखा, अर्चना न तो चारपाई से उठी है और न आवाज़ देकर उसने अरूणा को, चाय तैयार करने के लिये ही कहा है।

वही हुआ, जो इन दिनों अकसर हुआ करता था।

मिन्नतें करके, मां को चाय पिलाई। अर्चना और अरूणा को पीने पर बाध्य किया और तब अपना कप उठा कर होंठो से लगा लिया।

चाय के बाद, माहौल ज़रा सा सामान्य हुआ। मैंने बात शुरू की, “मुझे आज मैनेजर ने अपने दफ़तर में बुलाया था।”

दोनों बहनें मेरी ओर देखने लगीं।

“वह आप के बारे में चिंता व्यक्त कर रहा था। पूछ रहा था, लड़कियां कितनी पढ़ी हैं। मैंने बता दिया।”

वे बिना कुछ कहे, मेरी ओर देखे जा रही थीं।

“शायद बड़े साहब से कह कर, वह नौकरी वगैरा की कोशिश करें।”

वे अब भी चुप थीं।

“आप कुछ कहेंगी नहीं?”

“हमारे कहने को तो कुछ भी नहीं रहा। आप जैसा भी कहेंगे, मैं कर लूंगी। मगर…” अर्चना ने कहा।

“मगर क्या?”

अर्चना की आंखों में पानी भर आया। बोलने लगी, तो गला रूंध गया। वह उठ कर बाहर चली गई।

समझ में न आया, क्या हुआ! मैंने अरूणा की ओर देखा।

अरूणा कुछ झिझकी। फिर बोल ही पड़ी, ”पिछले ब्लाॅक की औरतें कुछ उल्टा सीधा बोल रही थीं?”

“क्या?… क्या कह रही थीं?”

वह चुप रही।

“अरूणा, बताओ न, क्या कह रही थीं?” मैंने आतुरता से पूछा। वह असमंजस में पड़ गई। फिर कहने लगी, “दरअसल, वे आप और दीदी को लेकर कुछ बक रही थीं।”

“ओह!”

अर्चना भीतर लौट, पहले की तरह चारपाई पर बैठ गई। वह अब थोड़ा संतुलित दिखाई पड़ रही थी। अरूणा बात का संकेत दे चुकी है, यह अनुमान शायद उसने लगा लिया था।

मन बहुत ही दुखी था। गरदन नीची करके, मैं फ़र्श को लगातार ताके जा रहा था।

अर्चना ही बोली, ”हम लोगों की वजह से, आप के नाम पर भी धब्बा लग रहा है!”

“मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया। फिर धब्बा कैसा?”

“अभी कल की बात है। मैं दुकान से कुछ सामान ख़रीद कर लौट रही थी। पान की दुकान पर खड़े लोग भी, व्यंग्यवाण चलाने लगे।”

“सोचता हूं, मुझे यहां नहीं आना चाहिये।”

वह कुछ असामान्य सी होकर बोली, ”हां, अपने मान सम्मान की रक्षा का ध्यान तो रखना ही चाहिये न!”

“अर्चना, प्रश्न मेरे मान सम्मान की रक्षा का नहीं है। मैं तो यह सोच रहा हूं, कि ऐसे दूषित वातावरण में, आप दोनों बहनों और मां का यहां रहना कितना कठिन होगा। कैसे गुज़र होगी यहां, यही सोच रहा हूं।”

“किया ही क्या जा सकता है!” वह लाचार सी बोली।

मैंने उठते हुए कहा, “मैं कल मैनेजर से फिर बात करूंगा।”

 

अगले दिन, मैंने मैनेजर से भेंट करने का तीन चार बार प्रयास किया। किंतु हर बार, उसे दो चार आदमियों से घिरे ही पाया। एक बार वह ख़ाली भी मिला। फैक्टरी सम्बंधी काग़ज़ात दिखा कर, मैं निजी बात आरम्भ करने ही लगा था, कि सहायक प्रबंधक शीतल कुमार, सिग्रेट का धुआं उड़ाते और बग़ल में ड्राइंगों का बंडल दबाये, भीतर आया और एन0 मोहन के ठीक सामने पड़ी कुर्सी पर पसर गया। तब भी बात न हो पाई।

उस दिन, दोपहर के बाद काम बंद था। अगले दिन विश्वकर्मा पूजा थी। इसी कारण, मशीनों के साथ साथ, पूरे सेक्शन की सफ़ाई की जा रहीे थी।

अनिल की स्मृति ने फिर झकझोर डाला… वह कितने उत्साह से, पूजा की तैयारियों में जुट जाया करता था। सप्ताह भर पूर्व ही, वह सप्रयास पूजा समिति का गठन करा देता। साथ चल कर चन्दा इकट्ठा कराता और पूजा वाले दिन, क्या क्या कार्यक्रम रहेगा, यह सुनिश्चित कराता। खाने और नाश्ते में क्या क्या चीज़े तैयार हांेगी और कौन सी, बाज़ार से बनी बनाई लाईं जायेंगी, इस पूरे विवाद को वह कुशलतापूर्वक सुलझा देता। हारमोनियम, तबला, लाउडस्पीकर, दरियां, झडियां, कलाकार और अदाकार, वह बिना झिझक, सभी ज़िम्मेदारियां, अपने ऊपर ले लेता।

मगर उसमें एक ही कमी थी। वह मामूली सी बात पर ही चेहरा सुर्ख़ कर लेता और शुरू हो जाता… बस बस, आप रहने ही दीजिये। मुझे तो पहले ही मालूम था, यह आप से नहीं होने का। आप छोड़ दीजिये इसे, मैं अपने आप कर लंूगा…

उसी के प्रयास से, हमारे सेक्शन को, दो बार सफाई और सजावट के लिये शील्ड मिल चुकी थी…

कहां है अनिल? कहां चला गया वह? मैं भावुक होने लगा था।

“सर, कैन्टीन वालों को कह कर बरतन तो दिला दीजिये।”

देखा, तीन चार नौजवान वर्कर सामने मौजूद हैं।

“अरे भाई, मेरे कहने से वे लोग कब देने वाले हैं। आप जाकर फ़ोरमैन साहब से कहिये न।”

मैं सोच रहा था, कि पूजा वाले दिन तो फैक्टरी में कोई सरकारी काम नहीं होता। क्यों न उसी दिन एन0 मोहन से मिल लिया जाये।

किंतु पूजा वाले दिन, मैं सुबह से ही इधर उधर के कामों में उलझ गया था… फल कहां रखवा दें?… लकड़ियां तो गीली निकल गईं… गरम मसाले की पुड़िया कहां है? या उसे लाना ही भूल गये?… वह पनीर अब तक नहीं पहुंचा। भई, किसी को गेट पास देकर लाने भेजो… दूध तो खीर के लिये ही काफी नहीं, दोनों टाइम की चाय कहां से बनेगी? धूपबती और फूल, स्टोर से कौन उठा ले गया?… अरे यार, यहां तो सभी बारातियांे की तरह घूम रहे हैं। काम को हाथ लगाने के लिये कोई भी तैयार नहीं!…

अफसरों की पूरी टीम को, सभी सेक्शनों की ओर से निमंत्रण भेजा जाता था। वे लोग सभी जगह बारी बारी से जाते। प्रत्येक सेक्शन में दस बारह मिनट रूक कर, कलाकारों की कला के छोटे छोटे नमूनों का आनन्द उठाते, सफ़ाई और सजावट का निरीक्षण करते तथा खाने कीे प्लेटों में से, थोड़ा सा कुछ उठा कर मुंह जूठा करते और फिर निश्चित कार्यक्रमानुसार, अगले सेक्शन के लिये चल पड़ते।

मगर यह सब तो बाद में होता था। उससे पहले, उन्हें कुछ देर के लिये, हवन में हिस्सा लेने के लिये, एक जगह दरी पर बैठना होता था। संस्कृत में बोले गये श्लोकों और मंत्रोच्चारण को सुनना होता था। माथे पर तिलक लगवा कर बंूदी का प्रसाद लेना होता था। देवी देवताओं के प्रति विश्वास न रखते हुए भी, बहुत से महानुभाव, इस नाटक में बराबर का हिस्सा लेते थे।

हमारे सेक्शन से विदा होत समय, नरेन्द्र मोहन अपनी अफ़सरांे की टोली से थोड़ा पीछे रह गया था। दरअसल वह इस समय किसी से चुहल कर रहा था। वह वहां से चलने लगा, तो उपयुक्त अवसर पाकर मैंने उसके नज़दीक जाकर कहा, ”सर, मैं आप से मिलना चाहता था। अगर आप…“

किंतु उसने मुझे वाक्य पूरा करने का अवसर ही नहीं दिया। दोनों हाथ फैला कर, मेरी ओर बढ़ा और कहने लगा, “आइये मेहरबान! शौक़ से मिलिये!”

इर्द गिर्द खड़े वर्कर और अन्य स्टाफ़, सभी खिलखिला कर हँसे। इस समय, वह एक चतुर विदूषक की तरह, तमाशा दिखा कर, तटस्थ सा बना खड़ा था और मैं शरम से ज़मीन में गड़ा जा रहा था…

कितनी लज्जा की बात है, कि मुझे किसी से ठीक तरह से बात करनी भी नहीं आती। मगर इस बाज़ीगर को भी तो देखो, जिसे ज़रा भी शरम और हया नहीं! भरे सेक्शन के बीच, इसने मुझे इस तरह ज़लील कर डाला!

“सुनो।” कह कर वह बिना मेरी प्रतीक्षा किये, उस ओर चल दिया, जिधर कुछ देर पहले, अन्य सभी अफसर, आगे निकल गये थे।

इतना अपमान महसूस करने के बावजूद, मुझे अपने स्वाभिमान को ताक पर रख कर, केवल एक शब्द ‘सुनो’ पर ही, कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए, उसके पीछे लपकना था!

कुछ तेज़ क़दम बढ़ाकर, मैं उसके बराबर तक जा पहुंचा और साथ साथ चलने लगा। वह बिना इधर उधर देखे और उसी तरह तन कर चलते बोला, ”मैं तो तुम्हें अक़्लमंद आदमी समझता था।”

मैं चुप रहा।

“ऐसी बातें आराम से बैठ कर हुआ करती हैं। शाम को कोठी पर चले आना।”

कितना कुछ बना था उस दिन दोपहर के खाने में पीठी वाली पूड़ी, मटर पनीर और आलू गोभी की सब्ज़ी, बंूदी का रायता, पापड़, सलाद और अचार। खालिस गाढ़े दूध से तैयार की गई खीर में, ढेर सारे मेवे गिराये गये थे। किंतु मेरा उसे चखने तक को मन नहीं हुआ। दो वर्करों ने आकर कहा भी था, “आप भी खा लीजिये खाना।” मेरा यही उत्तर था, ”आप लोग शुरू कीजिये। मुझे अभी भूख नहीं लगी। मैं बाद में खा लूंगा।”

अनिल होता, तो क्या यों ही छोड़ देता! कितना शौक़ था उसे दूसरों को खिलाने का! कोई नख़रा दिखाने लगे, या मना करे, तो वही गरम गरम मूड!… ठीक है साहब, नाली में फेंकवा देते हैं। वैसे, आपने इस इलाके़ में कुत्तोें की भी कोई कमी नहीं… आप चुपचाप खा लीजिये, वरना आप जानते हैं कि मैं…

शाम को, मुझे मिलने के लिये उसकी कोठी पर जाना चाहिये या नहीं, इस पर सोचने या बहस की ज़रा भी गुंजायश नहीं थी। कितने ही कार्य हैं, जो अनिच्छा से भी, करने ही पड़ते हैं। नौकरी करने को भी कहां मन हो रहा था! प्रमहंस राम कृष्ण देव की शिक्षा सम्बंधी पुस्तकों का अध्ययन करने और यह जानते हुए भी, कि नौकरी करना आत्महत्या से भी बड़ा पाप है, ग़ुलामी का यह जुआ मैंने अपने कंधों पर डाल लिया था और फिर यह नौकरी भी कौन सी आसानी से मिल गई थी! कितना संघर्ष करना पड़ा था, ‘नौकर’ शब्द का काला टीका अपने माथे पर सजाने के लिये! मगर जब यह ‘गुलामी’ एक बार स्वीकार कर ही ली थी, तो यह रोना-झीकना या नख़रे दिखाना कैसा?

किंतु इस समय मैं मन मार कर जो कुछ कर रहा था, वह मेरे अपने लिये तो न था। अनिल मेरा क्या लगता था? या मैं अर्चना, अरूणा और उनकी मां के लिये कौन हूं? मैं इस पर विचार नहीं करना चाहता था। केवल एक ही बात मन में थी, मुझे इनके लिये कुछ करना ही चाहिये। भले ही मुझे, उस नरेन्द्र मोहन जैसे के सामने, बारबार ही क्यों न ज़लील होना पड़ जाये!

रात आठ बजे के आसपास, वह क्लब चला जाता था। मुझे उससे पहले ही वहां पहुंचना था। ऐसा न हो, मैं वहां सड़क तक ही पहंुचूं और उसकी कार, गैराज से निकल कर, बाहर फाटक की ओर आ रही हो और देख लेने पर फिर उसके मुंह से वही शब्द निकलें… मैं तो तुम्हें एक अक़्लमंद आदमी समझता था!

वर्कर काॅलोनी में इस समय, बहुत ही चहल पहल का माहौल रहता था। हम सुपरवाइज़र लोगों के क्वार्टरों में, मामूली आपसदारी और औपचारिकता की झलक, देखने को मिलती। मगर इधर बेंगलो एरिया में तो एकदम ख़ामोशी का माहौल, जैसे यहां के सभी निवासी, घर बार छोड़ कर पलायन कर गये हों, या किसी के ग़मी में शरीक होकर लौटें हो और इस वक़्त आराम कर रहे हों!

ये लोग शायद ही, कभी आपस में मिलते जुलते हों। याद आया, एक बार एक अफ़सर, लगभग दो महीने तक बीमार रहा। ठीक होकर जब ड्यूटी पर लौटा, तो बराबर वाले बंगले मे रहने वाला एक अन्य अफसर, उससे हाथ मिलाते हुए, पूछ रहा था, ”कहां रहते हो भाई, आजकल? दिखाई ही नहीं पड़ते। क्या एल0 टी0 सी0 लेकर, फै़मिली को कन्या कुमारी घुमाने ले गये थे?”

सवा साम बजे थे। मैंने लोहे का फाटक खोल, कोठी की सीमा में प्रवेश किया और फाटक को पहले की तरह बंद कर, पक्की सड़क पर चलता हुआ बरामदे वाले शार्ट कट पर बढ़ा।

आधी रात जैसा सुनसान। बरामदे में वही एक सीध में पड़ी ख़ाली कुर्सियां, फूलों के गमले, रात की रानी की सुगन्ध और सामने के चारों बंद दरवाज़े। सभी दरवाजे़ और खिडकियों के शीशों के पीछे, मैरून रंग के पर्दे, जिन में इस समय ज़रा भी जुम्बिश न थी।

मैं कालबेल का बटन दबाने की लगा था, कि बायीं ओर से, दूसरे कमरे का दरवाज़ा खुला।

“येस प्लीज़?”

यह वही लड़की थी। आज वह, गहरे सुखऱ् के बजाय, गहरे हरे रंग की पौशाक में थी। बालों का स्टाइल भी, आज थोड़ा बदला हुआ था। किंतु उसका चेहरा ऐसा नहीं था, जो एक बार देखने के बाद, पुनः पहचान लेने में कोई ग़लती कर जायेः

“अंकल तो नहीं हैं।” उसने कहा।

“क्लब चले गये?”

“नो नो… क्लब अभी कहां! सिटी गये हैं। कुछ शाॅपिंग करनी थी- आप…?”

“मैं फिर आ जाऊंगा।”

“कोई अर्जेंट काम था?”

“था तो अर्जेट ही।”

“आप व्हेट कर लीजिये।”

“मैं…“

“अरे, आइये न… मैं उधर से ड्राइंग रूम का दरवाज़ा खोलती हूं।”

वह अदृश्य हो गई और एक मिनट से भी कम समय में, दूसरे कमरे का दरवाज़ा खोले, मौजूद थी।

“प्लीज़, कम इन।”

मैं झिझकता-सा हुआ भीतर चला गया।

“आप तो बहुत ही हेज़िटेट कर रहे हैं… बैठिये न।”

बैठना ही पड़ा।

“चाय लेंगे?”

“चाय पी कर ही चला था घर से।”

“कोल्डड्रिंक? ओह नो, चाय के बाद कोल्डड्रिंक तो हार्मफुल होगी। काॅफ़ी ठीक रहेगी।

व्हाट डू यु थिंक? चलेगी?”

अजीब हालत है! लगता है, इन कोठी बंगलों में रहने वाले लोग, इसी तरह ख़ाली बातें बनाने, या नाटक करने में पूरी तरह माहिर होते हैं।

मगर वह बोली, “अच्छी बात, काॅफ़ी ही ठीक रहेगी। इट्स फ़ाइनेल।”

वह चुस्ती से उठ कर, साथ वाले कमरे में से होती हुई, पीछे बरामदे की ओर निकल गई और एक मिनट बाद लौट कर, कुर्सी पर बैठते बोली, “आप शायद पहले भी एक बार इधर आये थे?”

“जी।”

“हां, मुझे कुछ कुछ याद है… एक लड़की भी थी न आप के साथ? क्या नाम था उसका?

“अर्चना।”

“येस, अर्चना… ए लवली गर्ल! आपकी क्या लगती है वह?”

“लगती तो, कुछ नहीं।”

“तो, यों ही?”

“यों ही?”

“आई मीन, फाॅर सिम्पेथी?… उसके ब्रदर का कोई चक्कर था न?”

“मैं उसी सिलसिले में, साहब से बात करने आया था।”

“कुछ पता चला उसका?”

“कुछ पता नहीं चला।”

“वैरी सैड! बेचारी, उसकी सिस्टर… कैसा फ़ेस हो रहा था। उस दिन उसका। मैं रात भर उसी के बारे में सोचती रही थी।”

मैं सोच रहा था, ये लोग क्या वाक़ई इतने मासूम होते हैं, या नाटक करते रहना ही, इनके जीवन का उद्देश्य है?

किंतु, शायद यह शत प्रतिशत नाटक न होता हो। क्योंकि आज भी नौकर, टेª हाथ में लिये चला आ रहा था। काॅफ़ी के अलावा प्लेट में खाने का कुछ सामान भी था।

मैंने काॅफ़ी का पहला घूंट ही भरा था, कि उसने बंदूक सी दाग़ दी, “बाई दि वे, आप फैक्टरी में किस पोस्ट पर हैं?”

मैंने कप मेज़ पर रख कर कहा, ”मैं अफ़सर नहीं हूं।”

मेरा उत्तर सुनकर, वह मुस्कराने लगी। फिर बोली, मैंने यह तो नहीं पूछा था, कि आप क्या नहीं हैं!”

“मैं सुपरवाइज़र हूं।”

“सुपरवाइज़र? क्या करते हैं सुपरवाइज़र फैक्टरी में?”

कहना चाहा, झख मारते हैं!

“बिस्केट लीजिये न?”

मैंने एक बिस्कुट उठा लिया।

“आपने बताया नहीं, सुपरवाइज़र फैक्टरी में क्या करते हैं?”

“काम करते हैं।” मैंने कहा।

वह खिलखिला कर हँसी और बोली, “काम तो सभी करते होंगे?”

“सुपरवाइज़र भी करते हैं।”

“क्या काम करते हैं?”

””च कहूं, तो झख ही मारते हैं… सिर्फ़ पिसने का काम करते हैं हम लोग! दो पाट हैं चक्की के। ऊपर वाला पाट, अफ़सरों का। नीचे वाला वर्करों का और दोनों के बीच, हम लोग!”

“आप लोगों को अफ़सर डांटते होंगे और आप वहीं डांट, वर्करों को पास-आॅन कर देते होंगे।”

“नहीं। मैंने बताया ना, ऊपर और नीचे, दोनों ओर से, हमें ही डांट खानी पड़ती है। मगर आप यह सब क्यों पूछ रही हैं?”

“इन्ट्रेस्टिंग हैं ये बातें।”

“इन्ट्रेस्टिंग? मैं तो समझता हूं, बहुत ही बोर विषय है… आज आपकी आंटी दिखाई नहंीं पड़ रहीं?”

“शाॅपिंग के लिये गई हैं अंकल के साथ। मैंने बताया था न।”

“मुझे याद नहीं रहा। साहब तो आये नहीं अभी तक!”

वह अपनी कलाई पर बंधी खूबसूरत घड़ी को देखने लगी।

फिर बोली, “आपको यहां आये, सिर्फ़ अठारह मिनट और बीस सेकेण्ड हुए हैं। आई थिंक, यु फ़ील बोर?”

“नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।”

“फिर क्या बात है?”

“कुछ भी तो नहीं।”

“तो कुछ बात कीजिये न।”

“समझ में नहीं आता, क्या बात करूं! हम लोगों के पास तो आमतौर पर एक ही जैसी बातें हुआ करती हैं। बड़े साहब ने यह कहा और छोटे साहब ने वो कहा। कौन किसे मक्खन लगाता है और कौन किस की डांट खाता हैं। हमारा मानसिक स्तर तो बस, इससे ऊपर नहीं उठता।”

“बस बस, बस! इस तरह की बातें मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आतीं। कम पढ़ी लिखी हूं न! आप तो काफी पढ़े-लिखें होंगे।

मैंने उत्तर दिया, “फैक्टरी की नौकरी के लिये, बहुत पढ़ा लिखा होना ज़रूरी नहीं।”

तभी, साहब की कार का हाॅर्न सुनाई पड़ा।

मैंने हाथ जोड़, अभिवादन किया। मिसेस एन0 मोहन ने तनिक-सा सिर हिलाया और दूसरे कमरे में चली गई। वे आज भी सफ़ेद परिधान में थीं।

एन0 मोहन ने ‘हेलो’ के बाद ‘मैं अभी आता हूं’ कहा और मिसेस एन0 मोहन के पीछे ही दूसरे कमरे में चला गया।

पांच-सात मिनट के बाद, वह कुरते पाजामे में लौटा और दीवान पर पालथी मार कर बैठ गया। मैंने अनुमान लगाया, कि आज उनका क्लब जाने का मूड नहीं है।

“हां, अब कहिये?”

“सर, उस दिन आप से, अनिल की बहन के बारे में बात हुई थी…”

“ओह येस! मैंने बड़े साहब से बात की थी। वे मदद करने को तैयार हैं। नौकरी कर लेगी वह लड़की?”

“जी।”

“उम्र क्या है उसकी?”

“बड़ी उन्नीस की है और छोटी सतरह की।”

“छोटी तो अंडरएज है। बड़ी का काम हो सकता है। एम्पलाएमेंट एक्सचेंज में नाम तो रजिस्टर करा रखा है न?”

“शायद नहीं।”

“कमाल है! अरे भाई, इतना काम तो अब तक करा रखना चाहिये था।”

“सर, मैं कह दूंगा इसके लिये।”

“कह दूंगा नहीं। साथ ले जाकर नाम रजिस्टर करा डालो। उसके बाद, कार्ड नम्बर मुझे लिख कर दे देना। मैं अपने आप नाम निकलवा लूंगा वहां से। ओ0 के0?”

“सर, बड़ी मेहरबानी होगी आपकी।” मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया।

वह मेरी ओर आंखें फाड़ कर देखने लगा। फिर बोला, “क्या फ़रमाया आपने?… आप भी कभी कभी अजीब क़िस्म की बातें किया करते हैं!”

मैंने सिर झुका लिया।

 

अगली सुबह, मैं अर्चना के साथ, लोकल बस में बैठ, शहर रवाना हो गया। बस-स्टैंड से रोज़गार कार्यालय, लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था। समय पर्याप्त था, इसलिये पैदल चलना ही निश्चित हुआ।

दफ़तर खुलने से पहले ही, वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी। अर्चना ने सहम कर पूछा, “इतने लोगों को कैसे मिल पायेगी नौकरी?”

“ये लोग, यहां सिर्फ़ नाम दर्ज कराने, या कार्ड पर तारीख बदलवाने आये हैं। नौकरी तो, इन सौ में एक आध को ही मिल सकेगी।

“तब, मुझे कैसे मिल सकेगी?”

“मिल जायेगी, तो अच्छा है। ना वाली स्थिति तो पहले ही है। फिर भी देखते हैं, क्या होता है!”

“यहां पर तो नाम दर्ज कराना भी आसान नज़र नहीं आता।”

“इतना काम तो अब करके ही लौटेंगे।”

किसी ने मेरे कंधे पर हाथ धरा। पलट कर देखा, योगेश था।

“कहो गुरू, कैसे हो?”

योगेश मेरे साथ ही फैक्टरी में लगा था। मगर नौकरी लगने के एक महीना बाद ही, ‘गुरू, यह काम अपने वश का नहीं’ कह कर वह नौकरी छोड़ गया और शहर के किसी मुहल्ले में, दुकान खोल कर बैठ गया।

“इधर कैसे?” उसने पूछा।

“आप बताइये, आप जैसे मेहनती और व्यस्त आदमी को इधर क्या काम पड़ गया?”

वह ज़रा सा मुस्कराया और कहने लगा, “अपना भतीजा है न रामशरण, उस का नाम निकलवाने आया हूं। अपने एक फ्रेंड का अंकल है इधर। काम तो वह कर देगा। मगर है साला हरामी, पक्का लोभी! साॅरी… इतना होते हुए भी, पांच सौ मांग रहा है। ख़ैर, आप बताओ, इधर कैसे?”

अर्चना थोड़ा हट कर खड़ी हो गई थी। मैंने कहा, “मेरे मित्र की बहन है, इसका नाम दर्ज कराना है।”

“इतना सा काम तो सौ रूपये में हो जायेगा।”

मैंने हंस कर कहा, “यह काम, बिना पैसे दिये कराना है।”

“तब तो गुरू, पूरा दिन खड़े खड़े निकल जायेगा और… मगर मैं एक बात बता दूं। आपके इस आदर्शवादी ढंग से, नाम भले ही यहां दर्ज हो जाये, नौकरी बीस साल बाद भी नहीं मिल पायेगी।”

अर्चना कुछ फ़ासले पर खड़ी थी। किंतु हमारी बातचीत, बखूबी उसके कानों में पहंुच रही थी। योगेश चला गया, तो वह समीप आकर बोली, “यहां तो बहुत बिगड़ी दशा है!”

मैंने कहा, “यहां ही नहीं, जिस दिशा में भी जाओगी, दशा बिगड़ी हुई ही नज़र आयेगी।”

दोपहर डेढ़ बजे के आसपास नाम रजिस्टर कराने का काम हो गया। कार्ड प्राप्त करते समय, यों ही पूछ लिया।

“कब तक सम्भावना है नौकरी मिल जाने की?”

क्लर्क महोदय मुस्करा कर बोले, “जब भी किसी संस्थान की ओर से, स्थान रिक्त होने का पत्र आयेगा। हम लोग योग्यता और वरयीता के आधार पर नाम भेज देंगे। यहां तो बिल्कुल सीधा सच्चा और साफ़ सुथरा हिसाब है।”

“सुना है, कुछ ले-दे कर काम हो जाता है?” मैंने धीरे से पूछा।

“कोशिश कर देखिये। बाहर कितने ही चोर-उचक्के, आप जैसों को लूटते फिर रहे हैं। वैसे, आप मुझे छुट्टी के बाद, बाहर चाय की दुकान पर मिल लें। मैं बता दूंगा, काम कैसे हो सकता है।”

हम बस स्टैंड की ओर चल पड़े। मुझे अब भूख परेशान करने लगी थी। सुबह से इधर आ कर, चाय तक नहीं पी सके थे।

कई एक साधारण सी दुकानें और रेस्तोरां, मार्ग में दिखाई पड़े। उनके समीप से गुज़रे, तो मैंने कहा, “मुझे तो बड़े ज़ोर की भूख लगी है।”

अर्चना ने मेरी ओर देखा और कहा, ”आपने पहले क्यों नहीं बताया, मेरे पास परांठे थे।”

“थे? अब नहीं?”

वह ज़रा सी हंसी। सम्भवतः बहुत दिन बाद, या शायद पहली बार, उसके चेहरे पर हंसी दिखाई पड़ी।

“अब भी हैं इस बैग में। मगर खायेंगे कहां बैठ कर?”

“सामने चाय की दुकान है, वहीं चलते हैं। आइये।”

अर्चना ने बैग खोल कर, बंधा हुआ रूमाल बाहर निकाला। रूमाल की गांठ खोली, तो अख़बार के काग़ज़ में तुड़े मुड़े परांठे नज़र आये। दो पराठों के बीच, आम का अचार की कुछ फांके, गहरे मसाले में लिपटी, महक रही थीं।

“बस, चार ही हैं?” मैंने पूछा।

“नहीं, पांच हैं।”

एक एक प्लेट आलू-छोले की और बाद में चाय लाने के लिये, मैंने दुकानदार से कह दिया।

उस अति साधारण चाय की दुकान की मैली सी मेेज़ पर, हमारा ‘लंच’ सज गया था।

“आप खा क्यों नहीं रहीं?” उसका रूका हाथ देख, मैंने पूछा।

“खा तो रही हूं।” कह कर उसने छोटा सा कोर मुंह में डाला।

“आप एक बात बतायेंगे?” उसने एकाएक पूछा।

“ज़रूर।”

“आप मुझे इस तरह आप कहकर, कब तक बात करतेे रहेंगे?”

“ओह! मैं तो डर ही गया था। सोचा, न जाने क्या पूछा जाने वाला है!”

“सच, बड़ा ही अजीब लगता है। अरूणा भी कह रही थी।”

“क्या कह रही थी?”

“यही, कि जब भाई साहब, हमें आप कह कर बात करते हैं, तो बड़ी शरम महसूस होती है।”

मैंने कहा, “जहां तक मैं समझता हूं, आप कहने, से छिन तो कुुछ भी नहीं जाता। सच मानिये, मेरा किसी को लज्जित करने का कभी विचार मन में नहीं आया।”

“तब भी, इतनी औपचारिकता, बिना बात, अनावश्यक शिष्टाचार प्रदर्शन, अपने से छोटों को भी बड़ों की तरह सम्मान देना, नाटकीय-सा नहीं लगता?”

मैं हंसने लगा।

“बताइये, परायापन-सा नहीं झलकता, ऐसी बातों में, ”

मैं फिर हंसा, तो वह चकित सी मेरी ओर देखने लगी। मैंने सहज होने के विचार से कहा, “अभी अभी मुझे ऐसे लगा, जैसे कोई हिंदी की अध्यापिका, शुद्ध हिंदी में ‘व्यवहार’ शीर्षक पर, बच्चों को निबंध लिखा रही हो!”

वह अब सचमुच ही लज्जित हुुई जा रही थी। उसका चेहरा इस समय, बिल्कुल अनिल के चेहरे जैसा लगने लगा था। सुखऱ्ी की लहरें, उसके पूरे चेहरे पर दौड़ रही थीं।

उसके इस प्रकार चुप हो जाने पर, मुझे कहना ही पड़ा, “सच बात है, मेरा व्यवहार किसी के प्रति भी, न जाने क्यों, कभी सामान्य नहीं रह पाता। कुछ न कुछ गड़बड़ हो ही जाती है।”

“आप इतनी गहराई तक जा पहंुुचेंगे, ऐसा तो नहीं सोचा था, मैं तो सिर्फ़…”

“अपनापन ज़ाहिर करने के लिये शायद आप कह रही थी।”

वह पुनः लज्जित होने लगी। फिर बात का रूख पलटते हुए कहने लगी, ”कितनी मिर्च डाल रखी है इस आलू छोले की सब्जी में!”

“अचार बहुत बढ़िया है।” मैंने कहा।

“मां के हाथ से डाला गया अचार, बढ़िया ही तैयार होता है।” उसने सगर्व कहा।

“मेरी मां भी…“ मैं कुछ कहने लगा था।

“रूक क्यों गये? आप कुछ कहने लगे थे न?”

“कुछ नहीं।”

“कुछ नहीं! ठीक तो है! आपका इतने दिन से हमारे घर आना जाना है। हम सभी आपको इतना मानते हैं। आप पर पूरा भरोसा करते हैं। मगर आप हैं कि कभी…”

“पूरी बात कह डालिये।” मैंने कहा।

“कहना यही चाहती हूं, कि दूसरों से सभी कुछ मालूम करके स्वयं अपने बारे में, आप ने कभी एक शब्द नहीं कहा। इसका क्या कारण है?”

“क्या कहूं, अपने बारे में?”

“कुछ भी नहीं है आप के पास बताने के लिये? घर में कौन कौन हैं। जो हैं, वे आप के पास यहां कभी आते क्यों नहीं, इतना तो बता ही सकते हैं।”

“दरअसल मैं…“

“यह भी पता नहीं चलता, यहां कैसे चल रहा है।”

“कैसे मतलब?”

“खाना पीना, होटल में होता है, या घर पर खुद हाथ जलाते हैं। हमने तो इस बारे में जब भी बात की, तो आपने गोल मोल करके या हंस कर ही टाल दिया!”

“अर्चना, विश्वास करो, मैं सी0 बी0 आई का आदमी नहीं हूं। मेरा कोई भी रहस्य नहीं। फैैक्टरी में एक साधारण सुपरवाइज़र हूं और शायद अगले दस साल तक भी, इसी पोस्ट पर रहूंगा। दोपहर का खाना, फैक्टरी कैंटीन में खाता हूं। वहां पांच रूपये में, परोसी थाली मिल जाती है, जिस में चार चपातियां, जो आमतौर पर अन्दर से कच्ची और ऊपर से जली हुई होती हैं। थोड़े से चावल, जो बिना साफ़ किये या धोये ही, उबाल दिये जाते हैं और दाल… दाल हमारे यहां बहुत ही बढ़िया बनती है! शर्त लग जाती हैं। जो यह बता दे कि यह कौन सी दाल है, शर्त जीत जाता है। मगर यह कोई पहचाने कैसे, कि कौन सी दाल है। दाल में तो पानी ही पानी होता है। दाल का एक भी दाना उसमें नहीं होता। एक परेशानी और है। थालियां कम और खाने वाले बहुत अधिक। कैन्टीन का गेट खुलते ही, लोग चीलों की तरह झपट पड़ते हैं उन थालियों पर। तब जिस के हाथ मेें जो भी आया…”

मैं चुप हो गया, क्यांेकि उसकी अचानक ही हंसी छूट गई थी।

“क्या बात है?” मैंने गम्भीर होते पूछा।

“आपने तो मेल टेªेन ही छोड़ दी!… हां, सुबह के नाश्ते में क्या कुछ तैयार होता है?”

“वही, जो समय पर तैयार हो सके।”

“फिर भी?”

“मैं फैक्टरी के पहले हूटर पर बिस्तर से उठता हूं। दूसरे हूटर की आवाज़ पर किचिन में जा घुसता हूं। डबल रोटी अंडा, कभी कभी परांठा। मगर आप के इन परांठों जैसा नहीं बना पाता। चकले पर बेलन से गोल करने लगता हूं, तो तिकोना सा हो जाता है। त्रिकोण ठीक करने लगता हूं, तो बेढ़ंगा सा चतुर्भुज बन कर रह जाता है।”

“तब क्या करते हैं?”

“तब, उसे उसी तरह तवे पर पटक कर, सभी कसर घी से पूरी कर देता हूं।”

“किसी दिन हमें भी खिलाइये अपने बनाये परांठे!”

“श्योर श्योर! मैं…”

बातचीत बंद हो गई। अब तक यहां हम दो ही बैठे थे। दुकानदार अपने कार्य में व्यस्त था। किंतु अभी अभी, मोटे चेक की बुशशर्ट पहने, दो नौजवान, हमारे ठीक सामने आ बैठे थे।

बस स्टैंड यहां से अधिक दूर नहीं था। मेन बाज़ार भी समीप ही था।

“बाज़ार से कुछ लेना तो नहीं?” मैंने पूछा।

“ना।”

“एक काम आप को ज़रूर करना होगा।” मैंने कहा, तो उस के माथे पर शिकन पड़ गये। मैंने कारण समझते हुए कहा, “आदत को धीरे धीरे ही ठीक कर पाउंगा।”

 वह मुस्करा कर बोली, “ख़ैर, काम बताइये।”

“आप दोनों बहनें टाइप सीखना अभी से शुरू कर दें। यह बहुत ज़रूरी होगा।”

“समझ में नहीं आता, मैं नौकरी कर भी पाउंगी, या नहीं!”

“ऐसी भी क्या बात है?”

“मेरी तो इंगलिश बहुत कमज़ोर है।”

“सरकारी नौकरी के लिये, भाषा का ताक़तवर होना क़तई ज़रूरी नहीं। एक से बढ़कर एक भरे पड़े हैं सरकारी दफतरों में, कितने ही अफसर हैं, जिन्हें इंगलिश के टेंस का भी ज्ञान नहीं। मगर वे भी नीचे वालोें के लिखे ड्राफ्टों का मलीदा बना देने में कसर नहीं छोड़ते। बस, एक बार नौकरी पर लग जाना चाहिये। फिर सभी कुछ, अपने आप ही रास्ते पर आ जाता है।”

“मिल भी जायेगी मुझे नौकरी?”

“मुझे तो पूरा विश्वास हैैै।”

“अरूणा को भी मिल जायेगी?”

“लो, कर लो बात! पहले एक का काम तो हो जाये। उसकी तो अभी उम्र भी कम है। साल भर में वह टाइपिंग और शार्ट हैंड सीख ले, तो शायद उसका भी कहीं कुछ हो जाये।”

कुछ ही देर पहले, एक लोकल बस जा चुकी थी। अगली बस चलने में, अभी बीस मिनट शेष थे। इसलिये सीटें आराम से मिल गईं।

पौने तीन बज रहे थे। अर्चना कहने लगी, “अरे, इतना टाइम हो गया! आपका तो आज पूरा दिन ही बरबाद हो गया!”इसे बरबाद होना कहते हैं? हम पिक्चर देख कर तो नहीं लौट रहे। भई, जिस काम के लिये छुट्टी ली थी, वह पूरा करके आये हैं। क्यों तुम्हें ऐसा महसूस हुआ, कि दिन बरबाद हो गया?”

“एक बात कहूं।”

“ज़रूर कहो।”

“बुरा तो नहीं मान जायेंगे?”

“बुरा क्यों मानंूगा, बोलो, क्या बात है?”

“मैंने इससे पहले, आप को कभी इतना चहकते नहीं देखा।”

“मैं दरअसल…” मैं कहते कहते चुप हो गया।

“एक बात बता देने के बाद, चुप हो रहियेगा।”

मैंने उसकी ओर ग़ौर से देखा।

“आप फैैक्टरी में सुपरवाइज़र हैं न?”

“हां।”

“सुपरवाइज़र लोग, फैक्टरी में क्या करते हैं?”

ज़ोर से छूट जाने वाली हंसी पर, मैं कठिनाई से नियंत्रण कर पाया।

क्रमशः…३

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मायोपिआ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मायोपिआ ? ?

वे रोते नहीं-

धरती की कोख में उतरती

रसायनों की खेप पर,

ना ही-

आसमान की प्रहरी

ओज़ोन की पतली होती परत पर,

दूषित जल, प्रदूषित वायु

बढ़ती वैश्विक अग्नि भी

उनके दुख का कारण नहीं,

अब-

विदारक विलाप कर रहे हैं

इन्हीं तत्वों से उपजी

एक देह के मौन हो जाने का….

मनुष्य की आँख के इस शाश्वत

मायोपिआ का इलाज ढूँढ़ना

अभी बाकी है।

(मायोपिआ-नेत्र विकार, जिसमें दूर की वस्तु दिखाई नहीं देती।)

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, अपराह्न 1:05 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 97 – The Reality of Modern Travel… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Reality of Modern Travel 

☆ Witful Warmth# 97

☆ Satire ☆ The Reality of Modern Travel… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Travel used to be an adventure; now it is an exercise in logistical survival and content curation. The journey begins at the airport, where you are treated like a suspected international criminal just because you forgot to remove your belt. Once on the plane, you are packed into a metal tube with less legroom than a standard birdcage, praying that the person in front of you doesn’t recline their seat. When you finally arrive at the exotic destination, you find that the pristine, lonely beach from the brochure is actually packed with five thousand other tourists all holding selfie sticks. Everyone is looking at the sunset through their phone screens, ensuring the lighting is perfect for their followers, completely oblivious to the actual world around them.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघु कथा – आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघु कथा ☆ आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“मौसी, उँगली में फिर सुई चुभ गई?” राधा ने हँसते हुए पूछा।

अंजू ने उँगली से खून की बूँद पोंछी और मुस्करा दी, “अरे… इसकी आदत है।”

“इतने सालों से सिलाई कर रही हो, अब भी चुभ जाती है?”

“सुई से ज़्यादा ज़िंदगी चुभती है, बिटिया।”

राधा चुप हो गई।

कुछ देर बाद उसने कमरे में टँगे दर्जनों नए सूट देखे और फिर अंजू की फीकी, कई जगह से रफू की हुई साड़ी पर नज़र टिक गई।

“मौसी… अपने लिए कब सिलोगी?”

अंजू ने मशीन का पहिया फिर घुमा दिया।

“पहले यह ऑर्डर पूरा कर लूँ…”

खट… खट… खट…

कमरे में फिर वही आवाज़ गूँजने लगी।

राधा दरवाज़े पर खड़ी रही।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौसी कपड़े सिल रही थीं…

या अपनी पूरी ज़िंदगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२४ ☆ पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२४ 

?  आलेख – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा , पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

समय केवल कैलेंडर नहीं बदलता, वह मनुष्य की सोच, जीवन शैली और सामाजिक व्यवहार भी बदल देता है। इसी परिवर्तन को समझने के लिए समाजशास्त्रियों और जनसांख्यिकीय अध्येताओं ने विभिन्न आयु वर्गों को अलग अलग पीढ़ियों में एकीकृत संबोधन के रूप में वर्गीकृत किया है। इन्हें संक्षिप्त रूप में जेन एक्स, मिलेनियल, जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा जैसे नामों से जाना जाता है। ये केवल आयु का नहीं, बल्कि उस सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवेश का संकेत हैं जिसमें कोई पीढ़ी विकसित हुई।

लगभग 1965 से 1980 के बीच जन्मे लोग जेन एक्स कहलाते हैं। यह पीढ़ी परंपरागत जीवन से आधुनिक तकनीकी युग तक के संक्रमण की साक्षी रही।

1981 से 1996 के बीच जन्मे मिलेनियल या जेन वाई ने इंटरनेट, मोबाइल संचार और वैश्वीकरण को अपनाकर नई कार्य संस्कृति को आकार दिया।

1997 से 2012 के बीच जन्मी जेन जी पहली वास्तविक डिजिटल पीढ़ी मानी जाती है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इनके दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। सूचना तक त्वरित पहुंच, वैश्विक दृष्टिकोण और तकनीक के सहज उपयोग ने इस पीढ़ी की पहचान निर्मित की है।

2013 के बाद जन्मे बच्चों को जेन अल्फ़ा कहा जाता है। यह पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्मार्ट उपकरणों, आभासी दुनिया और स्वचालित प्रणालियों के बीच बड़ी हो रही है।

इसके बाद 2025 से जन्म लेने वाले बच्चों के लिए जेन बीटा शब्द प्रचलन में आ रहा है, जिनके जीवन में एआई, रोबोटिक्स और स्मार्ट परिवेश और भी गहराई से समाहित होंगे।

 

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन पीढ़ियों की समय सीमाओं में विभिन्न शोध संस्थानों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए इन्हें कठोर मानक नहीं, बल्कि सामाजिक अध्ययन के उपयोगी संकेतक मात्र माना जाता है।

 

आज जेन जी या जेन अल्फ़ा जैसे शब्द केवल फैशनेबल संबोधन नहीं हैं। ये उस युग की पहचान हैं जिसमें कोई पीढ़ी पली बढ़ी, उसने तकनीक को किस रूप में अपनाया और समाज को किस दिशा में प्रभावित किया। वस्तुतः पीढ़ियों के ये संक्षिप्त नाम बदलते समय का सामाजिक इतिहास हैं, जो मनुष्य और तकनीक के विकसित होते संबंधों की कहानी भी कहते हैं।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

☆ आलेख – संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

 संवेदना मानवीय गुण है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की भावनाओं,पीड़ा, खुशी व परिस्थितियों को समझकर उनके प्रति करुणा, सहानुभूति और सहयोग का भाव रखता है। संवेदनशील व्यक्ति केवल परिस्थिति को जानता ही नहीं, महसूस भी करता है। उसके अंदर दूसरे के नजरिए से सोच पाने की समझ होती है, दु:ख को देखकर उसके मन में करुणा का भाव उत्पन्न होता है, सहयोग के लिए आगे आता है और समाज व प्रकृति के प्रति सजग रहकर अपनी जिम्मेदारी समझता है। समाज का निर्माण भावनाओं, संवेदनाओं और परस्पर  विश्वास के आधार पर होता है। यदि संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान रह जाए और उसमें उसमें संवेदना, करुणा, सहानुभूति तथा सम्मान का अभाव हो जाए तो समाज में दूरियाँ, अविश्वास और संघर्ष बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब संवाद में मानवीय संवेदनाएँ जुड़ जातीं हैं तब वह बिखरे, विभाजित समाज को एकसूत्र में पिरोने का साधन बन जाता है। संवाद व्यक्ति को विरोधी नहीं बल्कि सहयात्री मानता है। इसमें मतभेद हो सकते हैं किन्तु मनभेद नहीं होना चाहिए। जब संवाद में सहानुभूति, धैर्य, सम्मान और करुणा का समावेश होता है तब वह संवेदनात्मक संवाद कहलाता है। सक्रिय एवं धैर्यपूर्ण श्रवण, भिन्न मतों का सम्मान, पूर्वाग्रहों से मुक्त दृष्टिकोण, भाषा में संयम व शिष्टता, समाधान केन्द्रित सोच, मानवीय गरिमा का संरक्षण, विश्वास निर्माण की प्रक्रिया आदि संवाद की प्रमुख विशेषताएँ होती हैं।

भारतीय संस्कृति में संवाद केवल सूचना का माध्यम नहीं, सत्य की खोज का साधन माना गया है। उपनिषदों में गुरू और शिष्य के बीच संवाद की परम्परा ज्ञान का आधार रही। गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के मध्य संवेदनात्मक संवाद अनुपम उदाहरण है। विषादग्रस्त अर्जुन को श्रीकृष्ण युद्धभूमि में आदेश नहीं देते अपितु उसके मनोभावों को समझकर संशयों का समाधान करते हैं। रामायण में श्रीराम निषादराज, शबरी, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान आदि से उनकी गरिमा के अनुरूप संवाद करते हैं। बौद्ध और जैन परम्परा में भी करुणा, अहिंसा और संवाद को परिवर्तन का आधार माना गया है। महात्मा गाँधी का सार्वजनिक जीवन संवाद की शक्ति पर ही आधारित था। उन्होंने विरोधियों से कभी संवाद बन्द नहीं किया। उनका कथन था कि– असहमति शत्रुता का कारण नहीं होनी चाहिए। प्रेमचंद की कहानियाँ सामाजिक विषमता को उजागर करते हुए करुणा और न्याय का संदेश देतीं हैं। कबीरदास की वाणी धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मानवीय एकता का आह्वान करती है– ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।। इसके अतिरिक्त वसुधैव कुटुम्बकम् तथा सर्वे भवन्तु सुखिन: जैसे भारतीय आदर्श संवेदनात्मक संवाद की वैश्विक भावना को अभिव्यक्त करते हैं।

समकालीन समाज आज अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है। आज लोग वैचारिक ध्रुवीकरण के आधार पर समूहों में बँटते जा रहे हैं। मतभेद को शत्रुता समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आर्थिक विषमता, शिक्षा में असंतुलन और अवसरों की असमान उपलब्धता सामाजिक दूरी का कारण बन रही है। छोटी-छोटी घटनाएँ भी बड़े सामाजिक तनाव का कारण बन जातीं हैं क्योंकि संवाद के स्थान पर अविश्वास बढ़ जाता है। सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रिया, अपमानजनक टिप्पणियाँ तनाव उत्पन्न करतीं हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन और व्यस्त जीवन-शैली ने आत्मीय संवाद के अवसर कम कर दिए हैं। इन मुश्किल हालातों में संवेदनात्मक संवाद अविश्वास को विश्वास में बदलता है, हिंसा के स्थान पर समझ विकसित करता है, समाज में सहिष्णुता बढ़ाता है, विविधता में एकता की भावना को मजबूत करता है, लोकतांत्रिक संस्कृति को सशक्त बनाता है, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव को कम करता है तथा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को गति देता है।

सारत: कह सकते हैं कि संवेदनात्मक संवाद सामाजिक स्थिरता, लोकतांत्रिक परिपक्वता, राष्ट्रीय एकता व विभाजित समाज को जोड़ने की एक सुन्दर सशक्त पहल है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है परन्तु मनभेद समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। अत: आवश्यक है कि हम अपने भीतर सहनशीलता, धैर्य और परस्पर समझ को बढ़ाएँ! किसी को सुधारने का प्रयास प्रेम और श्रद्धा से करें! केवल निंदा या उपेक्षा से कोई सुधार नहीं होता। जहाँ प्रेम और संवेदनात्मक संवाद जीवित रहता है, वहाँ विश्वास जन्म लेता है और जहाँ विश्वास होता है वहाँ समाज विभाजन से ऊपर उठकर समरसता और प्रगति की ओर अग्रसर होता है।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “फ़रियाद-ए-क़लम……” ☆ श्री आशिष मुळे ☆

श्री आशिष मुळे

☆ कविता ☆

☆ “फ़रियाद-ए-क़लम…☆ श्री आशिष मुळे ☆

क़लम आज शर्मिंदा है,

हालात इतने बेहूदा हैं।

फूल कभी खिल ही न पाए,

धूप यहाँ कुछ ज़्यादा है।

 *

उम्मीद लगाई थी छाँव की,

समझे थे कि वह पेड़ है।

एक बार क़रीब से देखा तो,

वह बस सूखी-सी लकड़ी है।

 *

जिनको फलने की थी सहूलत,

अफ़सोस, उन्होंने नफ़रत बोई है।

ऐसी है कुछ हालत-ए-गुलिस्ताँ —

गुलों में अब रंग नहीं है।

© श्री आशिष मुळे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५८ ⇒ नाम की महिमा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नाम की महिमा।)

?अभी अभी # १०५८ ⇒ आलेख – नाम की महिमा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संज्ञा हो या सर्वनाम, हमारा नाम के बिना काम नहीं चलता। नाम में ही ईश्वर का वास है, नाम में ही भगवान भी हैं और नारायण भी, फिर भी हमें हमारे मनमंदिर के राम के दर्शन नहीं होते।

बचपन से ही मैं राम के करीब भी रहा हूं, और ईश्वर के करीब भी ! नारायण तो मेरा पक्का दोस्त था, कल के भगवान को हम आज भगवान भाई कहकर पुकारते हैं, बड़े अच्छे मिलनसार व्यक्ति हैं।।

अपने इष्ट और आराध्य को हम जिस भी नाम से स्मरण करते हैं, पुकारते हैं और भजते हैं, वे सभी तो शरीर रूप में हमारे आसपास मौजूद हैं, लेकिन इस नश्वर जीव पर माया का ऐसा पर्दा पड़ा है, कि वह सिर्फ नाम में ही नहीं, रूप और स्वरूप में भी उलझा है। मंदिर में विराजमान मर्यादा पुरुषोत्तम राम अलग है और मेरा मित्र राम अलग। दोनों की आपस में कोई तुलना नहीं हो सकती।

ईश्वर, परमेश्वर, भगवान अथवा अपने इष्ट को हम जानते, पहचानते और मानते हैं, उनकी जप, पूजा, आराधना, प्रार्थना और सेवा सुश्रुषा करने में जो भक्ति भाव और परमानंद की अनुभूति होती है, वह किसी परिचित गिरीश और जगदीश से मिलने अथवा स्मरण मात्र से संभव नहीं। कहां राजा भोज…?

आदर्श अलग होता है और वास्तविकता और हकीकत उससे बहुत अलग होती है। गरीबों, दीन हीन की सेवा ही ईश्वर की सेवा है, माता पिता के चरणों में स्वर्ग है और गौ माता की तो बस पूछिए ही मत। फिर भी मंदिर मंदिर है और गुरुद्वारा गुरुद्वारा। अयोध्या के राम ही वास्तविक राम हैं और मथुरा द्वारका के कृष्ण ही तो कृष्ण कन्हैया हैं।

क्या सिर्फ नाम लेने, स्मरण करने अथवा अपने इष्ट को भजने से ही जीव का कल्याण हो सकता है। कहने को तो कहा भी गया है, कलियुग नाम आधारा! और शायद इसीलिए किसी अपने मित्र नारायण को पुकारते पुकारते आपको भी साक्षात नारायण के दर्शन हो जाएं।।

हमारे आसपास कितने स्त्री पुरुष के ऐसे नाम मंडरा रहे हैं, जिनके नाम मात्र से ही किसी देवी देवता का स्मरण हो आता है। सीता, सरस्वती, मंगला, गायत्री और लक्ष्मी जैसे नाम पहले रखे ही जाते थे, आज भी रखे जाते हैं, बस उनकी दशा मत पूछिए, क्योंकि आज सरस्वती काम पर नहीं आने वाली, बेचारी बीमार है।

यह इंसान बहुत चतुर और चालाक है। वह एक तीर से दो शिकार करना चाहता है, रमेश, दिनेश, सुरेश, महेश, अविनाश, अरविंद और कई शैलेष उसके परिचित स्नेही, मित्र, रिश्तेदार और करीबी हैं, आम के आम और गुठलियों के दाम, यानी उनके नाम के बहाने अपने इष्ट का भी नाम लेने में आ जाएगा और पहचान के लिए उनके नाम के आगे वर्मा, सक्सेना, अवस्थी और श्रीवास्तव सुशोभित हो जाएगा।।

नाम से ही हमारी पहचान है, प्रसिद्धि है। एक राम नाम ही तो हमारे सभी बिगाड़े काम बनाता है।

कहीं खाटू श्याम तो कहीं सांवरिया सेठ, किसी के महाकाल तो किसी के ओंकार। पुणे में अगर दगड़ू सेठ के गणपति की महिमा है तो पूरे महाराष्ट्र में अष्ट विनायक विराजमान हैं। एक और मेरा परम मित्र गणेश मुझे नैनीताल बुला रहा है, तो दूसरी ओर अभिन्न हृदय नारायण जी का प्रयाग राज का आग्रहपूर्ण आमंत्रण लंबित है।

नाम में ही रस और रूप है। महाराष्ट्र के संत गोंदवलेकर महाराज ने नाम के माहात्म्य पर एक पुस्तक लिखी है, प्रवचन पारिजात, जिसमें नाम की महिमा पर उनके ३६५ प्रवचन संकलित हैं। १ जनवरी से ३१ जनवरी तक। रोज एक पृष्ठ पढ़िए, नाम में खो जाइए। राम तेरे कितने नाम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०५ ☆ बाल गीत – लप्पा – लोरी गाए राम… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०५ ☆ 

☆ बाल गीत – लप्पा – लोरी गाए राम ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

लप्पा – लोरी गाए राम।

मंद – मंद मुस्काए राम।।

कभी पकड़ अंगुली इतराएँ।

तनिक प्रेमरस वह बरषाएँ।।

हमको मन – मन भाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

कभी गाल पर करें गुदगुदी।

थोड़े नटखट बढ़े धुकधुकी।।

अपनेपन में नहाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

पकड़ – पकड़ दादा की टोपी।

बंसी धुन पर नाचें गोपी।।

निप्पल चूसें भाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

ठुमक – ठुमक वह घुटअन चलते।

घुँघरू , छल्ला टुन – टुन बजते।

मंत्र सुनें मुस्काए राम।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पावसात भिजायचं…” ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “पावसात भिजायचं” ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

पावसात भिजायचं

मातीत रुजायचं

आभाळी भिडायचं

*

स्वप्न पहायचं

पावसात भिजायचं

थंडीत थिजायचं

मनात पहायचं

*

कवितेत हसायचं

पावसात भिजायचं

स्मृतीत रमायचं

गेलेल्या दिसांचं

*

चित्र स्मरायचं

पावसात भिजजायचं

आजारी पडायचं

देणं डाॕक्टरचं

*

देऊन टाकायचं

पावसात भिजायचं

घरात शिरायचं

भजी अन् चहाचं

जमवून आणायचं

© श्री सुनील देशपांडे

मो – 9657709640

email : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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