(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “कायनात के कायदे”।)
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ?” पर चर्चा।
☆ कविता ☆ क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ?☆ श्री मनजीत सिंह ☆
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जानते हो
मेरा जुर्म क्या था…?
मेरी खामोशियों में,
मेरी मुस्कुराहटों में, मेरी तन्हाइयों में,
मेरी जागी हुई रातों में,
मेरी अधूरी बातों में
वह हर बार तुम्हें ढूँढ़ लिया करता था…
मेरी हर दुआ में तुम्हारा नाम था,
मेरी हर खामोश नज़र में तुम्हारी ही तस्वीर बसती थी।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सच का सपना…“।)
अभी अभी # ९६३ ⇒ आलेख – सच का सपना श्री प्रदीप शर्मा
कल सपने में मैंने सच को देखा ! या यह कहूं मैंने सच के दीदार किये, दर्शन किये। मैंने कभी खुली आंखों से सच का साक्षात्कार नहीं किया, जब भी आंख बंद की, कभी सच नजर नहीं आया और अचानक आज सपने में सच को सामने देखकर मुझे भरोसा नहीं हुआ कि मैं सच का सामना कर रहा हूं, दर्शन कर रहा हूं। हां, इतना अहसास ज़रूर था, कि मैं सपना देख रहा हूं।
आप भी सोचेंगे, जब सपना सिर्फ सपना ही होता है, कभी सच नहीं होता, तो सच सपने में क्यों और कैसे आ सकता है। लेकिन सत्य तो ईश्वर है, वह जब कहीं भी आ जा सकता है, तो मेरे सपने में भी सच बनकर आ सकता है। भले ही मैं उसे पहचान न पाऊं।।
आप सपने में आंख खोलकर नहीं देख सकते। सपने बंद आंखों से ही देखे जाते हैं। हां, सपनों को सच करने के लिए आंखें ज़रूर खोलनी पड़ती है, जागना पड़ता है, विवेकानंद बनना पड़ता है ;
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
मेरे सामने सपने में सच था। मैने उसे देखने की कोशिश की। वह न तो नंगा था, न उसने फटी जींस पहन रखी थी, और ना ही वह अन्य किसी लिबास में था। स्वप्न में आप बड़े असहाय होते हैं। अवचेतन में बुद्धि और विवेक ताक में धरा रह जाता है, ठीक वैसे ही, जैसे बड़े बड़े मंदिरों में, प्रवेश के पूर्व, पर्स, कैमरा और मोबाइल तक लॉकर में रख लिया जाता है।।
जब बहुत देर तक सामने कुछ नज़र नहीं आया, तो मुझे सच पर शंका होने लगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि सच वच कुछ नहीं, एक धोखा है, फरेब है, दिखावा है। काहे का शिव और सुंदर। क्या सपने में भी बोध होता है ! शायद सच मुझसे मुखातिब था, लेकिन सामने नहीं आ रहा था। लेकिन हां मैं उसे सुन रहा था। वह कह रहा था सच एक अहसास है जो हमेशा अपनी आत्मा के आसपास है। अंतरात्मा का सच से संबंध है।
हम जब भी खुद से दूर होते हैं, सच से दूर होते चले जाते हैं। अपने करीब रहना ही सच के करीब रहना है। अपने आप से दूर जाना सच से पीछा छुड़ाना है, झूठ के पीछे भागना है। सत्य में प्रकाश है, झूठ अंधकार है। सांच को आंच नहीं। मतलब क्या आत्मा की तरह सच को भी किसी अस्त्र अथवा शस्त्र से पराजित नहीं किया जा सकता।।
मैने देखा, अचानक सच कहीं गायब हो गया था और सपने में मैं सच से नहीं, अपने आप से ही बातें कर रहा था। मेरा अब भी यही मानना है, सपना कभी सच नहीं होता। सच कभी सपना नहीं होता। सच हकीक़त होता है, मीठा, कड़वा आपके अनुभव के आधार पर होता है। इतने लोग दुनिया में एक दूसरे को मज़ा चखाते हैं, कभी सच को भी चख लें, लोगों को भी सच का स्वाद चखाएं। वाकई, मज़ा आ जाएगा ..!!!
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (6 अप्रैल से 12 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। कलयुग के पराक्रमी देवता श्री हनुमान जी के चरणों में शत-शत नमन के साथ आज की चौपाई है :-
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा,
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥
हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से राजकीय मान सम्मान प्राप्त होता है। हनुमत कृपा पर विश्वास आपको चतुर्दिक सफलता दिलाएगा।
“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में हनुमान चालीसा की चौपाइयों के संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
अब हम इस सप्ताह के ग्रहों के विचरण के बारे में चर्चा करेंगे।
इस सप्ताह सूर्य, शनि और मंगल मीन राशि में, वक्री राहु कुंभ राशि में, गुरु मिथुन राशि में और शुक्र मेष राशि में गोचर करेंगे। बुध प्रारंभ में कुंभ राशि में रहेंगे तथा 10 तारीख के 2:14 रात से मीन राशि में प्रवेश कर जाएंगे। आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपका व्यापार ठीक चलेगा। धन आने की पूरी उम्मीद है। गलत रास्ते से भी धन आएगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में मधुरता कम हो सकती है। कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है परंतु इसके लिए आपको अत्यंत सावधानी लेनी होगी। अपने वकील से भी आपको सावधान रहना पड़ेगा। आप अपने शत्रुओं को मामूली से प्रयासों से से परास्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए, 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित है। 6 और 7 तारीख को आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गरीबों के बीच में चावल का दान दें तथा शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को चावल या सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। धन की वृद्धि होगी। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह ठीक रहेगा। जीवनसाथी के साथ स्वास्थ्य में 6 और 7 तारीख को थोड़ी समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपकी कुंडली के गोचर में शत्रुहंता योग बन रहा है। इसके कारण आपके शत्रु कम या समाप्त हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख थोड़ा ठीक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मिथुन राशि
कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह का उत्तम रहेगा। उनका प्रमोशन अगर ड्यू है तो वह भी हो सकता है। सीमित मात्रा में धन आने का योग है। भाग्य से आपको सामान्य मदद मिलेगी। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके पेट में थोड़ी परेशानी हो सकती है।, आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहने की उम्मीद है। आपके ब्लड प्रेशर और डायबिटीज में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। छात्रों के लिए यह सप्ताह मिला-जुला प्रभाव लेकर आएगा। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख के दोपहर तक का समय किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक करने के लिए उपयुक्त है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी से कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। आपके जो भी कार्य सिर्फ भाग्य की वजह से अटक जाते हैं उनको इस सप्ताह करने का कष्ट करें। वे सभी कार्य हो जाएंगे। इस सप्ताह आपके खर्चे में वृद्धि होगी। पेट में छोटी-मोटी तकलीफ हो सकती है। ड्राइविंग के समय सावधान रहें। अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख किसी भी कार्य को करने के लिए सफलता दायक है। 8, 9 और 10 तारीख को आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को संपन्न करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह ठीक चलेगा। मामूली धन आने की उम्मीद है। भाई बहनों के साथ तनाव हो सकता है। भाग्य से ज्यादा आपको अपने पुरुषार्थ पर यकीन करना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहकर के कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। इस सप्ताह आपके लिए 6 और 7 तारीख सभी प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। 10, 11 और 12 को आपको अपने कार्यों को पूरी सावधानी के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए बहुत अच्छा है। आपके लिए यह सप्ताह मिश्रित फल दायक है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों के लिए सप्ताह लाभ देने वाला है। विद्यार्थियों को इस सप्ताह में कोई विशेष लाभ नहीं हो पाएगा। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपको सावधानी के साथ व्यवहार करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए लाभ फलदायक हैं। 6 और 7 अप्रैल को आपके भाई बहनों को कुछ लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। भाग्य से आपको इस सप्ताह कम मदद मिलेगी। आपको अपने कर्मों पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। आपको अपने संतान से इस सप्ताह मामूली सहयोग मिल सकता है। विद्यार्थियों की पढ़ाई भी सामान्य ही रहेगी अर्थात पहले से काफी कम हो जाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार से परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए की शिव पंचाक्षरी स्त्रोत का प्रतिदिन पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
वृश्चिक राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए काफी अच्छा रहेगा। अगर उनका प्रमोशन ड्यू है तो प्रमोशन भी हो सकता है। परीक्षा में उनको सफलता प्राप्त होगी। धन प्राप्त होने की आशा है। जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। दुर्घटनाओं से आपको सचेत रहना चाहिए। आपके पेट में कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको 6 और 7 तारीख को अपने स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रूप से अच्छा है। यात्रा का योग बन सकता है। विद्यार्थियों की पढ़ाई साधारण रूप से चलेगी। आपके जीवन साथी के पेट में कुछ तकलीफ हो सकती है। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है अर्थात ना अच्छा है और ना बुरा। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख लाभप्रद है। 6 और 7 तारीख को आपको कचहरी के कार्यों में सावधानी से कार्य करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए उत्तम है। भाई बहनों से आपके संबंध भी अच्छे रहेंगे। उनका समर्थन भी आपको प्राप्त होगा। धन आने का योग है। भाग्य से आपको मदद कम मात्रा में मिलेगी। आपके कर्म आपकी पूरी मदद करेंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनको चाहिए कि वे व्यर्थ का वाद विवाद न करें। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख सभी प्रकार के कार्यों के लिए शुभ है। 8, 9 और 10 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। 6 और 7 तारीख को आपको धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग है। आपके थोड़े थोड़े से प्रयास से ही आपके पास अधिक मात्रा में धन आ सकता है। धन प्राप्त करने की सभी योजनाओं पर आपको इस सप्ताह कार्य करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। संतान से आपको इस सप्ताह कम सहयोग प्राप्त होगा। दुर्घटनाओं के प्रति आपको इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य के स्थान पर आपको अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। आप जितना कर्म करेंगे उतना ही आपको फल प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए आपको 6, 7 तथा 11 और 12 अप्रैल को सावधान रहकर कार्यों को करने की आवश्यकता है। 8, 9 और 10 तारीख थोड़ा ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें। और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मीन राशि
यह सप्ताह आपके लिए अधिकांश रूप से ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। लोगों पर आप विजय प्राप्त कर सकते हैं। धन प्राप्त होने का सामान्य योग है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में भी आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। किसी प्रकार का कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। दुर्घटनाओं के प्रति भी आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख कार्यों को करने हेतु अनुकूल हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चिड़ियों को दाना दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
“श्रद्धा” आणि “विश्वास” हे शब्द रोजच्या बोलण्यात अनेकदा परस्परांना पूरक म्हणून वापरले जातात; परंतु त्यांच्या आशयात मूलभूत फरक आहे. भाषाशास्त्रीय आणि तत्त्वज्ञानाच्या दृष्टीने पाहिले तर “विश्वास” हा प्रामुख्याने अनुभव, पुरावा, तर्क आणि पुनर्परीक्षण यांवर आधारलेला असतो; तर “श्रद्धा” ही भावनिक, सांस्कृतिक किंवा धार्मिक संदर्भातून निर्माण झालेली अंतर्मनाची बांधिलकी असते. विश्वास हा एखाद्या विधानाबद्दलचा स्वीकार असतो, जो उपलब्ध माहितीवर उभा असतो. उदाहरणार्थ, सूर्य पूर्वेकडूनच उगवतो हा विश्वास आपण पूर्वानुभव आणि वैज्ञानिक स्पष्टीकरणांवरून ठेवतो. परंतु एखाद्या देवतेवर, गुरुवर किंवा ग्रंथावर असलेली निष्ठा (येथे बरेचदा लोक विश्वास हा शब्द वापरतात) ही बहुधा श्रद्धेच्या चौकटीत येते; ती अनुभवापेक्षा परंपरेवर आणि भावनिक नात्यावर अधिक आधारित असते.
विश्वासाचा सर्वात महत्त्वाचा गुण म्हणजे त्याची परिवर्तनीयता. एखादी गोष्ट खरी आहे असे आपण मानतो; परंतु नवे पुरावे, संशोधन किंवा अनुभव आपल्याला दाखवतात की ती गोष्ट चुकीची आहे, तर आपला विश्वास बदलतो. विज्ञानाचा संपूर्ण प्रवास याच तत्वावर उभा आहे. विज्ञानात कोणताही सिद्धांत अंतिम नसतो; तो नव्या प्रयोगांनी, नव्या माहितीने तपासला जातो. म्हणूनच विश्वास हा परिवर्तनीय असतो… तो वाढतो, बदलतो, कधी मोडतो, तर कधी अधिक बळकट होतो. ज्यावर आपला विश्वास आहे त्याला प्रश्न विचारणे हा त्याचा अपमान नसतो; उलट ती त्याची शक्ती असते. कारण प्रश्नांच्या कसोटीवर टिकणारा विश्वासच खरा ठरतो.
याच्या उलट श्रद्धेचे स्वरूप बहुतेकदा अपरिवर्तनीय असते. अनेक धर्मसंस्थांमध्ये किंवा परंपरांमध्ये श्रद्धेची चिकित्सा करणे म्हणजे पाप किंवा अवमान मानला जातो. परिणामी श्रद्धेला प्रश्न विचारण्याची मुभा नसते. ती तपासली जाऊ नये, बदलली जाऊ नये, अशी मानसिक चौकट तयार केली जाते. अशा वातावरणात श्रद्धा ही स्थिर, अपरिवर्तनीय आणि अंध स्वरूप धारण करते. श्रद्धेचा पाया भावनिक असतो; म्हणून ती तर्काच्या कसोटीवर टिकली नाही तरी टिकवून धरली जाते. एखादी गोष्ट चुकीची आहे हे कळूनही “माझी श्रद्धा आहे” या कारणाने ती सोडली जात नाही. म्हणूनच विश्वास आणि श्रद्धा यांतील मुख्य भेद म्हणजे बदल स्वीकारण्याची तयारी आहे की नाही हा आहे. विश्वास हा सत्याच्या शोधात असतो. तो सत्य सापडल्यावर आपले रूप बदलतो. श्रद्धा मात्र सत्यापेक्षा स्थैर्याला महत्त्व देते. विश्वास म्हणतो, “मला पटते, पण जर चुकीचे ठरले तर मी बदलेन. ” श्रद्धा म्हणते, “मला पटते, आणि तेच अंतिम आहे. ” या दोन भूमिकांतील फरक लक्षात घेतला तर समाजातील अनेक वादांची मुळे स्पष्ट होतात.
याचा अर्थ श्रद्धा नेहमीच नकारात्मक असते असे नाही. ती व्यक्तीला मानसिक आधार, प्रेरणा आणि धैर्य देऊ शकते. पण जेव्हा श्रद्धेला प्रश्नांपासून दूर ठेवले जाते, तेव्हा ती विचारस्वातंत्र्यावर मर्यादा आणते. म्हणूनच मी असे नेहमी म्हणतो की, ज्या श्रद्धा चिकित्सेला नकार देतात त्या सगळ्या अंधश्रद्धाच असतात. सर्वसाधारणपणे प्रत्येक वेळेला असे निदर्शनास आलेले आहे की, कोणत्याही धर्मातील श्रद्धा ही चिकित्सेला नकारच देत असते म्हणून प्रत्येक श्रद्धा ही अंधश्रद्धाच असते. विश्वास मात्र व्यक्तीला संशय, शोध आणि आत्मपरीक्षणाची सवय लावतो. म्हणूनच विचारशील समाज घडवायचा असेल, तर विश्वासाच्या परिवर्तनीय स्वभावाला मान्यता देणे आणि श्रद्धेलाही प्रश्नांच्या प्रकाशात पाहण्याची तयारी ठेवणे आवश्यक आहे. श्रद्धा आणि विश्वास यांचा हा सूक्ष्म पण मूलभूत फरक ओळखला, तर वैचारिक प्रगल्भतेकडे एक मोठे पाऊल टाकता येईल.
☆ आजोबांच्या व्रताचा वसा… इंग्रजी लेखक : अज्ञात ☆ मराठी अनुवाद : श्री मकरंद पिंपुटकर☆
तीन महिन्यांपूर्वी, कॉलेजात जाणाऱ्या माझ्या मुलाने आमच्या स्कूटरचा अपघात केला. चूक त्याचीच होती — स्कूटर चालवताना हा दीडशहाणा मोबाईल बघत होता. नशीब चांगलं की त्याला फारसं लागलं नाही आणि त्याच्या स्कूटरमुळे दुसऱ्या कोणाला काही झालं नाही. पण स्कूटरचा पार सत्यानाश झाला होता.
मेकॅनिकने दुरुस्तीचा खर्च भरमसाट सांगितला होता – ११, ००० रुपये. गाडी जुनी असल्याने गाडीच्या विम्याचे काही फारसे पैसे मिळणार नव्हते, आणि स्कूटरची गरज तर आम्हाला खूप होती.
करोनामध्ये नवऱ्याची नोकरी गेली होती, मोठ्या मिनतवाऱ्या करून एका इमारतीत रखवालदाराची नोकरी मिळाली होती – दहा हजार मिळायचे, पण दरमहा त्यातले हजार रुपये नोकरी लावणाऱ्या मध्यस्थाला द्यावे लागायचे. मला एका ठिकाणी पार्ट टाईम नोकरी होती, उरलेल्या वेळात मी डबे करायचे, तेच पोचवण्यासाठी स्कूटर लागायची.
त्या गॅरेजमधल्या एकाने माझ्या चेहऱ्यावरचे भाव पाहिले, आजूबाजूला कोणी नाही बघून त्याने हळूच मला एका दुसऱ्या गॅरेजबद्दल सांगितलं, “एक म्हातारा कारागीर आहे तिथं. जुगाड करतो, कमी किंमतीत काम होईल तुमचं. बघा तुम्हाला चालतंय का ते. “
स्कूटर कशीबशी चालवत मी त्या पत्त्यावर पोचले. एखाद्या भंगारखान्यासारखं दिसत होतं ते गॅरेज. सगळीकडे गंजलेल्या, तुटक्या फुटक्या स्कूटर्स, मोटार सायकली होत्या. रंग उडालेला, पोपडे निघणारा गॅरेजच्या नावाचा फलक कसाबसा लटकलेला होता. मी गाडी मागे घेऊन परतच जाणार होते.
तेवढ्यात गॅरेजमधून एक वृद्ध माणूस बाहेर आला. त्याचे वय पंचाहत्तर असावे, कदाचित त्याहूनही जास्त. ग्रीस लागलेले कपडे. हात थोडे थरथरत होते.
“स्कूटरला काय झालं मुली? ” त्याने विचारले.
मी त्यांना परिस्थिती समजावून सांगितली. त्या आजोबांनी गाडीकडे पाहिले, ते काहीतरी पुटपुटले आणि गॅरेजमध्ये गेले. काही मिनिटांनी एका कागदावर कसलासा हिशेब घेऊन ते परत आले, “मी ३, ००० रुपयांमध्ये दुरुस्त करून देतो. “
माझा विश्वास बसेना, ” अहो, पण सर्व्हिसिंग सेंटरवाले तर… “
“ते नवीन सुटे भाग आणि महागडा रंग वापरतात, इंग्लिशमध्ये यस फ्यस करतात, ” आजोबा म्हणाले, “मी नवेकोरे पार्ट्स नसेन वापरत, पण चांगले असले तरच वापरतो. गाडी १००% सुरक्षित असण्याची गॅरंटी माझी. ३, ००० रुपये. “
हे बिल नक्कीच कमी होतं, पण माझ्याकडे तेवढेही पैसे नव्हते. “आणि… मी पैसे कधी देऊ? “
“तुम्ही आता १, ००० रुपये देऊ शकाल का? बाकीचे जसे जमतील तसे द्या. काही घाई नाही. “
मी तिथेच उभी राहिले. “तुम्ही माझ्यावर विश्वास का ठेवत आहात? “
त्यांनी आयुष्य अनुभवलेल्या डोळ्यांनी माझ्याकडे पाहिले. “करोनाने माझा तरुण मुलगा माझ्यापासून हिरावून नेला. बायको आधीच वारली होती. लेक लग्न होऊन दुसऱ्या शहरी गेलेली. मी एकटा पडलो. मी सैरभैर झालो होतो. तेव्हा एकाने मला मदत केली, औषधं, जेवणखाण, पैसे – हर तऱ्हेने मदत केली. तो दर दिवसाआड मला भेटायला यायचा.
मुलाच्या जाण्याच्या दुःखातून बाहेर यायला मला तीन चार महिने लागले. त्या भल्या माणसाने माझ्याकडून एक रुपयासुद्धा घेतला नाही. “कोण्या गरजवंताला मदत कर, ” तो मला म्हणाला. मी काही फार पैसा बाळगून नाही, बजाजमध्ये नोकरी करून निवृत्त झालो होतो. कोणाला नगद पैसे देता येणार नाहीत मला, पण दुचाकी दुरुस्त करता येतात मला. मग तेव्हापासून हेच काम पुन्हा करू लागलो, ” आजोबा सांगत होते.
दोन दिवसांत त्यांनी माझी स्कूटर दुरुस्त केली, एकदम ठणठणीत. मुलाला घेऊन मी स्कूटर आणायला गेले होते, आजोबांनी खोटंच दटावत माझ्या लेकाचा कान धरला, “पोरा, अपघातात स्कूटरचं काही नुकसान झालं, तर मी दुरुस्त करायचा प्रयत्न करेन, पण तुला काही दुखापत झाली, तर तुझ्या आईकडे कोण बघणार? “
जसं जमेल, जेव्हा जमेल तेव्हा दर दहा पंधरा दिवसांनी मी २०० – ५०० रुपये घेऊन त्यांच्याकडे जायचे. दर वेळी कोणीतरी आपली बिघडलेली दुचाकी आणि विस्कटलेलं आयुष्य घेऊन त्यांच्याकडे आलेलं असायचं, कोणाचं पेन्शन अजून जमा झालेलं नसायचं, कोणाला कामावरून कमी केलेलं असायचं, कोणी परराज्यातून आलेला असायचा – पार मोडकळीला आलेल्या जुन्यापुराण्या गाड्या – आजोबा सगळ्यांना उभारी द्यायचे, नवा आशावाद द्यायचे, उभारी द्यायचे – आणि हे सगळं कमी किंमतीत, सुलभ हप्त्यावर, किंवा अनेकदा फुकट.
जेव्हा मी माझं शेवटचं पेमेंट करत होते, तेव्हा न राहवून, मी त्यांना विचारलं, “हे चॅरिटी वगैरे सगळं ठीक आहे, पण तुमच्या पोटापाण्याचं काय? “
“काही जण एकरकमी सगळे पैसे देतात, त्यावर थोडाफार गुजारा होतो. बरेच जण पैसे देऊ शकत नाहीत, त्यामुळे माझी अजून गरज आहे हे जाणवत रहातं. “
मध्ये बराच काळ लोटला, आज आत्ता डबे द्यायला गेलेला मुलगा सांगत आला, तो आजोबांच्या गॅरेजच्या बाजूला गेला होता, तर आजोबा दिसले नाहीत, आणि गॅरेजवर “for sale” असा बोर्ड लागला होता.
मी चरकले, मोबाईलमधला त्यांचा नंबर हुडकला आणि फोन केला, फोन त्यांच्या मुलीने उचलला. “बाबा आजारी आहेत, वय झालं त्यांचं. आता घरी आले आहेत हॉस्पिटलमधून. प्रकृती जरा आणखी सुधारली की मी त्यांना माझ्या सासरी घेऊन जाईन. म्हणून गॅरेज विकायला काढलं आहे. ”
मी त्यांना भेटायला त्यांच्या घरी गेले. ते झोपले होते, अंगात ताकद नव्हती अजिबात.
“मी त्यांचे हिशेब पहात होते. बँकेत फक्त १८, ००० रुपये आहेत त्यांच्या. त्यांची जमाखर्चाची वही पाहिली. ७२ जणांकडून पैसे यायचे बाकी आहेत – सगळे मिळून पाच लाखांच्यावर येणं बाकी आहे, पण बाबांनी त्या उधारीसमोर नोंद केली आहे – उधार माफ केली आहे, माझ्या पैशांच्या गरजेपेक्षा ही स्कूटर त्यांना मिळणं जास्त गरजेचं आणि महत्त्वाचं होतं. “
मी त्या सगळ्यांची नावं आणि फोन नंबर घेतले आणि सगळ्यांना निरोप दिले.
दोन दिवसांनी आजोबांच्या मुलीचा फोन आला, आजोबा वारले होते.
आम्ही सगळे अंत्यसंस्काराला गेलो होतो, उधार बाकी असलेले तर आले होतेच, पण बाकीचेही अनेक जण – आम्हा सगळ्यांना आजोबांनी वेळोवेळी मदत केलेली होती.
आम्ही सगळ्यांनी आम्हाला जेवढे शक्य होतील तेवढे पैसे गोळा केले होते, आजोबांचे उधार तर पूर्ण झालेच, थोडे आणखी पैसेही जमा झाले होते. आम्ही ते सगळे पैसे त्यांच्या मुलीला दिले.
नंतर, माझ्या मुलाने मला विचारले, “आई, तू का रडत आहेस? तू त्यांना फारसं ओळखतही नव्हतीस. ”
“कारण, ” मी त्याला म्हणाले, “त्या माणसाने मला एक अशी गोष्ट शिकवली, जी माझ्या – तुझ्या पिढीने शिकायला हवी. दररोज, आपण लोकांना पाहतो. त्यांच्या अडचणी पाहतो, त्यांच्या बिघडलेल्या गाड्या, त्यांचे रिकामे खिसे, आणि त्याहीपेक्षा महत्त्वाचे म्हणजे त्यांची बिनसलेली मनं. आता तुला ठरवायचं आहे – यांना तू मदत करणारा होणार आहेस का त्यांच्या अडचणींकडे दुर्लक्ष करणारा? ”
मला काय म्हणायचं आहे हे माझ्या मुलाला समजले. गेल्या महिन्यापासून, तो एका अनाथाश्रमात जाऊ लागला आहे – तिथल्या मुलांना तो शिकवतो. त्याबद्दल बडेजाव करत नाही, पण नियमितपणे जातो.
आजोबांच्या व्रताचा वसा आता माझ्या मुलाने घेतला आहे.
(एका इंग्रजी कथेचा स्वैर अनुवाद.)
इंग्रजी लेखक : अज्ञात
मराठी अनुवाद : मकरंद पिंपुटकर
चिंचवड, पुणे – मो ८६९८०५३२१५
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “हडळ…!!!” – भाग – १ ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆
मी नववीत असेन बहुधा.
साताऱ्यातून मी त्यावेळी आजीकडे आलो होतो उन्हाळ्याच्या सुट्टीला.
मे महिन्याचा शेवटचा आठवडा असावा, ढग दाटून यायचे पण पाऊस पडायचा नाही. खूप रडावसं वाटतं, मन भरून येतं, पण रडू येत नाही तसंच काहीसं.
त्या दिवशी आजीबरोबर माझी काहीतरी वादावादी झाली होती. रागानं दिवसभर जेवलो नव्हतो, तिनेही बोलावलं नाही.
रागाच्या तिरीमिरीत गल्लीतल्या मित्राकडे जायला निघालो. संध्याकाळचे ७ वाजते असावेत.
अंधार आणि उजेड एकमेकांना आलिंगन देत ‘पहले आप पहले आप’ म्हणून निरोप देत असावेत.
निम्म्या वाटेवर आल्यावर नेमका गडगडाट सुरू झाला, काळोख पडला आणि काय होतंय कळायच्या आत धो-धो पाऊस सुरू झाला. मी चिंब…!
पावसापासून बचाव करायचा म्हणून जवळच्याच एका घरात शिरलो. घर कसलं? पत्रे, गोणपाट लावून केलेला तो एक निवारा होता.
आमच्या गल्लीतलं सगळ्यात गरीब कुटुंब हे!
आम्ही जिथे रहायचो. तिथे एक पन्नाशीची बाई रहायची. शेजारच्या आयाबाया तिला ‘हडळ’ म्हणायच्या.
ती दिसायलाही होती तशीच. डावा डोळा एकदम बारीक, या डोळ्यात काळे बुब्बुळ नव्हतंच, अख्खा डोळा पांढराफेक, उजवा डोळा बाहेर आल्यासारखा बटबटीत, आतलं बुब्बुळ तिच्या मर्जीविरुद्ध कुठेही गरागरा फिरायचं, या वयातही चेहरा सुरकुतलेला, पांढरे केस पिंजारलेले, तोंडात मोजके दात, त्यातून समोरचा एक पडलेला. दुसरा ओठातूनही बाहेर आलेला, अंगावर लुगडं घातलंय की चुकून अंगावर पडलंय अशी शंका यावी असं नेसलेलं, रंगही इतका काळा, की काळ्या रंगानं लाजावं…!
… एकूण अवतार भेसूर!
त्यात बोलण असं की भांडल्यासारखं, प्रत्येक वाक्यात शिवी.
कुणीही हिच्या नादी लागत नसे, समोर दिसली तरी विटाळ व्हायचा लोकांना, अपशकून व्हायचा त्यांना. कोणत्याही सण समारंभात हिला जाणीवपूर्वक बाजुला ठेवायचे. लहान मुलांना तर ती हडळ तुला खाईल, अशी भिती घालायचे. तिला जादुटोणा येतो, तिच्या घरात कवट्या आहेत वगैरे असंही बोललं जायचं. हे घर तिचंच..!
मी नेमका याच घरात शिरलो होतो. पत्र्याच्या त्या घरात मंद चूल पेटली होती. शेजारचा टेंभा (जुन्या डब्यात रॉकेल भरून, जुनी नाडी टाकून, उजेडासाठी वात पेटवलेली असे. गावाकडचा जुगाड) मिणमिणता प्रकाश देत होता.
ती चुलीशेजारीच बसली होती. त्याच नेहमीच्या विस्कटलेल्या अवतारात.. केस तसेच पिंजारलेले. चूल आणि टेंभ्याचा संमिश्र प्रकाश तिच्या भेसूर चेहऱ्यावर पडला होता. मूळचाच भीषण चेहरा अजून भीतीदायक वाटत होता. विरुद्ध बाजूला तिचीच सावली जमिनीवर पडली होती. एकूण वातावरण भितीदायक!
मी घाबरलो. पण बाहेर पडायची सोय नव्हती.
‘काय रं? ‘ घोगऱ्या आवाजात ती गरजली.
‘काय नाय, ते आपलं भायेर पाऊस म्हणून.. ‘ मी पायाने जमीन टोकरत चाचरत बोललो.
ती बसली होती. समोर काटवटीत भाकरीचं पीठ ओतलं होतं. पूर्वी डालड्याचा पिवळा डबा मिळत असे. त्यावर कसल्याशा झाडाचं चित्र असे. डब्यातला डालडा संपला की त्याचे अनेक उपयोग असत. कुणी डाळी तांदुळ त्यात साठवत असत, कुणी बाहेर शौच्यासाठी जाताना टमरेल म्हणूनही वापरे. तिनं याच डब्यात पाणी भरून ठेवलं होतं.
डबा काटवटी शेजारी. डब्यातलं पाणी पिठावर शिंपडून ती पीठ तिंबत होती.
मांजरानं उंदराला खेळवावं तसं ती पिठाशी खेळत होती. इकडून तिकडे फिरवत होती, मध्येच चापट्या मारत होती, मध्येच पिठाचा गालगुच्चा घेत होती. मी हा खेळ पाहण्यात रंगून गेलो. शेवटी त्या गोळ्याचा भला मोठा लचका तिनं तोडला. दोन हाताच्या तळव्यात धरून या लचक्याला तिनं गोल आकार दिला आणि हातातून पडू न देता त्या गोळ्याला हवेतच थापट्या मारू लागली. दोन्ही बाजूंनी ढोलकी बडवतात तसं…
एका क्षणी तर जादू झाली. या गोल गोळ्यापासून एक सुंदर गोलाकार अशी ताटाएवढ्या आकाराची पोळी तयार झाली. माझी आजी पोळपाटावर भाकरी थापते, हिनं हवेतच ती केली. हिच्या अंगात नक्की जादुटोणा असावा अशी आता माझी खात्री पटली.
यानंतर तिने बनवलेली ती कलाकृती धाप्पदिशी, चुलीवरल्या तापलेल्या काळ्या लोखंडी तव्यावर पसरली. डब्यात पाणी घेऊन पुन्हा पाण्याचा हात त्या भाकरीवरन फिरवला. शेणाने सारवलेल्या जमिनीवर उलथन पडलं होतं, तिनं आधी ते पदराला पुसलं. उलथन्यानं तव्याला थोडं ढोसून चुलीवरल्या तव्याला नीट केलं आणि हातानं तव्यावरची भाकरी उलटली. उलटलेली भाकरी पुन्हा तव्यावरनं काढून चुलीच्या तोंडावर तिला धग लागेल अशी ठेवली.
आता त्या बाजरीच्या भाकरीला मस्त पापुद्रा आला. ती टम्म फुगली. दिवसभर मी फुगलो होतो, तस्साच!
तिचं माझ्याकडे लक्ष नव्हतंच. बाजरीच्या भाकरीचा मंद सुवास माझ्या नाकात शिरला. पत्र्याबाहेर अंधार, नुकताच पडून गेलेला पाऊस, हवेत झोंबरा गारवा, पत्र्याच्या आत चुलीमुळे निर्माण झालेली उबदार धग आणि माझ्या पोटात पडलेली आग!
मी आशाळभूतपणे भाकरीकडे पहात होतो.
तिचं माझ्याकडे लक्ष गेलं. म्हणाली, ‘खातु का भाकर? ‘ छ्या… छ्या… नको मला. ‘ एकदम हो कसं म्हणणार?
एखादी गोष्ट मनापासून हवी असताना… ती मिळत असताना, नको म्हणणं काय असतं, हे त्या नको म्हणणारालाच कळेल.
तोंडानं नाही म्हटलं तरी काही गोष्टी चेहऱ्यावर ओघळतातच, मनात असलं नसलं तरी! डोक्यावर ओतलेल्या तेलाचे गालावर ओघळ यावेत तसे.
तिला या अंधारातही ते दिसलं असावं. म्हणाली, ‘हिकड ये… ‘
‘जावू का नको? ‘ मी घुटमळलो.
‘ये रं ल्येकरा, माज्याजवळ बस… ये हिकडं… जमिनीवर हात आपटत ती बोलली… तीच्या बोलावण्यात आर्तता होती.
मी प्रथमच तिचा हा नाजूक आणि प्रेमळ आवाज ऐकत होतो. मायेनं भिजलेला तो आवाज होता.
तरीही जवळ बोलावून भाकरीबरोबर ही मलाच खावून टाकणार नाही ना? या विचारानं मी घाबरलो.
तिनं पुन्हा हाक मारली.
मी पाय ओढत तिच्या दिशेनं घाबरत निघालो. मी जवळ येताना पाहताच ती गालातल्या गालातल्या मंद हसली. मी असं हसताना याआधी कधीच पाहिलं नव्हतं. का हसली असेल ती अशी मला बघून? मी आणखी घाबरलो.
आता पळायची सोय नव्हती. तिनं माझे हात धरले होते. माझे थरथरते हात तिने हातात घेतले आणि झटका देत मला चुलीजवळ खाली बसवलं.
… चुलीजवळ असूनही मला कापरं भरलं. ती पुन्हा हसली. ओठाबाहेर आलेला दात मला अजून भ्या दावत होता. ‘कवापस्नं जेवला न्हाईस? ‘ डोक्यावर हात फिरवत मायेनं तिनं विचारलं. ‘सकाळपस्नं… ‘ मी चाचरत बोललो.
शेणानं सारवलेल्या जमिनीवरच एक जर्मनची ताटली पडली होती. तिन ती पदरानं पुसली. त्यावर ती गरमगरम भाकरी ठेवली. मी अजूनही साशंक होतो. ती पुढे काय करणार मला माहीत नव्हतं.
तिच्याबद्दल लोक काय काय बोलतात ते सारं आठवलं. अंगावर शहारे आले. ‘तू भाकर खायाला सुरवात कर, मी तवर भाजी करते. ‘ या वाक्यान माझी तंद्री भंगली.
तेवढ्यात तिनं, बाजूला असलेली कळकटलेली एक छोटी किटली काढली, दुसऱ्या हातानं तितकीच कळकट एक कढई चुलीवर ठेवली. किटलीतलं तेल कढईत टाकलं. किटलीच्या तोंडाला लागलेलं तेल तिनं बोटानं पुसून घेतलं आणि ते बोट माझ्या केसांना लावत म्हणाली, ‘रोजच्या रोज आंगुळ झाल्यावर, डोस्क्याला त्याल लावावं.. कसं भुतावानी झाल्यात क्यास…! ‘ असं म्हणत पुन्हा तेच बोट स्वतःच्या पदराला पुसलं.
मी तिच्या पिंजारलेल्या केसांकडे पाहिलं, वाटलं, मला सांगते तर मग ही का लावत नसेल डोक्याला तेल?
.. “भुतावानी” हा तिच्या तोंडून आलेला शब्द ऐकून मी अजून घाबरलो.
तिला याचं काही सोयरसुतक नव्हतं. शांतपणे जरा लांब हात करून तिने मग लसणाची गड्डी काढली. जमिनीत उकरून केलेल्या उखळात टाकली, वरवंट्यानं दणादणा चेचली आणि कढईतल्या तेलात टाकली. उखळ पुन्हा त्याच पदरानं पुसून घेतलं. त्यानंतर गुडघ्यावर हात ठेवत ती भिंतीच्या आधारानं उठली आणि कसल्याशा फडक्याखाली झाकलेली मेथीची गड्डी काढली.
बुडख्याकडचा (देठाकडचा) भाग हातानंच पिळून तटदिशी तोडला आणि अख्खी मेथीची गड्डी तिनं अक्षरशः हातानं कुस्करुन कढईत टाकली. ना निवडणं, ना साफ करणं, ना देठ काढणं…!
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २१ आणि २२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. २१ – –
मना वासना चुकवी येरझारा ।
मना कामना सांडि रे द्रव्यदारा |
मना यातना थोर हे गर्भवासी ।
मना सज्जना भेटवी राघवासी |२१ |
अर्थ: हे मना, वासनेमुळे जीव जन्म मरणाच्या फेऱ्यात (येरझारा)अडकतो. त्या वासनेचा त्याग कर म्हणजे जीव जन्म मरणाच्या फेऱ्यात अडकणार नाही. पैसा आणि स्त्री सुख यांच्याबद्दल मोह बाळगू नकोस. कारण वासनेच्या पोटी जन्म घ्यावा लागतो आणि गर्भवासाच्या यातना भयंकर असतात. म्हणून हे मना भगवंताची भेट करून घे.
विवेचन: जन्माआधी आणि जन्माच्या प्रसंगी होणाऱ्या यातना किती भयंकर असतात हे समर्थांनी आधीच्या श्लोकात सांगितले आहे. या श्लोकात ते आपल्याला म्हणतात की वासनेच्या पोटी जन्म घ्यावा लागतो म्हणून या वासनांचा त्याग करायला हवा. वासनाच नसतील तर जन्म मृत्यूचा प्रश्नच उद्भवणार नाही. या श्लोकात ‘ चुकवी ‘ हा शब्द वासना आणि येरझारा या दोन्हीसाठी आहे. आपल्याला वासना आणि येरझारा दोन्हीही चुकवायच्या आहेतच. वासना चुकवली तर येरझारा आपोआपच चुकतील.
वासना या निरनिराळ्या प्रकारच्या असतात त्यातही त्यांचे दोन प्रमुख प्रकार सांगता येतील. सद् वासना आणि दुर्वासना. दोन्हींपैकी कोणत्याही प्रकारची वासना असेल तरी पुनर्जन्म हा अटळ आहे. परंतु त्यातल्या त्यात सद्वासना म्हणजे चांगल्या वासना असतील तर पुन्हा जन्म मिळाला तरी हरकत नसते. समाजोपयोगी कार्य करणे, संतांचा सहवास लाभणे किंवा परमेश्वर भक्तीची इच्छा धरणे या सद्वासना आहेत. या सद्वासनांमुळे आत्मिक उन्नती होण्यासाठी मदत होते. षडरिपूंच्या नादी लागून त्या वासना अपूर्ण जर राहिल्या असतील तर त्या पूर्ण करण्यासाठी पुनर्जन्म घ्यावा लागतो. परंतु त्याने शेवटी मनुष्याची अधोगतीच होते आणि मुक्तीपासून तो दूर जातो.
संत तुकाराम महाराजांना संतसंग आणि भगवद्भक्तीची आस होती. ते म्हणतात – –
न लगे मुक्ती आणि संपदा, संतसंग देई सदा|
तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हासी ||
संतांचा, सज्जनांचा संग म्हणजे सहवास मिळावा, परमेश्वराची भक्ती कायम लाभावी म्हणजे जेणेकरून त्यातील गोडी कायम अनुभवता येईल. म्हणून त्यांना गर्भवास म्हणजे पुन्हा जन्म घेणेदेखील मान्य आहे.
तुकाराम महाराजांसारख्या संतांची ही सद्वासना झाली. परंतु या ऐहिक जीवनात सामान्य मनुष्य एवढा गुंतून जातो की त्याच्या अनेक प्रकारच्या वासनांची पूर्ती कधी होतच नाही. ज्याप्रमाणे अग्नीमध्ये जेवढे इंधन घालावे तेवढा तो अधिक प्रज्वलित होतो. तशा या दुर्वासना देखील वाढत जातात आणि अंतकाळी या वासना कायम असतील तर त्या पोटी मनुष्याला पुनर्जन्म घ्यावा लागतो. सत्ता, संपत्ती आणि स्त्री संबंधित वासना कधी संपतच नाहीत. कामिनी आणि कांचन यांच्या वासना सर्वात जास्त प्रबळ आहेत. त्यांच्यावर मात करणे सोपे नाही. इतर वासना त्यामानाने गौण आहेत. आज जगातील घडणारे बहुतेक गुन्हे आणि वाईट घटना कामिनी आणि कांचनाच्या हव्यासापायीच घडत आहेत. चित्रपटातून आणि टीव्हीवरील विविध प्रकारच्या धारावाहिकांमधून अशाच घटना समोर येतात. त्यापासून बोध घेण्याऐवजी त्यातील वाईट गोष्टींचा प्रभाव समाजमनावर अधिक पडतो. भ्रष्टाचाराच्या घटनांबद्दल तर न बोललेले बरे इतक्या त्या नित्याच्या झाल्या आहेत.
वासना अपूर्ण राहिल्या की पुन्हा जन्म घ्यावा लागतो. जन्माला आल्यानंतर या वासनांचा भोग तर मिळतो परंतु माणसाची अधिकाधिक अधोगती होते आणि त्याने तो मुक्ती पासून दूर जातो.
परद्रव्य कांता पराची पाहता
स्मरादि रिपु ओढिती मानसाता
– – असे श्री दत्त स्तुतीत म्हटले आहे. दुसऱ्याचे धन, दुसऱ्याची स्त्री यांची अभिलाषा धरली तर काम, क्रोध यांसारखे शत्रू मनावर आक्रमण करतात आणि शेवटी ते माणसाचा नाश घडवून आणतात.
म्हणूनच जन्म मृत्यूचा फेरा म्हणजेच येरझारा चुकवायचा असेल तर समर्थ वासनेवर मात करायला सांगतात. आणि त्यासाठी ईश्वर प्राप्तीचे पवित्र ध्येय आपल्या डोळ्यासमोर ठेवावे लागते. केवळ ध्येयवादी मनुष्य असा त्याग करू शकतो. माया मोहात अडकलेले मन आपण ईश्वराकडे लावले तर तेच मन आपल्याला (राघवाची) ईश्वराची भेट घडवून देईल.
स्वसंवाद :
माझ्या आयुष्यात कोणत्या वासना मला सर्वाधिक बांधून ठेवतात?
कामिनी आणि कांचनाच्या मोहापासून दूर राहण्यासाठी मी सजग आहे का?
संतसंग, सत्संग किंवा आध्यात्मिक चिंतनाला माझ्या जीवनात किती स्थान आहे?
माझ्या जीवनाचे ध्येय केवळ भोग आहे की ईश्वरप्राप्ती?
– – – –
श्लोक क्र. २२ – –
मना सज्जना हीत माझे करावे ।
रघुनायका दृढ चित्ती धरावे ।
महाराज तो स्वामि वायूसुताचा ।
जना उद्धरी नाथ लोकत्रयाचा ।।२२।।
अर्थ :
हे सज्जन मना, तुला जर तुझे खरे कल्याण करून घ्यायचे असेल तर रघुकुलाचा नायक असलेल्या श्रीरामाला चित्तामध्ये दृढ धारण कर. तो वायूसुत हनुमंताचा स्वामी आहे आणि तिन्ही लोकांचा उद्धार करणारा आहे. म्हणून अशा त्या श्रीरामाला तू घट्ट धरून ठेव—म्हणजेच नेहमी त्याच्या चिंतनात राहून आपला उद्धार करून घे.
विवेचन :
आधीच्या श्लोकांमध्ये जन्माला येताना जीवाला किती यातना सहन कराव्या लागतात हे समर्थ सांगतात. आयुष्य जगताना देखील नाना प्रकारची दुःखे, संकटे आणि क्लेश सहन करावे लागतात. हे सर्व म्हणजे जन्म-मृत्यूच्या अखंड फेऱ्यांमुळे घडणारे आहे. या येरझाऱ्यातून सुटका करून घ्यायची असेल तर माणसाने आपले खरे हीत करून घ्यायला हवे. मग हे हीत म्हणजे नेमके काय आणि ते कसे साध्य करायचे—याचे उत्तर समर्थ या श्लोकात देतात.
हे जग मायेचा एक मोहक पिसारा आहे. त्याला आपण भुलतो, तेच अंतिम सत्य आहे असे मानतो आणि त्यातच अडकून पडतो. नाना प्रकारची प्रलोभने, विकार आणि वासना आपल्या मार्गात अडथळे निर्माण करतात. परिणामी, आपल्या कल्याणाचा जो अंतिम मार्ग आहे—श्रेयसाचा मार्ग, त्याऐवजी आपली वाटचाल प्रेयसाच्या मार्गाने होत राहते.
खरे पाहता मनच आपला मित्र आणि मनच आपला शत्रू असते. तेच आपले हीत किंवा अहित करू शकते. विषयसुख आणि शरीरसुखालाच आपण जीवनाचे अंतिम ध्येय मानतो. कामिनी आणि कांचनाच्या मागे धावत राहतो. परंतु या सर्व गोष्टी म्हणजे मृगजळासारख्या आहेत. मृगजळ दिसते, पण प्रत्यक्षात अस्तित्वात नसते. तसेच हे बाह्य जग—ते सत्य वाटते, पण ते भासमान आहे. आपण त्याच्या मागे धावत राहतो आणि जे अंतिम सत्य आहे—ब्रह्म किंवा परमेश्वर—त्याकडे दुर्लक्ष करतो.
आपली अवस्था कस्तुरीमृगासारखी होते. कस्तुरी स्वतःच्या नाभीत असतानाही तो तिच्या शोधात रानोमाळ भटकत राहतो. त्याचप्रमाणे आपल्या हृदयातच असलेल्या आत्मारामाला आपण विसरतो आणि बाह्य सुखांच्या मागे भटकत राहतो.
मानवी जीवनाचे खरे हीत म्हणजे त्या रघुनायकाला दृढ चित्ती धारण करणे. चित्तामध्ये भगवंताला घट्ट धरून ठेवणे म्हणजेच आपले कल्याण करणे होय. एखाद्या वस्तूचा सतत सहवास लाभला तर ती वस्तू आपल्याला प्रिय वाटू लागते. तसेच भगवंताच्या नामाचा आणि स्मरणाचा सतत सहवास लाभला तर भगवंतही आपल्याला प्रिय वाटू लागतो. आणि जेव्हा भगवंत प्रिय वाटू लागतो, तेव्हा समजावे की आपण योग्य मार्गावर चाललो आहोत.
श्रीराम हे वायूसुत हनुमंताचे स्वामी आहेत. हनुमंत म्हणजे शक्ती, युक्ती आणि बुद्धिमत्तेचे मूर्तिमंत प्रतीक. तरीही तो स्वतःला रामाचा दास मानतो. भक्ती कशी करावी हे हनुमंताकडून शिकावे. त्याने श्रीरामांना आपल्या हृदयात कायमचे धारण केले आहे. श्रीरामांच्या कृपेने तो चिरंजीव झाला आहे.
शौर्य, धैर्य, औदार्य आणि शरणागताचे रक्षण—हे श्रीरामांचे वैशिष्ट्यपूर्ण गुण आहेत. ते रघुकुलाचे भूषण आहेत. त्यांचे नाम पापातून मुक्त करणारे आहे, भवसागरातून तारून नेणारे आहे. हजारो वर्षांपासून असंख्य लोकांनी श्रीरामनामाचा आश्रय घेतला आणि या संसारसागरातून तरून गेले.
त्रैलोक्याचा नाथ असलेल्या त्या श्रीरामांनी लोककल्याणाचे व्रत स्वीकारले आहे. म्हणूनच समर्थ अत्यंत तळमळीने आपल्या मनाला सांगतात—
“हे सज्जन मना, त्या श्रीरामांना आपल्या हृदयात दृढ धारण कर; त्यातच तुझे खरे कल्याण आहे. ”
स्वसंवाद :
माझ्या जीवनातील खरे “हीत” काय आहे याचा मी कधी गंभीरपणे विचार केला आहे का?
विषयसुख आणि भौतिक यश यांनाच मी जीवनाचे अंतिम ध्येय मानतो आहे का?
माझ्या मनाला ईश्वरनाम, सद्गुण आणि सत्कर्म यांचा सहवास मिळतो आहे का?
हनुमंताप्रमाणे श्रद्धा, नम्रता आणि सेवाभाव माझ्या जीवनात कितपत आहे?