(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Bird of Destiny…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – झुके, ना हारे हैं हम…!
☆ ॥ कविता॥ झुके, ना हारे हैं हम…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सॉनेट – जल दिवस।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “देश की मिट्टी…“।)
अभी अभी # ९५६ ⇒ आलेख – देश की मिट्टी श्री प्रदीप शर्मा
हम जिसे देश, वतन, राष्ट्र, भारत माता अथवा धरती माता कहते हैं, वह वास्तव में हमारे देश की मिट्टी ही तो होती है, कहीं काली, कहीं रेतीली, तो कहीं पथरीली।
मिट्टी से ही बना यह शरीर, पंच तत्वों में विलीन हो, इसी मिट्टी में तो समा जाता है।
हम छोटे थे, तो मिट्टी में बहुत खेलते थे। मां हमें दूध पिलाती थी, खिलाती पिलाती थी, फिर भी हम मिट्टी खाते थे। कई बार मां ने मुंह में उंगली डाल मिट्टी बाहर निकाली होगी, हमें मारा भी होगा, लेकिन अपने देश की मिट्टी का स्वाद किस मां के लाल ने नहीं चखा।।
हमें क्यों अपना ननिहाल बार बार याद आता है, क्योंकि वहां मिट्टी में खेलने से कोई नहीं रोकता था। मिट्टी के मकान होते थे मिट्टी के ही आंगन और ओटले होते थे, जिन्हें गोबर से लीपा जाता था। रोज नया चूल्हा जलता था, बढ़िया लिपा पुता हुआ। वहां दूध डेयरी से नहीं आता था, गाय खुद दूध देती थी। तब दूध के दो ही तो नाम होते थे, मां का दूध और गाय का दूध। हां, लेकिन मक्खन तो नानी ही निकालती थी।
हमारा देश और कहीं नहीं है, आज भी हमारे आसपास ही है। एक किसान अगर खेती कर रहा है, अपने खेत की रखवाली कर रहा है, अनाज पैदा कर रहा है, तो वह देश की सेवा ही तो कर रहा है। यही उसकी राष्ट्रीयता है, उसकी देशभक्ति है। अपने देश की मिट्टी से जुड़े रहना ही सच्ची राष्ट्रीयता है।।
देश की इसी मिट्टी के लिए कई रणबांकुरों ने अपने जीवन का बलिदान दिया है। ये माटी सभी की कहानी कहेगी। आप कभी हल्दी घाटी जाइए। महाराणा प्रताप का प्रताप देखिए, हम तो अपने घाव पर हल्दी लगाते हैं, योद्धाओं के लिए प्रकृति हल्दी घाटी बिछा देती है।
हम आज महानगरों के कांक्रीट जंगलों में आकर बस गए, मिट्टी के खिलौने भूल गए। जमीन बीघा एकड़ से सिमटकर स्क्वेयर फीट और इंच में आ गई। सर पर छत नहीं, पांवों के नीचे जमीं नहीं, 1, 2 और 3bhk में हमारी जिंदगी सिमटकर रह गई। इंसान कहां पहचाने मिट्टी और कहां खुला आसमान।।
ऐसे में, अचानक ही, मेरे अपने ही फ्लैट में हमारी बिटिया नर्सरी से दो नन्हे पौधे ले आई, मिट्टी में सने, पॉलीथीन से लिपटे। मुझे उनके लिए गमलों में मिट्टी तैयार करनी थी, और उन्हें सिर्फ गमलों में उतारना था।
जिन्हें बागवानी का और घर के पौधों की देखरेख का शौक है, वे वाकई देश की मिट्टी से ही जुड़े हैं। पौधों की सेवा भी किसी समाज सेवा अथवा ईश्वरीय सेवा से कम नहीं। नन्हीं खिलती कलियां और रंग बिरंगे फूलों की क्यारियां बच्चों की मुस्कान और किलकारियों से कम नहीं होती।।
गमले की मिट्टी में भी मुझे अपने देश की ही मिट्टी नजर आती है। इसी बहाने मैं रोज अपने देश की मिट्टी से तो जुड़ा हुआ हूं। देश की मिट्टी की गंध मुझे अपने गमलों में आती है, वही मेरा तिरंगा है, वही मेरा वंदे मातरम् है। देश की मिट्टी की गंध के आगे सभी सौगंध फीकी है, क्योंकि हमने अपने देश की मिट्टी का स्वाद चखा है …!!
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (30 मार्च से 5 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
परम पावन पर्व नवरात्रि समाप्त हो गया है। परंतु श्री हनुमान जी की हमारी और आपकी आराधना लगातार चलेंगी। इस बार के चौपाई इस प्रकार हैं।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते,
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से यश कीर्ति की वृद्धि होती है, मान सम्मान बढ़ता है। “नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में हनुमान चालीसा की चौपाइयों के संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
इसके उपरांत में अब आपको इस सप्ताह के ग्रहों के गोचर के बारे में बताऊंगा। सप्ताह इस सप्ताह सूर्य और शनि मीन राशि में, मंगल और बुध कुंभ राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र मेष राशि में और राहु कुंभ राशि में मंगल और बुध के साथ में गोचर करेंगे।
आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। साथ ही प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ेगी। अगर आप सावधानी से कार्य करेंगे तो कचहरी के कार्यों में विजय प्राप्त हो सकती है। गलत रास्ते से धन आने का योग है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। विद्यार्थियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य ही रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने कर्म पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। भाग्य से भी थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच अप्रैल कार्यों को करने हेतु उपयुक्त हैं। एक और दो अप्रैल को आपको कोई भी कार्य बड़े सावधानी के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। अच्छे और बुरे दोनों रास्तों से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष मदद प्राप्त नहीं हो पाएगी। कचहरी के कार्यों में रिक्स ना लें। आपका स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। डायबिटीज और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने वाणी पर इस सप्ताह कंट्रोल करना चाहिए। किसी से फालतू लड़ाई नहीं करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। विद्यार्थियों के लिए यह सप्ताह कम ठीक है। उनको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह 30 और 31 मार्च आपके लिए परिणाम दायक हैं। तीन चार और पांच तारीख को आपको सतर्क होकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
मिथुन राशि
कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह अत्यंत अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। विद्यार्थियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह सामान्य गति से चलेगा। भाग्य से इस सप्ताह आप सभी को कम मदद प्राप्त होगी। आपको अपने परिश्रम पर ज्यादा विश्वास करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक नहीं रह पाएंगे। कर्मचारियों को अपने कार्यालय में अच्छा सम्मान प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो अप्रैल कार्यों को करने हेतु फलदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए की आप प्रतिदिन गरीबों के बीच में चावल का दान दें तथा शुक्रवार को मंदिर पर जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपको भाग्य का अच्छा साथ मिलेगा। भाग्य के सहारे आपके कार्य हो सकते हैं। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। आप सभी को इस सप्ताह दुर्घटनाओं के प्रति सचेत रहना चाहिए। व्यय की मात्रा में बढ़ोतरी होगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। पेट में थोड़ा कष्ट भी हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच तारीख सफलता दायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह ठीक-ठाक चलेगा। कर्मचारियों अधिकारियों का भी यह सप्ताह सामान्य रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य होगा। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य के स्थान पर आपको अपने पुरुषार्थ पर यकीन करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 मार्च सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अत्यंत उत्तम है। उनका स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहेगा। आपके माताजी और आपका स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। पिताजी के स्वास्थ्य में थोड़ी परेशानी हो सकती है। शत्रुओं से सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। दुर्घटनाओं से भी आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक और 2 अप्रैल विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। 30 और 31 मार्च को आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह अविवाहित जातकों के विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। भाग्य के प्रति आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। आपको अपने संतान से सहयोग कम मिलेगा। इस सप्ताह आप आसानी से अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं, परंतु इसके लिए भी थोड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच अप्रैल लाभदायक है। एक और दो अप्रैल को अगर आप सावधानी बस कार्य नहीं करेंगे तो कार्यों में आपको नुकसान हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
वृश्चिक राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए काफी अच्छा रहेगा। संतान को उन्नति मिल सकती है। आपको भी संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी परीक्षा में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव हो सकता है। आपके पेट में कष्ट हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति आपको सचेत रहना चाहिए। आपको अपने शत्रुओं से भी सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 मार्च अनुकूल है। तीन चार और पांच अप्रैल को आपको कार्यों को पूर्ण सतर्कता के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
धनु राशि
जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक है। भाई बहनों के साथ संबंध कम ठीक रहेंगे। भाग्य से मदद मिलेगी। यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो अप्रैल कार्यों के लिए परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गरीब बच्चों के बीच में पुस्तकों का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
मकर राशि
इस सप्ताह आपके पास सामान्य रूप से धन आ सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध उत्तम रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। भाग्य आपका साथ दे सकता है। छात्रों को इस सप्ताह पढ़ाई में परेशानी आ सकती है। गलत रास्ते से भी धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और पांच तारीख शुभ है। 30 और 31 मार्च के दिन कार्यों को करने के पहले पूरी प्लानिंग कर लेना चाहिए तथा सतर्कता पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। धन अच्छे और बुरे दोनों रास्तों से आ सकता है। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा बहुत तनाव हो सकता है। माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके अंदर क्रोध की मात्रा बढ़ सकती है। आपको खून संबंधी रोग जैसे डायबिटीज ब्लड प्रेशर से सावधान रहना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। छात्रों की पढ़ाई में बाधा आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 मार्च कार्यों को करने के लिए आनंददायक हैं। एक और दो अप्रैल को आपको कोई भी कार्य पूरी सजगता के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उच्च कोटि का रहेगा। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधानी बरतना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। दुश्मनों को आप आसानी से इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। आपके जीवन साथी को शारीरिक कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो अप्रैल कार्यों को करने के लिए उचित हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
भारतीय स्वातंत्र्यलढ्याचे समर्थन करण्यासाठी आपला देश सोडून आलेली मीराबेन.हिचे मूळ नाव मॅडलीन स्लेड. जन्म २२ नोव्हेंबर १८९२. वडील ब्रिटिश नेव्हीत ऑफिसर होते. सर एडमंट स्लेड वडिलांचे नाव आणि फ्लोरेंन्स आईचं नाव. एका सुस्थितीतल्या ब्रिटिश कुटुंबातल्या मॅडलीनला लहानपणापासून निसर्ग व घोडेस्वारीची आवड.तसेच संगीताची ही आवड होती.पियानो आणि संगीत मैफलीत भाग घेत असे. एकदा त्यासंबंधी कामासाठी जर्मनीला गेली असता रोलॅंडने लिहिलेल्या महात्मा गांधी यांच्या चरित्राविषयी कळले. दुसरे ख्रिस्त आणि विसाव्या शतकातील महान व्यक्तिमत्त्व असे त्यांचे वर्णन ऐकून ती भारावली.
इंग्लंडला परत आल्यावर रोलँड ने लिहिलेले गांधी चरित्र वाचले. आणि गांधीजींची शिष्य होण्याचे, जीवन त्यांना समर्पित करण्याचे ठरविले. त्यासाठी तयारी म्हणून आधी साबरमती आश्रमातील साहित्याचा अभ्यास केला. मांडी घालून बसणे शिकली. आहारात बदल केला. शाकाहार स्वीकारला मांस व मद्याचा त्याग केला. सुत कातणे,लोकर विणकाम शिकली. इंग्लंडमध्ये यंग इंडियाची सदस्य झाली. भगवत् गीता, ऋग्वेद वाचण्याचा अभ्यास केला.
१९२५ मध्ये गांधींची संपर्क साधून त्यांच्या आश्रमात राहण्याची परवानगी मागितली. भारतात येऊन गांधींना भेटल्यावर गांधींनी ‘तू माझी मुलगी होशील’ असे म्हणून तिला ‘मीराबेन’ नाव दिले. आपले जुने जीवन ती विसरली.१९२५ च्या भारतीय काँग्रेसच्या पहिल्या वार्षिक सभेला त्या उपस्थित राहिल्या. साबरमती आश्रमात सुतकताई, विणकाम, स्वयंपाक, स्वच्छता अशी कामे त्या करत. गुजराती व मराठी शिकल्या. साबरमतीत स्वतःने विणकाम केंद्र सुरू केले. रवींद्रनाथ यांच्या शांतिनिकेतनला भेट दिली.१९३१ च्या गोलमेज परिषदेसाठी गांधींबरोबर केल्या. गांधीना अटक झाल्यावर त्यांनाही अटक झाली. आर्थर रोड आणि साबरमती तुरंगात राहावे लागले.
इंग्लंडमध्ये जाऊन सरकारला पटवून दिले की, भारत देश चालवायला समर्थ आहे. ब्रिटिश वसाहत वादामुळे ग्रामीण उद्योगांचा विनाश होतो. उच्च कर लादले जातात. भारत छोडो चळवळीत गांधी व कार्यकर्त्यांबरोबर त्यांनाही अटक झाली. दोन वर्षे पुणे येथे आगाखान पॅलेस मध्ये होत्या. नंतर हरिद्वार येथे किसान आश्रम स्थापला. गो संरक्षणाचे काम केले. भारताच्या स्वातंत्र्याची संबंधित सिमला परिषद, संविधान सभा, भारताची फाळणी आणि गांधीहत्येच्या त्या साक्षीदार होत्या. स्वातंत्र्यानंतर शेती, दुग्ध व्यवसाय, वनसंरक्षण, पर्यावरण या क्षेत्रात काम केले. पुढे १९६० मध्ये ऑस्ट्रेलियाला स्थलांतरित झाल्या. १९८२ मध्ये मृत्यू झाला. त्यापूर्वी १९८१ मध्ये भारताचा दुसरा सर्वोच्च नागरी सन्मान पद्मविभूषण प्रदान करण्यात आला. त्यांनी काही पुस्तके लिहिली स्वतःचे चरित्र, गांधींची मीरेला पत्रे इ. अशा प्रकारे एका सुखवस्तू ब्रिटिश घरातील मुलगी आपले पूर्वीचे नावासकट सर्व विसरली आणि भारतीय नेत्याची कार्यकर्ती व मुलगी म्हणून राहणे पसंत केले. सगळेच अतर्क्य !
☆ त्या दिवशी असं झालं… भाग १(भावानुवाद) – गौतम राजऋषी ☆ उज्ज्वला केळकर ☆
‘तुला काही झालं असतं ना… तू मेला असतास ना… तरी मी तुझ्याशी आजिबात बोललो नसतो… कधीच… ’ संग्रामचा हा मोबाईलवर आलेला डायलॉग ऐकताना, त्याही स्थितीत गौरवला खदाखदा हसू आलं. त्याही स्थितीत… म्हणजे गेले पाच-सहा दिवस असह्य वेदनांमुळे बाहेर पडणार्या किंकाळ्यांना मोठ्या संयमाने रोखून धरत असतानाही, त्याला संग्रामच्या बोलण्याचं हसू आलं. त्याला असं खदाखदा हसताना आहून बेस हॉस्पिटलची हेड नर्स शकुंतला मॅमनी त्याच्याकडे चमकून पाहीलं. त्याच्या या अशा मोठमोठ्याने हसण्यामुळे, तीन दिवस आधी पोटावर आणि डाव्या हातावर घातलेल्या टाक्यांवर अतिरिक्त ताण तर पडणार नाही ना, अशी त्यांना शंका येत होती आणि तसं होणं मुळीच योग्य नव्हतं. शकुंतला मॅमच्या चमकून बघण्यामागे ही काळजी होती. पण गौरवला असं हसताना पाहून तिचं मन द्रवलंही. गेल्या पाच-सहा दिवसाच्या त्याच्या मूक अश्रूपाताची ती एकटीच साक्षीदार होती.
श्रीनगरच्या या आर्मी बेस हॉस्पिटलच्या भितींवर या दिवसात दु:ख, वेदनेचा, नवा मजकूर लिहिला जात होता. बदामी बागेच्या आर्मी कॅंन्टोंन्मेंटच्या विशाल पसरलेल्या परिसराच्या मधे असलेले ते बेस हॉस्पिटल किती तरी वर्षांपासून किती तरी किंचाळ्यांचं, कण्हण्याचं मूक साक्षीदार बनलय. विशेषत: गेल्या दहा-पंधरा वर्षापासून, जेव्हापासून आतंकवादाने या घाटीत आपलं डोकं वर काढलय, तेव्हापासून जरा जास्तच. गोळ्यांनी विंधलेल्या, बॉम्बनी क्षत-विक्षत झालेल्या सैनिकांच्या शरिरांनी या हॉस्पिटलचे बेड भरलेलेच असायचे.
ऑफिसर वॉर्डच्या दहा बेडच्या हॉलमध्ये एका कोपर्यातल्या बेडवर गौरव पडलेला होता. शेजारी ठेवलेल्या एका उंच स्टॅंडवर प्लॅस्टर घातलेला त्याचा डावा हात क्लिपमध्ये बांधून ठेवलेला होता. ओठातून उमटत असलेलं दबक्या आवाजातलं कण्हणं, त्या भिंतींवर नव्या काव्यपंक्ती लिहीत चाललं होतं. गौरव… मेजर गौरव वत्स… सात गोळ्या आपल्या शरीरात सामावलेला. केवढा तरी रक्तपात झाल्यानंतर, हॉस्पिटलच्या डॉक्टरांच्या मते, त्याचं जीवंत रहाणं हा मोठाच चमत्कार होता. डॉक्टरांच्या या कथित चमत्कारानंतर, त्याच्या शौर्याची, वीरतेची सगळीकडे चर्चा होत होती. ‘कॉन्ग्रेचुलेशन मेजर.. ’ आणि ‘वेल डन माय बॉय… ‘ सारखे उद्गार भेटायला येणार्यांच्या ओठांवर विराजमान होते. अशा सगळ्या ‘कॉन्ग्रेचुलेशन्स’ आणि ‘वेल डन’वर, गौरवला सगळ्या मर्यादा तोडून आभाळाला जाऊन भिडेल, इतक्या मोठयाने किंचाळावसं वाटतं. कसलं शौर्य? कसली वीरता? जेव्हा त्याचा बड्डी… साथीदार लांस नायाक खुशहाल सिंह याने त्याच्यासमोर प्राण सोडला होता… जेव्हा त्याच्यासाठी बाहेर पडलेल्या गोळीने त्याच्या लाडक्या अतिप्रीय सिद्धार्थचा जीव घेतला, तेव्हा तो काहीच करू शकला नाही. मग यात शौर्य कुठून आलं? किती तरी वेळा त्याला वेदना असह्य होते. खूप मोठयाने ओरडावसं वाटतं पण त्याने स्वत:वर कामालीची बंधने घालून घेतली आहेत. ओठातून बाहेर पडण्यापूर्वीच किंचाळीला मूक व्हावं लागत होतं. तसंही, कुठल्याही सैनिकाला, आपलं दु:ख, आपल्या वेदना, यामुळे कण्हण्याची, ओरडण्याची परवानगी, त्यांची वर्दी देत नाही. ‘गट्स’ आणि ‘ग्लोरी’चा परीघ, क्रूरतेच्या हद्दीपर्यंत सगळा अंधार, वर्दी आपल्या चमकत्या आवरणाखाली लपवून ठेवते.
तीन दिवस आय. सी. यू. मध्ये बेशुद्धावस्थेत पडून राहिल्यानंतर आज जेव्हा त्याला ऑफिसर वॉर्डमध्ये आणलं गेलं, तेव्हा त्याला त्याचा मोबाईल हातात घेण्याची परवानगी मिळाली. शेकडो एसएमएसनी त्याचा इनबॉक्स तुडुंब भरला होता. पहिला कॉल त्याने गीतालीलाच केला.
‘हाऊ आर यू माय हीरो? ’ स्वत:ला सहज असल्याचं दाखवण्याचा प्रयत्न करता करता ती हमसून हमसून रडू लागली.
’कमॉन सोना… तूच जर असं करू लागलीस, तर कसं होणार? तूच तर माझी ताकद आहेस ना! ’
‘किती दुखतय? ’
‘आता कुठलं दु:ख सोना! तू विचारलंस आणि सगळं दु:ख गायब. हा… हा… ’ गौरवनं जबरदस्तीने हसण्याचा प्रयत्न केला.
’राहू दे… राहू दे… हा डायलॉग तुझ्या गर्लफ्रेण्डससाठी राखून ठेव! ’
‘कुठल्या गर्लफ्रेण्डस बेबी? कधीच सुटल्या सगळ्या… तुझ्याशी बांधला गेलो तेव्हा. बरं मला सांग, मम्मी, पप्पा कसे आहेत? आणि माझी टिप्सी? ’ गौरवने विषय बदलत विचारलं. त्याच्या मनात अनेकानेक एसएमएसनी भरलेला इनबॉक्स चमकत होता. पण ते कुणाचे आहेत, ते त्याला कळणार नव्हतं कारण काही दिवसांपूर्वीच त्याने स्वत:च सगळे नंबर डीलिट केले होते.
‘न्यूज कळल्यापासून मम्मींचं रडणं थांबतच नाही आहे. पप्पा गप्प गप्प आहेत. आजीचं रडणं पाहून टिप्सीला कळलं, आपल्या पापांना गोळी-बिळीसारखं काही लागलय. काल आपल्या सगळ्या दोस्तांना सांगत होती की तिच्या पापांना गुंडांशी लढताना जखम झालीय. ’ गीतालीचे हुंदके मोबाईलच्या स्पीकरमधून बाहेर पडून वॉर्डमध्ये तरंगू लागले.
हॉस्पिटलच्या मूक भितींवर आधीपासूनच लिहिलेल्या दु:ख, वेदनांच्या कहाण्यांवर नवीन नवीन थर चढत होते. त्याला संग्रामच्या कॉलने थोडासा विसावा मिळाला होता. कोणत्याही परिस्थितीत, प्रत्येक क्षणी त्याची हसरी, खेळकर वृत्ती कायम असायची. अथांग पीडेच्या क्षणीही, त्याच्या कॉलने हसण्यासाठी गौरवला विवश केलं होतं. गौरवकडून सगळं जाणून घेण्यासाठी तो उतावीळ झाला होता. ऑपरेशनमध्ये कुठे गडबड झाली की ज्यामुळे आतंकवाद्यांचा निपटारा करताना गौरवच्या बटालियनला इतकं नुकसान सोसावं लागलं? झालेल्या क्षितीसाठी नुकसान शब्द छोटाच म्हणायला हवा. यावेळी गौरवला ते जाणवत असणार, ही गोष्ट संग्रामच्या लक्षात येत होती. दोन आतंकवाद्यांना मारून टाकण्यात भारतीय सेनेचा एक कॅप्टन आणि एक जवान यांना हौतात्म्य पत्करावं लागलं होतं आणि एक मेजर अतिशय घायाळ होऊन हॉस्पिटलमध्ये पडला होता. संग्रामने दोन-तीन वेळा विचारल्यावर गौरवने कण्हल्यासारख्या आवाजात म्हंटलं होतं, ‘हे सांग संग्राम, कुणाच्या असण्यासाठी कुणाचं नसणं, नियतीच्या कोणत्या कायद्यात बसतं? ’
‘मला माहीत आहे गौरव तू कॅप्टन सिद्धार्थबद्दल बोलतो आहेस ना? कसं झालं दोस्त हे सगळं? तुम्हाला जर पक्की खबर होती की त्या घरात विदेशी आतंकवादी लपलेले आहेत, तर घरात घुसण्याची काय गरज होती? बाहेरूनच बॉम्ब टाकून घर का नाही उडवलंत? सरकार मालकाला पूर्ण पैसे देतंच की! ’
‘सगळं कसं धूसर धूसर आहे संग्राम… आत्ता मला तू माफ कर. ’
‘ठीकाय! ठिकाय! आत्ता तू आराम कर. स्वत:ची काळजी घे. जे झालं ते झालं. यू डीड युअर बेस्ट… गीतालीचा कॉल आला होता. तुला बघायला श्रीनगरला यायचं म्हणतेय. मला म्हणत होती, घेऊन चल… मलासुद्धा तुला बघावसं, भेटावसं वाटतय. ’
‘कुणीही येणार नाही इथे… मला एकट्यालाच राहू दे. ’ गौरवने ओरडत फोन कट केला.
सगळी मीडिया या ऑपरेशनच्या वेळी सेनेच्या झालेल्या त्रुटीबद्दल हा:हा:कार माजवत होती. संग्रामला माहीत होतं की सत्य काय आहे, ते केवळ आणि केवळ त्याचा जिगरी दोस्त गौरवच सांगू शकतो आणि ते सत्य तो आपल्या चॅनेलद्वारा सर्वांपुढे आणू इच्छितोय. दोघांची दोस्ती लहानपणापासूनची. ‘दो जिस्म मगर एक जान’ सारखा एखादा बिल्ला लावून वाढलेली. मोठी झालेली. आता गौरवच्या आवाजात असलेली वेदना संग्राम आपल्या छातीत अनुभवत होता. संग्रामच्या प्रश्नांनंतर गौरवला पेन-किलरच्या इंजक्शनची अवश्यकता कित्येक पटीने जास्त वाटू लागली होती. शकुंतला मॅमला थोडी काळजी वाटत होती. पेन-किलरच्या इतक्या जास्त डोसाचा काही विपरीत परिणाम तर गौरवच्या शरीरावर होणार नाही ना? . या काळजीपोटीच गौरवने वारंवार केलेल्या विनंतीवरून त्याला हॉस्पिटलच्या परिसरात सिगरेट ओढण्याची परवानगी देण्यात आली होती. गौरवचं म्हणणं होतं की विल्सवाल्यांनी आपली ‘क्लासिक’ नावाची जी चौर्याऐशी मिलीमीटरची नळी… सिगरेट बाजारात उतरवलीय, तिच्या तोडीचं दुसरं पेन-किलर सध्या तरी शक्य नाही. यावर, शकुंतला मॅम आणि गौरवच्या डॉक्टरांचं हसू त्या ऑंफिसर वॉर्डमध्ये किती तरी वेळ खळखळत राहीलं.
वेदनेच्या उत्तुंग लहरींनी भिजलेला फेसाळ किनारा, केव्हढ्या तरी दु:खाचा फेस घेऊन हळू हळू वाहणारा काळाचा प्रवाह गुपचुप बघत होता. काश्मीरच्या त्या ऑक्टोबरच्या कुडकुडणार्या थंडीत धुक्यात न्हालेल्या दुपारी आणि उदास हुडहुडी भरवणार्या रात्रींच्यामध्ये पेन कीलरच्या इंजक्शनच्या गुंगीत असताना मधेच खडबडून जागा व्हायचा गौरव. दूरवरून, ’गौरव सर.. ’ अशी हाक यायची आणि खूप वेळपर्यंत त्याच्या कानाच्या अनंत खोलीत, त्याची झोप उडवत ती गुंजत राहयाची. दूरवरून येणार्या प्रत्येक हाकेसरशी त्याला उठून तिकडे जावंसं वाटायचं पण पोटावर बांधलेल्या भरभक्कम पट्ट्या आणि क्लिपमध्ये अडकवलेला त्याचा प्लॅस्टर घातलेला डावा हात त्याला तसं करण्यापासून रोखायचा. त्या रात्री सिद्धार्थचा आवाज ‘गौरव सर… सेव्ह मी प्लीज… ’, वॉर्डचे झरोके आणि खिडक्या यातून खाली उतरून वॉर्डच्या चारी बाजूच्या भिंतींवर टांगला गेला. डॉक्टरांनी त्याचे पोट आणि डाव्या हातावर अनेक गुंतागुंतीच्या शस्त्रक्रिया करून टाके घातले होते, त्याला अवघा दीड आठवडा झाला होता.
आकाशातून बारीक बारीक बर्फाचे फाये हळू हळू खाली उतरत होते. मध्यरात्र होऊन गेली होती. कॅप्टन सिद्धार्थ राय आपल्या फूल बॅटल गिअरमध्ये रक्तरंजित वर्दीसहित वॉर्डच्या एका झरोक्यातून तरंगत तरंगत त्याच्या बेडच्या जवळ येऊन उभा राहिला. त्याच्या चेहर्यावरून टपकणारं रक्त गौरवाच्या पोटावर पडत होतं आणि न जाणे, कसल्या उदास, विरक्त दृष्टीने तो टकामका गौरवकडे बघत होता. क्षणभरातच गौरवच्या चित्काराने सगळा वॉर्ड गडबडून उठला. थोड्या वेळापूर्वी शिफ्ट ड्यूटीवर आलेल्या शकुंतला मॅम पळतच गौरवच्या बेडपाशी आल्या. ऑक्टोबरच्या त्या थंडीतही घामाने भिजलेल्या गौरवला पाहून त्या घाबरून गेल्या. त्याच्या डोक्यावर मायेने हात फिरवत त्यांनी विचारलं,
‘काय झालं बेटा? आर यू ऑल राईट? ’
‘मी त्याला वाचवू शकलो असतो मॅम.. आपल्या सिद्धार्थला मी वाचवू शकलो असतो.. ’ असं म्हणत तो स्फुंदून स्फुंदून रडू लागला.
‘इतका विचार करू नकोस गौरव! झालं ते झालं… सगळं काही नियतीच्या हाती… ’ लहान मुलाप्रमाणे हमसून हमसून रडणार्या, सैन्यातील त्या मेजरला कसं समजावावं, ते शकुंतला मॅमच्या लक्षात येत नव्हतं.
– क्रमशः भाग पहिला
मूळ हिंदी कथा – ‘गर्लफ्रेंड’ मूळ लेखक – गौतम राजऋषि
अनुवाद – उज्ज्वला केळकर
संपर्क –निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३ सेक्टर – ५, सी. बी. डी. – नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
☆ “खेळ नशिबाचा असला तरी..” ☆ सुश्री संध्या बेडेकर ☆
सध्या चालू असलेल्या भारत इंग्लंड ची मॅच, मी माझ्या वडिलांबरोबर बघत होते. शेवटच्या बाॅलवर सिक्स गेला. व त्या एका बॉलमुळे म्हणा किंवा सिक्स मुळे म्हणा आपण हातातोंडाशी आलेला मॅच हारलो.
त्या नंतर त्यावर चर्चेला रंग चढला. जो तो आपापल्या बुद्धी नुसार, त्या एका बाॅलवर आपली प्रतिक्रिया देण्यात दंग होता. चर्चेला उधाण आलं होतं. प्रत्त्येक जण या क्षेत्रातील expert असल्यासारखे विश्लेषण करत होता.
बॉल असा फेकला असता तर, पिच कसं आहे?? त्याप्रमाणे बॉल फेकायला पाहिजे होता. या मोमेंटवर कोणी फुल टॉस बॉल फेकतो का?? वगैरे वगैरे अंतरराष्ट्रीय स्टेजवर बसलेले कॉमेंटेटर्स तर आपले गहन विचार मांडत होते. जूने उदाहरण देऊन यावर चर्चा करण्यात गुंग होते. काय आणि कसं करायला हवं होतं?? यावर ‘expert comments ‘ देण्यात प्रत्येकाने स्वतः ला झोकून दिलं होतं. क्रिकेट प्रेमी तर पार कोलमडले होते.
मी बाबांना विचारलं, हे सर्व बरोबर बोलताहेत का?? मला मॅच बघायला आवडत, पण खूप बारीक सारीक डिटेल्स काही कळत नाही. डिस्कस करता येत नाही.
तेंव्हा बाबा म्हणाले,
हा बॉलरही इंटरनॅशनल प्लेअर आहे. बरेच मॅचेस खेळलेला आहे. तो प्रत्यक्ष फिल्ड वर आहे. त्यानेही काही तरी विचार बॉलफेकण्यापुर्वी केलाच असेल ना. त्यालाही हे “एक बॉल पाच रन्स ” हे समीकरण माहित होतं, त्यालाही जिंकायचीच इच्छा होती. ते त्याच्या करिता आणि टीम करिता सर्वच दृष्टीने आवश्यक होतं. महत्वाचे होते. आणि फायद्याचेही होत. मॅच विनर/ फिनिशर म्हणून त्याच्यावर शिक्का लागला असता. तर, त्याची ‘ IPL’ मध्येही किंमत वाढली असती. जाहिराती मिळाल्या असत्या.
“जैसा परफोर्मेंस वैसी प्राइस मिलती हैं।” बॉल फेकण्याआधी कॅप्टन व त्याचे डिस्कशन ही झाले होतेच.
पण यावेळेस निशाणा ठिकाणी लागला नाही. हे खरय. त्याने जो विचार करून बॉल फेकला, तसं झालं नाही. बॅट्समनला पण जिंकायचं होत, त्यांच्यासाठी पण एकच चान्स होता, त्याने शेवटच्या बॉलवर आपले प्राण लावले, शक्ती लावली, तो सफल झाला.
यात चूक कोणाचीच नाही. असं होतच.
“कोशीश करना हमारा कामं है, हारजीत तो परिणाम हैं ”
दोघांनी आपापल्या दृष्टीने बरोबरच विचार केला. सिक्स च्या जागी तो कॅच आउट झाला असता. कदाचित स्टंप्स उडाले असते. तर बाजी पालटली असती.
आयुष्यातही असच होत असत. किती तरी निर्णय आपण घेत असतो. प्रश्न / समस्याच्या degree of difficulty, नुसार आपण त्यावर विचार करतो, कधी दुसऱ्या कोणाबरोबर विचार विमर्श ही करतो. प्रत्येकाला आयुष्यात जिंकायचेच असते. कोणालाही हार, नुकसान नको असते. प्रत्त्येक जण धावायचाच प्रयत्न करतो, पडायचा करत नाही. पण प्रत्त्येक वेळेस आपल्या मनासारखे होतेच असं नाही. निर्णय घेताना परिस्थिती वर खूप विचार करूनही कधी कधी नुकसान होतेच. हार होते, निर्णय चूक घेतला, हेही सर्व नंतरच कळत. घटना घडून गेल्यावरच कळत. शेअर्स मध्ये नुकसान झाले. घराचे बुकिंग झाल्यावर बिल्डरने धोका दिला, पैशाची गुंतवणूक चूक जागी झाली. हे सर्व नंतरच कळत. प्रयत्न शेवटपर्यंत जिंकायचाच असतो.
हार की जीत मॅच झाल्यावरच कळत.
यालाच नशीब म्हणतात का??
प्रत्त्येक निर्णय विचार पूर्वक घेतल्यानंतर ही असं का होतं??
परिस्थिती बदलली की निर्णयही बदलतात.
वेळ कधी कशी येईल?? सांगता येत नाही. रात्री रामाला राज्य द्यायचा निर्णय झाला होता, परंतु सकाळी वनवास मिळाला.
“अपेक्षा घेऊन सुरू केलेला प्रत्येक दिवस अनुभव देऊनच जातो, मग तो देवमाणूस असो नाहीतर सामान्य माणूस असो. “
निसर्गाच्या नियमानुसार बदल होत असतात. आयुष्यात ही बदल होत असतातच. बालपण, तारुण्य, म्हातारपण या वेगवेगळ्या फेज मध्ये खूपदा गणित बदलत, समीकरण बदलतात. तेंव्हा त्याप्रमाणे आधी घेतलेले निर्णय कधी विचार पूर्वक तर कधी नाइलाजाने बदलावे लागतात. म्हणून निर्णय घ्यायचेच नाही असं नाही. पण लवचिकता ठेवावी. जेवढ लवचिक राहाल तेवढं चांगलं.
खूपदा लोकांनी घेतलेल्या निर्णयांवर आपण चर्चा करतो. जोपर्यंत आपल्यावर एखादी ‘तशी’ वेळ येत नाही. तोपर्यंत आपल्याला त्या गोष्टी चे गांभिर्य कळत नाही.
घरचा प्रमूखाला तर नेहमीच मोठे निर्णय घ्यावे लागतात. त्याच्या निर्णयावर तर घरच्यांच्या बऱ्याच गोष्टी/ भविष्य अवलंबून असतात. प्रमूख नेहमी परिवाराच्या भल्याचाच विचार करून निर्णय घेतो. पण ते नेहमी बरोबरच सिद्ध होत, असं नाही.
घरच्या प्रमूखाची स्थिती घरावरील पत्र्याच्या शेडसारखी असते, जो ऊन, पाऊस, वादळ, वारा सर्व नैसर्गिक आपत्ती झेलतो. आयुष्यात येणारे उतार चढाव सर्वांना तोंड देतो. आपल्या क्षमतेनुसार निर्णय घेतो. पण त्या खाली राहणारे नेहमी म्हणतात की,
“हा खूप आवाज करतो. ” नेहमी सर्व खुश असतातच असं नाही.
घरच्यांना बरेच निर्णय पटत नाही. कदाचित चूकतही असतील. पण जाणूनबुजून कोणी नुकसान करण्यासाठी चूकीचे निर्णय घेत नाही.
कदाचित नशीबात तेच लिहिले असते. म्हणून तसे निर्णय घेतले जात असावेत.
“अकल कितनी भी तेज़ हो, नसीब के बिना जीत नहीं सकते ।”
म्हणतात ना,
” देवाला हसवायचे असेल तर त्याला आपला प्लान सांगावा, तो म्हणे गालातल्या गालात हसतो. ” त्याने आधीच आपले आयुष्य ठरवून ठेवलेले असते, त्याचे सर्व निर्णय घेऊन झालेले असतात.
“कोई चाहें कितना भी सोच ले,
आखिर में हुकुम का इक्का कुदरत ही फेंकती हैं।”
निर्णय चूकला तर वाईट वाटणे सहाजिकच आहे. पण (guilt) अपराधीपणाची भावना नसावी.
कधी कधी न ठरविलेल्या/ अपेक्षा नसलेल्या गोष्टी सहज घडतात/मिळतात. तर कधी खूप विचार करून घेतलेले निर्णय अपेक्षेप्रमाणे, मनासारखे नसतात. यालाच बहुतेक नशिबाचे खेळ म्हणतात.