हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६४ – स्वतंत्र पहचान… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – स्वतंत्र पहचान।)

☆ हेमंत साहित्य # ६४ ☆

✍ स्वतंत्र पहचान… ☆ श्री हेमंत तारे  

इससे पहले कि,

खो जाये स्वतंत्र पहचान,

और हो जाये विलय,

किसी डबरे,

पोखर,

तालाब,

नदी या नाले में

 

पानी के हर टपके ने

बनाया

वर्तुल वलय एक

और,

मना लिया उत्सव

अपनी सम्भावित

विस्तारित सम्प्रभुता का ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५१ ⇒ पेइंग गेस्ट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेइंग गेस्ट।)

?अभी अभी # १०५१ ⇒ आलेख – पेइंग गेस्ट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अतिथि भगवान होता है, बैंक का एटीएम नहीं ! साईं इतना दीजिये, जा में कुटुंब समाय,

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए। साधु भी अतिथि ही होता है, लेकिन भरपेट भोजन के बाद संतुष्ट होकर आशीर्वाद देकर विदा ले लेता है। अतिथि क्या लेकर आया था, और क्या देकर जाता है, भगवान ही जाने।

जो अतिथि कुछ देकर जाता है, उसे पेइंग गेस्ट कहते हैं। कीमत हमेशा कैश अथवा काइंड ही नहीं होती ! दूर की चाची, दस रोज रुकने के बाद जब भरे मन से वापस जाती थी, तो मुन्नू के हाथ में गुड़ा-मुड़ा बीस का नोट रखकर ज़रूर जाती थी। बहू ! तेरा अचार बहुत पसंद आया, थोड़ा बरनी में बाँध दीजो। लेकिन उन्हें आप पेइंग गेस्ट नहीं कह सकते।।

1957 में देवानंद और नूतन की एक फ़िल्म आई थी, पेइंग गेस्ट ! बॉलीवुड की नगरी मुम्बई में कई डिसूजा और परेरा टाइप परिवार रहते थे, जिन्हें आप एंग्लो-इंडियन कह सकते हैं। ये सब बूढ़ी आंटियां रहती थीं, जिनके एक अथवा दो लड़कियां रहती थीं। कोई सुंदर सा नवयुवक इनके यहाँ नौकरी ढूँढने के बहाने आता, इनके यहाँ पेइंग गेस्ट बनकर रहता, और पिक्चर चल निकलती। किसी एक लड़की से उसका प्यार होता और छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा, गाना शूट हो जाता। कहीं से एक विलेन आ जाता, ढिशुम, ढिशुम और बाद में मालूम पड़ता कि वह नवयुवक अपने पिता रायबहादुर की करोड़ों की जायदाद को ठुकराकर चला आया है। एक सुखांत फ़िल्म का अंत हो जाता।

मुम्बई जब बम्बई था, तब वहाँ पेइंग गेस्ट रहा करते थे। छोटे कस्बों से नौकरी की तलाश में आए युवकों को पेइंग गेस्ट रखने वाले मिल भी जाया करते थे। तब के मुम्बई में बहुत से एंग्लो-इंडियन और पारसी परिवार ऐसे होते थे जहाँ एक निश्चित राशि में रहने को छत, भोजन और मकान मालिक का ढेरों प्यार मिल जाता था। बहुत से किस्से हैं पेइंग गेस्ट के। कई लोगों की ज़िंदगी यहीं रहकर बनी है।।

आज यह हालत है कि अगर किसी को मकान किराये से दो, तो पहले थाने में सूचित करो। छः महीने का एडवांस, महीने के महीने किराया, कहीं भी खाओ, कुछ भी खाओ अपनी बला से।

कितने उदार दिल होते होंगे वे लोग, जो किसी को अपने यहाँ पेइंग गेस्ट रखते होंगे। आजकल दो भाई एक साथ घर में नहीं रह सकते, ऐसी स्थिति में माँ-बाप की तरह प्यार देना, अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाना। बीमारी और मुफ़लिसी में भी हर तरह की मदद करना, यह काम कोई फरिश्ता ही कर सकता है।।

संघर्ष के दिनों के सबके अपने अपने अनुभव होते हैं। घर से बाहर की अनजान दुनिया में भी कई फरिश्ते बसते हैं, समय निकल जाता है, उनकी यादें नहीं जाती। नौकरी धंधे के कारण, जो व्यक्ति जितना घर के बाहर रहा है, उसके जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों का उतना ही समावेश रहा है।

जीवन के शुरुआती दौर में नौकरी ! घर से बाहर ट्रांसफर। नई जगह, नया परिवेश। बिना शादीशुदा को किराए का मकान नहीं मिलता। क्या जाने कैसा इंसान हो। फिर भी येन केन प्रकारेण छत का जुगाड़ तो हो ही जाता। तब कहाँ का टिफिन ! किसी ढाबे में जाकर खा लो, या अपने हाथों से खाना बनाओ। मकान मालिक अच्छा दयालु हुआ, तो कभी कभी चाय पानी भी हो जाता था।।

आप किसी के पेइंग गेस्ट रहे हों या किरायेदार, लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते, कि हमारे आसपास आज भी इंसानियत बिखरी पड़ी है। जीवन में फूल ही नहीं, काँटे भी होते हैं। हो सकता हो, किसी के अनुभव कटु भी हों, लेकिन पेइंग गेस्ट की कल्पना मात्र ही, आज भी मुझे रोमांचित कर देती है। मेरी आँखों के सामने एक बूढ़ी आंटी तैर जाती है, जो यह पूछती नज़र आती है। बेटा! तूने आज दो रोटी कम क्यों खाई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆ हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “हम और जीवन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆

✍ कविता – हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

औरों का श्रम खरीदते हैं हम

और महंगे दामों पर बेचते हैं हम

जितना सस्ता खरीदे महंगा बेचे,

उसी को बड़ा आदमी कहते हैं हम।

*

वही बड़े आदमी नीतियाँ बनाते हैं

गरीबों के नाम पर स्वहित साधते हैं

विकास करते हैं और खूब कमाते हैं,

श्रम करने वाले श्रम करते ही जाते हैं।

*

मन के श्रम को कीमत सदा मिलती

शरीर को श्रम करते बीमारी मिलती

दोनों से ऊपर समझता है अब आदमी,

ईश्वर समझने की सदा इच्छा है रहती।

*

सब सुनाना चाहते हैं पर सुनना नहीं

फोलोवर चाहते हैं, फोलो करना नहीं

कोई हम से मैं कोई मैं से हम बनता है

पर आदमी बनना कोई चाहता नहीं।

*

क्षण भंगुर जीवन को जी न पाते हम

धरती आसमान पर कब्जा जमाते हम

और कर्ता बन समझ इठलाते हैं हम,

जड़ चेतन पर फिर भी बतियाते हैं हम।

*

कुछ नाटक करके जागरूक कर रहे

कुछ जागरूकता का नाटक कर रहे

पता ही नहीं कुछ नाटक के पात्र बने,

हम ऐसे ही अब जीवन यापन कर रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२३ ☆ मुखवटा… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२३ ?

☆ मुखवटा ☆  प्रभा सोनवणे ☆

सखी, तू जेव्हा उतरवून ठेवशील,

तुझा मुखवटा,

आणि पाहू शकशील–

स्वतःचं खरं प्रतिबिंब,

तेव्हाच पुन्हा भेट मला ….

मनाच्या पारदर्शकतेसह!

खूप जवळच्या मैत्रीत,

जाणून असतो आपण,

एकमेकींना,

अगदी “नस नससे वाकीफ”!

 

मग तुझी झाकपाक कशासाठी ?

आयुष्याच्या सांजवेळी,

मांडायचा असतो—

लेखाजोखा,

एकमेकींच्या साक्षीने,

जगलेल्या क्षणांचा !!

 

पण तुझी सगळ्यांवरच–

आगपाखड!

 स्वतःच्या खऱ्या प्रतिमेकडे,

जेव्हा पाहू शकशील,

धीटपणे—

 

तेव्हाच ये ऐसपैस गप्पांसाठी,

खऱ्या आठवणींच्या

झाडाखाली!!!

तो पर्यंत—-

शांतच राहू दोघीही !!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेच्या उत्सव ☆ अनमोल नाते… ☆ जयश्री पाटील ☆

जयश्री पाटील

? कवितेच्या उत्सव ?

अनमोल नाते… ☆  जयश्री पाटील ☆

येताच या जगी तू आनंद फार झाला

सर्वांग सुंदर आई शब्द बहाल झाला

 *

लाभताच मातृत्व हे धन्य मी जाहले

अलौकिक नात्यात अलगद गुंतून गेले

 *

हातात घेताच तुजला गगन ठेंगणे झाले

रूप तुझे पाहता मी स्वतःच विसरून गेले

 *

कुशीत घेता तुजला वाटे स्वर्ग जणू लाभला

इवल्याशा ओठात तुझ्या अमृत पान्हा झरला

 *

दिवस रात्र जणू काही समसमान झाले

सभोवती तुझ्या माझे सारे विश्व सामावले

 *

मिठीत विसावता तुझे बाळरूप गोजिरे

फिके वाटती मज आकाशातील चंद्र तारे

 *

अनमोल तू खास तू फक्त माझे बाळ तू

मानवाच्या निर्मितीतला माझाच गर्व तू

 *

विरल्या प्रसव वेदना तोडली जरी नाळ

जोडली आहे काळजाची काळजाशी नाळ

  

© जयश्री पाटील

विजयनगर.सांगली.

मो.नं.:-8275592044

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “सुपर वूमन सिंड्रोम” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

? विविधा ?

☆ “सुपर वूमन सिंड्रोम…☆ श्री जगदीश काबरे ☆

भारतीय समाजातील अनेक स्त्रियांमध्ये तथाकथित “सुपर वूमन सिंड्रोम” दिसून येतो, असे काही समाजशास्त्रज्ञ आणि मानसशास्त्रज्ञ मानतात. याचा अर्थ असा की, स्त्रीने एकाच वेळी आदर्श पत्नी, आदर्श सून, आदर्श आई, आदर्श कर्मचारी, आदर्श गृहिणी आणि परंपरेची कट्टर रक्षक अशा सर्व भूमिका निर्दोषपणे पार पाडल्याच पाहिजेत, अशी अपेक्षा ती स्वतःकडून आणि समाज तिच्याकडून ठेवतो. हा केवळ वैयक्तिक स्वभावाचा प्रश्न नसून सामाजिक संस्कार, लिंगाधारित अपेक्षा आणि सांस्कृतिक दबाव यांचा परिणाम असू शकतो.

पतीपरायणतेच्या संकल्पनेत वाढलेल्या अनेक स्त्रिया पतीची सेवा, उपवास-व्रते, धार्मिक विधी आणि कुटुंबाच्या प्रतिष्ठेसाठी स्वतःच्या गरजा बाजूला ठेवणे हेच स्त्रीत्वाचे सर्वोच्च लक्षण आहे, असे मानतात. परिणामी, त्या स्वतःवर कामाचा, त्यागाचा आणि जबाबदाऱ्यांचा एवढा मोठा बोजा अंगावर घेतात की त्याला जणू ‘सुपर वूमन’ बनण्याची स्पर्धाच समजू लागते. घरातील प्रत्येक गोष्ट परिपूर्ण ठेवण्याचा, प्रत्येक नाते जपण्याचा आणि प्रत्येक धार्मिक परंपरा पाळण्याचा भार त्या स्वतःच्या खांद्यावर घेतात. या नादात त्या स्वतःचे स्वत्व मात्र गमावून बसतात. स्वतःच्या इच्छा आकांक्षांना दडपून लोक काय म्हणतील किंवा लोकांकडून कौतुकाचे शब्द ऐकायला मिळतील या आवास्तव इच्छेपोटी ‘सुपर वुमन’ होण्याचा प्रयत्न करतात.

याच मानसिकतेतून काही स्त्रिया संस्कृतीच्या रक्षणाची जबाबदारीही प्रामुख्याने स्वतःवर घेतात. कोणते व्रत करायचे, कोणता सण कसा साजरा करायचा, कोणते कपडे घालायचे, मुलांना कोणते संस्कार द्यायचे, कुटुंबाची परंपरा कशी टिकवायची या सर्व बाबींमध्ये त्या स्वतःला संस्कृतीच्या पहारेकरी समजू लागतात. प्रत्यक्षात संस्कृती ही स्त्री किंवा पुरुष अशा एकाच घटकाची जबाबदारी नसून संपूर्ण समाजाची सामूहिक निर्मिती असते. तरीही इतिहासात स्त्रियांवरच संस्कृतीचे ओझे अधिक टाकले गेले आहे.

आजच्या काळात खरी गरज ‘सुपर वूमन’ किंवा ‘सुपर मॅन’ घडवण्याची नाही, तर समान जबाबदारी स्वीकारणारे, परस्पर आदर राखणारे आणि विवेकाने परंपरांचा विचार करणारे कुटुंब घडवण्याची आहे. संस्कृती टिकवायची असेल तर ती भीती, अपराधभाव किंवा एकाच लिंगाच्या त्यागावर नव्हे, तर समता, संवाद आणि मानवी मूल्यांवर टिकली पाहिजे. तेव्हाच संस्कृती जिवंत राहील; अन्यथा ती केवळ स्त्रियांसाठी कर्मकांडांचे ओझे बनून राहील

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ तीन अनुवादित लघुकथा – मी नक्की येईन / आत्मविश्वास / खेळणे “ हिन्दी लेखक : श्री महेश राजा ☆ भावानुवाद – सौ. उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

? जीवनरंग ?

☆ तीन अनुवादित लघुकथा – मी नक्की येईन / आत्मविश्वास / खेळणे “ हिन्दी लेखक : श्री महेश राजा ☆ भावानुवाद – उज्ज्वला केळकर

१) मी नक्की येईन माझ्या बाळांनो!

मुलांच्या परीक्षेचा आज शेवटचा दिवस होता. मुले खूश होती. उद्यापासून दिवाळीची सुट्टी लागणार होती. दु:खी होती ती शाळेतली आया. ती एका कोपर्‍यात बसून मुलांना खेळताना बघत होती. उद्यापासून शाळा उजाड वाटणार होती.

तिचे कोणी नातेवाईक, संबंधित नव्हते, असा काही नव्हतं. तिला दोन मुले होती. ती वेगवेगळ्या शहरात आपापल्या पत्नी-मुलांबरोबर रहात होती. जेव्हा, त्यांना पैशाची काही अडचण यायची, तेव्हा, त्यांना आईची आठवण यायची. नाही तर कधी सणावारीदेखील आईला कधी बोलावले नव्हते. पतीचा मृत्यूनंतर, तिने मेहनत-मजुरी करून मुलांना शिकवले. छोटी-मोठी नोकरी शोधून, त्यांची समान परिवारातील मुलींशी लग्ने करून दिली. सगळ्यांना ती खुश बघू इच्छित होती. तिची कुणाहीबद्दल कसलीच तक्रार नव्हती. तिला माहीत होतं, आज-कालचे दिवस असे आहेत. सुना सासूच्याजवळ राहू इच्छित नाहीत. घरोघरी हीच परिस्थिती आहे. आपल्या नशिबाचा दोष मानून, ती शहरातील एका प्रतिष्ठित शाळेत आयाची नोकरी करत होती. शाळेतील मुलांवर ती खूप प्रेम करत असे. त्या मुलामध्ये, ती आपलं मन रमवत असे. कधी तिला आपल्या नातवंडांची आठवण येत असे. आपण त्यांना आपल्या मांडीवर बसवून कधी नीट भरवू शकलो नाही या विचाराने, ती दु:खी होत असे. या शाळेतल्या मुलांनाच ती आपली मुले मानून खूश रहात असे.

एवढ्यात, एका मुलाच्या रडण्याच्या आवाजाने तिची तंद्री भंग पावली. तिने त्या मुलाला मांडीवर बसवले आणि त्याला गप्प करण्याचा ती प्रयत्न करू लागली. सगळ्या मुलांना ती खूप आवडत असे. ती सगळ्यांमध्ये मिळून-मिसळून गेली होती. तिला आता रडू येऊ लागले होते. दिवसभर मुलांची देखभाल, त्यांचे खाणे -पिणे, साफ-सफाई यात तिचं मन रमायचं. आता उद्यापासून काय करणार? हा विचार तिला सतावत होता. मॅडमने हाक मारली. सुट्टीची वेळ झाली. मुलांकडे भरलेल्या नजरेने बघत ती बेल वाजवायला निघून गेली. तिच्या डोळ्यातून अविरत अश्रूधारा वहात होत्या. मॅडमने तिच्या मनातील भाव समजून, तिच्या ख्ंद्यावर हात ठेवून तिला सांत्वना दिली. गेट उघडून ती लक्ष ठेवत होती. कुणाची रिक्षा अजून आली नाही. इतक्यात बघता बघता मुलांनी तिला घेरलं. त्यांच्या हातात एक पॅकेट होतं. सगळी मुले एका स्वरात ओरडली, ; बाई, यावेळी दिवाळीसाठी तू आमच्याच घरी ये. आम्ही आमच्या मम्मी –पापांना विचारलय! तिने सगळ्या मुलांना आपल्या ममतामयी बाहुंनी विळखा घातला. भरल्या आवाजात ती म्हणाली, येईन बाळांनो. जरूर येईन! तिचा गळा दाटून आला. मुले जिद्द करू लागली. नाही. आत्ताच चल आमच्या बरोबर! तिने मुलांना समजवलं, शाळेची साफ-सफाई, राखण करणं, याची जबाबदारी तिच्यावर आहे. वेळ काढून एकेकाकडे, अशी ती सगळ्यांकडे जाईल.

मुलांनी तिच्याकडून प्रॉमीस घेतले. सगळ्यात छोट्या असलेल्या सिद्धीने तिच्या हातात पॅकेट दिले. ती म्हणाली, हे काय आहे बाळांनो?

यावेळी सहावीच्या वर्गातला विकी म्हणाला, ही साडी आहे. आम्ही सगळ्यांनी आमच्या पॉकेट मनीतून पैसे वाचवून ही साडी तुझ्यासाठी घेतली.

नको. मी कशी ही घेऊ?

नाही म्हणू नको हं! आम्हाला वाईट वाटेल!

मॅडम म्हणाल्या, बाई, घे! मुलांनी इतक्या प्रेमाने आणलीय!

तिने सगळ्या मुलांच्या गालाचा एकेक पापा घेतला.

बाई, तू घरी आली नाहीस, तर मी फटाके नाही उडवणार! विशू म्हणाली.

बाई, मी फराळाच करणार नाही.. मदन म्हणाला.

नाही. नाही. बाळांनो, मी नक्की येईन. आत्यंतिक खुशीने ओघळणारे अश्रू, तिने तसेच ओघळू दिले.

सगळी मुले निघून गेली.

गेटपाशी उभी असलेल्या तिला, दूर उडणार्‍या धुळीकडे ती बघत राहिली.

…. जीवनात आज तिला प्रथमच वाटले, ती एकटी नाही आहे.

मूळ कथा – मैं जरूर आऊंगी मेरे बच्चोँ!, मूळ लेखक – महेश राजा

मराठी अनुवाद – उज्ज्वला केळकर मो- 8369252454,

२) आत्मविश्वास – – 

जानकीदेवींनी एकदा आपल्या सार्‍या घराचे निरीक्षण केलं. सगळं काही ठाक-ठीक आहे न? तिची सहयोगी आशा पूर्ण निष्ठेने घर सजवण्याच्या कामात गुंतलेली होती. तिचा मुलगा राजेश आपल्या पत्नीला घेऊन आपल्या कामाच्या ठिकाणी गेला होता. मुलगी रीना आपल्या सासरी सुखात आहे. जानकीदेवींनी अन्य नोकरांना आवश्यक त्या सूचना दिल्या. आता ती देवघरात आली. आपल्या इष्ट देवतांना नमस्कार करून, आपल्या पतीच्या फोटोपूढे उभी राहिली. तस्बिरीतून एक तेजस्वी किरण फुटतोय, असा तिला वाटलं.

पदर डोक्यावर ठेवत ती हळुवारपणे म्हणाली, ‘आहो, बघा ना, मी माझी सारी कर्तव्ये पार पाडलीत. मुलीचा विवाह एका कुलीन परिवारात केला. मुलगा आणि सून डॉक्टर आहेत. तुम्ही दोघांना माझ्या झोळीत टाकून, लवकर निघून गेलात आणि सगळी जबाबदारी माझ्यावर टाकलीत. तुमचा माझ्यावर विश्वास होता. तो मी कायम ठेवला. सगळं चांगल्या तर्‍हेने निभावलं. ’

थोडं थांबून डोळ्यात उतरलेलं पाणी पदराने पुसलं. मग म्हणाली, ‘आता मला परवानगी द्या. आता मी माझं पुढचं जीवन समाजसेवेत आणि गरीब मुलांना शिकवण्यात व्यतीत करू इच्छिते. मला आशा आहे, तुमचा विरोध असणार नाही. आजपासूनच मी आपलं हे निवासस्थान, हर्षध्वनी आश्रमाच्या रूपात बदलते आहे.

तुम्हाला प्रणाम करून, तुमचा आशीर्वाद घेऊनच, हे शुभ काम मी करू इच्छिते. मला परवानगी द्या! ’

– – ती हात जोडून मूक उभी राहिली. तिला वाटलं, पतीची तसबीर हसते आहे.

मूळ हिंदी कथा – स्वयं पर विश्वास, मूळ लेखक – महेश राजा

मराठी अनुवाद – उज्ज्वला केळकर मो- 8369252454

३) खेळणे – – 

दोन दिवसांनंतर आज वातावरण स्वच्छ होतं. मध्यंतरी खूप पाऊस पडत होता. आज ऊन पडण्याची लक्षणे दिसू लागले होती. अंश आज आपल्या आजोबांबरोबर किलकारी गार्डनमध्ये आला होता. शहराच्या मधोमध असलेला हा बगीचा मुलांच्या दृष्टीने फिरण्यासाठी अतिशय आकर्षक जागा होती. बागेत झोपाळे, घसरगुंड्या आणि व्यायाम करण्याची अनेक उपकरणे लावलेली होती. बसण्यासाठी चांगली व्यवस्था केलेली होती. किलकारीच्या एका बाजूला फळे, ज्यूस इ. च्या हातगाड्या लागल्या होत्या. दुसर्‍या

बाजूला एक हलकी चटई हांतरून एक बाई, आपल्या लहान मुलाला घेऊन मुलांसाठी मातीची अनेक आकर्षक खेळणी घेऊन, गिर्‍हाईकांची वाट बघत बसली होती. तिचा छोटा मुलगा पुन्हा पुन्हा त्या खेळण्यासाठी हट्ट करत होता. तो सारखा एखादं खेळणं उचलून घेत होता. त्याची आई, त्याच्या हातातून ते काढून घेत होती.. खेळणं घेण्याची मनाई करत होती.

अंश वारंवार हे दृश्य बघत होता. तो आपल्या आजोबांना म्हणाला, ‘ आजोबा, त्या मुलाची मम्मी त्याला खेळणं का घेऊ देत नाही? ’

आजोबा त्याला समजावत म्हणाले, ‘ती गरीब आहे. त्यांच्या घरी खाण्यासाठी काही नाही. जेव्हा तिची खेळणी विकली जातील, तेव्हा त्यांच्या घराची चूल पेटेल. 

अंशने पुहा विचारले, ‘आजोबा, त्यांच्याकडे खायला का नाही? आपल्या घरी तर आहे. आपण घरून रोटी आणून या महिलेला आणून देऊ या. ’

आपल्या नातवाचे हे निरागस बोलणे, ऐकल्यावर आजोबा हसू लागले. लाडाने त्यांनी याला मिठीत घेतलं. ‘चल! त्या महिलेकडून खेळणं घेऊ या. ’

अंश खूश झाला. तो त्या जागी गेला व दोन चांगली खेळणी त्याने उचलली आणि आजोबांकडे पाहिलं. आजोबांनी होकार भरला.

अंशने एक खेळणं त्या छोट्या मुलाला दिलं. ती महिला ‘नको… नको.. ’ म्हणत होती.

आजोबांनी दोन्ही खेळण्यांचे पैसे तिला दिले. तेव्हा ती आश्वस्त झाली. तो मुलगा खेळणं मिळाल्याने खुश झाला. तो खेळण्याशी खेळू लागला.

अंशने आपल्या बॅगेतून काही फळे काढली आणि त्या मुलाला दिली. मुलाची आई त्यांच्यापुढे हात जोडत राहिली.

आता आजोबा-नातवाची जोडी हातात हात घालून आपल्या घराकडे खुशी-खुशीने परत चालले होते.

– – आकाश निरभ्र होतं. त्यातून सूर्यदेवता हसत होती.

मूळ हिन्दी कथा – खिलौना, मूळ लेखक – महेश राजा

मराठी अनुवाद – उज्ज्वला केळकर मो- 8369252454,

मराठी भावानुवाद : सौ. उज्ज्वला केळकर 

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈संस्थापक संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “माझी वारी ! माझा अनुभव !”- लेख क्र. ५ ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

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माझी वारी ! माझा अनुभव ! – लेख क्र. ५ ☆ श्री संभाजी बबन गायके 

देवाची गाडी!

 पंढरीची वारी म्हणजे पायी प्रवास हे समीकरण साहजिकच आहे. ज्या काळात वाहतुकीच्या सुविधा नव्हत्या त्या काळात वारकरी संपूर्ण प्रवास पायीच करीत असत. पण कालांतराने वारक-यांची संख्या वाढली, वाटेतील मुक्काम, भोजन व्यवस्था आपली आपण करण्याची गरज भासू लागली तसे सोबत वाहन ठेवणे आवश्यक झाले. त्यामुळे आरंभी पालखी सोहळ्यासोबत लोक बैलगाडी, टांगा अशी वाहने आणीत. या वाहनांमधून साहित्याची आणि गरज पडेल त्यानुसार माणसांची वाहतूक होऊ लागली.

पुढे मोठी स्वयंचलित वाहने उपलब्ध झाल्यावर उत्तम आर्थिक परिस्थिती असलेल्या दिंडीचालकांनी टेम्पो, ट्रक अशी वाहने सोबत घेण्यास सुरुवात केली. यात आरंभी trolly असलेला tractor फार लोकप्रिय आणि सोयीचा होता. अजूनही त्याचा वापर मोठ्या प्रमाणावर होताना दिसतो.

या वाहनांमध्ये दिंडीला आवश्यक असणा-या सर्व साहित्याची वाहतूक करणे किफायतशीर ठरते. तंबू, स्वयंपाक, किराणा इत्यादी साहित्य, दिंडीत पायी चालणा-या वारक-यांच्या पिशव्या हे सर्व या वाहनांत ठेवले जाते. ही वाहने म्हणजे एकाअर्थाने दिंडीची कार्यालयेच ठरतात. ज्यांना पायी प्रवास झेपत नाही, किंवा प्रकृती खालावते असे वारकरी काहीवेळा या वाहनांतून वारीचा प्रवास करत असतात. वारीहून घरी परतण्यासाठी तर हमखास हीच वाहने वापरली जातात.

दानशूर लोक दिंडीसाठी स्वत:ची वाहने देऊ करतात. किंवा ही वाहने भाड्यानेही घेतली जातात. काही मालक, चालक केवळ इंधनखर्च, चालकाचे वेतन एवढा खर्च दिला तरी चालेल, अशा भावनेने वाहनसेवा रुजू करतात.

आज समजा पालखीचा मुक्काम सासवड येथे असेल तर दिंडीची ही वाहने पुण्यातून पालख्या निघण्याआधी निघून हडपसर येथील दुपारच्या भोजनाची जागा गाठतात. दुपारची जेवणे उरकली की, सोहळा निघण्यापूर्वी ही वाहने सासवडकडे रवाना केली जातात. वाहनांची संख्या आणि लोकांची संख्या जास्त झाल्याने बरेचदा रस्त्याच्या एका बाजूने दिंडी चाललेली आहे, आणि शेजारून दिंडीची वाहने चाललेली आहेत, असे दृश्य दिसते.

दुपारच्या भोजनाच्या ठिकाणी वाहनांतून आणलेल्या वस्तूंच्या साहाय्याने स्वयंपाक केला जातो. वाहने मुक्कामाच्या ठिकाणी पोहोचल्यावर तंबू ठोकले जातात. तंबूची जागा आधीच राखून ठेवलेली असते. त्यासाठी दिंडीचालक वारी आधी संबंधित व्यक्तींच्या, संस्थांच्या भेटी घेऊन व्यवस्था ठरवून घेतात. पंढरपुरात ब-याच गावांच्या, दिंड्या यांच्या स्वत:च्या मालकीच्या धर्मशाळा आहेत. पण इतर लोकांना मात्र मोकळ्या जागांत तंबू ठोकावे लागतात.

या वाहनांसोबत स्वयंपाकासाठी आचारी, त्यांचे साहाय्यक प्रवास करीत असतात. बहुतेक वेळा ही मंडळी अल्प मानधनावर आणि देवाची सेवा म्हणून हे काम करीत असतात. काही श्रीमंत दिंड्या स्वत:चे मोठे कामगार पथक सोबत घेऊन चालतात. यात वीज व्यवस्था, तंबू व्यवस्था, भोजन व्यवस्था त्यामानाने काहीशी वरच्या दर्जाची असते. काही ठिकाणी तर प्रत्येक तंबूमध्ये ट्यूब लाईटस, गाड्या, खुर्च्या आणि इतर वीजव्यवस्थाही करण्यात येते. अर्थात बहुतांश ठिकाणी वीज महामंडळाच्या तारांवर धातूच्या तारांचे आकडे टाकून वीज घेतली जाते… कारण तंबू माळावर, उघड्या जागी टाकलेले असतात. अशावेळी अधिकृतपणे वीज जोड घेता येणे शक्य नसते. अर्थात वाढत्या शहरीकरणामुळे हे प्रकार कमी झालेले आहेत. पूर्वी कंदिलाच्या उजेडात काम केले जाई. त्यामुळेच आजही दिंडी वाहनांच्या बाजूला कंदील दिसतात, पाण्याच्या बादल्या, तंबूचे साहित्य दिसते.

वारी काळात त्या त्या शहरांत gas cyllinders, रॉकेल, जळणासाठी लाकडे अशी व्यवस्था शासकीय पातळीवर माफक दरांत केली जाते. स्वयंसेवी संस्था सुद्धा अनेक सुविधा पुरवतात. हल्ली मोबाईल चार्जिंग व्यवस्थाही महत्त्वाची ठरलेली आहे.

वाहनांचे चालक, साहाय्यक सुद्धा या काळात वारक-यांच्या भूमिकेत दिसतात. हे लोक स्वयंपाक, दिंडीप्रवास यांत साहाय्य करताना दिसतात.

पालखी मार्गावर त्या त्या दिवशी केवळ दिंडीच्या वाहनांना प्रवेश दिला जातो. या वाहनांवर दिंडीचे फलक, पताका लावलेल्या दिसतात. हल्ली या वाहनांना टोल माफीही दिली जाते.

महाराष्ट्राच्या विविध भागांतून पंढरपूरला पोहोचण्यासाठी राज्य परिवहन मंडळाच्या (एस. टी.) बसेसशिवाय पर्याय नव्हता. इंग्रज काळात १९५९ मध्ये पुणे ते बार्शी अशी रेल्वे व्यवस्था निर्माण झाली. पुढे पुणे ते सोलापूर अशी रेल्वे १८६० मध्ये सुरु झाली. पण सोलापूरहून पंढरपूर तसे बरेच दूर आहे. त्यामुळे तिथून एस. टी. ने जाण्याशिवाय पर्याय नसे. पण दूर मराठवाड्यातील लोकांना पंढरीस येण्यासाठी रेल्वे उपलब्ध नव्हती.

एवरार्ड कॅलथोर्प नावाच्या हुशार, मेह्नती इंग्रज अधिका-याच्या अथक परिश्रमांतून बार्शी ते पंढरपूर अशी narrow guage अर्थात दोन रूळांमध्ये कमी अंतर असलेली रेल्वे सेवा सुरु होऊ शकली. मराठवाड्यातील प्रवाशांसाठी (बार्शी) मिरज ते लातूर असा मार्ग सुरु केला गेल्याने खूप भाविकांची सोय झाली. कुर्डूवाडीनंतर पुढे या गाडीसाठी पंढरपूर रेल्वे स्टेशनची उभारणी झाल्यावर या गाडीला देवाची गाडी हे नाव चिकटले. या गाडीत केवळ सामान्य बैठक व्यवस्था होती. तिकीटदर माफक होते. आणि वेग अतिशय कमी. म्हणजे गाडीतून उतरून जाऊन आपले एखादे छोटे काम उरकून थोडेफार पळत जाऊन ही गाडी पकडता येत असे. आणि लोकांना फार घाईसुद्धा नसे. वारकरी गाडीच्या डब्यातच भजनाचा फड उभारीत आणि संपूर्ण प्रवास नामस्मरणात पूर्ण होई. असो.

पंढरीला देहू-आळंदीच नव्हे तर संपूर्ण महाराष्ट्रातून पायी दिंड्या येत असतात. काही दिंड्या तर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश या राज्यांतूनही येतात. अर्थात या दिंड्यांसोबत चालणा-या लोकांची संख्याही कमी असते. सर्वच दिंड्यांना पोलिस बंदोबस्त देणे शक्य होणारे नसते. या दिंड्या महामार्ग, राज्य मार्ग इत्यादी रस्त्यांवरून प्रवास करीत असतात. बहुदा प्रवास पहाटे लवकर सुरु केला जातो, आणि काही वेळा रात्री उशीरा, अंधार पडेपर्यंत सुरु असतो. दिंडीसोबत चोपदार आणि शिपाई लोक चालत असतात, आणि हे लोक वाहतुकीपासून दिंडीचे संरक्षण करतात. पण अशा कमी संख्येन चालणा-या, अंधारात चालणा-या दिंड्यांमध्ये रस्त्यावरून धावणारी वाहने घुसून अपघात घडल्याची उदाहरणे बरीच आहेत. यात काही बळीही गेलेले आहेत. देहू, आळंदी, शेगाव, त्र्यंबकेश्वर, पैठण येथून येणा-या मोठ्या दिंड्यांच्या बाबतीत असे अपघात झाल्याचे फारसे प्रकार ऐकिवात नाहीत. कारण गर्दी पाहून वाहन चालक काळजीपूर्वक वाहने चालवतात, पोलिस बंदोबस्त असत, शिवाय दिंडी सोबतचे कार्यकर्ते, चोपदार, शिपाई शिस्त सांभाळत असतात.

दिंड्यांसोबत छोटे टेम्पो, मध्यम आकाराच्या ट्रक्स आणि काहीवेळा गरजेनुसार मोठे ट्रक्स असू शकतात. त्याच प्रमाणे शासकीय पाणी पुरवठा व्यवस्थेची वाहने, आरोग्य विभागाची वाहने, पोलिसांची वाहने, खाजगी दूरचित्रवाणी वाहिन्यांची वाहने, हौशी प्रेक्षकांची वाहने असतात. शिवाय संबंधित मार्गांवर नेहमीची प्रवासी वाहतूक सुरूच असते. फक्त गरजेनुसार मार्गांचे नियोजन केले जाते.

पूर्वी ही वाहने रस्त्यात बंद पडण्याचे प्रमाण अधिक होते. वारीपूर्वी वाहनांची पूर्व तपासणी करून घेण्याची अट असल्याने आता हे प्रकार फारसे दिसत नाहीत. माल वाहतुकीच्या वाहनांतून प्रवासी वाहतूक करण्यास कायद्याने मज्जाव असला तरी मोठी संख्या, जनमताचा दबाव या काही कारणांमुळे प्रशासनाला या नियमाकडे डोळेझाक करावी लागते, हेही खरे आहे!

१३ जुलै, २०२६ रोजी सासवड ते जेजुरी मार्गावर एका दिंडीमध्ये ट्रक घुसून काही वारकरी मृत्युमुखी पडल्याची, जखमी झाल्याची दुर्दैवी घटना घडली. सदर ट्रक हा त्या दिंडीचाच, त्यांच्या लोकांची, मालाची वाहतूक करणारा होता असे समजते. वाहनचालक वयस्कर असून, त्यांना अचानक प्रकृती खालावल्यामुळे वाहन नियंत्रणात ठेवता आले नाही, व सदर वाहन दुर्दैवाने पायी चालणा-या बिचा-या महिला वारक-यांना चिरडत पुढे गेले. त्यामुळे मोठी जीवितहानी झाली! ही परिस्थिती त्यावेळी तरी मानवी नियंत्रणात नव्हती, असे निदर्शनास आले आहे. या पुढील काळात चालकांची आरोग्य तपासणी आणि इतर सुरक्षिततेच्या उपाययोजना केल्या जातील, अशी अपेक्षा आहे! पूर्वी हत्ती दिंडीसोबत आणला जाई. पण त्यामुळे अनुचित घटना घडण्याची शक्यता लक्षात घेऊन त्यावर प्रतिबंध आणले गेले आहेत. दिंडीरथाला जोडलेले बैल, घोडे यांच्यामुळे सुद्धा काहीवेळा अपघात घडतात. पण हे प्रमाण अतिशय कमी आहे. दरवर्षी अनुभवातून सुधारणा केल्या जातात. अधिकृत दिंडीत चालणा-या वारकरी मंडळीची स्वयंशिस्त उत्तम असल्याने चेंगराचेंगरीचे प्रकार सहसा होत नाहीत. पण संख्याच मोठी असल्याने वारीचे नियोजन खूप अवघड बनले आहे. सोहळा ज्या ज्या जिल्ह्यांतून जातो, त्या त्या जिल्ह्यांतील पोलिसांकडे सोहळ्याला संरक्षण देण्याची जबाबदारी दिलेली असते. पोलिसांत महिला पोलिसांची संख्याही नजरेत भरण्यासारखी मोठी असून त्यामुळे महिला वारकरी, भाविक यांचे उत्तम संरक्षण होते. वारीत चोरांची संख्याही बरीच असते. पोलिसांमुळे यावर खूप नियंत्रण आलेले आहे.

सासवड-जेज्रुरी मार्गावर झालेल्या या दुर्दैवी अपघातात जीव गमवावा लागलेल्या वारकरी भाविकांना भावपूर्ण श्रद्धांजली! यापुढे अधिक काळजी घेतली जाईल, ही अपेक्षा! रामकृष्णहरी!

– लेख क्र. ५ 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ दारातल्या गप्पा –  लेखिका : प्रार्थना देशमुख ☆ प्रस्तुती – सुनीला वैशंपायन ☆

सुनीला वैशंपायन 

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☆ दारातल्या गप्पा –  लेखिका : प्रार्थना देशमुख ☆ प्रस्तुती – सुनीला वैशंपायन 

साध्या क्षणांत दडलेला आनंद आणि स्त्रीजीवनाचा एक सुंदर भाग!

आपल्या महाराष्ट्रात आणि एकूणच भारतीय संस्कृतीत एक अतिशय साधं पण तितकंच खास असं दृश्य आपण नेहमी पाहतो — घराच्या दारात, जिन्यावर किंवा गॅलरीत उभ्या राहून होणाऱ्या गप्पा… म्हणजेच ‘दारातल्या गप्पा’.

या गप्पांसाठी ना कोणतं निमंत्रण लागतं, ना खास वेळ ठरवावा लागतो. दोन ओळखीच्या स्त्रिया एकमेकींना दिसल्या की बस्स… गप्पांचा प्रवास सुरू होतो. आणि मग वेळ, काम, स्वयंपाक, बाजार… सगळं काही हळूहळू विसरायला लागतं.

“चल निघते आता…” — पण निघणं कधीच होत नाही!

दारातल्या गप्पांमधलं सर्वात प्रसिद्ध वाक्य म्हणजे —

“चल निघते आता गं…”

हे वाक्य साधारणपणे प्रत्येक 10-15 मिनिटांनी पुन्हा पुन्हा ऐकायला मिळतं. पण गंमत अशी की, हे म्हणणारी व्यक्ती प्रत्यक्षात मात्र अजूनही दारातच उभी असते.

“घरात काम आहे गं…”

“स्वयंपाक ठेवला आहे…”

“नवरा येईल आता…”

असं सगळं बोललं जातं, पण तरीही पाय काही हलत नाहीत. कारण गप्पांमध्ये एक वेगळीच ओढ असते — जी माणसाला थांबवून ठेवते.

 

दारातल्या गप्पांचं एक छोटं पण रंगीत विश्व!

या गप्पांमध्ये विषयांची काहीच मर्यादा नसते. अगदी छोट्या गोष्टींपासून मोठ्या चर्चांपर्यंत सगळं काही इथे घडतं.

आजच्या स्वयंपाकाची चर्चा 

भाजी बाजारातले दर 

शेजारच्या घरातील घडामोडी

टीव्ही सिरियलमधले नवीन ट्विस्ट 

आणि कधी कधी जुन्या आठवणींच्या गोड गोष्टीही 

आणि सगळ्यात शेवटी एक ठरलेलं वाक्य —

“आपल्याला काय करायचंय लोकांचं! ” 

 

वेळ कसा जातो हेच कळत नाही…

या गप्पा सुरू झाल्या की वेळ थांबतो असं वाटतं. पाच मिनिटं म्हणून सुरू झालेली चर्चा कधी एक तास होते, हेच कळत नाही.

कुकरची शिट्टी विसरली जाते,

टीव्हीवरील आवडती मालिका चुकते,

कधी कधी फोनवर आलेले कॉलही दुर्लक्षित होतात…

आणि घरात वाट पाहणारे लोक मात्र म्हणत राहतात —

“आता नक्की येतील…” 

 

फक्त गप्पा नाहीत… हा एक मानसिक आधार आहे!

काही लोक याला फक्त वेळ घालवणं म्हणतील, पण खरं पाहिलं तर या गप्पा म्हणजे स्त्रियांसाठी एक छोटासा विराम असतो.

घरकाम, जबाबदाऱ्या, कुटुंब, नोकरी — या सगळ्यांच्या मधोमध स्वतःसाठी काढलेला हा थोडा वेळ म्हणजे मन हलकं करण्याचा एक सुंदर मार्ग असतो.

हसणं, बोलणं, मन मोकळं करणं — हे सगळं मानसिक ताण कमी करतं. आणि म्हणूनच या ‘दारातल्या गप्पा’ अनेकदा औषधासारख्या काम करतात.

– – नात्यांना जवळ आणणारा एक साधा सेतू

या गप्पांमुळे शेजारपाजारात प्रेम, ओळख आणि आपुलकी वाढते.

“ती शेजारीण” हळूहळू “माझी मैत्रीण” बनते.

आणि हेच छोटंसं नातं अनेकदा मोठ्या अडचणीच्या वेळी आधार देऊन जातं.

 

शेवटी इतकंच…

जीवनात मोठ्या गोष्टींपेक्षा छोट्या क्षणांतच खरा आनंद दडलेला असतो.

‘दारातल्या गप्पा’ हे त्याच छोट्या आनंदाचं एक सुंदर उदाहरण आहे.

म्हणूनच…

जर तुमच्या आजूबाजूलाही अशा गप्पांचा फड रंगत असेल, तर त्याकडे फक्त गंमत म्हणून नाही, तर जीवन जगण्याचा एक हलका, सुंदर आणि आनंदी क्षण म्हणून पाहा.

 

तुमच्याकडेही असा अनुभव आहे का? “चल निघते आता…” म्हणत किती वेळ गप्पा चालतात? नक्की कमेंट करा!

लेखिका : प्रार्थना देशमुख 

प्रस्तुती : सुनीला वैशंपायन 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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